ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 341–350
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 341–350
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* ब्रह्मविज्ञान * इन तीनों तेजों के साथ तीन - तीन परिवार देवता भी संयुक्त रहते हैं । जैसे— १ - सूर्य, ग्रग्नि, पृथ्वी, ग्रन्न, २ - चन्द्र, नक्षत्र, आप्, दिक्, ३ - विद्युत्, प्राण, द्यो प्राकाश, इस प्रकार भिन्न कारण - भिन्न परिवारों से मिश्रित होकर ही तीनों तेज परस्पर समन्वित होते हैं । इस यह तेजसप्राण हैं छान्दोग्य बारह तत्वों का बना हुआ होता है, इसे अग्निविद्या या आत्मविद्या भी कहते । उपनिपद के चौथे प्रपाठक में कहा गया है कि जावाल ऋषि के शिष्य उपकोशल को अग्निदेवता ने स्वयं इस अग्निविद्या का उपदेश किया था । १ - जो भीतर खींचता अन्न भोजन किया अग्नि करता है, अर्थात् है जाता है, उसको यह तैजस प्राण ही ग्रहरण । जिस ग्रग्नि से शरीर धारण किया जाता है से शरीर के धातु उत्पन्न होते रहते हैं, और उन धातुओं , यही तेजस के द्वारा शरीर धातु तेजस का पृथ्वी अग्नि, पृथ्वी और अन्न के कार्य में होते भाग है । इस प्रकार रहते हैं । किन्तु इन तीनों का टिकाव सूर्य से होता है । ओर २- नक्षत्र से ग्रार्तव होते हैं । दिक् के संबन्ध से शरीर का चारों पसार होता शुक्र, लोम, कूप आदि उत्पन्न शरीर में उत्पन्न होते है और ( नरमी ) और द्रव भाग रहते हैं आप से शरीर का बढ़ना मुलायमी । किन्तुइन तीनों का टिकाव चन्द्रमा से होता है । ३ - प्रारण में शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, वस्तिगृहा से क्रिया चेष्टा होते हैं और आकाश से शरीर उसमें फिर ,, दहराकाश ग्रादि भिन्न शरीर आकाश में हृदय आकाश - भिन्न ग्राकाश उत्पन्न होते हैं । और के द्यौ लोक से आते इस से दिव्यरस नाना प्रकार रहते हैं प्रकार आकाश उत्पन्न होते हैं और द्यो के सबन्ध इस शरीर में भी विद्यमान् । जैसे सूर्य द्यो के अनुसार , चन्द्रमाविद्युत् प्रादि कितने ही रस , इन सबका टिकाव शरीर में बीजली के द्वारा होता है । क्षेत्रज्ञ और सूर्य और आत्मा में भी आते हैं, किन्तु रश्मि महान् चन्द्रमा के रस यद्यपि क्षेत्रज्ञग्रात्मा और महान हैं । अर्थात् सूर्य की सूर्य इन दोनों में से संस्रवित होते को न सूर्य और चन्द्र के रस मुलानुगत रूप है उसे ही क्षेत्रज्ञ आत्मा कहते छोड़कर से काम करता, में हैं । इस शरीर में भी विज्ञानमय रूप इस शरीर महान् आत्मा इसी प्रकार आकार रखता हुआ ही चान्द्ररस ( से टूटा बनता चन्द्रमा से भी अपना नित्य संबन्ध का रस वृणमूल मूल या है । किन्तु सूर्य और चन्द्रमा कि सूर्य में प्रकाश ) ग्रर्थात् तैजस में ऐसा नहीं है, यहा पर चाहिये श्रीर अपने है । इसको यों समझना सदा रहता है, इसी ताप दोनों मूल को छोड़कर शरीर में प्राता सूर्य बिम्ब के साथ से पाये जाते हैं रश्मि ग्रच्छिन्नमूल होकर किन्तु ताप जो दिन में किसी सांयकाल । किन्तु प्रकाश भी छिप जाता है को सूर्य के छिपते ही सम्पूर्ण प्रकाश मण्डल संबन्ध नहीं रखता, छिन्नमूल होकर पत्थर, बालू है । वह सूर्य से है । तेजस रात्रि, पानी आदि द्रव्यों में प्रविष्ट हो जाता छिन्नमूल का उदाहरण में भी है, यही अधिक समय तक उन द्रव्यों में बना रहता [ ३०६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान में आया हुआ सूर्य और चन्द्र का रस छिन्नमूल होकर रहता है इसलिये क्षेत्रज्ञ और महान् के अनुसार इनमें तीव्रता नहीं रहती । इन दोनों के साथ तीसरा विद्युत् भी ग्राकर तीनों शरीर के मन में प्रविष्ट होता हैं, इसलिये तीनों का मिला हुआ रूप, मानव ग्रात्मा बनता है । तात्पर्य यह है कि. हृदय में जो विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा है, वही मन कहलाता है, उसकी हिरण्यवत् कान्ति है श्रीर सूक्ष्म है । विज्ञानमय होने के कारण अपने विवेक और विचार शक्ति से प्रज्ञात्मा रूपी जीव आत्मा को प्रतिक्षण शासन करता है उसे ही मनु कहते हैं । उस मनु में ग्रात्म समर्पण करने के कारण ये तीनों ( सूर्य, चन्द्र, विद्युत् ) मिल-कर माननग्रात्मा हो जाता है । किन्तु इनमें विशेषता यह है कि सूर्य चन्द्ररस खनिजों में नहीं जाते इस-लिये वहाँ तेजस का पूर्णा रूप उत्पन्न नहीं होता । किन्तु विद्यत् रस