ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 31–40
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 31–40
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* ब्रह्मविज्ञान के विषय ४ - श्रात्मगति परिच्छेद १ गतिस्वरूप २ गतिप्रभेद १ संसारगति ( नित्यगति ) २ अतिमुक्ति = भूतगति ३ श्रतिमृत्यु = देवगति ४ पञ्चत्वगति = भूतगति ( प्राणगति = उत्क्रान्ति के ४ भेद हैं ) १० समवलय ३ गतिनिमित्त १ ज्ञानरुपी विद्या श्रविद्या २ कर्मरूपी विद्या अविद्या काम कर्म १ ( विद्या सापेक्ष कर्म ) १ यज्ञ २ तप ३ दान २ ( विद्या निरपेक्ष कर्म ) ( विक्रमं श्रर्थात् विद्या विरोधी ) ( अकर्म ) ( मुलाविद्या ) ४ प्रेत्य स्थिति १ भिन्न लोकों में भिन्न शरीर २ लोकों में बीच की स्थिति ५. गनिमार्ग १ शरीर के भीतर ग्रात्मा का गतिमार्ग [ न ] पृष्ठ ३५८ ३५८ ३५६ ३५६ ३६० ३६० ३६१ ३६१ ३६२ ३६३ ३६४ २६४ ३६५ ३६८ ३७३ ३७४ III III ३७७ ३७७ ३७८ ३७६ ३८० ३८२ ३८३ ३८३ ३८५ ३८५ ५ ब्रह्मगति, ६ – दैवगति, ७ - पंत्रीगति, ८- नारकीगति, -ग्रगति ३६२ ( शरीर आत्मा के तीनों लोकों में भ्रमण के तीन कारण ) ३८१ २ स्थूल शरीर छोड़ते समय आत्मा के सूक्ष्म शरीर का परमाणु ३८६
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* ब्रह्मविज्ञान ३ प्रत्ययज्ञान १ शुक्लकृष्ण मार्ग ५ पर्व शुक्लकृष्ण मार्ग के १ कर्म २ नाड़ी ३ दि ४ आकाश ५ काल २ कर्म ३ काम ४शुक्र यज्ञ ( चयनयज्ञ ) तप प्राकाम्य मुक्ति ( १ - कर्मयोग, २- भक्तियोग ) ( ३ - ज्ञानयोग ) सम्पत्ति कैवल्य भूमोदर्क मुक्ति ( २ - क्षीणोदकमुक्ति ) निर्वारण समघलय दात उपसंहार इति शुभम् [ ट ] पृष्ठ ३८७ ३८७ ३६० ३६० ३६० ३६० ३६२ ३६२ ४०० ४०३ ४०६ ४०६ ४१३ ४२० ४२० ४२३ ४२५ ४२५ ४२७ ४२६ ४२६ ४३१ ४३२ ४३६
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ॐ श्री: कं ब्रह्मविज्ञान सिद्धान्तवाद - व्याख्यान * मङ्गलाचरण * निपु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च ॥ ( १ ) ( ऋ ० १०/११२/६ ) ( २ ) जगृम्भा ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं वसूयवो वसुपते वसुनाम् । विद्मा हि त्वा गोपति शुरगोना-मस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः ॥ ( २ ) ( ऋ ० १०/४७/१ ) -तरलार्थ --हे ( गणपते ) हे समूह के पति! ( गणे ) श्राप अपने समूह में ( निषुसीद ) विराजें । ( त्वां ) आपको सभी ( कवीनां ) विद्वानों के ( विप्रतम ) अग्रगण्य ( ग्राहुः ) कहते हैं । ( त्वद्ऋते ) आपके बिना ( किञ्चनारे ) कोई भी काम कहीं भी ( न क्रियते ) नहीं किया जाता है | ( मघवन् ) हे पूजनीय प्रभो! ( चित्र ) नाना प्रकार के ( महामर्क ) बडे प्रकाश ग्रर्थात् दिव्य ज्ञान को ( ग्रर्च ) प्रकाशित कीजिये ॥१ ॥
( वैज्ञानिक - विवेचना ) र में प्रत्येक मनुष्य की ग्रात्मा प्रज्ञा और प्रारण से बनी हुई है । शरीर में प्रज्ञा के द्वारा र प्राण के द्वारा क्रिया का संचार निरंतर होता रहता है । यदि सम्पूर्ण जगत् की भूत,
