ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 41–50
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 41–50
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* ब्रह्मविज्ञान और वस्तुएं कुछ भी न थी, ग्रतः कहा जा सकता है । पहले ये सब ग्रसत थीं ग्रर्थात् विद्यमान नहीं थीं । इसी अभिप्राय से ' प्रसदेवेदमग्र ग्रासीत् ' यह श्रुति कही गई है । किन्तु ये सब किसी न किसी चीज से जरूर उत्पन्न हुई है; वह चीज पहले अवश्य थी । ग्रगर वह न होती तो बिना कारण इन चीजों की उत्पत्ति नहीं होती । ग्रतः जब वह सृष्टि की ग्रादि में कुछ वस्तु थी तो उसी अभिप्राय से “ सदेवेदमग्र श्रासीत् " यह श्रुति चरितार्थ होती है । जव इस प्रकार कार्य के अनुरोध से पहले असत् होना और कारण के अनुरोध से पहले सत् होना पाया जाता है तो एक ही वस्तु को सत् और असत् दोनों कहना संभव है; विरोध नहीं रहा; यह एक युक्ति है । इसी में दूसरी युक्ति है कि इस जगत् में प्रत्येक वस्तु आपस में भिन्न हैं । अर्थात् एक से एक में भेद पाया जाता है । भेद को ग्रन्योन्याभाव कहते हैं, अर्थात् थोड़ा हाथी नहीं है और हाथी घोड़ा नहीं है; तात्पर्य यह है कि हाथी ग्रपने रूप से भाव है और घोड़े के रूप से प्रभाव है । इस प्रकार प्रत्येक वस्तु जो ग्रपने रूप से भाव है वही दूसरे सब रूपों से प्रभाव है, इस प्रकार भाव अभाव का जब सामञ्जस्य है तो सत् ग्रोर श्रमत् इन दोनों का एक ही ग्रर्थ हुआ । उसी से श्रुतिवाक्यों में भी विरोध नहीं रहा । यह सामञ्जस्यवाद छटा विकल्प है । ( ७ ) अक्षरवाद सांख्य का मत है कि पुरुष और प्रकृति ये दो मूल तत्व हैं । पुरुष को सत् ग्रौर प्रकृति को ग्रसत् कहते हैं । इनमें पुरुष ज्ञानरूप है, निर्विकार है और सदा एक रूप है । किन्तु प्रकृति विकारी है और सर्वदा नानारूपों में बदलती रहती है । इसी मूल प्रकृति को प्रधान और अव्यक्त भी कहते हैं और इस का ग्रक्षर भी नाम है । जहां वेद में ग्रक्षर से सृष्टि होना कहा हैं वह इस मूल प्रकृति से समझना चाहिए, यह ग्रसद्वाद का तात्पर्य है । किन्तु वेदान्त का मत है कि पुरुष और प्रकृति छैन दोनों में जो पुरुष सत्रूप है वही ग्रव्यक्त और ग्रक्षर शब्द से कहा जाता है । जहां ग्रक्षर से बेद में सृष्टि का होना कहा गया है वह इस पुरुष से समझना चाहिए, यही सद्वाद का तात्पर्य है । इस प्रकार यह सातवां विकल्प अक्षरवाद समाप्त हुआ । इस प्रकार सदसद्वाद में सात विकल्प सिद्ध होते हैं । जिनका संक्षेप में स्वरूप मात्र ऊपर दिखाया गया है । किन्तु इनको विस्तार से लिखने की ग्रावश्यकता है । यद्यपि ये सब इतने निगूढ़ तत्व हैं कि इनका सहज में विचार करना और विचार करके यथार्थ सत्य को पा जाना सर्वथा कठिन है, बल्कि मनुष्य वुद्धि के बाहर है । किन्तु विचार करके इन का थोड़ा भी जानना बड़े ग्रानन्द का कारण है, बड़ी ग्रापत्तियां दूर होती हैं, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जहां तक हो सके ढूंढ कर सत्य को निकाले । इसी तात्पर्य से इन सातों विकल्पों का अपनी बुद्धि से जहां तक हो सकता है; कुछ विचार करने को हम तैयार हुए हैं । सदसद्वादाधिकार में पहला उपक्रमाधिकार समाप्त हुआ । [ ε ]
