ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 351–360
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 351–360
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* ब्रह्मविज्ञान होकर भिन्न भिन्न सा प्रतीत होता है । किन्तु यदि प्राज्ञ का सम्बन्ध छुट जाय तो उस क्षेत्रज्ञ का शरीर-अभिमान भी छूट जाता है । इसीलिये इस शरीर के किये हुए पाप पुण्य की या सुख, दुःख की वास्ना इसमें नहीं होती । यह क्षेत्रज्ञ शुद्ध में प्राज्ञ से अलग होकर सूर्य में लीन हो जाता है । किन्तु प्राज्ञ आत्मा क़र्म्म जन्य संस्कारों के वशीभूत होकर छोटे बड़े अनन्त योनियों में भ्रमण किया करता है । महान् योनि में उसका महान् शरीर शुद्र योनि में क्षुद्र शरीर पाता है । क्षुद्रयोनि में इन्द्रियाँ अल्प होती हैं, इसलिये ज्ञान भी अल्प होता है, और इन्द्रियों की शक्तियाँ भी अल्प होती हैं । इसी प्रकार महान् योनि में ज्ञान या शक्ति में अपेक्षाकृत अधिकता होती है । क्रीमी कीटों की अपेक्षा मनुष्यों में जिस प्रकार इन्द्रियाँ या इन्द्रियशक्ति अधिक है, उसी प्रकार मनुष्य की अपेक्षा भी देवयोनि में अधिक हैं । अर्थात् मनुष्य में १३ या १४ इन्द्रियाँ हैं । किन्तु देव योनि में १७ अधिक इन्द्रियाँ हैं । अर्थात् = बुष्टि ( अणिमा, महिमा, लधिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व ) और निधियाँ हैं । इस प्रकार इन्द्रियों की न्यूनाधिकता प्राज्ञ में योनि के भेद से होती है । अर्थात् बड़ी योनि की प्राज्ञ ग्रात्मा जब छोटी योनि में जाती है तो उसकी इन्द्रियाँ और इन्द्रियों की शक्ति पाप कर्मों के प्रभाव से कम हो जाती है और छोटी योनि की प्रान आत्मा यदि बड़ी योनि में जाती है तो पुण्य कर्म के प्रभाव इन्द्रियाँ या इन्द्रिय शक्ति बढ़ जाती है । प्रत्येक प्राज्ञ में ज्ञान और कर्म के प्रभाव से उसकी प्रकृति पर परिवर्तन होता रहता है । उस प्रकृति में जैसा संस्कार वासना स्थिर हो जावे वह संस्कार या वासना उस प्राज्ञात्मा को उस छोटी - बड़ी योनि में जाने के लिये विवश कर देते हैं । यदि मनुष्य श्वान से अधिक प्रेम या अधिक सहवास करे तो सम्भव है कि मनुष्य की प्रकृति में श्वान की वासना अधिकतर आवेश करे और उसके कारण उन मनुष्य को श्वान योनि में जाना पडे । जबकि इस प्रकार प्रकृति में संस्कार का प्रभाव पड़ता है तो उस ग्रात्मा की प्रकृति में अधम संस्कार लाना ही पाप है और उत्तम संस्कार का प्रवेश करना ही पुण्य है । १० - प्रत्यय की वृद्धि से विज्ञान की वृद्धि इन्द्रियजन्य ज्ञान को ' प्रत्यय ' कहते हैं । इन प्रत्ययों का सम्बन्ध प्राज्ञ से है । ज्वों ज्यों प्रत्यय अधिक होता जाता है, त्यों त्यों प्राज्ञ ग्रात्मा की वृद्धि प्रतीत प्रतीत होती है । परन्तु वास्तव में प्रज्ञान में बैठा हुआ विज्ञान ग्रात्मा बढ़ता रहता है । सूर्य, चन्द्र, विद्युत् इन तीनों से बना हुआ तेजस, बढ़ता हुआ वैश्वानर को बढ़ाकर साथ ही एक एक अंग को बढ़ाता रहता है, जिससे शरीर बढ़ जाता है । शरीर के बढ़ने से प्राज्ञात्मा भी बढ़ा हुप्रा प्रतीत होता है । विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ आत्मा में मुख्य प्राण और प्राज्ञात्मा दोनों ही रहते हैं । मुख्य प्रारण से कर्म इन्द्रियों का साक्षात् सम्बन्ध है, किन्तु प्राज्ञात्मा का सहकारिता सम्बन्ध है । क्योंकि विना ज्ञान की सहायता के कोई भी कर्म इन्द्रिय अपनी क्रिया नहीं करती । इसी प्रकार प्राज्ञात्मा से ज्ञान इन्द्रियों का साक्षात् सम्बन्ध है, किन्तु मुख्य प्राण का सहकारिता सम्बन्ध है । क्योंकि बिना क्रिया किये कोई भी ज्ञान इन्द्रिय ज्ञान उत्पन्न नहीं कर सकता । ज्ञान इन्द्रिय से जो बाहर का अर्थ ग्रहण किया जाता है, उसमें अर्थ पर इस परमाणु के परिमाण से दृष्टि पर ग्राता है, आये हुए सूर्य रश्मि जब अर्थ के तो तेजस प्राण का सोमरस उसी [ ३१ ९ ] परमाणु से संयोग करके परिमाण का वैसा ही
