ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 181–190
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 181–190
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* ब्रह्मविज्ञान होती रहेंगी। तात्पर्य है कि जिस की जीवन होती है उसी प्रकार प्रत्येक यह पदार्थों की प्रकार उत्पत्ति वस्तु भी का यज्ञ से स्वरूप ही समझनी या प्रत्येक चाहिये वस्त । रक्षा यज्ञ से हो ( ११ यज्ञ से होने वाली प्रजापति की प्रजा दो प्रकार की है- देवे और भूते । देवता ३३ हैं, ८ वसु, , १२ आदित्य द्यो , और रहनेवाले ग्रादित्यों पृथ्वी । इनमें वसुत्रों में सब से प्रथम अग्नि है और रुद्रों के पीछे सिलसिला में बारहवां ग्रादित्य विष्ण है इस प्रकार अग्नि से लेकर विष्णु तक जो देवताओं का जारी हो जाता है उसको देवताओं संन्निवेश है । इस यज्ञ । के द्वारा यज्ञ कहते हैं । इसी यज्ञ में सब का जिन सिलसिले देवताओं में सब देवताओं का समुदाय बनता है उसी को प्रजापति कहते हैं । इन ही ३३ के रूप में प्रजापतिका फैलाव होना अनिरुक्तप्रजापति का निरुतरूप है । किसी के ६ - तीनों वेदों में से ऋक् और साम का अपने ग्राप उत्यमन ( उठना ) नहीं होता इसीलिये न दोनों ग्रन्न होते हैं ग्रग्निरूपी जो वाक है वह और न इन दोनों का कोई दूसरा ग्रन्न होता है किन्तु इनमें । ग्रानन्द भी है एक श्रीर अन्न भी इसीलिये है अन्न लेने के उद्देश्य से उक्थ से उठकर अकं बनता है यह प्रकार का भी रूप उत्क्रमण है और दूसरे किसी प्रजापति के अन्नाद प्राण के आक्रमण के कारण अन्न से ग्रग्निका उत्क्रमण हो से यहां का अग्नि या बाक खिच कर दूसर के शरीर जाता है । ग्रंथांतु दूसरे के बल में चला प्रकार का उत्क्रमण है । इनमें अन्नाद जाता है वह दूसरे ग्रात्मा की तृप्ति करता है, यह दूसरे प्राण को अग्नि बनाया जाता है वह सोम कहलाता कहते हैं । और जो अंश खींच कर दूसरे का अन्न है | जब कभी सोम किया है तो सोम तत्काल ही अपने रूप से बदल कर ग्रन्नाद अग्नि में हवन जाता में ऊर्क हो जाता ठडा रस है । यह रस थोड़े ही काल प्राणरूप है । ऊ एक प्रकार का बल बढानेवाला मैं प्रकार प्राण, ऊर्क और परिणत हो जाता है । वह प्रारण फिर अन्न को ग्रहण करने लगता है, इस पकड़े रहता है और एक ते एक ग्रन्न इन तीनों का परस्पर पनिष्ट सम्बन्ध हो जाता है । एक को एक उत्पन्न होता सिलसिलेवार क्रिया को यज्ञ वहले / हैं जगत् है । इन तीनों के इस प्रकार परस्पर उत्पत्ति की में किसी भी के बिना नहीं होती । पदार्थ की उत्पत्ति या स्थिति इस यज्ञक्रिया है । यही यज्ञक्रिया हमारे इस प्रकार का यह प्रत्येक में प्रत्येक समय में रातदिन जारी रहता शरीर को यज्ञ वस्तु रहता है । यद्यपि हमारी ग्रात्मा अग्नि को या हमारी आत्मा को प्रतिक्षण स्वर्ग में पहुचाता प्रतिक्षण है तथापि हमारे शरीर में सूत्रा-त्मा के सूर्य रूपी स्वर्ग मण्डल में इसी यज्ञ के द्वारा जाती रहती शरीर में द्वारा क्षेत्रजात्मा कि इनके स्वर्ग जाने पर भी ज्यों रहते हैं की त्यों या प्रज्ञात्मा इस प्रकार बन्धे हुए या शरीर के सम्बन्ध का अभियान आत्मा की स्थिति बनी रहती है और उनका इन्द्रियों के साथ सम्बन्धजाते हये भी अपने को स्वर्ग भी ज्यों का त्यों हमारी आत्मा नित्य स्वर्ग जाती बना रहता है इसलिये आकार में सूर्य की गति के कारण हुई नहीं पहिचानती में सूर्य के बिम्ब का रस विस्त्र । जिस प्रकार जल से बिम्ब से रस का जाना नहीं प्रतीत में भी भी ज्यों का त्यों फिर आजाने बंधा बदलता ही रहता है तो बिना बंधे हये भी हुआ दीखता होता न ज्यों का त्यों बिम्ब जल के साथ कुछ हानि प्रतीत होती है अपने को समझती है किन्तु है उसी बिना बंधी हुई भी बंधी हुई सी अपने प्रकार शरीर में हमारी आत्मा को बाहर जाते । हुए नहीं मानती । १४६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान यज्ञभक्तिसूत्र ऊपर लिखे हुए यज्ञ प्रकारों का तात्पर्य यह है कि अग्नि के संस्कार को यज्ञ कहते हैं । अग्नि को हमने ३ प्रकार से देखा है- वैदिक, दैविक और भौतिक । इन सभी ग्रग्नियों का संस्कार करना ही यज्ञ है - वैदिक अग्नि को यजुः कहते हैं । यजुः के रस से ही प्रत्येक वस्तु का स्वरूप वना हुआ रहता हैं वही वजुः ऋक् होकर निकल जाता है और