ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 331–340

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 331–340

पृष्ठ 331

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 331 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* महाविज्ञान योगाभ्यास थोड़ी ग्रावि गिद्धि देर के शिलाओं में लिये इसी हमारे श्रद्धा की ही साल ग्रात्मा की बनी हुई ईश्वर बनी होती से जाती हैं या देवताओं की मूर्तियाँ और मनोनुकूल है । वरदान भी दे जाती हैं ।परन्तु यह मूर्तियाँ सत्व रजस्तमसां साम्यावस्था महतोऽहंकारः प्रकृतिः, प्रकृतेर्महान् । , अहंकारात् पञ्चतन्मात्राणि 11 मनोयोग इसलिये अधिक के दीर्घकाल काल न बैठकर किन्तु वे हमारी विचार आवर अर्थात ही महान आत्मा में लीन हो जाती हैं यह बिगड़ती के भीतर प्रेम और निरन्तर से साक्षात्कार रहती विचार के भूमि होने के कारण बाहर हो जाता है । हैं अनुसार हमारी आत्मा की ही ये भिन्न भिन्न -। इनमें हमारी मूर्तियां प्रतिक्षण बनती बात्मा की श्रद्धा ही कारण है। इसलिये गीता में लिखा है-अर्थात् श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः । यह महान् है पुरुष श्रद्धामय है जिस अर्थात् उसी की उत्कण्ठा श्रद्धा होती है यह महान् भी वही , भाव की प्राकृति का होजाता है । बनजाता किसी श्रद्धा से भिन्न बदलती विषय को - भिन्न श्राकृतिबनने में विज्ञानमय क्षेत्रज्ञात्मा की भी है जब छोड़कर रहती न जाने तब आवश्यकता । तक है, किन्तु तक उस विषय की श्रद्धा नहीं होती । विज्ञान के बदलने के कारण श्रद्धा बनी निकल मरती समय जिस रहती जाता प्राकृति में आकर महान् ग्रात्मा भूतात्मा के साथ बाहर देह कहा है. और है वह प्राकृति फिर नहीं बदलने पाती । इसलिये पुनर्जन्म होने तक वही प्रकृति सम्भवतःउसी योनि में उस लेना है इसलिये पुराणों में भूतात्मा को जन्म पड़ता है — अन्तेमतिः सागतिः । का " ग्रह अहंकृति महान् ही " अर्थात् उस इशारा " मैं " धातु किया यह बुद्धि जिसके लिये होती है वह शरीर है । अहं इस बुद्धि से चेतन शरीर उसे को जाता है महान् श्रद्धा । यह शरीर जड़ होने पर भी जिस धातु के द्वारा चेतन पाया जाता है । प्रकार जानना कहते चाहिये, वही धातु अहंकार है । किन्तु अहंकार जिस धातु से उत्पन्न होता है । का हैं अध्यात्म माना । महान् ही होता है । इस अहंकार को सांख्य में ५ पांचों कही है, वैकारिक अहंकार के रूप में परिणत ग्रधिदैवत जाती तैजस, भूतादि सानुमान निरनुमान । वाक्, प्रारण, चक्षु श्रोत्र, मन ये , ,, होती हैं । इनके दिक् और चन्द्र ये , है हैं । ५ शब्दादि विपय यदिभुत हैं । अग्नि, वायु, सुर्य । जिस इन देवताओंों के संसर्ग से बुद्धि इन्द्रिय की क्रिया ही ५ प्राण हैं । उनमें विषय उत्पन्न में भूत करती है । भूतादि का जो गुण रहता है वह इन्द्रिय उसी गुरण का ग्रहण * वैदिक भाषा में इन्द्रियों को प्राण कहते हैं । [ २६६ ]

