ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 311–320
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 311–320
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* ब्रह्मविज्ञान अपने ही ज्ञान का अपने पर विश्वास नहीं होता । अथवा अपने निश्चय को पीछे कभी भूल मानता है । यह तीसरा ' तमज्ञान ' हुआ । इन दोनों में अर्थात् बुद्ध ज्ञान, मत ज्ञान में यह ज्ञान अपने ज्ञान के स्वरूप में भासता है । किन्तु शान्त दशा में वह ज्ञान होने पर भी उस रूप में नहीं भासता । इसी प्रकार चौथे भूत रूप में भी यह चेतना ज्ञान के रूप नहीं भासता । किन्तु अन्तर यह है कि शान्त ज्ञान निर्विषयक है, इसलिये ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट नहीं होता । किन्तु भूत की दशा में इन भूतों से प्रत्यन्त आक्रान्त होने के कारण ज्ञान स्पष्ट नहीं भासता । जिस प्रकार पानी में अधिक मृत्तिका डालने से पानी का प्रवहण धर्म जाता रहता है, उसी प्रकार इन भूतों में भी भूतमात्रा की अधिकता से प्रज्ञान का ज्ञान धर्म जाता रहता है । तात्पर्य यह है कि भूत दो प्रकार का है । एक बाह्यभूत जैसे लोष्ट ( ढेला ) पाषाण आदि तथा दूसरा शरीरभूत जो प्राणी के शरीर में अस्थि, मांस, मज्जा, त्वचा आदि रूप में दीखता है । यह बिना चेतना के सम्बन्ध के उत्पन्न नहीं होता । इनमें चेतना का अंश रहने पर भी वह चेतना स्पष्ट नहीं भासती किन्तु प्रारणी के देह त्याग होने पर जब इन अवयवों में से वीरे धीरे चेतना निकवने लगती है तो ये अस्थि, मांस, मज्जा आदि भी वाह्यभूत के अनुसार मिट्टी हो जाते हैं किन्तु जब तक प्राणी जीवित रहता है तब तक इन अवयवों में मिट्टी का रूप न दीखकर जो नया रूप दीखता है यह प्रज्ञान के सम्बन्ध के कारण से ही है । यही उस चेतना का चतुर्थरूप है । इस प्रकार वह चेतना अपने शुद्ध शान्त स्वरूप से धीरे धीरे कलुपित होकर वुद्ध, मत्त, भूत तक प्राकर भिन्न स्वरूप धारण करता । ये सब इसी सूत्रात्मा के प्रभाव से होता है ॥ १० ॥
क्षेत्रज्ञ आत्मा सत्यात्मा का वर्णन हो चुका है, अब यहां से क्षेत्रज्ञ श्रात्मा कही जाती है । क्षेत्रज्ञात्मा भूतभृत् है अर्थात् भूतों को पकड़ने वाली है, किन्तु भूतों से पकड़ा हुआ नहीं है । यह सब कर्मों से सम्बन्ध रखता है किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता । यह हम को सूर्य से मिलता है इसलिये विज्ञानात्मा कहलाता है । जिस प्रकार आकाश में वा द्यौ में जितने देवता हैं सब सूर्य की रश्मि में रहते हैं और सूर्य के ग्राश्रित हैं उसी प्रकार इस शरीर में जितने देवता हैं सब इसी के प्राश्रित रहते हैं । इसी क्षेत्रज्ञात्मा को सांख्य में पुरुष कहा है और महान् आत्मा को सांख्यवालों ने इसी क्षेत्रज्ञ पुरुष की प्रकृति स्थिर किया है । प्रकृति का जिस प्रकार जिन धर्मों से सांख्य में वर्णन हुआ है वह सब महान् आत्मा से समझना चाहिये किन्तु पुरुष के लिये जिस प्रकार का वर्णन सांख्य में हुआ है वह सब क्षेत्रज्ञ के लिये समझना चाहिये । उसका वर्णन विस्तार के कारण यहां नहीं किया जाता है । मैत्रायणी श्रुति में इक्ष्वाकुवंशी राजा मस्तु को शाकायन्य महर्षि ने जिस प्रकार क्षेत्रज्ञ का स्वरूप निरुपण किया है वा कपिलदेव के सांख्य दर्शन में पञ्चशिखादि आचार्यों ने जिस प्रकार उसका विस्तार दिखाया है सो सब उन्हीं के ग्रन्थो से देखना आवश्यक है । उनकी यहां पुनरावृत्ति करना आवश्यक नहीं है | १ - योनि, प्रतिष्ठा, आशय इस क्षेत्रज्ञात्मा को ' महाजन ' वा ( हृद्य ) कहते हैं । इसकी योनि सिर है, हृदय इसकी प्रतिष्ठा है, और हृदय के भीतर मनोमय दहराकाश और हितानाड़ी का अन्तरा कोई इसका आशय है । यद्यपि [ २७ ९ ]
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* ब्रह्मविज्ञान यह भी जीवात्मा का छोटा भाग है तथापि जिन के मत में भूतात्मा ही जीव कहा जाता है उनके विचार से यह प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में विराजमान स्वतन्त्र ईश्वर है । यह अपनी माया से यन्त्रारूढ़ भूतों को परिभ्रमण करता हुआ इस भूतात्मा जीब पर वा उसके शरीर पर पूर्ण श्राधिपत्य रखता है । * जो कुछ मेरा विशाल ज्ञानमण्डल है, जिस ज्ञानमण्डल में मेरे शरीर सहित यह संपूर्ण चराचर जगत् भास रहा है, यही ज्ञान विकास इस क्षेत्रज्ञात्मा का साक्षात स्वरूप है और जितने भिन्न - भिन्न