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* ब्रह्मविज्ञान भविष्यत् और वर्तमान सभी आत्माओं को एक दृष्टि से देखा जाय तो सर्वजगद्व्यापक समस्त प्रज्ञा उस इन्द्र के कुछ - कुछ और प्राणों का घनस्वरूप वह एक ही ग्रात्मा होगी । इसी को ' इन्द्र ' कहते हैं । भाग से प्रत्येक मनुष्य की ग्रात्मा बनी है । यही इन्द्र यहां गणपति शब्द में व्यवहृत किया गया है । भारतवर्ष में जो प्रत्येक कर्म के प्रारम्भ में गणपति का पूजन किया जाता है, वह इसी जगद्व्यापक आत्मा वाले इन्द्र की अर्चना है । यह इन्द्र मरुद्गण के साथ रहता है, इसी कारण इसे गणपति कहते हैं । तथा मरुतों की उत्पत्ति रुद्र से हुई है अतः इन्हें रुद्रपुत्र ( महादेवजी के लड़के ) भी कहते हैं । इस इन्द्र आत्मा को प्रज्ञा और प्राण का घन बता चुके हैं, ग्रतः सभी विद्वानों का सत्र प्रकार का ज्ञान इसी आत्मा से ग्रारम्भ होता है । मन्त्र में भी इसीलिए कहा गया है कि गणपति विद्वानों में प्रग्रगण्य हैं । इनके प्राण के घन होने के कारण यह कहना भी सत्य है कि गणपति के बिना कहीं भी कोई क्रिया ( कार्य ) नहीं की जा सकती । इसी से उस व्यापक ग्रात्मा से प्रार्थना की जाती है कि आपका जितना भाग मुझ छोटी सी ग्रात्मा में है, उसमें अधिक प्रकाश डालिये, जिससे मेरी इस ग्रात्मा में प्रज्ञा और प्राण का अर्थात् ज्ञान और क्रिया का अधिक प्रकाश हो जिसके द्वारा बहुत से दिव्य, अलौकिक वैज्ञानिक विषयों का यथार्थज्ञान मेरे में हो और अधिक क्रिया करने में समर्थ हो सकूं ॥ १ ॥
२ – सरलार्थ — हे इन्द्र प्रभो! हमने ग्रापका दाहिना हाथ पकड़ा है । है धन के स्वामी! हम धन की आशा रखते हैं । हे शूरवीर! ग्रापको हम गायों का स्वामी जानते हैं । ग्राम हमें बढ़ती हुई सम्पदा दीजिये | ( वैज्ञानिक - विवेचना ) प्रत्येक मनुष्य की आत्मा से जो शक्तियां निकलती हैं वे सूर्य की दक्षिण गति के कारण शरीर के दाहिने भाग में कुछ अधिक रूप में और बाँये भाग में कुछ कम होती हैं । इसलिये दाहिने हाथ से तात्पर्य, अधिक शक्ति की ओर संकेत करना है । यद्यपि यह इन्द्र प्राण की घनरूप एक ही आत्मा है और उसके हाथ - पांव यदि कोई भी खास अङ्ग नहीं है तथापि उसकी अधिक शक्ति शरीर में दाहिनी ओर जाया करती है । उसी शक्ति का हम ग्राश्रय लेते हैं । दाहिना हाथ पकड़ने का यही तात्पर्य है । हम धन की प्राशा रखते हैं और वह धन का स्वामी है । हम गौ के सदृश अर्थात् पशु - तुल्य ग्रल्पज्ञ हैं और वह ग्रात्मा पशुरूप छोटी - छोटी श्रात्मायों का सर्वप्रभु है । इसलिए हमारे दुःखों को दूर करने का अधिकारी उस परमात्मा इन्द्र को समझ कर प्रार्थना की जाती है कि वह हमारी मांग को पूरी करें | प्रतिज्ञा जहाँ तहाँ जो कुछ दृष्टिगोचर होता है, इन सब की जड़ क्या है, प्रारम्भ कब से है, संस्था अर्थात् स्वरूप - विन्यास किस प्रकार है और गति किस प्रकार की है