ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 201–210
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 201–210
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ॐ ब्रह्मविज्ञान उवथ, ब्रह्म, साम हो बढ़ उसकी आत्मा है, इसी नियम के अनुसार हमारे संसार का समस्त व्यवहार और कुटुम्ब आदि परिवार और मेरे सब कर्म इन सबका यह हमारा शरीर ही उक्थ, ब्रह्म, साम हैं, इसी से जो कुछ इस शरीर में है उन सबके सहित मेरे इस शरीर को ग्रात्मा कह सकते हैं । यह मेरी व्यवहार दशा में प्रथम ग्रात्मा है इस आत्मा के अनुरोध से उन सब व्यवहारों को ग्रनात्मा कहते हैं कि जिनकी आत्मा है । अब इसमें तीन प्रकार के वाक् विकार हैं । " भौम ' जिनको भूत कहते हैं, " दिव्य " जिनको देवता कहते हैं और " ग्रान्तरिक्ष " जिनको वायु कहते हैं ये तीन वर्ग एक रूप में ग्राकर शरीर कहे जाते हैं । अर्थात् इन्हीं तीनों वर्गों को एक शब्द से शरीर कहते हैं । इस शरीर का जो उक्थ, ब्रह्म, साम है उसको इस शरीर की ग्रात्मा कहेंगे । वह आत्मा मन, प्राण, वाक् इन तीनों का समष्टि रूप है । यह दुसरी आत्मा है इस दूसरी ग्रात्मा के अनुरोध से उस शरीर को अनात्मा कहते हैं । अब मन, प्राण, वाक् इन तीनों में भी वाक् का सब विकार मन, प्राण के ग्रधीन है, इसलिये मन, ब्राणु की समष्टि को ग्रात्मा और वाक् प्राज्च को अनात्मा वा शरीर कहते हैं यह तीसरा आत्मा है । अब इन दोनों में भी यह प्राण सर्वदा मन के अधीन रहता है, मन से उठकर मन ही के प्राधार से चलकर मन ही में लय होजाता है, इसलिये प्राण की अपेक्षा से भी मन ही एक आत्मा है । प्राण वाक् अपने विकारों के सहित इसका शरीर यह मन व्यवहार दशा में चौथी आत्मा है । ग्रव ये मन, प्राण, वाक् तीनों भी मय अपने विकारों के किसी की अव्याकृत ( नाम, रूप, रहित ) अनिर्वचनीय श्रव्यक्त किसी पदार्थ के अधीन अपनी स्थिति रखते हैं, इसलिये वही अव्याकृत यहाँ पर परमार्थ रूप से मुख्य प्रात्मा माना जाता है । और सब उसके शरीर हैं । अव्याकृत, ग्रव्यवहार्य होने से व्यवहार दशा में उसको ग्रात्मा नहीं कहते किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से वही एक आत्मा है इसी कारण आत्मा को निर्विकार, अजर अमर, अविनाशी, अखण्ड एक तत्व माना गया है । किन्तु व्यवहारिक श्रात्माएं केवल व्यवहार के लिये उपयुक्त होती हैं, जिस प्रकार दीपक में केवल ग्रचि ( लो ) का भाग ही मुख्य दीपक है, किन्तु व्यवहार दशा में मय बत्ती, मय तेल, मयतैलाधारपात्र के, मय पात्राधारादण्ड के, मय प्रावरण के भी दीपक शब्द कहा जाता किन्तु उन सब में अचिका होना श्रावश्यक है चि के होते हुए उन सब को भी दीपक कहते हैं । इस प्रकार यहां भी अव्याकृत ही केवल आत्मा है । सब के भीतर उसके रहते ही मन, प्राण, वाक् आदि शरीर तक का आत्मा शब्द से व्यवहार होता है । उन व्यवहारिक गौण ग्रात्माओं में वेदान्त उपनिषदों के कहे हुए आत्मा के अविनाशी आदि गुण कदापि नहीं हैं, वे सब विनाशी है और कूटस्थ न होकर विचाली है, अविकारी न होकर विकारी हैं, ग्रानन्दरूप न होकर भय, सुख, दुख, भागी हैं और अजन्मा श्रमर न होकर जन्म, मृत्यु भागी हैं, किन्तु इतना होने पर भी बाह्य धर्मों की अपेक्षा शरीर को, शरीर की अपेक्षा त्रिसत्य को, त्रिसत्य की अपेक्षा मन को भी आत्मा कहकर आदर अवश्य किया जाता है, क्योंकि यह सब क्रम, क्रम से आत्मा के समीपवर्ती होने से आत्मा के मुख्य धम्मों को क्रम - क्रम से अधिक ग्रहणकियेहुए हैं । * ग्रव्याकृत ग्रात्मा अष्टगुणी है जैसाकि श्रुति ने कहा है १ - पाप या विकार का संसर्ग न होना २ – वृद्व न होना, ३ - मृत्यु का न होना, ४ – शोक का न होना, ५- भूख का न होना, ६ – प्यास का न होना, सत्य, काम, सत्य संकल्प का होना । [ १६ ९ ]