सोम के द्वारा साम रूप से लाकर फिर श्रग्नि वनकर यजुः हो जाता है यही वैदिक अग्नि का संस्कार है । और दूसरा दैविक अग्नि वह है जिसके वसु, रुद्र, ग्रादित्य के विभाग से प्रजापति का वैतानिक स्वरूप बनता है, और जिसमें ३३ देवतात्रों का सन्निवेश है, उसी में ग्रन्न, ऊक्ळे प्राण के परस्पर परिग्रह द्वारा यज्ञ का स्वरूप वतलाया जा चुका है, और तीसरा भौतिक-श्रग्नि है जिसमें आहुति हुआ करती है इस बाहुति से अग्नि बनकर फिर कभी सोम हो जाता है, यह भी प्रकार दिखाया जा चुका है, किन्तु इसमें विशेषता यह है कि अग्नि में प्राहुति दो प्रकार के पदार्थों अग्नि और सोम की होती है । अग्नि के संस्कार के लिए यदि अग्नि ही की बाहुति दी जाय तो अग्नि वयनयज्ञ या अग्नियज्ञ कहते हैं | वह अग्नि जिसमें अग्नि या सोम की आहुति दी जाती है वह ११ प्रकार की है- ( १ ) गार्हपत्य जो पृथ्वी से सम्बन्ध रखता है, ( २ ) ग्राहवनीय को सूर्य से संबन्ध रखता है और तीसरा अन्तरिक्ष से संबन्ध रखने वाले ८ प्रकार के धिष्ण्याग्नि हैं और ११ वीं नैऋताग्नि - इन ग्यारहों श्रग्नियों में अग्नि या सोम की आहुति देना ही अग्नि या सोमयज्ञ है । अग्नि चयनयज्ञ में अग्नि दो प्रकार का है -चित्य और चितेनिधेय इनमें भूत और देवता ये दोनों प्रकार के चित्याग्नि होते हैं जब अग्नि में अग्नि की आहुति से अग्नि का चयन किया जाता है तो अग्नि के बलवान् होने से ग्रात्मा भी प्रबल हो जाता है, इसीलिए उसमें भूतों का संबन्ध या सोम का सम्बन्ध निर्बल होकर टहनी में से सूखे हुए पत्तों के अनुसार झड़कर अलग हो जाते हैं इसीलिये आत्मा पृथ्वी और चन्द्रमा दोनों छोड़कर शुद्ध निराले अग्निरूप से सूर्य में चली जाती है, अर्थात् वैश्वानरश्रग्नि जो दिव्य और पार्थिव अग्नि के मेल से उत्पन्न हुआ है इसमें से पार्थिव अग्नि का चयन संस्कार द्वारा पार्थिवपना मिट कर दिव्याग्नि भाव ही रह जाता है । जिससे आत्मा की कैवल्य मुक्ति हो जाती है । परन्तु अग्नि में यदि सोम की आहुति दी जाय तो उस आत्मा की मुक्ति नहीं होती, किन्तु स्वर्ग का सुख उसको अवश्य होता है । उसके शरीर में निघेवाग्नि रूप देवता सूर्य के संवत्सर से आकर मनुष्य के देह की आत्मा वनती है और शरीर के वैश्वानर से एक होकर अग्नि के स्वभाव से प्रतिक्षण शरीर से बाहर द्यौ लोक की ओर जाया करते हैं । जिस प्रकार सूर्य का सवत्सर सब देवतायों से बना हुआ होता है उसी प्रकार जीव के शरीर में वंश्वानर अग्नि भी सब देवतायों से बना हुआ है । इसलिये ग्रग्नि में सोम की प्राहुति करना सब देवताओं में ही प्राहुति करना है और इस आहुति को यज्ञ कहते हैं । मेरे शरीर का वैश्वानर सूर्य के संवत्सर की प्रतिमा है, अर्थात् पूर्ण सादृश्य है इसी कारण से सूर्य संवत्सर के जितने अवश्य होते हैं उतने ही अवयव इस वैश्वानर के भी जानने चाहिये । जब हम यज्ञ करते हैं तो उसकी प्राहुति ऊपर जाकर जिस प्रकार सूर्य के संवत्सर का संस्कार करती है उसी [ १५० ]
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* ब्रह्मविज्ञान * प्रकार उसके साथ - साथ ही यजमान के वैश्वानर का भी संस्कार करती रहती है । इसीलिए हम प्रथम सूर्य संवत्सर के अवयव को दिखाते हैं । संवत्सर का सबसे छोटा अवयव ब्रहोरान है । ३६० ग्रंणों में से आये - याचे अंश मिलाकर एक श्रंश का अहोरात्र होता है इसीलिए संवत्सरचक में एक - एक अंश काले, सफेद के विभाग से दो - दो होकर पूरे ७२० विभाग होते हैं इन में एक काला दूसरा सफेद एकान्तर क्रम से रहते हैं इस पर कोई प्रश्न कर सकता है कि ये अहोरात्र सूर्य के कारण नहीं प्रत्युत पृथ्वी के कारण होता है आकाश में पृथ्वी जहां पर है उसके सूर्य की ओर आधा भाग ऊजाले में रहता है और दूसरी ओर का आधा भाग काली छाया में रहता है । पृथ्वी चाहे साल भर में सूर्य के चारों ओर कहीं भी रहे वहां उसकी इसी प्रकार दोनों ओर सफेद, काले भाग रहते हैं, किन्तु जहां पृथ्वी है केवल उसी स्थान में पृथ्वी के एक पृष्ठ में एक ही काला भाग हो सकता है । उसके पहले के काले भाग सव नष्ट हो जाते हैं । इसीलिए ये संवत्सर चक्र में एकान्तर क्रम से काले, सफेद का होना मिथ्या है । इसके उत्तर में कहना है कि ये श्राकाश के ७२० भाग यजमान के विचार से माने जा सकते