ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 191–200
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 191–200
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* ब्रह्मविज्ञान * १ इच्छा, तप ३ , श्रम । क्रिया यद्यपिप्राण की ही वृति है, मन और वाक् में स्वतः क्रिया नहीं होती । मिलेजुले रहने के कारण प्राण में क्षोभ होते. ही साथ क्षव्ध हो जातेहैं इसलिये कहते हैं मन में जितना क्षोभ होता है उसी को ' इच्छा ' कहते हैं, प्राण के क्षोभ को ' तप ' और वाक में जो है किन्तु क्षोभ होता है उसे ही ' श्रम ' कहते हैं । T श्रम भौतिक शरीर की चेष्टा को कहते यह शरीर चेष्टा भीतर के किसी विषय प्रारण के प्रयत्न से होती है उसको ' तप ' कहते हैं और यह प्रयत्न की कामना से को जानता होता है और कामना उस विषय के ज्ञान से होती है, जब मन किसी विषय है तो अपनी रजोवृत्तिके कारण प्रारण को क्षोभित करके उस विषय की कामना करता है । इन परमाणुओं १ का परस्पर अपने प्रारण के कारण जो मिलाव होता है । वह ८ प्रकार का होता है । ळI 800 है जिससेवह विषय सिद्ध ने कहा है कि होता है इसी क्रम को विद्वानों जिससेउस विषय शरीर की चेष्टा होने लगती की ओर प्रयत्न आरम्भ होते ही साथ - साथ श्रम अर्थात् [ १५६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान *
ज्ञानजन्या भवेदिच्छा, इच्छा जन्या कृतिर्भवेत् ।
कृति जन्यं भवेत् कर्म, ततो विषयसिद्धयः ॥
कर्म होता है अर्थात् — ज्ञान से इच्छा होती है, इच्छा से कृति अर्थात् क्रिया होती है कृत्ति से बंटता और कर्म से विषय अर्थात् अर्थों की सिद्धि होती है । इच्छा के कारण ' प्राण ' छोटे - बड़े खण्डों में के ( विभक्त होता ) है उसका एक - एक खण्ड अपने परिमाण के अनुसार वाक् को लिये रहता है । में बाक् रखकर साथ भीतर, बाहर एक में होकर इस प्रकार एक जीव हो जाता है कि जिससे वाक् को गर्भ प्राण के, अथवा ब्राण को गर्भ में रखकर वाक् के छोटे - छोटे खण्ड हो जाते हैं जिनको परमाणु कहते हैं । भौतिकसृष्टि में सबसे प्रथम इन्ही परमाणुओं की सृष्टि होती है- ये परमाणु भिन्न - भिन्न जाति के होते हैं जैसा कि यम और अग्नि इन दोनों प्राणों के मिले हुए रूप से यदि प्रारण परमाणु उत्पन्न करें तो वह वायु का परमाणु होगा तथा सोम और श्रग्नि इन दोनों प्राणों के मेल से जल के परमाणु की सृष्टि होती है — तीनों प्राणों के प्रर्थात् श्रग्नि, यम, सोम के मेल से मृतिका परमाणु की सृष्टि होती है । यम थोड़े सोम को अलग करता है इसीलिए ' श्राप् ' वायु के रूप में परिणत हो जाता है किन्तु ' श्राप् में यदि श्रल्प ' यम ' का योग हो तो ' आप ' में से सोम नहीं हटता । किन्तु तीनों के योग से मृतिका हो जाती है इसी प्रकार श्रग्नि, यम, सोम, श्राप इन चारों की न्यूनाधिकता या संयोग की विचित्रता से जल, वायु, मृत्तिकानों के बहुत से भेद उत्पन्न हो जाते हैं । पहले कहा जा चुका है कि ग्रासञ्जन अर्थात् भिन्न - भिन्न प्रारणों को मिलकर एक हो जाना और दूसरा विवारण अर्थात् कई परमाणुओं को पकड़ कर ग्रापस में उनको बांधकर धारण करना ये दोनों प्राण के धर्म हैं इन्हीं दोनों धर्मों से परमाणुओंों के परस्पर योग होकर उनके भिन्न - भिन्न प्राण हो जाते हैं और उस एक प्राण में वे दो या अनेक परमाणु ग्रापस में बंधे रहते हैं कि जैसे बरतन में पानी अथवा पानी में चीनी यद्यपि उनमें एक परमाणु दूसरे हुए परमाणु इस प्रकार को अपनी इच्छा से कदापि नहीं पकड़ता वे सब परमाणु अपने स्वरूप में पर्याप्त ( परिपूर्ण उनके ) और मस्त है तथापि प्राण एक होने के कारण वे भिन्न - भिन्न परमाणु जुड़े हुए से रहते हैं । अपने प्राण के कारण जो मिलाव होता है वह ८ प्रकार का है १ दो परमाणुओं इन परमाणुओं के भिन्न, का २ परस्पर प्राणों का पृष्ठ योग ग्रथवा २ उदर योग, ३ अथवा ग्रणु के पृष्ठ योगी दोनों ४ अथवा ५ दूसरे प्राण