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जिस प्रकार शरीर के संबन्ध * ब्रह्मविज्ञान ग्रात्मा, अनात्मा का विभाग दिखाया गया है उसी प्रकार इस विश्व में भी उन दोनों का विभाग है । जितना वाक् के विकार का प्रपञ्च है उसे ही विश्व कहते हैं, यह प्रपञ्च ही ग्रात्मा का शरीर है, मन, प्राण, वाक् ये तीनों उसकी श्रात्मा हैं, किन्तु वाक् का विकार वाक् से कदापि भिन्न नहीं है और यह वाक् ग्रात्मा ही का एक भाग है, इसलिये इस विश्व प्रपञ्च को भी हम ग्रात्मा ही कह सकते हैं । यह विश्व मन रूपी श्रात्मा में प्रविष्ट है, किन्तु प्राण रूपी आत्मा इस विश्व में सर्वत्र प्रविष्ट है और वाक् का विकार वाक् से भिन्न न होने के कारण यह सम्पूर्ण विश्व वाक् रूपी आत्मा ही है इसी से जगत् के ग्रात्मा के साथ तीन सम्बन्ध सिद्ध होते हैं, १ - ग्रात्मा में विश्व २ -- विश्व में ग्रात्मा, ३ – ग्रात्मा ही विश्व है । किन्तु यदि वाक् ही को आत्मा माना जाय वाक् के विकारों को विकार की दृष्टि से ही ग्रात्मा न समझें तो चौथा सम्बन्ध भी सिद्ध होता है जो चौथा सम्बन्ध यह कि विश्व में आत्मा भिन्न है | किन्तु इसे भिन्नता पर भी यदि पाँचवें विकार को वास्तव में विकार न माना जाय तो सम्बन्ध भी सिद्ध होता है अर्थात् ग्रात्मा से विश्व भिन्न नहीं है । तात्पर्य यह कि श्रात्मा विश्व से भिन्न है किन्तु विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है । इससे दोनों में भेदाभेद सम्बन्ध सिद्ध हुआ है । जैसे प्रकाश और दीपक अथवा ग्रग्नि या ताप में भेदाभेद सम्बन्ध है वैसे ही यह समझो इस प्रकार विरुद्ध पांच सम्बन्धों के मेल होने से अर्थात् विरोध न होने से छठा अनिर्वचनीय सम्बन्ध भी सिद्ध होता है इसको * पविकल्प सम्बन्ध कहते हैं । वाक् के विकारों में सबसे प्रथम गुण भूत जिनको तन्त्रात्मा या विशेष भी कहते हैं उत्पन्न हुए, तत्पश्चात् परमाणु भूत पञ्चीकरण होने से महाभूत तत्पश्चात् भौतिक पिण्ड बस इतनी ही वाक् की सृष्टि अद्यपर्यन्त उत्पन्न हुई । इन विकारों को ग्रात्मा श्रनात्मा दोनों उपर्युक्त अनुसार कह सकते हैं । किन्तु यह विकार वाक् के ग्राघे भाग में ही होते हैं और ग्राधा अब भी उन विकारों में सदा निर्विकार रूप से रहता है जैसे पानी में फेन होकर पानी को ढकता है उसी प्रकार यह विकार निर्विकार वाक् को निगूढ़ भाव से भीतर रखता है यही कारण है कि प्राकाश को छोड़कर शेष जितने भूत विकार * षड्विकल्प सम्बन्ध १ - आत्मा और विश्व का - ग्राधाराधेय भाव - ग्रात्मा में विश्व - ( शुद्धाद्वैत - वल्लभ ) । २- ” 11 ३- " " ४-" " - विश्व में ग्रात्मा, -" - " - ( विशिष्टाद्वैत - रामानुज ) । 11 -ग्रभेद सम्बन्ध— ग्रात्मा ही विश्व है, - ( द्वैत शङ्कर ) । - भेद सम्बन्ध - विश्व से ग्रात्मा भिन्न है, - ( द्वैत- माधव ) । ५- " " } ६- " श्रात्मा से विश्व भिन्न नहीं हैं ] -भेदा - भेद सम्बन्ध-" ( द्वैताद्वैत निम्बार्क ) । किन्तु विश्व से ग्रात्मा भिन्न है " - अनिर्वचनीय सम्वन्ध - अकथनीय ( प्राश्चर्यमय ) - ( मायावाद....... ) । [ १७० ]
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* ब्रह्मविज्ञान हैं वे संयोग विभाग दोनों दिशाओं में अपने में से निर्विकार वाक् अर्थात् शब्द को प्रकट करते हैं । यह शब्द स्वयम् गतिशील न होने से वायु के द्वारा वायु पर ही सवार होकर बाहर मण्डलरूप में क्षण भर प्रकट होकर ग्राकाश और समुद्र में लीन हो जाता है । इससे भी सिद्ध हुआ कि यह भौतिक विश्व अपनी वारूपीआत्मा में ही रहता है । और ये सब विकार वास्तव में वाकू ही है और प्रतिसंचर क्रम में सब भौतिक भूतों में और पृथ्वी, जल, तेज, वायु क्रम में फिर बाक् हो जाते हैं । इसमें वैज्ञानिकों की दृष्टि में कोई भी विचार नहीं माना जाता, केवल ये सब विकार वाक् के ही अवस्था विशेष हैं । जैसे सोने के टुकड़े को डला, कड़ा इत्यादि कहें, उसी प्रकार इन्हें बिकार कहना भ्रम मात्र है और मिथ्या है । मोम जिस प्रकार पिघलकर द्रव होता है और फिर घन होता है उसी प्रकार यह वाक् भी केवल अपनी अवस्था पलटती है इसीलिए हम कह सकते हैं कि वास्तव में यह सम्पूर्ण विशाल जगत् निर्विकार केबल आत्मा ही आत्मा है । इसी अभिप्राय को लेकर वेद बारम्बार कहना है कि - आत्मैवेदं सर्वम् 1 एतदात्म्यमिदं सर्वम् ये ही ग्रात्मायें सब 1 २ - व्यूहानुव्यूह परिच्छेद में ३ दर्शन हैं १ - परमेश्वरदर्शन, २ - ईश्वरदर्शन, ३ - जीवदर्शन ( १ ) परमेश्वरदर्शन १ — उपक्रमसूत्र १ – पहले परिच्छेद में जो व्यूह कहा गया है वह अनन्त प्रकार का है किन्तु उन व्यूहों से बना हुग्रा ग्रनुव्यूह तीन प्रकार का है— जीव, ईश्वर और परमेश्वर । प्रजापति के सहस्रों व्यूहों के समुच्चय से एक जीव का अनुव्यूह उत्पन्न होता है और सहस्रों जीबों के अनुब्यूह् उत्पन्न होता है और अनन्त ईश्वर व्यूहों से एक परमेश्वर का अनुव्यूह सम्पन्न होता है । यह परमेश्वर एक ही है इसी कारण फिर चीथा अनुव्यूह सम्पन्न नहीं होता है इस कारण तीन ही अनुव्यूह सिद्ध होते हैं । २ — ग्रपने ब्यूहों को धारण करती हुई आत्मा जिन वाक्, प्राण, मनों से सम्पन्न होती है उनसे अतिरिक्त वाक्, प्राण, मनों को जीव धारण करता है और जीव सम्बन्धी उन तीनों से अतिरिक्त वाक् प्राण, मनों को ईश्वर धारण करता है और ईश्वर के भी उन तीनों से अतिरिक्त वाक्, प्राण, मन, परमेश्वर के हैं । [ १७१ 1
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ३ – सब से प्रथम कोई एक ग्रात्मा समस्त वाक्, प्रारण, मनों से पर्याप्त अखिल विश्वव्यापी था, वही सृष्टि क्रम में ग्राकर असीम से ससीम रूपों में ग्राकर व्याप्त हो गया, फिर उन ससीमों में भी धीरे - धीरे बृहत्सीम के भीतर असंख्य अल्पसीम उत्पन्न हुए । इस प्रकार प्रथम तीन विभाग हुए १ - असीम २- बृहत्-सोम, ३ - ग्रल्पसीम | इन्हीं तीनों को क्रम से परमेश्वर, ईश्वर और जीव कहते हैं । ४- इन तीनों श्रात्मानों से पृथक् पृथक् सृष्टियां होती हैं वह प्रत्येक सृष्टि अपनी - अपनी आत्मा में ही रहती है । वाक् ही बीज रूप से अर्थात् उपादान रूप से होता है । इसी प्रकार मन स्रष्टा या निर्माता अनुसार प्राण के श्राश्रय से वाक् ही परिणत ५ — इन सृष्टियों में तीनों ही ग्रात्मा में सर्वत्र कारण होता है और प्राण उपाय रूप से निमित्त कारण ( कर्ता ) रूप से कारण होता है । मन की इच्छा वृत्ति के होकर नाना रूप धारण करती हैं - यही सृष्टि का मूलतत्त्व या रहस्य है । ६ – यद्यपि परमेश्वर, ईश्वर, जीव इन तीनों में मन, प्रारण, वाक् अवश्य रहते ही हैं किन्तु परमेश्वर में सबसे अधिक और ईश्वर से उससे कम और जीव में उससे कम उन तीनों की मात्रा रहती है । ७– इससे पहले के “ विशिष्ट त्रिसत्यवाद " में जगत्, जीव और ईश्वर ये तीन तत्त्व दिखाये गये थे, परन्तु अब सूक्ष्म विचार करने से ईश्वर के अतिरिक्त परमेश्वर भी दिखाया जाता है और जीव, ईश्वर, परमेश्वर, इन तीनों को ही लेकर हम यहाँ त्रिसत्य का वर्णन करेंगे और जगत् को जो ये तीनों पृथक-भासते हैं वह भी इन्हीं तीनों के साथ पृथक - पृथक वर्णन करेंगे, क्योंकि सूक्ष्म विचार करने पर यह जगत् इन तीनों से पृथक् कदापि प्रतीत नहीं होता है । २ - आयुर्निर्णय सूत्र इन तीनों में परमेश्वर की ग्रायु श्रर्थात् जीवनकाल का प्रमाण नहीं पाया जाता और ईश्वर की की आयु शतकल्प की अनुमान की जाती है किन्तु सम्भव है कि ईश्वर के नाना प्रकार के होने के कारण किसी किसी ईश्वर की आयु इससे भी अधिक हो किन्तु जीवों में मनुष्य की ग्रायु का प्रमाण भिन्न - भिन्न प्रकार का है कितने ही जीवों की ग्रायु सहस्र वर्ष की पाई जाती है और कितने ही जीव एक दिन में ही कई बार पैदा होते हैं और मरते हैं । उन सब जीवों की ग्रायु का भिन्न भिन्न विचार न करके यहाँ केवल मनुष्य की आयु के सम्बन्ध में कुछ कहा जाता है । मनुष्य की श्रात्मा जिन मन, प्राण, वाकों से सम्पन्न होती है उनकी संख्या ३६००० की है- ३६००० मन, ३६००० प्राण, ३६००० वाकों से बनी हुई आत्मा ३६००० दिन में पृथ्वी मे बने हुए शरीर से संबन्ध तोड़ लेती है । इसी कारण मनुष्य की श्रायु मुख्यतः १०० वर्ष की मानी जाती है । मनुष्य की आयु १०० वर्ष की होती है । इसके कारण परीक्षा में कई मत हैं - १ यह है कि जिस प्रकार इस त्रिलोकी ब्रह्माण्ड के मध्य में सूर्य अपने प्रकाश से व्याप्त हो रहा है । उसी प्रकार इस त्रिलोकी शरीर में भी हमारी आत्मा सूर्य के समान चारों ओर ज्ञानमय प्रकाश से शरीर में व्याप्त