पृष्ठ 332

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 332 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान अहंकार से भौतिक ५ गुण उत्पन्न होते हैं । वैकारिक ग्रहंकार से इनके पांचों देवता उत्पन्न होते हैं | ये देवता भूत शरीर में आकर जो इन्द्रियरूप में परिणत होते हैं इस अहंकार रूप महान् का काम है | अध्यात्म में इन्द्रियों का सञ्चालन करने वाला अहंकार यदि शरीर में न रहे तो भूत गुण या देवता इनके संयोग होने पर भी इन्द्रियों से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, इस प्रकार वैकारिक अहंकार से इन्द्रियों के देवताओं की सिद्धि होती । तैजस अहंकार से इस शरीर में तेजोमय प्राण उत्पन्न होता है । अर्थात्, सूर्य, चन्द्र, विद्यत ये तीनों तेजोमय देवता हैं । इन तीनों के तीन तीन परिवार देवता हैं । द्यौः, प्राण आकाश ये तीनों विद्युत से सम्बन्ध रखते हैं । नक्षत्र, दिक् और ग्राप इनका चन्द्रमा से सम्बन्ध है | इन परिवार देवताओं के साथ तीनों तेजो देवता शरीर में ग्राकर एक १२ का संघ उत्पन्न करते हैं उसे ही तेजस प्राण कहते हैं । जिस प्रकार इन्द्रियों का संचालन करने वाला प्रज्ञात्मा एक भूतात्मा है, उसी प्रकार यह तैजस ग्रात्मा भी दूसरा भूतात्मा है । ये दोनों ही भूतात्मायें जिस महान् से उत्पन्न होते हैं या जिस महान् से मिले जुले रहते हैं वही महान् ग्रहंकार है । वैकारिक तेजस के अतिरिक्त तीसरा ग्रहङ्कार भूतादि है, वह पाँच प्रकार के हैं अनपर, संश्लेषण, शुक्लपीत सूत्र, द्रव द्रव्य, और इन्द्रिय, ये पांचों ही जिस अहङ्कार से उत्पन्न होते हैं, उसे भूतादि कहते हैं । इस शरीर में मांस, अस्थि, मज्जा, ग्रन्त्र, ( आंत ) वसा, शोणित मेद ,, शुक्र इत्यादि कितने ही कीट धातु जो भिन्न - भिन्न प्रकार के दीखते हैं ये सब भिन्न - भिन्न प्रकार के कीटों से ही बने हुए हैं । उन्हीं जीवों को अनपर कहते हैं । ये भिन्न - भिन्न प्राकृति के अत्यन्त सूक्ष्म जीव हैं । उनके शरीर जिन भूतों से बने हैं, वही भूतादि श्रहङ्कार हैं । ये असंख्य होने पर भी एक से एक सब आपस में चिपके हुए रहते हैं । जिस रस से ये चिपके हैं उसी को कहते हैं । है । इस संश्लेषण से ही अस्थि, मज्जादि धातुयों के भिन्न रूप हो जाते हैं । इन धातुम्रों में इन कीटों के रहने योग्य एक प्रकार का जाल रहता है । यह जाल सफेद और पीले सूत्रों से बना हुआ होता है । ये सूत्र ( सूत ) वायु, मृत्तिका और मन इन तीनों के योग से बनते हैं । इनमें संश्लेषरण द्रव्य भरे रहने से सब सूक्ष्मकीट अन्नपात हुए चिपके रहते हैं । इन तीनों के प्रतिरिक्त इस शरीर में बहुत से बहते हुए द्रव् हैं उनकी उत्पत्ति भी सोम से हैं और, प्राणमय इन्द्रियों के रहने योग्य जो शरीर में स्थूल भौतिक इन्द्रियां आँख, कान, नासिका आदि हैं इनकी उत्पत्ति भी भूतादि ग्रहङ्कार से होती है । पांचों ही भूतादि अहङ्कार के कार्य हैं, ये सब स्थूल भूतमय जड़ है । है, भूतादि ग्रहङ्कार के उपरोक्त ५ कार्यों में जो अनपर जीव कहे हैं वे दो के हैं । भ्रूणव प्रकार सृमर । इनमें भ्रूण कीट शुक्र में रहता है और सृमर कीट ग्रन्यान्य धातुयों में रहते हैं । इनका भेद इस लिये है कि भ्रूण स्त्री के गर्भ में जाकर विकसित होता है और उत्पन्न होता , उससे एक विस्तृत शरीर और किन्तु सृमर से दूसरा उत्पन्न नहीं होता, वह अपने धातुओं में होते रहते हैं रहकर भी एक से अनेक वहीं ( धातुओं में ) उनका जीवन मरण होता है । इन दोनों को इनके शरीर श्रव्यूह जीव कहते हैं । अर्थात् में दूसरे जीवों से मटन ( बनावट ) नहीं होता व स्वयं वैसी बनावट एक जीव रूप हैं । उनके शरीरों की है । श्राकृति देने वाला उस शरीर के भीतर रहने वाला जीव आत्मा है वह जिस आकृति करता प्रकार की उसी प्रकार के भूत रस उस पर सश्चित होकर उनके वैसे शरीर बन जाते हैं शरीरों । इस प्रकार अव्यूढ़ [ ३०० ]

