ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 211–220

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 211–220

पृष्ठ 211

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* ब्रह्मविज्ञान टैं मनुष्य जीवों की सृष्टि होती है । इस त्रैलोक्य में भी ये भिन्न - भिन्न तीनों लोक भिन्न - भिन्न तीन ईश्वर हैं, जैसा कि पृथ्वी एक ईश्वर की छोटी मूर्ति है इस प्रकार ये छोटे बड़े सभी ईश्वर अपने गर्भ में अनन्तानन्त जीवों को उत्पन्न करते हुए रखते हैं । अपने - अपने जीवों के साथ एक - एक ईश्वर दूसरे ईश्वर के साथ व्याप्यव्यापक भाव स रहते हैं और परतन्त्र हैं इस प्रकार जीवों के साथ और ईश्वर के साथ व्याप्यव्यापक भाव की दशा में पारतन्त्र्य है और वैयधिकरण्य अलग हद्द, भिन्न आयतन की दशा में स्वातन्त्र्य है । जगत् व्यपदेशसूत्र ( व्यपदेश - प्रयोग ) जीव, ईश्वर श्रीर परमेश्वर ये तीनों व्यूहानुव्यूह हैं । इनमें कितने ही स्कन्धव्यूहों के व्यूहों से स्वरूप का निर्माण होता है । प्रत्येक स्कन्धव्युह में अनेक आत्मायों का संग्रह होता है और प्रत्येक आत्मा अपना रूप, शरीर और वित्त पृथक् - पृथक् रखती है अर्थात् मन, प्राण, वाक् ये तीनों मिलकर एक अनुव्यूह आत्मा हैं | ज्ञान, क्रिया, अर्थ ये ही तीनों आत्मा के उबुद्ध रूप हैं और वेद, यज्ञ, प्रजा ये तीनो उस ग्रात्मा के शरीर हैं और प्रबल आत्मा अन्य निर्बल श्रात्माओं से जो कुछ अपने श्रायतन में संग्रह करता है वह उस ग्रात्मा का वित्त है । इस प्रकार आत्मा, रूप, शरीर और वित्त चारों मिलकर एक अनुव्यूह होता है । ऐसे अनेकानेक अनुव्युहों से एक स्कन्ध व्यूह होता है और कितने ही स्कन्ध ब्यूहों के मिलाव से एक वह व्यूह उत्पन्न होता है जिसको जीव कहते है । यह जीव तीन जाति के हैं । एक खनिज जो प्रसंज्ञ है जैसे हीरा, माणिक इत्यादि । दूसरा जीव उद्भिज्ज है जो अन्तः संज्ञ है — जैस वृक्षादि । तीसरा जीवज है जो ससज्ञ है - जैसे मनुष्यादि । खनिज में केवल वैश्वा-नरप्राण ही आत्मा होता है । उद्भिज्ज में वैश्वानर और तैजस इन दो प्राणों की आत्मायें हैं और जीवज में वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ ये तीनों प्राणों की आत्माएं हैं । ऐसे तीनों प्रकार के अनेकाने क जीवों से एक नया वह् व्यूह उत्पन्न होता है जिसे ईश्वर कहते हैं । ऐसे अनन्त ईश्वर व्यूहों से वह एक ग्रसीम व्यूह गदा सिद्ध रहता हूँ जिसे परमेश्वर कहते है । परमेश्वर एक ही है, इसीलिए उससे नया व्यूह उत्पन्न नहीं होता । इतना विषय पहल कहा जा चुका है, अब इतना और कहना है कि जीव व्यूह की जो ग्रात्मा है उसका रूप तो ज्ञान, क्रिया और अर्थ ग्रात्मा से पृथक् नहीं हो सकता किन्तु उसके आधार जो अतिरिक्त तीन भाग हैं - वेद, यज्ञ, प्रजा इन तीनों को यद्यपि उस ग्रात्मा का शरीर माना गया है तथापि उनमें मुख्य शरीर का भाग प्रजा है, जो कि अग्नि, सोम, यम, आप इन चारों देवताओं के संबन्ध से पञ्चदेवपञ्चभूत ये दशों अपने विकारों से एक प्रकार का पुद्गल उत्पन्न करते हैं, वही स्थूल होने के कारण मुख्य शरीर है | यह उसी का जीवन निर्वाह है, और वेद भी उसी का विस्तार है । तात्पर्य यह है कि ग्रात्मा और उसके रूप से अतिरिक्त वेद, यज्ञ, प्रजा के भेद से जो कुछ शरीर का भाग है या वित्त का भाग है वही उस आत्मा का जगत् है । जिस प्रकार शरीर जीव का तन्त्र है और जिस प्रकार ब्रह्माण्ड ईश्वर का तन्त्र है उसी प्रकार यह असीम जगत् परमेश्वर का तन्त्र है | शरीर, अण्ड और जगत् ये तीनों ग्रापेक्षिक पर्याय शब्द है अर्थात् [ १७६ ]