उनमें भी नहीं सकता, यह सब पदार्थों में नित्य रूप से विद्यमान रहता है । यही कारण है कि जब प्राणी मर जाता है तब उसी की भूतात्मा में से वैश्वानर, प्राज्ञ, ये दोनों बने रहकर लोकोन्तर में जाते हैं । किन्तु उनमें तेजस के सूर्य, चन्द्ररस दोनों ही तत्क्षणात् अपने - अपने प्रभव में चले जाते हैं, जिससे तेजस का वास्तव रूप नष्ट हो जाता है । इसलिये मरने के पश्चात् जब तक वह पुनर्जन्म न ग्रहण करें तब तक उसका शरीर बढ़ने नहीं पाता । बच्चा, जवान, बूढ़ा जिस अवस्था में गया था उसी अवस्था में कर्म फल भोगता हुआ बना रहता है । यद्यपि उसके भी भोग शरीर है, किन्तु उनमें तेजस न होने के कारण घटने बढ़ने की क्रिया बन्द हो जाती है इतना होने पर भी तैजस का विद्युत भाग नष्ट नहीं होता, किन्तु वह केवल अपनी अवस्था में इन्द्र कहलाता है । प्रज्ञात्मा के साथ - साथ बरावर लोकान्तर में भी बना रहता है । वह सूर्य लोक से पार जाने पर वह विद्युत् पुरुष इन्द्र वरुण ग्रादि लोकों में जाने में जिस प्रकार सहायता करता है वह ग्रागे ग्रात्म-गति विद्या में विशेष रूप से कहा जायगा । ३- प्रज्ञात्मा ( १ योनि और २ आशय ) लोकत्रयातीत चेतना ( चिदात्मा ) सूर्य रश्मियों में व्याप्त होता है, और उसी सूर्य- रश्मि से हमारा विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा बनता है और सूर्य, चन्द्र, विद्युत् इन तीनों के छिन्नमूल रसों से जो रूप बनकर हमारे शरीर में ग्रात्मा वनता है, उस ग्रात्मा में क्षेत्रज्ञ के संयोग होने पर उसके द्वारा चिदात्मा उस पर व्याप्त हो जाता है । इस प्रकार सूर्य, चन्द्र विद्यतु के साथ क्षेत्रज्ञ और चिदात्मा के संयोग से जो रूप सिद्ध होता है उसे ही प्रज्ञा कहते हैं । वास्तव में यह प्रज्ञा चिदाभास कहलाता है । प्रभास प्रतिबिम्ब को कहते हैं । सूर्य, चन्द्र, विद्युत् के रसों के समन्वय से जो जल के समान एक स्वच्छ द्रव्य उत्पन्न होता है, उस पर क्षेत्रज्ञ के द्वारा जो चिदात्मा का प्रतिविम्ब होता है वह चिदाभास है, और उसे ही प्रज्ञा कहते हैं और जिस रस पर चिदाभास हुआ है उस विशिष्ट का नाम प्राज्ञ ग्रात्मा है । शारीरकभाष्य में शंकराचार्य ने प्रज्ञान ग्रात्मा को विज्ञानमय क्षेत्रज्ञआत्मा से भी ऊँची कक्षा का माना है | उनकी दृष्टि में विज्ञानमय आत्मा सगुण, सविकार और नाना धर्मो करके युक्त हैं । किन्तु प्रज्ञान ग्रात्मा निर्गुण, निर्विकार, निर्विशेष, अव्याकृत विशुद्ध चेतना रूप हैं, वह धर्म, अधर्म, कार्य कारण सबसे परे हैं । तात्पर्य यह है कि विज्ञानमय प्रात्मा ही जीव श्रात्मा है और वह जगत् के भीतर है, किन्तु [ ३१० ]
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* ब्रह्मविज्ञान प्रज्ञान ग्रात्मा विशुद्ध चिदात्मा वह जगत् से बाहरी तत्त्व है, परन्तु कौपितक उपनिषद् में समस्त इन्द्रियों के मूल इन्द्र रूपी प्राण को प्रज्ञा कहा है और देह में बसता हुआ देह और इन्द्रियों के धारण करने वाला और मृत्यु के समय में देह से उत्क्रमण होने वाला कहा गया है । यह कथन विशुद्ध चिदात्मा में बन नहीं सकता, उसके व्यापक होने से देह में पश्चात् प्रवेश करना, और केवल जीवन पर्यन्त ही शरीर को धारण करना, और किसी समय शरीर को छोड़कर बाहर निकल जाना, ये सब असंभव है । इससे सिद्ध है कि उपनिषद् के मत में प्रज्ञान आत्मा ही वह जीव आत्मा है जिसका आवागमन होता है, वह प्रज्ञात्मा कई रसों का बना हुआ एक ऐसा स्वच्छ पदार्थ है, कि जिस पर चिदाभास होता है | चिदाभास विशिष्ट उस प्रज्ञा प्राण को ही हम प्राज्ञ आत्मा कह सकते हैं, वही जीव आत्मा है, और उसी का आवा-गमन होता है । जो दक्षिण नेत्र में ज्योतिः स्वरूप लक्षित होता है, वही प्रज्ञात्मा है, वह सूर्य नहीं है, किन्तु सूर्य रूपी क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा उस ज्योतिः स्वरूप से मिला हुआ अवश्य रहता है । इसी कारण उप-निषदों में विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ का भी दक्षिण नेत्र में होना कहा गया है । वास्तव में बात यह है कि चक्षु में दोनों ही आत्मा भासित होती हैं जाग्रत् अवस्था में चक्षु से जो प्रकाश निकल कर इस विशाल जगत् जगत् का भान करता है वह ज्योति विज्ञानमय क्षेत्रज्ञात्मा है । किन्तु जब कभी घोर