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मूलोपनिषत् [ १ ] " भिद्यते हृदयग्रन्थिरिच्छद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ " सद्सद्वाद में सप्त विकल्प पहले दिखाये गये हैं । उन सब में पहला " प्रत्ययाद्वैतवाद " है । उसका तात्पर्य यह कि यह सब एक ही प्रत्यय अर्थात् ज्ञानरूप है । परन्तु यदि हम इन वस्तुओंों की र दृष्टि डालते हैं तो यह ज्ञान से भिन्न ग्रर्थात् ज्ञेय रूप से दीखता है । ग्रतः प्रथम इनका प्रत्ययरूप होने का निर्णय करना उचित है । किन्तु उस निर्णय में कई प्रकार के भिन्न - भिन्न मत उपस्थित होते हैं । उनको १० उपनिषद् कहते हैं । वे ही यहां क्रम से दिखाये जाते हैं । इनमें प्रथम मूलोपनिषत् है । यह सब जो कुछ है, वही जगत् कहलाता है, इसका एक ही मूल है उसको ब्रह्म कहते है, इसी से यह सम्पूर्ण जगत् ब्रह्मरूप है । उस ब्रह्म को " ग्रोंम्, तत्, सत् " इन तीनों रूपों से या तीन प्रकार से समझना चाहिये । यह ब्रह्म दो प्रकार का है । ग्राम और ग्रभ्व । द्रष्टा को प्रभु और दृष्य को श्रभ्व कहते हैं । अर्थात् दिग, देश, काल इन तीनों से जिस का परिच्छेद न हो वही द्रष्टा अर्थात् ज्ञान है उसी को ग्राभु कहते हैं । किन्तु इसके विपरीत जो दिक्, देश, काल से परिच्छिन्न है उसको कर्म या दृश्य कहते हैं, वही ग्रभ्व है । इन दोनों में ‘ आमु ' तीन प्रकार का है । श्वानंद, चेतना और सत्ता । इसी प्रकार ग्रभ्व के भी तीन भेद हैं कर्म, रूप और नाम । कितने ही आचार्यों का मत है कि इनमें ' आभु ' को ही ब्रह्म कहना चाहिए । किन्तु ग्रभ्व के तीनों भेद ब्रह्म नहीं हैं । अर्थात् माया के भेद हैं । माया से तात्पर्य है - मिथ्या वस्तु से । नाम, रूप, कर्म तीनों ही मिथ्या हैं, अतएव ब्रह्म का अद्वैत होना सिद्ध होता है किन्तु वास्तव में ये तीनों भी ब्रह्म के ही रूप हैं । इनको तैत्तिरीय संहिता और माध्यन्दिनीय संहिता में ब्रह्म शब्द से स्पष्ट कहा है | जव कि इनको हम प्रत्यक्ष देखते हैं तो इनको मिथ्या कहना सर्वथा मिथ्या है । वास्तव में हमको इन तीनों सिवाय कुछ दिखता ही नहीं है । जो कुछ दिखता है श्रुति के अनुसार वह सब ब्रह्म है । क्योंकि ( श्रुति कहती है- ' सर्वं खल्विदं ब्रह्म ', ब्रह्मवेदं सर्वम् ' इत्यादि । श्रतः ये तीनों भी ब्रह्म हैं । अर्थात् यह सिद्ध हुआ कि श्रानन्द, चेतना, सत्ता, कर्म, रूप और नाम ये छयों रूप ही सव ब्रह्म हैं । दूसरी बात यह है कि जिससे दूसरी चीज पैदा होती है, परन्तु वह खुद कम नहीं होती है और न बिगड़ती है | जैसे बीज का अंकुर, वीज की हालत बिगड़ने से ऊगता है, दूध के नष्ट होने से दही पैदा होता है, घास की सूरत नष्ट होने से दूध पैदा होता है किन्तु नाना प्रकार की वस्तु जिससे I १० ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान पैदा होती रहती हैं तथापि उसका असली स्वरूप नष्ट नहीं होता । तात्पर्य यह है कि ग्रानन्द पद में दो विभाग हैं— ' ग्रा ' और ' नन्द ' आकार का अर्थ है चौतरफ, नन्द का अर्थ है बढ़ना, चारों ओर बढ़ने से तात्पर्य यह हुआ कि जो दूसरी जगह चला जाता है परन्तु ग्रपनी पुरानी जगह को नहीं छोड़ता । या यों समझिए कि जो खुब धावा करता है परन्तु कुछ भी नहीं चलता अर्थात् बैठा हुग्रा ही बहुत दूर तक चला जाता है | इस प्रकार अपने असली स्थान को न छोड़ कर बहुत दूर तक चला जाना, यह लक्षण सिवाय हमारी ग्रात्मा के अन्यत्र नहीं है । इसी से आत्मा को आनन्द कहते हैं । क्योंकि यह श्रात्मा जो मन के रूप से हृदय में वर्तमान है वह हृदय को न छोड़कर दूर - दूर तक पदार्थों को जानने के लिए जाती रहती है । शरीर से उसके बाहर जाने पर भी शरीर में उसका कुछ भी भाग कम नहीं होता । इसीलिए कहा जा सकता है; वह ठहरा हुआ चलता रहता है । इसी प्रकार उस हृदय में बसते हुए ग्रात्मा से शरीर के नाना विभाग लोम, त्वचा, शोणित, मांस, मेदा, ग्रस्थि, मज्जा, शुक्र, श्रांख, कुछ पित्त इत्यादि भिन्न २ पदार्थ ग्रात्मा से निकलते श्रीर बनते रहते हैं; परन्तु उस आत्मा में भी कमी नहीं होती और न कुछ विकार होता है । अतएव उस आत्मा को आनन्द कहते हैं । आत्मा कै आनन्द होने का प्रमाण यह है कि संसार के सभी पदार्थ – सम्पत्ति, स्त्री, पुत्र, परिवार इत्यादि से अपनी ग्रात्मा सभी को अधिक प्यारी होती । उनकी