ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 281–290

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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* ब्रह्मविज्ञान अंश सेमाथा बनता मांस रहता है और दूसरे किसी अंश से धड़ या हाथ पाँव उसी तरल वस्तु से अस्थि -, स्नायु, मज्जा शोणित श्रादि भिन्न की जाती सबके बनने में कोई भी कम, - भिन्न प्रकार वस्तु बन हैं । इन नहीं है । लकडी माथे में घन के शरीर बेर आदि में कीड़ों के शरीर बनते समय सम्भव है कि से, फल बहुत पाँव तकसब अङ्ग प्रत्यङ्ग भी परमेश्वर का शरीर है एक साथ ही बन जाते हों इसी प्रकार यह जगत् । इस शरीर के भी अनुसार यही सम्भव है कि सब अङ्ग प्रत्यङ्ग छोटे से बड़े तक मनुष्य शरीर के एक साथ हों । बनते बिगड़ते रहते हैं वे मनुष्य के शरीर में जिस प्रकार अनेक भाव कफ, पित्त, दन्त आदि , नष्ट सदा सर्वदा होकर फिर उत्पन्न होते हैं । ठीक उसी प्रकार परमेश्वर के शरीर रूपी इस जगत् में भी होना कुछ न कुछ अवश्य ही है । किन्तु समष्टिरूप से शरीर का उत्पन्न एक उत्पन्न - विनष्ट होता रहता साथ ही । शरीर के जितने सब श्रद्धों की उत्पत्ति से होता है उसमें अग्र पश्चात् का क्रम नहीं है इस , अवयव हैं जा सकता , सब असत्यहैं क्योंकि सब नष्ट हो सकते हैं । इसी प्रकार यह भी कहा है कि येसब सत्य प्रत्यङ्ग हैं क्योंकि इसका मूल उपादान तत्व सत्य है, वह कभी नष्ट नहीं होता । इसके अङ्ग-मैं सृष्टि सर्वदा बदलते रहते हैं किन्तु समष्टि रूप से शरीर सदैव कायम रहता है । इसलिये इसके अङ्गों का भाव, अणिमोत्तरवाद अथवा और कोई सदा एक साथ होता रहता है । उसमें भूमोत्तरवाद अथवा क्रमवादकी कल्पना नित्य सनातन अविनाशी सत्य है । करना मिथ्या है । यह परमेश्वर ॥ इति जीव दर्शनम् ॥ आत्म - परिच्छेद ( श्रात्मभेद विचार ) सिद्ध हैं आत्मा के संबन्ध में ५ मत इसीका यहाँ है कि जो जिसका उक्थ विचार में यह कहा जा चुका करना है । यद्यपि प्रजापति प्रकरण किसे कहते हैं? अब यहां वस्तु है? आत्मा से आत्मा का विचार करते हैं । यह आत्मा क्या हो अर्थात् जिसका उत्थान साम का प्रभव ' हो और जो अपने में धारण करने वाला हो और जो जिसका ब्रह्म हो अर्थात् जैसे हो, वही उसकी आत्मा है । घटका हो अर्थात अनेक प्रकार के कार्यों में समान भाव से देखा जाता की आत्मा है । इस प्रकार प्रात्मा मृत्तिका घट , मृत्तिका उक्थ है और साम है इसीलिये नहीं! प्रश्न का, है, ब्रह्म है किन्तु स्वरूप लक्षण यह लक्षरण यद्यपि लक्षण इस है कि जिसको सिद्ध हो जाता है तथापि यह तटस्थ गया है, वह कौन वस्तु है तो प्रश्न समझा रिक्ता-के उक्थ होने से जगत् की श्रात्मा २ - प्रत्ययाति उत्तर में, ब्रह्म, साम हैं १ - प्रत्ययात्मवाद, विचार करने पर ६ मत आज तक सिद्ध हुए, [ २४ ९ ]

पृष्ठ 282

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* ब्रह्मविज्ञान से । इनका कम ४ - कोशवदात्मबाद, ५ - यज्ञमयात्मवाद, ६- चिदात्मवाद त्मवाद, ३ - कोशात्मवाद, निरूपण इस प्रकार है । १- प्रत्ययात्मवाद से कुछ इन्द्रियों के द्वारा बाहर बहुतों का विचार है कि सभी प्राणी जन्म काल से आरम्भ करके है इस प्रकार प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता न कुछ विषय प्रतिक्षरण ग्रहरण करते रहते हैं और वह संग्रह है और बढ़ता इन्द्रियों से या मन से जो ब्राह्य अर्थों का भीतर ज्ञान उत्पन्न हो - हो कर संग्रहित होता रहता से लेकर जो कि जन्म काल रहता है उसे ज्ञान का प्रत्यय कहते हैं और यही प्रत्यय प्राणियों की आत्मा है की आत्मा छोटे बालक और बाल्य, तारुण्य, वार्धक्य के क्रम से बढ़ता रहता है । प्रत्यक्ष हम देखते हैं कि वहत हो इन्द्रिय न । छोटी होती है और वृद्ध की बढ़ी हुई किन्तु यह भी विश्वास करने योग्य बात है कि यदि सकती मानी जा इन्द्रियजन्य कोई ज्ञान उत्पन्न हुग्रा हो तो उस प्राणी में आत्मा की भी सत्ता नहीं तो हम उसमें जाय ही मान लीजिये कि कोई वालक ग्रन्धा, वहा आदि सब इन्द्रियों से हीन कही उत्पन्न होकि यह प्रत्यय किसी प्रकार की ग्रात्मा होने का विश्वास नहीं कर सकते । इसीलिये सिद्ध हया ग्रात्मा है । २- प्रत्ययातिरिक्तात्मवाद मानी का सत्ता यह ऊपर का प्रत्ययात्मवाद तब ठीक हो सकता था जब कि जीवों ही में आत्मा हैं जिनसे गई होती परन्तु जीवों से अतिरिक्त ईश्वर में भी श्रात्मा की प्रतिष्ठा है । बहुत सी ऐसी युक्तियां होना का जीवों के अतिरिक्त ईश्वरों को भी विद्वानों ने देखा है और उनमें भी जीवों के अनुसार आत्मा न इन्द्रियां पाया गया है किन्तु जिस प्रकार जीवों में चक्षु कर्ण ग्रादि इन्द्रियों का सन्निवेश है उसी प्रकार कदाचित् , होकर सर्वाङ्ग शरीर से सब इन्द्रियों का काम होता है और वह भी जीव के अनुसार मनुष्य या से होने न होकर एकान्त निरवच्छिन्न होता है तो ऐसी के प्रत्यय दशा में इन्द्रियों से भिन्न - भिन्न प्रकार मानना बढ़ती हुई आत्मा का होना ईश्वर में नहीं में का माना जा सकता, ऐसी स्थिति में ईश्वर ग्रात्मा विरुद्ध होगा । इसलिये इन्द्रिय जन्य प्रत्ययों के संग्रह है ॥ १ ॥