के पेट में दो परमाणु, ६ अथवा एक परमाणु, ७ अथवा प्रारण दोनों , अथवा एक प्रारण ८ अथवा दोनों ग्रणु के नाभि से नाभि का योग । अणु के . पृष्ठ से पृष्ठ का योग प्राण ने इस प्रकार सबसे प्रथम जो वाकू का व्याकारण क्रिया किये वे अर्थात् छोटे - छोटे विभाग सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हो गये उनको शब्दमय ग्राकाश कहते हैं किसी समय यह सम्पूर्ण जगत् इस ग्राकाशमय रूप में चिरकाल तक रहा कुछ काल केअनन्तर वही ग्राकाशमय उसका के वाक् प्रथवा कुछ अंश सोम कारण घन होने लगा ग्रन्त में उस सम्पूर्ण भर ग्राकाश में व्यापक एक घन पदार्थ * गया उसे वायु कहते हैं किसी समयतक यह सम्पूरणं जगत् इस पाकर वायुमय रूप में रहा फिर समय इन वायुओं में भिन्न - भिन्न चाल के कारण परस्पर घर्षण होने कुछ लगा इस घर्षण के जोर पकड़ने पर [ १६० ]
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* ब्रह्मविज्ञान वायु तेज के रूप में परिणत कालान्तर हो गई और यही तेजोमय को में इन तेजों के ( गर्मी ) जगत् किसी समय ' आप ' जोर पकड़ने तक विद्यमान् रहा कहते हैं पर तेज से तेज टकराकर मूछित वायु और और सम्पूर्ण होने लगे उसी मछित अवस्था तेज जगत् इसी श्रापोमय सर्वत्र के मिश्रण रूप में कुछ काल तक होते होते रहा । क्रम से इस आप् में परमाणु एक जीव होने पर मृत्तिका दिया रूप से उत्पन्न हुई जो कि सम्पूर्ण जिसे व्याप्त थी । समय श्राकाश में पृथिवी समय पाकर संग्रह कहते वायु ने उन परमाणुओं को एकत्र करके करके हैं । इसी प्रकार कितने वह रूप मन सूर्य का ही तेज के परमाणुत्रों को चारों और से , प्राण गोला उत्पन्न कर दिया एक काल में , शब्द । इन गोलों में मन से लेकर उत्तर, वायु तेज सब उत्पन्न हुए पदार्थ प्रर्थात् -, जल , नदियां उत्तर सृष्टि पृथ्वी इनके संग्रह से वायु ने पुष्टि किया , हुई है इसका इस प्रकार पूर्व - पूर्व सृष्टि से पृथ्वी में प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि जो किसी श्राज उनमें बहती थी समय वेदों के लिखे अनुसार सहस्रों अब वे सब लुप्त होकर ये सब पानी थाह हो गया है बहुत थोड़ी रह गई हैं जो किसी समय अथाह थी से मिट्टी यहां तक कि गङ्गा सदृश नदी में भी जाती है त्यों बनते रहने के अथाह कहीं - कहीं पर दीयर हो गये हैं । - त्यों पिछली कारण पानी की कमी से हुए हैं ज्यों - ज्यों आगे की सृष्टि सृष्टि, बढ़ती समाप्त ही पडती ही भौतिकी दृष्टि " का वह पहला रूप कम हो जाता है । आज तक इस प्रकार सृष्टि होते-में हो गई हो मन । इस विषय से लेकर में कोई निश्चित तर्कना कि मन पृथ्वी तक नहीं की जा सकती इन पंच महाभूतों की सृष्टि ने और मन धीरे - धीरे अपने अधिक घन होता गया है किन्तु पृथ्वी की अवस्था में पहुंच कर जब फिर घनता में जाने के उसी विकास के लिए अवकाश नहीं देखा तो सम्भव है कि वह व्याकुल होकर मन लिए मुँह फेरा हो जड़ भौतिक के विकास । इसी से हम देखते हैं कि इन पृथ्वी चन्द्र सूर्य आदि गोलों वाले ,, पर पिण्ड भौतिकपिण्ड को धारणकरते हुए चेतनसृष्टि होने लगी है जिनमें पहले सर्वथा धीरे बुद्धि और से धीरे - धीरे मन विकसित होकर चेतन उत्पन्न होने लगे हैं और उनके मन में धीरे-अपेक्षा आत्मा की विद्या मनुष्य के मात्रा इतनी बढ़ती जा रही है कि आज क्रिमि कीट पक्षी आदि की पिण्ड ,, पशु, तपश्चर्या में अधिक मात्रा आदि ज्ञानमात्रा बढ़ चुकी है जिसके द्वारा वह अपने उद्धार की चिन्ता व उत्पन्न यत्न भी करने भूत होवे लगा है । जिन यत्नों से सम्भवतः भौतिक मात्रात्रों से ज्ञान की शुद्धि और भौतिक तेज आदि बन्धन कम होकर केवल ज्ञानमय आत्मा बन कर मुक्त हो जावे उनके का क्रियाओं रह वायु में में स्पष्ट यही क्रिया की जाती है कि जिससे पृथ्वी का जल में जल तेज में , का, जाय, वायुका आकाश इस । इस में लय करते - करते अन्त में आत्मा, प्रारण और मन रूप में अवशिष्ट प्रकार प्रकार