ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 321–330

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 321–330

पृष्ठ 321

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* ब्रहाविज्ञान * मुमूर्षु ( मरनेवाला ) के मरण से कुछ पूर्व तक हृदयमात्र में अन्तधि रहता है । उसी ज्ञान प्रकाश के साथ सब इन्द्रियां प्राणों को लिये हुए मुख्य प्राण ब्रह्मरन्ध्र के छिद्र से निकलती । यदि उस विज्ञान से मिले हुए प्राज्ञात्मा में पापरूपी दुर्गामनायें भरी हो, तो उसी दुर्वासना की मात्रा के अनुसार भारी होकर वह विज्ञानमय प्राण नीचे की ओर झुक जाता है । इसलिए ब्रह्मरन्ध्र के द्वार से न निकलकर कदाचित् चक्षु से या और किसी शरीर के भाग से निकलता हुआ देखा गया है । मृत्यु के समय जिस अङ्ग से आत्मा निकलता है उस अ में कुछ न कुछ विकार अवश्य हो जाता । जो आत्मा निकल जाता है उसमें सब ज्ञानेन्द्रिय, सब कर्मेन्द्रिय, मुख्य प्राण, विज्ञानप्रात्मा और प्रज्ञानात्मा और भूतों का अनुशय इतने साथ होकर सम्मिलितरूप में उत्क्रमण करता है । स्वप्नकाल में जिस प्रकार का या जितना बोध प्राणी को रहता है, उसी प्रकार का उतना ही बोध उत्क्रमण के पीछे भी रहता है । यह इतनी श्रात्मा की मात्रा सूर्य, चन्द्रमा और विदात्मा के रमों से बनी हुई होती है, वह प्रत्यन्त मङ्गल और अत्यन्त पवित्र है । जब तक वह ग्रात्मा शरीर में रहना है तब तक शरीर के अपवित्र भागों को भी पवित्र रखता है । नख, केश, मांस, शोणित आदि सब शुद्ध रूप में अनुभूत ( ज्ञात ) होते हैं । किन्तु ये सब जीवित शरीर से भी अलग करने पर अपवित्र हो जाते हैं और शरीर से आत्मा के उत्क्रमण होने से मृत्यु होने पर इस शरीर के सभी ग्रङ्ग प्रत्यङ्ग उनी समय सड़ने लगते हैं । थोड़े ही समय में अत्यन्त दुर्गन्धि निकलकर बाहर के वायु तक को गन्दा कर देती है । यह सड़ना या दुर्गन्ध होने की क्रिया जीवितदशा में भी अवश्य ही जारी रहती होगी । किन्तु इसी पवित्र आत्मा के कारण ये सब दोष दूर होकर यह शरीर अत्यन्त सुन्दर निर्मल और पवित्र बना रहता है । इस शरीर की पवित्रता से उस आत्मा की पवित्रता सिद्ध होती है । महान् आत्मा पिप्पलाद ऋषि ने कहा है कि यह आत्मा षोड़शी है, अर्थात् सोलह कला वाली है । वे १६ कलायें ये हैं | १ प्राण, २ श्रद्धा, ३ से ७ तक पञ्चभूत इन्द्रिय, ६ मन, १० अन्न, ११ अन्न से उत्पन्न वीर्य, १२ तप, १३ मन्त्र १४ लोक, १५ नाम, १६ कर्म । जिस प्रकार र चक्र की नाभि में चारों ओर अरे जुड़ी रहती है, उसी प्रकार इस पुरुष में ये १६ कलायें चारों ओर ठहरी हुई हैं । जिस सूर्य से रश्मियाँ उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई उसी मण्डल में लीन हो जाती हैं उसी प्रकार ये कलाएं भी इस ग्रात्मा में उत्पन्न होकर उसी के चारों ओर फैली हुई उसी ग्रात्मा में लीन हो जाती हैं । जिस प्रकार बहुत सी नदियाँ समुद्र में लीन होकर अपने नाम रूप को खो देती हैं, उसी प्रकार पुरुष में लीन होने पर इन सोलह् कलानों के नाम रूप भी नष्ट हो जाते हैं । केवल यह शुद्ध आत्मा ही रह जाता है | विचार करने से ये सोलहों पदार्थ इस शरीर में पाये जाते हैं । किन्तु इनका विशेष वर्णन पिप्पलाद ऋषि ने स्पष्ट नहीं किया है | और किसी ऋषि ने भी इनका उल्लेख नहीं किया है । अलबत्ता आजकल के नये पश्चिमी विद्वान् शरीर का विचार करते हुए इस शरीर में सोलहों पदार्थ मानते हैं । उनके नाम थे हैं --१ - प्रॉक्सीजन ( अम्लजन ) Oxygen २- हाइजन ३ – नाइट्रोजन ( यद्रुजन = बहती हुई ) Hydrogen ( नक्तद्रुजन = स्थ न = स्याही ) Nitrogen [ २८६ ]