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* ब्रह्मविज्ञान र मिलकर अर्थ के आकार में श्राजाता है । वही चन्द्र रस धीरे धीरे तेजस आत्मा के चन्द्र भाग में संचित है तो उसकी ' प्रत्य-होता रहता है वही संचित भाग विद्युत् के द्वारा विज्ञान के सम्मुख जब जब आता जब तक भिज्ञा ' या स्मरण रूप ज्ञान हुआ करता है । अर्थ रूप में लाया हुआ चन्द्र रस विज्ञान से भासता रहता है, तब तक उसको प्राज्ञात्मा कहते हैं । यद्यपि यह प्राज्ञात्मा स्वयं कुछ नहीं बढ़ता, तथापि उसके भासने का स्थान जो श्रर्थ के ग्राकार में श्राया हुआ चन्द्र रस है वह बढ़ता है । उसके बढ़ने से प्राज्ञात्मा का भी बढ़ना प्रतीत होता है । यही प्राज्ञात्मा का बन्धन के लिये शुक्राधान संस्कार है । यह संस्कार दृढ़ मूल हो जाता है, जबकि उसकी कामना की जाती है । कामना ही बन्धन के लिये रस्सी या गूंद का काम देती है । किन्तु यदि निष्काम ज्ञान होता है तो प्राज्ञात्मा में ग्रामा हुआ शुक्र दृढ़मूल नहीं होता । इसलिये दृढ़ संस्कार न होने से प्राज्ञात्मा बद्ध नहीं होता । बद्ध होने पर प्राज्ञात्मा उस शुक्र के अनुसार भिन्न भिन्न गति में जाता है । किन्तु यदि श्रबद्ध होकर प्राज्ञात्मा बढ़ता रहे तो प्रज्ञान अन्त में विज्ञान रूप होता हुआ पृथक् स्वरूप बनकर विज्ञान ग्रात्मा में लीन होता रहता है । इससे विज्ञान आत्मा के साथ सूर्य में लीन होकर मुक्त हो जाता है । — स्वर्ग में नित्य जाना और यह प्राज्ञात्मा, ग्रानन्द, विज्ञान, मन, और ग्रन्न इन पाचा से कदापि शून्य नहीं होता, लोक सभी कामनायें इसकी सत्य ही होती हैं । यह सत्य संकल्प ही यहां से जाता है । तात्पर्य यह है कि से त्रियातीत चिदात्मा से ग्रानन्द की मात्रा, सूर्य से विज्ञान की मात्रा, चन्द्रमा से मन की मात्रा अन्तरिक्ष प्राण की मात्रा, और पृथ्वी से अन्न की मात्रा - ग्राकर यह प्राज्ञ ग्रात्मा पञ्च कोश का बनता है । सबसे , बाहर ग्रन्नमयकोश, उसके भीतर प्राणमयकोश, उसके भीतर मनोमयकोश, फिर भीतर विज्ञानमयकोश उसके भीतर ग्रानन्दमयकोश ग्रोर उसके भी भीतर हमारी प्राज्ञग्रात्मा है । इन पांचों कोशों के भीतर प्राज्ञआत्मा पर भिन्न २ स्थान से ये पांचों धर्म ग्राकर संचित हुए हैं । परन्तु ये पांचों ही इस प्राज्ञ ग्रात्मा में स्थिर नहीं रहते । प्रतिक्षण ये पांचों अपनी २ योनि पर जागा करते हैं इनका सत्यसंकल्प , यह जाना में है । ग्रर्थात् प्राज्ञ से एक ही स्थान में रहकर भी नियम से परिवर्तित ( उलटकर ) होकर भिन्न २ स्थानों भिन्न २ मार्ग से गति करने में ये कदापि चूकते नहीं, अवश्य ही अपने प्रभव स्थान पर यही पहुँचते हैं, इनके संकल्प की सत्यता है । इस प्रकार पृथ्वी, अन्तरिक्ष चन्द्रमा सूर्य और परोरजा इन पांचों स्थानों , , में जाना ही स्वर्ग में नित्य जाना है । परन्तु इस जाने से कि प्राज्ञश्रात्मा यह कल्पना नहीं करना चाहिये है, इन पांचों से कभी शून्य हो जाता है । जिस प्रकार एक जलपूर्ण पात्र जिसमें चन्द्रमा का प्रतिविम्ब यदि उसको एक कोस ले जायें तो भी उस जल में चन्द्रमा रहेगा । परन्तु का प्रतिबिम्ब दीखता ही विश्वास करो कि चन्द्रमा की वह रश्मि जिससे पहले प्रतिबिम्ब जा रहा बना था प्रत्येक पद में बदलता है । तथापि श्रविच्छिन्नगति से संयोग वियोग होते रहने के कारण जल में प्रतिबिम्ब स्थिर साप्रतीत के होता है । इसी प्रकार यहां प्राज्ञ में भी ये पांचों धर्म अविच्छिन्नगति से प्रतिक्षण प्राते जाते रहते हैं । इसी कारण नित्य स्वर्ग जाने पर भी प्राज्ञमात्मा नित्य, पञ्चकोशमय बना रहता है । जिस कारण सत्यइन मध्य या उदर में अनृत से प्राज्ञ में इन पञ्च कोशों का व्यभिचार नहीं और प्रज्ञा के अर्थों का भोगनहीं पांचों रूपों से प्रतिक्षण होता रहता है । इसी से इन पांचों का स्वर्ग में नित्य जाना हमारे विज्ञान में [ ३२० ]