अन्धकार में आँख की कोण को दबने पर भीतर की ओर प्रकाश का चक्र अकस्मात् भासित हो जाता है, वह ज्योति प्राज्ञ श्रात्मा का है । चक्षु के इसी प्राज्ञ प्रकाश को " संयद्वाम " कहते हैं, वाम्भ और भामनी भी कहते हैं । यह प्राज्ञ वास्तव में विद्युत् रूपी इन्द्र है, जिसमें चिदात्मा का प्रवेश होकर चिदाभास हो रहा है । इस चिदाभास के चिदात्मा और विद्युत् ये दोनों इस प्रकार मिलकर एक हो रहे हैं जैसे पानी में प्रतिबिम्ब के भीतर पानी पृथक् नहीं दीखता, किन्तु पानी का विकार उसमें होता रहता है । उसी प्रकार इस चिदा-भास में विद्युत् का भान पृथक् नहीं होता, किन्तु विद्युत् की चञ्चलता से उस चेतना में क्षोभ का विकार अवश्य होता रहता है । यह विकार चेतना का नहीं हैं, किन्तु विद्युत् या इन्द्र आवागमन वाली हमारी श्रात्मा है । उस विद्य ुत् का यहाँ बना रहना ही आयु कहलाता है । इस विद्युत् रूपी प्रज्ञात्मामय चिदा-भास ने हमारे शरीर में लोम और नख को छोड़कर शेष सम्पूर्ण प्रदेशों में व्याप्त होकर इस शरीर को धारण कर रक्खा है और इस शरीर की सम्पूर्ण इन्द्रियों पर अपना प्रभुत्व रखता है । इस प्राज्ञ श्रात्मा की योनि चिदाभास है, और प्राशय इस विद्युत् या इन्द्र है । २- प्रज्ञात्मा की प्रतिष्ठा ( प्रज्ञात्मा के टिकाव का जरिया ) इस प्रज्ञात्मा की प्रतिष्ठा ज्योति है, जो कि सूर्य, चन्द्र, अग्नि या तारायों से मिलती है । यही ज्योति इस प्रज्ञात्मा का अन्न है, जिसको पाकर यह प्रज्ञात्मा इस शरीर में निज स्वरूप से प्रतिष्ठित रहता है । यदि इन ज्योतियों में से एक भी ज्योति इसको न मिले तो यह प्रज्ञात्मा कुछ समय बाद क्षीण होते होते सर्वथा नष्ट हो जा सकता है [ ३११ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कै चित् का प्रतिबिम्ब है श्रौर प्रतिविम्बित होता इसी ज्योति में ही लोकत्रयातीत चिदात्मा संक्रान्त ( प्रविष्ट ) होकर चिदात्मा प्रति-भी वस्तु पर वही चिदाभास प्राज्ञ कहलाता है । इन ज्योतियों के अतिरिक्त और किसी चेतना भी सभी वस्तु बिम्बित नहीं होता । यही कारण है कि उस चिदात्मा के सर्वत्र व्यापक होने पर नहीं दीखते । अर्थात् इन संयोग होता है । इन पाँच ज्योतियों द्वारा बाहर के पदार्थों का हमारी ग्रात्मा के साथ के रूप में ग्रा ज्योतियों के किरण बाहर के पदार्थों पर पड़कर प्रत्येक परमाणु के रूप में आकर उस वस्तु से मस्तिष्क के जाते हैं । फिर उस वस्तु से पलट कर उसी वस्तु के रूप में ग्राँव तक पहुंचते हैं । आँख है । इस केन्द्र तक व्यापक प्रज्ञात्मा में वह रूप अङ्कित हो जाता है, यही उस वस्तु का ज्ञान कहलाता वही उन रहती है, प्रकार प्रज्ञात्मा में जो ज्ञान की मात्रा इन पाँचों ज्योतियों के द्वारा ग्राकर बढ़ती रूपो हमारी प्रज्ञात्मा बाहर की ज्योतियों के भीतर विद्यमान चिदात्मा के भाग का अनुग्रह है । अर्थात् वस्तु रूप ज्योति बाहर से उन वस्तुओंों के रूप में आई हुई ज्योतियों को ग्रहण कर लेती है और वह वाली ज्योति हमारी प्रज्ञात्मा की ज्योति में मिलकर हमारी क्षेत्रज्ञात्मा बन जाती है । यह इन्द्रियजन्य ज्ञान प्रत्यय कहलाता है । इन और अग्नि इस प्रत्यय के तीन भेद स्थल रीति से हो सकते हैं । १ रूप प्रत्यय जो सुगं, चन्द्र से उत्पन्न तीन ज्योतियों से उत्पन्न होता है, इसका द्वार चक्षु इन्द्रिय हैं और २ शब्द प्रत्यय जो वाक्से शरीर होता है, उसका द्वार श्रोत इन्द्रिय है । र ३ मानस प्रत्यय है जो कि क्षेत्रज्ञात्मा की ज्योति इन्द्रिय के भीतर ही उत्पन्न होता है और जिसका संपूर्ण शरीर में शोणित में घुला हुआ मनु । , द्वार व्याप्त है है । इन तीनों इन्द्रियों में प्रज्ञात्मा हो इन्द्रिय कहलाता है जिसका भेद से नाम भेद हो गया , स्थान ज्ञान जो कुछ स्पर्श करता है, संघता है इस का स्वाद लेता है सोचता है करता है, ये सब , या, या ध्यान प्रवेश मन इन्द्रिय के द्वारा ही प्रज्ञात्मा में पहुंचकर क्षेत्रज्ञात्मा बनती भीतर है । जब कि ये पाँचों ज्योति अर्थात् न करें तो क्षेत्रज्ञात्मा नष्ट होकर प्रज्ञात्मा भी नष्ट हो जायेंगे 1 इन्द्रिय का ज्ञान । और कोई भी को प्रत्यय नहीं हो सकेगा । इन पाँचों ज्योतियों का प्रज्ञात्मा के साथ जो संबन्ध है महाराजा जनक , वह महर्षि याज्ञवल्क्य ने ऊपर के अनुसार विशद रूप से