ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 271–280
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 271–280
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* ब्रह्मविज्ञान इसी प्रकार राजयोग के चार पाद हैं । प्रथम बहिरङ्गसाधन प्रासन, प्राणायाम, यम, नियम आदि हैं और द्वितीय ग्रन्तरङ्गसाघन है जिनमें धारण, ध्यान, समाधि आदि हैं । समाधि भी दो प्रकार की होती है सविकल्पक और निर्विकल्पक । इसी कारण से योग के फल भी दो प्रकार के हैं । विभूति श्रौर कैवल्य । सविकल्पक समाधि से विभूति सिद्ध होती है जो लौकिक फलप्रद है और निर्विकल्पक समाधि से कैवल्यमुक्ति होती है और यही निर्विकल्पक समाधि ज्ञानयोग के नाम से प्रसिद्ध है निर्विकल्पक समाधि के द्वारा ज्ञान के उदय होने पर ही मुक्ति होती है । ज्ञान के अतिरिक्त किसी भी उपाय से मुक्ति नहीं होती ऐसा वेद का सिद्धान्त है । तमेव विदित्वा प्रति मृत्यु मेति नान्यः पन्था विद्यते अनाय यह ब्रह्मगायत्री शाण्डिल्यविद्या है और शाण्डिल्य के उपदेशानुसार यह जीव विद्या है अथवा इसे ही ब्रह्मगायत्री विद्या भी कह सकते हैं । ( क ) जीव परिचय जहां जो कुछ हैं वह सब दो भाग में बांटा जा सकता है । १ - सचेतन जीव, २ – अचेतन जीव | जिनमें इन्द्रियाँ पाई जाती हैं उनको सचेतन और निरिन्द्रियों को अचेतन कहते हैं । ये दोनों ही ईश्वर के जगत् हैं, किन्तु इनमें सचेतन को जीव कहते हैं । जो कुछ ईश्वर में धर्म दीखते सर्व साधारण लोग हैं ये सब थोड़ी - थोड़ी मात्रा में इन जीवों में भी पाये जाते हैं । जिस प्रकार ईश्वर अपने व्यूहों से अनु-व्यूहित है उसी प्रकार यह जीव भी है । विशेषता यह है कि ईश्वर में असंख्यात त्रिलोकियाँ सन्निविष्ट हैं किन्तु इस जीव के शरीर में एक ही त्रिलोकी दीखती वह भी कम मात्रा में । इसी कारण से यह जीव ईश्वर की अपेक्षा बहुत ही कम ज्ञान रखता है । उस ईश्वर में भिन्न प्रकार से ही इन्द्रियों का सन्निवेश है और सब प्रकार का ज्ञान भी ईश्वर में सदा सर्वदा एक रूप से विद्यमान रहते हैं किन्तु जीव में इन्द्रियाँ भी परिमित स्थान में परिमित मात्रा में है और उनसे ज्ञान भी परिवर्तनशील अर्थात् निरन्तर नहीं रहता, टूटती हुई दशा में होता रहता है और उसमें संशय, भ्रम आदि ही सर्व साधारण लोग ग्रज्ञानों का भी सन्निवेश रहता है । ईश्वर का ज्ञान जैसा नित्य है उस प्रकार जीव का ज्ञान नित्य न होकर किसी नियत क्रम से उत्पन्न होता है । वह क्रम यह है-( ख ) ज्ञानोत्पत्ति क्रम " ( वस्तु, सूर्य और चक्षु जन्य ज्ञान सविकल्पक है ) स्वच्छ जल जिस प्रकार लवण, कटु, तिक्त, अम्ल, कषाय, मिष्ट आदि के योग से वैसे ही स्वाद का हो जाता है | इसी प्रकार स्वच्छ हमारी इन्द्रियां भी जिस रङ्ग की जिस वस्तु से योग करती है वैसी ही हो जाती है । बहुतों का खयाल है कि चक्षु इन्द्रिय बाहर विषय के देश तक जाकर विषयों को ग्रहण करती है और दुसरों का विश्वास है कि बाहर के विषय ही चक्षु पर आकर योग करते हैं । परन्तु मेरा [ २३६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कहना है कि न इन्द्रियाँ विषय देश में जाती हैं और न विपय चक्षु में ग्राता है, किन्तु सूर्य के किरण किसी वस्तु पर टकराकर परिवर्तित होते हैं और वही परिवर्तित किरण चक्षु पर ग्राकर उन वस्तु की मूर्ति वना देता है । ऐसी दशा में बाहर के घटादि पदार्थ जो वास्तव में परमेश्वर में विद्यमान हैं और तीसरी जो जीव में विद्यमान है, इन तीनों के संयोग होने पर जो नई बात पैदा होती है उसी को ज्ञान चक्षु कहते हैं । यह ज्ञान ग्रात्मा के स्वरूप निर्विकल्पक ज्ञान निर्विषयता होने से किसी विषय का अवलम्बन नहीं करता किन्तु सविकल्पक ज्ञान सर्वदा विषय की अपेक्षा रखता है विना विषय के उसका स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता । निर्विकल्पक ज्ञान जगत् का आधार है और सबका कारण हैं । किन्तु सविकल्पक ज्ञान घटादि वाह्य पदार्थ और सूर्य किरण तथा इन्द्रिय इनके योग से ही उत्पन्न होता है | ( पांच गुणों का पांच शरीर वाले इन्हीं पांच देवताओं से संयोग हो ज्ञान है ) J इन्द्रियां = नासिका, जिह्वा, चक्षु, त्वचा, श्रोत्र । अर्थ = गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द । । देवता = पृथ्वी, वरुण, आदित्य, वायु, इन्द्र । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांचों ही भूत गुण ईश्वर से उत्पन्न हुए अर्थ हैं । यही शरीर के भीतर पञ्च देवता के रूप से विद्यमान रहते हैं । जब ये बाहर के पांचों द्रव्य गुण शरीर वाले इन्हीं पांत्र देवताओं से संयोग करते जो देवता कि इस शरीर में पहले से प्रज्ञा में मिले हुये हैं तब दोनों के मेल से जो बात पैदा होती है उसे ही ज्ञान कहते हैं । व्यूह तीन प्रकार के कहे गये हैं— परमेश्वर, ईश्वर, जीव इन तीनों की आत्माओं को क्रम से ओम्, अहः, अहम् कहते हैं । इन तीनों आत्माओं में भिन्न - भिन्न मन, प्राण, वाक् ये तीनों रहते हैं । इनमें से ओम् की वस्तु की वाक् से प्रेरित होकर ग्रहः रूपी सूर्य के किरण की ' वाक् लोटकर ग्रहम् की चक्षु रूपी वाक् में ग्राती हैं और इन तीनों वाकों के तीन प्राण परस्पर मिल जाते हैं । जिनके मिलने से जो तीनों मन का मेल होता है उसी मेल को ज्ञान कहते हैं । मन दो प्रकार का है । एक इन्द्रिय, दूसरा अनिन्द्रिय । इसमें इन्द्रिय मन से सुख, दुःख, मोह का ज्ञान होता है और वह इन्द्रिय मन शोणित में या शोणित का केन्द्र हृदय में रहता है । किन्तु ग्रनिन्द्रिय मन इन्हीं ग्यारह इन्द्रियों में रहता है, इस मन के बिना कोई भी इन्द्रिय अपना काम नहीं कर सकती अथवा इन्द्रियों के काम होने पर भी वे ( काम ) निष्फल हो जाते हैं । अर्थात् उनसे ज्ञान या क्रिया कुछ नहीं होते इसी ग्रनिन्द्रिय ज्ञान को प्रज्ञा कहते हैं । यह मस्तिष्क ( भेजा ) से निकल कर सब इन्द्रियों में सर्वथा व्याप्त रहता है । जब कभी सूर्य किरण के द्वारा किसी वस्तु का रूप चक्षु इन्द्रिय में श्राता है तो वह चक्षु इन्द्रिय एक वस्तु की आकृति उत्पन्न करके उसी प्रज्ञा रूपी मन में अर्पण कर देता है । इतना ही करके कृतकृत्य होकर शान्त हो जाता है । अब वह मन उस प्राकृति को लेकर आत्मा में अपंग करता है । यदि वह आत्मा आत्मा में स्थिर हो जावे तो [ २४० ]
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* ब्रह्मविज्ञान * उसी को अलगम ज्ञान कहते हैं । यही अवगमज्ञान मुख्य ज्ञान है । किन्तु इसमें ४ कक्षायें हैं - १ अवग्रह, २ ईहा ३ अवाय, ४ धारा इन में इन्द्रियजन्य ज्ञान को अवग्रह कहते हैं, मनोजन्य ज्ञान को ईहा कहते हैं, आत्मजन्य ज्ञान को अवाय कहते हैं, और अवाय की स्थिरता को धारणा कहते हैं । तात्पर्य यह है कि प्रत्येक वस्तु में द्रव्य, गुण, क्रिया इन तीनों पदार्थों की सत्ता रहती क्रिया श्रागन्तुक है वह उत्पन्न, विनिष्ट होता रहता है, किन्तु द्रव्य और गुण ये दोनों स्थिर है जिनमें नैयायिकों का मत है कि चक्षु इन्द्रिय पहले द्रव्य को ग्रहण करती है पीछे द्रव्य के संबन्ध से रहते गुणों हैं को भी ग्रहण कर सकती है । किन्तु यहां इसके विपरीत कहना है । कोई भी इन्द्रिय किसी भी द्रव्य को ग्रह्ण नहीं करती । विचार कर देखने से समझ में आता है कि पांचों ज्ञानेन्द्रियां पांचों इन्द्रियार्थं अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, उनमें से अपने - अपने गुण को ही केवल ग्रहण कर सकती है । वे इन्द्रिय अपने गुण के अतिरिक्त द्रव्य को कदापि नहीं जानती । गुणों का ज्ञान ही इन्द्रियों का ज्ञान है और उतने ही से इन्द्रियां कृतकृत्य हो जाती है इसी ज्ञान को अवग्रह कहते हैं । इस श्रवग्रह होने पर वह अवग्रह ज्ञान मनमें पहुंचता है, उस समय मन उन गुणों को ग्रहण करके उन गुणों का गुणी द्रव्य का स्वरूप नियत करता है । अर्थात् द्रव्य का ज्ञान करना मन का काम है किन्तु यदि कोई प्रश्न करें कि इन्द्रिय के द्वारा गुण का ज्ञान होने पर पश्चात् मन किसी द्रव्य के जानने के लिये व्यापार ही क्यों करता है तो उसके उत्तर में हम कहेंगे कि जब इन्द्रिय अपने विषय को अर्थात् गुण को ग्रहण करके मनमें समर्पण करती है तब उस मनमें पहले का आये हुए भिन्न - भिन्न द्रव्य वाले भिन्न - भिन्न कितने ही गुणों के संस्कार उद्बुद्ध हो जाते हैं । उनके उद्बोधन से मन में एक प्रकार का तरङ्ग उठता हैं । अर्थात् उन गुणों के आश्रय