को ग्रात्मा मानना ठीक नहीं जचता क्योंकि दूसरी बात यह है कि इन्द्रियों से उत्पन्न होने वाले प्रत्ययों को अनुचित है ग्रहण ग्रात्मा कहना को बाहर के पदार्थों का इन्द्रियों पर ग्राने से ही प्रत्यय नहीं होता रूपों में करने किन्तु बाहर से आते हुए इन्द्रियों वाला इन्द्रियों में कोई तत्व पहले ही से विद्यमान कोई तत्त्व पदार्थों बैठा ग्रनुभूत होता है क्योंकि से आये हुए हुआ पहले ही से देखने, सुनने, समझने के लिये उत्कण्ठा करता है और बाहर ग्रहण को बड़े यत्नों से परीक्षा करके अर्थ को । ग्रहण करता है यदि वह उत्कण्ठा करने वाला उस बाहरी होता करने के लिये तैयार हो तो नहीं न बाहरी ग्रथों के इन्द्रियों पर आने उत्पन्न जाता जिसका मन किसी दूसरी ओर खिचा पर भी प्रत्यय सामने लिये हुआ रहता है तो उसकी आंख खुली रहने पर भी के | हुप्रा मनुष्य नहीं दीखता, किसी की आवाज भी नहीं कि प्रत्यय होने सुनता, इससे सिद्ध हुआ बाहरी प्रर्थों के भीतर जाने से पहले ही किसी तत्त्व ॥ का भीतर होना आवश्यक है ॥ २ [ २५० ]

पृष्ठ 283

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ॐ ब्रह्मविज्ञान अव फिर कोई कह सकता है कि पहले देखी हुई सुनी हुई बातों का जो प्रत्यय भीतर संग्रहीत है वही तत्व ग्रहण करता है कि में होगा, न किसी नय तत्व की मानने की आवश्यकता है तो इसके उत्तर कहना कि यह उत्तरोत्तर भी जीवन दशा में यद्यपि सम्भव है किन्तु जीवन के आरम्भकाल में जब कि कोई प्रत्यय भीतर प्रवेश उत्पन्न नहीं हुआ था उस समय बाहरी अथों को जो इन्द्रियों पर आये थे उनको भीतर करने वाले किसी असंभव ग्रन्दरुनी तत्व को न मानने से प्रत्यय का होना असम्भव है और प्रथम वार होने से एक भी प्रत्ययों से प्रत्यय न होने पर उत्तरोत्तर जीवन दशा में भी प्रत्ययो का होना और उन ग्रात्मा का होना किसी का प्रवेश असंभव ही ठहरेगा । इसलिये शरीर के भीतर जन्म से पहले ही तत्व मानना उचित है जिसकी भीतर प्रवेश होना सामञ्जस्य उत्कण्ठा से इन्द्रियों पर आये हुए बाहरी अर्थों का होता है उसीतत्व को प्रात्मा कहना चाहिये ॥ ३ ॥