प्रकार की मेरी बुद्धियाँ हैं वे इसी क्षेत्रज्ञ रूपी सूर्य की रश्मियाँ हैं । २- ग्रालम्बन सर्वव्यापक चिदात्मा सूर्य के रस पर ग्राकर उसी रस के परिच्छिन्न होता है । श्रीर रस के संयोग से चिदात्मा का स्वरूप भी बदल जाता है । वही उन दोनों का संम्मिलित स्वरूप विज्ञान के नाम से कहा जाता है । उस विज्ञान का परिच्छिन्न बिम्ब ही इस शरीर के भीतर चन्द्रमा के रस से उत्पन्न हुए महान् ग्रात्मा पर प्रतिबिम्बित होता है और उसी को सत्वगुण कहते हैं । यह महान् ग्रात्मा सोम रस होने के कारण जल वा काच के अनुसार स्वच्छ होता है उस महान् ग्रात्मा का सत्व भाग भूतात्मा के प्रज्ञान भाग में मिलकर उस प्रज्ञान ग्रात्मा को इतना स्वच्छ कर देता है कि जिस से उस प्रज्ञान पर वह पहला विज्ञान आत्मा प्रतिबिम्बित हो जाता है । प्रतिम्बि की रश्मि भी विम्व के अनुसार फैलने का स्वभाव रखती है तथापि जिस ओर उसका आलम्बन जल दर्पण आदि द्रव्य रहता है उस ओर रश्मियाँ प्रतिरुद्ध रहती है । इसी नियम के अनुसार शरीर में भी प्रज्ञान रूक जाता है प्रतिबिम्बित विज्ञान आत्मा की रश्मियाँ पीठ की ओर जाकर सामने की ओर ऊपर नीचे चारों ओर व्याप्त होती है । जिससे हमारे ज्ञान की प्रवृति जिन इन्द्रियों से होती हैं वे सब ज्ञानेन्द्रियाँ मस्तक के एक ही छोर में देखी जाती हैं । यद्यपि हमारा ज्ञान इन्द्रियों से होता दीखता है तथापि उन इन्द्रियों में प्रज्ञान भासित होता है और उस प्रज्ञान में विज्ञान प्रतिविम्वित है । वह विज्ञान सूर्य का वह रस है कि जिसमें चिदात्मा का ग्रंश भरा हुआ है । उसी चिदात्मा के बल से विज्ञान आत्मा और प्रज्ञान आत्मा भी ज्ञानमय होकर हमारे हृदय में वा इन्द्रियों में निवास करता है । इसी से हम चेतन कहलाते हैं और प्रज्ञान पर जो विज्ञान का प्रतिबिम्ब है उसी को चिदाभास कहते हैं, और इस चिदाभास को ही बहुत से विद्वानों ने जीव-आत्मा शब्द से कहा है । ३- नाड़ी संचार ऊपर ग्राकाश में सूर्य मण्डल में जो हिरण्मय चमकता या टिमटिमाता हुग्रा पुरुष है, वही आत्मा मेरे इस शरीर की भी ग्रात्मा है । जिस प्रकार सूर्य पुरुष इस ब्रह्माण्ड शरीर की ग्रात्मा है । उसी प्रकार वही सूर्य पुरुष छोटे रूप में मेरे हृदय में हार्द पुरुष होकर मेरे शरीर की ग्रात्मा होता है वही मैं हूँ अर्थात् मैं शब्द से उसी का व्यवहार होता है । जिस प्रकार वड़े सूर्य पुरुष का प्रकाश ब्रह्माण्डमण्डल में सर्वत्र व्यापक है उसी प्रकार हमारे शरीर को हार्दपुरुष का भी प्रकाश संपूर्ण शरीर में व्यापक है इस ॐ भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया । ( गीता ) [ २८० ]
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* ब्रह्मविज्ञान शरीर स्थित प्रकाश का कभी कभी हम साक्षात्कार भी कर लेते हैं । घोर अन्धकार में जब कभी हम अपने एक नेत्र के कोण को दबाकर वा उक्साकर वारवार वक्र ( टेढ़ा ) करते हैं तो अकस्मात् नेत्र के ऊपरी ढक्कन के नीचे प्रकाश का चक्र बिजली के अनुसार चञ्चल दीख आता है । उसके मध्य में श्याम प्रदेश है, वही ज्ञान का मुख्य स्वरूप भासित होता है । उस श्याम छिद्र को ही ज्ञान का स्वरूप समझना चाहिये । उसके चारों ओर कुण्डल के अनुसार प्रकाश मण्डल दीखता है जिसका वर्ग कुछ नीली और हरी भाइ को लिये हुए एवेत है । किसी किसी का मत है कि वह प्रकाश चक्र तो प्राज्ञ आत्मा का स्वरूप है किन्तु उसके मध्य में जो श्यामछिद्र है उसी का ज्ञान विकास जो हमारे शरीर से बाहर न होकर भी बाहर के ढङ्ग पर दीखता है जो हमारे ग्राँख के श्याम तारे पर रहकर भी सम्पूर्ण जगत् के विशाल विशाल प्रदेश को बालान से भी सूक्ष्म नेत्राग्र प्रदेश में दिखा रहा है वह विशाल ज्ञान प्रकाश वास्तव में क्षेत्रज्ञात्मा का स्वरूप है यद्यपि वह भी मेरे सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त है तथापि प्राज्ञात्मा के अनुसार उसी नेत्र में उजली झलक के भीतर दीख प्राता है । अथवा जगत् का रूप दिखाने वाला ज्ञान प्रकाश अन्यान्य इन्द्रियों से बढ़ कर ग्रांख में ही भासता है । इसलिये प्राज्ञ के अनुसार क्षेत्रज्ञात्मा का भी दक्षिण नेत्र में ही लक्षित होना वेद में वर्णन किया गया है । अर्थात् वेद वार बार कहता है कि यह आकाश सूर्यपुरुष और हमारे दक्षिणनेत्र का इन्द्र पुरुष ये दोनों एक ही हैं और बायें आँख की ज्योति उस इन्द्र की