पृष्ठ 212

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* ब्रह्मविज्ञान एक ही विषय को लक्ष्य कर के जीव सम्बन्ध से शरीर, ईश्वर के सम्बन्ध से ग्रण्ड और परमेश्वर के सम्बन्ध से जगत् कहलाता है । तथापि परमेश्वर का जगत् उसका ग्रण्ड और शरीर भी कहा जा सकता है । इसी प्रकार जीव के शरीर को भी उसका ब्रह्माण्ड मा उसका जगत् कह सकते हैं । इस प्रकार जीव, ईश्वर और परमेश्वर के भेद से यह जगत् भी तीन भिन्न - भिन्न प्रकार का है । किन्तु जीव का जगत् ईश्वर के जगत् में श्रौर ईश्वर का जगत् भी परमेश्वर के जगत् में अन्तर्गत होकर रहता है जीव के जगत् से बाह्र दूसरे जीव का जगत् या ईश्वर का जगत् है । इसी प्रकार ईश्वर के जगत् बाहर भी दूसरे ईश्वर का जगत् रहता है । किन्तु परमेश्वर के जगत् से बाहर कहीं कुछ नहीं है । परमेश्वर का जगत् ही परमेश्वर है | ईश्वर या जीव का जगत् भी ईश्वर या जीव की आत्मा से उत्पन्न होकर उसी ग्रात्मा के ग्राश्रय से इस प्रकार मिलाजुला रहता है कि जिससे ईश्वर के जगत् को ईश्वर से या जीब के जगत् को जीव से भिन्न कदापि नहीं कह सकते । जीवतन्त्र का नाम शरीर है; ईश्वर 17 " परमेश्वर,, अण्ड है ।} शरीर, ग्रण्ड, जगत् । ,,, जगत् जीव, ईश्वर, परमेश्वर के तन्त्रों को शरीर, ग्रण्ड, जगत् तीनों नामों से भी बोल सकते हैं । जीव का तन्त्र ग्रन्य जीव के तन्त्र से भिन्न है किन्तु ईश्वर के तन्त्र के अन्तर्गत है । ऐसे ही ईश्वर का तन्त्र अन्य ईश्वर के तन्त्र से भिन्न है किन्तु परमेश्वर के तन्त्र के अन्तर्गत है । आत्मत्रयसाम्यसूत्र पहले कहा जा चुका है कि जीव में ३ ग्रात्मायें हैं- वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ । इसी प्रकार से ईश्वर में तीन आत्माएं हैं- विराट् हिरण्यगर्भ और अन्तर्यामी या सर्वज्ञ | इसी प्रकार परमेश्वर में तीन आत्मायें हैं — यग्नि, और वायु और इन्द्र । अधिकरण या व्यूह भेद से इन ग्रात्माओं के भेद होने पर भी वास्तव में अग्नि, विराट् और वैश्वानर ये तीनों एक ही पदार्थ हैं अर्थात् ग्रग्नि के ही ये तीनों नाम हैं और यह वाक् प्रवान है । यह तीनों ग्रधिकरणों या व्यूहों में अर्थो की सृष्टि किया करता है-इसी प्रकार वायु, हिरण्यगर्भ और तेजस ये तीनों भी एक ही पदार्थ हैं और यह प्राण प्रधान है तीनों व्यूहों में क्रियाओं को उत्पन्न किया करता है । इसी प्रकार इन्द्र, ग्रन्तर्यामी और प्राज्ञ ये तीनों भी एक ही पदार्थ है अर्थात् इन्द्र ही है, यह गन प्रधान है । तीनों व्यूहों में ज्ञान भाग की उत्पन्न करना इसका काम है | इस प्रकार मन, प्रारण, वाक् के सम्बन्ध से तीनों व्यूहों में समान जाति के तीन ग्रात्मा होने से तीनों की समानता है । ज्ञानोत्पादक क्रियोत्पादक अर्थोत्पादक इन्द्र रूप वायुरूप अग्नि रूप [ १८० ]

पृष्ठ 213

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* ब्रह्मविज्ञान छै जीव की प्रात्मा - मन, प्राण, वाक् को ही प्राज्ञ, तेजस, वैश्वानर कहते हैं । ईश्वर की ग्रात्मा — मन, प्राण, वाक् को ही सर्वज्ञ, ( अन्तर्यामी ) हिरण्यगर्भ, विराट् कहते हैं । परमेश्वर की ग्रात्मा— मन, प्राण, वाक् को ही इन्द्र, वायु, अग्नि कहते हैं । ग्राकाशत्रय साम्य तीन ग्राकाश दहरोत्तर भाव से सदा वर्तमान रहते हैं ऐसा माना गया है कि जीव का जितना शरीर है उसको शरीराकाश कहते हैं और उस शरीर का केन्द्र हृदय है, जिसके भीतर भी " दहरपुण्डरीक " के नाम से एक छोटा सा श्राकाशमण्डल है । उसी में शोणित की उत्पत्ति होती है । इस शरीर भर में जितने प्रकार के प्राा हैं जिनसे कि देवता और भूत उत्पन्न होते रहते हैं वे सब उस छोटे से दहरपुण्डरीक नाम के हृदयाकाश में विद्यमान होते हैं । इन दोनों ग्राकाशों को अर्थात् हृदयाकाश और शरीराकाश को जीव के संबन्ध के कारण एक ही मानते हैं । अब दूसरा ग्राकाश ब्रह्माण्ड का है अर्थात् इस भौतिक सूर्य का प्रकाश जहाँ तक है वह शुद्ध ब्रह्माण्ड आकाश है और ऐसे ऐसे सहस्रो सूर्य जित सच्चिदानन्द सूर्य के चारों चोर फिरते । उसका ज्ञान प्रकाश जहाँ तक व्याप्त है वह यही ब्रह्माण्ड श्राकाश है इन दोनों आकाशो को ईश्वर के सम्बन्ध होने के एक ही मानते हैं । अब तीसरे ग्राकाश को परमाकाश कहते हैं यह परमोध्योम असीम है । इसी परमाकाश अन्तर्गत असंख्यात अण्डाकाश हैं और एक एक अण्डाकाश के अन्तर्गत असंख्यात शरीराकाश हैं । इस प्रकार एक बड़ी सीमा में छोटी सीमा और फिर उसमें छोटी सीमा की वस्तु यदि रक्खी जाय तो इसको ' दहरो-त्तरभाव ' कहते हैं । वैज्ञानिक महर्षियों की सुक्ष्म परीक्षा ते यह निश्चित हो चुका है कि जितने प्रकार के प्राण या मन वाक् के विकार उस परमाकाश में है वे सब उसके अन्तर्गत ब्रह्माण्डाकाश में भी थोड़ी मात्रा में रहते हैं और ब्रह्माण्ड।काश में जितने प्राण हैं या जितने भूत और देवता हैं वे सब इस छोटे शरीराकाश में थोड़ी मात्रा में हैं । तात्पर्य यह कि इन तीन ग्रायतनों के छोटे बड़े होने के कारण मात्रा या परिमाण में भेद अवश्य है | परन्तु उन प्राणों की जाति तीनों में बराबर है इसीलिये पिण्ड की परीक्षा करने से अण्ड की और उसके द्वारा परमत्र्योम की परीक्षा हो जाने का विश्वास रखते हैं । अनाहतनाद सूत्र ( बिना ठोकर खाया हुआ ) जीव के शरीर में एक प्रकार की गरमी पाई जाती है उसे वैश्वानर + अग्नि कहते हैं । यह अग्नि दो प्रकार से उत्पन्न होता है । एक प्राकृतिक नियम से दुसरा कृत्रिम व्यापार से तात्पर्य यह है कि सूर्य * दहर का अर्थ छोटा है उससे उत्तर बड़ा आकाश रहता है इसी से इसको दहरोत्तर कहते हैं । + वैश्वानर – विश्व = लोक, नर = स्वामी तीनों लोक के स्वामी तीन प्राणों के संयोग से उत्पन्न अग्नि वैश्वानर को कहते हैं और सूर्य का प्राण भी इस शरीर पर अधिकार करता है । [ १८१ ।