पृष्ठ 333

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 333 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * के आत्मा वे जीव श्रात्मा सब निरनुमान ब्रहङ्कार से उत्पन्न होते हैं । वे भी सोमरस के बने हुए भिन्न - भिन्न महान् हैं | अब शरीर इन असंख्य की वैसी अव्यूढ़ जीवों के व्यूह से एक मनुष्य आदि प्राणी का शरीर बनता है उस का प्राकृति देने वाला है उसके वैसी एक बहुत बड़ा भिन्न ही महान् आत्मा है, जो मनुष्य आदि के आकृति प्राकृतियां ही आकृति होने के बनी कारण से ही उस पर भूत रस चढ़कर मनुष्यादि प्राणियों की ऐसी है हैं । यह । इस प्रकार व्यूढ़ जीव का बड़ा महान आत्मा जिस सोमरस से बना है, वह सानुमान ग्रहङ्कार इन पांचों अहंकारों “ से भिन्न - भिन्न महान की आकृतियां उत्पन्न होती है, इसे ही अहंकृत महान् " कहतेहैं । दिक सोम यह ग्रहङ्कार या महान सोम दिक और चन्द्र । इनमें से बनता है । यह सोम दो प्रकार का है, पड़ता द्रव हैं अग्नि उसमें प्रतिबिम्ब नहीं , के और है इसी । किन्तु, वायु समान रूखा कुछ कड़ा कारण स्निग्ध चन्द्र सोम है । उसका शरीर ( श्रद्धारूप है श्रद्धा एक प्रकार का आप है अर्थात् द्रव रूप तेजस मुलायम ) और ५ अहङ्कारों में से ओर अत्यन्त स्वच्छ है इसी से प्रतिबिम्बता ही है । उपरोक्त अत्यन्त भूतादि ये दोनों वह आत्मा है जो स्वच्छ दिक सोम से उत्पन्न हैं, इसलिये इनसे उत्पन्न हुआ महान् तीसरा है । जो चिदात्मा लेकर भास्वर हो जाता है । किन्तु वैकारिक का या विज्ञान आत्मा का प्रतिबिम्ब रूप है जिससे दोनों सोम का मिश्रण . से इसीलिये इन्द्रिय और प्रज्ञात्मा का सम्बन्ध है वह दिक और श्रद्धा इन्द्रियों या उससे उत्पन्न होने पर भी ज्ञानमय भी है । प्रज्ञात्मा से ही हुए इन्द्रिय या प्रजा स्थूल भूतमय विशेषकर हमारे होते हैं । सब प्रत्यय ज्ञान उत्पन्न पूर्व और पृथ्वी के चारों मार्ग है वह मार्ग पृथ्वी से जितना जाते पश्चिम है ओर कुछ दूर पर चन्द्रकक्षा अर्थात् चन्द्रगति जो के दक्षिण और चले हैं उन दोनों सीमात्रों को स्पर्श करते के किरण पृथ्वी करता, उसको हुए सूर्य के पूर्व और पश्चिम स्पर्श सुषुम्णा नाड़ी कहते के पास चन्द्रमा का हुआ है उसके हैं । उसका व्यास पृथ्वी है वह सुषुम्ना नाड़ी , प्रकाश आता प्रकाश है मध्य में पृथ्वी पड़ती है पृथ्वी पर जो सूर्य का में लिखा है । कि- और ही है इसलिये वेद " चन्द्रमा पर जो भी सुषुम्णा का और सौषुम्णश्चन्द्ररश्मिः सूर्य का प्रकाश है वह नाड़ी से चन्द्रमा पृथ्वी " का है । एक ही सुषुम्णा रस भी के जीवों अर्थात् चन्द्रमा में प्रकाश सुषुम्णा के अनुसार चन्द्रमा का अपना का सम्बन्ध होने से शरीर में पृथ्वी रस के मुख्य जीव आत्मा के होने पर चन्द्ररस भाग लेता है सम्बन्ध है कि प्राणान्त । दोनों रसों का इतना घनिष्ट साथपृथ्वीरस के बाहर जाने पर पहला भी मिला छोड़कर आत्मा रसाता स्थान जुला हुआ चन्द्रमा तक जाता है । पृथ्वी । पृथ्वीरस में जो चन्द्रमा का चन्द्रमा ही जा सकता ८४ खण्ड है वही है । चन्द्रमा को छोड़कर बाहर नहीं महान में भिन्न - भिन्न ८४ हैं । महान् आत्मा है । ४ का बनता है अर्थात् के निज के होते हैं । ये जिनमें वह महान सहस्र प्राणियों सहस्र ५६ खण्ड पितरों २८ खण्ड तक प्रत्येक अ अथवा के नाम से प्रसिद्ध हैं और के शिर से पांव में बिन्दु है वह प्राणी के शरीर के प्रथम मिलकर जो चन्द्ररस उत्पन्न होता होकर उसी मनुष्य अनुसार व्याप्त होता एक ( टपकता ) ही बनता है तथापि है, पश्चात् प्रत्येक अङ्ग से रस अनुसृत यद्यपि सोमरस से एक छोटा हैं । वह भ्रूण भूत प्रत्येक शरीर बनता है उसे ही भ्रूण कहते भी मिश्रित रहता है उसी अङ्ग से अनुत्रत उसमें का अनुशय होने के कारण भूत भाग सेभ्रूण का शरीर भौतिक होता है । [ ३०१ ]

पृष्ठ 334

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 334 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान ऐसे भ्रूण लक्षावधि ( लाखों की संख्या में ) एकत्र होता है तो उसे ही द्रवरूप में शुक्र कहते हैं । स्त्री गर्भ में शुक्र के जाने पर कोई एक ही भ्रूण पूर्ण बल पाकर चोरों को खाता है, जिससे उसका शरीर क्रमशः वढ़कर जन्म लेने लायक हो जाता है । जन्म के उत्तर ग्रन्न भोजन करने पर भौतिक शरीर बहुत विस्तृत हो जाता है उसमें वह महान् ग्रात्मा भी उसी के अनुसार विस्तृत होकर शरीर में व्याप्त हो जाता है । शरीर छूटने पर वह महान् आत्मा चन्द्र मार्ग में जाता है । किन्तु जाती समय वह केवल २८ अंश को लेकर चन्द्रमा में जाता है, और ५६ अंश उसके ७ सन्तानों में सन्तानित होकर पृथ्वी पर रह जाता है चन्द्रमा पर गये हुए या पृथ्वी पर रहे हुये दोनों ग्रंथों में नित्य निरन्तर दृढ़ सम्बन्ध बना रहता है । वह सम्वन्ध श्रद्धा सूत्र कहा जाता है । इसी श्रद्धा सूत्र के द्वारा सन्तानों के किये हु पिण्ड-दानों का चन्द्रमा में गये हुए पितर ग्रात्मायों में प्राप्ति होती है इसलिये उन पिण्डदानों को श्राद्ध कहते हैं । अष्टम वंशधर में उत्पन्न होने पर यह श्रद्धा सूत्र टूट जाता है और वह ५६ अंश जो पृथ्वी पर शेष रह गये थे वे सातों सन्तानों के चन्द्रलोक में जाने से चन्द्रमा के द्वारा पितरों को मिल जाते हैं । इसलिये ८४ मा पूर्ण होने पर पृथ्वी की लाग मिट जाने से चन्द्रमा का महान् आत्मा उसी सुषुम्णानाड़ी के द्वारा अपने मूल कारण सूर्य ज्योति में सम्मिलित होकर लीन हो जाता है यहां महान् ग्रात्मा की उत्पत्ति और समाप्ति है । पू. उ सुषु [ ३०२ ] प.