वाले अनेक द्रव्यों का स्मरण कराता है जिससे एक प्रकार का संशय ज्ञान उत्पन्न हो जाता है । अर्थात् चक्षु के द्वारा लाल रङ्ग देखने पर मन इस द्विविधा में आ जाता है कि यह लाल रङ्ग कपड़े पर है या घोड़े पर । इस बात के जानने के लिये मन यत्न करने लगता हैं । इसी प्रकार मरुस्थल में कड़ी धूप पड़ने पर जमीन की बालू से टकराकर सूर्य की किरणें ऊपर को फेंकी जाती हैं । उस समय ऊपर से नाते हुये किरणों के साथ धनका खाते हुए इस प्रकार हिलने लगते हैं जैसे किसी सरोवर में पानी की लहरें होती हों । उस समय चक्षु केवल लहर को ही देखती है किन्तु मन में सब प्रकार की लहरों का संस्कार उद्बुद्ध होने पर घट विचार उत्पन्न होता कि ये लहरें जल की है या वायु की है या सूर्य की किरण की है । इस प्रकार सन्देह ज्ञान को लेकर जब मन श्रात्मा में पहुँचता है तो उसी क्षण ग्रात्मा उस मन को आज्ञा देता है कि इस लहर के द्रव्य का वह यथार्थ निर्णय करें । यह प्राज्ञा पाते ' मन व्यापार करने लगता है और सहकारी गुणों को देखने के लिये इन्द्रियों को प्रेरणा करता है, कुछ अपने आप भी परामर्श करता है | जिस द्रव्य का उन गुणों के साथ वाधक पाता है उसको तल छोड़ जाता है और जिन गुणों का जिस द्रव्य का साधन पाता है उस द्रव्य को पकड़ कर उस पर स्थिर हो जाता है । उस समय उसका ४ प्रशान में विज्ञान और विज्ञान में चेतना है । महान् ग्रात्मा, क्षेत्रज्ञग्रात्मा, चिदात्मा । [ २४१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान में पहुंचा आत्मा लेकर किसी एक वस्तु का स्वरूप बनाकर तरङ्ग बन्द हो जाता है और कुछ छोड़कर कुछ को पैदा करके साधक, देता है । प्रत्येक इन्द्रिय जन्य ज्ञान के पश्चात् नियम से यह मन कई विकल्पों व्यापार को है । इस सम्पूर्ण तक बाधक के अनुगम से ग्रन्वीक्षण ( टुकडे ) करके एक वस्तु का ज्ञान करता कहीं देर शीघ्रकाल में यत्न है । दुबारा देखने को ईहा कहते हैं । यह ईहा कहीं कम कहीं ज्यादा कही सर्वत्र होता श्रवश्य होता है । उसके समय का या मात्रा का तो नियम नहीं हो सकता किन्तु यह ईहा नहीं है तो उस यदि कल्पना करो कि जिस मनुष्य में पहले किसी प्रकार का संस्कार उत्पन्न हुआ ही किसी प्रकार है । वहाँ पर के समय इन्द्रिय जन्य ज्ञान को ही ज्यों का त्यों लेकर मन ग्रात्मा में पहुँचा देता करने निर्णय के संस्कारों का उद्बोधन होने के कारण संदेह नहीं होता इसलिये ग्रात्मा भी मन को इन्द्रिय लिये प्रेरणा नहीं करता । इसलिये उस मूख मनुष्य के दृष्टि में किसी प्रकार का विचार न उठकर होता है जबकि जन्य ज्ञान ही मन का ज्ञान भी हो जाता है । वहाँ ईहा का स्वरूप विशेष प्रकार नहीं हो या विषय सत्य मन निःसंशय रूप से किसी एक ही विषय को लेकर ग्रात्मा में पहुँचाता है तो वह विषय उस मिथ्या हो मन के दिये हुए को ग्रात्मा ले लेता है उसी का नाम श्रवगम है । अवगम में आत्मा किसी उससे को श्रद्धा से पकड़ता है । यह श्रद्धा शब्द धत् और घा से बना है | श्रतु का अर्थ है सत्यता, विप , उसके विषय की धारणा करना श्रद्धा होती है । तात्पर्य यह है कि किसी विषय को सत्य समझकर भी करना रीत आत्मा का भाव न होता ग्रथवा ग्रभिमुख होना ही श्रद्धा है इस श्रद्धा से धारणा में , प्रकार दो रूप से होता है । उपेक्षा बुद्धि से और अपेक्षा बुद्धि से इनमें उपेक्षा से अवगम होने पर आत्मा बिना भी उसका संस्कार दृढ़ता से उत्पन्न नहीं होता । जिस प्रकार काच पर मुख का प्रतिविम्ब होकर से विषय आत्मा । कुछ चिह्न किये ही काच पर से निकल जाता है । उसी प्रकार ज्ञान होने पर भी वह है निकल जाता है । किन्तु यदि अपेक्षा बुद्धि से अवगम हो तो ग्रात्मा में उसका संस्कार हो जाता ज्ञान श्रात्मा में उसका चिह्न मुद्रित हो जाता है वही संस्कार धारणा या वासना कहलाती है इस प्रकार के होने की उत्पत्ति में क्रम से अवग्रह, ईहा, अवगम और धारणा में चार हैं । इन चारों कक्षा उत्पन्न होती पर ज्ञान का स्वरूप वास्तव में सिद्ध होता है । जीव ईश्वर का अन्तरान्तरभाव या एक अंगुल का सवां हिस्साभर भी कोई प्रदेश ऐसा हो । स्थूल प्रतिस्थूल नहीं है जहां कि कोई जीव न व्याप्त सूक्ष्म या प्रतिसूक्ष्म जीवों से यह में