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* ब्रह्मविज्ञान ४ – कार्बन ( अङ्गार = कोयला ) Carbon ५ – सल्फर ( गन्धक ) Sulphur ६ – फासफोरस पस्पर्श Phosphorus ७ - सोडियम ८- पुटासियम E - कैलसियम चूना १० - मैग्नीशियम ( ११ – लीथियम Sodium Potassium Calcium Magnesium Lithium Florin १२ - फ्लोरिन १३ - क्लोरिन Chlorine १४ – प्रायोडीन Iodine १५ – सिलीकन ( शिलाकण ) Silicon १६ – ग्रायरन लोह ) Iron शुक्र, ( चर्बी ) मूत्र, १६ बताये गये हैं । हड्डी, मांस, त्वचा, वसा हैं । इस शरीर के मूलतत्त्व ये ही से बने हुये मिलाना ) उद्वाप ( निकालना ) आदि सभी पदार्थ इन्हीं १६ मूल तत्वों के आवाप ( कुछ ने भी इस से भी शरीर में १६ ही तत्व सिद्ध होते हैं और प्राचीन महर्षियों विचार इस प्रकार आधूनिक परीक्षा उनका संबन्ध ठीक नहीं जचते हैं, इसलिए शरीर में १६ तत्व माने हैं, परन्तु इन नामों के परस्पर केवल इतना ही किया जाता है, इस पोडशी ग्रात्मा को इन्द्र कहते हैं । महान् ग्रात्मा का जन्म प्रकार् श्राकाश १ - पाँच कोशों में से तीसरा जो मनोमय कोश है अर्थात् प्राणों से भरा हुआ प्रकाशवान् के सदृश मनोमय ग्रात्मा है । वह प्राण शरीर प्रकाश रूप और सदृश श्रात्मा है । है । बना २ - चन्द्रमा का रस जो मृत और मृत्यु दाना का सम्मिलित रूप है, उसी से यह ग्रात्मा है वह अवश्य में १३- कौषीतकीय ब्राह्मण में कहा है कि जो ग्रात्मा इस पृथ्वी से निकल कर जाता मार्ग मुक्ति से ही चन्द्रमा में जाता है । भूतात्मा महान् ग्रात्मा से संमिलित होकर चन्द्रमा से फिर चाहे में चन्द्रमा । जाय या स्वर्ग मार्ग में जाय और नरक मार्ग में जाय या वापिस पृथ्वी में जन्म लेवे इन का है लौटकर जब पृथ्वी में आता है तब श्रद्धामय रहता है | श्रद्धा यह नाम सोम में रहने वाले पानी ( जो श्रद्धा से वह श्रद्धा सूर्य के रश्मिस्थित देवताओं के द्वारा द्यौ में हवन किया जाता है । जब तक वह होने पोमय था ) सोम हो जाता है । उस सोम की पर्जन्य ( बरसाती हवा ) के शरीर में ग्राहति में उदराग्नि की के पुरुष से वर्षा होती है । वर्षा जल की पृथ्वी में ग्राहुति होने से श्रन्न होता है । अन्न प्रकार है । इस प्राहुति होने से शुक्र होता है उस शुक्र की स्त्री के गर्भाशय में आहुति होने से गर्भ होता हई ग्रात्मा से लौटती श्रद्धा, सोम, वृष्टि, ग्रन्न, शुक्र, इन पाँच ग्राहृतियों के द्वारा इसी मार्ग से चन्द्रमा [ २६० ]

पृष्ठ 323

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ब्रह्मविज्ञान गर्भ में प्रवेश करती में जन्म है जिसका वर्ष लेता है छठे मास में विकास में सोलहों । यहीं चान्द्र होने से चेतन होकर के शोणित कलाओं आत्मा महान् वह गर्भ सातवें या दसवें का कहलाता है, यही मनोमय मास उत्पन्न रूपी विकास है । इस मन की अग्नि या परिपाक होकर जन्म से सोलहवें होता है में पुरुष पूर्णता होती है तभी । उसका का शुक्र रूपी बालकपना मिटता है सोम आहत होता । स्त्री क्रम यह है । यह पुरुष का है- शुक्र चन्द्रमा के सोम से किरण चन्द्रमा जिस लगातार समय उदय होता ई हई डालता है उसी समय से किरणों रहता है ग्रस्त होने तक अन्न रस से बने जाता । अस्त होने हुए शुक्र में अपने है का एक पर फिर उदय तक । जिससे थोक बनकर उन किरणों के न आने से उन पहली इसलिये फिर बिन्दुरूप हो जाता है । २८ चन्द्रोदय में वह चन्द्रमा के अस्तकाल में पककर शुक्र में दिन आए दृढ़ हो २८ के चान्द्रमास हुए किरणों के कच्चे रस का उस बिन्दु से में आ प्रकार में २८ नक्षत्रों मेल नहीं होता । जाता के विन्दु का भिन्न - भिन्न रस चन्द्रमा के वाले है उत्पन्न रस से मिलकर पुरुष के पहले और उसी कर देते हैं । के बिन्दु बिन्दू पहले नक्षत्र से २८ दिन पश्चात् फिर वह चन्द्रमा अपने पहले स्थान के सजातीय मिलकर जो उत्पन्न ही शुक्र में नया बिन्दु उत्पन्न करता है वह २६ वें दिन हुए चतुर्थ होते रहते होता है, नयेरूप का नहीं होता नक्षत्रों ग्राहति हैं ॥ इसलिए शुक्र में कुल २८ जाति के ही उन २८ के वाले बिन्दुओं का एक एक पिण्ड बनता है यही पिण्ड चन्द्रमा से आये से इस रस से शुक्रमय आत्मा पिण्ड युक्त होता का स्वरूप है । पिण्ड बिगड़ता और जाकर का है, जिस यह बनता रहता है, यह २५ अग्नि आरम्भ नक्षत्र में पुरुष का जन्म होता है उसी पाकर से होता नक्षत्र वाले दिन के सोम बिन्दु छठे संयोग करके है, वही महान् का मुख्य है । यह पिण्ड शुक्र के द्वारा स्त्री के गर्भाशय में स्वरूप मास में शुक्र शोणित धारण विकसित से शरीर का सङ्गठन होने पर चन्द्र छठी आवृति में पूर्ण बल होता है अर्थात् , छठे मास में सब अङ्ग विकसित करता है इसी होकर पृथक् चेतना का महान के विकसित या स्पष्ट होनेपर विज्ञानमय आत्मा या प्रज्ञानमय आत्मा भी उबुद्ध होते हैं । स्थायी इसप्रकार शुक्र महान् जिस शुक्र में बनता आत्मा के महान् आता है वह स्थायी महान आत्मा का है उसी श्रागन्तुक है । एक शुक्र जिस एक में उस एक प्रङ्ग में से रस निकलकर उसी स्थायी के आकार का भ्रूणमय शुक्र का महान आकर ( माया बना हुआ का जो स्थायी महान् का आकार है उसमें यह भ्रूणमय चन्द्रमा में पृथ्वी एक ही हुआ ) महान् अङ्ग के संनिविष्ट दोनों मैं स्त्री में महान् अङ्ग से जड़कर जहां तहां होकर एक रूप पहला ग्रात्मा बन जाता आये ) महान आत्मा है, की जन्म है है । यही इस चन्द्रमा से आगन्तुक ( हुए , वह वह उसका ग्रात्मा और स्त्री में जाकर शोणित से मिलकर दूसरी बार जन्म लेता है । इस जन्म वह ग्रात्मा जब भूमिष्ठ होता एक होती है, फिर स्त्री की आत्मा से निकल कर उस पृथ्वीलोक आत्मा का तीसरा जन्म है और में दिव्ययोनि ॥ मरने के पश्चात् श्रग्निदाह करते हैं तब उस अग्नि के द्वारा फिर के अग्नि चार में जाने के प्रकार ब्राह्मण के शरीर का गर्भ बार लिये चौथा जन्म होता है । इस के तक जन्म गर्भ में और में गर्भ में होता है । पिता के गर्भ में, माता के गर्भ में, पृथ्वी के ब्राह्मण ये चारों संस्कार भी वेद का जन्म जन्म तो इस पृथ्वीलोक में प्राकृतिक हैं । किन्तु उपनयन माना जाता है है । जिनका उपनयन नहीं होता यह जन्म संस्कृत या कृत्रिम [ २ ९ १ ]