हो रही है-[ १७२ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान * सूर्य प्रकाश मण्डल के समान ज्ञान - प्रकाश मण्डल को भी सम्वत्सर कहते हैं । रेखा जिसे विषुववृत्त कहते हैं उसी को ज्ञान की भाषा में बृहती कहते हैं । नाम है जो चतुष्पाद होकर ३६ अक्षर का होता है । त्सर में पृथ्वी पूर्वापर मध्य बृहती अक्षर के छन्द का विषुववृत्त में भी दश दश अंश का एक एक अक्षर मानने से ३६ अक्षर हैं इसी से उसे बृहती कहते हैं इनके एक एक अक्षर को जो दश दश अश के बने हैं प्रत्येक अंश को १०० से गुणा करके ३६००० हो जाते हैं । ३६००० दिन में उन ३६००० अक्षरों से सूर्य संवत्सर के संबन्ध पके हुए पत्तों के अनुसार अलग हो जाते हैं पृथ्वी और सूर्य की ग्रात्मा का सम्बन्ध इस प्रकार टूटे जाने पर तीनों लोक के रस मिले हुए नहीं रहते याने सूर्य का रस इस पृथ्वी से बने हुए शरीर को छोड़कर ऊपर सूर्य की ओर चले जाते हैं इसी की मृत्यु कहते हैं । २ – दूसरे मन में सूर्य के क्रान्तिवृत्त को जगती कहते हैं जगती १२ अक्षरका छन्द है इसको द्वादशाह कहते हैं | जगती को जगती से गुणा करने पर १४४ होता है यही १४४ वर्ष की मनुष्य की परम आयु है अर्थात् पृथ्वी के विषुवत् को १२ भाग करके प्रत्येक भाग में उन्हीं बारहों की दृष्टि पड़ने से प्रत्येक भाग १२ भागों में बट जाते हैं । यो १४४ भाग होते हैं । एक एक वर्ष में सूर्य के सम्बन्ध से पकने पर पृथ्वीरस और सूर्यरस पृथक् पृथक् हो जाता है इसी मृत्यु कहते हैं । यद्यपि मनुष्य की आयु प्रथम मत के अनुसार १०० वर्ष की मानी गयी है, किन्तु सदाचार और यज्ञादि के द्वारा अथवा शरीर संगठन की दृढ़ता के द्वारा यदि श्रायु बढ़े तो उसकी तीन सीमा है- १- कनिष्ठ सीमा १०८ वर्ष की, २ - मध्यमसीमा १२० वर्ष की और ३- परमसीमा १४४ वर्ष की है । इनमें परमसीमा का कारण द्वितीय मत से दिखाया गया है । सौ वर्ष का नियम सामान्य मान है किन्तु १०० वर्ष से भी अधिक जीवन के मनुष्य पाये गये हैं । प्रकृति नियम के अनुसार १४४ वर्ष से अधिक मनुष्य भी नहीं जीता । अलबत्ता औषधिकल्प के द्वारा अधिक जीवन चरकऋषि ने माना है और योगाभ्यास से अधिक जीवन पुराण के ऋषियों ने माना है । ३ – स्वातन्त्र्यसूत्र ( जीवतन्त्र, ईश्वरतन्त्र और परमेश्वरतन्त्र ) १ - जीवतन्त्र जीव ईश्वर परमेश्वर इन तीनों के भिन्न भिन्न तन्त्रों का अर्थात् संस्थाओं का आयतन है जैसा कि जीव के तन्त्र का प्रायतन हदबन्धी यह शरीर है । इस शरीर के भीतर जो कुछ है या जो उत्पन्न होता रहता है उनमें एक तिहाई भाग इस जीव के ही अधीन है अर्थात् जो मन, प्राण, वाक् इस जीव की ग्रात्मा है उनसे उत्पन्न होते हुए ज्ञान, क्रिया और अर्थ सभी जीव तन्त्र के भीतर माने जा सकते हैं और वे सब जीव के अधीन हैं अर्थात् उन ज्ञान, क्रिया, अर्थ इनकी उत्पत्ति में अथवा उनके संचालन में यह् जीव पूर्णतया स्वतन्त्र है उनमें ईश्वर के या परमेश्वर के तन्त्रों का साक्षात् सम्बन्ध नहीं है इसीलिये जीव दुराचरण का अपराधी माना जाता है और इसीलिये शास्त्र की विधि - निषेध की नोट: - यदि आयु का बढ़ाव हो तो १०८, या १२० या १४४ तक हो सकता है इत्यादि से तो ४०० वर्ष तक भी माना गया है । और योगाभ्यास [ १७३ ]
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ब्रह्मविज्ञान प्राज्ञाएँ सार्थक होती हैं, अथवा ईश्वर परमेश्वर के तन्त्र में जीव सदा परवश है । ऐसी स्थिति में जीव पर किसी प्रकार की शास्त्र की ग्राज्ञा का देना व्यर्थ हो जाता है । इस जीव में प्रारण तीन प्रकार का है १ - वैश्वानर, २- तेजस, ३ - प्राज्ञ इन तीनों में वैश्वानर प्राण शरीर का संरक्षक है, अर्थात् प्रकृति नियम के अनुसार प्रतिक्षा इस शरीर में से जो कुछ क्षीण होता रहता है उसकी पूर्ति करता हुआ इस शरीर की स्थिति को ज्यों की त्यों बनाये रहता है । जो कुछ अन्न, पान इस शरीर के भीतर प्रविष्ट होता है, उसके भी रम और मल दो भाग करके रस भाग को शरीर के निर्वाह के लिए भीतर ही धारण करता है और मल भाग से अपना संसर्ग छोड़ता है । अब दूसरा प्राण तेजस है जो कि इन दोनों