पृष्ठ 335

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 335 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * श्रव्यूढ़ सत्वों में प्राणी जिसे सृमर कहते हैं वे भी दो प्रकार के हैं । एक कोश या अनेक कोश व्यूढ़ सत्वों के अनुसार जिनका शरीर दूसरे जीवों को शरीर में रखकर शरीर बनाते हैं वे अनेक कोश के हैं । किन्तु जिनमें एक ही कोश है उनके शरीर शुद्ध एक ही कोश से बने हुए होने के कारण वे ही सब जीवों में श्रादि जीव हैं, अथवा जीव संस्था के मूल जीव स्वरूप है । उनके शरीर का निर्माण अन्यान्य जीवों के शरीर की अपेक्षा विलक्षण है । उनका शरीर द्रवप्राय कुछ धातुनों से बनते हैं जिससे वे शरीर को प्रसारण ग्राकुञ्चन कर सकते हैं । शरीर के मध्य में एक घन और कठिन बिन्दु है वही इसका शिर है । वह बहुत सूक्ष्म है, उसके चारों श्रोर जो चिपटाकार शरीर है उसमें एक चक्र कहीं पर होता है वही उसका चक्षु है बहुतों के शरीर में एक छोटा सा सूक्ष्म छिद्र होता है सम्पूर्ण शरीर में से पसेव के अनुसार कभी - कभी रस निकलकर उस छिद्र में जमा होता है, पीछे उसको त्याग कर देता है जब वह चलना चाहता है तो उसके चिपटवृत शरीर ही कुछ लम्बे होकर एक ओर बढ़ जाता है, फिर उस स्थान में मस्तक विन्दु सरक कर शरीर को गोल बना लेता है । इसी प्रकार बिना पाँव के भी वह इधर उधर चला करता धीरे - धीरे अधिक स्थूल है । जब उसकी तरुण अवस्था होती है तो सूक्ष्म मस्तक बिन्दु भी होकर बीच में से टूटकर दो हो जाते हैं । कुछ दिन दोनों शिर शरीर में रहते हैं फिर एक दूसरा क्रमशः हटकर उन दोनों शिर के बिन्दु को केन्द्रमान कर शरीर के दो भाग हो जाते हैं । उन दोनों के दोनों शिर फिर बढ़ते २ दो दो भाग होकर फिर अन्य जीवों को उत्पन्न करते हैं । इस प्रकार अयोनिज शरीर वाले ये जीव केवल शिर के दो दो भाग होने से एक से अनेक सैंकड़ों उत्पन्न होते रहते हैं, यही इन का उत्पत्ति क्रम है । जिस समय इनको भोजन की इच्छा होती है तो किसी रस को या दूसरे जीव को स्पर्शं करते ही अपने शरीर को मोड़कर इस प्रकार उसको लपेट लेते हैं, कि जिससे उसके शरीर के दो चर्म भागों से पकड़ा जाकर थोड़ी देर में लग जाता है । और वह रम उसके शरीर में लीन हो जाता है । तत्पश्चात् फिर ग्रपने मुड़े हुए शरीर को गोल बना लेता है । इस प्रकार के सृमर प्रत्येक धातु में भिन्न २ प्रकार के देखे गये हैं । इन सबका मस्तक भाग जो चिपटे शरीर के केन्द्र में रहता है जो एक ठोस त्रिन्दु रूप है वह श्रद्धा के श्राप से ही उत्पन्न होता है । इसी से उसमें मन का सन्निवेश है । उसी से इच्छा उत्पन्न करके इच्छानुसार प्राणों द्वारा उसके शरीर में भिन्न २ चेष्टायें होती रहती है । उनका यह महान् आत्मा और मनुष्य का महान् आत्मा एक नहीं भिन्न - भिन्न हैं । इसीलिये उनके शरीर में मेरा अहंकार नहीं है । और मेरे शरीर में उनका ग्रहंकार नहीं है । उपसंहार इस प्रकार ग्रहंकार, ग्रात्मा की वृत्ति, प्रकृति और प्राकृति ये चारों ही भाव महान् से ही उत्पन्न होते हैं । इस महान् से प्राकृति, प्रकृति, अहंकार आदि बनने में विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ प्रात्मा के योग की भी श्रावश्यकता होती है बिना विज्ञान के कोई भी महान् इन चारों भावों में परिणत नहीं हो सकता । इसी लिये गीता में कहा है-मम योनिर्महत्ब्रह्म, तस्मिन् गर्भं दधाम्यहं । सम्भवः सर्व भूतानाम्, ततोभवति भारत । [ ३०३ ]