पत्नी है और इन दोनों आंखों के प्रकाश का हृदयस्थान में मिलाव है । इसलिये यह भी कहते हैं कि हमारे हृदय की आत्मा और सूर्य ये दोनों एक ही वस्तु है । वेद मन्त्र है—; " सूर्यं श्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च " अर्थात् स्थावर और जङ्गम दोनों की श्रात्मा सूर्य है । जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर सूक्ष्मातिसूक्ष्म रश्मिनाड़ी फैली हुई दीखती है उसी प्रकार इस क्षेत्रज्ञात्मा का भी प्रतिष्ठा स्थान इस हृदय में चारों ओर सूक्ष्मातिसूक्ष्म धारण की हुई शरीर के सूर्य की किरणें हिता नाम की नाड़ियां चारों ओर शरीर में फैली हुई है जिस प्रकार बाहर के सूर्य की रश्मियां रक्त, पीत, हरित ग्रादि सात वर्गों की हैं उसी प्रकार इस हार्द सूर्य की भी हिता नाम की नाडियां उन्हीं वर्णों की देखी गई हैं । उन नाड़ियों में १०१ नाड़ी हृदय से सिर की ओर गई हैं, जैसा कि वेद की
ऋचा में लिखा है -शतं चैकाच हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वं मायन्नमृतत्वमेति, विष्वङ न्या उत्क्रमणो भवन्ति ॥
अर्थात् इन १०१ नाड़ियों में एक नाड़ी ठीक सरल रेखा में ब्राह्मण्ड की ओर गई है, यदि उस नाड़ी के द्वारा श्रात्मा उत्क्रमण करे अर्थात् मृत्युकाल में उसी नाड़ी होकर जीव शरीर से बाहर निकले तो वह जीव अमृतत्व अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है । किन्तु उससे भिन्न नाडी द्वारा उत्क्रमण होने से विष्वङ् ग्रर्थात् इधर उधर नाना प्रकार के स्वर्गों में जाता है वहां से फिर ग्राना पड़ता है । [ २८१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान क जिस प्रकार दो नगरों को मिलाने वाला मध्य में बहुत विस्तृत राज मार्ग फैला हुआ होता है, जिसके द्वारा इस नगर से उस नगर तक जीव आते जाते रहते हैं उसी प्रकार द्यावा पृथ्वी अर्थात् सूर्य पृथ्वी को मिलाने वाला रश्मि नाड़ियों का बना हुआ एक माहमार्ग समझना चाहिये | जिसके द्वारा सूर्य का रस क्षेत्रज्ञात्मा में और क्षेत्रज्ञ का रस सूर्य ग्रात्मा में प्रतिक्षण प्राते जाते रहते हैं, और सूर्य की आत्मा उसी मार्ग से ग्राकर क्षेत्रज्ञात्मा वना है वा क्षेत्रज्ञात्मा भी मृत्युकाल में उसी मार्ग से जाकर सूर्य श्रात्मा में सम्मिलित हो जाता है । इस प्रकार सूर्य से फैलकर हितानाड़ी में रश्मियाँ आती है, और हृदय से फैलकर सूर्य में चली जाती है । मृत्युकाल में यह क्षेत्रज्ञात्मा उल्टे जाते हुए उन्हीं रश्मियों के साथ मनोवेग के अनुसार एक दक्षिण में सूर्य तक पहुँच जाता है । यदि उसमें विद्या का प्रबल संबन्ध हो किन्तु मलिन विद्या जिसे काम कहते हैं, और काम - जन्य, कर्म और अविद्या का वो ग्रात्मा पर अधिक हो तो वह ग्रात्मा इतनी शीघ्रता से सूर्य तक नहीं पहुँचने पाती । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर किरणें है, उसी प्रकार इस हार्द सूर्य के भी चारों ओर किरणें है, उन्हीं किरणों के बल से यह क्षेत्रज्ञात्मा इस शरीर को प्रत्यन्त हलका बनाकर शरीर को उठाये रहता है । ४ - क्षेत्रज्ञात्मा से संबन्ध रखने वाले देवता आकाश के सूर्य से सम्बन्ध रखने वाले प्राणप्रधान तत्वों को देवता कहते है । उन देवताओं के प्रथम विभाग को ऋषि कहते हैं, जो शुद्ध ग्रमिश्रित प्राण स्वरूप हैं उनके अनेक भेद हैं, इन ऋषियों से उत्पन्न होने वाले दूसरे विभाग में पांच तत्व हैं - पितर, देव, ग्रसुर, मनुष्य, गन्धवं । इनमें यद्यपि पितर तत्व चन्द्रमा के प्रकाश में, देवतत्व पृथ्वी के प्रकाश में, ग्रसुर तत्व पृथ्वी और चन्द्रमा के पीछे की ओर अन्धकार भाग में, मनुष्यतत्व पृथ्वी के दोनों सन्ध्या की छाया में और गन्धर्व चन्द्रमा की दोनों सन्ध्या की छाया में रहते हुए प्राणतत्व को कहते हैं तथापि ये सब प्रारण सूर्य से संबन्ध रखते हैं । सूर्य से ही आकर इन सव में व्याप्त हुए हैं, इसलिये ये विभाग सूर्य में भी माने जाते हैं । इनमें देवता से उत्पन्न होने वाले तीसरे विभाग में पांच तत्व हैं । ३ - अग्नि और २ - सोम जिनको क्रमशः ग्रग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र और दिक् कहते हैं । ये पांचों सूर्य में रहते हैं । इन पांचों में से जो प्रथम तीन देवता है उनसे उत्पन्न होने वाला चौथा विभाग है, जिसमें ३३ तत्व भी सूर्य की किरणों में व्याप्त रहते है । अथवा यों समझना चाहिये