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ब्रह्मविज्ञान याता | जैसे किसी तो होद में समान दो भागों हौद का जल में पानी माना जाता रहे और वे दोनों मार्ग ढक दिये जायें ये पांचों स्थिर प्रतीत होगा ही । उसी प्रकार ये पांचों धर्म स्वर्ग में जाते हुये भी स्थिर प्रतीत होते हैं । जब अपने अपने २ प्रभव से मौलिक फिर प्रभव में जाते रूप आते हैं, तब वे सत्य हैं और जब परिवर्तित होकर प्राज्ञात्मा हैं तो उस में समय भी मौलिक रूप होने के कारण वे पांचों सत्य हैं । किन्तु वे पांचों ग्राकर एकत्रित या मिया है होकर मिश्रित रूप में होते हैं । तब उनका रूप यौगिक होने के कारण अनृत । इसी बात शब्द में ' न ' की सूचना के लिये ' सतियं ' शब्द का सत्यं शब्द बोला जाता है । अर्थात् इस है पूर्ण रूप है , इसीलिये और ' य ' रूप है । किन्तु ' त ' बिना स्वर के होने के कारण खण्डित रूप में करता उसको ' ति ' ' शब्द सूचित है रूप में कहना है । तात्पर्य यह है कि यह ' सत्य मौलिक, कि इस अनृत या मिथ्या जगत् की प्रत्येक वस्तु यादि में रूप सत्य थी और पश्चात् भी पुरूष सत्य ही या मौलिक रहेगी । है मध्य में जो कुछ यह जगत् रूप दीखता है सब मिथ्या । १२ – प्राज्ञ आत्मा का मुख्य स्वरूप ( क ) इस शरीर में करता है । सर्वाङ्ग शरीर अन्तरिक्ष से वायू ग्राकर इस शरीर का निर्माण मेंव्याप्त है । किन्तु होकर केन्द्र की शरीर को पकड़े हुए केन्द्रस्थ होता केन्द्र शक्ति से अधिक मात्रा में वह वायु सर्वाङ्ग । इन पांचों केन्द्रों का इस शरीर में योनि या ब्रह्मग्रन्थि भी पांच हैं - ब्रह्मरन्ध्र, कण्ठ, हृदय, नाभि, एक प्रकार केन्द्र ' से वायु आकर हृदय ' अपेक्षा में अधिक मात्रा बद्ध और है । इस हेतु सब केन्द्रों की हृदय में अधिक स्थिर हो शरीर में व्याप्त होता हुआ हृदय मात्रा जाता है । इसी वायु को जो कि सर्वाङ्ग सूर्य से प्राये से है उसको विक्षेपक शक्ति है, इसी हेतु हुए प्राणवायु व्यान कहते हैं । इस व्यान में स्वभावतः पृथ्वी से आये हुए । वायु को को अपने में फेंकता है । इसी प्रकार सिद्ध अपने ग्राघात से उलटा द्यौलोक के तीन वायु से पांच वायु होते हैं ग्राघात से पृथ्वी की ओर फेंक देता है । इस प्रकार तीन लोकों पृथ्वी से प्राता हुआ । प्रारण दिव्य वायू हैं, समान आता ये दोनों योग कराने बाला और हुआ और उदान उल्टा जाता हुआ हैं और दोनों का जो अन्तरिक्ष पृथ्वी में उलटा जाता हुआ अपान ये दोनों पृथ्वी की वायु प्राण और प्रपान का घर्षण का मध्यवर्ती में व्यानवायु ऊपर तीन लोकों को होता है वायु व्यान है । इन पांचों वायुओं ' ' कहते हैं । तीन उसी से एक नयी होती है उसे वैश्वानर हैं । नर का अथ विश्व यौगिक अग्नि उत्पन्न ' नर ' कहते सञ्चालन कहते हैं वायुओं को तीनों को । इन तीनों लोकों के भिन्न २ तीनों प्राण हैं इसलिये उन विश्व करनेवाला सञ्चालन करते, के परस्पर मेल का है । तीनों प्राणवायु तीनों विश्वों का तीनों विश्वानरों से नर अर्थात हैं । इन प्रकार का यह विश्व के चलाने वाले को विश्वानर कहते पिण्ड में जो एक गरमी शरीराग्नि कहते हैं । प्रत्येक ग्रात्मा पहली भूतश्रात्मा उत्पन्न होती है इसी से इसको वैश्वानर वही प्रत्येक पिण्ड की मालूम है । होती है पिण्ड वैश्वानर अग्नि । , वह उस का है इसी से यह ( ख ) का मूलकारण वैश्वानर यह वैश्वानरयग्नि ही सुवर्ण अण्ड कह नाता हिरण्यरेता है अर्थात् इसके परमाणु वहां तक हिरण्यमय है अग्नि अपने व्याप्ति करता है उत्पन्न होता. । प्रग्रण्डे परिमाण के तक का गोला अनुसार जहाँ के परमाणुओं के आकार में सूवर्ण का गोला अर्थात् अग्नि [ ३२१ ।
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* ब्रह्मविज्ञान ऋ स्थिर है । इस हिरण्मय ग्रण्ड के केन्द्र में अग्नि की प्रबलशक्ति के कारण जो एक प्रकार का प्राण वायु रहता है, उसे हो ब्रह्मा कहते हैं । वैश्वानर के हिरण्यमय पिण्ड में सूर्य, चन्द्रमा और विद्युत ये तीनों ही तीन २ - परिवारों के साथ व्याप्त होकर जो ग्रण्ड के केन्द्र में अपनी शक्ति का श्राधान करते हैं वही शक्ति तीन तेजों से उत्पन्न होने के कारण तेजस कहलाता है । ब्रह्माण्ड रूपी ग्रण्ड में जो हिरण्यगर्भ कहा जाता है, वही प्राणियों के शरीर में तेजस कहलाता हैं और इसी को पौराणिक भाषा में ब्रह्मा कहते हैं । यही