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का ब्रह्मविज्ञान या ग्रन्त में दाह नहीं होता ऐसे प्राणियों के तीन जन्म होना स्वाभाविक है । किन्तु प्रयोनिज शरीर है जैसे लकड़ी में घुन उनका एक ही बार जन्म होता है । इस प्रकार इस महान् श्रात्मा के रहते हुए भूतात्मा का एक बार, तीन बार, अथवा पांच बार पृथ्वी में जन्म लेना सम्भव है । सपिण्डविचार किसी मनुष्य के शरीर में जो शुक्र में चन्द्रमा से २८ दिन का रस ग्राकर २८ बिन्दु का एक पिण्ड बनता है | वह पिण्ड स्त्री के गर्भ में प्रवेश करते समय सब नहीं जाता, किन्तु उसमें से २१ बिन्दु का एक भाग स्त्री के गर्भ में जाकर उस से पुत्र उत्पन्न होता है और ७ बिन्दु का भाग पिता के शरीर में स्थायीरूप रहता है इसी प्रकार वह २१ विन्दु का भाग जो पुत्र में गया है उस से १५ बिन्दु का भाग निकलकर पात्र बनता है और छः भाग पुत्र के शरीर में स्थायी रूप से रहता है । उस १५ भाग में से १० भाग निकलकर प्रपौत्र का शरीर बनता है और ५ भाग पीत्र के शरीर में स्थायी रूप से रहता है । १० भाग में से ६ भाग निकलकर वृद्ध प्रपीत्र बनता है और ४ भाग स्थायी रूप से प्रपौत्र में रहता है । ६ भाग में से तीन भाग निकलकर प्रति वृद्ध प्रपौत्र बनता है और ३ भाग वृद्ध प्रपौत्र में रह जाता । ३ भाग में से १ भाग से वृद्धातिवृद्ध प्रपौत्र बनता है और दो भाग प्रति वृद्ध प्रपौत्र में रह | जाता है । फिर वह १ भाग भी वृद्धातिवृद्ध पौत्र में ही रह जाता है । प्राठवीं पुश्त में उस २८ विन्दु का कुछ भी भाग नहीं जाता इसलिये २८ बिन्दु के पिण्ड का ७-६-५-४--३-२-१ इस क्रम से सात पुरुष ( पुश्त ) में सन्तान अर्थात् फैलाव होता है, इसलिये इन सात को सन्तान कहते हैं, और इन सातों में एक ही पिण्ड के भाग विभक्त होकर रहते हैं । इसलिये इन सातों को सपिण्ड कहते हैं | इस पिण्ड का आठवीं पुश्त में कुछ भी भाग नहीं रहता, इसलिये वह सपिण्ड नहीं कहला सकता । इसके लिये शास्त्र का वचन है-" तापिण्डयं साप्तपौरुषम् ग्रर्थात् सपिण्डता सात पुरुष तक है । प्रत्येक मनुष्य किसी के अनुरोध से ७ वीं पीढ़ी का है और किसी के ६ ठी पीढ़ी का और किसी के ५ वीं, ४ थी, ३ री, या दूसरी का है । इसलिये पिण्ड का एक बिन्दु किसी के दो या तीन, चार, पाच, छः सात जिसका यह पुत्र है उसका २१ वां ग्रंश, उसके प्रतिमाह का १५ अंश, और उसके प्रतिमाह का १० अंश, और वृद्ध प्रपितामह का ६ अंश और प्रतिबुद्ध प्रपितामह का ३ ग्रंथ, और वृद्धातिवृद्ध प्रपिता-मह का १ अंश इस प्रकार ४६ अंश पितरों को लेकर प्रत्येक मनुष्य उत्पन्न होता है । तत्पश्चात् उसमें २८ अंश खुद का उत्पन्न होता है । इस प्रकार दो भाग पितरों का और एक भाग विज का कुल मिला-कर सोम के चौरासी अंग प्रत्येक महान आत्मा में होता है । किन्तु जब वह पुत्र उत्पन्न करता है तो २८ में से ७, २१ में से ६, १५ में से ५, १० में से ४, ६ में से ३ और ३ में से २ र १ पूरा अपने पास रखकर कुल २८ अंशमय पितरों के और निज के मिलाकर स्थायी रूप से रख लेता है बाकी ५६ अंश अपने पुत्र के शरीर के जिए समर्पण कर देता है ये २० ग्रंश जो उसमें शेष रह जाते हैं उनको जब उसकी मृत्यु होती है तब वह श्रात्मा चन्द्रमा में जाकर चन्द्रमा में रहते हुए छ: पुरुषों को क्रम से १, . २, ३, ४, ५, ६ देकर सात अंश अपने पास रख लेता है, इसी को सपिण्डीकरण क्रिया कहते हैं । [ २२

