ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 361–370

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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* ब्रह्मविज्ञान * ब्रह्मा जो स्वभाव से ही दो शरीर धारण करता है उसमें एक प्राण रखने वाला धातुपुरुष श्रीर दूसरी मूर्ति भूतधात्री स्त्री रूपा है । पुरुष स्वरूप सूर्य में या द्यौ में मुख्यतया रहकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त रहता है । इसी प्रकार स्त्री मृर्ति वह भूतधात्री मुख्यतया पृथ्वी में रहकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है । इसी प्रकार शरीर में भी पुरुष आत्मा नाभि से ऊपर और स्त्री ग्रात्मा नाभि से नीचे मुख्यतया रहकर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है । एक प्राण प्रधान है, दूसरा भूत प्रधान है । इन दोनों को पौराणिक - परिभाषा में पुरुष को स्वयम्भू मनु और स्त्री को शतरूपा कहते हैं । इन्हीं दोनों तात्विक स्त्री पुरुषों के योग से मैथुनी सृष्टी अर्थात् यौगिक सृष्टी प्रारम्भ होती है । इन दोनों के योग से जो द्वितीय पुरुष उत्पन्न हुग्रा उसे ही विराट् कहते हैं । विराट् का अर्थ १० श्रवयव वाला है । उन दशों अवयवों के वर्णन ऊपर चुके हैं । इस बिराट् पुरुष को भी मनु कहते । इस विराट् मनु का भी उसी भूतधात्री शतरूपा के संयोग से वैराजमनु उत्पन्न होता है । उस वैराज मनु से १० ऋषिगण उत्पन्न होते हैं जोकि प्रयोगिक ग्रंथांत् मौलिक रूप में प्राण है । इन्हीं ऋषियों के परस्पर संयोग से ३ पृथक् और ४ पृथक् वितर उत्पन्न होते हैं, उनमें ३ के नाम ये हैं- १ सोमसत, २ वर्हिषत, ३ अग्निष्वात्ता और ४ पितरों के के नाम ये हैं- १ ग्रविर्भुक्, २ आज्यपा, ३ सोमपा, ४ सुकाला— इन्हीं सात पितरों के परस्पर संयोग से देवता और असुर उत्पन्न होते हैं, और उन देवता असुरों के संयोग से जगत् । प्रत्येक के साथ भूतधात्री के सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं ये सब प्राण पुरुष रूप पुरुष के संयोग से पञ्च महाभूतों का संयोग होता रहता है, जिसके प्राणों का आधार यह शरीर बना करता है, यही सर्वत्र सृष्टि का क्रम है । ब्रह्मा = हिरण्यगर्भ स्वयम्भूः शतरूपा विराट् वैराजः शतरूपा १ मरीचीः, २ भृगु, ३ श्रङ्गिरा, ४ अत्रि:, ५ पुलस्त्य, ६ पुलहः, ७ ऋतुः ८ दक्ष, वसिष्ठः १० कौशिक २ अमूर्त - सोमसत, वर्हिषत् श्रग्निष्वात्ताः, मूर्तिमान्, हविभुंक्, ग्राज्यपाः, सोमपाः, तुकाला ( नारद ) ३ देवाः — असुराः ४ भूतग्राम विग्रहाः • ५ गन्धवः [ ३२६ ]