ब्रह्मा हिरण्यगर्भ या तैजस रूप में प्रत्येक प्राणियों का दूसरा भूतात्मा है । ( ग ) इस हिरण्यगर्म या तैजस रूपी ब्रह्मा में विद्युत् के कारण सूर्यरस और चन्द्ररस विभक्त होकर दो स्वरूप धारण करते हैं । एक सूर्य प्रधान जिसमें चन्द्ररस गोण है, वह स्वरूप पुरुष की शक्ति रखता है और दूसरा चन्द्र या सोम प्रधान जिसमें सूर्य रस गोरण ( सहकारी ) रहता है, वह स्त्री का स्वभाव रखता है । इस प्रकार एक ही ब्रह्मा स्त्री और पुरुष के स्वरूप में दो हो जाता है । ये दोनों ही नित्य संयुक्त रहते हैं, यहां तक कि प्रत्येक पुरुष या प्रत्येक स्त्री के शरीर में ये दोनों स्वरूप मिलकर रहते हैं । दाहिना भाग पुरुष का है और बाम भाग स्त्री का है पुरुष भाग को इन्द्र कहते हैं और स्त्री भाग को ' विराट ' किन्तु पुरुष के शरीर में इन्द्र अर्थात् पुरूष भाग प्रधान रहता है । इसी प्रकार स्त्री के शरीर में विराट अर्थात् स्त्री ग्रात्मा ही प्रधान रहती है । इसी प्रधानता के कारण जगत् में स्त्री पुरुष कहकर दो स्वरूप के जीव दिखाई पड़ते हैं । स्त्री या पुरुष इन दोनों में से प्रत्येक के शरीर में स्त्री आत्मा या पुरुष आत्मा मिलकर एक तीसरा स्वरूप उत्पन्न करते हैं जिस को भी ' विराट ' ही कहते हैं । ' विराट् ' यह शब्द एक छन्द का नाम है, जिसमें १० ग्रक्षर अर्थात् १० अवयव मिलकर कोई स्वरूप बनता हो वह विराट्छन्द का होता है इसीलिये विराट् कहलाता है । स्त्री ग्रात्मा या पुरुष श्रोत्मा दोनों मिलकर जो नया स्वरूप हैं उत्पन्न होता है वह स्वभाव से ही १० धर्मों का ग्रहण करने वाला होता है इसी से इसे विराट कहते , ( वे ५० धर्म ये हैं- १ - प्राण, २ - देवता ३ ऋतु ४- दिक् - साम ६ - ग्रह ,, ५ - छन्द ६- स्तोम ७- ८, ,,, पृष्ठ, १० - ऋषि । जगत् में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो इन दसों का धारण किये यों कहिये हुए न हों अथवा कि इन दसों के व्यूह को ही वस्तु कहते हैं । सभी वस्तुएं इन्हीं दसों धर्मों से बनी हुई हैं । १- प्राण इनमें भी प्राण १० प्रकार का चेतन शरीर में देखा तीनों दो - दो जाता है, कान, आंख, प्राण ये होने से छः हो गये, वाक्, नाभि, शिश्न और गुदा से आत्मा इन चारों के योग से १० प्रारण होते हैं । इन भिन्न २ प्रकार के ग्रन्नों को ग्रहण रखते करता है । किन्तु अचेतन धातु इत्यादि को न भी ये इन १० प्राणों में हुए प्राण अवश्य रखते हैं । जिससे वे भी अग्नि । जगत् , सोम आदि पदार्थों को खाया करते हैं ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो बाहर से अन्न को ग्रहण न धर्मों को बाहर करता हो या अपने शरीर के न निकलता हो, इनमें ग्रन्न ग्रहण करना प्राण का है । इससे काम है, और निकलना अपान का काम प्रत्येक वस्तु में प्राण अपान का होना सिद्ध है होते हैं ) , । ( दो प्राणों के सिद्धहोने से पांच प्राण सिद्ध [ ३२२ ]
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ब्रह्मविज्ञान २ - देवता इसी प्रकार अग्नि प्रत्येक वस्तु में पांच जाति के देवता रहते हैं अग्नि सूर्य चन्द्र और दिक् , वायु,, , वायु ११ रहते है आदित्य १२ चन्द्र ३ दि ३ इनके अतिरिक्त पांच प्रकार के प्रत्येक वस्तू में प्रत्येक,, पशु प्रत्येक वस्तु में जो एक प्रकार का बल अथवा दीखता है अग्नि का अंश है । और वस्तु के वस्तु भार वह और जो अङ्ग ये का अंश है । इन प्रत्यङ्ग नियतरूप से जमाव है या जो उसमें परिवर्तन है सब वायु वस्तुओं में जो की ( अन्न का ग्रहण ) प्रादान करना और मन का निकालना विसर्ग है । यज्ञ क्रिया होती है उसका कारण इन में सूर्यहै । अन्न जो हम अन्न, ऊके, प्राण इनके से जो है उसे ही यज्ञ कहते हैं । अर्थात् खाते हैं उसको परस्पर परिग्रह चक्कर बनता है । अन्न खाया जाता है प्राण ही भीतर ले जाता है, अर्थात् प्राण से अन्न खाया जाता | अन्न के से प्रारण बनता है, और रस से एक जिसे ऊर्क कहते हैं । उसी ऊर्क बल प्रकार का बल होता है, जाती है । यही प्राण से फिर क्रिया जड़ चेतन सभी वस्तुओं में पाई , वस्तु