अर्थात् जो जैसा दृष्टि में ग्रा रहा [ २ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान * है वह पीछे किस रूप में दिखाई देगा और कहा जायेगा - इत्यादि वातों की जिज्ञासा प्रत्येक मनुष्य के दिल में स्वतः उत्पन्न हुआ करती है । इन सब बातों को यथार्थ रूप से जानने के लिए प्राचीन समय अर्थात् देवयुग में प्राप्तवाक्य ऋषि, महर्षियों ने जो कि प्रत्यन्त विचारशील और ग्रसाधारण धारणा के अग्रगण्य विद्वान् हुए थे उन्होंने अपने विचारानुसार अथवा परामर्शपूर्वक जो भी कुछ सिद्धान्त निर्धारित किये, उन्हीं सिद्धान्तों का कुछ दिग्दर्शन कराने का यहां यत्न किया जाता है । वैदिक वाक्यों से इस विषय में दस प्रकार के वाद सुनने में आते हैं— १ सदसद्वाद, २ रजोवाद, ३ व्योमवाद, ४ श्रपरवाद, ५ आवरणवाद, ६ अम्भोवाद, ७ अमृतमृत्युवाद, अहोरात्र, दैववादवाद, १० संशयवाद । इस प्रकार मुख्य ये दश हैं । इनमें कितने ही प्रवान्तरवाद भी श्रीर हैं । उन सब को इस ग्रन्थ में पृथक् करके प्रदर्शित करते हैं । विकल्प निर्देश - सदसद्वादविकल्प प्रत्येक वस्तु ( त्रिपक्षी सूत्र ) प्रतिक्षण में वदलती रहती है । बदलती हुई भी प्रायः सभी वस्तुएँ दीर्घकाल तक ठहरी हुई रहती हैं । इस प्रकार प्रत्येक और दूसरा स्थायीरूप । इन दोनों में असत् श्रौर सदसद् । वस्तु में दो भाव पाये जाते हैं - एक प्रतिक्षण मुख्य कौन है— इस विचार के सम्बन्ध में तीन नष्ट होता हुआ मतभेद हैं - सत्, यहाँ नष्ट होने वाले भाव को असत् शब्द से, और अविनाशी भाव को सत् शब्द से व्यवहार किया जाता है । ग्रसत् भाव एक क्षण से दूसरे क्षण तक भी एक रूप में नहीं रहता, किन्तु दूसरा सत् भाव वर्षों तक एक रूप में स्थायी रहता है । किसी का मत है कि इन दोनों भावों में असत् भाव ही प्रधान है पहले असत् ही था उसी से में पश्चात् सद्भाव उत्पन्न हुआ है । हम देखते हैं कि जो घड़ा या कपड़ा पहले उपयुक्त नहीं है वही पीछे बनाने पर उपयोगी होता है । इसी प्रकार यह विश्व भी कहा जा सकता है कि किसी दिन नहीं था जो पश्चात् उत्पन्न हुआ उसको किसी ने उत्पन्न नहीं किया क्योकि जब कुछ था ही नहीं तब किसी का किसी चीज से किसी प्रकार किसी वस्तु की उत्पत्ति करने का प्रयत्न कैसे संभव हो सकता है, मानना पड़ेगा कि जो न था उसने अपने आप अपने को बना लिया इसीलिये विश्व को स्वकृत कहते हुए प्राचार्यों ने सुकृत नाम दे दिया यह मत तैत्तिरीय लोगों का है ( उपर्युक्त प्रसद्वाद है ) । दूसरों का यह मत है कि असत् से सत् कभी हो ही नहीं सकता । असंभव विषय मान लेना समझ से बाहर है | हम कह सकते हैं कि इन दोनों भावों में सत् भाव ही प्रधान है । सत् से ही सत् | ३ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान भी हो जाया करता है । जा घड़ा या कपड़ा बाज सद्रूप में मौजूद हैं, वहा नष्टकर देने के लिये में पर सदा असद् रूप में ग्रा जाते हैं अथवा यों समझें कि इस जगत् जो प्रसद् भाव दोखता