ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 301–310
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 301–310
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* ब्रह्मविज्ञान सृष्टि करता है । इस अक्षर में वीजचिति, देवचिति, भूतचिति का सन्निवेश है इसी से इन बीज, देव, भूत-चिति सामग्नियों के द्वारा वह सब प्रकार की सृष्टि करने में समर्थ होता है, इसलिये वेद में लिखा है: I यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गाः । सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः तथाऽक्षराद् विविधाः सौम्यभावाः प्रजायन्ते तत्र चैवा पियन्ति 1 11 इस प्रकार यह अक्षर अपने शरीर से जिन भावों को उत्पन्न करता है वे सब भाव पानी में भाग के अनुसार उसी अक्षर पर चीयमान हो जाते हैं और वे चिति पांच प्रकार की १ - भूतात्मचिति, २- पुरुष - | --चिति, ३ - देवचिति, ४ - लोकचिति, ५ - धातुचिति इन पांचों चितियों को कुछ समय तक अपने आधार पर रखकर जब इनकी मात्रा अधिक हो जाती है तो स्वभाव से ही इन से विरक्त होकर इनको छोड़ना चाहता है और इनमें जो व्यापक अपना रस्ता खींच लेता है जिससे जिस प्रकार वृक्ष के पत्ते रस के सूखने के कारण अपने ग्राधार से अलग होकर झड़ जाते हैं उसी प्रकार अक्षर के रस हट जाने से वह भौतिक पिण्ड उड़कर उस अक्षर से अलग हो जाता है, इसीलिये उसे क्षर कहते हैं । पांच चितियां जो वास्तव में क्षर पदार्थ हैं इनकी चिति होने पर इनसे विशिष्ट होकर जो प्रक्षर अपना रूप धारण करता है उसी को क्षरपुरुष कहते हैं । यह जो जहां कुछ दीखता है वह सब क्षर है अर्थात् नाशवान् है किन्तु इनमें ग्रन्तर्गत ग्रक्षरपुष विद्यमान है और उस अक्षर के भीतर परपुरुष विद्यमान है और उस पर के भीतर भी परात्पर विद्यमान यह स्थूल रीति से भीतर बाहर का व्यवहार किया जाता है । वास्तव में क्षर के भीतर बाहर सर्वत्र व्यापक होकर ग्रक्षर रहता है और अक्षर के भी बाहर भीतर पर है और इसी प्रकार पर में परात्पर है इसीलिये ईशावास्य श्रति कहती है-तजति, तन्नजति, तद्दूरे, तद्वन्ति के 1 तदन्तरस्य सर्वस्य, तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ तात्पर्य यह है कि जिन क्षरों को आप सर्वत्र देख रहे हैं वे अक्षर की, पर की और परात्पर की भी साक्षात् मूर्तियां हैं इनमें जो सबका मुख्य ग्राधार परात्पर है वही सबका प्रभव और प्रलय है और वही सबकी मुख्य प्रतिष्ठा है । इसलिये वही चित् सब ग्रात्माओं की ग्रात्मा है । त्रिशरीर विवेक ( कारण, सूक्ष्म, स्थूल ) १- कारण शरीर तीन प्रकार के वीज जो पहले कहे गये हैं अर्थात् विद्या, कर्म और ग्रविद्या ये ही तीनों मिलकर कारण शरीर कहलाता है और इन पर जितने देवता युक्त होते हैं वे सब मिलकर सूक्ष्मशरीर कहलाते हैं, [ २६६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान उसी प्रकार इन पर जितने भूतों का संसर्ग होता है वे सब मिलकर स्थूलशरीर कहलाते हैं । ये तीनों भिन्न भिन्न प्रकार के तीन ढेर होते हैं इसलिये देह कहलाते हैं । क्योंकि देह का अर्थ ढेर हैं, ऐसे ही ये तीनों चय अर्थात् समुच्चय या समूह हैं, इसी से इनको काय कहते हैं । क्योंकि चयन से काय बनता है और ये तीनों फिर मुख्य ग्रात्मा से शीर्ण होकर अलग हो जाते हैं इसीलिये शरीर कहाते हैं । इन तीनों को ग्रात्मा विविध प्रकार से अथवा विशेष रूप से ग्रहण करता है इसलिये इनको विग्रह कहते हैं । ये तीनों ग्रात्मा पर वपन किये जाते हैं अर्थात् बोये जाते हैं इसीलिये वायु कहाते हैं । इन तीनों के कारण से ग्रात्मा का विस्तार होता है इसलिये तनाव होने के कारण इनको तनु कहते हैं । ये आत्मा पर मूर्च्छित रहते हैं इसलिये मूर्ति कहलाते हैं । इस प्रकार ये तीनों समूह रूप होने के कारण पुरी भी कहे जाते हैं । इन्हीं पुरियों में बसने के कारण श्रात्मा पुरुष कहलाता है ( पुर = बस, उष बसना ) इन तीनों शरीरों में ( वीज, देव, भूत ) जो कारण शरीर हैं वह २ प्रकार से होता है एक तो ग्रात्मा के वाक् भाग से स्वयम् आत्मा में से उत्पन्न होने वाले होकर उस वाक् पर नित्य रूप से विद्यमान रहता है अर्थात् आत्मा के मन, प्राण, वाक् सम्बन्ध से वह वाकू, विद्या, कर्म और अविद्यरूप से स्वयं परिणत हो जाता है यह पहला रूप है और ये सदा नित्य है ॥ १ ॥