सूर्य का अंश अन्न खाया जाता है । यह चक्र की शीतल हैं । जिनके कारण में घनता है । ये तीनों ही देवता गरम हैं, किन्तु शेष दो देवता होकर भिन्न भिन्न वस्तुओं उत्पन्न होती है पञ्चभूतों का आवरण और जिनसे सूक्ष्म आत्मा के ऊपर स्थूल इन्हीं पांचों का स्वरूप के परमाणु हैं वे सब बन जाता है । जो वस्तुओं में वस्तुओं कुछ इन देवताओं अग्नि के बल तीन प्रकार की से से उत्पन्न सोम से स्थूल भूत भाग और इनके भीतर हुए हैं । अर्थात् दोनों प्रकार के है कि-से कहा गया सूक्ष्म भाग बने हुए हैं । इसीलिये यह सिद्धांत रूप ' अग्निषोमात्मकं है । सोम से बना हुआ जगत् ' अर्थात् सम्पूर्ण जगत् अग्नि और ३- ऋतु भोर प्रत्येक होते रहते हैं । वृक्ष चेतन वस्तु में ऋतु जड़ चेतन ' दोनों में समान बदलते रहते हैं जैसा जीवों का संयोग है । यानि ऋतुधमं, उनमें प्रत्येक ऋतु में ऋतुओं कि गरमी में ऋतु के समय सन्तान उत्पन्न होता है यह ऋतुधर्म । भिन्न २ अन्न भी भिन्न २ में के दिनों में शीतकाल में नहीं होता होती हैं । ऋतु के अभाव होते हैं आम का फल होता है, करने की शक्ति का में । अर्थात् उत्पत्ति में ऋतुधर्मो प्रवेश ऋतुधर्म जब ऋतुधर्म उनमें आता है तब कि प्रत्येक वस्तु निर्गम के अभाव सिद्ध हुआ की होती है, वे ( से उत्पत्ति नहीं होती । इससे असंख्य प्रकार सब निकलता की अपेक्षा - वर्षा ये तीन ऋतु भिन्न २ ) होता रहता है । ऋतु यद्यपि प्रत्येक वस्तु २ - ग्रीष्म, ३ हैं हैं । किन्तु हैं । १ - वसन्त, ये तीनों ऋतु वे हैं जिनमें सर्व साधारण ऋतु ६ ही प्रकार की ६- शिशिर , जिनमें अग्नि की ४-, ५ - हेमन्त, हैं जो कि ६०-६० दिन की अग्नि मात्रा बढती जाती है तत्पश्चात् शरद् छः ऋतु होती मानी जाती मानी की मात्रा गिरती जाती है इस प्रकार यद्यपि से पांच ही है जाती है के देखने मुख्यतया के अनुरोध से ३६ , छत्तीस, जो कि किन्तु पदार्थों में इनका असर ५ प्रकार के चढ़ाव उतार २ एक. एक पांचों ऋतुओं है । दिन के ७२ दिन की होती है । इन में साधारण १० प्रत्येक वस्तु ऋतु सिद्ध होते हैं, इनका सम्बन्ध [ ३२३ ] ३६ ||
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* ब्रह्मविज्ञान ४ – दिक प्रत्येक वस्तु चारों ओर से दबा या घिरा हुआ प्रतीत होता है । अर्थात् प्रत्येक वस्तु में मुटाई होती है जो कि सीमा से बाहर जिन धर्मों से उसकी मुटाई जुदा होती है उन्हीं धर्मो को दिक् कहते हैं । यद्यपि मुटाई बाले वस्तु में ग्रन्तिम पृष्ठ के परमाणु के अनुरोध से ये दिक् श्रनन्त हो सकती है, तथापि समझने में सौकर्यं ( आसानी ) के लिये १० दिशा मानी जाती है । ४- प्रदिशा । ४- उपदिशा और २- ये । जिनमें अधः ऊर्ध्व । इन दस दिशाओं से प्रत्येक वस्तु जिनमें मुटाई है अवश्य ही घिरे हुए होते हैं इसलिये १० दिशा नहीं हैं उनमें मुटाई भी नहीं होती और वे पृथक् कोई वस्तु कहकर समझे नहीं जाते, वस्तु की दिशा भी साधारण धर्म है । ५ – छन्द १ - वय और प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई परिमाण होता है यह परिमाण दो प्रकार का है - उसकी २- योनाथ । जिन द्रव्यों से वस्तु बनी हुई होती है उसे ' वय ' कहते हैं । वय की न्यूनाधिकता या उस जाति से वस्तु के स्वरूप में भेद होता है । इसी प्रकार उस वस्तु के ग्रायतन को ' वयोनाथ ' कहते हैं भेद से भी वस्तु में भेद होता है जैसे कोई वस्तु गोल है या त्रिकोण या चौकोर है । इन्हीं दोनों परिमाणों में को छन्द कहते हैं । किन्तु इसमें ' वय ' को वछन्द और ' वयोनाथ ' को मात्रा छन्द कहते हैं । वेद अधिकतर वछन्द का ही निदर्शन है । कोई वस्तु ग्राग्नेय धर्मों से बना होता है उसे गायत्री छन्द कहते हैं और ऐन्द्र ११ धर्म वाले को त्रिष्टुप्छन्द और ग्रादित्य धर्म वाले को जगती १२ छन्द इत्यादि इत्यादि सब कहते हैं । तात्पर्य यह है कि कोई भी वस्तु इन दोनों छन्दों से रहित नही है इसलिये छन्द भी वस्तुनों का साधारण धर्म है । ६- स्तोम ( प्राणराशि ) ) हुग्रा प्रत्येक वस्तु में प्राणमय देवों की राशि जिन संख्याओं में प्रायः सन्निविष्ट ( जमी हुई, करती है उन्हीं प्रारण राशियों को स्तोम कहते हैं । यह स्तोम ४ प्रकार का होता है - १ - अभिप्लव स्तोम २- पृष्ठस्तोम - छन्दोमस्तोम, ४ - प्रविवावयस्तोम । ग्रभिप्लवस्तोम । १ - ज्योतिष्टोम ३ प्रकार का है ( E ), है -१ - निवृत्त [ देवता ], २ – गोष्टोम [ भूत ], ३ - प्रायुष्टोम [ श्रात्मा || पृष्टचस्तोम ६ प्रकार का ) । २- पञ्चदश ( १५ ), ३ - सप्तदश ( १७ ) ४- एकविंश ( ३३ , ( २१ ) - त्रयत्रिश, , ५ - त्रिरणव ( २७ ) ६ ( ४८ ) छन्दोमस्तोम तीन प्रकार का है । १ - चतुर्विंश ( २४ ) २-चतुश्चत्वारिंश ( ४८ ) ३ - श्रष्टचत्वारिंश जातियों विवाक्यस्तो एक ही प्रकार का हैं पञ्चविंश की । ( २५ ) इनमें ग्रभिप्लवस्तोम से तात्पर्य प्रारण सूर्य से है । तीन ही प्रकार के प्रारणों से जगत् के सत्र पदार्थ बने हैं की समष्टि यह के । इन्हीं तीनों प्रारणों से आत्मा है । इनमें ज्योतियों से देवताओंों की सब जाति और गौ से भूतों की सब जाति और ग्रायु को सब भेद इन तीनों पदार्थों के अतिरिक्त इस त्रैलोक्य भर में कहीं तीनों के जमाव कुछ नहीं है, इन्हीं ऋषृष्ठयस्तोम का सम्बन्ध वषट्कार ( जो वास्तव में वौषट्कार ) से है । [ ३२४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान अभिप्लोस्तोम जिनमें कहते हैं । उनके सन्निवेश ( जमने ) में प्राणों की संख्या प्रायः १० प्रकार की देखी गई है । ६ को नियत पृष्ट कहते हैं, क्योंकि उनसे तीन अग्नि और दो सोम और प्रजापति के सन्निवेश की सीमा होती है । ग्रागे की हुई तीन छन्दोमा इसलिये कहे जाते हैं कि उनकी संख्या छन्दों की संख्या से मिलती है जैसे चतुविश होता गायत्रीछन्द से, चतुश्चत्वारिश त्रिष्टुपछन्द से और अष्टचत्वारिंश जगतीछन्द से तुल्य है । शेष पञ्चविश इस किसी वस्तु या छन्द की संख्या से तुल्य नहीं होता । इसलिये अविवाक्य है । प्रकार १० स्तोम धर्म्म है । प्रत्येक वस्तु में नियत होते हैं इसलिये स्तोम भी प्रत्येक वस्तु का साधारण ७- पृष्ठ प्रत्येक निकल । कर दो पृष्ठ वस्तु मन प्रारण वाक् का बना हुआ होता है । उसके मन, प्रारण, वाक् , कायम करते और २ - दृश्य स्थानानभिमानी हैं । १ - अन्तःपृष्ठ जो स्थूल दृश्य और स्थानावरोधक होता है सूक्ष्म तक छः पृष्ठ नियत होता है । इस दूसरे पृष्ठ म वस्तु के केन्द्र से लेकर अन्तिम बहिः पृष्ठ रहते हैं जिनको हैं ये छओं पृष्ठस्तोम मिलकर एक ' वषट्-, त्रिवृत् पञ्चदश आदि स्तोम कहते । से कार ',, कहलाता से तात्पर्य वौक् का षट् ( छः ) भागों है । यहां है । यह ' वषट्कार ' ' वोट ' को कहते हैं । वौषट् रखने से वोक होता है । पर ' ग्र ' और के उदर में प्रो के जिसका ' उ ' मिलकर ' श्री ' बनता है । वाक् मे तात्पर्य उस प्रविष्ट हों । ऐसे मन, प्राण को उदर वाकू से है जिसके उदर में मन और प्राण लिये हुएवाकू के यः पृष्ठ में सीमा में नहीं जाता हुआ करते हैं में ग्रन्तिम बहिःपृष्ठ सब वस्तुओं बराबर । तथापि उन छः पृष्ठों में अन्य प्रकार का | किसी में और किसी इसलिये किसी वस्तु में वह पृष्ठ छोटा होता है, और किसी बड़ा रथन्तर पृष्ठ कहते पृष्ठ को हैं । सूर्य उन सबका नाम भिन्न - भिन्न प्रकार का है । जैसा कि पृथ्वी के बहि. कहते हैं । इसी प्रकार के बहिःपृष्ठ के बहिः पृष्ठ को राजिन को वृहत् पृष्ठ कहते हैं । चन्द्रमा के वषट्कारों में यद्यपि सभी वस्तुओं छ. विभाग को वौपट या वषट्कार कहते हैं । वस्तु भेदस ये बहिःपृष्ठ । उनके भिन्न - भिन्न नाम हैं नाना प्रकार के हैं और पृथ्वी ३ । क्योंकि यह रथन्तर भी २- वैरूप, ३- शाक्वर प्राणों की ३ प्रकार का होता है - १ - रथन्तर, गौ ३- द्यौः इन्ही तीनों वाक् प्राणों को अपने शरीर से निकालती है - १ - वाक्, २-, प्रकारके सीमानों ये तीन प्राण निकलते हैं, गों, आयु जिनकी को रथन्तरादि कहते सूर्य से भी ज्योति, हैं ये तीनो ही बृहपृष्ठ भिन्न भिन्न हैं । इसी प्रकार रक्तपृष्ठ कहते सीमायों को क्रम से वृहत्पृष्ठ, वैराजपृष्ठ, ही भेदहैं '1 में एक आदित्य आदि देवताओं के अग्नि, इन्द्र, । की सीमा ऊपर उस