पृष्ठ 336

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 336 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ॐ ब्रह्मविज्ञान सर्वयोनिषु कौन्तेय, मूर्तयः सम्भवन्तियाः । तासां ब्रह्म महद्योनि, रहंवीजप्रदः पिता ॥ इत्यादि -इस प्रकार यद्यपि महान् ग्रात्मा से मूर्तियाँ उत्पन्न होने में विज्ञानमय क्षेत्रज्ञग्रात्मा के विज्ञान रस का मिलाव अवश्य ही माना गया है । तथापि महान् श्रात्मा विकारी है और क्षेत्रज्ञग्रात्मा निर्विकार है! जिस प्रकार मृत्तिका से ईंट, या पात्र बनाने में पानी का मिलाना श्रावश्यक है । बिना जल के मिट्टी में लोच और मुलायम भी आदि नहीं प्राते गुणों को ईट या पात्र बनजाने पर वह जल मृत्तिका से अलग गुण हो जाता है, केवल उन मृत्तिका ही मिट्टी का वह में उत्पन्न पात्र बना करके रहता, है । जल मिलकर भी महान में मिलकर नाना प्रकार के भावों को उत्पन्न करता है किन्तु निर्विकार ही वह विज्ञान विशुद्ध महान् विकारों से अलग रहता है । भूतात्मा जिस प्रकार सूर्य के रस से क्षेत्रज्ञश्रात्मा उत्पन्न होता से महान् है, जिस प्रकार चन्द्रमा के रस ग्रात्मा उत्पन्न होता है उसी प्रकार पृथ्वी के रस से सूर्य और , भूत ग्रात्मा उत्पन्न होता है । जिस प्रकार चन्द्रमा दोनों इस पृथ्वी पर अपना रस बरसाते प्रकार हुए इस पृथ्वी से नित्य संवन्ध रखते हैं, उसी क्षेत्रज़ और महान् दोनों अपना रस अर्थात् जिस प्रकाश देते हुए भूतात्मा से नित्य संबन्ध रखते हैं । प्रकार चिदात्मा क्षेत्रज्ञग्रात्मा में प्रकट होता है उसी महान् , प्रकार क्षेत्रज्ञ और ग्रात्मा ग्रात्मा में भी महान में भूतात्मा में प्रकट होता है । इन चारों ग्रात्मा - चिदात्मा परस्पर , क्षेत्रज्ञ और भूतात्मा का संबन्ध सूत्रात्मा से होता है और, महान् भूतात्मा में भी वैश्वानर तेजस भेद हैं उनका ,, प्राज्ञ ये जो तीन ग्रवान्तर परस्पर संबन्ध भी इसी सूत्रात्मा के द्वारा बना हुआ है । भिन्न - भिन्न अपने तन्त्र रखते हुए. भी पाँचों ग्रात्माओं का एक तन्त्र बनकर प्राणीका शरीर चेतन बनकर चेष्टा में चिदात्मा और सूत्रात्मा ये ही दो ग्रङ्गी करता है । इस एक तन्त्र से या प्रधान हैं इधर तीन ग्रंग मिथ्या प्रहार विहार हैं अर्थात् गौण श्रात्मा हैं । प्रज्ञापराध होता है, अर्थात् ग्राहार और, मिथ्यायोग होते विहार का सुयोग न होकर हीनयोग, प्रतियोग हैं । जिनसे, कफ वात पित्त और रोग ,, शोणित ( व्याधि ) कहते इनकी विषमता हो जाती है इसी को । इसी प्रकार काम क्रोध हैं । ,, लोभ मोह के धातु इनकी विषमता से प्राधिरोग उत्पन्न,, मद मात्सर्य ये शरीर होते हैं, छ: सूक्ष्म मानस रोग है जो उपदेशादि से सकते हैं । शान्त हो भूतात्मा परिचय पञ्च महाभूत का पिण्ड जोमृत्युधर्मा है, उसमें अधिष्ठात्री देवता-होकर जो उसका ग्रभिमानी गरण हैं और जो अमृत हैं, उन देवताओं के समूह को भूतात्मा कहते हैं ॥। १ ॥ द्यो र पृथ्वी इन दोनों के तेजोमय तीसरा अमृतरस जिनमें लोकत्रयातीत दिव्यज्योति का मृतरस ( अर्थात् चिदात्मा का रस ) ये तीनों सम्मिलित में सम-होकर अन्नकोश के ग्रापोमय मृत्युपद [ ३०४ ]

पृष्ठ 337

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 337 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान स्वत ( युक्त ) होते हैं । इस समन्वय है उसी को भूतात्मा ( मिलाप ) से उन प्रमृतरसों का स्थान जो मृत्युरस में रूप सिद्ध होता कहते हैं || २ || कृमि कोट , बहुत ग्रन्तर, पतङ्ग पक्षी ,, पशु मनुष्य है इन सब में क्षेत्रज्ञश्रात्मा के तारतम्य से विज्ञान शक्ति का भय मैथुन । तथापि कितने , ही अंशों में बरावरी है । जैसे ग्रहार, निद्रा, रण, उत्सर्ग ग्रात्म इन सबका साम्य अर्थात् रूप से रक्षा कितने कृमि में के पाये जाते ही धर्म, विद्वान्, महामुर्ख, या पशु, पक्षी, कीट तक साधा-साथ हैं । यदि इन वृत्तियों विज्ञान शक्ति की वृद्धि साथ इन का सम्बन्ध क्षेत्रज्ञ आत्मा से होता तो महान् ग्रक में भी ग्रात्मा वृद्धि पाई जाती परन्तु ऐसा नहीं देखते इसलिये चिदात्मा, क्षेत्रज्ञ आत्मा, , ग्रात्मा इन तीनों 11311 ही के अतिरिक्त कोई इन वृत्तियों का प्राश्रय पाया जाता है वही भूत-देवताओं गरमी, धातुप्रचय की संस्था, स्नायुमण्डल ये तीनों भूतविकार जिसमें हैं और अग्नि, वायु, इन्द्र, इन तीनों | जिसमें है कर्ता रूपी जीव आत्मा भूत । , ज्ञान, बल, अर्थ ये तीनों कर्म जिसमें हैं वही आत्मा कहलाता है || ४ || त्वचा प्रश्न भोजन करने आदि पांचों भूतों का लोम, , शोणित से अन्न के किये हुए पृथ्वी भिन्न द्वारा शरीर में प्रवेश भिन्न-चेष्टायें, ग्रस्थि मज्जा आदि भूतों के विलक्षण रूप जिसके कारण उत्पन्न होता है, और या चेष्टाके लिये कामनायें जिसके होते हैं वही भूतात्मा है ॥ ५ ॥