पृष्ठ 214

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* ब्रह्मविज्ञान * और पृथ्वी का प्राण इस शरीर पर अपना अधिकार करता है इन दोनों के अतिरिक्त तीसरा प्राण ग्रन्त-| रिक्ष का है वह एक प्रादेश अर्थात् १० ॥ अंगुल का होकर ठीक हृदय से बचा हुआ रहता है उस प्राण को व्यानवायु कहते हैं इसी व्यान के ग्राधार पर सूर्य का प्राण पृथ्वी के प्राण में संयोग करता है । सूर्य काप्राण पृथ्वी के प्राण को दबाना चाहता है किन्तु पृथ्वी का प्राण हृदय से बन्धे रहने के कारण एकदम नष्ट नहीं होता, केवल दवकर व्यान के नीचे की छोर पर आकर फिर दबाव की जगह न पाकर एकदम उठने के लिए जोर करता है उसी के बल से सूर्य का प्राण धक्का खाकर पीछे की ओर लौटता है किन्तु वह भी सर्वदा नष्ट न होकर व्यान के ऊपरी छोर तक ग्राकर फिर नीचे की ओर आने का जोर लगाता है | इसी प्रकार दोनों प्राणों के बारी - बारी से ऊपर नीचे दबाव पड़ने को प्राणापान व्यापार कहते हैं । सूर्य के प्राण को प्राण हो कहते है और पृथ्वी के प्राण को अपान | पंखे के अनुसार इन दोनों प्राणों के ऊपर नीचे हिलने से कुछ शरीर की वायु ऊपर नासिका होकर निकलता है और प्राण के भीतर जाने पर बाहर की वायु शरीर के भीतर घुसती है, इसी को श्वासोच्छवास कहते हैं व्यानवायु पर इस प्रकार प्राण और प्रपान का जो संघर्षण होता है उसी से एक प्रकार की ग्रग्नि उत्पन्न होती है उसे ही वैश्वानर-ग्रग्नि कहते हैं । यह इस ग्रग्नि की उत्पत्ति प्राकृतिक नियम से है । इस प्रकार उत्पन्न हुआ ग्रग्नि शरीर के धातुओ का दान करने लगे इसीलिये उस अग्नि की रक्षा के अर्थ ग्रन्न भोजन करना पड़ता है क्योंकि ग्रग्नि का स्वभाव कुछ न कुछ खाते रहने का है । भोजन किये हुए अन्न से भी अग्नि उत्पन्न होता रहता है जिससे इस शरीर की रक्षा होती है, इस प्रकार अग्नि की उत्पत्ति कृत्रिम व्यापार से की जाती है । अग्नि का स्वभाव है कि जलते समय जलने वाली चीजों में से जमे जमाये बहुत से भौतिक वायुनों को उबेड़ कर बाहर फेंकता है और बहुत सी बाहरी भौतिक वायुओं को अपने जलने के काम में लेता है । इसीलिये भीतर वाले वायु को बाहर के वायुयों से जो मिलने का वेग उत्पन्न होता है उससे एक प्रकार का शब्द उत्पन्न हुआ करता है । तात्पर्य यह है कि जीव के शरीर में इसी प्रकार वैश्वानर-ग्रग्नि के जलते रहने से जो उसके जलने का शब्द उत्पन्न होता है उसे ही " ग्रनाहतनाद " कहते हैं । यह नाद जब तक प्राणी का जीवन है, जब तक शरीर में ग्रग्नि है तब तक बना रहता है किन्तु जब प्राणी के मृत्यु का समय समीप ग्राता है तो अग्नि बन्द होने लगती है तो वह नाद भी धीमा पड़ जाता है यहाँ तक कि मरने के समय सर्वथा बन्द हो जाता है । यह तो जीव के शरीर में अनाहतनाद का कारण है । किन्तु जिस प्रकार जीव के शरीर में तीनों लोक के तीन प्राण एकत्र होकर प्राणायान करते हैं उसी प्रकार ईश्वर के ब्रह्माण्ड में भी तीन लोक हैं और तीनों के प्राण परस्पर मिलते हैं । इनीलिये वहाँ भी अन्तरिक्ष में पृथ्वी के प्राण सूर्य के प्राण के साथ संघर्षण होते रहने के कारण जो एक प्रकार की अग्नि " उत्पन्न होती है उसे वैश्वानर प्राण कहते हैं । और शरीर के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वत्र व्याप्ल रहते हैं | इसे हम बाहर के अग्नि को देखकर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं तो इस से हम अनुमान भी कर सकते हैं कि जिस प्रकार मेरे शरीर में ग्रग्नि के जलन से शब्द अर्थात् ग्रनाहतनाद उत्पन्न होता है उसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड में भी उसी अग्नि के जलने से वह ग्रनाहतनाद ग्रवश्य उत्पन्न होता होगा ॥ १८२ |