रस और मल भागों को स्थानान्तरित करता है, अर्थात् रस बनने के स्थान से हटकर इसको सर्वाङ्ग शरीर में ग्रावश्यकतानुसार बांट कर संचालन करता है और मल भाग को शरीर के बाहर फेंक देता है । इसके अतिरिक्त बालक शरीर को धीरे धीरे बढ़ाकर, युवा ग्रवस्था, वृद्धावस्था में परिणत करता है । शरीर का बढ़ना, घटना, स्फुरण होना, चेप्टा होना, अपने श्राप गति करना इत्यादि सभी क्रियाएँ तैजस प्राण के अधीन है और तीसरा प्राण प्राज्ञ है, जिसके द्वारा शरीर में ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं संज्ञान अर्थात् किसी बात का संकेत करना या लक्ष्य रखना और ग्रज्ञान अर्थात् किसी विषय की और अपने को या दूसरे को रूकाना, प्रज्ञान अर्थात् किसी बाहरी विषय को अपने मस्तिष्क तक भीतर पहुँचाना और विज्ञान अर्थात् किसी विषय की सत्यता को चिरकाल तक धारण करना इत्यादि इत्यादि, ज्ञान की अनेक शाखाएँ इस शरीर में प्रज्ञाप्रारण के द्वारा उत्पन्न होती रहती हैं । ये ही तीन प्राण हैं इनमें वैश्वानर का संबंध ग्रंथ से है जो ग्रात्मा के वाक् भाग से उत्पन्न होता है, तेजस का संबन्ध क्रिया से है जो ग्रात्मा के प्राण भाग से उत्पन्न होती है और प्रज्ञाप्राण का सम्बन्ध ज्ञान से है जो श्रात्मा के मन भाग से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार वैश्वानर का संबन्ध ग्रग्नि देवता से, तेजस का संबन्ध वायु देवता से और प्रज्ञा का सम्बन्ध इन्द्र देवता से सर्वदा बना रहता है । इन्हीं तीनों के द्वारा जीव की ग्रात्मा का ईश्वर की ग्रात्मा के साथ संयोग है । प्राधिदैविक पदार्थ अध्यात्म में और ग्राध्या-त्मिक पदार्थ अधिदैविक में ग्राते जाते रहते हैं, जिनके द्वारा जीव, ईश्वर का सदा ऋणी बना रहता है । इन्हीं तीनों प्राणों को उपासना काण्ड में उपासना के लिये अर्थात् चित्त की स्थिरता के लिये तीन भिन्न भिन्न नामों से बोलते हैं । वैश्वानर को विष्णु कहते हैं, जिसका काम रक्षा करना है, तेजस को ब्रह्मा कहते हैं जिसका काम पैदा करना है और तीसरा प्रज्ञा का नाम शिव है अर्थात् सदा कल्याण या शान्त रूप है इन तीनों जीवों की वृत्तियों में जिस मात्रा को जीव अधिक बढ़ाना चाहता है उसी में मन लगावे तो तो मन के लगने से प्राण और वाक् ये दोनों भी उसी में लग जाते हैं, जिसके कारण आत्मा में वही भाग अधिक बढ़कर तन्मय हो जाता है और उसी के द्वारा ईश्वर या परमेश्वर के भी उसी भाग में लीन हो जाता है यही उपासना का सार या तात्पर्य है । ईश्वरतन्त्र जिस प्रकार जीव का तन्त्रायतन अर्थात् तन्त्रशाला यह शरीर है इसी प्रकार ईश्वर की तन्त्रशाला यह ब्रह्माण्ड है । ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ है या जो कुछ उत्पन्न होता रहता है उनमें ग्राधा भाग [ १७४ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ईश्वर के अधीन है अर्थात जो मन, प्राण वाक् उस ईश्वर की ग्रात्मा है उनसे उत्पन्न होते हुए ज्ञान, क्रिया, अर्थ सभी ईश्वर तन्त्र के भीतर माने जा सकते हैं और वे सब ईश्वर के अधीन हैं । अर्थात् उन ज्ञान, क्रिया, अर्थ उनकी उत्पत्ति में ग्रथवा उनके संचालन में यह ईश्वर पुर्णतया स्वतन्त्र है । उनमें परमेश्वर के तन्त्र का साक्षात् संबन्ध नहीं है । ईश्वर में प्राण तीन प्रकार का है - १ - विराट् २ - हिरण्यगर्भ ३ - सर्वज्ञ | विराट् को वैश्वानर भी कहते हैं इन तीनों में विराट् प्राण ब्रह्माण्ड का संरक्षक है । अर्थात् प्रकृति नियम के अनुसार प्रतिक्षण इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ क्षीगा होता रहता है उसकी पूर्ति करता हुआ इस ब्रह्माण्ड की स्थिति को ज्यों का त्यों बनाये रखता है । दूसरा प्राण हिरण्यगर्भ है जो कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पन्न होते हुए भिन्न भिन्न पदार्थों को ग्राव-श्यकता के अनुसार ऊपर नीचे भिन्न भिन्न स्थानों में बाँटकर संचालन करता हुआ ब्रह्माण्ड के स्वरूप को मिल मिलेवार संपन्न करता है इस ब्रह्माण्ड का समस्त परिवर्तन इसके अधीन है । तीसरा प्राण सर्वज्ञ है जिसको