पृष्ठ 362

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* ब्रह्मविज्ञान इनमें ब्रह्मा से जो वैराज ग्रात्मा उत्पन्न हुआ उसे ही प्राज्ञ कहते हैं । इसमें १० ऋषि या अन्यान्य असंख्य ऋषियों का संग्रह रहता है । इसलिये जिन ऋषियों का उसमें समावेश हो गया है उनकी वृत्तियां प्राज्ञआत्मा में उत्पन्न होती है । किन्तु जिन ऋषियों का समावेश नहीं हुआ उनकी वृत्तियां भी न्यूनाधिक उत्पन्न होती है । ये वृत्तियां यद्यपि ऋषि के भेद से अनन्त हैं, तथापि निदर्शन ( वानगी ) के लिये १० ऋषियों की १० वृत्तियां इस प्रकार कही गई हैं-संभूति = उत्पादन शक्ति । ख्याति यश | १ मरीचि २ भृगु ३ ग्रङ्गिरा स्मृति । ४ ग्रत्रि ५ पुलस्त्य प्रीति । क्षमा । ६ पुलह ७ क्रतु पदक्ष ६ वसिष्ठ १० नारद ( कौशिक ) अनुसूया = गुणों को अवगुण करके कहना । सतति = उत्साह शक्ति । अनुरक्ति = तत्परता । ऊर्जा = काम कैसा ही कठिन हो उस से पीछे न हटना । कलह = पिशुनता, चुगली । ( बृहती ) = बोलने का मादा । प्राज्ञग्रात्मा की ७ ग्रवस्था इस प्राज्ञग्रात्मा की ७ अवस्था होती है । १ जाग्रत्, २ स्वप्न, ३ सुषुप्ति, ४ मोह, ५ मूर्द्धा, ६ मृत्यु, ७ मुक्ति । ये सातों अवस्था इस प्राज्ञआत्मा की उपाधि संयोग के वश होती है । यह प्राज्ञश्रात्मा इन्हीं सातों में से किसी न किसी अवस्था में रहता है । इनसे प्रतिरिक्त यह प्राज्ञश्रात्मा कभी नहीं रहता । इनका विचार इस प्रकार है-१ - जाग्रत् जाग्रत् ग्रवस्था, जबकि यह प्राज्ञश्रात्मा इन्द्रियों के द्वारा अथवा सूर्य, चन्द्र, ग्रग्नि, वाक् और ग्रात्मा इन पांच ज्योतियों के द्वारा बाहर से अन्न ग्रहण करता है और उसी से उसका स्वरूप बनता है तो उस अवस्था को जाग्रत् कहते हैं । यद्यपि यह प्राज्ञग्रात्मा विज्ञानमय क्षेत्रज्ञग्रात्मा से एक क्षण भी पृथक् नहीं रहता, तथापि जाग्रत् अवस्था में विज्ञान को साथ लिये हुए यह इन्द्रियों के द्वार पर विद्यमान रहता है और वहां पर पश्वज्योति के द्वारा प्राये हुए ग्रन्नों को लेकर उनके संस्कारों को विज्ञान में पहु-चाता रहता है । इस क्रिया की दशा को ही जाग्रत् अवस्था कहते है । २- स्वप्न विज्ञानमय क्षेत्रज्ञग्रात्मा प्राणी के ही हृदय में सन्निविष्ट रहता है । किन्तु उसका प्रकाश, प्रदीप प्रकाश के अनुसार सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहता है उसी विज्ञान के साथ यह प्रज्ञानप्रात्मा भी विज्ञान | ३३० ]

पृष्ठ 363

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ॐ ब्रह्मविज्ञान * कीलों के साथ हृदय में बद्ध रहकर अपनी रश्मियों को सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रखता है । प्रज्ञान की रश्मियाँ विशेषकर शोणित में और इन्द्रियों में व्याप्त रहती है । जब कि सूर्य अस्त होता है । तब सूर्य रस से उत्पन्न हुए विज्ञानग्रात्मा से भी अन्न ग्रहण की कमी के कारण दुर्वलता आकर कुछ थकान होती है, जिससे उसकी किरणों संकुचित होने लगती हैं । विज्ञान रश्मि के संकोच के कारण उस से बंधी हुई प्रज्ञातरश्मियां भी संकुचित होकर इन्द्रियों से और शोणित से हटकर बुझते हुए दीपक के अनुसार केवल हृदयमान में रह जाती है । उस समय विज्ञान और प्रज्ञान दोनों एक होकर विज्ञान का लय हो जाता है । किन्तु प्रज्ञान ने जाग्रत् अवस्था में बाहर से ग्रन्न ग्रहण करके जो कुछ संस्कार उत्पन्न किया था उस से अपना सम्बन्ध न छोड़कर विज्ञान में लीन होता है । उस समय चक्षु यादि इन्द्रियां भी इन्द्र नाम के मुख्य प्राण जो क्षेत्रज्ञग्रात्मा का स्वरूप है उसी के प्राणों से बने हुए होने के कारण इस समय विज्ञान की संकोच अवस्था में बाहर नष्ट हो जाते हैं । उस समय इस शरीर में कही भी प्रकाश न रहकर केवल हृदयमान में प्रकाश रहता है । उस प्रकाश में यह प्राज्ञश्रात्मा अपने उपार्जित संस्कारों में से वायु प्राणों के ग्राघात से जिन २ को ऊपर उठाकर प्रकाश के क्षेत्र में लाया करता है, वही स्वरूप विज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित होकर देखा करते हैं, उसी देखने को स्वप्नज्ञान कहते हैं । उस समय सब पांचों इन्द्रियों के प्रारण संकुचित होकर हृदय में विद्यमान रहते हैं । इसलिये प्रज्ञान के लाये हुये संस्कारों में से शब्दों का सुनना, रूपों को देखना, सूंघना, चखना, सोचना, विचारना आदि सभी इन्द्रियों का काम उसी हृदय स्थान में होते रहते हैं । इन्द्रियों के अनुसार जाग्रत् ग्रवस्था में जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतियों की अपेक्षा होती थी वे बाहर की ज्योति या व इन्द्रियों के द्वारवन्द होने से भीतर नहीं प्राते । किन्तु पांचवीं विज्ञानमय आत्मा की ज्योति जो भीतर ही रहती है वह इस समय इन्द्रियों की सहायक होती है, और उसी ज्योति में स्वप्न के सब पदार्थ दीखते रहते हैं । विज्ञानमय क्षेत्रज्ञग्रात्मा को ' स्व ' वहते हैं उसमें प्रज्ञान आत्मा का ' आप्यय ' अर्थात् लय होने को ‘ स्वाप्यय ' कहते हैं | इसी स्वाप्यय शब्द से स्वाप और स्वप्न शब्द की उत्पत्ति हुई है । तात्पर्य यह है यह प्राज्ञश्रात्मा जाग्रत् अवस्था की सारी मात्रात्रों को साथ लेकर ' स्व ' में अर्थात् विज्ञानप्रात्मा में ' प्रतीत ' अर्थात् लीन हो गया है । इसी अभिप्राय से ' स्वपिति ' अर्थात् सोता है ऐसा व्यवहार किया जाता है | स्वप्न दृष्टि में जो कुछ हम देखते हैं, वे सब वास्तव में कुछ भी नहीं हैं न रथ हैं, न गाड़ी हैं न घोड़े है, न सड़क है किन्तु केवल प्राज्ञात्मा ही उन सबका निर्माणकर्ता है वह अपने अंश को प्रवेश व रके और भूतमात्रात्रों को लेकर उन सब स्वप्न के पदार्थों को बनाता है यहां तक कि जिस तत्त्व से जिस प्रकार ग्रन्यान्य पदार्थों की सृष्टि करता है उसी प्रकार स्वयं अपने स्वरूप की भी सृष्टि करता है स्वप्न के सभी पदार्थ वैज्ञानिक भौतिक नहीं । इसी से आग में जलने पर जलने के कष्ट का अनुभव होता है, किन्तु शरीर जलता नहीं । यदि प्रज्ञान आत्मा देखें सुने संस्कारों में अपने आप को प्रवेश न करता तो वे सब पदार्थ विज्ञान के प्रकाश में ग्रा नहीं सकते । किन्तु प्रज्ञान विज्ञान से मिला हुआ है । इसलिये यह प्रज्ञान जिन जिन रूपों में बदलता रहता है वे सब रूप विज्ञान के प्रकाश में आते रहते हैं, यही स्वप्न दृष्टि का रहस्य है । [ ३३१ ]