हैं । पृथ्वी पर सूर्य के संमुख यजमान के खड़े रहने पर वह पृथ्वी जितनी पूर्व को चली जाती है उतने को सफेद कल्पना करके फिर सूर्य के दूसरी भोर यजमान के जाने पर वह पृथ्वी जितने आकाश प्रदेश आगे बढ़ती है उतने को काला कल्पना करते हैं । प्रति दिन पृथ्वी अनुमान एक अंश के कम से चलती है इनमें एक अंश के आकाश में सफेद और काला दो भाग माने जा सकते हैं इसी प्रकार वर्ष भर की गति से ७२० भाग हो जाते हैं जिनको श्रहोरात्र कहते हैं यह पहला अहोरात्र विभाग है । इसी प्रकार दूसरा विभाग मास का है । पृथ्वी के चारों ओर चन्द्रमा फिरता है, जिस समय सूर्य भौर पृथ्वी के बीच में ग्राकर चन्द्रमा अदृश्य हो जाता है उसके दूसरे दिन में पृथ्वी और चन्द्रमा दोनों की गति के कारण जब चन्द्रमा पृथ्वी के दूसरी छोर की ओर श्रा जाता और सूर्य चन्द्रमा के बीच में पृथ्वी हो जाती है इतने समय में १५ दिन हो जाते हैं । इतने समय में पृथ्वी जितनी दूर पूर्व को चली जाती है उतने आकाश को शुक्लपक्ष कहते हैं फिर चन्द्रमा चलते - चलते १५ ही दिन में सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है उतने समय में पृथ्वी जितनी पूर्व को सरकती है उसे कृष्णपक्ष कहते हैं । इसी पन्द्रह - पन्द्रह दिन के एक - एक भाग बनाती हुई पृथ्वी एक संवत्सर में २४ भाग वना लेती है जिसमें १२ शुक्र और १२ ही कृष्ण एकान्तर क्रम से होते हैं । यहां भी उसी प्रकार पूर्व पक्ष सकता है किन्तु यज-मान ही के विचार से यहां भी पृथ्वी पर चन्द्रमा का शुक्ल भाग के दिन दो अधिक जाने से शुक्ल पक्ष तथा प्रकाश के दिन दो घटने से कृष्णपक्ष कहा जा सकता है । जिस समय सूर्य चन्द्रमा का योग होता है उस समय पृथ्वी आकाश के जिस बिन्दु पर है वहां से आरम्भ करके फिर सूर्य, चन्द्रमा के दुसरे योग तक पृथ्वी जहां चली जाती है उस बिन्दु तक संवत्सर का १२ वां भाग होता है उसी को मास में शुक्ल कृष्ण दो - दो भाग होने से संवत्सर के २४ विभाग हो जाते हैं, यही दूसरा विभाग है । [ १५१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान इसी प्रकार तीसरा विभाग ऋतुओं का है । भारतवर्ष में तीन ऋतु प्रधान है ग्रीष्म, वर्षा, शीत । एक - एक ऋतु चार - चार मास का होता है । इस कारण संवत्सर के तीन विभाग हो जाते हैं यही तीसरा विभाग हैं । इसी प्रकार चौथा भाग श्रयन का है हम देखते हैं संवत्सर में ६ मास तक सूर्य विषुववृत्त से उत्तर की ओर रहता है जिसमें पृथ्वी नीचे और सूर्य ऊपर ज्ञात होता है, किन्तु दूसरे ६ मास में सूर्य विषुवतवृत्त से दक्षिण की ओर रहता है इसी सूर्य या पृथ्वी की गति के कारण सवत्सर के दो भाग होते हैं, उत्तरायण गति को शुक्ल भाग और दक्षिणायन को कृष्णा भाग कहते है । इसी प्रकार पांचवां बिभाग संवत्सर का पूर्ण रूप से एक है । इस प्रकार संवत्सर के पांच रूप होते हैं इन पांचों में भिन्न २ पांच प्रकार की अग्नि मानी जाती हैं उनमें पृथक् २ आहुति देकर भिन्न २ प्रकार के सोमयज्ञ की विधियां हैं । इसीलिए सोमबाग चार प्रकार का हैं - एकाह, अहीन, रात्रिसत्र, ग्रायन-सत्र । जो यज्ञ एक ग्रहोरात्र में पूर्ण हो उसको एकाह कहते हैं और जो १० ग्रहोरात्र तक में पूर्ण हो उसे ब्रहीन या दशाह कहते हैं और जो १०० ग्रहोरात्र तक में पूर्ण हो उसे रात्रिसत्र कहते हैं और सहस्त्र अहोरात्र तक में पूर्ण होने वाले को अयनसत्र कहते हैं । इन सब में संवत्सर के छोटे भाग अथवा बड़े भाग को पकड़ कर उसका संस्कार करना ही यज्ञ से तात्पर्य रखता है । किसी न किसी प्रकार यज्ञ करने से संवत्सर का ही संस्कार होता है यहां पर इतना और विशेष समझना चाहिये कि इसी संवत्सर के संस्कार की योग्यता लाभ करने के लिये छोटे २ यज्ञ किये जाते हैं जिनको - १ अग्निहोत्र २ दर्शपूर्णमास ३ चातुर्मास्य, ४ पशुवन्ध कहते हैं । इनमें ग्रग्निहोत्र से संवत्सर ग्रहोरात्र विभाग का संस्कार होता है और दर्शबुर्गामास से पक्ष यामास विभाग का संस्कार होता है इसी प्रकार चातुर्मास्य ऋतु विभाग का और पशुवन्बर से अमन विभाग का संस्कार होकर फिर ५ सोमयाग से पूर्ण एक संवत्सर का संस्कार किया जाता है । सव इतने ही यज्ञ है । इनके अतिरिक्त जितने प्रकार के यज्ञ शास्त्रों में कहे गये हैं वे सब इन्हीं के रूपान्तर