कि ऋषि से लेकर अश्विनीकुमार तक ४ कक्षात्रों में जितने देवता कहे गये हैं इन्हीं सब के पिण्ड का नाम सूर्य है । इनके अतिरिक्त सूर्य और कुछ नहीं हैं तो ऐसी स्थिति में जब उस सूर्य का रस आकर प्राणी के हृदय में प्रतिष्ठित होकर यह क्षेत्रज्ञआत्मा बना है तो श्रावश्यक है कि वे सब चारों कक्षाओं के देवगण ज्यों के त्यों थोड़ी - थोड़ी मात्रात्रों में इस क्षेत्रज्ञात्मा का अङ्ग होकर प्राणी के शरीर में रहते हैं, इस शरीर में प्राणों की जो जहां चेष्टा हो रही है, जिन - जिन भूतों में गति वा कुछ क्रिया हो रही है वे सब इन्हीं देवताओं का स्फुरण ( फड़कना ) या जृम्भण ( फैलाव ) है । ५ - विधर्तृता जिस प्रकार पञ्चभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पांच गुण नियम से रहते हैं उसी प्रकार प्राण में विधरण का गुण है । यह प्राण अपने से मिले हुए दूसरे पदार्थ को पकड़ कर अपने ऊपर धारण-कर लेता हैं । इसी प्रारण का घन और प्रभव वह सूर्य है । वेद में कहा है कि-[ २८२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान प्राणः प्रजानामुदयतोष सूर्यः प्राण होने के कारण यह सूर्य विधरण धर्मा है । उसी को विवरण धर्म वाले रश्मियों से पकड़ी हुई यह संपूर्ण पृथ्वी कहीं श्राकाश में निराधार पकड़ी हुई है, या तीनों लोक यथास्थान संनिविष्ट रहते हैं, अपने नियतस्थान से विचलित नहीं होते । उसी प्रकार इस शरीर में क्षेत्रज्ञात्मा की रश्मियां भी विधरणधर्मा हैं । उसी क्षेत्रज्ञ की रश्मि से विधृत होकर यह शरीर हलका रहता है और सड़ता नहीं और इस शरीर में भी तीनों लोकों के भाग आपस में घिलमिल न होकर यथास्थान संनिविष्ट रहते हैं । ६ - सेतुता जहां कहीं पार और प्रवार का व्यवहार होता है, वहां कोई वस्तु मध्य में अवश्य होती है जिससे इस पार और उस पार का व्यवहार होता है, वहाँ पर पार और अवार इन दोनों को मिलाने वाली तीसरी वस्तु इस पार से उस पार तक दोनों भागों से स्पर्श करें तो उसे सेतु कहते हैं । उस सेतु के द्वारा किसी नदी के उस पार का प्राणी इस पार आता है और इस पार का प्राणी उस पार जाता है, ठीक इसी प्रकार संसार प्रवाह के मध्य में यह क्षेत्रज्ञ सूर्य है । इस क्षेत्रज्ञ से अर्वाक् महान् या भूतात्मा है । जहां कर्म की परतन्त्रता है । किन्तु उसी क्षेत्रज्ञ सूर्य से अन्तर्यामी चिदात्मा है, जहां ज्ञान के प्राधान्य से प्राणी में स्वातन्त्र्य होता है, कर्म का पारतन्त्र्य नष्ट हो जाता है । तात्पर्य यह है कि इस क्षेत्रज्ञ सूर्य से अर्वाक् भाग में संसार बन्धन की सामग्री है और उसी से दूसरी और संसार से छूटने अर्थात् मुक्ति की सामग्री है | मध्य में यह क्षेत्रज्ञात्मा है, इसलिए इसको सेतु कहते हैं । इसी के द्वारा परलीपार की चिदात्मा इस पार के भूतात्मा में यज्ञात्मा बनती है, और प्रज्ञात्मा भूतात्मा भी जो जीव कहा जाता है इसी क्षेत्रज्ञ में पहुँचकर शुद्ध चिदात्मा वन जाता है । संसार से मुक्त होकर उस पार चला जाता है । इसीलिए इस पार से उस पार जाने में इस क्षेत्रज्ञात्मा को सेतु समझना चाहिये । वेद ने इसके लिये कहा है – अमृतस्यैष सेतुः । अर्थात् मृत्यु के अमृत भाग में जाकर अमृत बनने के लिये यही विज्ञान आत्मा सेतु है | ७ - प्रयोजकता इस शरीर में काम करने वाला प्राज्ञश्रात्मा है । किन्तु वह चन्द्ररस से उत्पन्न होने के कारण परतः प्रकाश है, । स्वतः ज्योतिष्मान् नहीं है । इसलिए स्वतः उससे ज्ञानरूपी प्रकाश का उद्भव होना असंभव है । यद्यपि उस प्राज्ञ में इसी विज्ञान आत्मा क्षेत्रज्ञ का प्रतिबिम्ब पड़ने से चिदाभास होकर प्राज्ञ भी चेतन हो गया है । तथापि प्राज्ञ की चेतनता इसी विज्ञान आत्मा क्षेत्रज्ञ के आधीन है, क्योंकि जिस प्रकार बिम्ब में कोई क्रिया या परिवर्तन होता है उसी से प्रतिविम्ब में क्रिया और परिवर्तन होना देखा गया है । इसीलिए यह माना जाता है कि यह प्राज्ञनात्मा जो कुछ क्रिया करता है उसका प्रयोजक अर्थात् प्रवर्तक यही विज्ञानमय क्षेत्रज्ञश्रात्मा है । जिस प्रकार नेत्र देखने की क्रिया करता है किन्तु उसके इस क्रिया का प्रवर्तक सूर्य ही है । यदि सूर्य का प्रकाश न यावे तो यह चक्षु स्वच्छ होने पर भी नहीं देख सकता । इस प्रकार बिना क्षेत्रज्ञ की सहायता के प्राज्ञ प्रात्मा कुछ क्रिया नहीं कर सकता ॥ १ ॥
