ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 291–300
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 291–300
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ब्रहा विज्ञान में नाम, रूप. कर्म भिन्न - भिन्न प्रकार के होते हैं तथापि उन सब भिन्न - भिन्न रूपों में भी तीन बल सर्वत्र समान रूप से रहते है और उन तीनों को परस्पर सम्बन्ध कराने वाला एक प्रधान बल भी सभी वस्तुमा में समान रूप से ही रहता है|| ३ || यह प्रधान बल जितने परिमाण कायोता है उतन ही सीमा तक वाक् बन्धन में ग्राकर अपनी एक नाभि प्रर्थानि एक केन्द्र नियत करता है और उस नाभि से प्रथि तक उस वाक की सीमा तक वह बल ही रूप से नियत नवनव्याप्त रहता है । वह बन भीतर वाले तीनों बलों को पकड़कर वस्तुका एक स्वरूप करता है इसलिये को प्रजापति कहते है । प्रत्येक वस्तु में यही बल प्रधान है और इस बल ब्रह्म इस प्रधान " " है तीनों बलो में से एक बलजला बल के भीतर जो तीन बल हैं उनको ही वेद कहते उन के अनुसार उत्तरोत्तर छोटा - छोटा चक्र बनाता हुआ नाभि में बाहर से शीतर की ओर जाता हुआ पहुंच कर का काम है । यह बल जितना उन बलों की ग्रन्थि उत्पन्न करता है वहीं उस प्रथम वल अधिक होगा के के स्वरूप का आयतन उतनी ही ग्रन्थि बडी होगी उसी ग्रन्थि की सीमा अनुसार वस्तु सिद्ध होता रिच से बना है जिसका अर्थ प्रस्ताव है इमी प्रथम बल को " ऋग्वेद " कहते हैं ( ऋक्, धातु है या शुरुआत करता है ) । जिस ग्रन्थि उत्पन्न करके वस्तु की मूर्ति प्रकार यह प्रथम नाभि तक याता हुआ उत्पन्न वल प्रथि से प्रधि तक करना की नाभि से उठकर जाता है उसी प्रकार उसी के साथ - साथ एक दूसरा बल उस मुर्ति हुआ उस मूर्ति उड़ता हुआ आगे को बढ़ता है जिसके कारण का संगठन करने वाली ग्रन्थि को धीरे - धीरे में एक उस मूर्ति धीरे घटता हा प्रधि स्थान वारगी का श्रायतन वा व्यास केन्द्र स्थान की अपेक्षा धीरे -घटजाता मात्र भी अपना श्रायतन नहीं रखता है यहां तक उस प्रधि से बाहर वह मूर्ति परमाणु को उधेड़ने तब उस यही मूर्ति की ग्रन्थि वाला सीमा से बाहर दृष्टि रखने पर वह वस्तु नहीं दीखती कहते हैं उसी यही बल " साम " दोनों बलों को ऋक और साम कहलाता है । जिस प्रकार इन प्रकार इसी जिन - जिन और साम कहलाते हैं । कारण बाकों में होकर यह बल संचार करते हैं वे वाक भी ऋक दोनों पार्श्व से केन्द्रवाली मूर्ति के वाह्य ऋक और साम ये हैं । बल के अनुरोध से वहीं प्रधि दोनों दो प्रकार के होते क्षेत्र उत्पन्न होता है ऋक् और तक जो दो रेखा उससे जो त्रिकोण उन रेवालों जाकर समाप्त करती हैं केन्द्र वाली मूर्ति के एक - एक अंश उबेडकर से परिच्छिन्न मूर्ति रूप वाक् भी ऋ है इसी प्रकार दोनों सीमाओंों से दी रेखायें बाहर की परारते हैं उतने प्रदेश की प्रदेश निकल प्रधि में पहुंचकर जितने अश तक या उन रेखाओं से परिच्छिन्न कहलाता कर वस्तू मूर्ति केन्द्र में करते हैं वे दोनों रेखाये से भी है समाप्त, प्रधि के बीच में वृत्त रूप उत्पन्न । इनके अतिरिक्त के केन्द्र और होता एक तीसरा ऋक साम । अर्थात् ऋक् जा सकता है वो भी के स्वरूप कहा बाह्य प्रधि के समान ही ऋक्साम मोर सामये दोनों उधेड़ता है, इसी कारण बनाता है, दूसरा मूर्ति से सम्बन्ध रखते हैं, एक मूर्ति को से केन्द्र दोनों ही वल के की समाप्ति है । ये नाभि स्थान में में ऋक से प्रि से साम की समाप्ति है और अधिक स्थान दोनों ही बल नाभि तक प्रधि गति हुए भी करके व्याप्त तक या प्रधि से नाभि तक इस प्रकार विरुद्ध की नाभि से प्रारम्भ होकर रहते हैं । इस मूर्ति समान देश में रहकर परस्पर बद्ध [ २५ ९ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान बाहर की प्रधि तक जितना श्राकाश है असंख्य मूर्तियों से संबन्ध करते हुए ऋक् सामों के समुद्रवत् वर्तमान रहता है । ऋक्साम वस्तु की नाभि से इस प्रकार बद्ध हैं कि जब तक यह नाभि न हटाया जाय तब तक ये ऋक्, साम अचल और अटल अपने स्थान पर स्थिर रहते हैं उनकी अपने