है । इन यज्ञों के करने से सूर्य संवत्सर के अनुसार यजमान के शरीर वैश्वनार भी संस्कार युक्त होकर शरीर छोड़ने के बाद सूर्य संवत्सर में सम्मिलित हो जाता है जिससे स्वर्ग का मुग मिलना संभव है, जिसका विषय दूसरे स्थान में विशेष रूप से वर्णन किया गया है । प्रजा सबसे पहला स्वयम्भू प्रजापति के मन, प्रारण, वाक् से ही सब कुछ सृष्टि उत्पन्न हुई है । उनमें सबसे प्रथम मन में एक प्रकार की इच्छा वृत्ति उत्पन्न हुई किसी विषय के लिये मन का उसके आकार में [ ५५२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान 8 नाना ही इच्छा कहलाती है | यह इच्छा होते ही उसके लिये प्राण की क्रिया होने लगती है । प्राण एक प्रकार का बल है, वाक़ ही पर लगा करता है । उनी बल के अनुसार जो उसी को प्रजा वाक् में विकार उत्पन्न होता है कहते हैं । मन की इच्छानुसार प्राण - चल जो वाक् में क्रिया होने से विकार होने लगता है उससे दो रूप उत्पन्न होते हैं — अमृत और मत्यं श्रथवा प्रमृतं योर मूर्त श्रथवा [ स्थित और यत अथवा ( सत्य Á र त्यम । जो मूच्छित होता है । उसी को मूर्त्य या मन्यं कहते हैं - यह मूर्त अपने स्वातन्त्र्य को नष्ट कर देता है और पराधीन हो जाता है, इसी को भूत कहते हैं । इन मूर्ती में अमुर्त प्रविष्ट ( घुसा हुआ ) रहता है वह_ श्रमृत है । उसी को देवता कहते हैं । मूत और देवता ये ही दो प्रकार की प्रजा हैं । जो कुछ हम कहीं देखते हैं यह सब मर्त्य है और सब मन, त्राण, वाक् मय हैं, किन्तु इन सब के भीतर कोई श्रमूर्ततत्त्व है जो इन मूत मत्यों को धारण किये हुए रहता है और इनको चलाता रहता है । यद्यपि ये सब मन, प्राण, वाक्-मय क्रहे गये हैं तथापि मुख्यतया ये सब वाक् ही वाक् दिखलाई देते हैं । क्योंकि जितना विकार होकर इन पदार्थों में भिन्नता दिखाई देती है । वे सब विकारे वाक् ही में होना सम्भव है । मन और प्राण में कोई ऐसा विकार नहीं होता जिससे उनके असली रूप में परिवर्तन हो किन्तु सांचे में ढले हुए रस के अनुसार अथवा खेत की क्यारी में पानी के अनुसार इन विकार वाले भिन्न २ रूप के वाक् में प्राण और मन भी उसी के अनुसार हो जाते हैं । बाक् का जैसा छन्द है उससे छेदे हुए होने के कारण मत और प्राण अन्यथा नहीं हो सकते अथवा यो समझिये कि सब से पहले मन जैसा हो उसी प्रकार प्राण ने क्रिया की और उसी प्रकार वाक् ने विकार पाया इसलिये इन सब पदार्थों में मन, प्राण और वाक् इन तीनों का एक ही सांचा समझना चाहिये । मन में नाना रूप होने से प्रारण नाना रूप का होता है और प्राण के नाना रूप होने से वाक् भी नाना प्रकार का होकर भिन्न भावों को उत्पन्न करता है यद्यपि ये तीनों नाना प्रकार के होते रहते हैं तथानि इनमें केवल वाक् ही विकार युक्त होती है, मन, प्राण में कदापि विकार नहीं होता । यद्यपि हम देखते हैं कि विचार करता हुआ मन बहुत से नये २ रूपों को धारण करता है तथापि वह मन अपने परि-माण में कम नहीं होता और उसके उत्पन्न हुए नाना भाव भी उससे अलग कदापि नहीं रहते फिर भी अपनी ही माया से स्वतन्त्रता पूर्वक नाना रूपों में बदलता हुआ भी सदा सर्वदा निविकार रहकर एक ही रूप में मन बना रहता है । इसी प्रकार प्राण भी मन के नियोग से यद्यपि नाना रूप का होता है तथापि उसमें धिकार नहीं याता न उन विकारों से दृढ़ बन्धन पाता है वाक् में अपना काम करके यद्यपि कुछ काल के लिये विकारवान् प्रतीत होता है किन्तु फिर पूर्ववत् अपने स्वरूप में ग्रा जाता है वास्तव में उसमें कोई विकार नहीं होता, परन्तु इन्हीं मन और प्राण के द्वारा वाक् में विकार होता है । प्राग़ बल का नाम है वल के अनन्त भेद हैं भिन्न २ प्रकार का बल थोड़ा या अधिक जिस प्रकार वाक् से मिलता है उसी क्षण वह वाक् और की और हो जाती है और उस विकार युक्त वाक् में प्राण और मन भी उसी के अनुसार अपने भी स्वरूप धारण किये रहते हैं । मन, प्राण, वाक् इन तीनों में मन की इच्छानुसार प्राण के बल से ही वाक् में विकार उत्पन्न होता है यह कहा जा चुका है इसी नियम के अनुसार ग्रमृत उत्पन्न होने के लिए आदि प्रजापति का मन सबसे [ १५३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान पहले हुआ इसी से वाक् के ऊपर प्राण ने अमृत के लिए बल लगाया जिससे