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* ब्रह्मविज्ञान के प्रकार हैं, वे सब प्राण दा यह क्षेत्रज्ञ श्रात्मा प्राणमय है । प्राण से ही सब क्रिया उत्पन्न होती ये ही कहते हैं । हैं । मध्य वाले मुख्य प्राण को इन्द्र कहते हैं और शेष उसके अनुयायी प्रारणों को देवता है || २ || ग्ररता देवता सव उस इन्द्र की इन्द्रियां हैं, जिन इन्द्रियों से प्रेरित होकर प्राज्ञ ग्रात्मा सब काम महान जो मन है उसे ही इस क्षेत्रज्ञ आत्मा का स्वरूप मनोमय है, श्रीर प्राणशरीर है, इसका है कि मेरी लोक में जो व्यवहार किया जाता ग्रात्मा कहते हैं । यह महानात्मा उस क्षेत्रज्ञ की प्रकृति है । तीनों गुणा प्रकृति अच्छी नहीं है, वह प्रकृति यही महान् आत्मा है । वह महानात्मा, सत्व, रज, तम इन है । हो जाता के स्वरूप हैं । ये आपस में एक दूसरे के ग्राघात से बदलते रहते हैं । जब कभी सत्व अधिक की है, और तम तत्र सुखदाई अच्छी प्रकृति होती है । रज की अधिकता में दुःखदाई खराब प्रकृति होती से रहकर अधिकता में मोहदाई स्तम्भित प्रकृति होती है । ये तीनों क्षेत्रज्ञआत्मा के ऊपर उसके ग्राश्रय किरणें विज्ञान बदलते रहते हैं । वे तीनों गुण जिस अवस्था में रहें उसी अवस्था में उनमें क्षेत्रज्ञग्रात्मा को है जब प्रविष्ट होकर उन गुणों को ज्ञानमय बनाते हैं । जिससे सुख दुःख मोह का अनुभव हुआ करता विना से रूप दुःख का होता है तभी प्रकृति अच्छी नहीं है कहा जाता है । क्षेत्रज्ञ का विज्ञान स्वतन्त्र में होकर किसी गुणों के मेल के हमें कभी प्रतीत नहीं होता । क्षेत्रज्ञ पर ग्रावरण रूप इन तीनों गुणों में ही ज्ञान की किरणें निकलती हैं, वे उन्हीं गुणों के रङ्ग स रङ्गा हुआ दीखता है । किन्तु यदि वास्तव विचार कर देखें तो यह क्षेत्रज्ञ का विज्ञान अपने स्वरूप से ग्रसङ्ग और निर्लिप्त है 1 । न यह साधु किन्तु है । बड़ा होता है और न पाप कर्म से छोटा होता है, वह चारों ओर समानभाव से व्याप्त रहा में बड़े कर्मों उसके मार्ग में ग्राए हुए छोटे कर्मों में उस कर्म के आयतन के अनुसार छोटा दीखता है और क्षेत्रज्ञ ' वड़ा दीखता है । किन्तु अवगुणों में छोटे बड़े होने की क्रिया इसी का परिवर्तन या सब प्रकार में मुख्य ग्रात्मा के प्राणरूप देवताओं के संयोग वियोग से हुग्रा करते हैं वही क्षेत्रज्ञआत्मा मेरे इस शरीरसम्यक् ग्रात्मा है, वही इस शरीर का कर्त्ता, हर्त्ता, विधाता ईश्वर है गति को । यदि उसको उसकी है और G प्रकार से जाना जाय तो किसी कर्म सेभी लिप्त नहीं होता और न पाप पुण्य का परिणाम होता कर्म बन्धन से छूट जाने के कारण यह जीव मुक्त माना जाताहै । इसीलिये श्रुति कहती है कि-एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य, न वर्धते कर्मरणा नो कनीयान् । तस्यैवस्यात् पद विततं विदित्वा त लिप्यते कर्मणा पापकेन ॥ कर्म से ८- निर्लिप्तता से यह क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा अस होने होने से किसी के कारण किसी में ग्रासक्त ॥ यह गृहीत नहीं होता । यह प्रशी ( न टूटने योग्य नहीं होता ग्रग्राह्य नहीं होता अव्यथित ) होने जैसे तेज की रश्मियां शीं इत्यादि है किसी काम में इसको व्यथा सड़ना किसी या थकान नहीं होती और इसमें किसी प्रकार का । विकार नहीं होता, यह ग्रभय और पवित्र भी ज्ञान की आत्मा है, इसके ग्रसङ होने के कारण कोई भी विषय के रङ्ग से रङ्गा नहीं जाता मिठास की शीतता, अग्नि , गुड़ का , नीम की तिक्तता, जल [ २८४ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान उता इत्यादि में इत्यादि कोई भी धर्म शुद्ध निर्विषय इसमें लागू नहीं होते । जाग्रत से स्वप्न में या स्वप्न से सुपुत रूप का ज्ञान चला जाता है । -अवस्थात्रय यह विज्ञानग्रात्मा प्राज्ञ के क्षेत्रज्ञ, सर्वदा प्राज्ञ आत्मा से संश्लिष्ट ( मिला जुला ) ही रहता है इसलिये साथ हीयह अपनी तीन अवस्था धारण करता है । बुद्ध यन्त सन्ध्य स्वप्नान्त इन तीनों का क्रम ,, से विचार किया जाता है । जब कि प्राज्ञआत्मा जाग्रत या बुद्धयन्त अवस्था समय विज्ञान बहिरिन्द्रियों के द्वारा शरीर से बाहर के विषयों का भोग करता है तो उस ग्रात्मा प्रज्ञानआत्मा और इन्द्रिये ये तीनों रहते हैं । उस समय यह विज्ञान ग्रात्मा भी एक साथ मिले प्रज्ञान के साथ जाग्रत अवस्था में यह विज्ञान बहिश्वर हो जाता है, उसी अवस्था को जाग्रत कहते हैं । इस अतिरिक्त ग्रात्मा पश्रज्योति से ज्योतिष्मान