पृथ्वी सृष्टि सृष्टि के विरुद्ध प्रतिष्टि से अपनी मुक्ति का उपाय मन आप ही सोच लेता है । आदि के तीन भेद से क्रम से लोकसृष्टि हये १ मन से पृथ्वी तक भौतिकसृष्टि, २ उन भौतिकद्रव्यों सूर्य, चन्द्र, मनुष्य या अनुसृष्टि तीसरे तक ३ इन गोलों पर प्रथम खनिज दूसरे उद्भिज, जीवनसृष्टि तक कि सकता मनुष्य चेतनसृष्टि इनमें मन का विकास धीरे - धीरे अधिक बढ़ता हुआ पाया जाता है यहां है यदि चाहे और तो अपने श्रात्मा के भतों को ज्ञान द्वारा मन की अवस्था में लाकर मुक्त हो यों इस सृष्टि के झंझट सेछुटकारा पा सकता है बस इतनी ही प्रजा की सृष्टि हुई । [ १६१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * अन्नादन कल्प मन प्राण में और प्राण वाक् में नित्य नियम से इस प्रकार बचे सृष्टि हुए प्रतीत के द्वारा होते यह हैं वाक् कि जिससे जैसा-उनमें एक भी दूसरे से पृथक् होकर कभी रह ही नहीं सकता, इसी कारण और मन जैसा भिन्न - भिन्न अपना रूप धारण करती जाती है उसी ग्राकार और उसी प्रमाण में प्राण मन, प्राण भी उसी प्रकार श्रनुयायी हो जाता है । इस प्रकार जो जहां कुछ वस्तु उत्पन्न हुई है सभी के कारण कोई वाक् इन तीनों मूल तत्त्वों से ही व्याप्त हैं, किन्तु तथापि उनमें प्रारण ही न्यूनाधिकता में मन प्रारण वाक् होने से वह वस्तु बलवान् वस्तु अन्न और कोई ग्रन्नाद हो जाता है । अधिक परिमाण,, नियम है, हो जाती है, प्रबल होने के कारण अपने से दुर्वल वस्तु को खाया करती है, यह तो एक विशेष ग्रन उनका किन्तु साधारणतः सभी वस्तु दूसरी सभी वस्तुनों से अपना ग्रन्न ग्रहण किया करती हैं किन्तु ग्रहण उनके बल के अनुसार होता है और वल उनमें मन, प्राण, वाक् की मात्रा के अनुसार होता है । प्रत्येक वस्तु में प्राण का विस्रसन देखते हैं । यह वित्रसन दो प्रकार के हैं- १ साक्षात् और और २ परम्बरा से ( पारम्परिक ) । साक्षात् वह है कि प्रत्येक प्राण अपने स्वभाव से निकला करता है जो दूसरे के गर्भ में जाकर ग्रन्न होता है और कहीं दूसरे के आकर्षण से खींचा जाकर ग्रन्न बनता है | हम देखते हैं कि प्रारण, मन की ओर जाकर मन वन जाता और वहीं वाक् की ओर जाकर वाक् वन जाता है और मन, वाक् दोनों को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से वह प्राण अपने विग्रह ( मन, प्राण, वाक् के समूह कर रूप वस्तु की शरीर मूर्ति ) से जिस पिण्ड में कि वह निकल कर दूसरी वस्तु के विग्रह में प्रवेश सन जाता है और इस प्रकार वह इस वस्तु से विच्छिन्न हो जाता है । इन दोनों प्रकारों से प्रारण का विस्र होता है अर्थात् अपने विग्रह में दूसरे भावों में बदलना तो पारम्परिक हैं और प्रारण का अपने विग्रह निकल कर दूसरे विग्रह में चले जाना साक्षात् है । प्रत्येक प्राणी के ग्रन्न ७ प्रकार के होते हैं उनमें १ पृथ्वी २ पाने से प्रत्यक्ष जल ये दोनों भोजन देखते हैं, ३ सूर्य से तेज, ४ अन्तरिक्ष से वायु ५ शब्द अपने मिलते रहते हैं और ६ , ग्राप स्वभावतः कर्मेन्द्रियों से प्रत्येक प्राणी कुछ न कुछ काम करता निकलता रहता है, जिससे मलिन वल शरीर में से है और उसके स्थान में पूर्व की अपेक्षा अधिक प्रकार रहता ७ प्रत्येक प्राणी अपने ज्ञानेन्द्रियों से प्रतिक्षण कुछ मात्रा न कुछ का ज्ञान शुद्ध वल ग्रहण शरीर करता में ग्राता रहता रहता है इसी हमारे है, ये ही ७ योग अन्न हैं । इन सातों ग्रन्नों के ग्रहण करने में मात्रा का ४ प्रकार हो सकता है —१ सुयोग, २ हीनयोग, की ३ आवश्यकता अतियोग, ४ है मिथ्यायोग क्योंकि सम्भवतः । इनमें इन सुयोग अन्नों है जो वह हमारी ही आत्मा के धारण करने के वल के हीन या अनुकूल मात्रा में हो उससे कम या अधिक होना प्रतियोग है और ग्रात्मा के विरुद्ध वस्तुओं खाना का आना मिथ्या योग है जैसे भोजन के में विप इत्यादि 1 ।