पृष्ठ 215

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* ब्रह्मविज्ञान क किन्तु सूक्ष्म होने के कारण हमारी श्रोत्र - इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर सकती अथवा ऐसे समझिये कि यदि शब्द होकर न हो, तभी शब्द गहन किया जाता है परन्तु शब्द एक रस होता ही रहे उसका विच्छेद यदि हम ग्रहण न करें तो उस शब्द को भी हम ग्रहण नहीं कर सकते । यही कारण है कि सदा सर्वदा एक रस ग्रविच्छिन्न ग्रनाहतनाद के पेट में बड़े हुए हम उस अनाहतनाद को ग्रहण नहीं करने पाते परन्तु यदि ब्रह्माण्ड में ग्रग्नि है तो ब्रह्माण्ड में अनाहतनाद होना भी प्रकृति नियम के अनुसार ग्रावश्यक है । हम विश्वास रखते हैं कि हमारे अनुसार ईश्वर भी अपने अनाहतनाद को अपने जीवन पर्यन्त श्रवश्य ही सुनता होगा | आजकल बहुत से विद्वानों का यह विश्वास है कि कान जब अंगुली से बन्द करते हैं तो कान के छिद्र द्वारा प्रवेश करते हुए बाहर वायु को प्रवेश का मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म मिलता है इसलिए उसमें वायु को प्रवेश करते समय संकुचित होकर घन होना पड़ता इसलिये वायु के प्रवेश करते समय शब्द की उत्पत्ति होती है यह उत्पत्ति कर्ण प्रदेश में ही होती है न कान के भीतर है न बाहर है इसीलिए इस शब्द को शरीर के भीतर मानना भूल है इस पर अधिक विचार करने से यही सिद्ध होता है कि यह शब्द शरीर के भीतर ग्रग्नि के हो जलने का है जैसा कि छान्दोग्य श्रुति में लिखा है बाहर से वायु का प्रवेश करते समय करन्ध्र में शब्द की उत्पत्ति मानना अधिक विश्वास योग्य प्रतीत नहीं होता क्योंकि हम देखते हैं कि बाहर यदि प्रचण्ड वायु चलता हो अथवा सर्वथा वायु शान्त होकर हमें कुछ भी प्रतीत न होता हो इन दोनों ग्रवस्थानों में अंगुली से कान बन्द करने पर इकसार अनाहतनाद सुनने में आता हैं न कभी घटता है न कभी बढ़ता है यदि बाहरी वायु कारण होता तो उसके घटने बढ़ने पर शब्द के घटाव - वढ़ाव में ग्रवश्य ही कुछ परिवर्तन होता इसके अतिरिक्त एक प्रबल प्रमाण यह है कि जहां बाहरी वायु चलता रह्ता है वह करन्ध्र या नासिका मुख आदि में अवश्य ही प्रवेश करता रहता है किन्तु, उससे हम शब्द का अनुभव कदापि नहीं करते प्रत्युत किसी समय जब हम निर्जन एकान्त स्थान में बैठते हैं जहां वायु का सञ्चालन भी सर्वथा रुका हुआ हो और हमारी इन्द्रियाँ भी रोग के कारण कुछ निर्बल हो गयी हो तो ऐसी स्थिति में बिना अंगुली दबाये भी इस अनाहतनाद का सन्नाटा देर तक सुनते रहते हैं इसका अनुभव योगाभ्यास करने वालों को समय - समय पर अधिक होता है वे अंगुली से कान नहीं दबातेतथापि श्रनाहतनाद बराबर सुनते रहते इन बातों से सिद्ध होता है कि कान में वायु का मार्ग तंग करने से इस शब्द की उत्पत्ति नहीं है ग्रवश्य ही इसका कोई दूसरा कारण है संभवतः वह दूसरा कारण अग्नि का कारण अग्नि का जलना ही हो सकता है क्योंकि जब कभी बाहर हम अधिक श्रग्नि को गम्भीरता से जलते हुए पाते हैं तो किसी समय उसके जलने का सनसनाहट शब्द भी सुनते हैं उस शब्द से यदि इसकी तुलता करते हैं तो उन दोनों में बहुत कुछ समानता प्रतीत होती है, इसलिए विश्वास करना चाहिए कि यह अनाहतनाद शरीर के अग्नि के प्रज्वलन का ही है । शब्द जहां कहीं उत्पन्न होता है वहाँ कुछ न कुछ प्राघात अवश्य होता है, श्राघात के होते ही सबसे प्रथम जो शब्द उत्पन्न होता है उसको एक बिन्दु रूप कल्पना कर सकते हैं, उस बिन्दु से फिर श्रनन्त शब्द उत्पन्न होकर उस बिन्दु के चारों ओर दूर - दूर तक इस प्रकार वे शब्द फैलते हैं चलते हुए [ १८३ ]