किसी का देखी जाती है वह प्रत्येक कहना है कि बाहरी ग्रंथों को ग्रहण करने के लिये जो भीतर उत्कण्ठा । इन्द्रियों की व्यर्थ है तो इसके ही हो सकती है इसलिये एक - एक इन्द्रिय ही एक - एक आत्मा मानना उत्तर में कहना कि आँख का काम कान से और होगा कि इन्द्रियों का समूह यदि एक आत्मा होवे तो संभव है कान का काम नहीं होता इसलिये सिद्ध है कि सब इन्द्रियां मिलकर आँख से भी होने लगे परन्तु ऐसा अनेक आत्मा माना जाय तो एक ग्रात्मा नहीं है और यदि भिन्न - भिन्न इन्द्रियों को भिन्न - भिन्न है । मैंने यह भी ठीक नहीं है क्योंकि किसी ही तत्व को देखना सुनना आदि अभिमान पाया जाता देखा, मैंने एक के भिन्न - भिन्न कम्र्मों का एक ही किसी " मैं सुना, मैंने ही कहा इत्यादि इत्यादि सभी इन्द्रियों " पदार्थ में प्रश्रित भिन्न आत्मा होते तो देखने वाला आत्मा सुनने का अभिमान होना पाया जाता है । यदि भिन्न - इन्द्रियों का आश्रय कदापि नहीं करता इससे सिद्ध होता है कि सब इन्द्रियों से अतिरिक्त सब सब इन्द्रियों है वही इस शरीर में के भिन्न - भिन्न कम्मों का फल भोगता कोई भिन्न ही एक तत्व श्रात्मा है || ४ || रखते कोई भी इन्द्रिय मन, प्राण, वाक् श्रोत्र में कोई किसी से सम्बन्ध नहीं दूसरी इन्द्रिय, ये पांचों ही इन्द्रियां आपस नहीं होते तो भी इन्द्रियों को उनके कामों के को उसके काम के लिये प्रेरणा करते मालूम उत्तेजना कौन करता है और लिये कुछ अन्दरुनी है सुनने के लिये कान को सुनी हुई प्रेरणा होना मालूम पड़ता, किसकी प्रेरणा से उसको आँख देखना बातों को देखने के लिये मन में इच्छा होती है और विषय के चाहती है तात्पर्य यह है कि किसी एक ही सम्बन्ध और देखी हुई वस्तु को वाक् कहना चाहती है । होती है । इस पर से एक अपने काम के लिये तत्पर यह इन्द्रिय के पीछे दूसरी तीसरी इन्द्रिय अपने - है और साधारणतः प्रश्न, ओर सब उठता है कि खास विषय की झुकता कि विषयों मन किस की प्रेरणा से उस यदि मान लिया जाय उस की ओर कैसे पहुँच जाता है । विषय न जाकर किसी खास विषय पर ही हो जाता है वह मन को को पहले काम करके कृतकृत्य या कान से सुना था तथापि यह कान अपना के काम के लिये प्रेरणा ही कर दूसरी इन्द्रियों न मन को मन सकता को अपना विषय नहीं जानता है और खास विषय पर कैसे दोड़ है फिर विषयों को छोड़कर उसी है जाता यह मन इस संसार में अनन्तानन्त भी कौन प्रेरणा करता, है उसकी समुद्र इन्द्रियों को कौन प्रेरणा करता है, इसी प्रकार अन्यान्य [ २५१ ]

पृष्ठ 284

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* ब्रह्मविज्ञान के ज्ञानों का कोई एक ही इन सब प्रश्नों का उत्तर तब तक नहीं हो सकता जब तक कि इन सब है और इन्द्रियों सब इन्द्रियों का प्रेरक है वह्नी श्राश्रय नहीं माना जावे और वही आश्रय जो सब ज्ञानों का ग्राधार आत्मा है || ५ || सुनती इसी प्रकार जो इन्द्रिय बाकू इन्द्रिय से शब्द निकलता है पर शब्द को ग्रहण नहीं करता । मैंने ही मैंने ही सुना, है वह बोलती नहीं, न समझती न देखती है पर यह जो अभिमान होता है कि देखने, सम-देखा, मैंने ही समझा और मैंने ही कहा यह एक ही का अभिमान सिद्ध करता है कि सुनने, झने, बोलने वाला इन इन्द्रियों के अतिरिक्त कोई एक ही है वो ही ग्रात्मा है ॥ ६ ॥

प्रश्न किसी वस्तु की देखने की इच्छा से कोई मनुष्य उस वस्तु के पास जाना चाहता है परन्तु पांव चलने वाला यह है कि देखने की इन्द्रिय खुद चलती है न चलने वाले पांव को चलाते हैं इसी प्रकार इच्छा या देखने की इच्छा रखता है और न वह देख सकता है फिर यह देखने की इच्छा से गमन की इच्छा गमन कैसे हुआ, को किसने उठाया । इसके उत्तर में को कहना होगा कि यह देखने की , पांव हम आँख में नहीं है और न पांव ही अपने ग्राप चलता है किन्तु ये सब किसी अन्य अध्यक्ष के आज्ञाकारी अपना-सव सम्बद्ध किङ्कर हैं जिसकी इच्छा से और जिसकी हां करने वाली प्रेरणा से ये सब इन्द्रियां अपना काम करने लगती हैं, वही आत्मा है । हैं कि हाथ से हम अपने पांव को स्पर्श करते हैं या उसकी खुजली मेटते हैं परन्तु हमारा विश्वास गरज न यह हाथ पांव को, न पांव इस हाथ को पहचानता हैं, न पांव की खजली मेटने से हाथ को कोई से है परन्तु ऐसा होने पर भी जो यह मानता कि पांव से खुजली के नाखून चल रही है इसको हाथ मिटाकर मिटाना चाहिये यह विचार कर जो हाथ को उसी खुजली पर पहुंचाता है और हाथ से खुजली जिसको संतोष मिलता है वही आत्मा है ॥ ८ । । यही ग्रात्मा चक्षु का चक्षु श्रोत्र का पात्र हैं वाक् का है प्राण का प्राण , वाक् है मन का मन, सब , है | ये सब इन्द्रियां यद्यपि भिन्न - भिन्न अनेक हैं तथापि सबको पृथक् देने वाला और पृथक् शक्ति -इन्द्रियों में सर्वदा विद्यमान और सब का अभिमान करने वाला वह सर्वथा एक ही है || ६|| इन भिन्न - भिन्न इन्द्रियों के द्वारा जो ज्ञान उत्पन्न होता कहते हैं । प्रतिक्षण रहता है उसे प्रत्यय इन संख्य ऐसे प्रत्ययों के आते रहने पर उन सब प्रत्ययों को संग्रह करने है वह वाला वही आत्मा इन्द्रियों से अतिरिक्त है । यदि वह ग्रात्मा सब इन्द्रियों में रहने अतिरिक्त एक भिन्न पर भी सब इन्द्रयों से का पदार्थ न माना जाये तो परस्पर विरुद्ध धर्म वाले इन इन्द्रियों ही में सब का एकाधिकरण्य अर्थात् एक के ग्रभिमान होना नहीं बन सकता है । इसलिये प्रत्ययों के भिन्न नदियों सावन इन सब इन्द्रियों का भिन्न - जिस लिये समुद्र के अनुसार " एकायन " है अर्थात् सब की गति जिस है । एक ही स्थान में है बही आत्मा कर प्रकार एक ही समुद्र का जल आकाश में उठकर भिन्न - भिन्न दिशाओं में बरस में जाकर भिन्न देशों स्वाद, गति, भिन्न - भिन्न प्रकार की नदियों में परिणत होता है । और उन नदियों के जल, नाम रूप, नाम, गुप्ता आदि गुणों में भिन्न होकर भी चलकर फिर एक उसी एक समुद्र में लीन हो जाते हैं । उनका । २५२ ]