वर्णन किया है । ३- प्राज्ञ का आयतन यें । इस शरीर में प्रधानता से ५ देवताओं का अधिकार है ग्रग्नि सूर्य चन्द्रमा और दिक् के -, पाँचों ही देवता ग्रधिदैवत में जिस प्रकार सूर्य के आश्रित, वायु, में क्षेत्रज्ञात्मा हैं, उसी प्रकार अध्यात्म पाँचों-ग्राश्रित रहते हैं । इन पांचों देवताओं के द्वारा के प्रज्ञात्मा विभक्त हो जाता है । इस प्रकार प्रज्ञा है और विभागों को पञ्च प्राण या पञ्च इन्द्रिय कहते हैं 1 । जिनमें ग्रग्नि देवता में रहता में वाक् होकर मुख से कर्ण से नासिका में सूर्य श्रोत रूप वायु प्राण अर्थात् श्वास रूप, चक्षु रूप से नेत्र में ग्रौर दिग देवता इन्द्रियों और चन्द्रमा मन रूप से स्नायु और शोणित में व्याप्त रहता ग्रन्य चार के है । इनमें मन इन्द्रिय प्रज्ञा का ग्राकाश के ग्रनुसार स्थान होता है, ग्रंथोत् वाक् प्राण श्रोत्र ये चारों हो मन रूपी , चक्षु, [ ३१२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान आधार पर काम रूप करते हैं । इन चारों से भी में मन भी साथ रहता है । किन्तु मन इससे अलग रहकर स्वतन्त्र मनन आदि संकल्प मन इन्द्रिय विकल्प किया करता है । तात्पर्य यह है कि लेकर मस्तिष्क इस का रूप है जिसके हृदय से तक प्रकार मध्य में मूख नाक आँख काम ये चारों इन्द्रियाँ सिलसिलेवार जमे हुए हैं । अध्यात्म,, रखते में परिणत पांचों हुए एक देवताओं से सूर्य संबन्धि अधिदेवत के पांचों देवता प्रतिक्षण संबंध अपने एक चक्र बनाते देवताओं हैं । अर्थात् इन पाँचों इन्द्रिय प्रारणों के रस प्रतिक्षण अधिदैवत के अपने-में जाते रहते पूरी होती रहती हैं, और अधिदेवत से देवताओं के रस प्रतिक्षण आकर अध्यात्म की कमी इन्द्रियाँ हैं । जब कोई तक बाहर वाले प्राणों से भीतर वाले प्रारणों का संबन्ध न हो तब तक ये पहुँचाते भी अपनाकाम नहीं कर सकती । देवता के अर्थों को इन पाँचों इन्द्रियों में हैं । तब बाहर के बाहर वह जीवित इन ग्रंथों को भीतर उसी से रहता वाली प्रज्ञा ग्रहरण करके उनका ज्ञान उत्पन्न करती है, और हो जाता है । बाहर के देवताओं असंभव है, से संबन्ध टूट जाने पर बाहर के अर्थों का भीतर जाना अर्थात और इससे ग्रथोंका ज्ञान उत्पन्न न होकर प्रज्ञात्मा के पाँचों विभाग एक ही मुख्य प्रारण संभव क्षेत्रज्ञ हो जाता ग्रात्मा में लीन हो जाते हैं । चिरकाल तक इस प्रकार होने से प्रज्ञात्मा का नष्ट होना इन है । इस मानी जाती हैं । अर्थात् पांच स्थानों प्रकार इस प्रज्ञात्मा की ये पाँचों इन्द्रियाँ पाँच आयतन में बैठकर अन्न ग्रहण करता है, उन्हीं बाहर वाले देवताओं से संबन्ध करता हुआ अपना स्थानों को आयतन कहते हैं । ४ - इन्द्रियों का देवतापन कारण इस शरीर जिनके पांच देवताओं के पाँच भेद में जितनी इन्द्रियाँ हैं वे सब एक ही प्राज्ञ के स्वरूप हैं, होते हैं हो गये हैं, शरीराभिमानी क्षेत्रज्ञात्मा में प्रश्रित विम्बित और फिर । ये पाँचों देवता सूर्य से आकर इस प्रति-जिस प्रकार पानी के अन्दर किन्तु सूर्य में आकाश इस क्षेत्रज्ञ से निकल कर सूर्य से मिलते रहते हैं । हैं और निकलती रहती हैं, के सूर्य की किरणें प्रतिक्षण नयी - नयी आती रहती स्थिर • उनका सिलसिला चारों ओर किरणें जमी हुई दीखती न टूटने के जिस प्रकार आकाश के सूर्य में में वे बदलती रहती हैं, उसी कारण दीखती हैं, परन्तु वास्तव किरणों हैं । उसी प्रकार पानी के सूर्य में भी वे स्थिर ही के सर्वदा अनुसार से चारों प्रकार हमारे के क्षेत्रज्ञ आत्मा भी आकाश के सूर्य रहती है । प्रोर चमकती रहती शरीर है अन्दर वे किरणें वास्तव में बदलती , परन्तु उसकी इस प्रकार क्षेत्रमात्मा नाम का रहता है, उसी हैं । जिस प्रकार बाहर के सूर्य में ( आकाश ) अन्दर एक प्राण इन्द्र देवता उसके आश्रित रहते उन देवतानों में एक प्रज्ञामय है और पांच है । वह अग्नि मुख्य प्राण इन्द्र नाम का है वह इन्द्रिय कहलाती , से पांच उस मुख्य प्राण इन्द्र की श्रोत्र पांचों वायु सूर्य रूप में परिणत हुई प्रज्ञा ही मन और इन , प्राण, चक्षु , चन्द्र दिक् के भेद से वाक्, , इन पांच देवताओं नामों सेकहा जाताहै । * क्षेत्रज्ञ । - कारयिता के समान ( काम कराने वाला ) दीपक महान् न कर्ता न कारयिता प्राश - कर्ता, चक्षु के समान । [ ३१३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान के पांच विभाग सूर्य आदि प्रत्येक पिण्ड से जहाँ तक रश्मियाँ जाती है, इस वहाँ प्रकार तक उन हैं कि रश्मियों यदि उन रश्मियों को होकर इन पांच देवताओं का स्वरूप बनता है । उनके ५ विभाग उन तीनों के सोम पर ६ ३३ भांगों में बांट दें तो आदि के ३ भागों को आत्मा या ब्रह्म कहा जायगा । १ - त्रिवृत् पर । मिलाने से त्रिवृत्स्तोम होता है । ( त्रिवृत् ६ को कहते हैं ) और उसे ही ग्रग्नि कहते हैं भाग पर ६ ६ भाग मिलाने पंचदशस्तोम होता है, इसे ही वायु या इन्द्र देवता कहते हैं । २- पश्चदश से मिलाने मिलाने से एकविंशस्तोम होता है, इसे ही ग्रादित्य या सूर्य कहते हैं । ३ एकविश पर भाग भाग पर ६ त्रिवस्तोम अर्थात सप्तविशस्तोम होता है, और उसे ही चन्द्र कहते हैं । ४ - त्रिवस्तोम केन्द्र सप्त-मिलाने से त्रिस्नोम कहते हैं उसे ही दिक्सोम कहते हैं । ५ - ये ही पांन देवता है । ३३ का भागों दशस्तोम है, वही प्रजापति देवता है । जो कि दोनों ओर सोलह २ भागों को ग्रहण किये हुए ३३ इस हैं उसी प्रकार पर आक्रांत रहता है । इसी कारण पाचों देवता जिस प्रकार मुलयात्मा के अधीन रहते अज्योति, मध्यप्रजापति के भी ग्राश्रित हैं । इस प्रकार सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी अर्थात् स्वयंज्योति, पज्योनि या एक मण्डलरूप या रूपज्योति कोई भी पिण्ड क्यों न हो सभी में ३३ भागवाले प्राण तत्व सर्वदा निकलकर में ग्रा बनाते हैं । जिनके पांच विभागों को ही पांच देवता कहते हैं । जबकि सूर्य का ही रस हमारे शरीरमण्डल कर क्षेत्रजग्रात्मा बनता है, तो संभव है कि उससे भी २३ भाग वाले प्राण विकसित होकर एकआकर बनावें और उपर्युक्त के अनुसार उसमें भी ५ देवता हों इन्हीं ५ देवताओं का थोक एक रूप में । वह प्रजापति कहलाता है । जो कि इस सर्वांग शरीर में नख और केश को छोड़कर सर्वत्र व्याप्त है वह प्रजापति ५ देवताओं की ५ शक्तिवाला होने के कारण ५ इन्द्रियों का काम कर सकता है, और है । जाग्रत अवस्था में नियत ५ स्थानों से अपना ग्रस अर्थात् बाहर के भूतों किया करता का संस्कार ग्रहण और स्वप्न अवस्था में भीतर आय हुए संस्कारों को ही उलट किन्तु सुषुप्ति ग्रवस्था पुलट किया करता है । में बाहर से अन्न ग्रहण करना बन्द हो जाता है क्योंकि इनकी पांचों देवता मुलग्रात्मा , सब शक्तियां ग्रर्थात् उसी में उस समय लीन हो जाते हैं । तथापि अग्नि होता है , वायु, सूर्य, इन तीनों का जिस प्रकार लय है । प्रकार सोम मा दिक् का लय होने पर भी ही रहता कुछ २ अंश शरीर के प्रत्येक भागों में भी बना जिस प्रकार रात्रि के वोर ग्रन्थकार में भी आकाश सूर्य, चन्द्र, अग्नि के प्रकाशों का अत्यन्त लोप होने पर में टिमटिमाते हुए ताराओं की कुछ प्रकार इस झलक उस ग्रन्धकार में भी सर्वत्र । उसी शरीर के व्याप्त रहती है है । सर्वाङ्ग में ज्ञान प्रकाश का अधिकांश लोप होने रहती पर भी बहुत थोडा ग्रंश सर्वत्र व्याप्त लेकर यही कारण है कि घोर निद्रा में सोते रहने नाम पर भी दो चार मनुष्यों में से जिस मनुष्य का भी श्रावाज देते हैं तो उसी नाम वाला यह मनुष्य उठ बैठता है, और मनुष्य सोते रहते हैं । किसी समय २ देखा गया है, कि गहरी नींद में सोता कभी हुग्रा मनुष्य जब वर्राने लगता है तो पूछने पर भी वह उस समय मनुष्य उत्तर भी देता है और सूई चुभाने से पानी मनुष्य , डालने से तपाने से बेखवर जाग सकता है ।, ग्राग वह ही इससे सिद्ध हुआ कि शरीर के चर्म भी बना भाग में भी कुछ ज्ञान का निद्रा में भाग उस गाढ़ रहता है, जिसके कम्पन से मुख्य आत्मा में गये अपने हुए पांचों देवता भी ग्राघात पाकर एकाएक आयतन इन्द्रियों में दौड़ प्राते हैं, जिससे वह मनुष्यतुरन्त जाग उठता है । से प्रकार सूई इत्यादि इस [ ३१४ ]