रहता हैं । अर्थात् सूर्य, चन्द्र, अग्नि इन तीनों के सुना किसी से दो से तीन से, चार से हुआ शब्द और उस विज्ञान की निन की ज्योति, इनमें एक या पाँचों भी सविषयक से काम लेती है । अपनी ज्योति के अतिरिक्त बाहर की चार ज्योतियां ज्ञान मेंइसकी सहायता करती हैं । २ - स्वप्न या सन्ध्य अवस्था केवल ग्रपनी यह विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ की चारों ज्योतियों से संबन्ध तोड़कर ही ज्योति आत्मा जब कि बाहर में सब इन्द्रियों को और प्रज्ञान से काम लेता है अवस्था कहते हैं । स्वप्न आत्मा उस समय को स्वप्न पदाथों को जाग्रत् के को साथ लेकर रश्मियों में प्रज्ञान के बने हुए अनुसार: भिन्न यह विज्ञान ग्रात्मा अपनी पदार्थ के नही हैं, भिन्न इन्द्रियों से देखा करता है । यद्यपि स्वप्न के एक भी बाहर तथापिप्रज्ञान के के समय यह क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा अपनी बनाये हुए उनको अपने प्रकाश से देखता रहता है । स्वप्न विज्ञान सब ओर से अपनी रश्मियों रश्मियों को चर्मतक फैलाये नहीं रहता है, किन्तु को और शरीर के वाह्य पर्यवसन्न ( संकुचित ) होता है । जिस प्रकार सब इन्द्रियों को खींचकर केवल, हृदय में ही साथ अस्त हो जाते सूर्यास्त काल के साथ एक होकर उसके है, उसी में सब रश्मियों अस्त जाते हुए मण्डल ही विज्ञान रश्मियां भी सब उस प्रकार विज्ञान के में सङ्कुचित होते - ग्रात्मा हृदयाकाश हृदय मात्राकाश संकुचित होती हैं । उसी हृदयाकाश में संकुचित हो जाती हैं । इन्द्रियां भी सब हृदय में ही में प्रवेश करके इन्द्रिय में स्वप्न के आत्मा भी विज्ञानमय आत्मा स्थित सब दृश्य देखे जाते हैं । प्रज्ञान त्वचा में से जब कभी पूर्णतया अपने किरणों खींच लेता है, किन्तु शरीर का देता है । को हृदय में ही है, पूछने पर जवाब स्वप्न नहीं खींच प्रादमी बता के के लेता है तब कभी कभी सोता हुआ । सिंह, हाथी, आदि श्राक्रमण दस्त विकार निर्गत होते हैं , पेशाब में में ही तीनों विकार की दुर्बलता , मैथुन वास्तव से में भय है ये सब स्नायु प्रज्ञानात्मा से छाती में धड़कन वास्तव में ही हो जाती परन्तु में यदि बल हो तो प्रज्ञान की रश्मियाँ अच्छी जाने से ही होते हैं । किन्तु स्नायु भी विकार नहीं होते की रश्मियाँ तरह खिची न उस मनुष्य के ये कोई जाती हैं तो ॥ इन बलात्कार से हृदय में सिंच दोष दीखेंगे दुसरे नहीं होगे में से जो के सम्बन्ध वाले जो नाड़ी जिस की दुर्बल होगी उसी [ २८५ ]
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ब्रह्मविज्ञान स्वप्न में जितने पदार्थ दीखते हैं उनको विज्ञान ग्रात्मा ही प्रज्ञान से बनाता विगाड़ता रहता है । इन में भी कफ, वात, पित्त आदि शरीर धातुयों का संबन्ध अवश्य रहता है । हृदय की नाड़ी दुर्बल अवस्था में जिन धातुयों से मिली रहती है । उस धातु का संबन्ध स्वप्न दृश्य में अवश्य हो जाता है अर्थात् पित्त की वृद्धि में अग्नि का, कफ की वृद्धि में जल का, वायु की वृद्वि में उड़ने या भय का अधिक दृश्य देखा जाता है । इन सब की अधिकता भी नाड़ी की दुर्बलता ही से होती है । हिता नाम की नाड़ियां जो हृदय स्थान से सर्वाङ्ग शरीर में फैली हुई हैं जिन की संख्या ७२००० हैं, उन्हीं नाड़ियों में किसी किसी की दुर्बलता के कारण भिन्न भिन्न प्रकार के अद्भ ुत ग्रद्भ ुत स्वप्न दृश्य दिखाई दिया करते हैं । कल्पना करो कि किसी मनुष्य के यह हृदय से फैली हुई हितानाड़ी बहुत कम दुर्बल है, अथवा सर्वथा दुर्वल नहीं है तो ऐसे मनुष्य या तो स्वप्न देखते नहीं, ग्रथवा स्वल्प काल में स्वल्प - मात्रा में देखते हैं । किन्तु यह सब स्वप्न दृश्य हृदय के आकाश में ही होते हैं और जाग्रत के अनुसार हृदय में ही बैठा हुआ विज्ञान ग्रात्मा उसे देखा करता हैं । जाग्रत अवस्था में यह विज्ञान ग्रात्मा इन्द्रिय में जगत् के दृश्यों को देखता है और व्यानस्थ होकर विचार करने में विचारित पदार्थों को स्वप्न के ग्रनुसार प्रज्ञान से ही बनाकर हृदयस्थान में ही देखता हैं । इस जाग्रत में दोनों स्थानों से काम लेता है, किन्तु स्वप्न में इन्द्रियों को छोड़कर केवल हृदय से ही काम लेता है । ३ - सुषुप्ति या स्वप्नान्त अवस्था जबकि न जाग्रत के अनुसार न स्वप्न के अनुसार कुछ देखता है, न सोचता है जबकि सभी इन्द्रियाँ मन किसी विषय को ग्रहण नहीं करती तो उस समय यह