जगत् सर्वत्र व्याप्त है । यह वायु जो सर्वत्र श्राकाश अग्न , यह वायव्य ( वायु शरीरी ) जीवों से पर्याप्त से है । इसी प्रकार आग्ने ( ग्रग्नि शरीरी ) जीवों भरा है और जलीय ( जल शरीर वाले सर्वत्र पर्याप्त है । ) जीवों से जल तथा पार्थिव शरीरी जीवों से यह पृथ्वी यह जीव दो प्रकार के देखे गये हैं करता हुआ जीव का प्रभेद है जैसा कि । एक तो ग्रनन्त जीवों से पर्याप्त ग्रङ्गों का धारण असंख्यात मनुष्य शरीरी जीव के अङ्ग प्रति इत्यादि जीवों से बने हुए होते हैं ग्रङ्ग, शोणित, मांस, अस्थि जीव । किन्तु दूसरे प्रकार के जीव अन्य हैं कि जिनके शरीर में किसी बिना । का प्रवेश नहीं होता । जो इसी सङ्गठन वह मनुष्य शरीर में सबसे छोटा से छोटा का जीव है सृमर नाम [ २४२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान के अन्य जीवों के मिलाव दूसरे के अपना शरीर प्रकार के रखता है । इन सब जीवों में किया जीव जो प्रथम प्रकार के जीव व्यूढ़ है किन्तु गया सृमर कहे गये हैं है | किन्तु अव्यूढ़ हैं क्योंकि इनमें और दो जीवों के मेल से व्यूह नहीं मनुष्य यदि जीवों का शरीरं व्यूढ़ इसलिये है कि उनमें अनेक जीवों के संग्रह से एक प्रकार का व्यूहकिया गयाहै । अनेक व्यूढ़ ग्रात्मा तीन प्रकार के शरीर क्षुद्र जीवों से मनुष्यादि का कहा गया है । १- जीव, २ - ईश्वर, ३ - परमेश्वर । इनमें जिस प्रकार में व्यूह व्यूढ़ आत्मा के शरीर में है उसी प्रकार इस होता है और इसी व्यूह इन मनुष्यादि जीवों से ईश्वर परम्परा के प्रकार अनन्तानन्त ईश्वरों से भी परमेश्वर के शरीर में व्यूह होता है सृष्टि एक , इतनी ही छोर में ग्रव्युढ जीव अर्थात् यह है, उसी चेतन सृमर है और दूसरे छोर में परमेश्वर है । बस चेतन की अचेतन की सृष्टि के शरीर बनकर भीतर बाहर अचेतन सृष्टि भाग गय है व्याप्त रहती है ॥ किन्तु चेतन भाग प्रधानहै क्योंकि चेतन के ही शरीर के लिये अचेतन की सृष्टि दीख पड़ती है । परमेश्वर प्राण ईश्वर वाला, और जीव यदि है, उद्भिज ये तीन व्यूह है । इनमें जीव तीन प्रकार के हैं । जीवन जो तीन हम जो दो प्रारण वाला है खनिज जो व्यूढ़ सृष्टि वाला है । दूसरे प्रकार से , व्यूह वाला एक प्रारण बाहर देवता को देखें तो और और एक छोर में परमेश्वर है और दूसरी छोर में खनिज है । खनिजों से भूत है । कोई भी देवता बिना और भूत और देवता भूतों के नहीं है, भूतों से देवता अपना शरीर बनाते हैं । उद्भिज दोनों से खनिज भ्रूणों दोनों का शरीर बनता है, खनिजों से उद्भिज का शरीर बनता है खनिज से ग्रव्यूढ़ से स्थूल जीवों का सृमर शरीर बनता है । अव्यूढ़ जीवों से भ्रूण जीव बने हैं, और हुआ है जीवों का शरीर । बना है, और स्थूल जीवों से ईश्वर शरीर और ईश्वरों से परमेश्वर बना उसी जिस प्रकार प्रकार सृमर या शरीर से जीव का शरीर बना है । से एक कई उपेश्वरों भ्रण ग्रादि अनेक जीवों के एक स्थूल - एक के शरीर से शरीर बना है । और कितने ही दूसरे उपश्वरों ईश्वर उपेश्वरों एक - एक ईश्वर का हैं का भी शरीर परमेश्वर के शरीर में असंख्य और उसी बना है तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार इन सबमें प्रकार ईश्वर में भी कितने ही ईश्वर हैं और उनमें भी कितने ही क्षुद्रातिक्षुद्र ईश्वर हैं । श्राकाश स्थूल या क्षुद्र परिवार परिवृत में विचरते सूक्ष्म जीवों की सत्ता का कर्म वर्तमान है, कितने ही गन्धर्व शून्य होकर असंख्य सूर्य है हैं, उन गन्धर्वों से परिवारित चन्द्रमा है, चन्द्रमाओं से परिवृत पृथ्वी है, पृथ्वियों से यह सूर्य असंख्य सूर्य अथवा त्रैलोक्य एक उपेश्वर है । एक - एक सूर्य का एक - एक त्रैलोक्य है । ऐसे से परिवृत है । एक ईश्वर है, ऐसे अनेक ईश्वरों से परिवृत एक परमेश्वर है इन | उस सब का परमेश्वर का स्वरूप माखाओं परमेश्वर तात्पर्य यह है कि जो जहां कुछ हम देख रहे हैं ये सब एक ही में की महिमा के करते हैं तो उस अणिमा की धारा कई जब कि बट साथ जब अणिमा का ध्यान अनेक जाती है प्रत्येक में के अन्तर्गत दूसरे अनेक व्यूहों का पता चलता है । व्यूहों का शाखा एक व्यूह की होना संभव न होकर सूक्ष्म कोई एक रूप शेष रह जाता है तो वहाँ अणिमा [ २४३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * धारा समाप्त होती है । प्रत्येक श्रणिमा की अन्तिम सूक्ष्मता से प्रारम्भ करके यदि भूमा की ओर बढ़ें तो सभी धाराओं के अन्त में वही एक परमेश्वर मिलता है कि जिससे परे कही कुछ नहीं है । वह पर-मेश्वर भूमा है यह भूमा देश से असीम या अनन्त है किन्तु संख्या में एक है । इसके विपरीत प्रणिमा संख्या में ग्रसीम या अनन्त | किन्तु देश में ससीम है परन्तु काल में दोनों असीम या अनन्त हैं, अणिमा प्रवाह धारा से काल में असीम है । आरम्भक तारतम्य उपादान कारण परमेश्वर, ईश्वर और जीव के उपादान कारण जो मन, प्रारण, वाक् हैं उनमें श्रापेक्षिक कमी - बेशी यह परमेश्वर मन, प्राण, वाक् से विभक्त है । मन तीन प्रकार का होता है- १ प्राणों का प्रभाव अर्थात् सभी प्रकार के प्रारण इसी मन में से निकलते हैं । २ यही मन सब प्राणों की प्रतिष्ठा है, अर्थात् प्राण रूपी वायु के लिये यह मन आकाश रूपी आधार है । ३ और तीसरा इन सब प्राणों का यही मन प्रलय स्थान है । अर्थात् यह प्राण बल रूप से क्रिया करके ग्रन्त में इसी मन में लीन हो जाता है । इनमें आधार रूप ग्राकाश जो मन है वह भूमा है । उस भूमा की कोई भी सीमा नहीं । उसी अनन्त मन रूपी आकाश में यह सब कुछ जो जहां दीखता है विद्यमान है । और जहां तक यह मन है वही परमेश्वर का रूप है । यह मन प्रारण के बिना कभी नहीं रहता । प्राण को वल कहते हैं । वह बल मन से ही उठता है । इम प्रत्यक्ष देखते हैं कि मन के गिरजाने पर सर्वाङ्ग शरीर शिथिल हो जाता है । सत्र श्रृङ्गों में दुर्बलता श्रा जाती है । बोलने में भी कष्ट होता है परन्तु यह बल अणिमा रूप अनेक खण्डों के मिलने से अपना रूप रखता है । यह बल के ग्रनन्तानन्त खण्ड प्रखण्ड मन में व्याप्त रहता है । जिस प्रकार अखण्ड मन को परमेश्वर कहा है उसी प्रकार इन ग्रनन्तानन्त बल के खण्डों की समष्टि को भी परमेश्वर समझना चाहिये । ये प्राण भी बिना वाक् के नहीं रहते । मन से प्रेरित होकर प्राण वाक् में ही क्रिया रूप से व्यक्त होता है । वेद, यज्ञ और देवता या भूत रूपी प्रजा इन तीनों को प्राण, वाक् से ही उत्पन्न करता है । जिस प्रकार प्राण खण्डों की समष्टि को भी परमेश्वर समझना चाहिये । जो जहां जितने वेद या यज्ञ हैं या जितने देवता या भूत हैं या जितने इनके विकार हैं ये सब इस परमेश्वर में ही विद्यमान हैं । जिस प्रकार जिन - जिन तत्वों से यह परमेश्वर पर्याप्त है उसी प्रकार उन्हीं समस्त तत्वों से उसी परमेश्वर में भिन्न - भिन्न कई एक ईश्वर उत्पन्न हो गये हैं । विशेषता यही है कि परमेश्वर के मन, प्राण, वाक् असीम है किन्तु ईश्वर स्वयं ससीम है और उसके मन, प्राण, वाक् भी ससीम है और परमेश्वर एक है किन्तु उसमें ये ईश्वर ग्रनन्त हैं । जिस प्रकार परमेश्वर में ईश्वर उत्पन्न हुए हैं उसी प्रकार एक-एक ईश्वर में अनन्त जीव उत्पन्न होते हैं और ईश्वर के अनुसार इन जीवों में भी प्रत्येक २ भिन्न - भिन्न मन, प्राण, वाक् अपने विकारों के साथ विद्यमान रहते हैं । किन्तु जैसे ईश्वर में परमेश्वर की अपेक्षा न्यूनमात्रा में ये सब हैं उसी प्रकार इन जीवों में ईश्वर की अपेक्षा भी न्यूनमात्रा में यह सब हैं जो [ २४४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान विकार अधिक मात्रा के सापेक्ष हैं वे ईश्वर में होने पर भी जीवों में न्यूनमात्रा के कारण उत्पन्न नहीं होते अर्थात् अधिक मात्रा होने से हो सकता है इसलिये ईश्वर का ज्ञान या शक्ति या वस्तु सिद्धिर्या रूप से रहती है | किन्तु जीवों में यह सब अत्यन्त प्रल्प होती है यही ईश्वर से जीवों में विशेषता है । भूमोत्तर या प्रणिमोत्तरवाद ( बड़े से छोटे या छोटे से बड़े सृष्टि क्रम का विचार ) ( क ) भूमोत्तर या विकासवाद सृष्टि क्रम में इस बात का संशय विद्वानों में चल रहा है कि यह सृष्टि भुमोत्तर है या प्रणिमोत्तर है | अर्थात् सब से प्रथम छोटी से छोटी चीजें बनी फिर उनके समुदाय से धीर - धीरे बड़ी से बड़ी चीजें बन गई हैं यह भूमोत्तरवाद है । इसके विपरीत प्रणिमोत्तरवाद वह है कि जिसमें सबसे प्रथम बड़ी से बड़ी वस्तु बनी फिर उससे धीरे - धीरे छोटी वस्तुए बनते - बनते अन्त में सब से