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* ब्रह्मविज्ञान प्रर्थात् जिन पितरों का जितना पिण्डभाग इसने अपने शरीर के लिए रख लिया था उनको वापस पितरों को समर्पण करके पितृऋण से मुक्त हो जाता है । उन पितरों के इस प्रकार अपने २८ विन्दु वाले पिण्ड के सब भाग जब तक वापस न मिल जायें तत्र तक उनके पिण्ड का अंग सन्तान रूप से पृथ्वी पर रहने के कारण पृथ्वी ग्राकर्षण बना रहता है । इसी से वे पितर चन्द्रमा से निकल कर सूर्य में जा नहीं सकते । अर्थात् उनकी मुक्ति नहीं हो सकती । इस प्रकार पितर का बन्धन चन्द्रलोक में बना रहता है ।! इसी अभिप्राय से शास्त्र में लिखा है-" अपुत्रस्यगतिर्नास्ति " अर्थात् विना सन्तान के पितरों का पितृलोक अर्थात् चन्द्रमा से गति नहीं होती । किन्तु मरकर मनुष्य जव चन्द्रलोक में पितरों का उनके पिण्ड का अंश उलटा देता है तो उनमें जिसको अर्थात् वृद्धातिवृद्ध प्रपितामह को जो सातवीं पीढ़ी में थे उनको एक अंश देता है | जिससे उनके २८ ग्रंश के सब भाग पूरे आ जाते हैं । अब उनका कुछ भी अंश पृथ्वी पर नहीं रहता जिससे पृथ्वी पर उनके सूत्र का बन्धन टूट जाता है और वह एक पितर उसी समय चन्द्रलोक से निकल कर सूर्य में चले जाते हैं और उनकी मुक्ति हो जाती है । इस प्रकार पितरों को मुक्ति पहुँचाना – यही पुत्र का मुख्य-पुत्र धर्म है । २८ बिन्दु के पिण्ड का जो महान् आत्मा उत्पन्न हुआ था वह आत्मा कुछ थोड़े ग्रंश ते पिता में रहूकर वाकी २१ अंश लेकर पुत्र रूप से उत्पन्न होता है । उस उत्पन्न हुए पुत्र में पांच और पित्तरों का भाग शामिल रहता है । इस प्रकार कह सकते हैं कि छ पितरों को छ महान् आत्मा कमी वेशी अंशों से एकत्र होकर एक पुरुष ( मनुष्य ) उत्पन्न होता है । उन छात्रों अवयवों के ग्रवयवी छ पितर जो चन्द्रमा में रहते हैं ये श्रद्धा सूत्र से संबन्ध करते हैं । इस प्रकार पैतृक षट्कोश ते पाट् कौशिक शरीर उत्पन्न करके सातवाँ कोश स्वयं उत्पन्न करता हैं । इस प्रकार सात कोश का बना हुआ महान्, प्रकृति कहलाती है | इसी प्रकृति की अधीन क्षेत्रज्ञ आत्मा की परिस्थिति रहती है । प्रायः सातों प्रकार का महान् वाला शुक्र विशेष कर तिर्यक् स्रोता होता है । उसके सातों कोशों के शुक्र ओज के स्वरूप में परिणत होते हुए नित्य क्षीण होते है | और फिर नित्य ही उत्पन्न होते रहते हैं । यदि कोई पुरुष ऊर्ध्वरेता या स्रोत हुआ तो उसके सब शुक्र योग में परिणत होते ही तत्काल मन में परिणत हो जाता है । उस सब से वह जो विचार या चिन्ता करता है उस में वह मन खर्च होता रहता हैं । किन्तु जो ग्रधो रेता ( अधःस्रोत ) गुरुष हैं उनके वे सातों कोशवाला शुक्र स्त्री के गर्भ में आहुत होकर अपत्य ( औलाद ) बनते हैं । उसी स्थिति में उन सातों कोशों के पूर्वोक्त नियमानुसार दो दो भाग होकर ८४ भाग में से २८ भाग पिता में रह जाते है । और ५६ भाग से पुत्र का शरीर बनता है । जो २८ भाग पिता में रह गये थे उनमें फिर चन्द्र किरणों के रस आकर फिर ८४ अंश पूर्ण हो जाते हैं । फिर पुत्र उत्पन्न होने पर २८ अंश पिता में रह जाते हैं जिन के फिर ८४ ग्रंश हो जाते हैं । इसी प्रकार आजीवन होता रहता है । पितृस्वधा पितृगण जो अट्ठाईस २ ग्रंशों का पिण्ड बनाकर अपना स्वरूप धारण करते हैं, उस पिण्ड में से कुछ कुछ ग्रंश अपने सात पीढ़ी के सन्तानों में सन्तनन ( फैलाते हैं ) करते हैं । वे सातों पीढ़ी में उनके [ २ ९ ३ ]