क्षेत्रज्ञग्रात्मा द्वारा उत्थित, जिस आत्मा में , महान् प्रकार की विशेषतायें ग्रात्मा के साथ सम्मिलित होकर नाना उत्पन्न करतेहैं अर्थात् शिक्षाजन्य सभ्यता इत्यादि वही भूतात्मा है ॥ ६ ॥

भी भूतात्मा के से उत्पन्न होकर मुख्यतया तीन भेद हैं । इनमें वैश्वानर तीन रस इन । वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ ये तीन विश्व हैं । तीनों दो रस से पृथ्वी अन्तरिक्ष, द्यो ये के उत्पन्न होता है । वेद में लिखा है कि, हैं । तीनों सञ्चालन अग्नि, वायु, सूर्य कहते जो ही करने वाले इन तीनों में पृथक् पृथक तीन नूर है, जिनको संघर्षण से ग्रग्नि एक शब्द के परस्पर योग या में विश्वानर कहे जाते हैं । इन तीनों विश्वानरों वे मौलिक उत्पन्न अग्निरूप हैं । किन्तु से + होता है उसे ही वैश्वानर कहते हैं । यद्यपि वह तीनों भी जो चौथा अग्नि होने रखते । किन्तु उन तीनों के घर्षण से रूप के भी नहीं रूप है यौगिक या ताप आदि अग्नि रूप कुछ अग्नि अमृतरूप और अक्षर-है किन्तु अग्नि उत्पन्न होता है वही वैश्वानर है । मौलिक तीनों है और क्षर २। उनसे, रहने के कारण मत्य यह उत्पन्न प्रतिक्षण नष्ट होते वही है, प्रतिक्षण हुआ यह यौगिक अग्नि मर जाता है इसका मरना ग्रन्न खाते रहने से जीता न मिलने पर रहता है | अन्न , जो इस इसके लोक में चले जाना है । वैश्वानर मौलिक पृथक तीनों तीनों अग्नियों का संयोग नष्ट होकर पृथक् होने पर उन की उत्पत्ति के उदर में शुक्र शोणित के संयोग इस प्रकार होती कि माता नर = सञ्चालन करने + मौलिक वाला, चलने वाला । तात्विक मूलरूप । ,, तत्वरूप [ ३०५ ]

पृष्ठ 338

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 338 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान दोनों का समन्वय करा कर शरीर का सङ्गटन करने के लिये माता के हृदय से एक प्रकार का वायु उत्पन्न होता है । इस वायु के दो रूप हैं - एक विश्वकर्मा, दूसरा सूत्रात्मा । इनमें विश्वकर्मा वायु शिर से पाद तक प्रत्येक ग्रङ्ग प्रत्यङ्ग का निर्माण करता है किन्तु निर्माण किये हुए ग्रहों को नियमानुसार जहाँ का तहाँ रखकर उनको अपने स्थान से हटने न देकर सबको पकड़े हुए केन्द्र में, अर्थात् हृदय में स्थिर हो जाता है । दीपक के अनुसार उसके दो स्वरूप होते हैं । एक मध्य पिण्डरूप और दूसरा रश्मिरूप | इनमें रश्मिरूप से यह वायु सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है, किन्तु मध्य का पिण्डरूप केवल. हृदय में ही रहता है, उसी सूत्रात्मा वायु को शारीरिक परिभाषा में व्यान वायु कहते हैं । इसका श्रायतन एक प्रादेश ( १० ॥ अङ्ग ुल ) है । यह व्यान मुख्य प्राण है, और यही जीवन का आधार है । इसी के उत्क्र-मरण- ( निकल जाना ) से प्राण और अपान भी उत्पन्न ( जगह छोड़ना ) हो जाते हैं । इसीलिये श्रुि

कहती है-न प्राणेन नापानेन मय जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेता वुपाश्रिता ॥

अर्थात् प्रारण से या प्रपान से कोई भी प्राणी नहीं जीता है, इन दोनों के अतिरिक्त तीसरा कोई देवता है, जिसके ये दोनों ग्राश्रित हैं, वही सब प्राणियों का जीवन ग्राधार है । हृदय में विद्यमान यह ब्यानवायु ग्रन्तरिक्ष से प्राप्त होता है । इसी व्यान पर पृथ्वी से ग्रपानवायु और सूर्य से प्राणवायु श्राकर सम्मिलित होते हैं । यह व्यानवायु सूर्य से प्राते हुए प्राणवायु का प्रतिपृम्भन ( रोकना ) करके उलटा प्रतिक्षेपण ( धक्का देना ) करता है । जिससे प्राणवायु उलटा ऊपर जाता हुआ उदान वायु कहलाता है । इसी प्रकार वह व्यानवायु नीचे पृथ्वी से प्राते हुए वायु को प्रतिष्टम्भन करके उलटा प्रतिक्षेपण करता है, जिससे उलटा नीचे को जाता हुआ वह ग्रपानवायु कहलाता है । किन्तु जो उसका भाग शरीर में रहकर अन्नादि का पाचन ग्रादि का काम करता है वह समानवायु कहलाता है । इस प्रकार तीन लोक के तीन रस मिलकर पाँच प्राणु उत्पन्न करते हैं । इन्हीं पाँचों प्राणों के आधार पर प्राणियों की जीवन सत्ता निर्भर है । जिस प्रकार एक शिलापर लोढ़ी से पेषण ( पिसान ) करते हुए हाथ से लोढ़ी को आगे पीछे करते हैं, उसी प्रकार व्यान रूपी शिला पर प्राण ग्रौर ग्रपान दोनों वायु एक दिन रात में २१६०० बार आना जाना करते हैं | यज्ञ की परिभाषा में सोमलता के कूटने या पीसने की शिला को उपांशु सवन कहते हैं और उस पर पीसने के समय लोढ़ी का बाहर जाना उपांशु है, और अपनी ओर ग्राजाना अन्तर्याम है | इसी उपांशु अन्तर्याम क्रिया से प्राण, ग्रपानवायु की उपमा दी गई है । व्यानरूपी उपांशुसवन पर प्राण और अपानवायु के उपांशु ग्रन्तर्यामि क्रिया से जो २१६०० बार घर्षण होता है, उससे एक यौगिक ग्रग्नि उत्पन्न होती है, उसी को वैश्वानर अग्नि कहते हैं । यह वैश्वानर ग्रग्नि प्राण, अपान श्रीर व्यान इन तीनों मौलिक अग्नियों के मेल से या घर्षण से उत्पन्न होती है, इसलिये यौगिक है । जब तक व्यानवायु हृदय में दृढ बद्ध होकर स्थिर रहता है, तब तक प्राण और प्रपान का उपांशु श्रन्तर्यामि क्रिया के बन्धन होने से वैश्वानर भी जाग्रत रहता है । व्यानवायु के उत्क्रमण होने पर उपांशु अन्तर्याम क्रिया भी बन्द हो जाती [ ३०६ ]