छोटी वस्तुओंों की उत्पत्ति मानी गई हो । भूमोत्तरवादी कहते हैं कि संभवतः सब से प्रथम परमाणुओं की सृष्टि समझ में आती है । दो परमाणुत्रों के योग से द्वचणुक बना और तीन अणु त्र्यणुक बना और तीन से ज्यादा तीस परमाणु तक मिलने से छोटे बड़े कई प्रकार के त्रसरेणु उत्पन्न होते हैं और त्रसरेणुओं से भूत, महाभूत और भौतिक सृष्टियां क्रम से होती हैं । भौतिक में भी सबसे प्रथम खनिज सृष्टि होती है, उसमें भी प्रथम छोटी और धीरे - धीरे बडी सृष्टि होना संभव है । खनिजों के पीछे उद्भिजों की सृष्टि है । जिसमें भी प्रथम २ पत्तेवाले कई सृष्टि के ग्रनन्तर दूर्वा, पाँदे, लता, वृक्ष होते हुए अन्त में पीपल, वड़ आदि बड़े वृक्षों की सृष्टि हुई | उद्भिजों के पश्चात् जीवजसृष्टि होती है उसमें भी प्रथम अव्यूढ़ क्रिमि भ्रूणक्रिमि, कीट, देश, मसक, पतङ्ग, पक्षी, पशु, मनुष्य आदि जीवों की सृष्टि क्रम से हुई सब प्रकार के जीव सृष्टि के उत्तर उन्हीं सब ईश्वर का स्वरूप वना और ईश्वर सृष्टि के बाद उन्हीं सब ईश्वरों से परमेश्वर का स्वरूप बना । परमेश्वर में जाकर सृष्टि समाप्त होती है क्योंकि वह भूमा है । उससे अधिक बढ़ने का अवकाश नहीं है, इसलिये इस प्रकार सृष्टि क्रम को भूमोत्तर सृष्टि कहेंगे । कितनों हीं ने जीवों की गणना १४ भेदों में की । जिनमें वृक्ष, कृमि, कीट, पक्षी, पशु ये पाँच तो अधम कक्षा के तगोविशाल जीव हैं और मनुष्य एक ही मध्यम कक्षा का रजोविशाल जीव है । गुह्यक, यक्ष, विद्याधर, गन्धर्व, पितर, देव, इन्द्र और ब्रह्म ये आठ उत्तम कक्षा के सत्व विशाल जीव हैं, और कितने ही दूसरे प्रकार से १४ भेद जीवसृष्टि के माने हैं । १ स्थिरपाद, २ अपाद, ३ गूढ़वाद, ४ शतपदी, ५ बहुपाद, ६ षोड़शपदी कीट, ७ अष्टापद = पट्पद पक्षी, ६ षट्पद पशु, १० चतुष्पाद पशु, ११ द्विपद पक्षी, १२ द्विपद हस्तवान, १३, उत्थित पद, १४ अपाद इन चौदहों में भूमोत्तरवादी के मत से कहना होगा कि आदि में वृक्ष बने फिर कृमि, कीट, आदि होते हुए पशु से मनुष्य बना मनुष्यों से देवता बनें । धीरे - धीरे आत्मा छोटो सी अवस्था से विकास पाकर ब्रह्मा तक बढ़ गया है इसी से इसको विकासवाद भी कहते हैं | प्रायः अधिकतर नास्तिकों का या श्रनार्थों का यही सिद्धान्त है । वे इसी पर जमे हुये हैं कि छोटे - छोटे जलकण मिलकर महाविशाल मेघ बना है । छोटे - छोटे शिलाकरण के ढेर से पहाड़ बना है । [ २४५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ॐ फूलों की छोटी कलियों से बड़ा पुष्प खिलता है और छोटे से बीज से विशाल वटवृक्ष होता है । पेट में बहुत छोटा सा वच्चा होकर धीरे धीरे बढ़ कर जवान होता है । तात्पर्य यह है कि सर्वत्र प्रकृति - नियम को देखते हुए यह सहज में सिद्ध हो जाता है कि सृष्टि क्रम में प्रथम छोटा है पीछे बड़ा है, इसलिये सृष्टि भी दिन - दिन बढ़ती ही जाती है । पृथ्वी भी बढ़ती है, पृथ्वी पर जीवों की संख्या भी बढ़ती जाती है । ( ख ) प्रणिमोत्तरवाद चतुर्वर्ग सृष्टिक्रम दूसरा मत यह है कि यह परमेश्वर सदा सर्वदा नित्य सनातन मूर्ति है । ऐसा कभी विश्वास नहीं करना चाहिये कि परमेश्वर या यह उसका जगत् किसी दिन सर्वथा न या । पीछे से उत्पन्न हुग्रा है प्रत्युत यह मानना उचित जचता है कि यह जगत् और जगदावार परमात्मा परमेश्वर सदा सर्वदा इसी प्रकार विद्यमान रहते हैं । केवल उसके अवयव प्रत्यवयवों में हीं सृष्टि क्रम कभी कहीं प्रवृत होता है और कभी. कहीं विलुप्त होता है । जो यह नित्य सनातन परमेश्वर सदा सर्वदा विद्यमान रहता है उसके चार वर्ग हैं १ - ग्रात्मा, २ - रूप, ३ - शरीर - वित्त । इनमें आत्मा जो अव्याकृत है वह वास्तव में भूमा है, निर्विशेष निर्विकल्प है, न वह उत्पन्न होता है न कभी नष्ट होता है । उस श्रात्मा के ३ रूप हैं । मन, प्राण, वाक् ये तीनों ही एक साथ भूमा होने से असीम हैं । उनमें मन की इच्छा से, प्राण की क्रिया से जो वाक् में वेद, यज्ञ, देवभूत विकार उत्पन्न होते हैं जिनसे इस ग्रात्मा का शरीर बना है वह भी भूमा होने से असीम है | ये निवर्ग ( ग्रात्मा, रूप, शरीर ) परमेश्वर का कभी लुप्त नहीं होता, किन्तु इसी परमेश्वर का वित्त समय - समय पर नष्ट भी होता