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ॐ ब्रह्मविज्ञान है । वे " रब " अंश ग्रंश “ स्वबा ” कहलाते हैं । क्योंकि वे अंश पितरों के " स्व " है, अर्थात् उन निज पितरों का अंग को स्वधायी कहते हैं । सन्तानों में धारण कराये गये हैं । इसलिये स्वधा कहलाते हैं । और धारण करता अथवा “ स्व ” नाम ग्रात्मा का है । ज्ञात्मा महान आत्मा में रहकर इस " व " को है । इसी प्रकार है, इसलिये पितर गण भी स्ववायी कहलाते हैं । और उनका ग्रंथ स्वथा कहलाता के ग्रंथों " स्व " में हैं उन्हीं देवताओं का अर्थ ग्रात्मा है । क्षेत्रज्ञग्रात्मा सम्पूर्ण देवतागण व्याप्त रहते, बहान को स्वाह कहते हैं । + ( " स्व " = क्षेत्रज्ञ, ग्राहाव्याप्त ) अथवा स्व का अर्थ क्षेत्र ग्रात्मा उसको अर्थात् न छोड़ने वाला अर्थात् क्षेत्रज्ञ से पहुँचने वाला जो ग्रन्न है उसको स्वाहा कहते हैं । महान् का ४ प्रकार से शरीर में रहना का ( तरल यह महान् ग्रात्मा श्रद्धामय है | यह श्रद्धा चन्द्रमा से उत्पन्न होने वाला एक प्रकार से में ४ प्रकार वस्तु ) आप है | यही मनुष्य के शरीर की योनि ( सांचा ) है | यह महान् इस शरीर मागे का रहकर अपना काम करता है । ग्राकृति, प्रकृति, ग्रात्म वृति और प्रकृति, इन्हीं चारों महान विचार करते हैं । १- प्राकृति महान् अर्थात् सभी योनियों में जो भिन्न भिन्न प्रकार की मूर्तियां दीखती हैं उन्हीं को आकृति कहते हैं । की मनुष्य मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बैल, भैंस, इत्यादि योनियों के ग्राकार अनादि काल से नियत हैं । पूर्व विक्तियां १०० वर्ष से अधिक नहीं रहती, परन्तु मनुष्य की प्राकृति है । लाखों वर्ष ग्रजर, अमर का मनुष्य की यह प्राकृति मौजूद थी और लाखों वर्ष पश्चात् भी ऐसे ही रहेगी, और उन मनुष्य जैसे स्वभाव यादि शरीर गत सभी धर्म पूर्व काल जैसे थे उत्तर काल में भी वैसे सी रहेंगें । पक्षी है " उड़ते थे सदा उड़ते रहेगें । तात्पर्ययह है कि जिस प्राकृति के साथ जैसा शरीर धर्म नियत हो चुकाका । वह उस प्रकृति के साथ अवश्य ही लागू रहता है | ( नित्य सम्बन्ध ) ये प्राकृतियाँ अवश्य ही प्रकृति लिहाज करती हैं, अर्थात् जैसी प्रकृति होती है वैसी ही ग्राकृति बनती देखते हैं है | हम प्रत्यक्ष पर शृङ्गार, वीर, करुणा, ग्रद्भुत, हास्य, भयानक वीभत्स रौद्र इत्यादि मनोवृति के बदलने ,,, शान्त बनते तत्काल ही प्राकृति में ग्रन्तर पड़ जाता है । इसी नियम के प्राकृति अनुसार सर्व प्रथम योनि की अर्थात् समय जैसी उस आत्मा की प्रकृति थी उसी के गई अनुसार काम करने योग्य उसकी आकृति बन मनुष्य हाथ से ग्रन्त उठा कर मुख में रखने की प्रकृति रखता चाहता है और मुख में उस अन्न को चबाना के है, इसलिये मनुष्य की प्राकृति में होठ मुलायम होकर पक्षी होठों के भीतर दाँत उत्पन्न हुए किन्तु महान आत्मा की प्रकृति ऐसी न थी वह अपने अन्न का है इसलिये उसके होठ कड़े हो गये । श्रर दाँतों के लिये जो मुख में ही उठाकर तोड़ना चाहती होकर दाँत रस ग्राये थे उनका होठों पर खिचाव में बनकर वैसे ही कई ग्रन्त के काटने योग्य हो गये योनियों ग्रर्थात् चोंच बन गई । इसी प्रकार सब + नमस्कार ( मनुष्य ) हन्तकार ( प्रेत ) स्वधाकार इन्द्र ) ( पितर ) स्वाहाकार ( देवता ) वषट्कार ( [ २२४ ]