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प्राघात ॐ ब्रह्मविज्ञान * देवता पहुंचाना पाँव से वाला सिर तक नाम की प्रजापति प्रत्येक मेरी ग्रात्मा एक रूप अङ्ग में किया जा से पांव सकता है । इससे है । से सिर तक संपूर्ण सिद्ध हुश्रा कि वह पांच शरीर में व्याप्तहै, और वही प्रजापति प्राज्ञ करने || ज्ञान को ५ - प्राज्ञ का भिन्नरूप का पद उत्पन्न करने धारण करना कितने अर्थात् में किसी इन्द्रिय ही स्थान को भी स्वातन्त्र्य कोई बाद विद्वान् मात्र हैं भिन्न नहीं है । ये इन्द्रियां , २ ज्ञान ही को प्राण को ही काम करता है उन्हीं को उत्पन्न , कामों को भिन्न या चक्षु मुख्य कहकर शेष २ ज्ञान कहते हैं । सब इन्द्रियों को उसीका भेद मानते हैं । इसी प्रकार की उपासना सकते करते है न हैं । क्योंकि जब चक्षु चक्षु हो इन्द्रियों से जो भिन्न केवल है कह सकते २ प्रकार के ज्ञान होते तब वह हैं । क्योंकि जिस हैं उसको न प्राण ही कह हैं एक न प्राण समय वह प्रारण है जो ही है उस समय न चक्षु है न कि एक काम न वाक है । तात्पर्य वाक् है, और चक्षु बाक के यह है कि ये सब दूसरे काम से संबन्ध यादि प्राण भाव हैं, इसीलिये न रखते हुए है अधूरे हैं । किन्तु ये पांचों जिस का, चक्षु आदि कि श्वास नाम पांचों नामों से ही काम किसी एक तत्त्व के मन न देकर कहा जा सकता है उस एक तत्त्व को , कहा लेते समय आत्मा इस वाक्, या प्राण या पद से समय जाता प्रारण बोलते व्यवहार किया जाता है । वह आत्मा ही एक ऐसा भिन्न है, समय तत्त्व यद्यपि । अर्थात् वाक्, देखते समय चक्षु सुनते श्रोत्र २ नाम ये पांचों, समय, मनन करते समय है परस्पर से कहा ही एक ही आत्मा तत्व के पांच हैं , आत्मा एक जाता है काम । भिन्न २ काम के करते , परन्तु वास्तव में वह ही से एक आत्मा एक है । वाक् प्राण चक्षु आदि ,, प्राण भिन्न है किन्तु है, आत्मा, आत्मा से ये पांचों ही भिन्न नहीं है । अर्थात् आत्मा ही ही चक्षु है वाक् , आत्मा ही श्रोत्र है और आत्मा ही मन है । को मुख्य इन्द्रिय कहकर मानते हैं । परन्तु वास्तव में यह सबअधूरी वस्तु से वाक् ६ - इन्द्रिय प्राणों का एक ही प्रज्ञा की ओर प्रज्ञा ज्ञान में ठहरे, प्रारण, झुकाव चक्षु श्रोत्र तथापि की हुए रहते, और मन ये पाँचों भिन्न भिन्न देवता होने भी पाँचों ही अग्नि उत्पत्ति हैं । प्रज्ञा - पर रूप किन्तु इन्द्रियों में और ये पाँचों देवता इनके मेल से ज्ञान की उत्पत्ति होती है । यद्यपि एक प्रज्ञा रोष प्रज्ञा के भिन्न और दूसरा पाँचों देवताओं में से एक देवता ये दोनों ही सहकारी हैं है चिदाभास - भिन्न ज्ञान को । , प्रज्ञा के कारण प्रज्ञा ही कहना चाहिये, क्योंकि देवता पांचों ही जड़ स्वरूप हैं । प्रज्ञा के एक चेतन है किन्तु होगा कि प्रज्ञा अपने से निर्वि में रूप, यह अवश्य कहना स्वरूप यता विशेषता होने पर भी जो है भिन्न - भिन्न पाँच रूप के पाँच ज्ञान इन्द्रियों से उत्पन्न होते हैं पाँचों इसीलिये उसमें पाँच देवताओं उनमें कौषीतक के मिलाव के कारण से ही है फिर भी प्रज्ञा ही की काम ने इन्द्रिय प्रारणों को " ये इन्द्रिय समय नहीं करते एकभूयता " कहा हैं । अर्थात् प्रारण एक काम बोलना हैं एक में होता है सुनते देखना और कोई, क्षण एक ही इन्द्रिय का काम । समय भी दो इन्द्रियों चारों ही के बन्द हो का काम साथ नहीं होता । अर्थात् देखते समय और लिये जाता IMITTEE कते हैं कि सब देवता मिलकर देखने के समय प्रज्ञा कीपुष्टि करते हैं के समय सुनने के लिये शेष चारों । इसी प्रकार सुनने ही [ ३१५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान देवता प्रज्ञा की पुष्टि करते हैं । इसी प्रकार सव इन्द्रिय प्राण एक समय में एक ही कर्म करते हुये पूर्ण रूप से प्रज्ञा में मिल जाते हैं । इसीलिये प्रज्ञा पांच ज्ञानों में बंटकर प्रत्येक ज्ञान में अधूरी नहीं ज्ञान रहने पाती । किन्तु प्रज्ञा की जितनी मात्रा क्षेत्रज्ञ विज्ञान में रहती है, उस पूर्ण प्रज्ञा मात्रा से एक एक बोल की उत्पत्ति होती है । इस लिये ऐतरेय आदि ऋषियों ने यह कहा है कि प्राणी श्वास लेते समय उपयोग नहीं सकता, और बोलने की दशा में श्वास नहीं ले सकता । क्योंकि श्वास लेने में सब प्राणों का मन्त्र होने के कारण बोलने के लिये प्रारण की मात्रा नहीं बचती इसी ग्रभिप्रायः को लेकर वेद में एक कहा है कि— एकः सुपर्णः स समुद्माविवेश, स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे । तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितम्त माता रेढि स उ रेढि मातरम् ॥ ऋ. सं. ८।६।