रक्षा का भी अधिक ध्यान रहता है, किन्तु अपने शरीर तक से भी यह आत्मा अधिक प्रिय है । जिस अंग में पीड़ा से आत्मा में वेदना हो तो उस आत्मा के अनुरोध से उस अंग को काटना पड़ता है । अतः स्पष्ट हुआ कि सबसे प्रिय आत्मा है, जो आनन्द-रूप है । हाँ, इतनी विशेषता है कि यह आनन्द दो प्रकार का है — भुमा और शान्ति । भूमा वृद्धि को क़हते हैं । किसी प्रकार की वृद्धि होने पर जब तक आत्मा बढ़कर दूसरी सीमा में नहीं आ जाती तब तक श्रानन्द का अनुभव होता है किन्तु यह स्मरण रहे कि यह वास्तव में आनन्द नहीं, जिसे सब आनन्द समझते हैं वह ग्रानन्द का अनुभव अर्थात् ज्ञान है न कि स्वयं आनन्द । असल में श्रानन्द शान्ति का नाम है | जैसे जल में कोई लहर न हो, बिल्कुल ठहरा ठहरा हुआ हो तो उसको प्रसाद ( अच्छी तरह ठहरा हुआ ) कहते हैं । उसमें प्रतिबिब ठीक रूप धारण करता है । यहां तक कि उस पानी का स्वरूप तक दीखता है । ऐसी दशा में ठहरे हुए पानी को प्रसन्न कहते हैं । ठीक इसी प्रकार जिसकी श्रात्मा में किसी प्रकार की हलचल न हो तो वह प्रात्मा का प्रसाद है । उसमें सोचने विचारने का सामर्थ्य रहता है, जिसका विचार करता है उसके अन्त तक पहुचता है । ऐसी दशा में उस आत्मा को प्रसन्न कहते हैं । इसी को शांति और आनन्द कहते हैं । जैसे जल का शांत रहना स्वाभाविक धर्म है किन्तु हलचल होना बाहरी पदार्थ वायु इत्यादि का कारण होता है, वैसे ही इस ग्रात्मा का भी प्रसन्न रहना अर्थात् शांति स्वाभाविक धर्म है किन्तु उसमें हलचल होना बाहरी ग्रनात्मिक पदार्थों के सम्बन्ध से अज्ञानता के कारण होता है । जितनी ही अज्ञानता घटती जाय और ज्ञान की मात्रा बढ़ाई जाय [ ११ ]
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* ब्रह्मविज्ञान उतनी ही ग्रात्मा को शक्ति मिलती है, हलचल कम होकर शान्ति होती है । यही शान्ति वास्तव में आनन्द का रूप है इसी से ग्रात्मा आनन्दमय या ग्रानन्द रूप है । ग्रानन्द जो आत्मा का प्रथम स्वरूप है, वह अपने स्थान पर कूटस्थ ( ग्रविचाली ) रह कर चारों ग्रोर फैलता हुआ जाता हुआ सा दीखता है । असली बिम्ब से बाहर जितनी दूर फैला हुआ उसका प्रकाश दीखता है उस प्रकाश को उस विम्ब की ' चिती ' कहते हैं । जैसे किसी चीज पर कोई दूसरी चीज़ एक के ऊपर एक करके बराबर चुनते जायें तो वह चुनाव उसकी ' चिति ' होगी । जैसे किसी दीवार की नींव पर ईंट या पत्थर रख कर चेजा करते हुए ईटों से उसको चुनते जाते हैं जिस से वह दीवार अपनी जगह ठहरी हुई ऊपर २ बढ़ती जा रही है । इसी प्रकार यह श्रानन्द अपने एक केन्द्र की नींव पर ठहरा हुआ चारों ओर बढ़ गया है वह बढ़ा हुग्रा भाग उस श्रानन्द की ' चिति ' है । उस ' चिति ' ही को चेतना कहते हैं । हम देखते हैं कि सूर्य या दीपक जैसे एक स्थान पर रह कर चारों ओर अपना प्रकाश फैला रहा है इसी तरह यह मेरी ग्रात्मा जो ग्रानन्दरूप हैं, मेरे शरीर के केन्द्र में अर्थात् हृदय में स्थिर रह कर शरीर से बाहर ग्रनन्त श्राकाशमण्डल में दूर २ तक पदार्थों को प्रकाश करता हुआ या पकड़ता हुआ फैला हुआ है । यह फैलाव इस ग्रानन्द की ' चिति ' या चेतना है । जिस प्रकार शरीर के सम्पूर्ण शोणितमण्डल में यह फैला हुआ है, उसी प्रकार आंख, कान ग्रादि इन्द्रियों के द्वारा यह शरीर से वाहर भी उपरोक्त प्रकार से निकला हुआ रहता है, किन्तु यह ध्यान देने की बात है कि इसके शरीर बाहर इतने फैलने पर भी शरीर के ' चिति ' है के भीतर कमी नहीं होती क्योंकि इसकी जहां तक वहां तक इसका वास्तविक स्वरूप है । सूर्य के समान जिस मध्यवाले विम्व को हमने ग्रानन्द कहा है और प्रकाश के समान जिस बाहरी फैलाव को हमने चेतना कहा है यह दोनों भाग एक से एक अविनाभूत हैं । सदा मिलते हुए ही स्वरूप धारण करते हैं इसलिए मोटी