पृष्ठ 364

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* ब्रह्मविज्ञान इस स्वप्न दृष्टि में जिन जिन पदार्थों की सृष्टि होती है उनका रचने वाला जीव है या ईश्वर । इस प्रश्न के विचार में रामानुजस्वामी का मत है कि स्वप्न अवस्था में जीव सर्वथा प्रयोग्य और समर्थ रहता है । उसकी इन्द्रियाँ और अन्यान्य शक्तियाँ भी कम हो जाती हैं, इसलिये यह स्वप्न सृष्टि केवल ईश्वर की ही हो सकती है । यदि यह सृष्टि जीव की होती तो कोई भी स्वप्न देखने वाला जीव शत्रु के हाथ से न मारा जाता या हाथी से न डरता । स्वप्न में बहुत से ग्रनिष्ट ऐसे भी दीखते हैं कि जिनका अनिष्ट परिणाम जाग्रत् में भी बना रहता है इस से स्पष्ट सिद्ध है कि जीव परवश है । ईश्वर की इच्छा से जैसी कुछ सृष्टि स्वप्न में उसके सामने ग्राती है, उसको उसे भोगना पड़ता है, इत्यादि । इस मत को यदि स्थूल दृष्टि से देखें तो इसमें बहुत कुछ सत्यता प्रतीत होती है । किन्तु सूक्ष्म विचार करने से यह जीव की ही सृष्टि प्रतीत होती है, क्योंकि इस स्वप्न सृष्टि में तीन दोष हैं । १ विशृ-ङ्खलता, २ प्रत्ययभेद, ३ बाध । हम देखते हैं कि स्वप्न में कभी कभी पानी में ज्वाला उठती है, बिना पक्ष का मनुष्य आकाश में उड़ता है, और पुत्र कभी पिता का अभिमान करने लगता है इत्यादि बातें बेजोड़ तोड़ की कभी हो जाती हैं कोई भी बात शृङ्खलावद्ध अर्थात् सिलसिलेवार बहुत समय तक स्वप्न में नहीं दीखती इसलिये स्वप्न-सृष्टि में विशृङ्खलता है । दूसरा प्रत्ययभेद है | जब कभी घोड़े पर चढ़ता है तो थोड़े ही समय पश्चात् वह घोड़ा हाथी प्रतीत होने लगता है । इसी प्रकार एक वस्तु क्षण क्षण में भिन्न - भिन्न प्रकार की प्रतीत होती रहती है । तीसरा दोष बाध ( अस्तिको नास्ति कहना ) ग्रर्थात् जानने पर वे सब स्वप्न के पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और वे ये ही नहीं ऐसा दृढ़ विश्वास होने लगता है, यही उन सब पदार्थों का बाथ है ये तीनों ही दोप ईश्वरी सृष्टि के नियम के विरुद्ध हैं । परमेश्वर का कोई भी काम ऐसा नहीं हो सकता कि जिसमें विशृङ्खलता हो सब कार्य नियमानुसार ही होते हैं । जिस पर्वत को ग्राज हम जहां देखते हैं सैंकड़ों वर्ष पीछे भी वह वहीं दीखता है । तात्पर्य यह है कि परमेश्वर की सृष्टि व्यवस्थानुकूल नियमबद्ध चिरस्थायी होती है । किन्तु स्वप्नसृष्टि ऐसी नहीं हैं । इससे सिद्ध है कि यह स्वप्नसृष्टि अप शक्ति, अल्पज्ञ, असम्पन्न इस जीव की ही निर्मित है न कि ईश्वर की । जो यह कहा जाता है कि यदि जीव ही सृष्टि करता है तो दुःखमय यदि अपनी श्रनिष्ट - सामग्री वह क्यों बनाता है, तो इसके उत्तर में हम कहेंगे कि जाग्रत अवस्था में बहुत से कामों में जीव स्वतन्त्र है | इच्छा से भोजन करता है, इच्छा से बिहार करता है, भिन्न - भिन्न सामाजिक व्यवहार करता है, किन्तु उन सब से सभी दशा में इष्ट ही चाहता है, अनिष्टपाने की न उसकी वासना है न प्रयत्न है | तथापि उसके मिथ्या आहार विहार के कारण ही वह बहुधा दुःख, भय पाया करता है । यह क्यों? इच्छाधीन भोजन होने पर भी जिस प्रकार भोजन दोष से रोग ग्रादि नाना श्रनिष्ट पाता रहता है । उसी प्रकार स्वप्न में भी स्वतन्त्र होने पर भी अज्ञानता के कारण ऐसी सामग्रियां वह अपने श्राप बना लेता है जिससे पश्चात् उसको भय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि चाहे जाग्रत् हो या स्वप्न ग्रवस्था हो [ ३३२ ]