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* ब्रह्मविज्ञान जैसी जिसकी प्राकृति बनी करना चाहता है वह अवश्य ही उसकी वैसी रखते है इसलिये प्रकृति से संबन्ध रखती है । शेर दाँत से हिंसा हैं उसका ति नोकीले इसलिये हुये + । किन्तु वेल, हिरण, माथे से ढोकर मास्ने की रसों से ऊपर दांत बनाने वाले प्रकृति-नोकीले सत्र रस माथे की ओर खिच आये की परीक्षा सींग वन गये । ऊपर के दाँत न बनकर उन । इसी प्रकार सभी प्राकृतियों में हुई है । उन का भेद प्रकृति के अनुसार ही होने मनुष्य , पशु पक्षी , श्रात्मा है ग्रादि जीवों का जो भिन्न भिन्न नियत । जितने आकार हैं यही भिन्न भिन्न महान् महान् का भूत भविष्यन् वर्तमान ,, होंगे स्वरूप है । इसी मनुष्य हैं सब में जो समानता पाई जाती है वही मनुष्य | किन्तु प्रकार सश्व वह मनुष्य श्रादि महान के धर्म सब समान होंगे । गो महान् के धर्म भी सब समान विज्ञान एक एक जातियों में जो जहाँ का संसर्ग ग्रात्मा कुछ थोड़ा बहुत व्यक्तिगत भेद लक्षित होता है । किसी मिटने, प्रज्ञान ग्रात्मा के संसर्ग से के श्रद्धाभाग में परिवर्तन होने से होता है । विज्ञान पर फिर महान बलमा श्रद्धा ज्यों की त्यों हो जाती है । जाति मिटता की उपचार स्वभाव नहीं । किन्तु यदि आकृति से सर्वथा कि भी श्रद्धा बदलने का श्रभ्यास कराया जाय तो श्रद्धा के बदलने से महान् बदल जायगी मनुष्य और वह दूसरी योनि का महान् दूसरी योनि का हो सकता है । संभव है दूसरे श्रद्धा परिवर्तन जन्म में के कारण किसी प्राकृति की करता जाने उसी योनि किसी दूसरी योनि का महान भावना हुआ यह में जन्म लेवे और योनि का है परिवर्तन उसका मनुष्य महान् बदलकर उस दूसरी महान् हो । महान इसी कठिन के अत्यन्त जन्म में नहीं होने पाता इसका कारण भूत आत्मा का भौतिक शरीर सङ्गठन होता कोमल श्रद्धामय शरीर की अपेक्षा भौतिक शरीर बलवान और कहीं है । इसलिये भूतात्मा का कहीं ऐसा श्रद्धा के परिवर्तन से भौतिक सनिवेश का परिवर्तन नहीं होने पाता । किन्तु मृङ्ग की भी अनुभव शरीर भी के योग प्राकृति हुआ है कि भङ्गकीट की प्रबल भावना से मकड़ी का भौतिक में बदल योगियों बल जाता है है कि मनुष्यों में भी प्रबल प्रभाव कर से श्रद्धामय । इसी प्रकार यह भी संभव दिया में परिवर्तन परिवर्तन जाये भावना के द्वारा मनुष्य का शरीर भी पशु पक्षी आदि के शरीर तो यह ग्रान्तरिक से जो भौतिक शरीर पर भिन्न का श्रद्धामय महान् शरीर के परिवर्तन दुर्बल शरीर प्रभाव पड़ता प्रेत के शरीरों में इस प्रकार भिन्न-बदलने की है उसी से होना सम्भव है कितने ही भूत सकते बात देखी सुनी गई है वे भी नितान्त निर्मल निमूल नही हो । गिनकर इस प्रकार प्रकार विद्वानों के महान जो कि नाना जातियों में बंटे हैं उन की सब जातियां प्राचीन समय में / -की ने ८४००००० इतनी ही हैं । अर्थात् इतने ही वे गोरण जीवों स्थिर की हैं । जगत् में कुल योनियां की के संसर्ग से हुए हैं । इसलिये हैं और प्राकृतियां है । उनके व्यक्तिगत आकृति भेद प्रज्ञान एक - एक उनकी भी संख्या नहीं हो सकती । श्राकृति में जो अनन्तानन्त व्यक्तियां हैं जो चौरासी लाख हैं । ग्रण्डज , पिण्डज ( जरायुज) जीव हैं, ऊष्मज ( स्वेदज ), उद्भिज्ज ये चार प्रकार के आकृतियों जितने नियतहैं, उसी प्रकार इन ऊँचाई की ऊँचाई महान हैं इनकी आकृतियां योनिभेद के अनुरोध से जिस प्रकार वे अपनी जवानी में उस पर भी नियत आदि बहुत से ऊंचे वृक्ष हैं अवश्य है । पीपल, गूलर सींचने पर भी पीपल की पहुँच जाते हैं के वृक्ष को जल या दूध से । परन्तु एक तुलसी [ २ ९ ५ ]