पृष्ठ 339

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 339 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

४. ब्रह्मविज्ञान है, इसी से वैश्वानर अग्नि भी शरीर में नहीं रहता । शरीर की गरमी नष्ट हो जाती है, शोणित पानी हो जाता है, इसी को मरना कहते हैं । मनुष्य के शरीर में जिस प्रकार वैश्वानर प्राण उत्पन्न होता है उसी प्रकार इस विशाल ब्रह्माण्ड में भी सूर्य, पृथ्वी और अन्तरिक्ष के तीनों प्राणों का परस्पर संघर्षण होते रहने के कारण अन्तरिक्ष में 1 यह वैश्वानरप्रार्ण उत्पन्न होकर ब्रह्माण्ड की बिलोकी में शरीर के अनुसार सर्वत्र व्याप्त रहता हैं, उसे ही विराट् भगवान कहते हैं । यद्यपि शरीर के अनुसार उच्छवास, निःश्वास रूपी प्राण प्रपान क्रिया नहीं दीखती, तथापि शरीर के अनुसार वह अवश्य होगी । केवल बहुत विशाल होने के कारण हम ब्रह्माण्ड की सीमा को पार करके उसकी अवस्था को देख नहीं सकते । इसलिये न देखने से उसका न होना सिद्ध नहीं हो सकता । इसी प्रकार चेतन प्राणियों से न्यून कक्षा के वृक्षादि स्थावरों में भी हम उच्छ्वास निःश्वास नहीं देखते, किन्तु उनमें भी ये दोनों होते अवश्य हैं । अल्प मात्रा में होने के कारण उद्भट नहीं दीखते, किन्तु वैज्ञानिक परीक्षा से स्थावरों की श्वास क्रिया देखी जा सकती है । स्थावरों की अपेक्षा भी अत्यन्त ग्रल्पमात्रा में होने के कारण धातु पदार्थों में भी बहुत कठिनता से ये क्रिया प्रत्यक्ष की जा सकती है । तीनों लोकों के मौलिक प्राणों का जीव मूल, धातु इन तीनों तारतम्य से समन्वय होने के कारण यह सर्वत्र एक रूप से क्रिया नहीं भासती, किन्तु यदि उन सब में गरमी पाई जाती है तो गरमी का कारण उन तीनों प्राणों का संघर्षण अवश्य ही मानना पड़ेगा और संघर्षण की सत्ता में श्वास - निःश्वास का होना भी अनिवार्य है । इससे सिद्ध हुआ कि जगत् के प्रत्येक भूतग्राम में उन भूतों की सत्ता रखने के लिये वैश्वानरग्रात्मा अवश्य ही व्याप्त रहता है । इ होकर भूतात्मा कहलाता है । यह् वैश्वानर् उत्पन्न होकर अपना सन्निवेश ( टिकाव ) दो प्रकार से करता है, एक आन्तर रूप से दूसरा बाह्यरूप से । जिस प्रकार सूर्य में एक वैश्वानर सूर्यपिण्ड के भीतर व्याप्त होकर सूर्य का स्वरूप नियत करता है किन्तु दूसरा वैश्वानर सूर्यपिण्ड से बाहर निकलकर दूर तक रश्मियों का मण्डल बनाता है, ठीक उसी प्रकार प्रत्येक पिण्ड की व्यवस्था है । अर्थात् एक भाग वैश्वानर का वस्तु के अङ्ग प्रत्यङ्ग को पकड़कर वस्तु का स्वरूप नियत करता है और दूसरा वैश्वानर प्रत्येक वस्तु में बाहरी रश्मिमण्डल बनाता है इसी रश्मिमण्डल से एक वस्तु का दूसरी वस्तु के साथ संसर्ग होकर धर्मो का संक्रमण ( परस्पर जाना ) हो जाता है । यद्यपि वह बहिमंण्डल सूर्य के अनुसार और वस्तुओं में नहीं दीखता है, तथापि शरीर पर रक्खे गरमी का बाहर सञ्चार होना हुए आर्द्र ( गीले ) वस्त्र के शीघ्र सूख जाने से शरीर की पाया जाता है । इन दोनों को पृथक् समझने के लिये शरीर प्रविष्ट अग्नि को वैश्वानर और बर्हिगत रश्मिमण्डल को सम्वत्सर के नाम से बोलते हैं । इस प्रकार प्रत्येक प्राणी के शरीर में दो वैश्वानर सिद्ध होते हैं । किन्तु इनके अतिरिक्त दो वैश्वानर और भी इस शरीर में प्रविष्ट होते हैं । उपर्युक्त नियम के अनुसार सूर्य का बर्निंगत रश्मिमण्डल श्रीर पृथ्वी का बर्हिगत रश्मिमण्डल प्राणी के शरीर में प्रवेश करता और वे शरीर के वैश्वानर से भिन्न रहकर इस शरीर को अपनी अपनी ओर खींचते रहते हैं जिससे पृथ्वी के आकर्षण से शरीर आकाश में नहीं उठ सकता और सूर्य के आकर्षण प्राणी के पांव वृक्षों के [ ३०७ ]