पृष्ठ 285

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* ब्रह्मविज्ञान * रूप, गति, स्वाद श्रादि सब गुण सर्वथा नष्ट होकर केवल एक समुद्र ये इन्द्रियां उसी ही रह जाता है । ठीक उसी प्रकार किन्तु पश्चात् उसी एक ग्रात्मा आत्मा में लीन के रस होकर से उत्पन्न अपने होकर नाम, रूप भिन्न , - गुण भिन्न, कमों नाम, को रूप छोड़ , गुण, कर्म धारण करते हैं कह सकते है कि यह मेरी देते हैं । इसी कारण हम स्वतः यह वाक् इन्द्रिय बोलती है यह भी आत्मा बोलती है । क्योंकि विना काम ( इच्छा ) वाक् इन्द्रिय र ग्रा, म्आदि नियमानुसार अग्रपञ्चात् अक्षरों को उच्चारण करने में कभी समर्थ नहीं हो सकती है । वर्ष निकलते वाक् इन्द्रिय में स्थान और कारण के स्पर्श और विचार रूप संयोग विशेष मे भिन्न प्रकार के हैं किन्तु वह प्रयत्न यह संयोग अभ्यन्तर प्रयत्न से होता है और वह प्रयत्न वाह्य प्रयत्न से होता है । वायु का व्यापार फरक मन है वह वायू शरीर की अग्नि के आघात से उठता है । शरीर की अग्नि में के कारण की इच्छा होता है और मन वोलने की इच्छा से भिन्न - भिन्न प्रकार का प्रयत्न करता है । वोलने भिन्न प्रकार के का समुद्र ज्ञान से उठती है । इस सविकल्पक ज्ञान के उदय का स्थान निर्विकल्पकज्ञान है वही भी ज्ञान - समुद्र मेरी आत्मा है यही के इन्द्रियों में अपने आत्मा इस वाक् इन्द्रिय अनुसार अन्यान्य स्थान से धीरे धीरे - वल यह कोई भी पहुंचाकर उन इन्द्रियों से भिन्न - भिन्न प्रकार का काम करता है इसलिये इन्द्रियां अपने है इसलिये काम में भी स्वतन्त्र नहीं हैं, विना आत्म वल के इनमें स्वतन्त्र कुछ बल नहीं उचित इन इन्द्रियों से है या इन इन्द्रिय जन्य सव ही प्रत्ययों से अतिरिक्त कोई एक आत्मा का मानना । उसी बढ़ने आत्मा में ये सब होते रहते हैं और अपने से उस प्रत्यय जन्मकाल से लेकर मृत्यु काल तक जमा ज्ञान आत्मा को भी और पर्वत का छोटा बढ़ा हुआ दिखाते रहते हैं किन्तु जिस प्रकार तिल का ज्ञान जचता वडा होने है पर भी केवल तिल पर्वत ही छोटे बड़े समझे जाते हैं किन्तु ज्ञान छोटा बड़ा नहीं इसी, आभास प्रकार प्रत्ययों के में छोटे बड़ों का होने न्यूनाधिक होने पर भी मूर्ख और विद्वान की आत्मा यह पर भी वास्तव किन्तु उसका आश्रय ग्रात्मा में केवल प्रत्ययों ही की न्यूनाधिकता समझनों चाहिये कदापि छोटा आदि से अनवच्छिन्न एक बड़ा नही होता । यह ज्ञान स्वरूप दिक्, देश, काल विलक्षण तत्व है। ३ कोशात्मवाद सञ्जित कितनों ही भीतर जाकर जिस कोश में प्रत्ययों होते हैं का विचार है कि इन्द्रिय से उत्पन्न हुए सभी प्रत्यय न बढ़ता है न के उस कोश को ही ग्रात्मा कहते हैं । यह कोश उन प्रत्ययों के बढ़ने से, जिस घटने से उन्हीं को धारणा कहते हैं । मनुष्य घटता है उसमें इन्द्रियजन्य प्रत्यय जितने बढ़ते जाते । ही धारणा को किसी है । कहता है कि मेरी ऐसी बात का विश्वास हो है तो वह अभिमान करता रक्खा है तो जाता में किसी प्रकार का प्रत्य इस कहने का तात्पर्य यही हो सकता है कि मेरी ग्रात्मा कहते हुआ है पात्र को हम कोश । प्रत्ययों सकता है और उसी हैं और का रक्खा जाना किसी पात्र में ही हो है किन्तु उत्तरोत्तर वही कोश मेरी वह कोश यद्यपि एक ही प्रकार का आत्मा है । भिन्नभिन्न समय निधेय पदार्थों जाते हैं । सबसे बाहर का कोश है के भेद से भिन्न - भिन्न पांच प्रकार के कोश कहे पदार्थ जिसमें है जिसमें मन आदि ३ निवेय प्राणादि ४ पदार्थ निधेय हैं । अन्नकोश के भीतर प्राणमयकोश हैं । इस हैं । विज्ञान आदि पदार्थ निधेय इस प्राणमयकोश के भीतर मनोमयकोश है जिसमें [ २५३ ]