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* ब्रह्मविज्ञान ऊँचाई तक नहीं ले जा सकते । मनुष्य का शरीर भी आठ प्रादेश का होता है । अर्थात् १० || गुल के प्रादेश के हिसाब से ८४ अंगुल का मनुष्य शरीर होता है । यह इसकी नियत सीमा १२ अङ्ग ुल से न्यू-नाधिक होती है । अर्थात् कम से कम ७२ श्रङ्ग ुल का और अधिक से अधिक ९ ६ श्रङ्ग ुल का होता है । यह शास्त्रीयमान है किन्तु अपने अंगुल से मनुष्य का शरीर ६६ अङ्ग ुल का होता है । यह मध्यम मान भी बड़े - बड़े अङ्ग ुल से न्यूनाधिक होता है । कम से कम ८४ अङ्ग ुल का और अधिक से अधिक १०८ अंगुल का । इससे ऊँचाई में मनुष्य का शरीर कदापि ऊंचा नहीं जा सकता । मनुष्य की पूरी ऊँचाई अर्थात् प्रपद से खड़े होकर हाथ ऊंचा करके किसी का स्पर्श करें तो यह उसकी ऊँचाई १२० अंगुल की होगी । यह पुरुषमान मनुष्य के शरीर की परमसीमा है । इस प्रकार ३ ॥ हाथ ४ हाथ या ५ हाथ ये तीन मनुष्य के नियत नाप हैं । इसकी न्यूनाधिक भी एक नियत मान से ही कही गई है । इसी प्रकार हाथी, घोड़ा, सिंह, शशक, मूपक आदि सभी महान् की भिन्न - भिन्न ऊँचाई देखी गई है । एक हाथ का मनुष्य अज्ञानी वालक होता है । उसका ज्ञान, बल इन्द्रिय शक्ति सव अल्प होती हैं । किन्तु उतनी ही ऊंचाई का वानर पूर्ण तरुण माना जाता है उसका ज्ञान, वल, इन्द्रियों की शक्ति सव पूर्णता को पाजाती हैं यह ज्ञान और बल का परिपाक उतने ही बड़े मनुष्य बालक में क्यों नहीं होते ग्रथवा वानर के तरुण शरीर मनुष्य के अनुसार ३ ॥ हाथ की ऊँचाई पर क्यों नहीं जाते । इन सब प्रश्नों का उत्तर क्या है केवल " नियति ” है किन्तु यह शरीर उत्पन्न विनिष्ट होते रहते हैं । इनकी स्थिरता न रहने से इनके साथ कोई नियम पूर्व-काल से सदा के लिये नियत नहीं हो सकते । इसलिये अवश्य कोई स्थायी शरीर है जिसके साथ ये ऊँचाई के नियम सब लागू हुए हैं । वही शरार महान् ग्रात्मा कहलाता है जो कि ८४००००० योनियों में विभक्त हैं । शरीर की प्राकृति की यही नियति महान् ग्रात्मा का प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रकृति मनुष्य मात्र की प्रकृति भिन्न - भिन्न देखी जाती है, परन्तु यह भिन्नता शरीर के भेद से होती ही है, किन्तु एक शरीर में भी एक ही आत्मा की प्रकृति भिन्न - भिन्न कारणों से भिन्न - भिन्न अवस्था में भिन्न - भिन्न काल में भिन्न - भिन्न हो जाती है, यह प्रकृति स्वभाव कहलाती है । स्वभाव का अर्थ है श्रात्मा का भाव या वृत्ति । इसका तात्पर्य यह है कि क्षेत्रज्ञ आत्मा जो " स्व " कहलाता है उसको जो कुछ सुख दुःख मोह का भोग ग्रर्थात् अनुभव होता है उसका कारण यही महान् है । कारण को प्रकृति कहते हैं । इसलिये यह महान् क्षेत्रज्ञ की प्रकृति कहा जाता है । क्षेत्रज्ञ की प्रकृति कहने से क्षेत्रज्ञ आत्मा के सब भोगों की प्रकृति जाननी चाहिये । क्षेत्रज्ञ आत्मा की जितनी वृत्तियां होती हैं, जितने भोग होते हैं या जो कुछ वह करता है ये सत्र बातें प्रकृति अर्थात् महान् में ही संभव होते हैं । क्षेत्रज्ञ श्रात्मा कुछ नहीं करता । वह केवल साक्षी रूप से निर्विकार एक रस प्रकाश मान बना रहता है । किन्तु महान् के क्षेत्रज्ञ की प्रकृति होने के कारण महान् के सब धर्मों को क्षेत्रज्ञ पर ग्रभिमान हो जाता है । इसलिये क्षेत्रज्ञ आत्मा न कुछ करता हुआ भी अपने को सब काम का करता मानता है । इसलिये गीता में लिखा हैः-[ २ ९ ६ ]

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* ब्रह्मविज्ञान ऋ

प्रकृतेः क्रियमाणनि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।

अहंकारविमूढात्मा, कर्ताऽहमिति मन्यते ॥

अर्थात् प्रकृति के गुणों से सभी काम किये हुए होते हैं ( क्षेत्रज प्रात्मा कुछ नहीं करता ) किन्तु क्षेत्रज्ञ की प्रकृति के तमोगय अहंकार के योग से मोह पाकर वह क्षेत्रज्ञ आत्मा ' मैं करता हूँ ' ऐसा मान लेता है । चलता हुग्रा मनुष्य जल्दी - जल्दी ग्रोसरे से दोनों पाँवों को आगे पीछे करता रहता है । वह हर एक पैर के आगे पीछे करने के लिए उस समय खयाल नहीं करता, केवल चलने की इच्छा करते ही दोनों पाँव आगे पीछे होने लगते हैं ॥ १ ॥

बालक जन्मते ही हाथ पाँव हिलाने लगता है या रोता है । किन्तु इसके लिए वह इच्छा करके यत्न नहीं करता, बिना चाहे भी ये सब काम अपने आप होते हैं । इससे सिद्ध हुआ कि काम करने वाले प्रज्ञात्मा पर प्रकृति का प्रभाव पड़ता है । उसके कारण विज्ञान आत्मा की अपेक्षा न रखता हुआ भी प्रज्ञान ग्रात्मा प्रकृति से प्रर्थात् स्वभाव से वैसा करने लगता है ॥ २ ॥

किसी शिक्षा या उपदेश श्रादि के द्वारा विज्ञानमय श्रात्मा बढ़ाया जा सकता है । किन्तु उसके कारण प्रकृति नहीं बदलती । जिस प्रकार महा मुर्ख साधु स्वभाव या क्रूर स्वभाव का होता है उसी प्रकार महाविद्वान् भी हो सकता है । विज्ञान बढ़ाने की शिक्षा का प्रभाव प्रकृति पर नहीं पड़ता है । यदि प्रकृति को बदलना चाहे तो उसके लिए भिन्न ही उपस्कार करना पड़ेगा । उसके कारण ये हैं— मित्रों की शिक्षा, राजशासन, विशेष प्रकार का सात्विक या तामसिक भोजन, भय, अभ्यास और अवस्था या कालभेद इत्यादि इत्यादि इनके द्वारा प्रकृति क्रम से बदल कर और हो जाती है । किन्तु इससे विज्ञान का कुछ संबन्ध नहीं है, किन्तु प्रज्ञान का अवश्य संबन्ध है । प्रत्येक कर्म के करने में कुछ ज्ञान का भाग उसमें अनुस्यूत ( शामिल ) रहता है । वह ज्ञान का भाग विज्ञान का नहीं है, किन्तु प्रज्ञान का है । प्रकृति के बदलने से प्रकृति के अनुसार काम करने वाला प्रज्ञान आत्मा बिना सोचे विचारे ही अपनी ग्रादत के अनुसार काम करने लगता है । हम देखते हैं कि किसी मनुष्य को किसी काम करने में हस्त-क्रिया का कौशल होता है । जैसे अर्जुन में एक क्षण में ही १०० बाण प्रोसरे से लेकर चलाने का कौशल था, जो साधारण मनुष्य नहीं कर सकता । राजा ऋतुपर्ण को घोड़े हाँकने का कौशल था । इसी प्रकार कितने ही मनुष्य किसी काम करने में अन्य मनुष्यों की अपेक्षा स्फूर्ति रखते हैं । कितने ही मनुष्यों को सभा - चातुरी वाक्चातुरी देखी जाती है । इस प्रकार के जो गुण कहीं पाये जाते हैं ये सब प्रज्ञात्मा के धर्म हैं । इनका क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा से या महान् से भी कोई संबन्ध नहीं है । स्वतः प्रकाश न रखता हुआ । स्वच्छ रस का चन्द्रमा जिस प्रकार सूर्य रश्मि के संयोग से तीन भाव उत्पन्न करता है । सूर्य के संमुख भाग उसका ज्योतिष्मान् होता है । विपरीत भाग में तमोमय कृष्ण-वर्ण है, और इन दोनों की सन्धि में छायामय रहता है ठीक इसी प्रकार यह महान् भी स्वयं प्रकाश [ २ ९ ७ ]