पृष्ठ 216

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 216 का मूल पृष्ठ
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ॐ ब्रह्मविज्ञान श्री जैसे किसी ग्रग्ति के कणों से प्रकाश की धारा वारों योर फैलती हो या जिस प्रकार सूर्य के चारों नोर प्रकाश फैला हुआ है | इसमें भेद इतना ही है कि अग्नि का प्रकाश ज्यों - ज्यों ग्रागे बढ़ता जाता है त्यों - त्यों अग्नि कण से फिर दूसरी दूसरी प्रकाश की धारा सिलसिलेवार पीछे से आती रहती है इसीलिए विम्ब से प्रकाश की चरम सीमा तक प्रकाश भरे हुए से प्रतीत होते हैं किन्तु यह शब्द प्राघात से उत्पन्न होता है वह् श्राघात यदि एक ही वार हुग्रा तो वह पहला शब्द विन्दु उत्पन्न होते ही अनन्तानन्त शब्दों को उत्पन्न करके आप् मर जाता है इसीलिए जो शब्द की धारा ग्रागे वढ़ती जा रही है उसके पीछे फिर वह शब्द नहीं रहता । इसकी गति ठीक उसी प्रकार होती है जिस प्रकार पानी में एक ढेला डालने पर उस जगह से चारों ग्रोर ' लहर का चक्कर नया नया बनता हुआ चारों ओर फैलता हुआ जाता है । इस नाद का जो केन्द्र अथवा सवसे प्रथम जो शब्द उत्पन्न होता है, उस आघात बिन्दु से चारों ओर फैलते हुए शब्दों को नाद कहते हैं । यही नाद मेरे कर्णप्रदेशों में ग्राता है तब हम शब्द सुनते हैं इस विन्दु औौर नाद की समष्टि रूप में ' बीज ' कहते हैं उसी बीज का नाम ओम् है - वेद जो ऋक्, यजु, साम के भेद से तीन प्रकार का है वह वास्तव में वाक् है अर्थात् शब्द है यह शब्द ईश्वर के शरीर में हृदय वैश्वानर से उत्पन्न होता हुआ ग्रनाहतनाद जो ईश्वर के शरीर में प्रथात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है उसका विन्दु ईश्वर का हृदय है और उसका नाद सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है । उसी नाद से सब देवता ग्रौर सभीभूत जो वास्तव में वाक् ही के भेद हैं, उत्पन्न होते रहते हैं । इसीलिए वह बिन्दु या उसका नाद सम्पूर्ण जगत् का वीज रूप होता है उसी ईश्वर के अनाहतनाद से उत्पन्न होता है इसीलिए उसको भी ' ओम् ' शब्द से कहते हैं इसको ग्रोम् कहने के दो कारण एक तो यह है कि यदि ' प्रोम् ' शब्द को अविच्छिन्न रूप से वोलते ही रहे तो उसकी व्वनि अनाहतनाद की व्वनि से सर्वथा मिलती जुलती है यदि ग्रनाहतनाद को ग्रोम् के ध्वनि में मिलान करें तो भिन्नता नहीं प्रतीत होगी । अनाहतनाद को सुनकर ऐसी कल्पना हो उठती है कि मानों यह जीन तथा ईश्वर भी ओम् शब्द का निरन्तर उच्चारण कर रहा है बस इस सादृश्य को देखकर ही उस अनाहतनाद रूपी जगत् वीज को ' ओम् ' यह नाम दिया है । ग्रोम् नाम रखने का दूसरा कारण यह है कि प्रोम् शब्द ग्रह- श्रम् इन दोनों शब्दों के मेल से बना है इन दोनों में दो - दो वर्ण हैं प्रथम स्वर और दूसरा ऊष्मा है दूसरे में प्रथम स्वर और दूसरा स्पर्श है तात्पर्य यह हैं कि शब्दों में सबसे प्रथम शब्द ' ग्र ' है जो कि स्थान और करण इन दोनं के विवृत दशा में कण्ड से निकलता है इसके उच्चारण में मुख के किसी स्थान का किसी कारण से स्पर्श नहीं होता इसलिए इसका उच्चारण घन या स्थूल न होकर सूक्ष्म, स्वच्छ र अत्यन्त निर्मल है यह केवल प्रयत्न के वल से ही व्यक्त हुआ है यदि प्रयत्न में कमी की जाय तो यह शीघ्र ही अव्यक्त हो जायगा इसलिये शब्द की अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था सव से प्रथम ग्रकार में ही पाई जाती है यही प्रकार के पांचों स्थानों में गिराकर बोलने से इकार ग्रादि स्वर वन जाते हैं और इसी अकार में ऊष्मा और मुख स्पर्श मिलाने से व्यन्जन अक्षर बन जाते हैं यही बात ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक में लिखा है जैसाकि " ग्रकारो वै सर्वा वाक् । संषाम्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना, बह्वी, नानारूपा भवति " बाक श्रात्मा से २ प्रकार की सृष्टि होती है १ शब्दगयी और २ भूतमयी इनमें शब्दमयी सृष्टि उपरोक्त अनुसार ग्रह से ग्रर्थात् [ १८४ ]