किन्तु दूसरा इस जीव आत्मा के कर्म करते रहने से उस कर्म जन्य जो अतिशय उत्पन्न होता है । जिसे शुक्र कहते हैं वही बीज रूप से वाक् पर ग्रासक्त हो जाता है अर्थात् विद्या पर विद्या, कर्म पर कर्म, अविद्या पर अविद्या ग्राकर उनको पुष्ट करता है और ये तीनों ही कृत्रिम उत्पन्न होकर भोगने से नष्ट होते रहते हैं और फिर २ से उत्पन्न होते रहते हैं जब तक मुक्ति न हो तब तक इनका विनाश उत्पत्ति क्रम नष्ट नहीं होता इसलिये ये दोनों प्रकार के कारणशरीर नित्य ही विद्यमान रहते हैं किन्तु इनमें विशेष यह है कि पहला औदयिक कारण शरीर ग्रक्षर आत्मा में ही अवश्य रहता है इसीलिये ईश्वर का भी शरीर माना जाता है और उसी शरीर से ग्रक्षर ग्रात्मा अर्थात् ईश्वर सब सृष्टियों को करता है । किन्तु दूसरा ग्रासङ्गिक ( योग से ) कारण शरीर क्षर जीव शरीरों में ही जो प्रक्षर भाग है उसी पर रहता है । क्षर के सम्बन्ध से ही ग्रासङ्गिक कारणशरीर अक्षर पर उत्पन्न होता हैं और उसी ग्रास-ङ्गिक कारणशरीर के द्वार इस जीव का जन्म, मरण, मुक्ति, मुक्ति इत्यादि निर्भर है । श्रदयिक और ग्रासङ्गिक दोनों कारणशरीर जब ग्रक्षर पर उत्पन्न हो जाते हैं तब वही अक्षर ईश्वर न कहा कर जीव कहाने लगता है और वही जीव अपने पर नई पञ्चचिति वाले स्थूलशरीर को ग्रहण करता छोड़ता रहता है परन्तु वहीं ऐसा करें कि जिससे विद्या की उन्नति हो तो उससे विद्या बढ़कर ग्रविद्या को घटाते हुए किसी समय में उसको सर्वथा नष्ट कर देता है तो जीव लक्षण अविद्या के नष्ट होने से वही अक्षर विशुद्ध ईश्वर रूप हो जाता है यही जीव की सगुण मुक्ति कही जाती है । २ - सूक्ष्मशरीर सूक्ष्मशरीर तीन प्रकार से उत्पन्न होता है - १ - औदयिक, २ - प्रासङ्गिक, ३ - जैव - या हार्द ये तीनों ही जीव में ग्रक्षर ग्रात्मा के श्राश्रय से रहते हैं ॥ १ ॥
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* ब्रह्मविज्ञान ईश्वर की वाक् से स्वयं उत्पन्न होकर देवता और भूत ये दोनों ही ईश्वर के शरीर को विग्रह कहते हैं । ग्रक्षर में भी नियम से रहते हैं, किन्तु उपेश्वर जो सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि माने जाते हैं उनके अक्षर में प्रौदयिक देव भूत के अतिरिक्त प्रासङ्गिक देव भूत भी उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनके अपने देव भूत के अतिरिक्त ईश्वर से प्राये हुए देव, भूत भी ग्रासक्त हो जाते हैं किन्तु पृथ्वी आदि उपेश्वरों में जो . जीव उत्पन्न हुए हैं उनके शरीर में स्वयं उत्पन्न हुए देव, भूतों के अतिरिक्त ईश्वर या उपेश्वरों से आये हुए देव, भूत प्रागङ्गिक रहते हैं । इनके सिवाय जीवों के हृदय में हृदय के कारण जो षट्कोश कह कर गायत्री का वर्णन पहले किया गया है उस रूप में भी देव और भूत हृदय में आकर वहां हृदय में प्रति-ष्ठित होकर चार प्रकार के कर्म करते हैं यह तीसरे प्रकार का देव और भूत जीव के शरीर के हृदय के सम्वन्ध से ही उत्पन्न होते हैं इसलिये इनको जैव कहते हैं । इस प्रकार देव और भूतों के जो तीन भेद है उनमें देवता को लेकर सूक्ष्मशरीर कहा जाता है । ३ - स्थूलशरीर किन्तु इन्हीं तीनों भेदों में तीनों भूत भागों को लेकर तीन स्थूलशरीर भी जीवों में कहे जा सकते हैं । इन तीनों स्थूलों के अतिरिक्त एक चोथा और भी स्थूलशरीर उत्पन्न होता है वह माता - पिता के शुक्र शोणित से वनकर उन तीन स्थूल शरीरों में शामिल हो जाता है । इसी चौथे स्थूल शरीर को हम लोग स्पष्ट रूप से देखा करते हैं इसी चौथे के अन्तर्गत जैव, आसङ्गिक और प्रौदयिक भी स्थूलशरीर विद्य - ( \ मान रहते हैं । परन्तु इन चारों स्थूल शरीरों