मार्ग से प्रणुमात्र भी विचलित करने वाला, हटाने वाला कोई बल ग्राज तक उत्पन्न नहीं हुया, गलबत्ता किसी दूसरी वस्तु की मूर्ति का नाभि स्थित बल ही कुछ समय के लिये ऋक् साम के बल को मोड़ सकता है । हमारी दृष्टि के धरातल में प्रत्येक वस्तु की मूर्ति की धारा जिस साम से परिच्छिन्न होकर पहुँची है उतनी ही प्रायतन की छोटी बड़ी मूर्ति दिखाई देती है । हमारी दृष्टि का धरातल एक परमाणु रूप है उसी दृष्टि विन्दु पर चारों ओर से सहस्रावधि छोटी बड़ी मूर्तियों का ऋक् प्रवाह पहुँचर उन प्रवाहों के प्रारम्भ स्थान में वस्तुओं की ठहरी हुई दिखाती है । यह एक आश्चर्य का विषय है किन्तु इस से यह सिद्ध होता है कि अनन्तानन्त ऋचाएं एक ही किसी बिन्दु पर सामञ्जस्य सुभीते के साथ रह सकती हैं उनमें स्थान विरोध का गुण सर्वधा नहीं हैं । ऋक् साम //////// [ २६० ]
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* ब्रह्मविज्ञान यजुः इस प्रकार दो बल कहे गये हैं । इन्हीं दोनों के मध्य में तीसरा बल पृथक् रूप से अपना व्यापार करता है इस तीसरे बल को ही यजुः कहते हैं । यही प्रधान वेद है, इसी में अन्य दोनों वेद सम्मिलित रहते हैं ॥१ ॥
ऋक् और साम की सीमा के अन्दर नाभि से प्रषि तक और प्रषि से नाभि तक चक्कर लगाती हुई एक प्रकार की वाक् सर्वदा प्राती जाती रहती है, इस वाक् को यजुः कहते हैं और इसी यजुः से जगत् की सब प्रकार की सृष्टियां हुई हैं ॥ २ ॥
नाभि से प्रधि तक जाने वाली वाक् को सोम कहते हैं । अग्नि और सोम ये दोनों ही यजुः के रूप इन दोनों के परस्पर संयोग विशेष को यज्ञ कहते हैं । इसी यज्ञ से सब प्रकार की प्रजा ( जगत् ) उत्पन्न होती है । यह यजुः शब्द वास्तव में यजु से बना है इस शब्द में दो भाग हैं || ३ || यत् - जुः इनमें यत् का अर्थ चलने वाला अर्थात् गति स्वभाव वाला वायु है, और जुः का अर्थ स्थिति स्वभाव वाला आकाश है । इस प्रकार आकाश और उसमें रहने वाला वायु ये दोनों तत्व मिलकर यजु । का स्वरूप होता है । इनमें वायु पहले ही अग्नि और सोम कहकर दो रूप का कहला चुका है इसमें ग्राकाश का सम्बन्ध दोनों वायुनों से होकर चार तत्व सिद्ध हुए । आकाश, अग्नि और सोम, इनमें अग्नि और सोम दो - दो प्रकार का है - अमृत और मृत्यु - जिनमें अमृत अग्नि को अग्नि और मृत्यु अग्नि को ' यम ' कहते हैं इसी प्रकार सोम भी अमृत, मृत्यु के भेद से दो प्रकार के हैं जिनमें अमृत को सोम और मृत्यु को श्राप् कहते है इस प्रकार छः पदार्थ सिद्ध हुए- आकाश, अग्नि, यम, आकाश, सोम और आप || ४ || इनमें भी अग्नि के आकाश को इन्द्र कहते हैं जो सर्वव्यापक है उनसे शून्य न घन पर्वतादि पदार्थ हैं और वे विरल वायु आदि पदार्थ हैं ( इसी इन्द्र को पाश्चात्य विद्वानु " ईश्वर " बहुते हैं ) और सोम वाले ग्राकाश को वाक् या शब्द कहते है यह भी सर्वे व्यापक है किन्तु इस आकाश में लहर उत्पन्न होने पर आकाश का स्थिर स्वभाव होते हुए भी वायु के द्वारा चलकर कानों में धक्का मारता है जिससे शब्द रूप में वह कान से गृहित होता है । उपर्युक्त छः पदार्थों में इन्द्र, अग्नि, यम, ये तीनों ही अन्नाद कहे जाते हैं और सदा अन्न के ऊपर ग्राक्रमण करके अन्न को अपने पेट में लेते हैं और शब्द, सोम, श्राप् ये तीनों ही अन्न हैं ये श्रग्नि में पड़कर उसकी अवस्था बदलकर नाना प्रकार के पदार्थ उत्पन्न करते हैं नाभि से अग्नि उठकर प्रधि तक जाता है उसमें प्रधि से नाभि तक आते हुए सोम की आहुति होती रहती है यही आहुति यज्ञ है । इस यज्ञ से सब प्रजा उत्पन्न होती है और इसी यज्ञ से उसकी जीवन दशा स्थिर बनी रहती है ॥ ५ ॥