सहस्र में पृष्ठों को स्तोम कहते हैं दूसरा इस प्रकार होते हैं, किन्तु उन के अनुरोध सहस्र कर लिये गये हैं से जो खास खास सीमावृत्त नियत वस्तु है जो कि प्रत्येक यद्यपि एक प्रकार का वर्तुलवृत्त पृष्ठ शब्द साम का नाम है और एक साम किन्तु जोचरम राजिन प्रादि बृहत् के लिये रथन्तर ( या खिरी ) सीमा नियत होती है उन्ही बहिपृष्ठों ' यहाँ संकेत है । पर ' अ ' से मन का और ' उ ' से प्राण का | ३२५ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान संज्ञाशब्द् व्यवहार में आते हैं । यद्यपि यह पृष्ठ ग्रनन्त हैं तथापि उनमें से कोई न कोई प्रत्येक वस्तु अवश्य रहता है, इसलिये वहिःपृष्ठ भी प्रत्येक वस्तु का साधारण धर्म है । में ८- साम प्रत्येक वस्तु का जीवन, देश और काल से परिच्छिन्न होता है । अर्थात् किसी प्रदेश में रहकर चारों ओर जिस प्रकार अपनी सीमा वहिःपृष्ठ तक नियत करता है उसी प्रकार कालिक परिच्छेद में जन्म लेकर कुछ समय के पीछे उसका अभाव हो जाता है । इसी कारण से उसके जीव के ग्रवसान को साम कहते हैं । जीवन काल से लेकर अवसान काल तक यदि उसकी अवस्था देखी जाय तो असंख्य होगी, किन्तु स्थूल रूपसे ७ ग्रवस्था उस साम की भक्ति कही जाती है- -१ - हिंकार, २ - प्रस्ताव, ३ - यादि ४ – उद्गीथ, ५ - प्रतिहार, ६ - उपद्रव, ७ - निधन | किसी वस्तु के जन्म में जो वस्तु का सम्भार ( सामान ) एकत्र होने लगता है वह हिंकार | जब उस सम्भार से वस्तु बनने का उद्योग किया जाता है वह प्रस्ताव है उसके ग्रनन्तर जब वस्तु का स्वरूप बन जाता है तो वह आादि है, उस वस्तु के जीवन काल की प्रौढ़ अवस्था उद्गीथ है, उसकी गिराव की दशा प्रतिहार है, उसके स्वरूप में विकृत होना उपद्रव है ' प्रोर उसके स्वरूप का नाश होना निधन है । इस प्रकार ७ श्रवस्था प्रायः होती हैं इन्ही सातों से सिक्त उस वस्तु का साम होता है । यदि इस साम को संक्षेप से देखें तो ५ अवयव भी कह सकते हैं - १ - हिकार, २ – प्रस्ताव, ३– उद्गीथ, ४ - प्रतिहार, ५ - निधन, और भी संक्षेप से देखें तो तीन ग्रवयव हो सकते हैं – १ प्रस्ताव २– उद्गीथ, ३ - प्रतिहार । इसमें उद्गीथ को मुख्य साम का अवयव कह सकते हैं, क्योंकि वस्तु का स्वरूप सत्ता वहीं पूर्णता को प्राप्त होती है यह उस वस्तु की पूर्णमासी है, और हिङ्कार निधन ये दोनों ग्रमावास्या हैं । इसी उद्गीथ को प्रकार ग्रर्थात् श्रोम्कार को ऋग्वेद आदि वेदों में जिस प्रकार प्रणव कहते हैं उसी प्रकार सामवेद में उसे उद्गीथ करते हैं । उद्गीथ में ही उस वस्तु की प्रतिष्ठा है उसी प्रकार ग्रोंकार ही इस जगत् की प्रतिष्ठा है । इस सामके उद्गीथ आदि श्रवयवों के बहुत से उदाहरण छन्दोग्य उपनिषद् आदि में दिये हुए हैं वे सब कालिक उदाहरण हैं । किन्तु प्रत्येक वस्तु के दैशिक परिच्छेद में भी उसी प्रकार तीन वा पाँच या सात या ग्रसंख्य साम की भक्तियां हो सकती हैं । इसलिये यह साम भी पैदा होने वाली प्रत्येक परिच्छिन्न वस्तु का साधारण धर्म है । ६— ग्रह प्रत्येक वस्तु में अग्नि प्रज्वलित रहती है, उन्ही पात्रों को ग्रह कहते हैं । वह ग्रग्नि तीन प्रकार की होती हैं । १- गार्हपत्याग्नि जो पृथ्वी की ग्रग्नि है, २ - ग्राहवनीयाग्नि जो सूर्य की अग्नि है, और ३– दक्षिणाग्नि जो अन्तरिक्ष की अग्नि है । इन तीनों में गार्हपत्य के संबन्ध से श्राहवनीय उत्पन्न होता है, और उसी प्राहवनीय में सोम की आहुति रूप यज्ञ होता रहता है, और वही यज्ञ हमारा जीवन है । [ ३२६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान इस ग्राहवनीय में जो सोम यज्ञ होता है उसके लिये सोम भिन्न भिन्न पाँचों में ग्रहण किया जाकर क्रमसे अग्नि में हवन किया जाता है । वे सोम के रखने के पात्र शास्त्र में ४० गिने गये हैं । किन्तु इन पात्रों से सोम का हवन भिन्न - भिन्न समय में भिन्न - भिन्न संख्याओं में होता है । जिस प्रकार अग्नि में घृत डालने को हवन करते हैं, उसी प्रकार अग्नि में सोम डालने को ' सवन ' कहते हैं । यह सवन समय के भेद से ३ - प्रकार का होता