दृष्टि से जुदे २ दीखने पर भी वास्तव में इन दोनों को एक ही समझना चाहिए । इस चेतना के सम्बन्ध में यह और जानना चाहिए कि हमारे शरीर की ग्रात्मा का यह चेतना - भाग जो बाहर निकल रहा है वह बाहर जिस वस्तु के साथ जितने अंश में सहयोग करता है उसी क्षण उसी प्रकार का ज्यों का त्यों वन जाता है । किन्तु स्मरण रहे कि उस वस्तु के पृष्ठ भाग या दूसरी और या भीतरी भाग को स्पर्श न करने से उस रूप में नहीं बनता । उस वस्तु में जो भारीपन इत्यादि कितने ही धर्म हैं, उनको भी नहीं धारण करता, केवल अपने सम्मुख भागवाले पृष्ठ को पकड़ कर उसी को दृश्य बनाता है, अर्थात् उसी रूप को धारण कर लेता है । कहने का तात्पर्य यह है कि दस्तु के साथ आत्मा का चेतना संयोग करता है वह बस्तु हमारे ज्ञान से पृथक है । [ १२ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान किन्तु उसी के स्वरूप को हम अपने खयाल चेतना उस रूप को पैदा करती है । उस उत्पन्न होने को संस्कृत भाषा में " विजायते " पर चढ़े हुए जो मान रहे हैं उसका यह अर्थ है कि वही आकार की एक नई वस्तु हमारी चेतना से उत्पन्न होती है । कहते हैं । उसी को बदलकर भेद दिखलाने के अभिप्राय से इस उत्पत्ति को ' विज्ञायते ' कहते हैं । ' विजायते ' का अर्थ जनना है और ' विज्ञायते ' का अर्थ जानना है । ' विजायते ' का धातु ' जन ' हैउसमें ' नकार ' के पहले रहने वाले ' प्रकार को ' नकार ' के पीछे लगाकर ( ज + न + अं + ग्रा = ज्ञा ' जा ' धातु बना लिया गया है इसी कारण इस वस्तु की उत्पत्ति को, जो चेतना से की गई है विज्ञान कहते हैं । ' चेतना का अर्थ आत्मा के प्रकाश का विस्तार है किन्तु विज्ञान का अर्थ उस चेतना में किसी वस्तु का स्वरूप श्रा जाना है । यही उस वस्तु का जानना अर्थात् अपने ज्ञान से उस वस्तु का एक प्रकार की ' उत्पत्ति ' है । इस से उस प्रानन्द के दूसरे स्वरूप के दो नाम सिद्ध हुए ' चेतना ' और ' विज्ञान ' ( चेतना और विज्ञान एक ही है ) । ग्रानन्द का जो दूसरा स्वरूप यह विज्ञान है, वह वास्तव में जब तक शरीर के ग्राभ्यन्तर रहता है तब तक निर्विषयक रहता है । श्रतएव उसमें किसी प्रकार का अन्य ग्राकार अथवा उसके निज का भी कोई आकार प्रतीत नहीं होता और वह एक रस या एक रूप का रहता है । किन्तु वही विज्ञान इन्द्रियों के द्वारा बाहर ग्राकर जब बाह्य जगत् में किसी वस्तु के साथ संयोग करता है तो तत्काल ही उस वस्तु के रूप में बदल जाता है । वह वस्तु जो हमारी ग्रात्मा से बनी है हमें दीखती है । यह मानी हुई बात है कि जिस वस्तु के संयोग से हमारी ग्रात्मा बदल कर साकार रूप में आई है वह वस्तु हमारे लिए परोक्ष है अर्थात् उसको न कभी देखा था, न देखते हैं, न देखेंगे और न वह वस्तु हमारे ज्ञान में ग्राती है केवल उस वस्तु का चित्र ही ज्ञान में खिंच जाता है । यद्यपि यह चित्र मेरी ग्रात्मा से बना है, इसके बनने में मेरा विज्ञान ही खर्च हुआ है तथापि इस विज्ञान का यह माहात्म्य है कि इतना खर्च होने पर भी वह पूर्ववत् ज्यों का त्यों बना हुआ प्रतीत होता है और उस विज्ञान में वह वस्तु ग्रन्तर्गत प्रतीत होती है । इसी कारण से उस विज्ञान को अब हम दो खण्ड में देखते हैं — द्रष्टा और दृश्य, अथवा विज्ञान और विज्ञेय । तात्पर्य यह है कि वह वस्तु जिस ग्राधार पर ठहरी हुई हमें नजर आती है वह भाग विज्ञान है । वही द्रष्टा या मेरी ग्रात्मा है । किन्तु जो वस्तु उस विज्ञान पर चढ़ी हुई दीखती है वह विज्ञेय है । उसको हम विज्ञान से भिन्नरूप में देख रहे हैं इसलिए उस रूप को विज्ञान न कह कर ' सत्ता ' कहते हैं । जगत् में जो प्रत्येक दृष्टि " है है ” की प्रतीत होती है उसी को सत्ता कहत हैं । यह सत्ता विज्ञान के भीतर किसी प्रकार का आकार ही है इसलिए उसी ग्राकार को ' सत्ता ' कहना चाहिये । अव यह सिद्ध हुआ है कि एक ही विज्ञान के दो रूप होते हैं— एक निराकार और दूसरा साकार – एक निर्विकार और दूसरा सविकार – एक दिग्, देश, काल से अपरिच्छिन्न और दूसस परिच्छिन्न । इनमें निराकार निर्विकार अपरिच्छिन्न रूप को तो पहले के अनुसार विज्ञान ही कहते हैं किन्तु दूसरे साकार, सविकार और परिच्छिन्न रूप को ' सत्ता ' कहते हैं । [ १३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ॐ सत्ता । यह तीनों भिन्न दीखने पर इस प्रकार एक ‘ आभु ' के ३ रूप सिद्ध हुए - आनन्द विज्ञान और है किन्तु यह समष्टि, व्यष्टि का भेद है । भी वास्तव में एक ही वस्तु है । यद्यपि ' सत्ता ' परिच्छिन्न दोखती खण्ड २ करके अनेक संस्था में पाये जाते व्यष्टि - दशा में केवल सत्ता ही नहीं, विज्ञान और श्रानन्द भी में ये तीनों अनन्त और व्यापक हैं । जिनको जीव आत्मायें कहते हैं किन्तु इन ही तीनों की समष्टिदशा और व्यापक प्रतीत होती है । रूप में आ जाते हैं । उस दशा में ' सत्ता ' साकार होने पर भी निराकार उस समय उन तीनों का भेद समझना भी कठिन हो जाता है । अभ्व विज्ञान से अब हम ग्रम्ब के स्वरूपों का वर्णन करेंगे । जिस प्रकार आनन्द से विज्ञान और ही सत्ता प्रतिपन्न हुआ है ( समझ में ग्राया है ) उसी प्रकार ग्रव सत्ता कर्म, रूप, नाम ये तीनों ' अम्व ' प्रतिपन्न होते हैं । जब हम अपने विज्ञान में किसी सत्ता को पाते हैं और उसकी ग्रीर खासकर दृष्टि डालते हैं तो वह सत्ता जो अखण्ड अनवयव होकर प्रतीत होती थी, उसमें तीन प्रकार के ग्रन्थ भाव पृथक् - पृथक् हमें प्रतीत होने लगते हैं— कर्म, रूप और नाम । मान लीजिए कि हम घट देख रहे हैं अर्थात् घट की सत्ता प्रतीत हो रही है तो उसमें यदि हम विशेष दृष्टि दें, तो सबसे प्रथम कुछ ऐसा श्राकार गृहीत होता है कि जिससे उस वस्तु की सीमा कायम होती है । और उस सीमा के अन्दर कुछ रंग प्रतीत होता है कि जो उस सीमा के बाहर नहीं है । यही आकार श्रीर रंग उस वस्तु का रूप कहलाता है । और वह किसी पृथ्वी भाग या प्रकाश के भाग को श्रावरण करता हुआ प्रतीत होता है । हमारे विज्ञान की किरणों को भी धक्का देकर श्रागे जाने से रोकता है और वापस लौटा कर अपने स्वरूप को किसी श्रात्मा के पहुंचाने का कारण बनता है । इसके अतिरिक्त उसके कितने ही श्रौर भी कर्म, जिनके लिए कि उस वस्तु । इस का संसार में जन्म है, गृहीत होते हैं प्रकार प्रत्येक वस्तु के ३ कर्म होते हैं अर्थात् उस वस्तु के ज्ञान होते वक्त उसके नाम का अभिनय किया जाता है अर्थात् उसका नाम मन में श्रा जाना ही उस वस्तु के ज्ञान का स्वरूप जिस प्रकार ' गाय ' यह नाम सुनने से गाय का रूप मन में चढ़ प्राता है बनता है । रूप को देखते ही ' गाय ' यह नाम मन के अन्दर बिना वोले ही वुल । इस प्रकार गाय के प्रत्येक दृष्टि में जो कुछ सत्ता प्रतीत होती है उसमें विशेष जाता है । तात्पर्य यह है कि ज्ञान में आते हैं । इन्हीं तीनों के नाने से किसी वस्तु कर्म, विशेष रूप और विशेष नाम ही कहते हैं । की सत्ता ज्ञान में आती हैं । इन्हीं तीनों को अभ्व इस प्रकार ६ रूप सिद्ध हये इनमें ' प्रथम के ३ अर्थात् प्रानन्द और इनको ' प्रभु या द्रष्टा कहते हैं, विज्ञान सत्ता , यह सत् है, श्रीर दूसरे तीन अर्थात् कर्म ' या दृश्य कहते हैं । वे ' ग्रसत् और नाम इनको ' अभ्व , रूप ’ । यद्यपि इस प्रकार सत् श्रसत् का भेद किया जाता है तथापि वास्तव [ १४ ]