इन्द्र आकाश में रहने वाला जो ग्रग्नि, अन्नाद और प्रसारी है वही पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ इन तीनों लोकों में रहने के कारण तीन प्रकार का हो जाता है जिसे अग्नि, वायु, सूर्य कहते हैं । ये तीनों देवता के भेद हैं | इसी प्रकार शब्द ग्राकाश में रहने वाला सोम ही घनता के तारतम्य से तीन प्रकार का [ २६१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान के हो जाता है, जिसे तेज, ग्रप्, ग्रन्न कहते हैं और ये तीनों भूत के भेद हैं । उपर्युक्त तीनों देवता इन्हीं तीनों भूतों में नित्य रहते हैं, इस प्रकार यजुः के १० भेद सिद्ध होते हैं- इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, यम इस | प्रकार ये पांच भेद ग्रन्नाद के हैं और शब्दाकाश, तेज, ग्रप्, अन्न और ग्राप् में पांच भेद अन्न के हैं । यम और सोम के ग्रन्यान्य कितने ही भेद और भी हैं जिनका विस्तार रजोवाद यादि ग्रन्य प्रकरणों में दिखाया गया है । तात्पर्य यह है कि देवताओं से और भूतों से होने वाली जितनी सृष्टियां हैं सब यजुः से ही होती हैं और यजुः एक वेद है इसलिये वैदिक ग्रन्थों में बहुधा वेदों से ही सब सृष्टि का होना वॉन किया गया है उसी आधार पर मनु भगवान् भी कहते हैं-“ वेद शब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ” ग्रादि में वेद के शब्दों ही से पृथक् - पृथक् संस्थायें बनाई । इस प्रकार व्यापक जो वाकू तीन बलों के पेट में धारण करने वाले एक बल से परिच्छिन्न हो - हो कर नाना मूर्तियां पृथक् पृथक् ग्रपना नाम, रूप, कर्म धारण करती हैं यदि मूर्तिया न बनती तो उस व्यापक वाक् का नाम, रूप, कर्म कुछ नहीं कहे जा सकते थे और न उनका पृथक् - पृथक् वस्तु कहकर कुछ विज्ञान ही होता इसलिये मूर्ति बनाने वाले बलों से ही सब वस्तुओं का पृथक् - पृथक् विज्ञान होता है इसी से उस बल को वेद कहते हैं और जिसका बिज्ञान होता है वही वस्तु " विद्यते " ग्रर्थात् ' है ' । इसलिये जिसके द्वारा ‘ विद्यते ' अर्थात् वस्तु सत्ता की प्रतीति होती है वही बल वेद है । तात्पर्य यह है कि वेद से ही वस्तु की सत्ता है और वेद से ही वस्तु का मान है अथवा यां समर्थों कि जगत् की प्रत्येक वस्तु जिससे भासती है और सत्ता रखती है बही वेद कहा जा सकता है - वह वास्तव में विचित्र बलों से पूर्ण वाक् का ही नाम है | इस प्रकार बलों से विभिन्न रूप धारण करके जो वाक् ग्रात्मा पर व्याप्त हो जाता है इसे ही वेदविति कहते हैं । इस जगत् के सब पदार्थ पांच भागों में बँटे हैं - १ बरतत्व, २ - श्रीदयिक, ३ - योगरूढ़, ४ - यौगिक, ५ - तात्कालिक । परतत्व वह मूलतत्व है जिससे ये सब कुछ बना है और उसी को ब्रह्म कहते हैं - वह ग्रव्यक्त श्रव्याकृत, निविशेष, निष्कल, निरञ्जन है ॥ १ ॥
इसी परतत्व से बिना दूसरे मिलाब के जो अपने श्राप कुछ तत्व उदभूत हुए वे सब श्रीदयिक तत्व हैं ये सब भी परतत्व के अनुसार ही अखण्ड, निरवयव और निर्धार्मिक हैं । किन्तु विशेष यह है मुल- कि परतत्व एक था, निर्विशेष था, किन्तु ये सब अनेक हैं और सुविशेष हैं ॥ २ ॥
इन्हीं दयिक में से भिन्न - भिन्न ३ या अधिक तत्वों के परस्पर योग से जो एक नया तत्व उत्पन्न होता है उसी को योगरुड़ कहते हैं यद्यपि यह दो के योग से उत्पन्न हुआ है तथापि इसके उत्पन्न होने पर अब दो भाव नहीं रहते है, दानों का स्वरूप मिटकर एक ही कोई अखण्ड रूप उत्पन्न हो जाता है ऐसी अवस्था को योग तत्व कहेंगे ॥ ३ ॥
किन्तु इन्हीं औदयिकों का अथवा योगरूढ़ों का अथवा श्रदयिक योगरूढ़ों का कोई ऐसा मिलाब हो कि जिसमें दृढ़ योग होने पर भी उन दोनों तत्वों का नाश न होकर अपनी दशा से दोनों ज्यों के त्यों । २६२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * बने रहें जैसे लवण, जलका, शर्करा ( खांड ), गन्धवायु का घनिष्ट योग होने पर भी दोनों पृथक् - पृथक् बते रहकर एक नई दशा में आ जाते हैं उसी अवस्था को यौगिक कहते हैं यह तत्व नहीं कहा जाता ॥ ४ । परन्तु जब उन तत्वों का चेतन शरीर में ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से उसी ज्ञानेन्द्रिय के धरातल पर कोई नया भाव उत्पन्न हो तो वह उस संयोगकाल में ही उत्पन्न होकर उतने ही काल स्थिति रखकर नष्ट हो जाता है । इसीलिये उस भाव को तात्कालिक ( क्षणिक ) कहते हैं ये पांच प्रकार के है— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध । इस सबकी उत्पत्ति व स्थिति क्षण मात्र के लिये इन्द्रियों ही पर होती हैं । इसलिये हम कह सकत हैं कि इन पानों की वास्तविक सत्ता हमारे इन्द्रिय स्थान के अतिरिक्त जगत् भर में और कही भी नहीं है । हम अपने ज्ञान के भ्रम से अपनी इन्द्रिय के धम्मों को वस्तु धर्म कहकर बाहर जगत् के पदार्थों में गिथ्या आरोप करते हैं । वास्तव में बाहर के पदार्थों के कोई अदृश्य मूलतत्व अवश्य है जो कि हमारे इन्द्रिय तत्वों से मिलकर शब्द, स्पर्श यादि तात्कालिक भावों को उत्पन्न कर देते हैं । ये सब यद्यपि वास्तव में क्षणिक हैं तथापि जगत् में स्थिर रूप से इन्हीं पांचों को देखकर हम जगत् के सभी ही पदार्थों को स्थिर समझ रहे हैं । इस पर यही प्रश्न उठता है कि जब ये सब क्षणिक हैं तो इन सब पदार्थों में स्थिरता जो प्रतीत होती है वह कहां से आई तो उत्तर में कहना होगा कि यह स्थिरता उन भूतगणों की व्यक्तिगत नहीं है किन्तु उनकी सन्तान के कारण स्थिरता का अनुभव होता है और यज्ञ ब्रह्म से अर्थात् वेद से ( यजुः ) सम्पन्न होता है । तात्पर्य यह है कि वेद के द्वारा ही प्रत्येक वस्तु की स्थिरता कायम होती है जो वस्तु दीखती है या जो वस्तु नहीं दीखती है उन दोनों में यही सत्ता प्रतीत होती है तो अवश्य ही चयन के द्वारा या सोमहवन के द्वारा यज्ञ प्रवश्य होता है, इसलिये जिस प्रकार चयन यज्ञ से वस्तु क ग्रात्मा वनती है और हवन यज्ञ से उस ग्रात्मा का जीवन निर्वाह होता है, इसी प्रकार इन दोनों यज्ञों के सन्तान से उस ग्रात्मा की श्रात्मा के शरीर की और उस आत्मा के जीवन की स्थिरता सिद्ध होती है । परन्तु यह यज्ञ वेद बिना सम्पन्न नहीं होता इसलिये कहना होगा कि वेद ही इन सबका कारण है । इस यजुः के स्वरूप में जो छ प्रकार के तत्व बताये गये हैं उनमें अग्निपक्ष के आकाश को इन्द्र कहा गया है और सोमपक्ष के आकाश को वाक् कहते हैं यद्यपि इन दोनों में ही स्थिरता समान है किन्तु इस स्थिरता के स्वरूप में अथवा स्थिरता के कारण में भेद है । इसको यों समझना चाहिये कि इस जगत् में जितने पदार्थ हैं उनमें गति और स्थिति दोनों धर्म्म पाये जाते हैं । क्या प्राण के शरीर, क्या वृक्ष क्या पर्वतादि जिन - जिन को हम स्थिर समझ रहे हैं उन सब की कुछ काल के अन्तर देश या स्वरूप बदलते दीखते हैं । इससे मानना होगा कि उन सब स्थिरों में भी धीरे या तेजी से परिवर्तन का प्रवाह अवश्य जारी है अर्थात् उनके प्रत्येक ग्रवयव में गति रहती है इसी प्रकार जितने चलते हुए पदार्थ हम देखते हैं उनमें भी सभी जगह वेग की कमी बेसी अनुभव में आती है । वहु वेग क्या वस्तु है इसका विचार करें तो ज्ञान होगा कि गति वाले सभी पदार्थों में स्थिति भी साथ - साथ रहती है । इसी स्थिति की अधि-कता को धीरापन कहते हैं और उसकी अपेक्षा दुसरे चलने वालों में जितनी स्थिति कम हो उसी कमी को वेग कहते हैं | वेग का हमें अनुभव होता है वह विना स्थिति के कायम नहीं होता इसलिए प्रत्येक गति के साथ - साथ स्थिति का होना भी हमें मानना पड़ता है, इसके अतिरिक्त और भी प्रमाण हैं कि [ २६३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जब हम एक पदार्थ या तीर को कहीं फेंकते हैं तो वह अपने नियत स्थान पर पहुंचने के आकाश लिये के कुछ प्रदेशों समय में लेता है उस समय का यदि विभाग किया जाय तो प्रत्येक विभाग में उस भिन्न - भिन्न स्थित प्रतीत होगी - यदि बीच के श्राकाश में उसकी स्थिति न होती तो जिस क्षण में वह तीर फेंका गया था उस क्षण में अपने पहुंचने के स्थान में वह दीखता परन्तु ऐसा नहीं होता इसलिये कहना नहीं होगा होता कि वह ठहरता - ठहरता जाता है यह ठहराव गति में है या गति ठहराव में है यह स्पष्ट प्रतीत किन्तु घिलमिल हुए दोनों ही उस वस्तु में अवश्य प्रतीत होते है— सारांश यह है कि प्रत्येक वस्तु में गति और स्थिति दोनों ही तारतम्य से अवश्य ही रहते हैं । कितनी ही वस्तुओं में गति अपेक्षिक स्थिति की बनिस्पत अधिक पाई जाती है श्रौर