है क्योंकि जिसको है वह भ्रम ग्रसत् समझते हो उसकी भी सत्ता तुम मानते हो जैसाकि जो घट पहले सत् था नष्ट कर देने पर अब यह असत् है इसका यही अर्थ हुआ कि उस वस्तु के दो स्थिति और दूसरा नाश । जबकि यह सब सत् है और सत् से ही सत् उत्पन्न होता है रूप । यह हैं- संसार एक पहले भी सत् था, अभी सतु है और भविष्य में भी सदा के लिये इसी रूप से सत् ही रहेगा मत आरुणी वंश वालों का है, ( यह सद्वाद है ) ॥ यह सदवाद का पहले सत् था अब ग्रसत् है, प्रथात् शून्य रूप है तो इस ग्रसत् शून्य रूप के भी " हे " को लगाते हुए तुम सत्तावाला कह रहे हो, जब उसकी सत्ता है तो अवश्य ही वह सत् साथ माना जा सकता है फिर खयाल में आने वाली कोई भी चीज को ग्रसतु कह कर कैसे माना जा सकता है । व तीसरी राय यह है कि पहले सत् ही था पीछे असत् हुआ अथवा यो कहना कि पहले असत् ही था पीछे सत् पैदा हुग्रा ये दोनों रायें ही भूल हैं क्योंकि जब हम दोनों भाव बराबर देखते हैं तो उसमें ग्रागान्यीछा कायम करना भूल है । सत्य तो यह है कि जो सत् है वही है । सत्, सत् दो वस्तु नहीं, जब ये दो नही हैं तो इनमें ग्रग्र, पश्चात् कहना नहीं बन सकता । किसी रूप से यह सव जगत् सत् है तो वही किसी रूप से असत् कहलाता है और यह दोनों ही ख्याल सत्य हैं । यह तीसरा सदसद्वाद याज्ञवल्क्य आदि इस प्रकार सदम़द्वाद में तीन महषियों का है । मतभेद होने से त्रिपक्षी कहलाता है । सप्त विकल्पपुत्र । यह जो तीन पक्ष ( मत ) सदसद्वाद कहा गया है, उसके सत् ग्रसत् इन दोनों पदों के भिन्न-भिन्न अर्थ लेकर पूर्वाचार्यों में जो सात मतभेद हो गये थे वे ये हैं - १ - प्रत्ययाद्वैतवाद, २ - प्रकृत्यद्वैतवाद, ३ – तादात्म्यवाद, ४ – अभिवार्यवाद, ५- गुणवाद, ६ - सामञ्जस्यवाद, ७ – अक्षरवाद । इन सातों मतों में उपर्युक्त रीति के अनुसार प्रत्येक के सत्, असत् और सदसत् ये ३ पक्ष होने के कारण २१ मत हो जाते हैं । इन्हीं २१ मतों का वर्णन इस प्रथम सदसदाद में किया गया है । यद्यपि उपर्युक्त मतों का विस्तृत वर्णन यागे स्वतंत्र रूप से किया जायेगा, तथापि यहाँ संक्षेप में उनका दिग्दर्शन कराया जाता है । ( १ ) प्रत्ययाद्वैतवाद । जब हम किसी तरफ दृष्टि डालते हैं, तो हमें जो भी कुछ दृष्टिगोचर होता है और हम उसे देखते हैं इसी देखने में दो खण्ड प्रतीत होते हैं— द्रष्टा और दृष्य । इनमें द्रष्टा सत्र दृष्य श्रसत् [ ४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान है है । ये दोनों ही भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं । द्रष्टा देखने वाला और दृश्य जो दृष्टिगोचर होता है, उसे कहते है | मैं कुछ देखता हूँ इसी खयाल को देखना कहते हैं । इस देखने में ' मैं ' का भाग द्रष्टा है, जो सभी की दृष्टि में एक ही रहता है इसी को सत् कहते हैं, और ' कुछ ' का भाग दृश्य है, जो प्रत्येक की दृष्टि से भिन्न - भिन्न होता है, एकरूप नहीं रहता, इसीसे उसको ग्रसत् कहते