१६ जीव इस इसी अभिप्राय से कौपितक आदि ऋषियों ने प्राणाग्निहोत्र कहा है । अर्थात् प्रत्येक को ) प्राण के द्वारा प्रतिक्षण अग्निहोत्र करता रहता है । अर्थात् जब बोलता है तब वाक में प्राण ( श्वासके पाँच होमता है और जब श्वास लेता है नव प्राण में वाक् को होमता है । तात्पर्य यह है कि देवताओं होने पर भी प्रधान प्रज्ञा एक होने से एक समय एक ही काम होता है वही प्रज्ञा वाक की वाक है, प्रारण का प्राण है, चक्षु का चक्षु है, श्रोत्र का श्रोत्र है और मन का मन है । ७ – इन्द्रियों में प्रारण की मुख्यता चक्षु इन्द्रियों में प्राण इन्द्रिय चारों से श्रेष्ठ है । मन इन्द्रिय शेष आयतन है । चार इन्द्रियों का क्षेत्र इन्द्रिय शेष चार इन्द्रियों की प्रतिष्ठा है । वाक् इन्द्रिय शेष वरिष्ठ हैं, और चार इन्द्रियों में से इन्द्रिय शेष चार की सम्पत्ति है तात्पर्य यह है कि पाँच इन्द्रियों में चार इन्द्रियों प्रत्येक इन्द्रिय शेष हैं । उपयोग रखता है औौर सहकारी होता है । क्योंकि ये पांचों किया करती ही इन्द्रियाँ कुछ न कुछ से कुछ व्यापार करके ही ज्ञान का उत्पादन करने में समर्थ होती के सम्बन्ध है । यह क्रिया करना प्रारण से कोई है, ज्ञान अक्रिय है । यदि इन पाँचों में प्रारण भी इन्द्रिय का सम्बन्ध हटा दिया जाय तो किसी सब G भी ज्ञान उत्पन्न नहीं को हो सकता, इससे पाँचों ही इन्द्रिय प्रारण के प्राश्रित हैं । इसलिये प्राण इन्द्रियों से श्रेष्ठ कहते हैं ॥ १ ॥
कोई इसी प्रकार मन सबका ग्रायतन है । क्योकि से भी में मन के सम्बन्ध बिना किसी इन्द्रिय ज्ञान उत्पन्न नहीं होता । मन का मध्य स्थान हृदय से प्रारम्भ करके मस्तिष्क उसके अन्तर्गत तक है, इन्द्रियाँ वाक्, प्राण, चक्षु और श्रोत्र इन चारों चारों का सन्निवेश है अर्थात् शेष मन के आधार पर कहा ठहरकर और मन को साथ लेकर इन्द्रियाँ आयतन गया है || २ || काम करती हैं इसलिये मन चारों का से उसी इसी प्रकार चक्षु स जगत् के सब पदार्थ देख कर होते हैं । के के तीन पाद उत्पन्न अधिक भाग में ज्ञान उत्पन्न होकर उसी ही ज्ञान को कहने ज्ञान के विषय पर विचार करने के लिये मन उसी को लिये वाक् प्रवृत्त होती है । यदि चक्षु किसी लिये वाकू वस्तु को न दिखाती तो मन को विचार के [ ३१६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * कहने के लिये अवसर ही एक शब्द न मिलता । ओर श्रोत्र जो शब्दों को सुनता है उससे दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं का , और दूसरा उसके होता है अर्थ का । इनमें निरर्थक शब्द ज्ञान निःसार है किन्तु उससे अर्थ ज्ञान , वह देखी हुई ओर प्राण वस्तुओं से सम्बन्ध रखता है । इसलिये श्रोत्र ज्ञान में भी चक्षु की सहायता है, की क्रिया प्रतिष्ठा है || ३ || है वह भी इस रूप द्रव्य शरीर से सम्वन्ध रखती है । इसलिये चक्षु सबकी इसी जो समझते प्रकार वाक् सब इन्द्रियों का स्वरूप बाँधती है । अर्थात् मन में हैं, उस के काम को कहकर ज्ञान के सुनने समझ को मन नहीं देखने को चक्षु नहीं कह सकता, श्रोत्र को श्रोत्र नहीं कह सकता, चक्षु को उन चारों कह सकता केवल ही कहती है कि मैंने समझा, देखा, सुना इत्यादि इससे का, वाक्, का ज्ञान इस सब इन्द्रियों विशिष्ट वाकू को अपने पेट में लेकर स्वरूप धारण करता है । इसलिये वाक् है ( जोरदार स्वरूप बनता है ) और गंगा भी परा या पश्यन्ती वाक के द्वारा ही ज्ञान का है । इसलिये उसके भी ज्ञान में वाकू का प्रवेश 11811 है, इसलिये वह वित्त है उसी से ॥ , उसको धन सम्पत्ति कहा है ॥ ५ इसी और वित्त जो चार प्रकार श्रोत्र की आत्मा, शरीर, प्रजा भाग हैं अन्तिम सीमा है । जिस प्रकार आत्मा ही में आता , उसमें वित्त श्रोत्र अन्त ही अन्तिम सीमा है । उसी प्रकार इन्द्रिय जन्य ज्ञान में कि श्रोत इन प्राणों में श्रोत चक्षु वाकू, मन, प्राण तात्पर्य यह है शब्द की अपेक्षा मुख्यता के अनुरोध से यों क्रम हैं कि,, करता है; किन्तु चक्षु , स्पर्श चक्षु की मुख्यता है क्योंकि श्रोत केवल शब्द मात्र को ग्रहण विपय, रूप में यद्यपि रूप ही इनका मुख्य है इन गुणों को ग्रहण करने का सामर्थ्य रखती है । वास्तव कि मौन भाव से, तथापि करता है । जैसे पुस्तक रूप द्रव्यों में गुणों को भी यह ग्रहण शुक्र वाली बाँचने अन्यान्य कितने ही को भी ग्रहण करता है और भास्वर पर लिखित ग्रक्षरों को देखता हुआ यह चक्षु शब्द नेत्र उस भास्वर शुक्र वस्तु को नेत्र के समीप देखने से नेत्र पर आघात पहुँचता है । इस प्रकार के तीव्र केवल स्पर्श अनुभव हाथ से स्पर्श न करके या