स्थिति बहुत कम होती है इसके विपरीत कितनी ही वस्तुनों में स्थिति की मात्रा अधिक रहती है और गति की मात्रा कम । जब ऐसी वस्तु धर्म है तो हम यहां तक विचार में ला सकते हैं कि यह स्थिति की मात्रा बढ़ते - बढ़ते किसी वस्तु में इतनी बढ़ सकती है जहाँ गति की मात्रा कम होते - होते सर्वथा शून्य हो गई हो इस प्रकार स्थिरता जिस वस्तु में होगी उसे ही हम “ वाक् श्राकाश ” कहते हैं | अथवा इस वाक् आकाश की स्थिरता गति का श्रत्यन्त प्रभाव रूप है वह यद्यपि स्वभाव से स्थिर है तथापि वायु के द्वारा शब्द में लहर और गति प्रतीत होती है किन्तु यदि न रहे तो शब्द स्वयं नहीं चलता इसलिये वाक् रूपी श्राकाश सर्वथा गति रहित हम स्थिर समझ सकते हैं । इसी प्रकार इसके विपरीत यह गति बढ़ते - बढ़ते श्रवश्य ही किसी वस्तु में जाकर इतनी बढ़ सकती है जहाँ स्थिति की मात्रा कम होते - होते सर्वथा ही शून्य हो गई हो उस वस्तु में यद्यपि गति परिपूर्ण हो गई है तथापि प्रतीत नहीं हो सकती इसके दो कारण हैं— एक चली हुई वस्तु किसी एक रूख नहीं जाती क्योंकि उसम गति की पूर्णमात्रा होने के कारण किसी भी गति का नहीं है । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर नीचे सब ओर गति सर्वथा भाव से अभाव होती रहती है जिससे गति प्रतीत न होकर उन सब गतियों का एक समूह साथ रूप स्थिरता प्रतीत समान होती है । दूसरा कारण यह है कि कल्पना करो कि उस वस्तु की गति किसी एक ही में तो भी उसकी दशा हुई गति में साथ - साथ यदि स्थिति नहीं है तो वह मध्य में न ठहर कर जिस में दूसरे क्षरण चली उसी क्षण अन्तःस्थान में प्रतीत हो सकती है अर्थात् एक ही क्षण में है जिसके वह यहां से वहां तक पाई जा सकती कारण गति प्रतीत न होकर स्थिरता ही प्रतीत होती है । इसी स्थिरता के अभिप्रायसे वेद मन्त्र स्थान पर यह लिखा है कि-अनेजदेकं मनसो जवीयो नंनद्देवा प्राप्नुवन् तद्धावतोऽन्यानत्येतितिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा पूर्वमर्षत् दधाति
।
॥
( यजु ० उ ० प्र ० में एक ४०/४ ) तात्पर्य यह है कि इस जगत् स्थिति और और गति में दोनों ही दीखती हैं ये दोनों ही इन्द्र वाक् इन्हीं दोनों के रूप हैं जहां कहीं इन्द्राकाश का संबन्ध और जहां उद्भट है वहां गति प्रतीत होती है वाक् आकाश का संवन्ध अधिकता से हो जाता है वहां स्थिति प्रतीत होने लगती है किन्तु जगत् के जितने पदार्थ हैं वे सब इन दोनों ही ब्राकाशों में रहते हैं इसलिये स्थिति उन सबको इन दोनों आकाशों की गति [ २६४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान से संबन्ध कुछ न कुछ बना वाकू ही रहता है किन्तु जब इन दोनों को आकाश स्थिति जब केवल अपने निज के रूप में देखें तो घन है और इन्द्राकाश गतिघन श्राकाश के है ऐसा कहना होना तथापि इन्द्राकाश भी वाक् अनुसार अविचारी , कुटस्थ, व्यापक, स्थिर ही प्रतीत होता है । ४- लोकचिति है | यह इस प्रकार जो चितियां कही गई है प्रत्येक उन चितियों में उनसे भिन्न एक लोकचिति भी होती लोक शब्द -मिलकर ब्रह्माण्ड के तीन भागों को एक बतलाता है, पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्यौ- ये तीनों भाग ब्रह्माण्ड कहलाता मात्राओं को है, इस ब्रह्माण्ड में जहाँ जो कुछ जितने पदार्थ हैं सभी की कुछ - कुछ लेकर प्रत्येक प्राणी उतने के शरीर बनते हैं इसलिए ब्रह्माण्ड के जितने भाग लिये जा सकते हैं सब, भाग इस शरीर के पृथ्वी कहते भी होते हैं । प्रथम ब्रह्माण्ड के दो भाग हो मुख्य माने जाते हैं उसे द्यावा-से हैं 1 । इनमें दोनों ही द्यावा भाग देवता से सम्बन्ध रखता है और पृथ्वी भूतों से किन्तु गौण मुख्य भेद में देवता और
भूत दोनों रहते हैं ।
शरीर Sarga दो भाग हैं उसी प्रकार इस शरीर में भी शिर नौर ॥