है, किन्तु उसकी जगह दूसरा वित्त उत्पन्न हो जाता है । बिना वित्त के परमेश्वर की तन्त्र संस्था खाली नहीं रहती । परमेश्वर का वित्त ग्रनन्तानन्त ईश्वर है ये उत्पन्न विनष्ट होते रहते हैं । प्रत्येक ईश्वर के भी पृथक् - पृथक् तन्त्र संस्था होती रहती है और उनमें भी चार - चार वर्ग होते हैं; जिनके त्रिवर्ग की सत्ता ईश्वर की स्थिति के साथ हैं । किन्तु उसका वित्त जो उपेश्वर कहलाता है उत्पन्न विनष्ट होते रहते हैं । इन जीवों में भी भ्रूणादि जीव वित्त रूप हैं, जो प्रधान जीव के जीवन काल में ही उत्पन्न विनष्ट होते रहते हैं । इस प्रकार विचार करने से जाना जाता है कि बड़े के शरीर में छोटा और उसके शरीर में भी और छोटा उत्पन्न होता रहता है यही सृष्टिक्रम है और यह वास्तव में प्रणिमोत्तर है । ( ग ) जीव और ईश्वर के ग्रपने श्रङ्गों का जानना न जानना यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि इस चतुर्वर्ग में जो वित्त का भाग है उसमें जिस प्रकार ज्ञान की और बल की प्रवृत्तियां होती है उनको उस वित्त का स्वामी आत्मा जानता है या नहीं और उसके जितने वित्त हैं उनको भी जानना है या नहीं तो इस प्रश्न के उत्तर में हम प्रथम ग्रपनी परीक्षा करेंगे । जिस प्रकार परमेश्वर या ईश्वर के चतुर्वर्ग संस्था में वित्त है उसी प्रकार हम जीवों में भी वित्त हैं । हम जीवों के शरीर के भीतर बहुत से कीटाणु कीट जीव हैं, उनका ज्ञान या बल ग्रादि की प्रवृत्तियां हमारे [ २४६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * ज्ञान बल से भिन्न हैं उनको भूख प्यास लगती है, परस्पर युद्ध करते हैं, सुखी दुःखी होते हैं, चलते फिरते हैं | तात्पर्य यह है कि हमारे अनुसार वे सब भी बहुत कुछ ज्ञान रखते हैं और कितनी ही चेष्टा करते हैं । किन्तु हम उनके ज्ञानों को या उनकी चेष्टाओं को किंचित् मात्रा भी नहीं जानते उनमें कितने ही मर जाते हैं, कितने ही नये उत्पन्न होते हैं जिनकी मुझको कुछ ख़बर नहीं और इसी प्रकार हम भी जो कुछ जानते हैं या भिन्न - भिन्न चेष्टाएं करते हैं इन सब का ज्ञान उन कीटों को भी नहीं हैं तो इसी प्रकार हम अनुमान कर सकते हैं कि हमारे शरीर के कीटों के अनुसार हम सब जीव भी ईश्वर के शरीर में उत्पन्न विनष्ट होते रहते है । उन कीटों के अनुसार हमारे ज्ञान और चेष्टाओं की भी ईश्वर को खबर न हो और उसकी ज्ञान चेष्टा की हमको भी खबर नहीं है । अथवा दूसरा विचार यह हो सकता है कि अण्ड और पिण्ड में समान ही भाव से सब पदार्थों के रहने पर भी मात्रा का भेद अवश्य है । जिस प्रकार हमारे शरीर के कीटों के मन, प्राण दोनो प्रति-श्रल्प मात्रा के होने से उनमें ज्ञान इन्द्रियाँ और कर्म इन्द्रियाँ उनके शरीर के अति अल्प प्रदेश में थोड़ी मात्रा में बने हैं उसी प्रकार हमारे शरीर में भी मन, प्राण की अल्पता के कारण से ही ज्ञान इन्द्रियां और कर्म इन्द्रियां प्रति ग्रल्पभाग में ही बने हैं । हम आँख से ही देख सकते हैं, दांत, कान से नहीं, यही हम जीवों में ज्ञान - मात्रा की कमी है । हम नियत इन्द्रियों के अतिरिक्त कुछ भी ज्ञान लाभ नहीं कर सकते, और आँख, कान से चल नहीं सकते । किन्तु श्रण्ड रूपी ईश्वर के शरीर में यह बात पहले नहीं कहा गया है कि जीव के अनुसार ईश्वर के शरीर में भिन्न भिन्न नियत इन्द्रियां नहीं हैं । वह अपने शरीर के भागों से सब इन्द्रियों का काम लेता है, इसलिये उसके कोई ज्ञान कदापि बन्द नहीं होता । भीतर बाहर प्रत्येक अङ्ग से प्रत्येक ज्ञान सर्वदा होता रहता है । इसलिये जिस प्रकार हम अपने शरीर के भीतर शोणित, ग्रस्थि मज्जा आदि में या उनके कीटों में अपने चक्षु का बल न पहुँचने से न उनको देख सकते हैं न उनको जान सकते हैं, उस प्रकार ईश्वर की बात नहीं है । क्योंकि उसके प्रत्येक अङ्ग से ज्ञान या क्रिया होती रहती है । इसलिये यह बहुत सम्भव है कि वह ईश्वर हम जीवों के या हमारे शरीर स्थिति की सभी ज्ञानों को सभी चेष्टाओं को सदा सर्वदा बिना रुकावट के देखता और जानता हो यही ग्रंथ जीवों से ईश्वर में अधिक है । विस्फोटवाद सबसे प्रथम परमेश्वर का होना ही संभव होता है । वह परमेश्वर स्वभाव से ही नाना रूप में ही परिणत