, स्थान इनमें केवल सुयोग से ग्रात्मा की रक्षा और पृष्टि करती होती है विस्त्रंसन से जो हानि हुआ है उसकी पूर्ति होती रहती है । यही सुख का कारण है योग दुःख , किन्तु इससे अतिरिक्त तीनों * अदन = खाना कल्प = विचार । [ १६२ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान कारण हैं । दुःख के केवल कारण ये तीन होने से प्रायः एक ही सब प्राणी दुःखी प्रतीत होते है, क्योंकि सुख कारण तो का सुयोग है इनमें सुयोग को कारण होता न ग्रहण करके ग्रन्य तीन दुर्योगों के वश में आना प्रज्ञापराध है । सबसे हो जाता मुख्य अन्न ज्ञान का वह है प्रज्ञापराव । विद्या वेदान ज्ञान " की मान न्यूनता का से परिपूर्ण उत्पन्न रूप होता से है सुगोग , इसीलिये हो इन प्रज्ञापराध सातों अन्नों नष्ट में है और सुयोग जिससे की पहचान कर दुर्योगों से बचने का उपाय समर्थ ग्रात्मा का ग्रहण करने में होता है जिससे कल्याण होता है। इन सात वाकू प्रकार के ग्रन्नों में मार्ग में सन्निविष्ट बाकाय से पृथ्वी तक ५ प्रकार के अर्थ भोजन करने पर आत्मा के होता है होते हैं यर सोम के द्वारा जो बल किया में सन्निविष्ट और विद्या उत्पन्न जाता है वह प्राण यद्यपि के द्वारा जो इन तीनों ज्ञान उत्पन्न होता है वह आत्मा के मन भाग में सन्निविष्ट रहता है । अर्थ के मिले जुले इन तीनों रहने से एक एक की पुष्टि में तीनों पुष्ट अवश्य होते हैं, तथापि ज्ञान बल, का संनिवेश ग्रात्मा के मन, प्राण, वाक तीनों भागों में पृथक पृथक ही होता है । जिस कर देती प्रकार विरुद्ध और को भी दूषित है और वस्तु के सेवन से वाक विकार को प्राप्त होकर प्राण मन करेगा ग्रनुचित रीति से श्रम करने विकार होकर मन और वाक् को भी दूषित । इसी पर प्राण प्राप्त प्रज्ञान प्रकार मिथ्या का अंश या विरुद्ध ज्ञान पाने से मन भी क्षुब्ध होता है और भयभीत हो जाता है । विचलित ज्ञानरूप से करके को करता मन में प्रविष्ट होकर उस प्रकार की मिथ्या या विरुद्ध इच्छा प्राण का है जिससे जिस मनुष्य प्रारण क्षुब्ध होकर मन में व्याकुलता उत्पन्न कर देता हैं । प्रकार अल्पबल प्रवल प्राणी साधारण के ग्रामर बुद्धि वाला बालक मुर्ख प्राणी मिथ्याज्ञान से पीड़ित होता है उसी प्रकार कम से तत्काल ही जिस मनस्वी विद्वान् का मन प्रबल के धय्यच्यूत हो जाता है । किन्तु है वहसाधारण किसी क्षुद्रज्ञानसे एकाएक ' दूरकरने का यत्न सोचता है । विचलित नहीं होता किन्तु धीरता के साथ आई हुई आपत्तियों आत्मा इन सातों जिनमें कितने ही के प्रकार के ग्रन्नों में के भेद से बहुत विशेष होते हैं । तक विरोधी प्रसन्न - प्रसन्न लेकर विद्वानों भेद हैं और कितने दोनों के जानने के लिये पूर्वकाल से आज ने नाना ही अनुकूल । इन्हीं यौगिक-विद्याओं का विकास किया है । इस प्रकार वेद, यज्ञ और प्रजा इन तीनों रूढ़ों का विचार यहाँ समाप्त हुआ । नोट : - व्यवहार शेष ५ अन्न के में चरकादि विद्वानों ने को तो ग्राहार शब्द से व ग्रहण करने केवल अन्न और जल दोनों में प्रज्ञापराध को विहार शब्द से उल्लेख किया है- आहार और विहार इन विद्या की से तीन हैं जिनसे बचकर सुयोग के लिये प्रकार के दुर्योग हुआ करते आवश्यकता मानी गई है । ] यौगिक भोक्ता ग्रन्न दो में प्रकार कि ग्रन्न भोक्ता के ग्रहण करने पर वह अन्न इस का होता है । और भोग्य - जब प्रकार प्रविष्ट भुक्त भोक्ता की आत्मा ही बन जावे वह हो जाय कि अब वह पृथक् न दीख कर [ १६३ ]