ये भाग शिर हैं । शिर भाग में देव ही प्रधान है इसलिए भाग ही भूत मात्रा रहने पर भी द्यों के अनुसार मात्रा चेतन है से देव मात्रा रहने पर । उसी के सम्बन्ध से शरीर भी चेतन होता है । ऐसे ही शरीर भाग भी भूत के मात्रा ही प्रधान है शरीर नीचे है । इस प्रकार दो लोकों । इसीलिए शिर से रहता इसकी शरीर में चिति सिद्ध होतीहै । शरीर प्रकारान्तर से उसी प्रकार इस में तीन ब्रह्माण्ड के तीन भाग हैं जिनको तीन लोक कहते हैं । दूसरा है भाग दीखते हैं नाभि से तक अन्तरिक्ष भांग और अर्थात् योमि से नाभि तक पृथ्वी भाग है हृदय • साढ़े हृदय से कण्ठ प्रादेश अर्थात् १० ॥ -दस २ तक द्यौ भाग है । इन तीनों लोकों का इस प्रकार एक एक त्रिलोकी ग्रङ्ग ल प्रमाण परिच्छिन्न करते हैं इस प्रकार के के प्रारण होकर शरीर के एक - एक भाग को उससे रस से शरीर के लोकत्रय से प्रतीत अर्थात् परे तीन प्राण तीन भागों को उत्पन्न करते हैं । किन्तु होता जो परोरजा के ऊपर शिर का भाग उत्पन्न है जिसमें चिदात्मा है उसके रस से शरीर में भी त्रिलोकी चेतना रूपी त्रलोकी का अधिष्ठाता है । प्राण ही प्रधानरूप से रहता है और वही शरीर के यह शिर होता है जिसमें भवारों ॥ ऊपर भाग भी शरीर के तीन लोक के रसों को लेकर उत्पन्न . जहां कपाल जिसमें अनुसार अर्थात् ठोड़ी की अस्थि तक मस्तिष्क अर्थात भेजे का स्थान वह द्यौ भाग है और हनु अन्तरिक्ष ऊपर गई इन्द्रियों का सन्निवेश है वही है वह पृथ्वी का भाग है इन दोनों के मध्य में पांचों भाग है तीन लोक की चिति हैं ।. । तात्पर्य शिर भाग में भी यह है कि शरीर के अनुसार है यहां हस्त में- भूजा प्रकोष्ठ इसी प्रकार पाद में उरु, जङ्घा, प्रपद इस प्रकार तीन भाग बने के तक कि,, प्रतल भी त्रिलोकी भिन्न प्रत्येक अङ्ग पर्व दीखते हैं- इन सब का कारण अन्तरिक्ष - भिन्न ली में भी प्रत्येक तीन - तीन द्वितीय लोकं अर्थात् रस ही हैं लोक है चन्द्रमा और वायु है । अग्नि सहित पृथ्वी प्रथम, है । हमारे और सूर्य द्यौलोक है वह लोकातीत तुरीय भाग है । सूर्य से भी परे जो परज्योति [ २६५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान शरीर का जो मध्यम भाग है उसके तीन विभाग उस तुरीय परज्योति के रस से बने हुए हैं उस शिर में उस पर ज्योति से चेतना आई है वह इस शरीर में मन रूप से विद्यमान है वही मन अपनी इच्छा से प्राण को प्रेरणा करके जैसी चेष्टा कराता है वैसा ही भूत भाग चेष्टा करते हैं । यही तीन लोक और चौथा परज्योति का इस शरीर में विभक्त होकर चेष्टा कराना ही लोक चिति है । ५- धातुचिति पूर्व में जो पञ्चकोश चिति कही गई है जिसमें सबसे बाहर ग्रन्न कोश है उसके अन्दर प्राण है-यह प्राण ग्रन्नाद है यह बाहर से अन्न को ग्रहण करके अपने ऊपर व्यापक अन्नमयकोश उत्पन्न करता है । वह श्रन्नमयकोश सात चिति का है । ये सातों ही शरीर के धातु हैं अर्थात् धारण करने वाले हैं इसीलिए इन सातों को धातु चिति कहते हैं । ये सातों बाहर के क्रम से ग्रन्दर को जाते हुये इस प्रकार चीयमान हैं - लोम, त्वचा शोणित, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र । इनमें लोम को त्वचा के ऊपर नियम से रहने पर भी शरीर का ग्रवयव बहुत से विद्वान् नहीं मानते । इसी कारण त्वचा से शुक्र तक क्रम से सात ही विभाग कहे गये हैं इनमें त्वचा अर्थात् चर्म चार प्रकार का है । शोणित का वेष्टन, चर्म वसा का वेष्टन, मांस का वेष्टन, और अस्थि का वेष्टन - वसा, मांस, कोमलास्थि, दारुणास्थि ये चारों एक दृढ़ सूत्र के जाल पर चीयमान है, अर्थात् इन चारों के भीतर भिन्न वस्तुयों के गुथे हुए जाल हैं अस्थि में मज्जा, मज्जा में शुक्र चीययान है इनके अतिरिक्त बड़ा अन्त्र छोटा अन्त्र ( आंत ) शिरा अर्थात् वाहिनि नाड़ी धमनी अर्थात् वायु वाहिनी नाड़ी और स्नायु ( nerve ) अर्थात् ज्ञानवाहिनी या चेष्टा वाहिनी नाड़ी इस प्रकार के भिन्न - भिन्न सूत्र भी शरीर में चीयमान हैं । इनके अतिरिक्त कितने ही सूत्र ग्रन्थि भी शरीर में है । शोणित, पित्त वात, कफ ये चार धातु और रस तथा मल ये दो धातु भी शरीर में चीयमान है । हम देखते हैं कि एक फल में त्वचा, गुदा, नाड़ी, कठिन भाग और मज्जा में पांच भाग क्रम से रहते हैं - ठीक इसी प्रकार