में माता - पिता से आये हुए चौथे स्थूलशरीर का आत्मा से सम्बन्ध दुर्बल रहता है इसलिए इस चीथे स्थूलशरीर के जीर्ण होने पर जैसे सर्प अपनी जीर्ण त्वचा को छोड़कर निकल जाता है उसी प्रकार चौथे स्थूलशरीर को छोड़कर जीव आत्मा बाहर निकलता है और श्रपनी गति को जाता है इसी को मृत्यु कहते हैं । किन्तु इस जीव आत्मा के साथ तीन स्थूलशरीर तीन ही सूक्ष्मशरीर और दो कारण शरीर मरने के पश्चात् भी बने रहते हैं और इन्हीं शेष शरीरों के द्वारा जीवात्मा की भिन्न - भिन्न लोकों में गति होती है और जन्म लेते समय भी इन शरीरों को साथ लाता हुआ जीवात्मा चौथे प्रकार के नये स्थूलशरीर में प्रवेश करता है । त्रिविध - शरीर - समन्वय इस प्रकार विचार करने से जीव आत्मा में १ - कारणशरीर, २ - सूक्ष्मशरीर, ३ - स्थूलशरीर ये भेद से सिद्ध होते हैं । जिनमे स्थूलशरीर ये हैं - १ - प्रौदयिक, २ - प्रासङ्गिक, ३ - हार्द, ४ - माता- पितृज । जिनमें माता- पितृज ही शरीर को प्रायः साधारण बुद्धि से मुख्य स्थूलशरीर समझते हैं क्योंकि यही स्पष्ट ' रूप से दीखता है और ऊपर कही हुई ग्रात्मा अन्तिम पांच चितियां भी इसी स्थूलशरीर के ग्राश्रय से उत्पन्न होकर आत्मा के तीसरे उपसर्ग होते हैं । तीनों प्रकार के भुतात्मा या तीनों लोक के भेद से शरीर के विन्यास का भेद और ७ धातुत्रों का विन्यास और ७ प्रकार के प्राण तथा तीनों प्रकार के वेद में सब इस स्थूलशरीर के होने पर ही स्पष्ट रूप से भासते हैं इसलिए यह स्थूलशरीर ही ग्रात्मा का तीसरा उपसर्ग है । इसी उपसर्ग बन्धन से विरक्त होकर श्रात्मा इस स्थूलशरीर को छोड़कर लोकान्तर में जाता [ २७१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान है और इसी को मृत्यु कहते हैं । इस मृत्यु से यद्यपि यह चौथा स्थूल शरीर सर्वथा छूट जाता है तथापि अवशिष्ट तीनों स्थूल शरीर श्रात्मा से नहीं छूटते उनका बन्धन मृत्यु के पश्चात् भी ग्रात्मा स्वप्न अवस्था ` के अनुसार शरीर धारण किये हुए रहता और उसमें २ कारणशरीर ३ सूक्ष्म या ३ ही स्थूल शरीर भी बने रहते हैं । कितने ही शङ्का करते हैं कि हृदय विन्यास इस चौबे स्थूल शरीर में ही हो सकता है इसलिए उसको छूटने पर मृत्यु के पश्चात् हृदय नहीं रहता इसलिए हार्द स्थूलशरीर या हार्द सूक्ष्मशरीर नहीं होना चाहिये किन्तु विचार से सिद्ध हुआ है कि हृदय का भाग उन तीनों स्थूलशरीरों में भी होना - सम्भव है क्योंकि वह शरीर वासनामय है मृत्यु के पश्चात् भी ग्रात्मा जिस शरीर को छोड़ जाती है उसकी वासना रहने के कारण उसी प्रकार का शरीर उन तीनों भूतचितियों से भी बना लेता है यह बात केवल कल्पना ही नहीं है प्रत्युत स्वप्न ग्रवस्था में इसका वाह्य शरीर के अनुरूप ही बना हुआ नया शरीर प्रत्यक्ष में देखा जाता है और वह शरीर जाग्रत न रहकर स्वप्न में ही दीखता है इसलिए स्वप्न -काल में ही वासना से उसका बनाया जाना पाया जाता है । इसलिये श्रुति भी स्वप्न में उसका बनाना स्वीकार करती है | इसी स्वप्न के अनुसार मृत्यु के पश्चात् भी इन्हीं भूत सामग्रियों से उसी वासना द्वारा उसी प्रकार शरीर का बनाया जाना संभव है अब देखना चाहिये कि जब स्वप्न के शरीर में हृदय है और उसी हृदय के द्वारा हर्ष, विषाद, चिन्ता, शोक आदि जगत् के सब व्यवहार किये जाते हैं तो मृत्यु के पश्चात् भी उसी प्रकार के शरीर से आत्मा का चलना फिरना, हर्ष, शोक आदि सब व्यवहार होना संभव है इसका विस्तार पूर्वक वर्णन आगे ग्रात्म गति के प्रकरण में किया जायगा, यहां इतना ही कहना पर्याप्त है कि यदि स्वप्न के भौतिक शरीर में हृदय है मृत्यु के पश्चात् भी भौतिक शरीर में है और हृदय होने से हार्द सूक्ष्म या हार्दस्थूल दोनों ही शरीर हो सकते हैं । ये सूक्ष्म या स्थूल दोनों ही शरीर दृढ़ बन्धन होने के कारण ग्रात्मा में चिरकाल तक रहते हैं । अर्थात् ग्रात्मा की मुक्ति न होने तक रहते हैं अथवा यों समझें कि इन्हीं दोनों शरीरों के बन्धन के छूटने को मुक्ति कहते