पृष्ठ 286

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* ब्रह्मविज्ञान ॐ मनोमयकोश के भीतर विज्ञानमयकोश है जिसमें ग्रानन्द निवेय हैं इस ग्रानन्दमयकोश के भीतर वही आनन्दनिवेय है । कदलीयम्भ के अनुसार उस श्रानन्द के भीतर ग्रानन्द के अतिरिक्त और कोई निधेय नहीं हो सकता । इसलिये इस प्रकार ग्रन्तरन्तरीभाव से सन्निविष्ट ये पांच कोश ही शरीर के आकार का एक कोश कहा जाता है और यही पञ्चकोश का बना हुआ कोश मेरी आत्मा है । ठ = कोशवदात्मवाद बहुतों का विचार कि कोश आत्मा नहीं हो सकता क्योंकि कोश कहने ही से किसी ऐसी वस्तु का खयाल होता है जो इन कोशों में रहता हो जो कि प्रत्ययों के रखने का कोश कहा गया है वह भी ठीक नहीं है क्योंकि प्रत्ययों के रहने का कोश के वल एक विज्ञानमयकोश ही हो सकता है । ५ कोशों में से विज्ञान के अतिरिक्त एक भी कोश ऐसा नहीं है जिसमें ज्ञान स्वरूप यह प्रत्यय प्रवेश कर सकें और न इन प्रत्ययों के रहने के लिए एक कोश के अतिरिक्त भिन्न - भिन्न पांच कोश मानने की कोई ग्रावश्यकता ही प्रतीत होती है और ये प्रत्यय सब पीछे से पैदा हुए हैं और होते रहते हैं । ग्रन्न, प्राण आदि कोश बहिर हैं इनके प्रत्येक का दूसरा कोश मानना उचित नहीं जचता जबकि ये पांचों ही कोश हैं तो कोश का कोश न मानकर उचित है कि इन पांचों से अतिरिक्त कोई ऐसी वस्तु मानी जाये कि जिसके ये पाचों कहे जावें इसलिए जिस अन्य वस्तु के ये पांचों कोश हैं वही ग्रात्मा हो सकता है ॥ १ ॥

दूसरी बात यह है कि कोश का अर्थ आवरण है किन्तु ग्रात्मा स्वयं प्रकाश स्वरूप है । वह किसी वस्तु का आवरण नहीं कर सकता है । यह मानी हुई बात है कि ग्रनात्मिक द्रव्य तमः प्रधान है उसी से आवरण हो सकता है न कि प्रकाश स्वरूप वस्तु से इसलिए जिससे आवरण होता है वही कोश कहा जाता है इसी से वह ग्रनात्मिक वस्तु है किन्तु इन कोशों से जिसका आवरण होता है वही आत्मा हो सकता है ॥ २ ॥

जब कि कोश नाम ग्रावरण का है तो अन्न से प्रारण का, प्राण से मन का मन से विज्ञान का, विज्ञान से ग्रानन्द का प्रावरण भी माना जाय तो भी श्रानन्दमयकोश कहने के कारण उस आनन्द के भी भीतर किसी वस्तु के होने की आवश्यकता प्रतीत होती है । ग्रर्थात् जिस वस्तु का प्रावरण करने वाला यह ग्रानन्दमयकोश है वह इन पांचों से अतिरिक्त होकर इन सब की ग्रात्मा हो सकती है उसमें इनकोशी की विशेषता यह है कि वह निर्विकल्पक है, निविशेष है, निष्कल है, निरञ्जन है और इन पांच कोशों से ढके रहने के कारण स्पष्ट रूप से प्रतीत नहीं होता ॥ ३ ॥

इस आत्मा के राम्बन्ध से यहां पर छः ग्रात्मा का व्यवहार किया जाता है । मुख्य रूप से तो इन पात्र कोशों से अतिरिक्त जो इन सब के भीतर कोई एक निगूढ़ तत्त्व है वास्तव में वही ग्रात्मा है उसी ग्रात्मा को इन पांचों में खोज निकालने के लिए साग उपनिषद् शास्त्र प्रवृत्त हुआ है किन्तु श्रानन्द-कोश से प्रावृत उस ग्रात्मा को भी प्रानन्दमय आत्मा कहते हैं यह दूसरा व्यवहार है । इस ग्रात्मा सहित विज्ञानमयकोश को भी विज्ञानमय ग्रात्मा कहते हैं और इसके इसके सम्बन्ध से मन को भी मनोमय आत्मा कहते हैं, उसके सम्बन्ध से प्राणकोश को भी प्राणमय ग्रात्मा कहते हैं, इसी प्रकार उसके सम्बन्ध [ २५४ ]

पृष्ठ 287

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* ब्रह्मविज्ञान से अन्नकोश को भी अन्नमय आत्मा कहते हैं तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार बत्ती के ऊपर की लौ ही वास्तव में दीपक है किन्तु उस लो के सम्बन्ध से रुई की बत्ती को मोमबत्ती को लालटेन तक को भी दीपक कह सकते हैं उसी प्रकार एक अव्यक्त निर्विशेष कोई तत्त्व जो आत्मा है उसी के सम्बन्ध से इन पांचों कोशों को भिन्न - भिन्न पांच ग्रात्मा और इनसे अतिरिक्त वह असली मुख्य आत्मा, इस प्रकार ६ आत्मा माने जाते हैं | किन्तु विचार कर देखने से ये पांचों कोश वास्तव में आत्मा नहीं हैं । इन पांचों से अतिरिक्त ही कोई तत्त्व ग्रात्मा है उसी के ये पाँच कोश हैं । ५ - यज्ञमयात्मवाद बहुतों का विचार है कि यह आत्मा यज्ञ स्वरूप है । यज्ञ दो प्रकार का है - १ - अग्नि का चयन करना या पुनश्चयन करना प्रथम यज्ञ है । २ - किन्तु अग्नि में सोम की प्राहुति होना दूसरा यज्ञ है । इनमें प्रथम यज्ञ से ग्रात्मा का स्वरूप बनता है और दूसरे यज्ञ से उस श्रात्मा की जीवन यात्रा रूपी स्थिति रहती है ॥ १ ॥