पृष्ठ 340

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 340 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान - शरीर. से कहे जाते हैं १ अनुसार पृथ्वी में घुस नहीं जाता । इस प्रकार ये चार वैश्वानर चार शब्दों संवत्सर का के अन्तर्गत निज का बैश्वानर भुवनपति है । २ निज का संवत्सर भूतपति है । ३- पृथ्वी शरीर में आकर भूपति कहलाता है । ४ – सूर्य का सम्वत्सर शरीर में श्राया हुआ लिये नारायण भोजन कहा करते जाता समय हैं । सामवेदियों के लिए कौथुमी शाखा के गोभिलसूत्र में इन्हीं चारों श्रग्नियों के है तथापि इनका आरम्भ में चार नवेद्य देना विहित किया गया है । यद्यपि ये चारों अग्नि वैश्वानर ही, में सब योनि और कर्म पृथक् होने से पृथक् पृथक् व्यवहृत होते हैं शरीर के निज के वैश्वानर से शरीर दूसरा मनुष्य प्रकार के धातु बनते रहते हैं और निज के सम्वत्सर भूतपति से दर्पण में मुख दीखता है, या से आये हुए दूसरे मनुष्य को दूर: से दीखता है, जल में प्रतिबिम्ब पड़ता है, फोटो खींचा जाता है, पृथ्वी से शरीर में यज्ञ भूपति से यह शरीर पृथ्वी से पकड़ा हुआ रहता है और सूर्य से प्राये हुए नारायण अग्नि रहते हैं, क्रिया होती है, जिससे यह प्राणी नित्यप्रति बार बार ग्रन्न खाया करता है, ग्रङ्ग प्रत्यङ्ग बढ़तेकी अग्नि और कृमि, कीट से लेकर मनुष्य तक क्रमिकधारा में शिर ऊँचा होता रहता है । और शिर किन्तु निकलते रहने पर भी यह शरीर अग्नि से खाली नहीं होता यह सब नारायण ग्रग्नि का प्रभाव है , और नारायण इतना होने पर भी शरीर में मुख्य श्रग्नि मुवनपति है । उसकी सत्ता से भूतपति, भूपति होकर शरीर में काम करते हैं । यह वैश्वानर शरीर में एक प्रादेश ( १० ॥ अंगुल ) के प्रमाण से विभक्त । से हृदय शरीर में व्याप्त होता है, मनुष्य का शरीर नियम से प्रादेश का है ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ तक, , है और , कण्ठ तक, हृदय से नाभि तक और नाभि से योनि तक क्रम से शरीर बनता चार प्रादेश से मुख्य ४ कटि से जानु तक दो प्रदेश और जानु से एड़ी तक दो प्रादेश की अर्थात् अंगुल । इस प्रकार प्रादेश है । ' की ऊंचाई सिद्ध होती है होती एक एक प्रादेश को एक २ ग्रक्षर मानने से ८ अक्षर की गायत्री सिद्ध होता में व्याप्त यह गायत्री ही ग्रग्नि का निज छन्द है इसलिए अग्नि भाग में विभक्त होकर शरीर हथेली है । दोनों मुजायें भी एक अगुली से दूसरी अंगुली तक 5 प्रादेश की सिद्ध होती है । कण्ठ से दोनोंशिर तक चार प्रादेश होता है इस प्रकार एक पाद हाथों में और एक पाद एक पाद दोनों पावों में और से यह से योनि तक वामपार्श्व श्रीर् दक्षिणपार्श्व इन दोनों पावोंमें सिद्ध होकर त्रिपदी गायत्रीछन्द वैश्वानर अग्नि सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त है । २ -- तैजस आत्मा चुका, अब दूसरा तैजस का निरूपण किया जाता है । हो भूतात्मा जो वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ के भेद से तीन का वर्णन प्रकार का है, उनमें वैश्वानर जिस प्रकार वैश्वानर ग्रात्मा तीनों लोक केतीन रसों विलक्षण संबन्ध पाकर उत्पन्न उसी प्रकार तैजसग्रात्मा भी सूर्य, चन्द्र, विद्युत् इन तीनों तेजों का का इस शरीर में चयन है होता भाव होकर एक होने से उत्पन्न होने के कारण ही यह प्राण तेजस शरीर के प्रत्येक कहलाता है । इस प्रारण के द्वारा इस अङ्ग प्रत्यङ्ग प्रतिक्षण बढ़ते - फैलते रहते हैं । । १- ॐ भुवनपतय नमः, २- ॐ भूताना पतय नमः नमो नारायणाय , ३ ॐभूपतये नमः, ४- ॐ [ ३०८ ].