है । १ - प्रातः सवन, २ - मध्याह्न ( माध्यन्दिन ) सवन, ३ - सायंसवन । जिन में प्रातःसवन में १७ ग्रह होते हैं, और मध्यान्ह में ६ ग्रह और सायंसवन में ६ ग्रह होते हैं । इन का क्रम इस प्रकार है-४० ग्रह सोमरस के रखने के, सवन करने के पात्र प्रातः सवन मध्याह्नसवन सायंसवन १– उपांशु सवन = ग्रह व्यान २ - उपांशु " प्राण १- शुक्र २ - मंथी ग्रह " 1 ३- ग्रन्तर्याम उदान ३- जाग्रयण १ - आदित्य २ - दधि ३- सावित्र ग्रह 27 " 11 ४ – ऐन्द्रवायव ५ – मंत्रावरुण ६ - श्राश्विन " " वाक् ४- मरुत्वतीय ४ - वैश्वदेव 11 " " ऋतु, दक्ष ५ - उक्थ्य ५- पालीवत " 1 " 1 श्रोत्र ६ - माहेन्द्र ६ -हारियोजन 11 " } ७- शुक्र - मंधी " चक्षु 72 चक्षु ६- श्राग्रायण श्रात्मा " १० – उक्थ्य ग्राय " } ११ - वैश्वानर " " पूर्वप्राण १२ - ध्रुव १३- ऐन्द्राग्न " पश्चात् प्राण " १२ मास १४ – ऋतु १२ + १३,, = २५ १५ - वैश्वदेव २६ ” २७,, १६ – पूतभृत् १७ - ग्राहवनीय २८,, २८ + -६ - + -६ = ४० [ ३२७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान इस प्रकार ये ४० ग्रह जिनमें १३ ग्रादि के ग्रथवा ऋतुग्रहों को १२ गिनने से आदि के १८ ग्रह तो प्रातः सवन के हैं और पीछे ६ ग्रह मध्याह्नसवन के हैं और शेष ६ ग्रह सायमवन के हैं । तात्पर्य यह है कि विशेषकर मनुष्य के शरीर में ४० पदार्थ ऐसे हैं जिनमें चन्द्रमा आदि से सोमरस संचित होता है । अर्थात् स्वभाव से ही ग्राकाश से सोमरस को ग्रहण करके अपने भीतर भर लेते हैं, और फिर ग्राहव-नयकुण्ड में अर्थात् हमारे विज्ञानमय और ग्रात्मा में सवन अर्थात् डालते रहते हैं । जिससे सोम रूपी ग्रन्न पाकर वह विज्ञानमय हमारी ग्रात्मा प्रज्वलित रहती है । यदि इस प्रकार मोम की आहुति इसमें न होती तो यह विज्ञानमय - प्रात्मा निरन्तर १०० वर्ष तक शरीर में विद्यमान नहीं रह सकती । यद्यपि मनुष्य के शरीर में ही इस प्रकार ४० ग्रह देखे जाते हैं । किन्तु चेतन वस्तुनों में भी इन ४० ग्रहों में से न्यूनाधिक कितने ही ग्रह अवश्य पाये जाते हैं इसलिये ये ग्रह भी रात्र वस्तुनों के साधारण धर्म हैं । १० - ऋषि प्रत्येक वस्तु में जितने कार्य होते हैं, उनका कारण उस वस्तु में सन्निविष्ट देवता और असुर हैं ये देवता और असुर भी यद्यपि प्राण है, तथा ये यौगिक रूप होने से कार्य हैं । अर्थात् ये सब भिन्न - भिन्न प्राणों से मिलकर इनका मौलिक रूप नष्ट होकर नये रूप धारण करने से देव और असुर ये नाम पड़ते हैं । इनके मौलिक प्राणों को ' पितर ' कहते हैं, किन्तु ये पितर भी यौगिक प्राण हैं । इनके भी कोई मौलिक भिन्न - भिन्न प्राण हैं, जिनको ऋषि कहते इसीलिये भगवान् मनु कहते हैं ।
ऋषिभ्यः पितरो जाताः, पितृभ्यो देवदानवाः ।
देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरंस्थापवनु पूर्वशः ॥
ये ऋषिगण प्रयौगिक होने से ये सर्वदा असंपृक्त ( वेमिले हुये ) शुद्ध रूप में रहने वाले भिन्न-भिन्न प्राण है, जगत् के मूलरूप हैं । यद्यपि ये ऋषि अनन्त हैं तथापि उनमें से १० ऋषि विशेष उपयोगी माने जाते हैं । १ भृगु, २ ग्रङ्गिरा, ३ ग्रत्रि, ४ पुलस्त्य, ५ पुलह, ३ क्रतु, मरिचि, वशिष्ठ, ६ दक्ष, १० कौशिक ( विश्वामित्र ) इन्हीं १० ऋषि प्राणों से जगत् के संपूर्ण कार्य प्रातः उत्पन्न होते हैं । इसीलिये ये ऋषिगण भी प्रत्येक वस्तु के साधारण धर्म हैं । इस प्रकार ये १० पदार्थ प्राण, देवता, ऋतु, छन्द, दिक्, सोम, पृष्ठ, साम, ग्रह, ऋषि, सभी वस्तुत्रों में व्याप्त रहते हैं । अर्थात् इन्हीं १० धर्मों के समुदाय को वस्तु कहते हैं । जिस वाक् में १० अक्षर हो उसको बिराट् छन्द कहते हैं । जगत् के प्रत्येक पदार्थ वाक् से बने हुए वाक् रूप हैं, और उनके प्रत्येक रूप में उपरोक्त १० श्रवयव होते हैं । इसलिये उनको भी विराट् कहते हैं । जगत् की प्रत्येक वस्तु एक एक विराट् है । और उन सब की समष्टि रूप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी एक वस्तु है और उसमें भी ये ही १० धर्म व्याप्त हैं इसलिये वह भी एक विराट् है । [ ३२८ ]