हैं । इन दोनों के मिलने से जो एक प्रकार का ज्ञान होता है, जिस ज्ञान दो टुकड़े हैं, उसी ज्ञान को ' प्रत्यय ' कहते हैं, यह एक है । इस प्रत्यय से जो उपर्युक्त दो खण्ड दीखते हैं, उन पर यदि हम सूक्ष्म विचार करें तो, कह सकते हैं कि उन दोनों में द्रष्टा ही मुख्य है । इसी की ज्योति से दृश्य के रूप बनाये जाते हैं । इस लिए कोई भी दृश्य द्रष्टा से भिन्न नहीं माने जा सको । बस, द्रष्टा और दृश्य दोनों एक द्रष्टा ही हैं और उसी को प्रत्यय कहते है । यह सत् पक्ष का मत हुआ । दूसरा मत यह है कि प्रत्यय के दो खण्डों में ' दृश्य ' खण्ड ही मुख्य है । दृश्य के अतिरिक्त द्रष्टा कोई वस्तु नहीं हो सकता । क्योंकि वह द्रष्टा तुमको दृश्य है या नहीं, यदि नही है तो तुम उसका वर्णन नही कर सकते । क्योंकि तुमको दिखा ही नहीं, और यदि यह कहीं कि वह द्रष्टा भी मुझको दिखाई देता है तो ग्रवश्य वह दृश्य हो गया, फिर दृश्य से वह भिन्न खण्ड कैसे हो सकता है | कितने ही लोग यह भेद करते हैं कि दृश्य छोटा - २ खण्ड मात्र परिच्छिन्न पदार्थ है । किन्तु द्रष्टा व्यापक है । इस प्रकार भेद मानना भी सर्वथा मिथ्या है, क्योंकि कितने ही द्रष्टा अधिक विचारशील होने से अधिक देखते हैं और कितने ही मन्दबुद्धि अल्पज्ञ होते हैं इस प्रकार जब आत्मा छोटी - बड़ी होती है और कितनी ही परिच्छिन्न ग्रोपधियों के योग से मूच्छित होती है तो उस ग्रात्मा को व्यापक कैसे कह सकते हैं । इसलिये जैसे द्रष्टा और दृश्य सभी परिच्छिन्न पदार्थ हैं उसी प्रकार यह आत्मा भी एक परिच्छिन्न वस्तु है और दृश्य है । यह ग्रस्त पक्ष का अद्वैतवाद हुआ । तीसरा मत यह है कि द्रष्टा और दृश्य ये दोनों भिन्न - भिन्न पदार्थ हैं । द्रष्टा वह है, जहां से ज्ञान शुरू होता है और दृश्य वह है जहां से ज्ञानसून पहुंचता है । इनमें जब यादि और अन्त का भेद पाया जाता है तो ये दोनों खण्ड एक नहीं हो सकते । हाँ यह मान सकते हैं कि जिसका आदि और अन्त हुआ और ग्राखिरहुना वह शुरू से प्राखिर तक एक ही वस्तु है । उसी वस्तु को हम ' प्रत्यय ' कहते हैं । वह प्रत्यय एक अवश्य है, किन्तु उसके टुकड़े भी अवश्य ही दो हैं वह सदसत् ' पक्ष का अद्वैतवाद हुआ । इन तीनों पक्षों का प्रत्ययाद्वैतवाद प्रथम विकल्प है । ( २ ) प्रकृत्य द्वैतवाद कर्म को असत् कहते हैं, कर्म वह वस्तु है, जो पहले न रहकर पीछे उत्पन्न होता है और क्षणमात्र रह कर पीछे नष्ट हो जाता है । जो क्षरणमात्र रहने वाला, पूर्व पश्चात्, ग्रनन्त काल तक [ ५ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान: नहीं रहता है, वह ग्रसत्, कहलाता है । क्योंकि यदि वह सत् होता तोनष्ट जो उसकी क्षणमात्र की सत्ता प्रतीत होती है वह भी एक भ्रममात्र है, अब कभी नही होता; इसलिये दृष्टि डालते हैं तो सर्वत्र क्रिया ही क्रिया प्रतीत होती है । कोई भी वस्तु एक यदि क्षण के हम जगत् को और लिये भी दौ हुई नहीं है । जिसे हम