पृष्ठ 217

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6 वन्द्यविज्ञान अकार पर ऊष्मा और स्पर्श के संयोग से ही होती है इसलिये उसका बीज प्रोस्, माना गया है - व्याकरण के नियम से प्रकार के पश्चात् म करके पूर्व बीच का ऊपमा ' यो ' कार में बदल जाता है इसी नियम से ग्र - ह - न को ग्रोम् बोलते है । तात्पर्य्य यह है कि शब्दमयी सृष्टि का वीज जो प्रोम् है वही भूतमयी सृष्टि का बीज है । क्योंकि ईश्वर के अनाहतनाद से ही सम्पुर्ण शब्दमयी सृष्टि हुई है और उसी से भूतमीमी हुई है इसलिये हम कह सकते हैं कि यह भूतमय सम्पूर्ण जगत् ओंकार से ही उत्पन्न हुया है । इसलिये भूतमय जगत् जो अर्थ है उसका शब्द के साथ घनिष्ट सम्बन्ध कर दिया है- विज्ञान के भीतर शब्द को अर्थ के साथ और अर्थ को शब्द के साथ बांधा गया है, जिससे गौ का नाम सुनने पर गौ के रूप का ज्ञान हो जाता है । इस प्रकार गी का रूप देखने पर गौ का नाम बुद्धि में आजाता है इन दोनों शब्द और अर्थ को परस्पर बाँधने वाला हमारा विज्ञान है जो वास्तव में मेरी प्रात्मा है उसी ग्रात्मा से उत्पन्न हुआ श्रनाहतनाद इन दोनों मिले हुए शब्द और अर्थ को उत्पन्न करता है इसलिये दोनों हीं ' ओम् ' शब्द से उत्पन्न माने जाते हैं । सत्य अर्थों से बच्चे हुए सत्य शब्दों को जो कि यथार्थज्ञान उत्पन्न करते हैं उनको ही शास्त्र या वेद कहते हैं ये सम्पूर्ण वेद अर्थात् श्रर्थ का ज्ञान कराता हुआ शब्द भण्डार ओम् शाब्द से ही उत्पन्न हुआ है । इसलिये ऋषियों ने वेद के ग्रारम्भ करते समय या सगाप्त करते समय उस वेद के कारण ग्रोम् शब्द का स्मरण करना आवश्यक समझकर नियम बद्ध किया है । इस प्रकार ओम्कार से ही सम्पूर्ण वाङ्मय वेद की उत्पत्ति भागवत के बारहवें स्कन्ध के छठे श्रध्याय में कही गई है | इस वेद के बीज रूप प्रणव का प्रवर्तक ग्रनाहतनाद का स्थान जीव के शरीर में दहराकाश है और ईश्वर के शरीर में पुराणाकाश अर्थात् ब्रह्माण्ड है । इसी प्रकार परमेश्वर के शरीर में परमाकाश उसकी उत्पत्ति स्थान है । ग्रथवा किसी का मत है कि परमेश्वर में केन्द्र न होने के कारण श्रथवा तीन लोक न होने के कारण न वैश्वानर ग्रग्नि है और न ग्रनाहतनाद है और न उससे शब्द आदि भौतिकसृष्टि है । सब केवल ईश्वर और जीव से ही संबन्ध रखते हैं जो कही परमेश्वर को ही वेद का मूल कहा गया है अथवा कहीं पर वेद को ही परमेश्वर कहा गया है यह सब परमेश्वर का भक्तिवाद है क्योंकि परमेश्वर इस प्रकार व्यापक है कि ईश्वर में या जीव में जो कुछ है सब परमेश्वर से पृथक् नहीं हो सकता इसीलिये वेद का भी ग्राश्रय परमेश्वर कहा जा सकता है । अनाहतनाद का सारांश ग्राकाश अखण्डरूप से एक है । किन्तु जीव के शरीर के आकाश को शरीराकाश कहते हैं, और ईश्वर के ब्रह्माण्ड क्रे आकाश को ब्रह्माण्डाकाश और परमेश्वर के जगत् के प्रकाश को परमाकाश कहते हैं । शरीर, परमेश्वर और परमाकाश ये तीनों दहरोत्तर कहलाते हैं । जैसे तीनों प्राकाश एक रूप से हैं किन्तु मात्रा में छोटे वड़े हैं वैसे ही तीनों में मन, प्राण, वाक् और इनके विकार भी एक रूप से हैं किन्तु मात्रा में भेद है । यह जीव ईश्वर के ब्रह्माण्ड के तीन लोकों के नमूने पर बना है माया, सूर्य, हृदय, अन्तरिक्ष और पेट पृथ्वी - अन्तरिक्ष के वायु से जीव का हृदयाकाश बना है इसके हृदय में अन्तरिक्ष की वायु एक प्रादेश ( १० ॥ अंगुल ) में बंधा हुआ है । ग्रन्तरिक्ष का यह प्राण वायु जीव के हृदय में व्यानाय के नाम [ १८५ ]

पृष्ठ 218

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* त्रह्मविज्ञान से कहलाता है | वास्तव में जीव के मन, प्राण, वाक् में से प्राण यही व्यानप्राण है । यह व्यानप्राण हृदय में स्थानापन्न होकर समस्त शरीर में व्याप्त है और जीव के शरीर की यही जान है जिस प्रकार ग्रन्तरिक्ष से यह प्राण ग्राया है वैसे ही सूर्य और पृथ्वी से भी इस ब्यान पर सूर्यप्राण और पृथ्वीप्राणों की खींचातान है इस व्यान पर सूर्य का प्राण पृथ्वी के प्राण को दबाता है और फिर सूर्य के प्राण को पृथ्वी का प्राण ऊपर धकेलता है । अथवा यों कहिये कि सूर्य का प्राण पृथ्वी के प्राण को ऊपर खींचता है और सूर्य के प्राण को पृथ्वी नीचे खींचती है इसी खींचातान को ' प्राणापान ' कहते हैं इसी खींचातान की क्रियाको प्राप् कहते हैं । सूर्य सम्बन्धी ऊपर की क्रिया को प्राण और पृथ्वी संबन्धी नीचे की क्रिया को प्रपान कहते हैं । नासिका होकर वायु के अन्दर जाने को और बाहर आने को ही श्वासोच्छवास कहते हैं व्यानवायु पर प्राणापान के संघर्षा से जो ग्रग्नि उत्पन्न होता है उसको वैश्वानरयग्नि कहते हैं यह ग्रग्नि की उत्पति प्राकृतिक नियम से है । इसी प्राकृतिक नियमानुसार उत्पन्न की हुई अग्नि का एक दीर्घ कालतक स्थित रहना भोजन या पान से रहता है । इस अग्नि के प्रज्वलन से एक शब्द उत्पन्न होता रहता है इस शब्द को अनाहतनाद कहते हैं । जिस प्रकार व्यान पर प्राण ग्रपान के घर्षण से श्रग्नि उत्पन्न होता है वैसे ही त्रिलोकी में भी अन्तरिक्ष के वायु पर दिव्यप्राण और पार्थिव प्राण के संघर्षण से ग्रग्नि पैदा होती है जिसे वैश्वानर कहते हैं और इस अग्नि के जलने से जो शब्द पैदा होता है वह ग्रनाहतनाद है जिस को जीव के समान ईश्वर भी सुनता होगा । अध्यात्म के तीन तन्त्र पूर्वोक्त के अनुसार तीन ग्रात्मा के तीन तन्त्र पृथक् पृथक् हैं । किन्तु जीव के शरीर में तीनों तन्त्रों का समावेश है - प्रथम तो जीव तन्त्र ही उत्पन्न होता है अर्थात् जीव के ग्रात्मारूप मन, प्राण, वाक् से जो कुछ सृष्टि हुई, हो रही है और होती रहेगी यह सब जीव तन्त्र है किन्तु उस जीवतन्त्र के साथ - साथ ईश्वर तन्त्र भी काम कर रहा है क्योंकि व्यापक है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होती हुई उसके महिमा शरीर में प्रवेश न करे यह संभव नहीं है । इसी प्रकार परमेश्वर जो कि ईश्वर से भी अधिक व्यापक है उसकी महिमा से भी यह जीव शरीर वञ्चित नहीं रह सकता इसलिये हम विश्वास करते हैं कि जीव का शरीर तन्त्र है । कुछ ग्रश में जीव स्वतन्त्र है, किन्तु कुछ ग्रंश में ईश्वर परतन्त्र और कुछ अंश में परमेश्वर परतन्त्र है । अब यदि ईश्वर को देखें तो उसका शरीर अर्थात् ब्रह्माण्ड द्वितन्त्र है, क्योंकि ईश्वर इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि में कुछ ग्रंण को लेकर स्वतन्त्र है किन्तु उम परमेश्वर की महिमा का भी इसलिये कुछ अंश में वह ईश्वर भी परमेश्वर परतन्त्र है, किन्तु ईश्वर के शरीर में जीव का प्रभाव प्रभाव पड़ता है । तया नहीं पड़ता क्योंकि जीव को क्ति जीव के शरीर से बाहर नहीं है किन्तु ईश्वर उससे अधिक विशेष- विस्तृत प्रदेश में व्याप्त रहता है इसलिये उसमें जीव के तन्त्र की कमी होने से ईश्वर का शरीर द्वितन्त्र ही संभव है । I १८६ ]