अन्तर्यामी भी कहते हैं, जिसके द्वारा इस ब्रह्माण्ड के समस्त चेष्टाओं के कारण रूप, महाप्राण का उत्थान या संचालन होता रहता है । कोई भी प्राण बिना ज्ञान के नहीं प्रवृत्त होता यह् प्रजापति परिच्छेद में कहा जा चुका है । जिस प्रकार हमारे प्राण का संचालन हमारे शरीर के प्राज्ञग्रात्मा के अधीन होते हुए हम देखते हैं उसी प्रकार यहाँ भी प्राणों का संचालन किसी ज्ञान घन आत्मा के अधीन अवश्य होना माना जाता है । यद्यपि उसको हम अनुभव नहीं कर सकते, तथापि जिस प्रकार दूसरे शरीर के भीतर प्राण चेष्टा के कारण उसी शरीर के मन की इच्छा को सर्वथा हम अनुभव नहीं करते किन्तु अपने ही अनुसार उसके होने का भी पूर्णतया विश्वास रखते हैं ठीक उसी तरह ईश्वर के ब्रह्माण्ड में भी होती हुईं सभी चेष्टाओं का कारण किसी न किसी मन की इच्छा के होने का विश्वास करना चाहिये वही ज्ञान घन सर्वज्ञग्रात्मा है । ब्रह्माण्ड भर में ये ही तीन प्राण हैं, इनमें विराट् का, ब्रह्माण्ड का सम्बन्ध इस ब्रह्माण्ड के समस्त दैविक भौतिक अर्थों से है जो कि आत्मा के वाक् भाग से उत्पन्न होते हैं और हिरण्यगर्भ का सम्बन्ध इस ब्रह्माण्ड की समस्त क्रियायों से है जो ग्रात्मा के प्राण भाग से उत्पन्न होते हैं और सर्वज्ञ प्राण का संबन्ध ज्ञान से है जो ग्रात्मा के मन भाग से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार विराट का संबन्ध अग्निदेवता से, हिरण्यगर्भ का संबन्ध वायुदेवता से और सर्वज्ञ का संबन्ध इन्द्र से है । इन्हीं तीनों के द्वारा ईश्वर की श्रात्मा का जीव की ग्रात्मा के साथ प्रोतप्रोत संबन्ध है, जिसके द्वारा ईश्वर सर्वदा जीव पर अनुग्रह करता रहता है । इन्हीं तीनों प्राणों को उपासक लोग भिन्न नामों से व्यवहार करते हैं । अर्थात् विराट् को विष्णु, हिरण्यगर्भ को ब्रह्मा और सर्वज्ञ को शिव कहकर उपासना करते हैं । ये तीनों उपास्य देवता वास्तव में एक ही आत्मा के तीन स्वरूप हैं, इसीलिए तीनों एक ही हैं । जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में नाभि, [ १७५ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान केंड हृदय, सिर ये तीनों भिन्न होने पर भी एक ही शरीर के तीन भाग हैं, किसी ग्रङ्ग की सेवा करने से उस एक शरीर की ही सेवा होती है उसी प्रकार इन तीनों देवतानों में किसी एक की भी उपासना करने से एक ही आत्मा की उपासना होती है, परन्तु यदि एक की उपासना करता हुआ दूसरे की उपासना का विरोध करें तो वह नाभि की सेवा करते हुए शिर काटने के बराबर अनुचित है । वास्तव में उपासना का मर्म यही है कि अपनी तीनों ग्रात्माओं में से किसी ग्रात्मा के द्वारा ईश्वर की उसी ग्रात्मा तक पहुँ-चना और उसमें लय होकर ईश्वर में सायुज्य हो जाना । परमेश्वरतन्त्र सूर्य को द्यौलोक और इस भूमि को पृथ्वीलोक और इन दोनों के बीच के वायुमण्डल को अन्तरिक्ष कह कर एक त्रैलोक्य माना जाता है । इस प्रकार के त्रैलोक्य सहस्रों की संख्या में जिसके चारों ओर विद्यमान् हैं ऐसा एक सच्चिदानन्दमय मण्डल अर्थात् जिसके किरण सत्ताघन हैं, विज्ञानघन और आनन्दघन है वही सच्चिदानन्द रूपी सूर्य अपने विशाल प्रकाशमण्डल के साथ एक ईश्वर कहलाता है । इसी प्रकार के अनन्तानन्त ईश्वर जिस अनन्त विशाल परमाकाशमण्डल में विद्यमान है वही परमाकाश-मण्डल ग्रपने अन्तर्गत समस्त मन, प्राण, वाक् के साथ समस्त उनके विकारों के साथ एक परमेश्वर कहलाता है | जीब और ईश्वर जिस प्रकार अपनी आत्मा को केन्द्र बनाकर कुछ दूर अपना ग्रायतन बनाकर सीमाबद्ध होते हैं उस प्रकार यह परमेश्वर न तो अपना केन्द्र ही रखता है और न उसके प्रायतन की सीमा ही होती है । सीमावद्ध आयतन होने के कारण जिस प्रकार एक ईश्वर की सीमा के पश्चात् दूसरे ईश्वर का भी इस अनन्त आकाश में अवकाश मिलता है और इसलिए अनन्त ईश्वर का होना संभव हो जाता है, उसी परमेश्वर कदापि संख्या में अनन्त नहीं हो सकता जब कि वह सर्वत्र ही वर्तमान है उसकी सीमा ही नहीं है तो फिर दूसरे परमेश्वर के लिए अवकाश मिलना ही कैसे संभव हो सकता है इसलिए सिद्धान्त है