विज्ञान आत्मा निर्द्वन्द अर्थात् अकेला रहता है, उसी अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं । हृदय से प्रथम १०१ नाड़ी मुख्यता से निकलती हैं फिर उनके एक - एक में से सौ - सौ नाड़ियाँ ( शाखा ) निकली हैं फिर उनके एक - एक में से ७२००० नाड़ियाँ प्रति शाखा हुई हैं । इन सब नाड़ियों को जो सर्वाङ्ग शरीर में फैली हुई हैं इनको हितानाड़ी कहते हैं । इनमें व्यान वायु विचरता हुआ रहता है इस प्रकार नाड़ियों की व्याख्या पिप्पलाद ऋषि ने की है । जिस समय विज्ञानग्रात्मा जाग्रत् या स्वप्न में न रहकर सुषुप्ति में रहता है उस समय इन्हीं नाड़ियों में व्याप्त हो जाता है वह तेज पित्त से प्रज्वलित होकर इस प्रकार तीव्र हो जाता है कि उसके उस समय कोई भी वस्तु यहाँ तक कि नाड़ियों के चर्म भी स्पर्श नहीं करते । उसके तेज से विकीर्ण होकर ( धवका पाकर ) सब पदार्थ दूर हो जाते हैं, और वह अपने स्वरूप में स्वच्छ निर्विकल्पक रहता है, अर्थात् अपने निज स्वरूप में रहता है ये हिता-नाड़ियाँ हृदय से ऊपर नीचे चारों ओर फैली हुई हैं, उन सब में जबकि ज्ञान व्याप्त रहता है तभी जाग्रत होता है । किन्तु जबकि शिर की ओर जाने वाली ऊपर की नाड़ियों में न रहकर हृदय और हृदय के नीचे नाड़ियों में रहता है तब स्वप्न होता है । किन्तु जबकि हृदय को भी छोड़ देता है अर्थात् जो नाड़ियाँ हृदय से नीचे पुरीतत ( छोटी बड़ी प्रांतें ) नाड़ियों की प्रोर जो ७२००० शाखायें गई हैं उनके द्वारा पुरीतत नाड़ी तक पहुँचकर शान्त हो जाता है उसी को सुपुप्ति कहते हैं । इन्द्रियों के स्नायु हृदय में गये हैं इसीलिये हृदय में प्रज्ञात्म इन्द्रियों के रसों को लेकर विज्ञान आत्मा के प्रकाश में नाना [ २८६ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान मे प्रकार के दृश्यों को दिखा सकता था, किन्तु जबकि ज्ञानआत्मा हृदय आकाश को छोड़कर नीचे रहता है तो हृदय में अन्धकार होने से वहाँ इन्द्रियों का कोई भी भाव प्रज्ञान में नहीं आता इसीलिये प्रज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं होता । इसलिये हृदय प्रकाश में जो स्वप्न पहले दीखते थे अब नहीं देखते हृदय हृदय के नीचे पुरीतत नाड़ी में ज्ञान का प्रकाश रहने पर भी इन्द्रियों के स्नायु वहां न पहुँचने से किसी भी इन्द्रिय के धर्मों को प्रज्ञान ग्रात्मा ग्रहण नहीं करता, इसलिये विज्ञान के प्रकाश में कोई दूसरी वस्तु ही नहीं प्राती जो उस विज्ञान से प्रकाशित होती । इसलिये उस समय कोई भी इन्द्रियों की वृत्ति नहीं होती इससे वह विज्ञानआत्मा उस समय देखता हुआ भी नहीं देखता, सुनता हुआ भी नहीं सुनता, अर्थात् उसकी शक्ति प्रकाश करने की जाग्रत् स्वप्न के अनुसार इस समय भी ज्यों की त्यों बनी हुई है, किन्तु सामने दूसरी वस्तु के न होने से किसी विषय का भी ज्ञान नहीं होता । अजातशत्रु काशीराज ने ही पहले - पहल प्रज्ञान आत्मा से संश्लिष्ट विज्ञान आत्मा का हितानाड़ी द्वारा पुरीतत में जाना निरूपण किया है । विज्ञानात्मा का हृदय छोड़कर पुरीतत में रहना शङ्कराचार्य ने असम्भव समझकर हृदय का परिवेष्टन कल्पना करके उसका नाम पुरीतत रक्खा है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार एक परकोटे से घिरे हुए नगर में बड़े भवन में एक छोटी कोठरी में बैठे हुए आदमी के लिये तीनों प्रकार से व्यवहार किया जाता है । वह आदमी एक ही समय में खास कोठरी में है, बड़े भवन में है, और नगर में है, इसी प्रकार पुरीतत नाम के हृदय के अन्दर जो दहराकाश है उसमें रहने वाला विज्ञान आत्मा एक ही समय में तीनों स्थान में कहा जा सकता है । वह दहराकाश में है, हृदय में है, पुरीतत में है । पुरीतत में जाना कहने से हृदय का छोड़ना नहीं माना जा सकता । वह केवल सुषुप्ति-काल में ग्रसङ्ग होकर विषयों को स्पर्श नहीं करता इतने ही से सुषुप्ति हो जाती है, इस प्रकार शङ्कर का मत है । परन्तु दहराकाश में रहते हुए विज्ञान आत्मा का सुषुप्ति काल में हृदय के वेष्टन पुरीतत में जाने का वर्णन करना व्यर्थ ही दीखता है । क्योंकि यदि हृदय वेष्टन ही पुरीतत है तो उसके भीतर वहतीनों अवस्थाओंों में समान भाव से रहता है, फिर खासकर सुषुप्ति काल में ही पुरीतत कहने का कोई तात्पर्य नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि हृदय वेष्टन कीकल्पना करना निःसार है, क्योंकि तीसरी बात यह