ठहरी हुई देखते हैं बहु भी हमारा भ्रम है | क्योंकि उसका नयी से पुरानी ठहरी जाना हम कालान्तर में अनुभव करते हैं संबंध पुरानी नहीं होती , वह, किन्तु उसमें प्रतिक्षण कुछ परिवर्तन होता ही रहता है । प्रत्येक परमाणु बदलता रहता है । यही परिवर्तनशील क्रिया कुछ जो न प्रत्येक वस्तु में सूक्ष्मरूप से पाई जाती है, जिससे किसी वस्तु का ठहरना असंभव प्रतीत होता है 1 । जबकि सब क्रिया ही मानते क्रिया है तो इस क्रिया के असत् होने से हम हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् असत् रूप है । यह असत. पक्ष बाला प्रकृत्यद्वैत का मत है । ब्रह्म अर्थात् ज्ञान को सत् कहते हैं । यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञानरूप है । क्योंकि किसी वस्तु का होना या न होना बिचार के अधीन है । जिस वस्तु का जैसा रूपाल होता है वैसी ही वह वस्तु मानी जाती है । होना या न होना, छोटा या बड़ा होना काला या पीला इत्यादि जैसी भी हम वस्तु कहते या मानते है, सब हमारा खयाल ही खयाल है । जिस वस्तु का खयाल नहीं होता उसको नहीं कह सकते हैं । इसन्दिवे यह सम्पूर्ण खयाल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । जो लोग इस जगत को कर्मरूप मानते हैं वे भूल करते हैं, क्योंकि कर्म को सत कहते हैं । अस का श्रर्थ है न होना । असत् वहीं है, जो न कभी था, न है और न रहगा । किन्तु यह जगत् बहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा । फिर उसको अमत् कहना सर्वथा अनुचित है । जो वस्तु है, उसे नहीं कह् देना साहस नहीं है तो क्या है? वास्तव में यह जगत् ज्ञानरूप है । ज्ञान क्रियारूप नहीं होता, इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् सदा रहने वाला जगत् सत् रूप है । यह सत् पक्ष वाला प्रकृत्य द्वैतवाद का मत है | कर्म को असत् और ब्रह्म या ज्ञान को सन् कहते है । जगत् को जब हम देखते हैं तो प्रत्येक वस्तु में में दोनों पाये जाते हैं । जिस आदमी को जन्म से अंतकाल तक देखा है, उसके शरीर में प्रतिक्षण परिवर्तन होने से कभी बच्चा, कभी जवान और कभी वृद्ध इत्यादि कई दशाओं का हम उसको एक ही व्यक्ति सम-भिन्न - भिन्न अनुभव करते हुए भेद व्यवहार करते हैं । किन्तु साथ ही फिर झते और मानते हैं । भिन्न को एक समझना या एक को भिन्न समझना अनुचित है, किन्तु जगत् में अक्सर ऐसा व्यवहार होने से दोनों व्यवहार का कारण दोनों तत्व मानना श्रावश्यक हुआ है । जिस के कारण एकता प्रतीत होती है, वह ज्ञान रूप सत् है और जिसके द्वारा भिन्न २ अवस्थाएँ प्रतीत होती हैं वह क्रिया रूप असत् है इस प्रकार सतु और असत् से प्रत्येक वस्तु बहुई है । सब सद-सत् रूप हैं । यह् दोनों ( सत् श्रमत् ) पक्ष वाला तीसरा प्रकृत्य द्वैतवाद हुआ है । यहाँ दूसरा विकल्प समाप्त हुआ । [ ६ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ( ३ ) तादात्म्यवाद यह तीसरा तादात्म्यवाद है । तादात्म्य का