हैं इस मुक्ति के पश्चात् भी औदकि सूक्ष्मशरीर या स्थूलशरीर बना ही रहता है । उसी शरीर से वह ग्रात्मा सार्वकाम्य परमेश्वर्य का परमा-नन्द भोग करता है इसलिये इस मुक्ति को सगुण मुक्ति कहते हैं । किन्तु यदि किसी कारण से यह प्रद यिक तीनों शरीर भी आत्मा से छूट जावे तो वह सच्चा मुक्ति अर्थात् जिसको परम धाम कहते हैं प्राप्त हो जाता है और वह आत्मा आनन्द का भोग न करके स्वयं आनन्द रूप हो जाता है इस अवस्था में आत्मा शरीर होकर क्षर, अक्षर दोनों से प्रतीत पर पुरुषोत्तम श्रव्यय हो जाता है वही सगुणमुक्ति ईश्वर ( अक्षर ) की उपासना से सिद्ध होती है । उपासना के सब शास्त्र इसी मुक्ति के लिए सब उपाय बनाते हैं किन्तु निर्गुण मुक्ति इन उपासना के उपायों से सिद्ध नहीं हो सकती उसके लिए ज्ञानकाण्ड का आश्रय लेना होता है | ज्ञान शास्त्र ही निर्गुण मुक्ति के उपायों को दिखाता है और वह उपाय केवल ग्रात्मज्ञान है और कुछ नहीं इसलिए श्रुति कहती है-' तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' अर्थात् — उसको ही जानकर मुक्ति को प्राप्त होता है और कोई रास्ता जाने को नहीं है । [ २७२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान यह निर्गुणमुक्ति एक ही प्रकार की है जिस प्रकार सगुणमुक्ति को निःश्रेयस कहते हैं उसी प्रकार निर्गुणमुक्ति को ग्रपवर्ग कहते 1. पञ्चात्मसंस्था भृगुवल्ली कठश्रुति या तैत्तिरीयक श्रुति के अनुसार पांच कोश या पांच चिति कहकर जो ग्रात्मा में पांच विभाग किये गये हैं उनमें श्रानन्द, विज्ञान, मन इन तीनों को मन शब्द से ही यदि व्यवहार करें तो आत्मा के तीन ही विभाग सिद्ध होते हैं इसीलिए वृहदारण्यक श्रुति में आत्मा को मनोमय, प्राणमय, वाङ्मय ही कहते हैं इनमें मन दिव्यात्मा है । द्यौ में जो कुछ उत्पन्न होते हैं वे प्रायः मन प्रधान ही होते हैं । दूसरा प्राण ग्रान्तरिक्ष प्रात्मा है, अन्तरिक्ष के सब पदार्थ प्रारण प्रधान होते हैं और तीसरा वाक् पार्थिव ग्रात्मा है अर्थात् पृथ्वी पर सब पदार्थ वाक् प्रधान ही उत्पन्न होते हैं इस प्रकार तीन रस कहें या पांच रस कहें ये सब मिलकर एक ही आत्मा सिद्ध होता है । परन्तु वह आत्मा १ चाकू प्रधान, २- प्रारण प्रधान, ३ मन प्रधान, ४ - विज्ञान प्रधान और ५- आनन्द प्रधान होने के कारण पांच प्रकार से विभक्त किया जा सकता है । इन पांचों के क्रम से नाम ये हैं - १ - भूतात्मा, २– मूत्रात्मा, ३– महानात्मा, ४ - क्षेत्रज्ञात्मा, ५ - परमात्मा ये पांचों ही परस्पर संश्लिष्ट ( मिले हुए ) रहते हैं । इस ग्रानन्दमय आत्मा को १ - परोरजाः, २ - विरजा, ३ - सत्यस्य सत्य, ४ - भूमा, ५ - चिदात्मा भी कहते हैं ॥ १ ॥
विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा को १ - हार्द श्रात्मा, २ - सत्यात्मा, ३ - महाजन ४ – सर्वेश्वर, ५ - वसु-धान् भी कहते हैं ॥ २ ॥
मनोमय महानात्मा को १ - षोड़शी भी कहते हैं ॥ ३ ॥
प्राणमय सूत्रात्मा को १ - तेजन और २ - वामन भी कहते हैं ॥ ४ ॥
पांचवीं अन्नमय भूतात्मा को १ - हिरण्मय भी कहते हैं ॥ ५ ॥
इनमें पूर्व २ आत्मा का पर २ आत्मा शरीर बना रहता है इस प्रकार पाँच श्रात्मा पृथक् - पृथक् इस शरीर में अपना काम करते हैं । इनमें सूत्रात्मा और चिदात्मा ये दोनों ही व्यापक होने के कारण श्रव्यभिचारी रूप से सर्वत्र ही विद्यमान रहते हैं - यह स्वतः ही सर्वत्र उपलब्ध होते हैं, इसी कारण बहुत से ऋषियों ने विशेष रूप से इनकी चर्चा न करके मुख्यतया तीन ही श्रात्माओं का विचार किया है - क्षेत्रज्ञ, महान् और भूतात्मा इन तीनों को मिलाकर किसी ने जीवात्मा माना है और किसी ने क्षेत्रज्ञ और महान् को पृथक् करके केवल भूतात्मा को ही जीवात्मा माना है । यद्यपि तीनों ही ग्रात्मा इस देह् का अभिमान रखते हैं अर्थात् देह के भेद से ये भिन्न - भिन्न हो जाते हैं दूसरे देह के आत्मा पर दूसरे देह का कुछ धर्म संक्रान्त नहीं होता इसलिये ये तीन ही आत्मा विशेष रूप से