पृष्ठ 365

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* ब्रह्मविज्ञान * इस जीव के साथ एक अविद्या अवश्य लगी रहती है जिस प्रकार विद्या से ईश्वर की सृष्टि है, उसी प्रकार अविद्या से जीव की सृष्टि है । इसलिये विना श्रविद्या के जीव का स्वरूप कदापि नहीं रह सकता । अ-विद्या के नाश होने पर जीव, जीवनने से निर्मुक्त होकर ईश्वर हो जाता है । इसलिये जीव की सहकारी यह विद्या कितना ही प्रज्ञा दोप इस जीव से कराया करती है जिसके कारण यह जीव स्वयं अपने अनिष्ट के लिये सामग्री बनाया करता है । इसी कारण स्वप्न में भी उस प्राज्ञप्रात्मा के साथ जो कर्मवश कितने ही संस्कार पहले से जाकर सञ्चित रहते हैं उनके इष्ट या अनिष्ट होने के कारण शुभ या अशुभ अवस्था इस प्राज्ञ जीव की स्वप्नकाल में परवश हुआ करती है इसमें प्राज्ञ जीव स्वयं दोषी है । अथवा उसके संस्कार के कारण से है, किन्तु यह कहना बड़ी भूल है कि ये शुभ अशुभ स्वप्न की सृष्टि प्राज्ञ जीव के सामने ईश्वर उपस्थित करता है क्योंकि इसमें ईश्वर को दोषी करना पड़ता है । ईश्वर दयालु है, वह किसी जीव को भयङ्कर स्वप्न दिखाकर भय देवें या कोई अनिष्ट करे, यह सम्भव नहीं है । इस से सिद्ध है कि यह स्वप्न सृष्टि प्राज्ञ जीव की अपनी अपनी ही अविद्या से निर्मित है, ईश्वर निर्मित नहीं इसलिये वेद में भी कहा है कि-स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो, रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्रीभिः सह मोदमानो, जक्षदुते वापि भयानि पश्यन् ॥ ( बृहदारण्यक उपनिषद् ) प्रश्न यह है कि स्वप्नसृष्टि में जो प्राणी दीखते हैं उनमें इन्द्रियां हैं या नहीं क्योंकि इन्द्रियों का सम्बन्ध ५ देवताओंों से है, अर्थात् १ - ग्रग्नि २ - वायु, ३ - सूर्य, ४ - चन्द्र और ५ - दिक् | ये ही पांचों क्रम से वाक् प्राण, चक्षु, मन औौर श्रोत्र बनकर शरीर में स्थित हैं । इन देवताओं का इस स्थूल शरीर के साथ जैसा संबन्ध सम्भव है वैसा सम्बन्ध उन प्राणियों के शरीर से उत्पन्न नहीं है क्योंकि वे शरीर कल्पित हैं । उनका किसी द्वारा से सम्भव भी बाहर के देवताओं से लगाव सम्भव नहीं ठहरता । इसलिये कह सकते हैं कि उनमें इन्द्रियां नहीं हैं । किन्तु हम देखते हैं कि वे सब प्राणी भी हँसते, रोते, कहने, सुनते, खाते, पीते हैं, बिना इन्द्रियां ये सब नहीं हो सकते और मेरे अनुसार उनकी इन्द्रियां सब ज्यों की त्यों दीखती भी हैं, इसलिये कह सकते हैं कि उनमें भी सब इन्द्रियां हैं । ऐसी स्थिति में निश्चय नहीं होता कि वे सब अनिन्द्रिय हैं या इन्द्रिययुक्त हैं । उत्तर में कहा जाता है कि वास्तव में जाग्रत् पुरुषों के अनुसार उनमें स्पष्ट इन्द्रियां नहीं है । किन्तु जिस प्रकार वैज्ञानिक उनके शरीर हैं वे भौतिक नहीं हैं उसी प्रकार उनकी इन्द्रियां भी जाग्रत् जीवों के अनुसार दैविक न होकर वैज्ञानिक हैं उन्हीं से उनके इन्द्रिय जन्य सब व्यवहार उत्पन्न हो गये हैं । इसमें एक प्रश्न यह भी है कि यह स्वप्न जगत् सत्य हैं या मिथ्या, इसमें बहुत विद्वानों का विचार है कि स्वप्नसृष्टि केवल ग्राभास मात्र है अर्थात् केवल मेरी बुद्धि का दोष है परमार्थ में कोई वस्तु नहीं है । इसके कारण ४ हैं - देशाधिकत्व, बहुभिन्नकालत्व, अनिन्द्रियत्व, प्रतिबाध । अर्थात् स्वप्नसृष्टि में जितने मनुष्य या अन्यान्य जीव जितने बड़े क्षेत्र में फैले हुए दीखते हैं, जिन सड़कों से कोसों जाते हैं उतने क्षेत्र या उतने लम्बे मार्ग इस हृदय के दहराकाश में कदापि रह नहीं सकते । इसलिये देशाधिकत्व में स्वप्न को मिथ्या कहते हैं । [ ३३३ ]