सबसे प्रथम कोई एक शान्त श्रानन्दमय क्षेत्र है उसको चयनविद्या अग्नि की परिभाषा कहते हैं । क्योंकि अग्नि का ग्रन्नादगुण इसमें भी पाया जाता है और चयन विद्या में चयन के लिये जो भूमि या क्षेत्र नियत किया जाता है उसको भी अग्नि शब्द से कहने की परिभाषा है । उस अग्नि पर पांच चितियां होती रहती हैं जिस प्रकार किसी दीवार में एक क्षेत्र पर ईटों की चितियां होती हैं उसी प्रकार एक ग्रात्मा में इस श्रानन्द पर भी अग्नि मयी ईटों की चितियां होती हैं, वे चितियां पाँच हैं - १ - आनन्द २ - विज्ञान, ३ - मन, ४ - प्राण, ५ - अन्न इन्हीं पांच चितियों से बना हुआ स्वरूप यज्ञ है और इसी को आत्मा कहते हैं इन पांचों में सबसे पीछे की जो प्राण और अन्न दो चिति हैं उन्हीं पर पुनश्चिति होती ॥ २ ॥

जब कभी स्त्री - पुरुष का संयोग होता तब उसी समय यह चयन यज्ञ सम्पन्न होता है | स्त्री का जो गर्भाशय है वही पृथ्वी है और वही यज्ञ की वेदी है उस वेदी पर सबसे प्रथम ( रुधिर ) शोणित औरशुक्र में दोनों मिलकर अन्नमय पहली ईंट की चिति होती है इस अन्न के चयन करने के लिये जो बल लगाया जाता है वही प्रारण रूपी इष्ट का ( ईंट ) है । और दोनों ही दोनों को उस समय मन से चाहते हुए काम के साथ संयोग करते हैं यह मन की इप्ट का है और दोनों ही दोनों को जानते हैं कि वह मुझसे अनुराग रखता है या संयोग करना चाहता है तो यह दोनों का विज्ञान मय इष्ट का है । और यह दोनों ही परस्पर हृष्ट रहते हैं उन दोनों का यह ग्रानन्द आनन्दमय इष्टका है इस प्रकार दोनों ओर से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्न इन पाँचों का एक साथ जो दो गुणा प्रयोग होता है । उसी से आगे होनहार एक बालक रूपी ग्रात्मा का बीज जमता है । इन पाँचों में से एक के भी न होने से पांच प्रकार की चिति पूरी नहीं होती इसलिये उस समय निश्चय ही वहां गर्भाधान नहीं होता । स्त्री और पुरुष दोनों साथ मिलकर पांच - पांच ' इष्टका ' उपादान ( चयन ) करते हैं यही इस शरीर के लिये पहली चिति कही जाती है । इनमें पहली अन्नचिति जितने अवकाश में होती है । उतने ही अवकाश में अन्य २ चारों चितियां भी चुनी जाती हैं । इसलिये ये पांचों ही इस शरीर में समान प्रदेश में हैं, न न्यून हैं, न श्रतिरिक्त है । [ २५५ ]

पृष्ठ 288

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* ब्रह्मविज्ञान १ - चयनयज्ञ आदि पंचचिति पुनश्चित पूर्वोक्त पांच चितियों में ग्रन्त की २ चितियाँ- प्रारण श्रोर वाक् हैं । इन दोनों पर फिर से तीन चितियाँ होती हैं | सबसे प्रथम बीज -चिति जो कि वाक् पर स्वभाव के कारण स्वतः ही हो जाती है उसके पश्चात् उसी के ऊपर उसी वीजचिति के कारण देवचिति और भूतचिति के साथ - साथ होती है इनमें विद्या, अविद्या श्रोर कर्म ये तीनों वीज कहलाते हैं क्योंकि आत्मा में शुभ ( सुख ) या अशुभ ( दुःख ) जितने भोग होते हैं या भोग की निवृत्ति होती हैं तथा ग्रात्मा वद्ध या मुक्त होता है इन सबके ये ही तीन कारण हैं क्योंकि केवल विद्या से आत्मा का मोक्ष होता है और विद्यायुक्त कर्म से स्वर्ग अर्थात् सुख भोग होता है और विद्या युक्त कर्म से नरक अर्थात् दुःख भोग होता है । दुःख या सुख भोग ये दोनों वन्धन हैं क्योंकि श्रात्मा में दूसरी वस्तु का मिलाव है किन्तु श्रात्मा में सुख भोग न होकर आत्मा का सुख रूप ही मोक्ष है इसलिये बीज कहलाता है । इनमें विद्या शब्द से निर्विकल्पज्ञान, सविकल्पज्ञान और वेद श्रर्थात् वस्तु ज्ञान ये तीनों समझे जाते हैं श्रौर श्रविद्या शब्द से पांच क्लेश कहे जाते हैं कर्म से पुण्य, पाप श्रौर उनके तीन विपाक जाति, आयु, भोग और कर्म जन्य अतिशय जिसे शुक्र कहते हैं और जिसे बार-बार क्लेश की समृद्धि हुआ करती है ये ही तीन विद्या अविद्या और कर्म प्रारणमय वाक् पर रहने से वीजचिति कही जाती है । इसी बीजचिति के सम्बन्ध से जीवात्मक वाक् पर दिव्यलोक से पाँच दिव्य | प्राण जो अमृत रूप हैं वे पांच मर्त्यं वाक् के साथ आकर चीयमान हो जाते हैं । ये पाँचों ये हैं -१ आकाश २ पर्जन्य, ३ सूर्य, ४ चन्द्र, ५ पृथ्वी । इनमें जितने प्राण हैं उन्हीं से देवचिति होती है और उनमें जितने भूतप्राण हैं उनमें ही भूतचिति होती है । यहाँ जो पर्जन्य कहा गया है वह वास्तव में एक प्रकार का वायु है उसी को कोई ब्रह्मा कहते हैं, कोई उसको प्रभिजित तारा कहकर वर्णन करते हैं । इसी ब्रह्मा को हमारा सूर्य परिक्रमा करता है उसके परे श्राकाश है जिसको कहीं इन्द्र शब्द से कहा है और कहीं दिक् शब्द से | ये पाँचों ही देवता प्राण रूप से शरीर में प्रवेश करके ४ प्रकार कर्म करते हैं । अन्तश्चर होकर शरीर के धातुओं का निर्माण करके शरीर का स्वरूप संघटन करते हैं तथा बहिश्चर होकर शरीर के बाहर भौतिक पदार्थों में से शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध रूपी भूतरसों को ग्रहण करके शरीर के भीतर आत्मा में पहुँचते हैं । और स्वर्ग में चार होकर स्वर्गादि स्थान से देवताओं के रसों को लेकर उनको शरीर के भीतर ग्रात्मा में पहुँचाते हैं और उपास्य रूप से इस शरीर की धा आत्मा की पुष्टि करते हैं । प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, ये पाँच अन्तश्चर प्रारण हैं और मन, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र ये पाँच बहिश्चर प्राण हैं श्रोर आकाश, पर्जन्य, सूर्य, सोम, श्रग्नि ये पाँच स्वर्गचर प्राण हैं और तेज तथा श्री, यश, तथा कीर्ति और व्यष्टि तथा श्रीज और महः श्रर ब्रह्मवर्चस ये पाँचों उपास्य रूप हैं इस प्रकार ये पाँच देवचितियाँ हुई किन्तु इस प्रकाश से भी परे जो परोरजा कहकर निष्कल, निरञ्जन कोई ध्रुव पदार्थ है जिसके आश्रय से ही ठहर कर ऊपर के पांचों देवता अपना - अपना कार्य करते हैं । 11 वह इन ज्योतियों की ज्योति भी मेरे शरीर में प्रवेश करती है और वही इस देवचिति की मुख्य चिति है जो कि विज्ञान आत्मा कहलाता है वही ' मैं ' ईश्वर हूँ । इसी पर ज्योति के ग्राश्रय से जो पाँच [ २५६ ]