खुरदरापना चक्षू करता है । और किसी वस्तु में चिकनापना है इनके अतिरिक्त संख्या से ही दूर से जानली जाती इसलिये परिमाण ग्रहण किया जाता है । किसी खम्भे की गोलाई ही गुण चक्षु से जाने जाते हैं । , पृथक्त्व संयोग विभाग परत्व, अपरत्व आदि कितने ,,, वाली चक्षु, को भी ग्रात्मा अनेक आत्माओं में ही को या दूसरी ज्ञान उत्पन्न होता है किन्तु वाकू से उस आत्मा से चक्षु-है । क्योंकि चक्षु श्रोत्र की अपेक्षा की अपेक्षा वाक् प्रधान प्रधान है । अब चक्षु ज्ञान कराया जा सकता है । वाकू होता में कोई भाव उत्पन्न है । क्योंकि प्रथम मन की अपेक्षा मन प्रधान वाक् ४ प्रकार की है-१ -- परा ( मनमें ), २– पश्यन्ती ( प्राण ३- मध्यमा में ), ४- वैखरी हवा में [ ३१७ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान है जिसको यह वाक् प्रकाश करती है जो विषय मन पर नहीं याता है, उसका अभिनय य वाक् नहीं कर सकती । इसलिये यह वाक् मन की कृता तु करा ( मन की कृति को अनुकरण करने वाली ) है | श्रर्थात् मन केग्रहण किये हुए को ग्रहण करने वाली, इसलिये मन प्रधान है । मन की अपेक्षा प्राण प्रधान है । क्योंकि प्राण यदि क्रिया न करें तो मन यादि सभी इन्द्रियों का काम बन्द हो जायें । यह देखा गया है कि बिना कान का बधिर, और बिना चक्षु का अन्धा, बिना वाक् का मूक और बिना मन का बच्चा या पागल जगत में जीवित रह सकता है, किन्तु प्राण के जाने से सब इन्द्रियां चली जाती हैं । इससे सिद्ध है कि सब इन्द्रियाँ प्राण बन्धन से बद्ध है इसीलिये वैदिक ऋषि गए पांचों इन्द्रियों को पश्च प्राण कहते हैं । ८ - प्रज्ञान का विज्ञान से सम्बन्ध प्राणियों का शरीर पञ्च भूतों का बना हुआ है । उनतों के बने हुए शरीर के धातुयों में शोणित ही प्रधान है । उस शोणित में के अङ्गिरा व्याप्त रहता है उसके आधार से वैश्वानर ग्रात्मा रहती है, उसके ग्राबार से तेजस आत्मा और उनके ग्राधार से प्रज्ञान आत्मा रहती है । प्रज्ञान ग्रात्मा से भूतमात्रा, प्रज्ञामात्रा और प्रारण मात्रा ये तीनों मात्रा संबन्ध रखती है । कोई भी ज्ञान इन तीनों मात्रात्रों के बिना स्वरूप नहीं रखता । प्रत्येक ज्ञान में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, और प्रत्येक वस्तुनों का आकार जो भासता है वह भूतमात्रा है । किन्तु उनके स्वरूप को दिखाने वाला भिन्न - भिन्न इन्द्रियों का भाग जिन से चक्षु का ज्ञान, श्रोत का ज्ञान इत्यादि भिन्न प्रकार के ज्ञानों का भेद प्रतीत होता है वही ज्ञानमात्रा है । और जो इन ज्ञानों में ज्ञान होने की भिन्न - भिन्न क्रियायें प्रतीत होती हैं वह प्राणमात्रा है । कोषीतक ऋषि का मन है कि जिस प्रकार रथ के चक्र में अधि ( भूत ) अरे ( ज्ञान ) और अरा धुरी से ( प्राण ) बद्ध है, उसी प्रकार भूतमात्रा प्रज्ञामात्रा से और प्रज्ञामात्रा प्राणमात्रा से बद्ध है । प्रागात्रा ही इन तीनों में प्रधान है यह प्रजा की प्राणमात्रायें क्षेत्र के भीतर मुख्य प्राण से संवन्ध रखते हैं, और इस मुख्य प्राण में चिदात्मा की चेतना व्याप्त है । इसलिये वह विज्ञानमय क्षेत्रात्मा है, और ये सब महान् आत्मा के आधार से है । स्त्रीपुरुष के अनुसार क्षेत्र का महान् के साथ घनिष्ठ संयोग संबन्ध है, जिससे ये सब आत्मा मिलकर एक आत्मा इस शरीर का धारण और सञ्चालन करता है । - प्राज्ञ की देह भेद से भिन्नता वैश्वानर और तेजस इन दोनों श्रात्माओं के साथ मिलकर रहता हुआ प्राज्ञात्मा प्रत्येक शरीर में भिन्न - भिन्न होता है । वहीं शरीर का ग्रभिमानी है, इसलिये शरीर कहलाता है । जो प्राज्ञात्मा जिस शरीर का अभिमानी है उस शरीर की इन्द्रियों से ज्ञानवन् है, सुखी दुःखी है, और उस शरीर से किये हुए कर्मों के द्वारा पापी पुण्यात्मा है । वास्तव में शरीरावच्छिन्न यही प्राज्ञात्मा शरीर के भेद से भिन्न - भिन्न ग्रनन्त हैं क्षेत्रज्ञात्मा एक है, वह ग्रनन्त नहीं है, किन्तु उसका इस प्राज्ञात्मा से सम्बन्ध रहता है और प्राज्ञश्रात्मायें अनन्त हैं । इसलिये प्राज्ञ के सम्बन्ध से क्षेत्रज्ञ आत्मा भी शरीर में बद्ध प्राय ( प्रतिबिम्ब बद्धप्राय जलका ) है अग्नि, यम, यादित्य इन तीनों मिले हुए रूपों को अङ्गिरा कहते हैं, और वायु, आप्, सोम इन तीनों के मिले हुए रूप को भृगु कहते हैं । [ ३१८ ]