पृष्ठ 366

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ॐ ब्रह्मविज्ञान छै दूसरा कितने ही वृद्ध मनुष्य अपने को या दूससे वृद्धको अवस्था में देखलेते हैं जो कि असम्भव है । घोर ग्रन्थकार की अकस्मात् स्वप्न में तरुण या बालक की रात्रि में कदाचित् स्वप्न देखता हुआ मध्याह्न दिन का अनुभव करता है, जोकि उस समय नहीं है ऐसे निकालत्व में भी स्वप्न मिथ्या ठहरता है । ३ - इसी प्रकार स्वप्नावस्था में सोनेवाले की सब इन्द्रियां शिथिल और मुद्रित ( बन्द ) हो जाती हैं | वे अपना काम नहीं करती तथापि अनिन्द्रियत्व बिना इन्द्रिय के सब काम देखना सुनना इत्यादि होते रहते हैं इसलिये स्वप्न मिथ्या है । कितने ही पदार्थ स्वप्न में दीखकर पुनः स्वप्नकाल में ही दीखते हैं । अर्थात् दीखता हुया हाथी कहीं देशान्तर में न जाकर दीखते दीखते ही नहीं दीखता है यह उसका प्रतिवाब है । और स्वप्न के उत्तर जागृति होने पर एक साथ सम्पूर्ण स्वप्न सृष्टि का सर्वथा अभाव हो जाता है यह दूसरा प्रतिबाध हैं । वैज्ञानिकों का सिद्धान्त है—

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।

उभयोरपि दृष्टान्तस्त्वनयोस्वदर्शिभिः ॥

अर्थात् सत् कभी असत् नहीं होता और ग्रसत् कभी सत् नहीं होता इस नियम के अनुसार यदि स्वप्न के पदार्थ सत् होते तो जागृतिकाल में भी वे कदापि असत् नहीं हो सकते । जब कि हम उनको जागृति में असत् देखते हैं तो उसी से यह निश्चित है कि स्वप्नकाल में भी वे असत् थे और मिथ्या थे । दूसरा मत इसके विपरीत है । कुछ विद्वानों का ऐसा भी विचार है, कि स्वप्न सृष्टि भूल भूवैय्यां नहीं, मिथ्या नहीं, वह जैसा दीखता है वैसा ही पारमार्थिक सत्य है । जब वह सृष्टि दीखती है । तो उसको असत् कहना ही भूल है, क्योंकि मिथ्या किसको कहते हैं इसी का विचार करना प्रथम ग्रावश्यक है । यदि यह कहें कि वस्तु दो प्रकार की हैं- सत्ता सिद्ध और भातिसिद्ध हो । वह भाति सिद्ध हो या न हो तो भी सत्य कहा जाता है, किन्तु जो सत्तासिद्ध न होकर केवल भातिसिद्ध हैं वही मिथ्या है | यदि कोई मिथ्या का यही लक्षण मानता हो तो हम कहेंगे कि यह भूल है क्योंकि संख्या, परत्व ( दूरी ) ग्रपरत्व अपरत्व ( नजदीकी ) ऊँचा, नीचा इत्यादि कितने ही भाव केवल भातिसिद्ध होने पर भी मिथ्या नहीं माने जाते । इसलिये मिथ्या का लक्षण यदि वादी के कथनानुसार वे ही चार बातें मानी जावे जिनका निर्देश ऊपर हो चुका है तो वे भी मेरे विचार से मिथ्या के लक्षण नहीं हो सकते । ये चारों ये हैं-देशाधिकत्व, बहुकालभिन्नत्व, ग्रनिन्द्रियत्व और प्रतिबाध, इन चारों में देशाधिकत्व मिथ्या का लक्षण नहीं हो सकता क्योंकि जागृत अवस्था में भी ग्रत्यन्त सूक्ष्म कनीनिका प्रदेश या कृष्णतारा ग्रर्थात् नेत्र के ग्रग्र बिन्दु पर मनुष्य हाथी पर्वत और नगर, मैदान यादि अधिक प्रदेश वाले पदार्थ बिना संकोच के शुद्ध अवस्था से प्रवेश करते हुए भासते हैं । यह एक प्रकृति कि माया संभव है कि इसी प्रकार हमारे हृदय के सूक्ष्मातिसूक्ष्म दहराकाश में भी अधिक प्रदेश वाले पर्वत नगर यादि पदार्थ सकोच से सुव्यवस्था से संनिविष्ट होते हों यह विचार अधिक वैज्ञानिक नहीं है कि हमारे समझ में न आने के कारण हम किसी [ ३३४ ]