मन, प्राण, वाक् तीनों के मेल से अमृत उत्पन्न हुआ, फिर भी उसी मन की इच्छा और प्राण के बल से वह अमृत दो प्रकार का हो गया अर्थात् उसमें दो प्रकार की वृत्तियां उत्पन्न हुई । एक अन्तर्मुख होने का स्वभाव रखता है तो दूसरा बाह- देश र्मुख होने का, बहिर्मुख स्वभाव वाला चञ्चल प्रकृति का है और विकस्वर अर्थात् उत्तरोत्तर अधिक लेते हुए गति का स्वभाव रखता है इसके विरुद्ध दूसरा स्थिरता का स्वभाव रखता है और उत्तरोत्तर संकुचित होता हुग्रा थोड़े देश की बोर होता है । इनमें बहिर्मुख को " अग्नि " कहते हैं और अन्तर्मुख को " सोम ” । मन के ही इच्छानुसार किसी वाक् में कम प्राण और किसी में अधिक प्राण लगा, जिसके कारण दो पदार्थ उत्पन्न हुए एक महाप्राण के कारण " अन्नाद " अर्थात् भोक्ता हुया उसे ही " अग्नि " कहते हैं और दूसरा अल्पप्राण के कारण अन्न रूप में हुआ अर्थात् भोग्य बना उसे ही " सोम " कहते हैं । सृष्टि में इन दोनों के मिलने से काम चलता है । यदि सोम न होता तो प्रत्येक वस्तु वितान अर्था फैलाव में ग्राकर नष्ट हो जाती यदि श्रग्नि न होता तो प्रत्येक वस्तु संकुचित होते - होते इतने छोटी होती | कि उनका अस्तित्व ही नहीं रहता । दोनों के होने से श्रग्नि के विकास को उचित प्रमाण से आगे रोक कर " सोम " संकुचित करता है और सोम के संकोच को उचित प्रमाण से आगे रोक कर अग्नि विकास में लाता है । इस प्रकार कुछ संकोच कुछ विकास में जगत् के सब पदार्थ दीखते हैं यहीं दोनों का कार्य है । जिस प्रकार आदि प्रजापति ने अमृत के लिए इच्छा की उसी प्रकार मृत्यु के लिए भी इच्छा करना उचित था । क्योंकि यदि मृत्यु न हों तो अग्नि और सोम इन दोनों का वल कम होना संभव हो जाता और उन दोनों के बराबर के बल से कोई एक ही प्रकार की वस्तु वन सकती । भांति - भांति के पदार्थ नहीं हो सकते इसीलिए मृत्यु होने की भी इच्छा हुई और उसके सत्वों-मन, प्रारण, बाब, स मृत्यु उत्पन्न हुया, वह भी मन के इच्छानुसार दो प्रकार अनुसार का हो उन्हीं गया - तीनों १ गोम की -मृत्यु जिसे ' यम कहते हैं और दूसरी अग्नि की मृत्यू जिसे ' अमति ' और ' ' हैं । इनमें यम वायु के आकार का एक गरम पदार्थ है जो रूखेपन का स्वभाव रखता अशनाया है - इसी कहते वन ( खुश्की ) से पदार्थों के अवयवों का जोड़ ढीला हो जाता है । स्नेह अर्थात् का नमी के कारण जो उनमें ग्रास बन्धन हुआ था वह ढीला हो जाता है और प्रत्येक ग्रङ्ग बिखर कर वस्तु अलग हो जाते हैं, और वह नष्ट हो जाती है, किन्तु इसके अतिरिक्त दूसरी मृत्यु प्रशनाया है जो कि एक प्रकार की बड़ी भूख है जो प्रत्येक परमाणु को भीतर - भीतर पेट में ले जाती है । वह मुक्ष्म रूप में रूपान्तरित होकर उसकी मूर्ति को हुई नष्ट एक कर ही स्थान देती है पर यह जमा शनाया करके उसको छुपा देती कि वह अपने अतिस्त्व को भी रख नहीं सकती इतना घोर पापा । इसीलिए प्रजापति की में अमृत सोम को ग्रहण किया जिससे उसमें भी इच्छा से अपने उदर ग्रात्मा श्रा गई । अमृत के भीतर अपनी रहने के कारण उसकी मृत्यु न होकर वह ग्रशनाया अर्क के रूप में ग्राई । ग्रर्क हुआ वह है जो ग्रशनाया ग्रंथात् को रखता अन्न के लिए धावा करता है और अन्न खाया भूख करता है । इस अर्क की नाम " आप " हो गया । प्राप् ही अवस्था में इस ग्रशनाया का इस जगत् में ग्रश अर्थात् उसको ग्रन्त को भीतर लाया अशनाया कहते है यह ग्राम स्नेह करता है, इसीलिए रखता है और स्नेह के ही मिलाता कारण एक में दूसरे को इस प्रकार । १५४
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* ब्रह्मविज्ञान * है इसीलिए इसे " आप् " कहते हैं कहते हैं । यह प्रत्येक । यह अग्नि के वस्तु को संवरण ( ढकना ) करता है इसीलिए " अग्नि के वितान कर्म अर्थात् फैलाव को वारी " विरुद्ध चाल निरोध करके अन्दर की ओर लेता चलने से इसे अग्नि की है इसीलिए सत्य कहते हैं । अग्नि, १ - अमृतत्त्वधर्म सोम, यम, आप् का साधर्म्य वैधर्म्य साधर्म्य है से सोम और अग्नि . रूक्षता का साधर्म्य है— मृत्यु धर्म से ' ' धर्म से यम और ' आप ' का यम और अग्निका साधर्म्य है स्नेह धर्म से सोम और , प्राप् का साधर्म्य है । २-पता दोनों प्रग्नि और में हैं यम ये दोनों ही अग्नि हैं किन्तु अग्नि दोनों की । सोम और अमृत है और यम मृत्यु हैं । यह विशे-विशेषता आप ये दोनों ही सोम है किन्तु सोम और है ।