कि परमेश्वर देश और काल में अनन्त होकर भी संख्या में सदा एक ही है । इस परमेश्वर का यही विशाल अनन्त परमाकाश ही तन्त्रशाला है इस विशाल विश्वमण्डल में जो जहां कुछ हो चुका है या जो कुछ उत्पन्न होने वाला है सब कुछ इसी तन्त्रशाला के अन्दर समझना चाहिए वे सब इस परमेश्वर के ही अधीन है श्रथवा यों भी कह सकते हैं कि वे ही सब कुछ मिलेजुले रूप में एक परमेश्वर है । इस परमेश्वर की ग्रात्मा अर्थात् मन, प्राण, वाक् से उत्पन्न होते हुए ज्ञान, क्रिया, अर्थ ही सर्वत्र व्याप्त हैं । यह परमेश्वर इन तीनों ज्ञान का निधि है और इन तीनों से यह महाजगत् परिपूर्ण है, अथवा परमेश्वर ही परिपूर्ण है । इसी परमेश्वर रूपी निधि से आवश्यकतानुसार थोड़ी - थोड़ी मात्रा में मन, प्राण, वाक् को अथवा उसके विकार, अर्थ को लेकर अनन्तानन्त ईश्वर अपना स्वरूप या ज्ञान, क्रिया जीवन धारण करते हैं और फिर उन ईश्वरों से उन्हीं तीनों रसों को पाकर अनन्त जीव भी अपना स्वरूप या जीवन धारण करते रहते हैं । जीव के नाश होने पर उनके स्वरूपारम्भक सभी रस जिस प्रकार ईश्वर में लीन हो जाते हैं उसी प्रकार ईश्वर के समाप्त होने पर उनके सब रस परमेश्वर में लीन हो जाते हैं अथवा यों कहिये कि वे सब रस जीव और ईश्वर के रहते भी परमेश्वर में ही लीन हैं, क्योंकि [ १७६ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान 8 जीव और ईश्वर भी परमेश्वर के आयतन से बाहर नहीं है । केवल जिन रसों से जीव और ईश्वर का स्वरूप बनाया वे स्वरुप केवल नष्ट हो जाते है । किन्तु वे रस जीव ईश्वर के पहले या पीछे भी ज्यों के त्यों रहते हैं क्योंकि वे नित्य परमेश्वर रूप हैं । परमेश्वर के प्राण भी तीन प्रकार के हैं १ - ग्रग्नि २ - वायु, ३- इन्द्र - ज्ञान के उदय होने का कारण इन्द्र है, ग्रंथों की उत्पत्ति और संचालन का कारण वायु है और प्रत्येक वस्तु मे से त्रिस्रस्त ( झड़ा हुआ ) अंश की पूर्ति करके उस वस्तु के स्वरूप की रक्षा रखना अथवा यज्ञ के स्वरूप में वस्तु की जीवन रक्षा रखना अग्नि का काम है । इन्हीं अग्नि, वायु, इन्द्रों को, जो थोड़ी मात्रा ईश्वर के शरीर को बनाते हैं, उन्हीं को वैश्वानर, हिरण्यगर्भ और नर्वज्ञ कहते हैं और उन तीनों की भी थोड़ी मात्रात्रों से जब जीव का स्वरूप बनता है तो उन्हीं तीनों को वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ कहते हैं । तात्पर्य यह है कि ग्राश्रय भेद और मात्रा भेद से नाम भेद होने पर भी वास्तव में परमेश्वर का श्रवयव मे तीनों अग्नि, वायु, इन्द्र ही सर्वत्र व्याप्त होकर इस चराचर जगत् का संचालन करते हैं । अथवा इन्हीं तीनों ग्रंथों को ज्ञान, क्रिया के साथ जगत् कहते हैं, यही परमेश्वर का रूप है । पारतन्त्र्यसूत्र जीव अनन्त है ये सब प्रत्येक अपना - अपना पृथक् तन्त्र रखते हैं किन्तु सभी जीव एक ईश्वर के साथ इस प्रकार बंधे है कि यदि ईश्वर न रहे तो ये सब जीव उसके साथ ही विलीयमान हो सकते हैं । जिस प्रकार सहस्रों जलपात्रों में भिन्न - भिन्न प्रतिबिम्ब अपना - अपना पृथक् तन्त्र रखते हैं तथापि वे सब एक ही आकाश वाले सूर्यतन्त्र से बने हैं इसी बन्धन को अनुग्रह कहते हैं क्योंकि सूर्य अपनी सत्ता से उन प्रतिबिम्बों में सत्ता प्रदान करता है । सूर्य ही की सत्ता से उन सब की सत्ता है इसी प्रकार ईश्वर ही अपनी सत्ता से सब जीवों में सत्ता प्रदान करता है । ईश्वर की सत्ता से ही सब जीवों की सत्ता है यही ईश्वर का जीवों पर अनुग्रह है । ठीक इसी प्रकार अनन्तानन्त ईश्वरों का संबंध एक परमेश्वर के साथ है, परमेश्वर के गर्भ में अनन्तानन्त ईश्वर हैं और एक - एक ईश्वर के गर्भ में ग्रनन्तानन्त जीव हैं । इस प्रकार परमेश्वर का ईश्वरों के साथ प्रोर ईश्वर का जीवों के साथ अनुग्राहक अनुगृहीत भाव है । अनुग्रह शब्द का अर्थ पकड़ने के हैं, जैसे गिरते हुए को हाथ का सहारा देकर कोई पकड़ ले तो वह पकड़ना उसका अनुग्रह होगा । इसी अनुग्रह में जीव थोर ईश्वर दोनों का पारतन्त्र्य है अर्थात् जीव वा ईश्वर दोनों ही अपने ग्रपने तन्त्र में पूर्ण स्वतन्त्र हैं किन्तु जीव की सत्ता ईश्वर परतन्त्र है । ऐसे ही ईश्वर की सत्ता परमेश्वर पतन है । सम्पूर्ण जीवों पर एक ईश्वर जो अक्षर है व्याप्त होकर रहता है और उन जीवो को सब तरह से भोगता है । अर्थात् उनको इच्छानुसार उत्पन्न करता है और उत्पन्न हूणों का रस लेता रहता है और उनकी कमी को अपना रस देकर पूरा करता रहता है और अन्त में अपने ही भीतर उनको लय भी कर लेता है । इसी प्रकार समस्त ईश्वरों पर परमेश्वर भी व्याप्त होकर उनको भोगता है और ज्यों का त्यों [ १७७ ।