पृष्ठ 367

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ब्रह्मविज्ञान ऋ वस्तु को मिथ्या कह दे । इसलिये देशा कित्व होने पर भी दृष्टि के अनुसार हृदयक्षेत्र की स्वप्नसृष्टि भी सभव है इसलिये मिथ्या नहीं हो सकती । इसी प्रकार बहुकालभिन्नत्व ' भी मिथ्या का लक्षण नहीं है । इसके लिये हम एक आख्यायिका कहेंगे । एक समय नारद ने मगवान् से कहा कि मुझको आप अपनी माया दिखलाइये । भगवान् ने कहा कि तुम मेरे भक्त हो हम हमारे भक्तों को माया में फँसाना नहीं चाहते । नारद ने अभिमान से कहा कि आपकी माया कैसी भी हो मेरे ऊपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता । भगवान् ने कहा कि ऐसा ही होना चाहिये | कुछ ग्रागोद - प्रमोद के पश्चात् नारद जी अपनी कुटी से कई शिष्य वर्गों के साथ गंगा स्नान करने को गये । तटपर वस्त्रों को रखकर शिष्यों को तटपर खड़ाकर के आपने गंगा में उतर कर डुबकी लगाई | फिर बाहर सिर निकालते ही १६ वर्ष की स्त्री प्रतीत हुए और देखा कि उस देश का राजा अपने परिकर वर्गों के साथ गंगा स्नान के लिये तट पर उपस्थित है । राजाने कन्या को देखते ही श्रादमी भेज के वस्त्र पहराकर अपने महलों में दाखिल कराया उस से ५ पुत्र और कन्यायें उत्तपन्न हुई । ठीक ४० बर्ष खुब आनन्द से राज्य भवन का सुख किया पश्चात् समय के फेर से स्वामी पुत्र और कन्यायें यदि अचानक किसी मक्रामक रोग से रोगी होकर एक साथ मरगये जिस से अत्यन्त दुःखिनी होकर अनेक परिचारिका स्त्रियों के साथ रोती हुई वह रानी शुद्धिस्नान के लिये उसी गङ्गा तटपर पहुँची जहां राजाने उसे ग्रहण किया था । गङ्गा में डुबकी लगाकर सिर ऊँचा करते ही पूर्ववत वहीं नारदजी हो गये और वस्त्र लिये उसी प्रकार शिष्य लोग खड़े थे । अत्यन्त आश्चर्य का विषय है कि ठीक - ठीक समय भी वही था जिस समय नारदजी ने पहले डुबकी लगाई थी । नारदजी को अत्यन्त विस्मय हुआ, भगवान् की माया का प्रभाव समझकर अत्यन्त लज्जित होकर चुपचाप कुटी चले गये और भगवान् के ध्यान में लवलीन होकर क्षमा मांगी । तात्पर्य यह है कि एक ही क्षण में ४० वर्ष से भी अधिक समय अन्तर्हित हो गया वह कोई स्वप्न न था । नारदजी जाग्रत् श्रवस्था में थे जिस प्रकार माया से उस एक क्षण में इतना अधिक काल सम-तुलित हो गया उसी प्रकार स्वप्न में भी बहुभिन्नकाल होना सम्भव है कदाचित कोई कहे कि वह माया थी, मायामिथ्या होती है, इसलिये स्वप्न के अनुसार वह ४० वर्ष भी मिथ्या है तो इस पर हम कहेंगे कि माया जब काम कर रही है और उस काम का माया का साथ कार्य कारण भाव का निरूपण कहते हैं तो उसको मिथ्या कहना साहस मात्र है । असम्भव समझकर ही मिथ्या नहीं कह सकते क्योंकि यही विशेष-कर माया लक्षण है कि असम्भव को सम्भव कर दिखादे । जब उसकी यही शक्ति या प्रभाव है और ऐसा ही अपना काम कर रही है तो उसे हम सर्वदा मिथ्या नहीं कह सकते इसी से पुराने प्राचार्यों ने माया के विषय में यह कहा है कि-न सतीसा, ना सतीसा, नोभयात्मा, एतद्विलक्षणा, काचिद्वस्तु भूतास्ति, विरोधतः । सर्वदा || इसी प्रकार ग्रइन्द्रियत्व भी मिथ्या लक्षण नहीं है । क्योंकि जाग्रत् अवस्था के अनुसार स्वप्न सृष्टि के प्राणी भी प्रत्येक इन्द्रियों से काम करते हुए पाये जाते हैं तो ऐसी दशा में उनको प्रनिन्द्रिय कहना ही [ ३३५ ]