पृष्ठ 289

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 289 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान के देवचिति कही गई हैं उनके प्रत्येक के साथ भूतभाग भी ग्राकर यह भूतचिति भी करते हैं अर्थात् प्राकाश से आकाश, पर्जन्य से वायु, सूर्य से तेज, चन्द्र से ग्राप और पृथ्वी से पृथ्वी ये पाँचों भूत अपने सूक्ष्म रूप से हमारी इस आत्मा में सन्निविष्ट होते हैं, उनका रूप शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँचों ही आत्मा में इनके ज्ञान होने के लिये यह वीजरूप से ग्राहक होकर आत्मा में रहते हैं यदि इनमें से कोई न हो तो सम्भव है कि उसका ज्ञान भी न हो क्योंकि इन्हीं के बल से इच्छा उत्पन्न होकर इन पाँचों को ग्रहण करने वाली पाँच इन्द्रियाँ होती हैं । किन्तु उस भूत चिति पर दूसरे प्रकार की और भी पाँच रूप से भूत-चितियाँ होती हैं जो यह - १ - भूतात्मचिति, २- पुरुषचिति, ३- वेदचिति, ४ - लोकचिति, ५ - धातुचिति ये || -पाँचों भूतचिति भी प्रथम भूतचिति के ऊपर ही होती हैं इसलिये पाँचों चितियाँ भी तीन चितियों में ही अन्तर्गत है जिससे यहाँ तक पुनश्चिति पूरी होती है पहले की पञ्चचिति और उस पर तीन पुनश्चिति करने से जो रूप सिद्ध होता है वही अग्निचयन यज्ञ हैं और यही यज्ञ मय आत्मा है । २ - अन्तिम पञ्चभूतचिति १ - भूतात्मचिति प्रज्ञान, तैजस, वैश्वानर इस प्रकार ३ आत्मा मिलकर एक आत्मा होती है, जिसमें सबसे प्रथम पृथ्वी का रस और सूर्य का रस इन दोनों के परस्पर घर्षण से शरीर में एक प्रकार की अग्नि उत्पन्न होती है, वह हमारे शरीर के सभी भूत भागों में सर्वत्र व्याप्त होती है, यह पहली चिति है । इस वैश्वानर के शरीर में रहने योग्य मात्रा से बढ़ने पर उसी वैश्वानर के भाग से तैजस आत्मा उत्पन्न होती है । जिसका काम इन भूतों को तनाव में डालकर पसारना है, अर्थात् छोटे को फैलाकर बड़ा करना है । इसी तैजस मात्रा के अनुसार शरीर की वृद्धि होती है, वृक्षादि भी उँचे चढ़ते हैं और प्रत्येक के शरीर में बिम्ब, शिशु, पोगण्ड, किशोर, तरुण, युवा, प्रौढ़, जरा, वार्धक्य, स्थविर रूपों से शरीर की अवस्थाएँ बदलती हैं । इस तेजस की भी शरीर में रहने योग्य सीमा से अधिक मात्रा होने पर उन मात्राओं से प्रज्ञान की उत्पत्ति होती है जिसके द्वारा भी जड़, मूर्ख, प्रोढ़, प्रवीण आदि भेद ज्ञान सम्बन्धी उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार भूतों में वैश्वानर की और उसमें तैजस की और उसमें प्रज्ञान की चितियाँ होकर एक विशिष्ट भूत आत्मा इन भूतों में सन्निविष्ट होती है यही भूतात्म - चिति है । २- पुरुषचिति शरीर के भूतों में प्राण सर्वत्र व्याप्त है यह प्राण स्वभाव से ही सात अवयवों में विभक्त रहता है उन अवयवों को पुरुष कहते हैं । इस प्रकार सात पुरुषों का एक पुरुष इस सम्पूर्ण शरीर में चीयमान होकर व्याप्त रहता हैं । इन सातों में से ४ पुरुष आत्मा होती हैं, अर्थात् मनुष्य अंगी बनकर मध्य में रहता है और दो पुरुष दो पक्ष होकर दोनों ओर में, एक पुरुष पुच्छ होकर नीचे की ओर में, उस अमी आत्मा का ग्रङ्ग होकर उस श्रात्मा की सहायता करता है । जिस प्रकार पक्षी का धड़भाग ४ प्राणों में बनता है । हृदय के ऊपर बाई दहनी दोनों छाती दो प्राणों से और हृदय के नीचे वांया, दहना दोनों बगल दो प्राणों से इस प्रकार चार प्राणों से घड़ बना हुआ है जो इस शरीर का मुख्य भाग है और दो प्राणों [ २५७ ]