विचार के योग्य हैं, परन्तु इस जीव शरीर में चिदात्मा और सूत्रात्मा भी अवश्य ही नियम से विद्यमान रहते हैं इन पांचों में भूतात्मा पृथ्वी से प्राता है महानात्मा चन्द्रमा से क्षेत्रज्ञात्मा सूर्य से सूत्रात्मा अन्तरिक्ष से और चिदात्मा तीनों लोकों से बाहर जो परोरजाः जा कर दिव्य ज्योतिमय कोई महासूर्य है उससे इस शरीर में आता है । [ २७३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान परमात्मा यह कहा गया है कि जो लोकत्रयातीत कोई महासूर्य है उससे जो रस हमारे शरीर में ग्राता है उसको चिदात्मा या परमात्मा कहते हैं उसका क्रम यह है कि हम जिस पृथ्वी पर बसते हैं और उसके चारों ओर जिस प्रकार चन्द्रमा परिक्रमा करता है वैसे ही यह पृथ्वी भी सूर्य की परिक्रमा और इस प्रकार के बहुत से सूर्य एक अभिजित् तारे को जिसको ब्रह्मा कहते हैं, और भी विद्युत, इन्द्र, सोम, वरुण कितने ही उस अभिजित् की परिक्रमा करते हैं । उन सबको साथ लिये हुए यह ब्रह्मा एक दूसरे ज्ञानमयं ज्योति वाले महासूर्य की परिक्रमा करता है, वह अभिजित् सूर्य, चन्द्रमा यादि सभी ग्राकाशों का प्रका-शक है, इसीलिये ज्योतिपांज्योति कहलाता है । उसकी यह दिव्यज्योति जहां तक जाती है वही एक महान जगत् है उस जगत् का प्रभु होने के कारण उसी महासूर्य को ईश्वर कहते हैं । उस ईश्वर की जो किरणें हैं वे प्रायु और अमृत कहलाती हैं और वे ज्ञानमय हैं श्रानन्दमय है, सत्तामय है । जगत् के प्रत्येक पदार्थ में जो सत्ता दीखती है वह वहीं से आती है और जितने ज्ञान जगत् के स्वरूपों का प्रकाश करते हैं, प्रकाश या अन्धकार का भेद दिखाते हैं वे सब ज्ञान भी वहीं से जगत् में ग्राते हैं । जितना आनन्द प्रत्येक वस्तु में हमको मिलता है वह ग्रानन्द भी वहीं से ग्राकर सर्वत्र व्याप्त हुआ है । जितने भूत या देवता जहां कहीं हैं वे सब उसी मूल कारण से उत्पन्न हुए हैं और उसी से पकड़े हुए उसी के चारों ओर उसी की उपासना करते हुए यत्र तत्र विद्यमान हैं । भूत और देवताओं के प्राश्रय होने के कारण यद्यपि वह अक्षर आत्मा है तथापि पर आत्मा का सव रस उसमें विद्यमान है अर्थात् ग्रानन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् इन सब का भी वह घन है । इतना ही परात्पर का रस भी जगत् में हमको जहां कुछ मिलता है उसी के द्वारा उपलब्ध होता है । तात्पर्य यह है कि हमारे लिये वह ईश्वर परात्पर आत्मा, पर ग्रात्मा और ग्रक्षर ग्रात्मा इन तीनों ग्रात्मानों को हमें एक साथ देता है इसलिये हम इस एक परमात्मा को तीन रूप से विभक्त करके देखते हैं । अर्थात् परात्पर ग्रात्मा पर या ग्रव्यय जिसे सत्य या ग्रन्तर्यामी भी कहते हैं और तीसरा अक्षर ग्रात्मा इन तीनों में परात्पर आत्मा का सत्ता, चेतना, ग्रानन्द इन तीनों के अतिरिक्त जो एक शान्त आनन्द है वही उसका मुख्य और समृद्धानन्द, चेतना, अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान और सत्ता ये तीनों ग्रव्यय आत्मा का रस है इसी श्रव्यय ग्रात्मा को सत्य कहते हैं । सत्य उसी को कहते हैं जो प्रत्येक वस्तु में एक प्रकार की नियति ( नियम ) पाई जाती है जो पानी को नीचे झुकाती है, आग को ऊंचे चढ़ाती है, हिरण के दोनों सींग मस्तक के मध्य भाग से दोनों छोर समान मिति और समान क्रम से झुकाती है, वदरफल के एक ही स्थान से निकले हुए दो कण्टक एक सीधा जाता है और दूसरा गुड़जाता है इत्यादि इत्यादि इस सत्य के ग्रनन्त उदाहरण हैं । यह सत्य प्रत्येक वस्तु के अन्दर बैठा हुआ उस वस्तु का नियमन करता है । अर्थात् उसको उन वस्तु के नियम पर चलाता है, इसलिये उसको अन्तर्यामी कहते हैं, यह अन्तर्यामी उसी अव्यय आत्मा सत्य का नाम है और तीसरा अक्षर आत्मा से नाम, रूप, कर्म जगत् प्रत्येक वस्तु में आते रहते हैं, इस प्रकार उस चिदात्मा को भिन्न भिन्न तीन आत्मा समझना चाहिये, अपर ग्रात्मा सत्य या अन्तर्यामी श्रात्मा और शान्त ग्रात्मा ये तीनों जिस ईश्वर से हमारे पास आते हैं उनकी स्तुति में वेद कहता है— [ २७४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * " यस्मादर्वाक् संवत्सरो होभिः परिवर्तते । तद्द ेवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥ " ( वृ ० आ ० ४।४ )
हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् ।
तच्छुभ्र ज्योतिषां ज्योतिस्तद् यदात्म विदोविदुः ॥
न तत्र सूर्याभाति न चन्द्र तारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ब्रह्मं वेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् दक्षिणत श्रोत्तरेण ग्रधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्म वेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् न जायते स्त्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः जो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे
सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।
वचनेषु च सर्वेषु यन्नव्येति तदव्ययम् ॥
दिव्योहमूर्तः पुरुषः स वाह्यभ्यन्तरोह्यजः ।
प्राणो ह्यमनाः श्रुयोह्यक्षरात् परतः परः ॥
शान्तात्मा ऊपर लिखे अनुसार जो चिदात्मा तीन रूप से कहा गया है उन तीनों का नाम इस प्रकार सम-झना चाहिये: - शान्तात्मा, सत्यात्मा, शारीरिक आत्मा । इनमें शान्तात्मा मानन्द स्वरूप है । ये दो प्रकार का है पूर्व औौर पर इनमें पूर्व तो वह है कि जिसका सृष्टि के पूर्व में होना अनुमान किया जाता है अर्थात् जिस शान्ति रूप में अकस्मात क्षोभ उत्पन्न होकर यह सृष्टि का रूप उत्पन्न हुआ है वही पूर्व शान्त है किन्तु यह क्षोभ उत्पन्न होकर जो जगत् का रूप इस समय दीखता है वह फिर शान्ति में आ जाते हैं वही अवस्था पर शान्त है । शान्तात्मा से उत्पन्न जो प्रथम पर ग्रात्मा है उसके तीन अवयव हैं - मन, प्राण और वाक् इनमें मध्यवर्ती प्राण किया करता है मन और वाक् मे दोनों अक्रिय है किन्तु प्राण यदि वाक् के साथ संयुक्त होता है तब प्रवृत्ति रूप किया करता है अर्थात् एक से दो, दो से चार इस प्रकार रूप बदलकर वस्तुओं के नाना भेद उत्पन्न करते हैं जिसमें जगत् की वृद्धि होती है । उन सब भिन्न - भिन्न रूपों में आकाश के अनुसार मन भी व्याप्त हो जाता है यही ग्रात्मा की जाग्रत अवस्था है और इसे ही जगत् कहते हैं और इस प्रवृत्ति समय के आत्मा को समृद्धानन्द कहते हैं । किन्तु वह प्रारण यदि मन के साथ संयुक्त होता है तो निवृत्ति क्रिया करता है अर्थात् जितने पदार्थ भिन्न भिन्न उत्पन्न हुये थे उनकी स्वरूप बनने वाली क्रिया को निरोध करके ४ से २ और २ से १ इस [ २७५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * हुए प्रकार उनकी सृष्टि स्वरूप को नष्ट करके प्राकृत स्वरूप अर्थात् उनके कारण का स्वरूप देते ये भेद बुद्धि का नष्ट करता है । इस प्रकार धीरे धीरे एक रूप में ग्राकर भिन्न भिन्न अपने नाम रूप कर्मों को छोड़ देते हैं । जिस प्रकार भिन्न भिन्न नाम रूप कर्मवाली सहस्रों नदियां समुद्र में जाकर अपने नाम रूप कर्मों को छोड़ कर समुद्र में लय हो जाते हैं उसी प्रकार इस जगत् के सब भाव जिस महा समुद्र में जाकर अपने नाम रूप कर्मों को खो बैठते हैं वहीं पर शान्तात्मा है वास्तव में यह शान्तात्मा एक ही है । वही इस जगत् का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण है किन्तु प्रतिष्ठा की दशा में वह समृद्धानन्द कहलाता है और प्रभव को पूर्व शान्ति और परायण को परशान्त कह करके बल व्यवहार किया गया है । वास्तव में यह शान्तात्मा तीनों अवस्था में एक है इसी शान्तानन्द की स्तुति में ग्रानन्दवल्ली कठश्रुति कहती है कि-आनन्दाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति, श्रानन्द प्रयन्त्यभि संविशन्ति " ॥ र भी वाजसनेय श्रुति कहती है कि-“ अस्यैवानन्दस्य अन्धानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति " सत्यात्मा सत्यात्मा जो वास्तव में अव्यय श्रात्मा का स्वरूप है वह तीन प्रकार से हमारे पास अर्थात् जगत् में व्याप्त होता है । सत्ता, शक्ति और ग्रर्थ इनमें वस्तुतः शक्ति ही एक मुख्य धर्म है ये शक्तियाँ ग्रनन्त होने पर भी उन संपूर्ण अनन्त शक्तियों को घिलमिल करके यदि एक रूप में हम देखें तो उसी का सत्ता यह नाम दिया गया है, अर्थात् सर्वं शक्ति धन को ही सत्ता कहते हैं, जो कि सर्व जगत में सर्वदा व्यापक है । इन्ही सत्ता रूपी अपरिमित शक्तियों के घन में से कितने ही शक्तियों को छोड़कर तथा कितनों ही को लेकर जो भिन्न भिन्न एक एक वस्तु उत्पन्न हुए हैं उनके वे परिमित शक्तियाँ ही शक्ति कहलाती हैं श्रीर ये परिमित शक्तियाँ जिस पात्र में पाई जाती है उस श्राश्रय या आधार को अर्थ कहते हैं । तात्पर्य यह है कि यह सत्यात्मा प्रथम कोई अर्थ का रूप धारण करता है वह अर्थ कितनी ही शक्तियों का प्राश्रय होता है यद्यपि वह् ग्रथं भी शक्तियों का ही पुञ्ज रूप है तथापि वे शक्तियाँ उस वस्तु के रूप बनाने में काम ग्राकर मूच्छित हो गई हैं, ग्रव वे दूसरे अर्थ पर कुछ प्रभाव नहीं डालते इसलिये अर्थ के नाम से भिन्न कहे जाते हैं | किन्तु कितनी ही परिमित शक्तियाँ उस वस्तु में जाग्रत रहकर कितने ही प्रकार के काम करती हैं उनको ही शक्ति के नाम से कहते हैं किन्तु इन सब वस्तुनों की सब शक्तियाँ जितनी इस जगत् में हैं वे सब एक दृष्टि से देखे जाकर सत्ता के नाम से कहे जाते हैं । इस प्रकार शक्ति ही के ये तीन भेद सिद्ध होते हैं वही शक्ति सत्य कहलाता है । कल्पना करो कि कुछ शक्तियाँ व्यापक सत्ता में से अलग होकर एक जगह मिल गये तो एक वस्तु का स्वरूप सिद्ध हो गया । उस वस्तु में ये तीनों सत्य विद्यमान हो गये । कुछ शक्तियाँ तो उस वस्तु के स्वरूप बनाने में बिना युक्त हुए और कुछ शक्तियाँ उस बने अर्थ में बैठकर अपना काम करने लगी । किन्तु ये दोनों प्रकार की शक्तियाँ उस व्यापक शक्ति घन से [ २७६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * निकलने के कारण अब भी उससे सम्पर्क रखती हैं । जिस प्रकार सरोवर में पानी से बुलबुला भिन्न बन-कर उस महाजन पानी से सम्पर्क रखते हुए रहते हैं । उसी प्रकार इन वस्तुओं ने भी जिस सत्ता की शक्तियों को लेकर स्वरूप धारण किया है उस सत्ता से अवश्य सम्पर्क रखते हैं । इसलिये वह वस्तु अब सत्ता का ग्रहण करने से उत्पन्न हुआ कहा जाता है और सत्ता वाला होने से वह ' है ' ऐसा व्यवहार होता है और यह ' है ' अपना ही उस वस्तु की सत्यता है । अक्षर ग्रात्मा पाँच प्रकार की आत्माओं में से सबसे प्रथम श्रौर मुख्य जो चिदात्मा कहा गया है उसके तीन भेद कहे गये थे । १ शान्त, २ सत्य और ३ ग्रक्षर जिनमें शान्त और सत्य का विचार हो चुका और तीसरा ग्रक्षर ग्रात्मा वही है जिसके अन्तर्गत परात्पर को लिये हुये पर आत्मा है । और जिसके प्रद-यिक तीन शरीर हैं, और जिसके आधार पर भूतात्मा रहता है, और जिसको आसङ्गिक और जैव तीन तीन शरीर नये उत्पन्न होते हैं । वह अक्षर आत्मा हमारे शरीर में उसी चिदात्मा से प्राप्त होता है इस तरह तीनों प्रकार की चिदात्माओं का निरूपण करके अब हम सूत्रात्मा का विचार करते हैं । सूत्रात्मा उस ज्योतिषा ज्योति परज्योति से रश्मियाँ आकर हमारे शरीर में अथवा संपूर्ण जगत् में जो प्रोत प्रोत हो रही हैं उसका कारण सूत्रात्मा है | दिव्य ज्योति असङ्ग होने पर भी उनमें व्याप्त सूत्रात्मा के कारण यह संपूर्ण जगत् उस दिव्या ज्योति की रश्मि में गुथा हुआ है । उसी सूत्रात्मा के कारण वह दिव्य ज्योति भी सूत्र बन गया है । जिसके लिये गीता में कहा है । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव । 7 ग्रर्थात् सूत्र में मणियों के अनुसार मुझमें अर्थात् चिदात्मा में यह सब प्रोत अर्थात् गुथा हुआ है || १ || इसी प्रकार सत्य, अर्थात् नाम, रूप, कर्म ये तीनों मृतको अर्थात् प्राण को आवरण करके वस्तु का स्वरूप बनाते हैं । इसमें सत्य और अमृत को परस्पर बाँधने वाला सूत्रात्मा है ॥२ ॥