पृष्ठ 368

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* ब्रह्मविज्ञान क अनुचित है । यदि उनका शरीर भौतिक है तो उनमें इन्द्रियां भी दैविक ही होनी चाहिये । यदि उनका शरीर वैज्ञानिक माना जावे तो उनकी इन्द्रियां भी वैज्ञानिक होगी, दोनों प्रकार से उनमें इन्द्रियां सिद्ध होती है । यदि उनके प्रत्यक्ष होने से वे सत्य माने जा सकते हैं, तो उनकी इन्द्रियां भी सत्य हो सकती हैं । तो ऐसी दशा में उन प्राणियों को अनिन्द्रिय कहकर अथवा स्वप्न देखनेवाले को अनिन्द्रिय कहकर स्वप्न-सृष्टि को मिथ्या कहना ही मिथ्या है और जो उनको प्रतिबाध ( न होना ) के कारण मिथ्या माना जाता है, तो वह भी मिथ्या है । प्रत्येक जायमान वस्तु में तीन अवस्था होती है उत्पत्ति स्थिति, और नाश । उत्पत्ति के पहले या नाश के पश्चात् उस वस्तु का प्रभाव है केवल मध्य दशा में उसकी स्थिति को देख-कर हम उसको सत्य कहते हैं । तो उसी प्रकार स्वप्न सृष्टि के प्राणी भी स्वप्न से पूर्व ग्रथवा स्वप्न के पश्चात् न होने पर भी केवल स्वप्न काल में उसकी स्थिति को देख कर उसे हम सत्य कह सकते हैं । जिसकी उत्पत्ति होती है उसका उत्तर काल में अवश्य ही नाश होता है वह नाश ही उसकी सत्ता का प्रतिवाध है । ऐसे प्रतिबाध के रहने पर भी कोई भी जगत् की वस्तु मिथ्या नहीं मानी जाती तो स्वप्न सृष्टि ही जागृति होने पर प्रतिवाद के कारण मिथ्या कैसे मानी जाती है । वास्तव में यदि विचार कर देखा जाय तो यह जागृत् ग्रवस्था की वाह्य सृष्टि जिस प्रकार सूर्य की ज्योति में भासती है, उसी प्रकार स्वप्न की अन्तर सृष्टि भी मनोमय चन्द्रमा की ज्योति में भासती है । यह एक जो किसी का मत है वही सत्य प्रतीत होता है । सर्वथा यह स्वप्न सृष्टि मिथ्या न होकर भातिसिद्ध और सत्तासिद्ध दोनों हैं, ग्रोर इसलिये स्वप्न सृष्टि पारमार्थिक सत्य है । ग्रव एक प्रश्न यह भी होता है कि यह स्वप्न सृष्टि शरीर के भीतर है या शरीर के बाहर । यद्यपि यह कहा जा चुका है कि शरीर के भीतर हृदय के सूक्ष्म दहराकाश में यह स्वप्न सृष्टि होती है, तथापि इसमें संदेह है कि जब स्वप्न में दीखते हुए पदार्थों के प्रदेश बहुत विस्तीर्ण दीखते हैं तो उनको सूक्ष्म हृदय प्रदेश न मानकर शरीर के बाहर ही क्यों न माना जाय । इस पर बहुतों का विचार है कि यदि यह स्वप्न शरीर के बाहर माना जाय तो इस स्वप्न को देखने वाली मेरी आत्मा को भी ग्रवश्यमेव बाहर जाना पड़ेगा । किन्तु यह निश्चित है कि यदि आत्मा शरीर को छोड़कर क्षणभर भी वाहर चला जाय तो यह शरीर तत् क्षरण अपवित्र होकर मृतक अनुसार सड़ने लगेगा और दुर्गन्धयुक्त होगा किन्तु ऐसा नहीं होता इससे सिद्ध है कि हमारी ग्रात्मा स्वप्न अवस्था में भी शरीर के भीतर ही रहता है, और उसके कारण यह शरीर भी पवित्र रहता है । जिस प्रकार सीप में मिथ्या चांदी भ्रम से प्रतीत होती है, उसी प्रकार इस प्रज्ञात्मा में मिथ्या ही स्वप्न जगत् भ्रम से प्रतीत होता है । यही याज्ञवल्क्य यादि बड़े - बड़े महर्षियों का सिद्धान्त है । किन्तु कितने ही पुराने विद्वानों का यह भी विचार है कि यह स्वप्नसृष्टि शरीर के भीतर न होकर शरीर के बाहर ही होती है । यह ग्रात्मा के बाहर जाने पर जो शरीर की अपवित्रता का प्रश्न उठाया जाता में यह ग्रसङ्गत है ( गलत है ) कारण कि इस शरीर के भीतर भूतात्मा दो प्रकार का है— १- प्राज्ञआत्मा, २ - हंसात्मा । इनमें प्राज्ञग्रात्मा ऊपर चन्द्रमा से प्राये हुये देवलोक, पितृलोक, स्वर्ग, नर्क आदि नाना लोकों में भ्रमण करने वाला और चन्द्रमा पर महान् ग्रात्मा से सम्मिलित होता हुआ पृथ्वीपर [ ३३६ ]