शब्दार्थ है, उसीसे अपना ग्रस्तित्व रखना । जैसे धर्म और धर्मी का तादात्म्य होता है अर्थात् जैसे ग्राम और गरमी ये दोनों परस्पर ग्रविनाभाव हैं, न गरमी बिना ग्राग का और न आग बिना गरमी का ग्रस्तित्व कायम रह सकता है इसी प्रकार असत् और सत् का भी परस्पर तादात्म्य है । एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता । असत् का अर्थ कर्म और-. सत् का अर्थ ज्ञान है । इतना अवश्य है कि इसमें कर्म जो असत् है वही प्रधान है या विशेष्य ( धर्मी ) है और ज्ञान उसका गुण है । ग्रर्थात् विशेषण धर्म है, इसी से हम कह सकते हैं, यह ज्ञान कर्म से भिन्न वस्तु नहीं । कर्म के ही ग्राधार से ज्ञान का अस्तित्व है । यह असत् पक्ष वाला तादात्म्यवाद है । ( F ) अथवा ग्रव यों समझिये कि ज्ञान ही इन दोनों में प्रधान है अथवा विशेष्य है और कर्म उसका गुणभूत विशेषधर्म है | ज्ञान के ही ग्राधार से कर्म का अस्तित्व है और ज्ञान से कर्म भिन्न नहीं है | अर्थात् ज्ञान का ही कर्म एक स्वरूपविशेष है । यह सत् पक्ष वाला तादात्म्यवाद हुआ । तीसरा पक्ष यह है कि जगत् की वस्तुओंों में जब सत् और असत् अर्थात् ज्ञान और क्रिया दोनों ही ग्र विनाभूत होकर दीखते हैं तो उसमें किसी को प्रधान और किसी को गौण मानने के लिए कोई विशेष युक्ति नहीं है । एक से एक बंधे हुए अथवा घिरे हुए हैं । दोनों मिलकर एक चीज ही जगत् की प्रत्येक वस्तु हैं ग्रौर दोनों ही दोनों की आत्मा हैं । यह उभयपक्ष वाला तादात्म्यवाद हुआा । यहां तीसरा तादात्म्यवाद का विकल्प समाप्त हुआ । ( ४ ) अभिकार्यवाद चौथा अभिकार्यवाद है । तात्पर्य यह है कि इस मत में सत् और असत् शब्दों से कार्य की ओर लक्ष्य है । ऊपर के तीनों मतों में उन दोनों शब्दों से कारण का खयाल बांधा जाता है किन्तु इसमें कारण का खयाल न करके केवल कार्य का सत् या असत् होना वर्णन किया जाता है । इसीसे इसे अभिकार्यवाद कहते हैं । यद्यपि इस जगत् में ब्रह्म और कर्म दोनों पाये जाते हैं । किन्तु उनमें ब्रह्म सदा ही सत् है, वह कभी असत् नहीं है । इसलिए उसमें दो पक्ष हो ही नहीं सकते । इसलिए उसको छोड़ते हैं । परन्तु दूसरा कर्म सतु और असतु दोनों रूप में दीखता है । पूर्व में तथा पश्चात् भी नहीं रहेगा । इसलिए असत् है । किन्तु मध्य में कुछ काल के लिए विद्यमान है । इसलिए सत् है । इस प्रकार जब उसके दो रूप हैं तो उसमें यह शंका अवश्य हो जाती है कि वह असल में सत् है या असत् है । इसमें एक मत यह है कि यह कर्म वास्तव में असत् ही है । वह ग्रसत् ही सत् होकर प्रतीत हो जाता है । / इसका सत् होना मिथ्या है, असत् होना सत्य । दूसरा मत यह है कि यदि यह कर्म असत् ही होता तो इसमें क्रिया किसी प्रकार उत्पन्न ही नहीं हो सकती तो फिर यह कर्म सत् से सत् होकर कैसे दीखता / [ ७ 1