है कि अमरकोश हृदय खुद चर्ममय है उसका कोई वेष्टन प्रत्यक्ष में नहीं देखा जाता । आदि कोश ग्रन्थों में प्रांतों का ही नाम पुरीतत कहा है । हृदय वेष्टन के लिये पुरीतत शब्द कहीं भी नहीं ग्राया इसलिये ग्रसली अर्थ पुरीतत का छोड़कर मिथ्या पुरीतत कल्पना करना अनुचित है । पिप्पलाद आदि ऋषियों ने इस विज्ञानमय आत्मा को अशरीर और अक्षर कहा है । शरीर वह कहलाता है कि जिसके शरीर का कोई परिमाण नियत न हो जैसे हवा, पानी, बादल ये सब अशरीर और वह विज्ञान हैं । अच्छा ये शुभ्र ( चमकदार ) है वह जाग्रत् स्वप्न में कितने ही मृत्यु के रूपों को अपने में लेकर भिन्न - भिन्न दृश्यों को विकासित करता है । किन्तु सुषुप्ति काल में मृत्यु के किसी रूप से स्पर्श नहीं करता और न किसी संस्कार को लेकर स्वप्न ज्ञान ही बनता है । मैं भीतर हूं या बाहर यह ज्ञान भी नहीं होता उस समय निष्काम शोकातीत निज के प्रानन्द में मग्न रहता है । यह उसकी ऐसी दशा होना परा सम्पत्ति है, परागति है । यह उसका परमलोक कैवल्यानन्द है । [ २८७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान मृत्यु मतान्तर ( दूसरा या तीसरा ) किसी किसी का मत है कि इस सूर्य में जो पुरुष दीखता है वह मृत्यु है, उसके भीतर अमृत है । और अमृत दोनों ग्रत्यन्त श्रोतप्रोन हैं जैसा कि श्रुति कहती है-अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्याबमृतमाहितम् । मृत्युविवस्वन्तंवस्ते, मृत्योरात्मा विवस्वति ॥ इसी अमृत और मृत्यु के सम्मिलित रूप से हमारी विज्ञानग्रात्मा बनती है । उस आत्मा के मृत्युभाग में प्रासक्ति हो सकती है, इसलिये उसी भाग में विज्ञानग्रात्मा के साथ ज्ञानग्रात्मा सम्मिलित होती है और ज्ञान के साथ इन्द्रियों का सम्बन्ध है, सब इन्द्रियां अपने - अपने विषय को जिस प्रकार प्रज्ञान आत्मा में पहुँचाती है वही विज्ञान आत्मा के मृत्यु भाग में पहुँचकर विज्ञान ग्रात्मा के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं । इसी को जाग्रत् ज्ञान या स्वप्नज्ञान कहते | किन्तु यह विज्ञान का मृत्युभाग अपने स्वभाव से ही जब ग्रन्तर्मुख अथवा बाहर के विषयों का ग्रहण करने से थक जाता है तो कुछ समय तक विश्राम के लिये शान्ति की इच्छा से वह मृत्युभाग अन्तर्मुख हो जाता है । अन्तर्मुख होते ही वह मरकर अमृत में लय हो जाता है । उस अवस्था में बिना मृत्यु केवल अमृतभाग विज्ञानग्रात्मा का रह जाता है और वह प्रसङ्ग है इसलिए उस भाग में प्रज्ञात्मा का सङ्ग नहीं होता इसीलिए प्रज्ञानग्रात्मा के सम्बन्धी इन्द्रियों के भी विषयों का सङ्ग नहीं होता ऐसी अवस्था में हृदय के दहाकाश में ही उस विज्ञान ग्रात्मा के रहने पर भी और वहां ही प्रज्ञात्मा के रहने पर भी और उस प्रज्ञान में सब इन्द्रियों के विषय जाने पर भी किसी विषय का ज्ञान नहीं होता, इसी को सुषुप्ति अवस्था कहते हैं । ० - उत्क्रमण यह विज्ञानात्मा यद्यपि प्रसङ्ग है तथापि उसका मृत्युभाग जो ग्रासक्तिमान् है उसमें प्राज्ञ ग्रात्मा परिष्वक्त ( पका हुआ ) ग्रर्थात् ग्रलिङ्गित रहता है उसी के कारण से यह विज्ञानग्रात्मा भी शरीर के भीतर प्रवेश करके शरीर बनता है और शरीर में रहने के कारण कितने ही परम्परा ( गदला करने वाला ) ग्रर्थात् ज्ञान बिरोधी जड़ धर्म अर्थात् जिसके संसर्ग से ज्ञान कलुषित होकर मलिन हो जावे ऐसे धर्मों से संसृष्ट हो जाता है । जब तक प्राणी का जीवन रहे तब तक यह् मिला हुआ ) विज्ञानग्रात्मा इसी प्रकार कलुषित होकर अल्पज्ञ रहता | किन्तु जब यह विज्ञान शरीर को छोड़कर मुक्तिकाल में उत्क्रमरण करता है तो उस समय कलुषित करने वाले इन जड़ धर्मों को जो शरीर में संसृष्ट हो गये थे । उनका सर्वथा त्याग करता है और शुद्ध निज रूप से निकल जाता है जिस प्रकार फल अपने बन्धनों से मुक्त हो जाता है उसी प्रकार यह विज्ञान ग्रात्मा भी जो प्रत्येक ग्रङ्गों से बंधा हुआ था सबसे बन्धन तोड़कर संकुचित होकर प्राज्ञआत्मा सहित सब इन्द्रियों को साथ लिये हुए केवल एक हृदय के अग्रभाग में ठहरता है । उस समय शरीर के किसी ग्रङ्ग में यदि स्पर्श करें तो बोध नहीं होता, न बोलता है, न देखता है, न सुनता है किन्तु केवल उसका हृदय छूने से धड़धड़ी का कम्प ज्ञात होता है । अर्थात् उस समय सब प्राणों को साथ लिये हुए विज्ञानमय मुख्य प्रारण केवल हृदय में अपना व्यापार करता है । [ २८८ ]