होता रहता है । जिस प्रकार समुद्र में छोटे बड़े सहस्रों तरङ्ग, लहरें और बुदबुदे झाग इत्यादि उत्पन्न विनष्ट- होते रहते हैं । उसी प्रकार महाविशाल परमेश्वर के रूप में जो अनन्तानन्त विकार उत्पन्न होते हैं उनको ही ईश्वर कहते हैं । इन ईश्वरों की सृष्टि के पीछे उन ईश्वरों से जो विकार उत्पन्न हुए उन्हें सूर्य कहते हैं । वैसे ही सूर्य का विकार पृथ्वी है और पृथ्वी का विकार मनुष्य है । मनुष्य शरीर में भी कितने ही कोट और कृमि उत्पन्न हुए और कृमि के पश्चात जो मनुष्य के शरीर में रोमवाली और केश प्रादि उद्भिज के रूप हैं वे ही पृथ्वी में पहुंचकर दूसरे उद्भिजों के लिये बीज रूप से परिणत होते हैं और उन वृक्षों के वक्कल, फूल, फल, लकड़ी, गुटली आदि पृथ्वी में बड़कर काल-[ २४७ ]
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* त्रहाविज्ञान कै वृक्षों के ग्रङ्ग प्रत्ये Ä क्रम से सड़कर किसी दूसरे वृक्ष के लिए बीज बनते हैं । इसी प्रकार बड़े बड़े नई जाति के वृक्ष उत्पन्न सड़कर धीरे धीरे सहस्रावधि भिन्न भिन्न प्रकार के वृक्षों का बीज बनकर नई के पृथ्वी में नाना प्रकार कर रहे हैं । इसी प्रकार मनुष्य के ग्रवयव और वृक्ष के ग्रवयव मिल मिलाकर जाति खनिजों की उत्पत्ति के कारण होते हैं इस प्रकार परमेश्वर से लेकर छोटी से छोटी वस्तु तक एक के बीज के अवयव से पृथ्वी में सरदी गरमी के परिपाक से बदल कर भिन्न - भिन्न प्रकार के दूसरी वस्तुयों बनते जा रहे हैं यही सृष्टिक्रम है । नई - नई जिस प्रकार ये सब पदार्थ ग्रपने सजातियों को उत्पन्न करते हैं । उसी प्रकार विजातीय काच वस्तुओं के लिये भी यही बीज हो जाते हैं । जैसे मिट्टी किसी वस्तु के संयोग से विकार पाकर है । रहता बनता है और वह काच फिर पृथ्वी में गिरकर कितने और खनिज धातूत्रों के उपादान बनता जीव जाति का जीव के शरीर में जो भौतिक विकार था वही स्वाती नक्षत्र के जलबिन्दु में सम्मिलित पत्थर पाकर • होकर मोती जैसी खनिज वस्तु को उत्पन्न करता है । इसी प्रकार मिट्टी या लकड़ी काल होती होता है, पत्थर भी काल पाकर कोयला होता है, कोयला भी काला पाकर हीरा जैसा खनिज वस्तु के जीवों है । इत्यादि सर्वत्र जानना चाहिये । तात्पर्य यह है कि खनिजों की उत्पत्ति का बीज उद्भिज और के ईश्वर अवयव से मिलता है । और उद्भिजों का बीज जीवों के ग्रवयव से बना है । जीवों का बीज उत्पत्ति अवयव से और ईश्वर परमेश्वर से निकला है । इस प्रकार बड़े के ग्रवयव फूट कर छोटी वस्तु की का कारण होता है । इस मत को विस्फोटवाद कहते हैं । युगपत् सृष्टिवाद और कितने ही अणिमोत्तरवाद अर्थात् बड़े से छोटे होने का क्रममानते हैं ॥ कितने ही विद्वान् एकदम सृष्टि क्रम में भूमोत्तरवाद मानते हैं अर्थात् छोटे से बड़े होने का क्रम विचार है कि सृष्टि में भिन्न - भिन्न स्थलों में ये दोनों ही क्रम दीखते हैं । प्रायः परन्तु मेरा में मेवे चीन देश में एक काठ की मञ्जूषा । सूत्र भरकर हवा बन्द करके कुछ रोज तक धूप में रखते हैं हो जाते हैं सब मेवे हजारों कीड़े उनमें एक दूसरे को खाने लगता है । इसी, सड़कर का तरह पर खाते २ अन्त में एक कीड़ा मंजुषा के आकार बन जाता है, उसको निकाल के काट २ कर ग्रमीर से एक लोग खाते हैं । वहां छोटे कीडों ही बड़े कीड़े का होना देखा पर हजारों प्राणी गया है इससे तो भूमोत्तरवाद सिद्ध होता किसी का शरीर यदि पानी के है । किन्तु मनुष्य यदि समीप कहीं छोड़ दिया जाय तो में परिणत सारा शरीर सड़कर हजारों कीड़ों यह हो जाता है । यहाँ पर एक बड़े जीव शरीर से छोटे -शिमोत्तर छोटे सहत्रों जीवों के शरीर उत्पन्न हुए जा कम सिद्ध होता है । इस प्रकार दोनों किया क्रम दीखने से नहीं । सकता इससे तो यही सिद्ध होता है कि एक कोई क्रम निश्चित है ब्रह्म रूप भूमा ही पूर्व में जगत् था उसी का स्फोट होना यह प्रथवा मनुष्यादि प्राणियों की शरीरसृष्टि के 1 अनुसार जगत् की सृष्टि जाननी चाहिये । के माताके उदर में शुक्र शोणित मिलकर जो विकार पैदा द्रप्स होता है उसकी प्रकृति कोई एक नहीं है । प्रत्युत उस किसी अणु भाग में एक साथ भिन्न - भिन्न प्रकार के अनेक विकार होना में शुरू हो जाता हैं । एक ही समय [ २४८ ]