पृष्ठ 219

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* ब्रह्मविज्ञान छ अब यदि परमेश्वर के शरीर का विचार करें तो वह एक तन्त्र ही प्रतीत होगा क्योंकि वह ग्रसीम है उसके सर्वाङ्ग शरीर में जीव वा ईश्वर जो परिमित सीमा रखते हैं अपना प्रभाव सर्वत्र नहीं डाल सकते । इसलिये परमेश्वर अपने शरीर में अर्थात् इस बहिर्जगत् में सर्वत्र स्वतन्त्र है । वह परतन्त्र नहीं हो सकता इसलिये उसमें एक ही तन्त्र का होना संभव है । इस जीव शरीर में जो कुछ मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार कर सकता है वही जीवतन्त्र है, परन्तु जिस विषय में प्रत्यन्त प्रबल इच्छा रखने पर भी इच्छा न रहने पर भी कितने ही परिवर्तन प्रतिक्षण होते रहते है वह सब ईश्वरतन्त्र है । ईश्वर की ही इच्छा से वे सब परिवर्तन मेरे शरीर में होते रहते हैं । किन्तु जिन पदार्थों पर जीव का व्यापार वा ईश्वर का व्यापार होता रहता है वे उन सब पदार्थों की गत्ता अथवा इस शरीर में ज्ञान का प्रभाव और जो किसी वस्तु में वा किसी काम में कभी आनन्द की झलक होती है अथवा मेरे शरीर में मेरी ग्रात्मा की जीवनपर्यन्त शान्ति रूप से एक प्रकार की स्थिति चल रही है, वह शान्ति रूप यानन्द है । ये तीनों अर्थात् सत्ता या चेतना या ग्रानन्द परमेश्वर से ही मुझ में यायें है, किन्तु मेरा जन्म, मृत्यु, निश्वास, उच्छवास की गति होना और तीन लोक की संख्या होना, मध्य में मेगदण्ड का होना, नाड़ी, चर्म, मास, मज्जा आदि धातु अथवा इन्द्रियाँ ये सब मेरे शरीर में ईश्वर के ग्राधीन हैं किन्तु इन इन्द्रियों से काम लेना जीव के आधीन है । अर्थात् बोलना, चलना, उठना, बैठना, सोना और मन में चिन्तमन करना, विद्या बुद्धि वा ग्रविद्या का संचार, अर्थात् अपने ज्ञान या क्रिया में सात्विक ग्रश, राजस अंश, तामस अंश इन तीनों का घटाना बढ़ाना जीव ही के अधीन है । कितनों ही का विश्वास है कि जीव किसी भी काम में स्वतन्त्र नहीं हैं इसीलिये उनका सिद्धान्त है कि वह—– तृणस्य कुब्जीकरणेऽप्यशक्तः " है । एक वृक्ष का पत्ता भी बिना ईश्वर की इच्छा के नहीं हिलता, परन्तु यह कथन कुछ ग्रंश तक सत्य हो सकता है तथापि सर्वथा जीव को परतन्त्र ही मानना विचारगत नहीं है । एक घोड़े के हमने चाबुक मारा और वह तेजी से चला कुछ दूर पर वह फिर धीमी चाल चलने लगा यह सब ईश्वर की ही इच्छा से ही मानना सर्वथा व्यर्थ है । यदि जीव की स्वतन्त्रता सर्वथा ही न होती तो जीवों के लिये शिक्षा, उपदेश, शासन आदि करना वेद शास्त्र का मिथ्या उरगा क्योंकि यह वेद शास्त्र ईश्वर के लिये उपदेश नही करते हैं किन्तु मनुष्य के लिये ही आज्ञा देते हैं । परन्तु कुछ कर ही नहीं सकता जो कुछ होना है सो ईश्वराधीन है फिर मनुष्य दोपी कैसे ठहराया जाता है । इससे अपने श्राप हृदय विश्वास करता है कि हम भी किसी सीमा तक करने न करने में स्वतन्त्र हैं । फिर हम यह भी देखते हैं कि ईश्वर ने ही मुझ में इन्द्रियां देकर उन इन्द्रियों को चलाने के लिये मुझ में मन भी दिया है, जिस मन के कारण हम चक्षु, जिह्वा आदि इन्द्रियों को काम में लेने या न लेने में स्वतन्त्र बन गये हैं बस इसी से सिद्ध है कि मुझ में इन्द्रियों का या मन का प्राना तो ईश्वराचीन है किन्तु इच्छानुसार उनसे काम लेना जीवाधीन है । ' ग्रहम् ' कहकर जिस अपने को मैं लक्षित करता हूँ वह मेरे शरीर का सबसे प्रधान भाग प्रकाश है । जिस प्रकाश के भीतर में अपने को, दूसरों को यहां तक कि चराचर जगत् को पाता हूँ जो कुछ [ १८७ ]