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नर * ब्रह्मविज्ञान कै अन्न भुक्त है, जिस प्रकार मनुष्य का भोजन किया हुआ अन्न ग्रथवा ग्रग्निकुण्ड में दिया हुआ तिल, घृत, समिधा ग्रादि यहां ग्रन्न भोक्ता के रूप में परिणत हो जाता है, किन्तु जहां कहीं दुर्वल दूसरी ग्रात्मा का शरीर मात्र काम में लाया जावे अथवा दुर्बल ग्रात्मा भी प्रबल आत्मा के वशीभूत किया जाय वह ग्रन्न भोग्य होता है | जैसे राजा के परिजन या कर्मचारीगण इन भृत्यों के कहीं पर शरीर मात्र से काम लिया जाता है र कहीं इनके विज्ञान से, इसीलिये ये सब भोग्य हैं । राजा की सब प्रजा ग्रन्न मानी जाती है । और प्रजा के भी पशु सव अन्न वेद में माने गये हैं । इसका भी तात्पर्य भोग्य ग्रन्न से ही है— — ग्रव हम को देखना है कि इसी भोग्य के अनुसार कहीं पर कोई ग्रात्मा अपने लिये अनेक भोग्यों को इकट्ठे करता है, किन्तु उन भोग्यों में परस्पर ग्रन्न ग्रन्नाद भाव नहीं रहता, वे सब मिलकर किसी दूसरी आत्मा का स्वरूप अवश्य बनाते हैं और इसीलिये उसी एक ग्रात्मा के अनुरोध से उनमें किसी प्रकार एकता भी ग्रा जाती है, तथापि परस्पर उन सब में ग्रन्न ग्रन्नाद भाव न होने के कारण एकता का भाव नहीं होने पाता इसी प्रकार के योग को मिश्रण कहते हैं । जिस प्रकार त्वचा, शोणित, मांस, ग्रस्थि ग्रादि नाना धातुओं के समुच्चय से देह वना है - यह देह एक आत्मा से पकड़े होने के कारण एक अवश्य है किन्तु इसमें त्वचा, शोणित ग्रादि धातुयों का परस्पर, अन्न, अन्नाद भाव नहीं है । इससे इन सब के मिश्रण से देह का बनना माना जाता है इसी प्रकार धुरा, चक्र, युग आदि अनेक पदार्थों के मिश्रण से एक रथ का स्व-रूप बनता है प्रायः औषधियों में कितने ही यूप ( काढ़ा ) शर्वत आदि पदार्थ मिश्रण के उदाहरण हैं । इसी प्रकार अन्याय यौगिक पदार्थों को भी जानना चाहिये । यहां यौगिकदर्शन पूर्ण हुआ । चतुर्व्यूहः पहले यह प्रजापति श्रन्याकृत रूप में था । उसके पश्चात् नाम, रूप, कर्म से व्याकरण होता है किसी वस्तु का कर्म ग्रर्थात् शक्ति का जानना और उसका रूप दीखना और इन्हीं दो तासीरों के अनुसार कुछ नाम रक्खा जाना ये ही तीनों मिलकर किसी भी वस्तु का व्याकरण कहलाता है । इन्हीं तीनों के कारण एक वस्तु दूसरी वस्तु से पृथक् की जाती है । इन नाम, रूप, कर्मों के द्वारा जो सबसे प्रथम कोई प्रजापति पृथक् रूप से निश्चित हुआ उसके मन, प्राण, वाक् के धर्मों से चार पदार्थ उत्पन्न होकर उस प्रजापति के चार व्यूह हुए | उन चारों के नाम ये हैं - १ ग्रात्मा, २ रूप, ३ शरीर, ४ वित्त | किसी स्कन्ध में जो सब के अन्दर कोई नभ्यबिन्दु है जिसमें सब प्रकार की शक्तियां हैं वही आत्मा का भाग है वह सर्वदा ग्रव्याकृत रूप में रहता है क्योंकि उसके कर्म, रूप, नाम कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं होते, किन्तु उसी से उत्पन्न होकर उसी के आधार से तीन सत्य - १ मन, २ प्राण, ३ वाक् जो उत्पन्न हुए हैं यही उस अनिरुक्त के निरुक्त भाग हैं । इस त्रिसत्य में तीन विशेष हैं इसी कारण यह निर्विशेष नहीं है । इन्हीं तीनों को उस आत्मा का रूप कहते है । क्योंकि वह आत्मा रूपों में प्रथम प्रकट होता है ग्रव इन तीनों सत्यों के द्वारा तीन भाव अर्थात् - वेद, यज्ञ, प्रजा उत्पन्न होकर उस ग्रात्मा का शरीर बनाते हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ये तीनों सम्मिलित रूप रहकर प्रत्येक वस्तु का शरीर बनाते हैं मूर्ति और महिमा दोनों को शरीर कहते हैं । अथवा यों समझिये कि किसी वस्तु का शरीर इन तीनों से अतिरिक्त कुछ नहीं - यह शरीर ही वास्तव में ग्रात्मा का श्रायतन ( घर ) है जिसके भीतर तीनों सत्य - मन, प्राण, वाक् [ १६४ ]
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१- श्रात्मा २- रूप १ - अव्याकृत मन २- अव्याकृत प्रारण ३- श्रव्याकृत वाक् और इसीलिये वित्त हैं । * ब्रह्मविज्ञान ४ - वित्त ३- शरीर सर्वे वेद अन्यान्य यज्ञ यज्ञ देवभूत अन्यान्य प्रजा हुआ होता है, यद्यपि अवयव ही आरम्भ होता है वह तीनों [ १६५ ] व्याप्त रहते हैं कभी २ । इस शरीर के अतिरिक्त और कितने ही धर्म जो इस शरीर में अनित्य रूप से आते जाते रहते हैं, अर्थात् जिनका रहना न रहना उस ग्रात्मा के लिये बराबर है, अर्थात् जिनके न रहने पर भी शरीर या ग्रात्मा की कोई हानि नहीं होती किन्तु वह ग्राया हुआ उस आत्मा के अधीन रहता है तो उसको वित्त अर्थात् धन कहते हैं । जैसा कृशता, पृष्ठता, तिलादि चिन्ह, रोग, विद्या, तप, बल, वस्त्र, स्त्री, पुत्र, बन्धु, भृत्य, गृह, लक्ष्मी इत्यादि । अब इस प्रजापति में चारों व्यूहों को यदि प्रथम २ देखा जाय तो यों विभाग हो सकते हैं— इस प्रकार एक – एक प्रजापति इन दश अवयवों से ही सर्वत्र बना १२ लिखे गये हैं तथापि प्रत्येक चतुर्व्यूह का उस एक अव्याकृत आत्मा से स्थान ( चतुर्व्यूह ) में एक ही है, इसलिये प्रजापति के १० ही अवयव होते हैं । प्रत्येक वस्तु में आत्मा और आत्मीय इस प्रकार २ भाग हैं जिनमें अव्याकृत भाग और दूसरा मन, प्रारण, वाक् इन तीनों रूपों का भाग और तीसरा वेद, यज्ञ और प्रजा ( देव, भूत ) इन तीनों शरीर का भाग ये सब मिलकर एक आत्मा सिद्ध होती है इसके अतिरिक्त जो कुछ इसके अधीन में है वही इस आत्मा का वित्त है वही आत्मीय है ( अर्थात् आत्मा की वस्तु जो आत्मा से भिन्न है ) यह आत्मीय ३ प्रकार का है । प्रथम मन, वेद के सम्बन्ध से सर्वेषणा है, यह सर्वेषणा मनुष्य में तीन प्रकार की है— जायंपणा, पुत्रेपणा, धनैषणा, ( एपणा - इच्छा ) यह एषणा जड़ चेतन प्रत्येक वस्तु में रहती है, किन्तु जड़ में केवल ग्रन्नंपणा होती है किन्तु मनुष्य में लोकंषणा भी होती है जो तीन प्रकार की पहले कही जा चुकी है । प्रारण यज्ञ के सम्बन्ध से अन्यान्ययज्ञ वह वित्त है जो शरीर के समष्टि रूप से प्रधान यज्ञ के अतिरिक्त जो प्रत्येक अङ्ग में भिन्न यज्ञ होते हैं जैसे दाँत, केश, रोग आदि की भिन्न उत्पत्ति और मृत्यु का क्रम पृथक् २ होता है, वह समष्टि के अनुरोध से वित्त हैं । इसी प्रकार वाक् और प्रजा के सम्बन्ध से अन्यान्य प्रजा वह वित्त है कि जो हमारे शरीर में बाहर से प्राता है, जैसा ग्रन्न और जल अथवा वह भी वित्त है जो हमारे शरीर का छोड़ा हुआ दूसरे के शरीर में जाता है अर्थात् जो कुछ हम भोजन करते हैं उसका हमारे शरीर की अग्नि से दो भाग किये जाते हैं- रस और मल जिनमें रस का भाग देव भूत के रूप में परिवर्तन होकर हमारे शरीर की संगठन ( बनावट ) करते हैं और मल भाग शरीर से निकल कर दूसरों का भोग बनाता । वह भी हमारी ग्रात्मा से निकलने के कारण आत्मीय कहे जा सकते हैं
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* ब्रह्मविज्ञान कै चतुर्व्यूह के चारों व्यूहों में नभ्य पृथक् एक भाग है और शेष तीनों - रूप, शरीर और वित्त ये विकार होने से पृथक् दूसरा भाग है, इस प्रकार यहाँ दो विभाग हो सकते हैं, अथवा नम्य, रूप और शरीर ये तीनों एक ग्रात्मा का भाग है और शेष वित्त इस ग्रात्मा का प्रधि अर्थात् ग्रायतन की चरम सीमा है और ग्रात्मीय है इनमें वित्त बहिरङ्ग और शेष तीनों ग्रात्मा के अन्तरङ्ग होते हैं इसलिये आत्मा मुख्यतया त्रिवृत्मय है जो कि प्रधि रूप वृत्त से पुष्ट किया जाता है इस प्रकार से दो विभाग हो सकते हैं । वेद, यज्ञ और प्रजा तथा बाहर से आया हुआ वित्त यह सब प्रजापति के उपकारक होने से महिमा है, किन्तु नभ्य आत्मा जो प्रजापति का अनिरुक्त भाग है अथवा मन, प्राण, वाक् में प्रजापति का निरुक्त भाग है ये ही दोनों ग्रनिरुक्त निरुक्त मिलकर मुख्य प्रजापति समझना चाहिये, जिसकी कि वह महिमा कही गई हैं | अथवा महिमा पर्यन्त प्रजापति को सर्व कहते हैं । उसकी अन्तरात्मा वेद, यज्ञ प्रजा है और उसकी भी अन्तरात्मा मन, प्राण, वाक् ये तीनों सत्य हैं और इनकी भी अन्तरात्मा ग्रनिरुक्त नभ्य है इनमें “ किम् ” सर्वनाम से प्रनिरुक्त प्रजापति और " यत् " ( जो ) सर्वनाम से त्रिसत्य रूपवाला निरुक्त मूर्ति और “ तत् " ( वहतो ) सर्वनाम से महिमा सहित सर्व प्रजापति तथा " सर्व " इस सर्वनाम से वित्त सहित सर्व प्रजापति संकेतित होते हैं । निर्विकार –नभ्य; वैकारिक — रूप, शरीर, वित्त; आत्मा –नभ्य, रूप, शरीर आत्मीय - वित्त " १ अन्तरङ्ग प्रजापति बहिरङ्ग १ सर्व नभ्य, रूप, शरीर, वित्त ) पूर्णात्मा १ तत् नभ्य, रूप, शरीर