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मैं ब्रह्मविज्ञान में इन दोनों भावों को ' सत् ' ही समझना चाहिए । क्योंकि जो ज्ञात होता है वही - " है " और जो " है ” वही ज्ञात होता है | और जो " है " और जो ज्ञात होता है वह " है " और " ज्ञान " इन दोनों का आश्रय होने से ग्रानन्द कहलाता है । इस प्रकार सभी कर्म, रूप, नाम का जगत् " है " और " ज्ञात " होता है । इसलिए ग्रानन्द रूप है । किसी समय सब से प्रथम यह एक दर्शन प्रचलित हुआ था किन्तु इसी सद्- प्रसद् - वाद पर विचार करते २ कितने ही समय पीछे इसमें दो मत हो गये । एक पक्ष यह था कि इनमें " सत् " ही मुख्य है “ असत् ” कोई वस्तु नहीं अर्थात् " प्रभु " जो द्रष्टा है, वही जगत् की ग्रात्मा है और वही " मैं ” ( जीव ) हूं इसी श्रात्मा से सत्ता के द्वारा तीनों " अभ्व " अर्थात् कर्म, रूप, नाम कल्पित हो गये हैं । वास्तव में आनन्द, विज्ञान, सत्ता ये ही ३ तत्त्व हैं और ये ही तीनों मिलकर जगत् है - यह एक दर्शन हुआ । दूसरे पक्षवाले कहने लगे कि कर्म, रूप, नाम, ये जो ३ ' प्रभ्व ' कहलाते हैं वास्तव में इन ही को तो हम चारों ओर देख रहे हैं । जिनको हम बार - बार सर्वत्र देखते हैं और जिस देखने को हम घोखा खाना नहीं मान सकते उनको न मानकर झूठा कायम करना सर्वथा अनुचित है । जो तीन ' प्रभु ' के रूप कहे गये हैं, वे भी एक - एक प्रकार के रूप हैं । उनमें भी कर्म है, उनके भी नाम हैं । बस जबकि यह ३ तत्त्व मान लिए गए तो इनसे जुदा कह कर कोई भी वस्तु न कहीं जा सकती है और न खयाल ही में श्रा सकती है, क्योंकि कहना नाम से और खयाल करना रूप से सम्बन्ध रखता है । ' आभु ' तीनों को श्राप अवश्य किसी न किसी रूप में ही खयाल करते हैं । इसी लिये उनके कुछ नाम भी रख लिये हैं । फिर वे नाम, रूप से पृथक् कैसे हो सकते हैं । अब रहा यह कि ये तीनों नित्य हैं तो रहें, यह कोई नियम नहीं है कि कोई नित्य ही पदार्थ बिना प्रमाण के भी मान लिया जाय । यदि प्रमाण से अनित्य ही पदार्थ सिद्ध होता है तो वही वास्तविक तत्त्व होगा । तात्पर्य यह है कि आत्मा कोई नित्य पदार्थ नहीं है । “ मैं ” भी अनित्य हूं यह दूसरा दर्शन हुआ । इस प्रकार दो मत होने पर बहुत दिनों तक इन दोनों पक्षवालों में विवाद और विरोध चलते रहे और सद्सवाद में ही कई मतमतान्तर खड़े हो गये जो ग्रागे दिखाये जायेंगे । नाना प्रकार के विरुद्ध मत होने पर किसी - किसी ने ऊब कर ( उख़ता कर ) संशयवाद कायम कर दिया । यही संशयवाद ग्रागे दिखाया जाता है । इति मूलोपनिषद् सदसद् - वाद का प्रत्ययाद्वैत के सम्बन्ध में संशयोपनिषत् । [ १५ ]
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संशयोपनिषद् [ २ ] स्याद्वादसूत्र ॥१ ॥
मूल उपनिषद् के पश्चात् सत् और असत् इन दोनों भावों को लेकर बहुत से मत इतने बढ़े कि उनमें से एक को भी निश्चयरूप से पकड़ कर किसी बात का सिद्धान्त करना कठिन हो गया । इसीलिए कितने ही ग्राचार्यों ने उन सब विरुद्ध मतों को मान कर स्याद्वाद का स्थापन किया जिससे " सप्तभङ्गी " ( सात टुकड़े ) नाम से एक ' नया ' ( कायदा ) अर्थात् युक्तिविशेष जो कायम की, वह इस प्रकार है । १ स्यादस्ति, २ स्यान्नास्ति ३ स्यादस्तिनास्ति ४ स्यादवाच्यम् ५ स्यादस्ति प्रबाध्यम ६ स्यान्नास्ति श्रवाच्यम्, ७ स्यादस्तिनास्ति ग्रवाच्यम् । ग्रर्थात्— १ - सम्भव है कि यह सब सत् ही सत् हो । २- सम्भव है कि यह सब ग्रसत् ही ग्रसत् हो । ३ - यह् भी सम्भव है कि यह सब सत् - सत् दोनों हो । ४ — सम्भव है कि यह सब ग्रनिर्वचनीय हो । अर्थात् किसी एक रूप में यह सब कहा न जा सकता हो । ५ - सम्भव है कि यह सब सत् होकर भी ठीक - ठीक कहा न जा सके । ६ - सम्भव है कि यह सव असत् होकर भी ठीक - ठीक कहा न जा सकता हो । ७ - यह भी सम्भव है कि यह सब सत् या ग्रसत् दोनों हों किन्तु ठीक - ठीक कहे न जा सकते हों । बस इस प्रकार निरुक्त और ग्रनिरुक्त मे दो भेद नियत करके एक निरक्त में ३, और दूसरे ग्रनिरुक्त में ४ भेद मान कर ७ भेद स्थिर किये गये । तात्पर्य यह है कि सत् और असत् को