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* ब्रह्मविज्ञान संमुख भाग ज्योतिष्मान् मान न होकर क्षेत्रज्ञ आत्मा की रश्मि से तीन भाव का हो जाता है । क्षेत्रज्ञ का होता है, उसे सत्वगुण कहते हैं । उसके विपरीत तमोमय रहता है उसे तमोगुण कहते हैं निज . श्रीर स्वरूप दोनों है का । सन्धिभाग जो छायामय है उसे रजोगुण कहते हैं । ये ही तीन गुण महान् आत्मा का का हैं । परस्पर 1. ये तीनों गुण तेल ( तम ), वत्ती ( रज ) लौह ( सत्व ) के अनुसार परस्पर के ग्राश्रित इस जगत् अभिभव ( दबाव ) करते हैं । और परस्पर को उत्पन्न करते हैं । इस प्राणी के शरीर में अथवा में, पुराण-में सभी भाव इन्हीं तीनों गुणों से व्याप्त हैं । इन तीनों गुणों का विस्तार से वर्णन सांख्यशास्त्र का अनु में और मनुस्मृति में किया गया है । जिस प्रकार चन्द्रमा पृथ्वी के संनिहित रहकर उसी के . शास्त्र ..गामी होकर सूर्य का भी अनुगामी है उसी प्रकार यह महान् आत्मा भी भूतात्मा अर्थात् प्रज्ञात्मा संनिहित रहकर उसी का अनुगामी होकर क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा का भी अनुगामी होता है । का संसर्ग स्वयं यह महान् ग्रात्मा बायु मेघ जल आदि के अनुसार शरीर है । किन्तु भूतात्मा ( मिल-,, से संसष्ट पाकर उसी के शरीर से वह होकर शरीरी हो जाता है और शरीर के कितने ही दोषों दोषों , के जाना होकर भूतात्मा के साथ कर्मों का फल भोक्ता होता है । इनमें महान आत्मा जो शरीर से के संयोग से सत्व रज तम गुणों में विषमता क्षोभ है उसी के कारण उस महान आत्मा ,, या पाजाता यदि उस संसृष्ट भूतात्मा उन गुणों के अनुसार सुख दुःख या अच्छे बरे भोगों को पाया करता है । से , पाप भूतात्मा में महान् ग्रात्मा का मिलान होता तो निर्गुण होने से प्रवृत्ति निवृत्ति रहित होकर पुण्य कर्म रहित हो यह भूतात्मा शुद्ध और मुक्त ही रहता । किन्तु महान् के कारण से ही गुग्गों के अनुसार सब करता हुआ यह भूतात्मा सब कर्मों का फल भोक्ता होता है । यह श्रुति में लिया है: -गुणन्वयौयः फलकर्मकर्त्ता कृतस्य तस्यैन, सचोपभोक्ता । सविश्वरूपस्त्रिगुरण स्त्रिवर्त्मा प्रागाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ आत्मवृत्ति के || इस क्षेत्रज्ञग्रात्मा की प्रकृति जब जिस के अनुसार प्रकार की होती है उस में उसी प्रकृति है वैसे ही विकार परवश बागा नहीं, उत्पन्न होते रहते हैं उन धिकारों न वे विकार कदापि को रोकने का कोई भी कारण रुक सकते हैं, इन्हीं विकारों को रात प्रतिक्षण ग्रात्मा की वृत्ति कहते हैं । दिन कभी यह क्षेत्रात्मा अपनी वृत्ति के अनुसार काम है, करता रहता है । कभी हँसता है कभी रोता सोचता है, कभी सोता है, कभी जागता है इत्यादि २ इन , , और कभी जानता है और कभी सब वृत्तियों में श्रद्धा ही चलता है, मुख्य कारण है । जिस भाव की ओर ठीक उसी भाव अनुसार महान् ग्रात्मा अपनी श्रद्धा भुक जाती है है, यह प्राकृति बदल लेता है ग्राकृति इसकी । यद्यपि महान् की प्राकृति मनुष्याकार जीवनभर स्थिर रहतो तथापि प्रतिबिम्ब श्रद्धा के कारण जैसे - जैसे भावों का इस पर पड़ता है तत्काल उस आकृति को अवश्य स्थिर धारण कर लेता है नहीं रहती एक के पश्चात । किन्तु ग्रहण की हुई ये आकृतियां स्थिर दूसरी बदलती रहती रूप है किन्तु का । किया जाय तो वह रूप इस मनुष्य की आकृति यदि विशेष प्रयत्न से उस भाव है से पृथक् होकर थोड़ी दीखती देर के लिये प्रत्यक्ष [ २६८ ]