अन्तरात्मा ३ यत् — नभ्य, रूप ग्रन्तरात्मा ४ किम् — नभ्य सर्वान्तरात्मा स्कन्धव्यूह इस प्रकार मन, प्राण, वाक् और वेद, यज्ञ, प्रजा तथा वित्त इन सबके समुच्चय से बना हुआ प्रजापति सब से प्रथम परमाणु रूप से उत्पन्न होता है । अर्थात् जो सबसे सूक्ष्म ग्रणु है जिसको एक तत्त्व कहकर निरवयव ग्रखण्ड मानते हैं वह ग्रखण्ड निरवयव न होकर मन प्रारण, वाक् से अथवा वेद, यज्ञ, प्रजा से सावयत्र अवश्य है । किन्तु मन, प्राण, वेद, यज्ञ ग्रादि ग्रवयवों को निराकार होने के कारण अव्यक्त अर्थात् इन्द्रिय ग्राह्य न होने से निरवयव प्रतीत होता है । यह ग्रणु इच्छा और वित्त के भेद से नाना प्रकार के और नाना जाति के ग्रनन्तानन्त उत्पन्न हुए हैं इनमें कितने ही सजातीय हैं कितने ही विजातीय और कितने ही अनुकूल होने के कारण परस्पर मिल [ १६६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जाते हैं, कितने ही प्रतिकूल होने के कारण परस्पर नहीं मिलते और कितने ही विद्वेष के कारण परस्पर युद्ध करके दोनों नष्ट होकर तीसरे प्रकार के अणु को उत्पन्न करते हैं । इसी प्रकार श्रृणुओं के भेद से अनन्तानन्त पदार्थ जगत् में उत्पन्न, नष्ट होते रहते हैं । इन्हीं परमाणुत्रों में अनेकानेक सजातीय और विजातीय तथा अनुकूल और प्रतिकुल अणुओं के योग से छोटे बड़े ग्रनेक प्रकार के स्कन्द अर्थात् प्रणु समुदाय जिसे त्रिसरेण कहते हैं, उत्पन्न होते रहते हैं, और अनेकानेक स्कन्धों के योग से भी दूसरे भिन्न प्राकर के कितने ही स्कन्ध बनते रहते हैं – ये सब स्कन्द भी ऋणु के अनुसार ही मन, प्राण, वाक् या वेद, यज्ञ, प्रजा और वित्त अपना - अपना पृथक् रखते हैं इनमें ग्रामों के त्रिसत्य ( मन, प्राण, वाक् ) और वेदादि महिमा पृथक् - पृथक् रहने पर भी उनसे स्कन्ध का कुछ सम्बन्ध नहीं, स्कन्ध के त्रिसत्यादि सभी व्यूह नये ही उत्पन्न होते हैं । ठेला, घर, षट, पात्र, लकड़ी पत्थर, मणि, जल, अग्नि, वायु इत्यादि जहाँ जो कुछ जगत् के पदार्थ दृष्टि में आते हैं ये सब स्कन्ध हैं । अणु यद्यपि हमारी दृष्टि में कहीं नहीं श्राते तथापि यह विश्वास करना । चाहिए कि इनमें एक भी स्कन्ध बिना अणु के उत्पन्न नहीं हुआ है । इन स्वान्धों का सबसे छोटा कोई खण्ड ग्रवश्य है, जिसको हम श्रणु कहते हैं इस प्रकार अणु अव्यक्त और स्कन्ध व्यक्त इनके भेद से दो प्रकार के प्रजापति सिद्ध हुए । १ सूर्य, २ चन्द्रमा, ३ पृथ्वी श्रीर ४ जीवों का शरीर ये चार स्कन्ध मुख्य करके बिचारने योग्य हैं । इन चारों स्कन्धों में उपर्युक्त के अनुसार चारव्यूह देखना चाहिये । १ – सूर्य में ये मन तो उसकी आत्मा है, ज्योति उसका रूप है, धोलोक ही उसका शरीर है और अनेकानेक ग्रह मण्डल ( जहाँ तक सूर्य की रोशनी जाती है याने बृहत् साम तक ) उसके वित्त हैं । २ – चन्द्रमा में प्रारण उसका आत्मा है, ज्योति रूप है और ग्रापोमय अन्तरिक्ष उसका शरीर है और सत्ताईस गन्धर्वमण्डल ( जहाँ तक चन्द्रमा की रोशनी जाती है याने उसके राजिन साम तक ) उसके वित्त हैं यह सुर्य अग्नि प्रधान है और चन्द्रमा सोम प्रधान है किन्तु अग्नि और सोम इन दोनों के संसर्ग से बनी हुई पृथ्वी है और सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी इन तीनों के रस द्रव्य को लेकर जीवों के शरीर बने हैं । जीवों के शरीर तो सोम प्रधान है और देह का स्वामी प्रारण अग्नि प्रधान है । अग्नि रूप सभी देवता हैं जो जीवों के प्राण में व्याप्त हैं किन्तु सोम से बना हुम्रा रेत ( वीर्य ) से शरीर बनता है सोम से उत्पन्न शरीर दृश्य होता है किन्तु ग्रग्नि से बना हुआ प्राणमण्डल अदृश्य रहता है । यों तो ग्रग्नि सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है किन्तु इस शरीर के छ प्रकार के प्रान्तों में इसकी इतनी ज्वाला निकलती रहती है कि जिसके कारण उन छ स्थानों में लोम ( केश ) उत्पन्न नहीं होने पाते वे प्रान्त ये हैं - १ - मुख, २ - योनि, ३ - गुदा, ४ – उपस्थ, ५ - दोनों हस्ततल, ६- दोनों पादतल । सबसे प्रथम मन * तीस अणु के समुदाय को त्रिसरेणु कहते हैं जो किसी खिड़की के जाली के छिद्रों में प्राते हुये सूर्य के किरण से प्रकाशित होकर वायु में इधर उधर फिरते हुये प्रत्यक्ष दीखते हैं । | १ ९ ७ ।