प्राणी के शरीर में भी त्वचा, मांस, नाड़ी, अस्थि और ये ही पांच चिति मुख्य हैं और शेष सब इसी के मददगार हैं । इसी प्रकार यह अन्नमय कोश ही भूत प्रात्मा कहलाता है इस भूत ग्रात्मा में मुख्यतया तीन रस आते हैं | भौम, दिव्य औौर पर, इनमें भौम रस में ही त्वचा, अस्थि प्रादि चिति समझनी चाहिए जिस प्रकार अन्न मय कोश में यह धातु चिति कही गई है उसी प्राणमय कोश में पहले कही हुई पुरुष-चिति या लोकचिति जाननी चाहिए । प्रारण के आधार से ही अन्नमय कोश में धातुचिति भी हो सकती है अन्यथा नहीं क्योंकि सब प्रकार की क्रियाएं प्रारण से ही उत्पन्न होती है, प्राण के बिना अन्न या धातु प्रादि सब पशु हैं क्रिया नहीं कर सकते इसलिए विना प्राण के कोई चिति नहीं हो सकती । श्रन्नचिति में जब प्राणचिति होती है तभी उसमें मन, विज्ञान, ग्रानन्द ये तीनों प्रकार की मनश्चिति भी होती है । इस मनश्चिति के मन या विज्ञान भाग को लेकर वेदचिति जाननी चाहिये । कोई - कोई वेदचिति और यज्ञ-चिति ये दोनों भी प्रारण चिति के हो भेद समझते हैं । इस प्रकार सब चिति मिलकर एक प्राणी का शरीर या श्रात्मा का स्वरूप सिद्ध होता है । [ २६६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान तात्पर्य यह है कि घातुचिति अन्न से अर्थात् वाक् से सम्बन्ध रखती है और मन से मन, विज्ञान और ग्रानन्द ये तीन ग्रन्तचितियां सम्बन्ध रखते हैं । इन दोनों के अतिरिक्त सब चित्तियां अर्थात् वेद-चिति, पुरुपचिति, लोक चिति, देवचिति और बीजचिति भी केवल प्राण से ही सम्बन्ध रखते हैं । इस प्रकार सत्र चितियों को संग्रह करके मन, प्राण, वाक् ये तीन तत्त्व वाली ग्रात्मा शरीर धारण करता है और शरीर या शारीरक कहलाता है । सवनयज्ञ तथा यज्ञमय आत्म जीवन सबसे प्रथम ग्रानन्दादि पांच कोशों से जो पांच चिति कही गई, उसके ऊपर वीजचिति आदि पुनश्चिति कही गई है इन दोनों चितियों से आत्मा की स्वरूप सिद्धि होती है । वह आत्मा अन्न भोक्त होकर जो चिरकाल तक अपनी जीवन स्थिति वनाये रखता है यह दूसरा यज्ञ है । आत्मा का वह अन्न जिसके उसका जीवन निर्वाह होता है दो प्रकार का है - १- दैव, २ - भोत-इनमें ग्राकाश पर्जन्य, सूर्य, चन्द्र ग्रादि पिण्डों के द्वारा द्यौ स्थान से अनवरत काल जो रस शरीर में आते रहते हैं वही देव ग्रन्न हैं । किन्तु इनके अतिरिक्त पृथ्वी में से सात प्रकार के ग्रन्न ग्रहण किये जाते हैं वे भौत ग्रन्न हैं । वे ये हैं- अन्न, जल, गर्मी, वायु, शब्द, प्रकाश वल या क्रिया और ज्ञान । इनमें गरमी और प्रकाश इन दोनों को ही तेज शब्द से कह सकते हैं, इसलिये श्रुति में ७ ही ग्रन्न हैं । जो ग्रन्न भोजन किया जाता है वह दैविक हो अथवा भौतिक वह आत्मा में पहुंचकर आत्मा ही वन जाता है इस प्रकार ग्रात्मा का वनते रहना ही श्रात्मा का जीवन है किन्तु इन दोनों प्रकार के अन्नों को शरीर स्थित अग्नि ग्रहण करता है । इनमें द्यौ स्थानी प्रारण आकर पृथ्वी स्थानी प्राण से शरीर में घर्पण पाकर के अग्नि की उत्पत्ति होती रहती है, किन्तु भौतिक अन्न पाकर उसको दहन करके जो रस उत्पन्न होता है उससे उस अग्नि की पुष्टि और रक्षा तथा स्थिति बनी रहती है, यद्यपि ये दोनों प्रकार के अन्न अग्नि की स्थिति के लिये प्रत्यन्त आवश्यक है किन्तु इन दोनों में भौतिक की अपेक्षा दैविक अन्न प्रधान है, क्योंकि कितने ही योगियों के शरीर में समाधि साधन की अवश्था में अनशन ( न खाना ) व्रत धारण करके अनेक वर्षों तक जीवन की स्थिति देखी गई है वहां यद्यपि भौतिक कुछ भी नहीं रहता तथापि केवल दैविक ग्रन्न ही प्रचुर ( ग्रधिक ) रूप से ग्राने के कारण रीर की अग्नि बनी रहती है | अग्नि ही वैश्वानर ग्रात्मा है और उसके कारण तेजस आत्मा और तेजस के कारण प्रज्ञात्मा बना रहता है, किन्तु यह अवश्य है कि बिना योग बल के साधारण मनुष्यों के शरीर में भौतिक अन्न के न आने पर केवल दैविक अन्न मात्र से अग्नि का बल कम हो जाता है जिससे मृत्यु रूप अग्नि अर्थात् यम के प्रबल हो जाने से द्यौलोक