लेकर जितने प्रकार के मत उस समय प्रचलित हुए थे, उन सब विरुद्ध मतों को संग्रह करके सब का सम्भव होना इस मत में स्वीकार किया है— मानों एक प्रकार से सब विरोध का परिहार ( मिटाना ) किया गया किन्तु इससे यहसिद्ध हुआ कि इस जगत् के सब ही पदार्थ इस प्रकार छिपे हुए हैं कि इनका सूक्ष्म विचार करने पर भी इनकी असलियत न ग्राज तक कभी किसी को ज्ञात हुई, न आगे कभी किसी को ज्ञात होगी, फिर इसके लिए सिर तोड़ परिश्रम करके विचार करना व्यर्थ है । जो जैसा कुछ तुम इसको समझ लो या मान तो, वह सब सम्भव है और सब तरह हो सकते हैं । बस यही इस मत का सिद्धान्त है । यह संशयवाद रूपी स्याद्वाद है । यह बहुत पुराने समय से चला आता है । जिसको भगवान् ' जिन ' या जिनेन्द्र स्वामी ने स्वीकार करके उपदेश किया किन्तु बहुत काल पश्चात् ' उमास्वामि ' आचार्य ने ' सूत्रजी ' निर्माण करके एक प्रकार का दूसरा दर्शन प्रचार किया । जिसमें सम्पूर्ण जगत् के [ १६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान पदार्थ एक निश्चित रूप प्रणाली पर मान लिये गये हैं जैसा कि - ' सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रारिण मोक्षमार्गः ' । प्रर्थात् सही - सही देखना, समझना और चलना मोक्ष का द्वार है । “ तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् जीवाजीवाश्रवबन्धसम्वर निर्जरा मोक्षास्तत्वम् ”
अर्थात् जीव, जीव, आश्रम, बन्ध, सम्वर, निर्जरा और मोक्ष ये ७ तत्त्व हैं ।
मूलाशुद्धिसूत्र ॥ २ ॥
जगत् की सृष्टि के सम्बन्ध में मुलतत्व को ढूंढने के लिए विचार करना सर्वथा व्यर्थ है । क्योंकियह विषय मनुष्य बुद्धि के बाहर है । हम इस सम्बन्ध में लोगों के अनेकानेक विरुद्ध विचार देख रहे हैं । भला क्या कहा जा सकता है कि इनमें कौन सत्य या मिथ्या है । जैसा इस जगत् का बीज किसी ने ' परमाणु ' कहा है, किसी ने ' प्रत्यय ' को माना है, कोई परमेश्वर की इच्छा से जगत् का होना बताता है । यह परमेश्वर भी किसी के विचार से जगत् के बाहर घड़े के अनुसार जगत् को बनाने वाला माना गया है । और किसी के विचार से इस सारे जगत् को ही परमेश्वर कहते हैं । और किसी के विचार में इस जगत् के प्रत्येक विषय में अन्दर घुसा हुआ परमेश्वर माना जाता है । भला कह सकते हैं, कि इनमें कौनसा विचार सत्य? मेरे विचार से तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं उपरोक्त सब ही विचार वाले सन्देह में पड़े हुये हैं । यह सब मत सन्दिग्ध हैं कोई विचार स्थिर नहीं किया जा सकता । यह केवल मेरी ही राय नहीं है किन्तु कितने ही प्राचीन महर्षियों ने भी नाना प्रकार के इन मतों को देखकर अपना असन्तोष प्रकट किया है । जैसा कि भगवान् विश्व-उपहास करके सन्देहवाद स्थापन कर्मा महर्षि और भगवान् परमेष्ठी प्रजापति ने उन सब मतों का किया है । जैसा कि ऋग्वेद के १० वें मण्डल ८२ सूक्त में विश्वकर्मा बहुवन ऋषि ने ' न तं विदार्थ ' इत्यादि मन्त्र कहा है । इसका अर्थ है कि तुमने उसको नहीं पहचाना है जिसने इस जगत् को पैदा किया, तुम लोगों की बुद्धि में कुछ और ही बात समा रही है । इस सम्बन्ध में जितनी बहस की जाती है, वे सब बर्फ से ढके हुए के सदृश हैं । इस जगत् के मूलतत्व ढूंढकर कहने वाले सब कुछ कहकर भी अपनी ग्रात्मा में पूर्णरूप से सन्तुष्ट न होकर ही फिरते हैं । इन्हीं विश्वकर्मा ने ऋग्वेद दशम मण्डल ८१ सूक्त में ' किस्विद्वनम् ' इत्यादि मन्त्र कहा है | अर्थ यह है कि वह कौनसा वन है और उस वन का कोनसा वृक्ष है कि जिसको काट कर इतना बड़ा त्रैलोक्य बनाकर खड़ा किया गया है । हे विद्वान् लोगों इस बात को हल करने के लिए मन ही गन ग्राप लोग उससे पूछो, जो सम्पूर्ण विश्वमण्डल को थाम कर सब पर हावी होकर बैठा है । इसी प्रकार ‘ परमेष्ठी