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* ब्रह्मविज्ञान उत्पन्न हुआ और उसके साथ - साथ ज्ञानसम्पत्ति के भेद स्वरूप नाना देवता भी उत्पन्न हुए इन सब के समुदाय को ' ब्रह्म ' कहते हैं | पश्चात् प्रारण उत्पन्न हुए और उसके साथ - साथ बलसम्पत्ति करने वाले नाना देवता भी उत्पन्न हुए इन सब के समुदाय को ' क्षत्र ' कहते हैं । तत् पश्चात् वाक् उत्पन्न हुई और उसके साथ २ द्रव्य-सम्पत्ति रूप नाना देवता भी उत्पन्न हुए इन सबके समुदाय को ' विट् ' कहते हैं । ' ये तीन ग्रात्मा उत्पन्न हुई किन्तु जिससे इन तीनों की पुष्टि होती रहती है जिनके द्वारा इनकी रक्षा रहती है वह सामान्य रूप अनेक धर्म्मो के समुदाय को ' शूद्र ' कहते हैं । ये चारों धर्म हैं इन्हीं धम्मों से सामान्य विशेष करके भिन्न-भिन्न जीवों के शरीर उत्पन्न हुए हैं प्रत्येक शरीर में ज्ञान, वीर्य, शारीरिक अर्थ अन्न, रस, धातु आदि और उनके पोषक बाहरी धर्म इन चारों से बने हुए होते हैं । इन जीवों के शरीर में तीन प्रकार की ' एबग़ा ' ( इच्छा ) स्वभाव से उत्पन्न होती है - स्त्री, प्रजा, वित्त जव तक इन तीनों को कोई भी शरीरधारी जीव प्राप्त नहीं करता है तब तक अपनी ग्रात्मा को श्रधूरी मानता है किन्तु योग क्षेम योग्य वित्त को पाकर अपनी आत्मा की सीमा को पूर्ण हुआ मानता 1 मन, प्राण, वाक् ये तीनों श्रात्मा के रूप हैं और देवता सभी शरीर हैं और तीनों एपणा वित्त हैं । इस त्रकार प्रजापति के सम्बन्ध से चारों व्यूहों की भावना सिद्ध होती है । गुण्य सञ्चर पृथ्वी, जल, तेज वायु, आकाश इन पञ्च महाभूतों से उत्पन्न हुआ यह शरीर जो सबसे बाहर है उसको वाक् समझना चाहिये इस शरीर के अन्तर्गत जितना क्रिया का मण्डल है वह सब प्राण हैं । शरीर का कोई भी अंग ऐसा नहीं है जिसमें क्रिया करने वाला प्राण भरा न हो इस प्राण के ग्रन्तर्गत मन का आकाश है कि जिसके कारण कहीं भी कांटा चुभ जाय उसी समय उसी स्थान में वेदना का ज्ञान उत्पन्न होता है यह मन का प्रकाश प्रारण के भी भीतर प्रारण का आधार स्वरूप है वेदना होते ही प्राण उससे बचने के लिये मन की आज्ञा से हीं चेष्टा करने लगता है और बाक् अर्थात् शरीर के उस भूतमय ग्रंश को उस स्थान से हटा देता है । इन्हीं तीनों मन, प्राण, वाक् के कारण इस शरीर में तीन धारायें अर्थात् ज्ञानधारा, चेष्टाधारा, धातुसृष्टिधारा सर्वथा होती रहती है । जैसे नेत्र संस्थान में नेत्र का स्वरूप भुत-भाग है और नेत्र में चेष्टायें प्राण भाग हैं और नेत्र से उत्पन्न चाक्षुषज्ञान मन का भाग है इस प्रकार तीनों के संयोग से प्रत्येक इन्द्रियां बनी । और भी शरीर के धातु इसी प्रकार तीनों से बनते है जैसा शोणित एक भूत है और उसकी चेष्टाएँ प्राण हैं और और उसके स्पर्श से ज्ञान होना मन है । जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक ग्रङ्ग इन तीनों से युक्त हैं उसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड भर में अथवा ग्रनन्त ब्रह्मण्ड वाले इस विशाल विश्वमण्डल में प्रत्येक पदार्थ इन तीनों ग्रात्मगुणों से बनकर ही अपनी स्थति रखते हैं, येही तीनों गुण आत्मा के रूप हैं, इसी से हम कह सकते हैं कि यह समस्त विश्व ग्रात्ममय है । श्रात्मगुण या आत्मरूप एक ही बात है । आत्मानात्मविवेकः यह आत्मा शब्द श्रापेक्षिक है अर्थात् जिस प्रकार पिता, पुत्र, गुरु, शिष्य, आदि सम्बन्धित शब्द अन्यसापेक्ष होते हैं उसी प्रकार श्रात्मा शब्द भी ग्रन्यसापेक्ष है । पहले कहा जा चुका है कि जो जिसका [ १६८ ]