से प्राते हुए रस का आगम विच्छिन्न हो जाता है इस कारण द्यौ प्राण और पार्थिव प्रारण के घर्षण बन्द हो जाने से शरीर की अग्नि सर्वथा नष्ट हो जाती है, जिससे आत्मा का जीवन सर्वथा नष्ट हो जाता है । तात्पर्य्य यह है कि जिस प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांचों तात्कालिक हैं उसी प्रकार द्यौ प्राण और पार्थिव प्रारण इन दोनों के योग से उत्पन्न होती हुई शरीर की अग्नि जिसमें गरमी भासती है वह भी तात्कालिक है जिस समय दोनों का योग यम के कारण नष्ट हो [ २६७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान जाता है उस समय शरीर की गरमी नष्ट हो जाती है और शरीर छूटने से प्राणी मरा हुया कहा जाता है । इस मृत्यु में ग्रन्न की हानि ही कारण है । इसलिये श्रन्न भोजन हो ग्रात्मा की जीवन सत्ता का कारण है । जिसमें दैविक ग्रन्न का प्राते रहना ही प्रयु शब्द से कहा जाता है— स्थूल मान से १४४ वर्ष या १०८ तक इस दैविक अन्न का शरीर में ग्राना स्वभाविक सिद्ध हुआ है । इसलिये यही मनुष्य की ग्रायु है और इससे कम समय में मनुष्य की मृत्यु वैकारिक है, वह स्वभाव सिद्ध है और यह विकार कृत है । ६- चिदात्मवाद अन्तिम मत यह है कि चित ही एक ग्रात्मा है चित का अर्थ है जो चयन करे प्रथवा जिस पर चयन हो अथवा जो चीयमान हो उसको चित कहते हैं - तात्पय्यं यह है कि तीन प्रकार की चिति कही गई है पहली पञ्चचिति, दूसरी त्रिचिति और तीसरी पुनश्चिति इन तीनों में पुनश्चिति मध्यवाली त्रिचिति के ऊपर होती है और यह मध्यम त्रिचिति भी प्रथम पञ्चचिति पर होती है किन्तु यह प्रथम पञ्चि भी अवश्य ही किसी न किसी पर होनी चाहिये क्योंकि कोई भी बिना क्षेत्र प्रर्थात् विना ग्राधार के नहीं हो सकती । इसलिये मानना पड़ेगा कि कोई न कोई अव्यक्त और ग्रव्याकृत, निर्लक्षण, निर्विशेष, निष्कुल, निरञ्जन, ग्रखण्ड, निरयव तत्त्व है जो नित्य सनातन है उसी के आधार पर पं चितियां होती रहती हैं । इन चितियों का करने वाला भी दूसरा नहीं हो सकता क्योंकि उस तत्त्व के अद्वैत होने से दूसरा कोई चयन करना सम्भव नहीं । वही अव्याकृत स्वयम् पांच रूप से उदय होकर उन्ही श्रदयिकों को अपने आधार पर चीयमान कर लेता है और जबकि उसी में से उदय होकर उस पर चिति होती है तो कहना होगा कि चीयमान पदार्थ भी तीनों चितियों के जो जहां कुछ है यह भी उस मूलतत्व से भिन्न नहीं हैं तो इससे सिद्ध हुआ कि जिस पर चिति है, जिन पदार्थों की चिति है जो चिति का कर्ता है इस प्रकार तीनों रूप से वह एक ही तत्त्व समझा जाता है इसीलिये उसको चित् कहते हैं । इस प्रकार इस चित् तत्व को परात्पर शब्द से समझना चाहिये । यही परात्पर मुलतत्त्व इन तीनों चितियों के कारण तीन अन्य अवस्था करता है जिन ग्रवस्थाओं के भेद से वह पर, अक्षर, क्षर कहलाता है । तात्पर्य्य यह है कि यदि तीनों प्रकार की चितियों से अलग करके यदि विशुद्ध उस मूलतत्त्व का विचार करें तो वह परात्पर कहावेगा, क्योंकि वह यागे के तीनों विशेषों में सबसे प्रधान ' पर ' है । उससे भी बहु निर्गुण, निर्विशेष परे है इसीलिये परात्पर कहलाता है और वह ग्रक्षेय ग्रनिवर्चनीय है । यह ' परात्पर ' अपने औदयिक भावों से पाश्चचिति करके उन पांचों से विशिष्ट अपना रूप बनाता है तो उसे अव्यय कहते हैं, यही अव्यय उन क्षर, अक्षरों से परे है इसीलिये पर ' कहलाता है और इन तीनों पुरुषों में यह पर उत्तम है इसलिये पुरुषोत्तम कहलाता है । यहीं पर पुरुष जबकि तीन चिति से भी युक्त होता है तो पचचिति और त्रिचिति इन दोनों चितियों से विशिष्ट होकर भिन्न रूप धारण करता है तो उसको अक्षर कहते हैं, यह सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान् है यद्यपि पर पुरुष में भी ग्रानन्द, विज्ञान, मन, प्राण, बाकू के रहने के कारण सब ज्ञान और सब शक्तियों की निधि होना सम्भव है तथापि बीज: उद्बुद्ध न होने के कारण उससे सृष्टि नहीं होती, वह केवल साक्षी चेता है । उसके ग्राधार से ही ग्रक्षर [ २६८ ]