पृष्ठ 290

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 290 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान के शरीर से दो पक्ष बनकर वह धड़ इधर - उधर चलाया जाता है और प्राण के एक भाग से पक्षी का पूँछ भाग बनकर वह सम्पूर्ण शरीर को हिलाने में या स्थिर रखने में मदद देता है । इसी प्रकार मनुष्य में भी बीच के घड़ में जितनी प्राण की मात्रा है ' उसकी ग्राथी मात्रा से दोनों हाथ और दोनों पाँव में प्राण है और उसकी चौथाई मात्रा का प्राण कमर में और कूल्हे में रहता है इसी प्रकार पुरुष, कीट, कृमि पत्ते में भी या वृक्ष ग्रादि प्राणी मात्र में सात प्राणों के रहने का नियम हैं, यहां तक कि वृक्षों के एक - एक जो कि वृक्ष की श्रात्मा से भिन्न अपनी आत्मा रखते हैं उनके भीतर का डांड जितने प्राण से बना है उसके आधे प्राण से डांड के दोनों ओर पत्ते का पसार बनता है और उसके चौथाई प्रांगा ने डांड के अन्त में पत्तों की नोक बनती है । इस प्रकार जिन सात प्राणों से शरीर बनता है उन्हीं गानों के सात से ये सिर 1. सबका शिर भाग भी बना करता है अर्थात सिर में पृथक सात प्राण की सत्ता रहती है | परन्तु हैं । के सात प्राण शरीर के मात प्राणों से मात्रा में बहुत कम होते हैं अर्थात् एक के बराबर होते पुरुष बना का मनुष्य के शरीर में यद्यपि पुच्छ भाग स्पष्ट नहीं दीखता तथापि मेदण्ड के नीचे तीन अस्थियों भाग हुआ एक त्रिकुट पुच्छ भाग अवश्य बना हुआ है । उसकी प्राण मात्रा का पविर्तन होकर कुछ ओर नीचे रहकर शेष अधिक, भाग उसके सिर में चलाया गया है जिसके कारण जान के नीचे की के खिंचाव ( गिराव ) से जो पशु पक्षियों में मन्द बुद्धि रहती है वही की नाडी सिर पुच्छ न होकर ज्ञान प्रकार ओर बढ़ने से ज्ञान की वृद्धि होकर मनुष्यों में पशु की अपेक्षा विलक्षणता देखी गई है । यद्यपि इस • के शरीर में सात प्राणों की स्थिति का व्यभिचार की यात्रा अवश्य हुआ है तथापि सात प्रारण है मनुष्य के शरीर में अवश्य है जो कि स्थानान्तरित होकर दूसरे स्थान में प्राप्त होता है । तात्पर्य यह कि प्राणी मात्र के शरीर इस प्रकार सात प्राण या आठ प्राणों की चिति से व्याप्त रहता हूँ । J ३ — वेदचिति जो ग्रात्मा का स्वरूप ३ भागों में विभक्त हैं ग्रथात् ही वेद के मन, प्रारण, वाक इनमें से वाक रूप में परिणत होती है और वेद से यज्ञ और यज्ञ ये सब प्रकार की प्रजायें उत्पन्न होती हैं । इसलिये ऐतरेय आदि श्रुतियों में सिद्धान्त रूप से यह कहा गया है. कि-" प्रथो वागेवेदं सर्वम् " अर्थात् वाक् ही यह सब कुछ है || १ || वह वाक् वास्तव में जो व्यापक है वह किसी बन्धन में आजाती है जिस प्रकार किसी जलाशय में वायु बिन्दु के में बल की ग्रन्थि पार सम्बन्ध से ग्रावर्त ( भंवर ) उसके अकस्मात जल उत्पन्न होकर को चक्कर में डाल देता है, उसी प्रकार वाक् को में होता है । बन्धन में डालने वाला परिणाम अर्थात् जिस सीमा के वल जितने हुए बाहर वह बल नहीं है उसी सीमा से पकड़े पर प्रधि बनाकर वह वल अपने से वाकू को सीमाबद्ध करदेता है । जिससे व्यापक असीम काल देश, | परिच्छिन्न होकर एक वस्तु के रूप में यह वाक् भी ससीम होकर दिक, बड़े आ जाता है इसी छोटे अनन्त वस्तुऐं उत्पन्न होती हैं || २ || प्रकार छोटे बड़े भिन्न बलों के कारण इन सब वस्तुनों में असंख्य भिन्न - भिन्न । तीन प्रकार के वलों को अपने गर्भ में धारण करते बलों पर अधिकार रखने वाला एक बल मुख्यतया वस्तुओं रहता है । भिन्न - भिन्न बलों के कारण यद्यपि [ २५८ ]