प्रजापति ' ने भी ऋग्वेद के दशम मण्डल १२६ सूक्त छठा और सातवां मन्त्र कहा है जिसका तात्पर्य यह है कि किसने साफ - साफ तौर पर समझा है, और किसने निःसन्देह होकर साफ - साफ इसका वर्णन किया है कि यह जगत् कहां से आया और कैसे इस प्रकार का बन गया । देवतागण जगत् को भीतरी चीज हैं । पीछे उत्पन्न हुए हैं । यह इस सृष्टि के पैदा करने में असमर्थ हैं । कौन जानता है कि कहां से, कैसे, यह कहां तक फैला हुआ है । तात्पर्य यह है कि लाख [ १७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान विचार करने पर भी इसका मूलतत्त्व सर्वथा अज्ञेय और अनिर्वचनीय है । ( ६ ) यह जगत् जिस मूलतत्त्व का बना हुआ है वह ऐसी कोई निराली चीज है या नहीं इस बात को वही जानता है जो इस विशाल ग्राकाश में बैठा हुआ कोई संसार का मालिक है । अथवा यों समभो कि वह भी शायद ही जानता हो । ( ७ ) इस प्रकार महा बुद्धिशाली महाविद्वानों की भी यही राम पाई जाती है कि इस संसार का मूलतत्त्व अभी तक शुद्ध नहीं हुआ अर्थात् स्पष्ट रूप से जाना नहीं गया और न जाना जा
सकता है ।
तूलाशुद्धिसूत्र ॥ ३ ॥
अनेक दार्शनिक लोगों ने इस जगत् के सम्बन्ध में खूब सोच - सोच कर जितने सिद्धान्त स्थापित किये हैं, उनमें से किसी को भी हम सत्य नहीं कह सकते हैं क्योंकि उनमें किसी का मत भी ऐसा नहीं है कि जिस पर विरुद्ध दलील खड़ी न की जा सके । जैसा कि समझो— मैं जगत् को देख रहा हूं उस मेरे देखने में द्रष्टा और दृश्य दोनों जुदे २ प्रतीतहोते हैं । उनमें दृश्य के देखने का कर अलग कर दें तो कहो कि वह मूल कारण केवल दृष्टा है । यदि हम दृष्टा के भाग को निकाल दृश्य क्या कुछ भी दीख सकता है? - कभी नहीं । इससे सिद्ध हुआ कि वह दृश्य द्रष्टा से जुदा वस्तु नहीं है । अथवा वह दृश्य सर्वथा नहीं है! मेरे ज्ञान ने ही दृश्य का रूप बनाया है । दूसरा यह है कि जिस दृश्य को मैं देखता हूँ वह मेरे ज्ञान का रूप है किन्तु उस रूप के बनने का का कारण, उससे अतिरिक्त कोई दृश्य वस्तु है । अथवा जो कुछ हमें प्रत्यक्ष होता है, वही वास्तव में दृश्य है । इन बातों पर खूब विचार करने पर भी क्या कोई निर्धारण करके कह सकता है कि वास्तव में दृश्य क्या है । जब यह नहीं कहा जा सकता तो उस दृश्य के लिए विचार करना व्यर्थ है इसलिए उसको अब द्रष्टा जो आंख से देखता है, नाक से सूंघता है, कान से सुनता है, जीभ से चखता है, त्वचा से स्पर्श करता है, इन सव ज्ञानों में द्रष्टा के द्वारा दूसरे पदार्थ दीखते हैं, किन्तु उस द्रष्टा को जिस पर कोई इन्द्रियां नहीं जा सकती, न द्रष्टा ही आप अपने ऊपर जा सकता है, ऐसी सूरत में उस द्रष्टा का वास्तविक रूप क्या है, क्या कभी किसी ने जाना? क्या कोई जान सकता है कभी नहीं । जब कभी हमने द्रष्टा को देखा है तो बाहर वाले किसी रूप में बदले हुए को ही देखा है किन्तु उस वाह्य-रूप को अलग करके द्रष्टा का असली रूप क्या है, कभी कुछ ज्ञात नहीं होता और जबकि प्रांख, कान आदि इन्द्रियों की सहायता न हो अर्थात् यह इन्द्रियां बाहर के पदार्थों से यदि स्पर्श न करें, तो यह द्रष्टा कभी किसी वस्तु को देख ही नहीं सकता । इस प्रकार द्रष्टा जव इन्द्रियों के साथ बाह्य किसी दृश्य पदार्थ से योग करता है तब इन तीनों के मिलने से उस ही समय एक नयी वस्तु बनती है जिसको कि हम देखना कहते हैं । वह सहयोग से बना हुआ पदार्थ सत्य नहीं हो सकता किन्तु जिनके संयोग से वह रूप वन गया है वह द्रष्टा, दृश्य व इन्द्रिय कोई भी अपने असली रूप में कैसा है सो जाना नहीं जा सकता । द्रष्टा है इसलिए दृश्य का रूप उसके भीतर भासता है । उस दृश्य की ' सत्ता ' द्रष्टा से कभी जुदा नहीं हो सकती । श्रथवा इससे उलटा समझो कि जव द्रष्टा कभी दृश्य के रूप में बदलता है । तब [ १८ ]