, अमृत प्राप् मृत्यु है यही इन १३-बनता अग्नि है किन्तु दो प्रकार का है कोई तो सोम मन अर्थात् दूसरा अग्नि सोम को खाता है और सोम से घुलकर यज्ञ का स्वरूप रोकता से विरोध रखता है यौगिक है । अग्नि में प्राती हई सोम की आहति को निय । इनमें इसीलिए उसे होने यम कहते हैं प्रकारान्तर से अग्नि दो प्रकार का है— मौलिक और के कारण मौलिक अग्नि जाता उसे ही भौतिक और सोम के योग से यौगिक अग्नि उत्पन्न होता है, स्थूल और रूपवान् सोम है तब अग्नि कहते हैं । जबकि ' यम ' के यह भौतिक द्वारा अग्नि और सोम का वियोग हो को भी ग्रग्नि सोमरूप और अग्नि अन्न न होने के कारण स्वयम् बुझ कर नष्ट हो जाता है । अब जलकर के अनुसार जलता यौगिक अग्नि दो प्रकार का जानना चाहिए एक वह जो अग्नि के संयोग से जलता है । हो नहीं और बनाता है उसे ही सोम कहते हैं किन्तु सोम जो अग्नि से दर्बल दूसरा वह है हटा देता होने पर अग्नि संयोग से हुए | है उड़कर चला जाता है, किन्तु प्रबल होने पर अग्नि को जो, इस सोम को ' ' I आप को कुछ कहीं आप कहते । इस प्रकार अग्नि, यम, सोम, आप् ये चार तत्त्व सिद्ध ' अग्नि सोम हम देखते हैं वे अग्नि और ' सब इन्हीं चारों से उत्पन्न हुए हैं । इनमें यम को ओर ऊपर मृत्यु ' सोम कहा गया है । उस नियम के अनुसार मुख्यतया दो ही तत्त्व सिद्ध है अर्थात् ' यम । इसीलिए लोक का लोक ऋषियों का सिद्धान्त किया है कि - अग्निषोमात्मकं जगत् इन चारों में चन्द्रमा विवस्वानहै अर्थात् इसकी स्थिति सूर्य में है और अग्नि का लोक पृथिवी, सोम का , आपका लोकइन तीनों लोक के बाहर चारों ओर फैला हुआ दिगन्त व्यापी समुद्र है । अग्नि की दिशा पूरब, यम की दिशा दक्षिण सोम की दिशा उत्तर, और आप की दिशा पश्चिम , है । इस पृथ्वी केऊपर देव कार्य देवता, दक्षिण इन्हीं चारों दिशाओं से ये चारों तत्त्व आया करते हैं । पूरब, उत्तर मुख करके तीनों, सोम मुख करके देवता में पितर पितृकार्य और पश्चिम मुख करके आसुर क्रूरकर्म करना चाहिये । अग्नि में क्षय, यम में भी पितर से हो पितर और आप में असुर प्रतिष्ठित रहते हैं, इन्ही चारों तत्त्वों इन जाता और असुरों है । की पुष्टि होती है । इन चारों तत्त्वों के क्षय होने पर उन तीनों का भी [ १५५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान देवताओं में से वसुदेवता अग्नि से, रुद्रदेवता सोम से और यम से, से विशेषतया संबन्ध रखते हैं इस प्रकार इन चारों तत्त्वों की ओर भी दैववाद के द्वारा जानना चाहिये । प्रादित्य देवता यम और प्राप् कितनी ही भक्तियां हैं । उनको सोमतत्त्व मन की ओर जाता है अग्नि और यम प्रारण की ओर, ग्राप् वाक् की ओर विशेषतया लक्ष्य रखते हैं | मन के कारण सोम वस्तु के बनने में अवकाश या श्रायतन पैदा करता है और प्राण के कारण अग्नि और यम वस्तु में क्रिया उत्पन्न करते हैं और वाक् के कारण आप वस्तु की उत्पत्ति में उपादान होता है । सोम और अग्नि के योग से वस्तु में घनता और तनुता दोनों मिले हुए रहते हैं । घनता के होने से वस्तु में स्थूलता नहीं प्राती । प्रत्येक परमाणु के विशकलित होने से वस्तु का स्वरूप नहीं बनने पाता इसी प्रकार यदि तनुता न होती तो सब परमाणु घन होते होते सूक्ष्म रूप में इतने ग्रा जाते कि वस्तु का प्रदेश वाला स्वरूप नहीं वनने पाता । आप् के स्नेह से अणु परस्पर सन्निकट होते जाते हैं और यम के रूखेपन से उनका बन्धन ढ़ीला पड़ जाता है, यम के संबन्ध से सोम का बल कम होता रहता है और प्राप् के संबन्ध से अग्नि का बल घटता रहता है । इन चारों तत्त्वों के योग से ही देवता और भूत इन दोनों प्रजाओं की सृष्टि होती है किन्तु इन चारों के बनों की न्यूनाधिकता से देवता और भूत प्रत्येक में नाना भेद उत्पन्न होते हैं विशेष कर देवता अग्नि में सोम के भोग से उत्पन्न होता है आप और यम इन दोनों का संबन्ध इसमें किश्चित निमित्त मात्र रहता है । इसी प्रकार यम के सिले हुये प्राप् से भूत उत्पन्न होते हैं, अग्नि और सोम इन दोनों का संबन्ध उनमें किञ्चित् निमित्त मात्र रहता है । किन्तु तैत्तिरीय और ऐतरेय ब्राह्मणों में ग्राप् से ही देवता और भूत की उत्पत्ति कही गई