पृष्ठ 220

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* ब्रह्मविज्ञान इस प्रकाश में मुझे भासता हैं उसी को मैं जगत् कहता हूँ किन्तु मेरे ज्ञान के प्रकाश के भीतर जो कुछ जगत् भासता है उसमें गौरव अर्थात् वस्तु भार नहीं है गौ, घोड़ा, हाथी, पहाड़ तक मेरी बुद्धि पर सवार हैं किन्तु उनके भार का ग्रनुभव नहीं करते इससे यह निश्चित है कि जो घोड़ा, हाथी वास्तव में बाहर है वे मेरी बुद्धि पर सवार नहीं होते किन्तु मेरी बुद्धि न ये घोड़े, हाथी उत्पन्न करती है इसका दूसरा कारण यह भी है कि वाहर वाले घोड़े, हाथी मेरी बुद्धि पर श्रा जाते तो उसी समय वे घोड़े हाथी अन्यान्य सैंकड़ों मनुष्यों की बुद्धियों पर सवार नहीं हो सकते इससे भी निश्चित है कि बाहर की सब वस्तुऐं बाहर ही कहीं पर स्थित रहती हैं किन्तु उनके संयोग से हम सब जीवों कों बुद्धियाँ उन्हीं के ग्राकार की बन जाया करती हैं तो सिद्ध हुया कि हमारी बुद्धि में जो कुछ जगत् भासता है वह बाहर वाले जगत् से भिन्न है, बस इसी जगत् को जो मेरे ज्ञान प्रकाश में भास रहा है वह जीव का जगत् है, जीव की सृष्टि है और जीव के ही भीतर सदा वर्तमान रहता है, इस जीव में ही जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय हैं । इस प्रकार जब कि यह जगत् मेरे ज्ञान के प्रकाश के भीतर है तो हम कह सकते हैं कि पह सम्पूर्ण मेरा जगत् मैं ही हूँ, क्योंकि जो कुछ भासता है वही मेरा प्रकाश है और जो मेरा प्रकाश है वही मैं हूँ इसलिये वेद का यह कहना सर्वथा सत्य है कि " श्रात्मं वेदं सर्वम् " जिस प्रकार मेरा जगत् मैं हूं उसी प्रकार दूसरे जीव का जगत् ग्रन्य जीव है । इन ग्रनन्त जीवों के भिन्न जगत् की उत्पत्ति के कारण एक ही कोई बाहर भिन्न जगत् है । जिसके संबंध से सब जीवों की ग्रात्मा अपने - अपने जगत् को उत्पन्न करती हैं — वह जगत् किसी जीव का जगत् न होने के कारण ईश्वर का ही जगत् माना जा सकता है । सम्भवतः जैसा मेरा ज्ञान मेरे जगत् को उत्पन्न करने में समर्थ है उसी प्रकार ईश्वर का ज्ञान भी उस जगत् के उत्पन्न करने में सामर्थ्य रखता है, ऐसे दो प्रकार के जगत् सिद्ध हुए किन्तु इन दोनों से प्रति-रिक्त तीसरा भी कोई जगत् अवश्य ही कही पर है जो कि दिक्, देश, काल सबसे अनवच्छिन्न निगूढ़ अर्थात् छिपा हुआ है, प्रतीन्द्रिय है और केवल विचार शक्ति से ही अनुभव किया जा सकता है | जब कोई विद्वान् किसी निगूढ़ तत्व का विचार करने बैठता है तो उस समय उसकी बुद्धि एक ऐसे नये मार्ग पर चलती रहती है कि जिस पर ग्राजन्म उसकी श्रात्मा कभी नहीं गई थी न उसके अतिरिक्त कोई जीव कभी गया था । ऐसे ही जिस स्वप्न को ग्राज किसी मनुष्य ने देखा उस स्वप्न की सारी पड़त को ज्यो का त्यो उसी मनुष्य ने पहले न कभी देखा था, न पीछे कभी देखेगा और न उस पड़त को संसार के भूत, भविष्य, वर्तमान कभी कोई जीव देख सकता है । यद्यपि उस स्वप्न के जगर को विद्वान लोग मिथ्या कल्पित कहने का साहस करते हैं किन्तु सम्भवतः जब कि वह दीखता है, ज्ञान ने उसको पकड़ा है तो उसे मिथ्या क्यों कहा जाय, क्यो नहीं वह ईश्वर वाले बाहर जगत् से भिन्न ही एक तीसरा जगत् मान लिया जाय कि जिसके संयोग से हमारा ज्ञान स्वप्न में नया एक जगत् उत्पन्न कर सका । इस प्रकार के अनेक उदाहरण शतरज आदि खेलों के भी दिये जा सकते हैं । नित्य नये खेल के सिलसिले बाहर के ईश्वरी जगत् में कहीं न होने पर भी खेलते समय अपने ग्राप चलता रहता है । वे सिलसिले भी किसी न किसी जगत् की नियुक्ति से संबन्ध रखते हैं । विद्वान् मनुष्य नया विचार करते समय ईश्वर की बाहरी सृष्टि में अपने मन को न भेज कर उसी परमेश्वर के जगत् के किसी मैदान में अपने ज्ञान को जाने देता [ १८८ ]