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* ब्रह्मविज्ञान ड बनाये रखता है । जीवों की श्रात्मा ईश्वर से प्राती है और ईश्वरों की ग्रात्माएं परमेश्वर से ग्राती है । परमेश्वर स्वयं ग्रात्मघन है, उनमें आत्मा और कहीं से नहीं ग्राती । जीव, ईश्वर और परमेश्वर इन तीनों का संबंध राजा, सम्राट और स्वराट् के अनुसार भी समझना चाहिये राजा अपने राष्ट्र का स्वतन्त्र है किन्तु उसकी सत्ता सम्राट् के अधीन है और सम्राट उससे रस भी लिया करता है इसी प्रकार सम्राट् अपने राष्ट्र में स्वतन्त्र है, किन्तु उसकी सत्ता स्वराट् के परतन्त्र है और वह उससे सभी लेता है. इसके अतिरिक्त इन तीनों का संबंध जल, बुदबुदा और प्रतिविम्व के अनुसार भी है- — जल के परतन्त्र बुदबुद है और बुदबुद के परतन्त्र उसमें प्रतिबिम्ब है इत्यादि और भी उदाहरण दिये जा सकते हैं । इस प्रकार विजातीय पारतन्त्र्य का विचार हुआ है । अब ग्रागे सजातीय पारतन्त्र्य के विषय में कहा जाता है । सजातीयपारतन्त्र्य पहले यह कहा जा चुका है कि जीव अनन्त हैं और प्रत्येक जीव अपना भिन्न तन्त्र रखता है तो इस कथन से यह निश्चित होता है कि जीव ईश्वर के प्रति परतन्त्र होने पर भी जीवों का जीवों के साथ पारतन्त्र्य नहीं है । इसी प्रकार ईश्वर का भी परमेश्वर के प्रति पारतन्त्र्य नहीं है । किन्तु किसी ईश्वर का ईश्वर के साथ बारतन्त्र्य नहीं है ऐसी शंका किसी को हो सकती है जिसको दूर करने के लिये कहा जाता है वास्तव में जीवों की स्थिति दो प्रकार से है एक " व्यधिकरण " रूप से और दूसरी " व्याप्यव्यापक ” रूप से इनमें पहला वह है जैसा कि दो मनुष्यों का परस्पर संबन्ध है । उन दोनों का प्रायतन भिन्न होने के कारण उनमें “ वैयधिकरण्य " है । ऐसी स्थिति में जीवों का जीवों के साथ पारतन्त्र्य न होना माना जासकता है, इसी प्रकार के व्यधिकरण ईश्वरों में भी पारतन्त्र्य का न होना माना जा सकता है, किन्तु जहाँ व्याप्यव्यापक भाव है उन में एक जीव के दूसरे सहस्त्रों जीव प्रारम्भक होते हैं । अथवा एक ईश्वर के कई ईश्वर ग्रारम्भक होते हैं ऐसी स्थिति में जीवों का जीव के साथ, ईश्वर का ईश्वर के साथ पारतन्त्र्य अवश्य माना जा सकता है । जैसा कि मनुष्य के शरीर में सबसे छोटा जीव " सृमर " है । सृमर के शरीर में दूसरे किसी जीव का सम्बन्ध नहीं है | किन्तु अनेक सृमर के मेल से दूसरे प्रकार का जीव उत्पन्न होता है, जिसे भ्रूण कहते हैं | वह शुक्र में, शोणित में, अस्थि प्रभृति में भी सख्यात रूप में रहते हैं, यद्यपि वे सब सृमर या भ्रूण जीव अपनी भिन्न - भिन्न जीवन परिस्थिति रखते हैं इसलिये अपने ढंग में स्वतन्त्र हैं किन्तु उनकी सत्ता हमारे शरीर की सत्ता के अधीन हैं । इसलिये हमारे शरीर के साथ परतन्त्र हैं । हमारे शरीर के श्रायतन के भीतर उनका श्रायतन होने के कारण हमारे साथ उनका व्याप्यव्यापक भाव है, इसलिये उनको व्यापक एक जीव का शरीर के आरम्भक होने से परतन्त्र कहते हैं । इसी प्रकार ईश्वर भी जो सब से बड़ा एक मुख्य है वह सच्चिदानन्दघन है और कृष्ण है, अर्थात् रूप रङ्ग रहित है और कितने ही ब्रह्माण्डों का स्वामी है, जिसका प्रायतन के भीतर सहस्त्रों सूर्य तपते हैं. वही एक मुख्य ईश्वर है, जिसके शरीर के प्रारम्भक और भी कितने ही छोटे बड़े ईश्वर माने जाते हैं, जैसाकि एक - एक सूर्य एक - एक ब्रह्माण्ड का स्वामी ईश्वर है । वह वर्ग में श्वेत है और उसके श्रायतन के भीतर बहुत सी त्रिलोकी हैं, ऐसे त्रैलोक्य का भी भिन्न एक ईश्वर है । जिसकी नकल पर । १७८ |