है, परन्तु वह अम्भोवाद का एक भिन्न मत है । इस मत में चार तत्त्व न होकर आप् को ही एक तत्त्व माना है । तीसरा मत है कि अमृतरूपी अग्नि में अमृतरूप सोम के प्रवेश करने से देवता उत्पन्न होता है किन्तु सोम में अग्नि की मूर्च्छा होने से भूत होता है देवता और भूत इन्हीं दोनों से यह सम्पूर्ण जगत् भरा है इन दोनों के अतिरिक्त जगत् में कहीं कुछ नहीं है । सोम, मम, अग्नि, ग्रप्, ये चारों भी प्रत्येक प्रत्येक श्रमृत और मर्त्य के भेद से दो प्रकार के होते हैं जितना कि इनमें वाक् की भक्ति है वे सब मर्त्य हैं किन्तु प्रारण और मन की भक्ति लेकर ये चारों ही अमृत हैं । इन चारों से उत्पन्न होने वाले पदार्थ भी दो प्रकार के उत्पन्न होते हैं मूर्त और अमूर्त । इनमें मूर्त सब म हैं किन्तु उनमें रहने वाले अमूर्त सब अमृत हैं । ये मूर्त भी दो प्रकार के होते हैं । जिनमें रूप वाले - पृथ्वी, जल, तेज ये तीनों मर्त्य हैं किन्तु वायु और आकाश ये दो अमूर्त हैं । इसी प्रकार पहले कहे हुए अमूर्त भी दो प्रकार के हैं । ऋषि, पितर देव असुर, गन्धर्व और मनुष्य, इतने निरुढ़ प्राण अमृत हैं किन्तु इनसे उत्पन्न होने वाले वैश्वानर यादि कितने ही अमूर्त जो यौगिक हैं वे अमूर्त होने पर भीम हैं । इस प्रकार मर्त्य और अमृत के विभाग में सभी मर्त्य अमृत के अधीन रहते हैं किन्तु मर्त्य ही उन मृतों का श्राश्रय है । [ १५६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान प्रारण कभी वाक् के बिना नहीं रहता, वाक् में जितने विकार के उत्पन्न होते हैं उनका कारण प्राण ही है । वह प्राण प्रजापति की मन की इच्छा से सात भागों में विभक्त होकर सर्वत्र रहता है । जिस समय कि वह श्रविकृत दशा में रहकर वाकु की प्रेरणा करता है तो उसे ऋषि कहते हैं । ऋषि का श्रर्थ वाक् का प्रवर्तक है अर्थात् बोलने वाला है किन्तु साथ ही उसका प्रयोगिक होना भी आवश्यक है वह सर्वदा वाक् का प्रधान होता है । ७ सात प्रकार के होने के कारण सप्तऋषि कहलाते हैं । यद्यपि ऋषि की सात ही मुख्य जाति हैं किन्तु प्राणमात्रा और वाक्मात्रा की न्यूनाधिकता के कारण उनके और भी अनेक भेद हो जाते हैं जैसे अंगिरा ऋषि २१ प्रकार के हैं, भृगु दो प्रकार के हैं, इत्यादि । अब नार जाति के ऋषियों के योग से जो नवीन प्रकार का यौगिक प्राण उत्पन्न होता है उसे पितर कहते हैं इनकं, भी जाति बहुत प्रकार की हैं किन्तु मुख्यतया ८ प्रकार के माने जाते हैं । भिन्न - भिन्न प्रकार के पितरों के योग से देवता और असुर उत्पन्न होते हैं । जो प्रकाशवान् स्वभाव रखता है उसे देवता कहते हैं किन्तु कृष्ण जो कभी प्रकाश में नहीं ग्राता उस प्राण को असुर कहते हैं । देव श्रीर असुर में प्रकाश और तम का ही भेद है किन्तु वास्तव में दोनों एक ही कक्षा ( Class ) के हैं क्योंकि दोनों ही पितरों से उत्पन्न होते हैं । देवताओं की पुरी हिरण्मयी अर्थात् सोने की होती है, पितरों की पुरी राजती ग्रर्थात् चांदी की होती है, असुरों की पुरी श्रायसी अर्थात् लोहे की होती है । ये ही तीन पुरी हैं, जिनमें कि ये तीनों सर्वदा रहते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि सूर्य का प्रकाशमण्डल हिरण्मय है और ं चन्द्रमा का राजत है और पृथ्वी की छाया आयसी है । सूर्य के तेज से सोने की, चन्द्रमा की चन्द्रिका से रजत की श्रीर पृथ्वी की छाया से लोहे की उत्पत्ति होती है, इसीलिये इन तीनों के नाम से सूर्यादि तीनों की छाया कही गईं हैं । इनमें भी सूर्यादि के कहने का तात्पर्य सूर्यादि से नहीं है, किन्तु स्वयंज्योति, परज्योति और ग्रज्योति पदार्थों से है । जगत् में संपूर्ण पदार्थ इन्हीं तीनों जातियों के पदार्थों में से हैं । इसीलिये यही तीनों पुरियां है जिनमें देवता पितर और असुर जाति के प्रारण पाये जाते हैं किन्तु ऋषि-प्रारण इन तीनों में समान रूप से रहते हैं उनकी कोई विशेष पुरी नहीं है । प्राणियों के शरीर में बंधे हुए जो एक प्रकार के प्रारण दीखते हैं वही मनुष्य प्राण है, क्योंकि इन प्राणों में ज्ञान इन्द्रियों के रखने वाले मन का संबन्ध अवश्य रहता है इसीलिये उसे मनुष्य कहते हैं । किन्तु यही मनुष्य प्राण स्वप्न की दशा में शरीर के बाहर विवरता रहता है और मरने के