इसी प्रकार ये तीनों लोक परस्पर में इसी सूत्रात्मा से बँधे होकर त्रैलोक्य रूपी एक संस्था संपन्न हुई है ॥३ ॥
और ऐसे अनन्तानन्त त्रैलोक्य किसी एक सूत्र में बँधे होकर एक महा ब्रह्माण्ड अथवा महाविश्व का रूप उत्पन्न करते हैं ॥ ४ ॥
जीव उपेश्वर में तथा उपेश्वर परात्पर में अथवा सब उपेश्वर एक ईश्वर में दृष्टि से और समष्टि से बँधे हुए हैं और ईश्वर से ये सब ग्रनुगृहीत हैं ॥ ५ ॥
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* ब्रह्मविज्ञान इसी प्रकार यह देह भी भिन्न भिन्न अपने तन्त्र रखते हुए नाना प्रकार के देवताओं से और भूतों भिन्न भिन्न जाति ( ढेर-इसी सूत्रात्मा का प्रभाव से परस्पर में बन्धन पाकर एक निकाय बन गया है । इनमें सब पदार्थों की थोक ) के होते हुए भी जो सबको मिलाकर एक तन्त्र से हो रहा है यह भी है ॥६ ॥
सूर्य के प्रारण पृथ्वी से अपान दोनों भिन्न भिन्न जाति के दो रस इस शरीर में ग्राकर जो इस तीसरे व्यान पर निबद्ध होता है जिसके कारण इस शरीर में से वायु एक दम निकल न जाकर नियमा-नुसार श्वास - प्रश्वास की क्रिया करता है यह भी सूत्रात्मा ही का प्रभाव है || ७ || इस शरीर में क्षेत्रज्ञात्मा सिर में रहता है और शुक्र और शोणित में महान् श्रात्मा रहता है | भिन्न भिन्न स्थानों में रहने वाले इन दोनों ग्रात्मानों का हृदय में रहने वाले भूतात्मा के साथ जो घनिष्ट संबन्ध पाया जाता है यह भी सूत्रात्मा ही के कारण से है ॥ ॥ यह सूत्रात्मा व्यान रूप से इस शरीर में हृदय स्थान में बैठकर अपने भिन्न भिन्न प्रकार के सूत्रों से संपूर्ण अङ्ग प्रत्यग्रङ्गों को संपूर्ण भूतमात्रा, प्राणमात्रा, प्राज्ञमात्राओं को यथा स्थान संनिवेश करके स्तब्ध र संव्ध रखता है । यही सूत्रात्मा इस शरीर से ग्रथवा इस जगत् में प्रधान ग्रात्मा कहना चाहिये क्योंकि इसी के कारण अन्यान्य कोई भी आत्मा अपने अपने स्थान से विचलित न होकर वह एक दूसरे से परस्पर - मिलकर इस देहचक को अथवा संसारचक्र को भली प्रकार से चला रहे हैं । यह सूत्रात्मा सर्व - जगत् व्यापक है | यह किसी खास पिण्ड से न ग्राकर अन्तरिक्ष से आता है || 8 || इसी सूत्रात्मा के प्रभाव से यह चिदात्मा जो ज्ञान स्वरूप है वह चयन के द्वारा ४ स्थान पर संक्रान्त दीखता है अर्थात् इस चेतना के चार स्वरूप होते हैं । शान्त, बुद्ध, मत भूत इनमें चिदात्मा जो शुद्ध अपने रूप में है वह चिति- होने से प्रथम शान्त कहलाता है । वह ज्ञान रूप होने पर भी निर्विषयक होने से अपरिच्छिन्न र स्वतन्त्र है । किन्तु यही चेतना किसी न किसी किसी विषय का अवलम्बन करके विज्ञान का रूप धारण करता है । किन्तु विषय के ऊपर ग्रारूढ़ होकर भी प्रसङ्ग स्वभाव होने के कारण विपय के धर्मों से उसका कुछ भी सम्पर्क नहीं होता । विषय से बन्धन न होने के कारण वह सहज ही भिन्न भिन्न विषयों को ग्रहण करता और छोड़ता रहता है, इसी विज्ञान को बुद्ध कहते हैं । यह विज्ञान भी एक दूसरे प्रज्ञान पर प्रतिविम्बित होता । जिस प्रकार जल या दर्पण आदि स्वच्छ पदार्थ सूर्यादि विम्बों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं, उसी प्रकार चन्द्रमा के रस रूपी प्रज्ञान भी स्वच्छ होने के कारण उस विज्ञान के विम्ब को ज्यों का त्यों ग्रहण कर लेता है । उसी प्रतिबिम्ब को चिदाभास कहते हैं । जिस प्रकार जल में प्रतिविम्ब, ग्रक्लेद्य, ग्रशोष्य, अच्छेद्य, श्रदाह्य, ग्रहस्तनेय है उसी प्रकार बह चिदाभास भी है । यह प्रज्ञान -मन शब्द से प्रसिद्ध है, इसलिये मन पर ग्राये हुए चिदा-भास को मतज्ञान कहते हैं और वह विषय मत कहा जाता है । यह प्रज्ञान ही सांख्यशास्त्र के अनुसार सत्व कहा जाता है । यह सत्व दो प्रकार का है । विशुद्ध सत्त्व अर्थात् जिसमें रज, तम का संसर्ग नहीं है बह सत्व ग्रक्षरात्मा में ग्रर्थात् ईश्वर के ज्ञान में पाया जाता है । किन्तु दूसरा कलुषित ( मलिन ) सत्त्व अर्थात् जिसमें रज, तम का मेल है वह जीव के ज्ञान में देखा जाता है और वह विचाली है अर्थात् L २७८ ]