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#. ब्रह्मविद्याय है जबकि हम इसको एक क्षा के लिए भी सत् होना पाते हैं; तो मानना पड़ता है कि यह पूर्व भी रात ही था । केवल इसका आविर्भाव पीछे होकर तत्पण्चात तिरोभाव हो जाता है । इसी तिरोभाव को असत् कहते हैं । किन्तु वस्तुतः इसकी सत्ता नहीं है । नीसरा मन यह है कि जिस प्रकार ब्रह्म को मन् माना है उसी प्रकार कर्म को सदयतु मानना चाहिए । वस्तु का स्वभाव विलक्षण होता है । उसमें क्यों का प्रश्न नहीं उठता । इसलिए यह कह सकते हैं कि ब्रह्म सत् ही सत् है । असत् कभी नहीं होगा । किन्तु कर्म स्वभाव से ही सत् और असत् होता है । यदि कोई कहे कि यह मत् - प्रमत् नहीं हो सकता, या असत् - सत् नहीं हो सकता यह प्रश्न भी अनुचित है । क्योंकि हम प्रत्यक्ष में इसकी सत्ता श्रीर नाश दोनों देखते हैं । ग्रतः वैसा ही स्वभाव मानना ग्रनुचित नहीं है । इस प्रकार यह तीनों पक्ष वाला ग्रभि-कार्यवाद चौथा विकल्प है । ( ५ ) ग्रात्मगुग्गावाद वेद में कहीं पर ' सदेवेदमग्र ग्रासीत् ' लिखा है, कहीं पर ' असदेवेदमग्र ग्रामीत् ' ऐसा कहा है । इसका तात्पर्य भगवान् याज्ञवल्क्य महर्षि ने इस प्रकार वर्णन किया है कि जिस ग्रात्मा में संपूर्ण सृष्टि उत्पन्न हुई है, उसके स्वरूप को कायम करने वाले तीन गुण हैं- मन, प्राण और वाक । इनमें मन को सदसत् कहते हैं, प्राण को असत् और वाक् को सत् । ये इन तीनों के तीन नाम हैं । इनमें पहले मन होकर उससे प्राण और वाक् पीछे उत्पन्न हुए हैं । यह मदमत् पक्ष है । अथवा प्राण पहले था उसी से मन और वाक् उत्पन्न हुए, यह असत् पक्ष है । प्रथमा वायु ही प्रथम था; उसीसे प्राण और मन पैदा हुआ । यह सत् पक्ष है । इस प्रकार किसी ने इन तीनों गुणों के पौर्वापर्य का विचार करके उन श्रुतियों का अर्थ किया है । किन्तु यह अनुचित है; क्योंकि जब यह तीनों गुण ग्रात्मा के स्वरूपसमर्पक हैं तो इनमें आगे पीछे कहना अनुचित प्रतीत होता है । मानना होगा कि ये तीनों ही नित्य हैं और ग्रात्मा के स्वरूप होने से एक साथ तीनों अनादि हैं । बात यथार्थ में यह है कि आत्मा के इन तीनों गुणों से सृष्टि की तीन धारायें पृथक् २ उत्पन्न होती हैं— ज्ञानधारा, क्रियाधारा और अर्थ या द्रव्यधारा । इनमें ज्ञान-धारा की सृष्टि में वेद कहता है कि सबसे प्रथम सदमत् था अर्थात् मन था । वल प्रर्थात् क्रिया की सृष्टि में सबसे प्रथम ग्रसत् था; अर्थात् प्राण था । इसी प्रकार अर्थ की सृष्टि में सब से प्रथम सत् था; श्रर्थात् वाक् थी । यही उन श्रुतियों का तात्पर्य है और यह तीनों ही वाद सत्य हैं । इनमें किसी प्रकार का विरोध नहीं हो सकता । यह त्रिपक्षी गुणवाद पाचवां विकल्प है । ( ६ ) सामञ्जस्यवाद जो पहले वेद के वाबय भिन्न - भिन्न दिखाये गये हैं; स्थूल दृष्टि से यद्यपि उनमें विरोध प्रतीत होता है, तथापि सूक्ष्म विचार से उनका सामञ्जस्य अर्थात् ग्रविरोध ( मेल ) पाया जाता है । तात्पर्य यह है कि जो वस्तुएं इस समय मौजूद हैं उनको सत् कहते हैं । सृष्टि के प्रारम्भ में ये सब [ = ] --