बाद भी वह चन्द्रमा से नीचे पृथ्वी से ऊपर अन्तरिक्ष में एक प्रकार की योनि में जन्म लेकर अपनी आयु तक पाया गया है । उन प्राणियों के प्राण को गन्धर्व कहते हैं । इस प्रकार ऋषि, पितर, देवासुर, मनुष्य और गन्धर्व ' ये पांच प्रकार की प्रथम सृष्टि प्रजापति की प्रजा है । जो पहले ग्रग्नि और सोम के भेद से दो प्रकार के देवता कहे गये थे वे दोनों भी अमृत मृत्यु के भेद से फिर दो प्रकार के कहे जा चुके हैं उनमें अमृत अग्नि को ' शिव ' कहते हैं और मृत्यु अर्थात् यमअग्नि को घोर कहते हैं इनमें शिवप्रग्नि तीन प्रकार की हैं— अग्नि, वायु, सूर्य – ये तीनों ही प्रातिलौकिक अर्थात् तीनों लोक रक्षा करने वाले भिन्न भिन्न एक २ स्वामी हैं । तीनों लोक तीन विश्व हैं उनके ये तीनों अग्नि, तीन नायक हैं, इसलिये इन तीनों को एक साथ वैश्वानर कहते हैं । इनमें पृथ्वी की भक्ति प [ १५७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान प्रकार की है जिनको वसु कहते हैं । अन्तरिक्ष के वायु ११ प्रकार के है जिनको रुद्र कहते हैं और यु ( द्यौ ) के सूर्य १२ प्रकार के हैं जिनको प्रादित्य कहते हैं और दो अश्विनी कुमार इस प्रकार ३३ देवता प्रमृतरूप शिवाग्नि के भेद हैं । इस पृथ्वी पर यदि इन तीनों अग्नियों को देखें तो उनमें पृथ्वी की अग्नि को गार्हपत्य कहेंगे और द्यौ से प्राये हुए देवाग्नि को ग्राहवनीय कहेंगे । अन्तरिक्ष की श्रग्नि जो ८ रूपों से पृथ्वी में रहती हैं उनको घिष्ण्याग्नि कहते हैं इस प्रकार दश अक्षर के छन्द होने से इन अग्नियों के थोक को विराट् कहते हैं । किन्तु पृथ्वी की अग्नि, अन्तरिक्ष की वायु और द्यो के सूर्य इन तीनों वैश्वानरों के घर्षण से जो एक नया अग्नि पैदा होता है वह वैश्वनराग्नि है यह सर्वलौकिक है क्योंकि यह एक ही रूप से तीनों लोकों में वर्त्तमान रहता है यह वैश्वानराग्नि हमारे शरीर में ४ प्रकार से रहता है जिनको नारायण भूपति भुवन-पति और भूतानामपति कहते हैं । इनका अधिक निरूपण श्रम्भोवाद और देववाद में किया गया है इसलिये शिवग्नि की व्याख्या यहां पूर्ण करते हैं । दूसरा घोर अग्नि ४ प्रकार का है - पावक, पवमान, शुचि और निति - इनमें पावकअग्नि वायु में पवमानश्रग्नि जल में, शुचिश्रग्नि तेज में और निर्ऋतिश्रग्नि पृथ्वी में पाये जाते हैं । पृथ्वी में निर्ऋति वह अग्नि है कि जिसके द्वारा पृथ्वी फटकर कोसों में बड़ी २ दरारें हो जाती हैं यह दारिद्रय का देवता इस प्रकार दोनों श्रग्नियों का निरूपण अन्यत्र विस्तार से किया गया है । अब सोम जो अमृत है वह दो है प्रकार का है एक सायतन जो चन्द्रमा में है और दूसरा निरायतन जो दिन में है चन्द्रमा भास्वर है दिक् अभावस्वर है और दूसरे सोम जो मृत्यु हैं जिसको आप कहते हैं उसमें नियम से श्रमृताग्नि रहता और है दोनों केवल पूर्ण होने से वही आप पृथ्वी के रूपमें परिणत हो जाता है इसलिये यह पृथ्वी, अग्नि और आप दोनों का मिला हुआ रूप है । मुख्यतया प्रजा दो प्रकार की सिद्ध हुई है— देवता और भूत । इनमें रहता है और देवता उनमें आत्मा होकर उस शरीर को भूत शरीर होकर बनाता चलता है औरउस शरीर पर अपना पूर्ण अधिकार रखता है । इनमें देवता और भूत दोनों के साथ २ व्याहृतियां होती हैं अर्थात् ७ कक्षा में कहे जाते हैं जिन कक्षात्रों को लोक कहते हैं वे सात लोक ये हैं- १ भूः २भुवः, ३ स्वः, ४ महः ५ जनः ६ तपः ७ ,, सत्यम् । इनमें देवताओं के ७ भेद इस प्रकार हैं -१ मनुष्य २ , गन्धर्व ३ देवासूर, ४ पितर, ५ ऋषि, ६ प्राण, ७ मन ये सातों देवताओं के लोक अवस्था विशेषसे माने जाते हैं की भी सात । इसी प्रकार भूतों ही अवस्थायें हैं- १ पृथ्वी, २ जल, ३ तेज ४ वायु ५ श्राकाश मत , ( वाक् ), ६ प्राण ७ मन । किसी का है कि अग्नि चन्द्रमा, , वायु, सूर्य,, दिक्, प्राण मन इस , प्रकारदेवताओं के सात भेद होते हैं । इनमें सातों भूतों से बना हुआ पिण्ड शरीर कहलाता है और इस शरीर के देवताओं के समुदाय से बनती है । संचालन करने वाली आत्मा उन सातों देवता हो चाहे भूत, ये दोनों प्रजा ग्रात्मा से हीउत्पन्न होती रहती है प्रजापति को कहते , आत्मा हैं । जो कि मन, प्राण, वाक् का घन है इसीलिये उसमें सृष्टि होने के पूर्व तीन क्रियायें अवश्य होती हैं-[ १५८ ]