पृष्ठ 369

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 369 का मूल पृष्ठ
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** ब्रह्मविज्ञान * स्त्री के पुरुष शुक्र, शोणित के बने हुए डिम्भ ( लोथड़ा ) में प्रवेश करके जन्म लेता है । इसलिये यह प्राज्ञआत्मा लोकान्तर चारी इस शरीर में ग्रागन्तुक है । किन्तु इस प्राज्ञश्रात्मा के आने के पश्चात् सूर्यरस, वायुरस और विद्य ुत इन तीनों के संयोग से इस भौतिक शरीर के सम्पूर्गा भुतानुशयों को ग्रहण करके उन्हीं अनुशयों से अपना शरीर बनाकर एक नवीन ग्रात्मा उत्पन्न होता है जिसे हंस आत्मा कहते हैं । यह हंस इस शरीर के रस से बनने के कारण इस शरीर का अभिमानि होफर भी इस शरीर को छोड़कर बाहर हजारों कोस चला जाता हैं और भिन्न - भिन्न स्थानों में रमता रहता है । किन्तु जिस प्रकार एक बड़े लम्बे सूत्र के एक छोर को हाथ से पकड़कर दूसरे छोर में बंधी हुई चिड़िया को आकाश में उड़ा दिया जाय वह पक्षी प्रकाश में इधर - उधर भ्रमता हुआ भी उस हाथ के सून की पकड़ से पकड़े हुए के कारण पुनः हाथ पर आता रहता है । इसी प्रकार यह हंस ग्रात्मा भी शरीर से बाहर दूर - दूर तक भ्रमता हुआ भी प्रतिक्षण इस शरीर का अनुसन्धान रखता है न कभी इस शरीर को भुलता है और न जीवन पर्यन्त इस शरीर से अलग होता है । इसी के सम्बन्ध में किसी ऋषि ने कहा है-स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्या सुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । शुक्रमादाम पुनरेतिस्थानं, हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १ ॥

प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं, बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा ।

सईयतेऽमृतो यत्र कामं, हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ २ ॥

( बृ. उ. अ. ४ श्लो. ११।१२ ) १ - प्रर्थात् इस शरीर का एक हंस पुरुष जो वास्तव में हिरण्मय है वह स्वप्न की दशा में शरीर श्रर्थात् शरीर में ही रखने वाला प्राज्ञाग्रात्मा से सम्बन्ध तोड़कर उस से अलग हटकर सर्वदा प्रसुप्त जागता हुआ, सोते हुए ग्रर्थात् विज्ञानआत्मा में लवलीन होते हुए प्राज्ञश्रात्मा और पञ्चदेवता इन सब की चौकसी करता है | बाहर से जो कुछ शुक्र ग्रर्थात् बल या रस उसको मिलता है उसको लेकर जागृत् अवस्था में फिर अपने स्थान पर अर्थात् शरीर के भीतर प्राज्ञश्रात्मा में चला आता है । २ - यह् हिरण्यमय हंस पुरुष इस ग्रवर कुलाय की अर्थात् हीन दशा में आये हुए ( बिस्तर पर पड़े हुए ) शरीर की प्राण से रक्षा करता हुग्रा स्वयं अमृतरूप अर्थात् निद्रारूपी मृत्यु दोष को न पाता हुग्रा कुलाय अर्थात् ग्रपने शरीर रूपी घोसले से बाहर इधर उधर विचरता हुआ, वह जहां चाहता है वहां जाता है | तात्पर्य यह है कि यह प्राज्ञग्रात्मा शरीर के भीतर ही रहने वाला है किन्तु यह हंस आत्मा इस शरीर को पकड़े हुए शरीर से बाहर दूर दूर भ्रमण करता है । वहां जो कुछ देखता सुनता है उनका रस लेकर फिर अपने स्थान शरीर के प्राज्ञश्रात्मा में चला आता है इसी को स्वप्न कहते हैं । किन्तु सुषुप्ति दशा में दूर देशान्तर में न जाकर भी इस शरीर के बाहर रहकर इस सोते हुए प्राज्ञश्रात्मा की और उसके इस शरीर की चौकसी करता रहता है । [ ३३७ ]

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* ब्रह्मविज्ञान आत्मा तीन प्रकार का है - महजात्मा, मानुषात्मा और देवात्मा । इनमें सहजात्मा तीन प्रकार की है । चिदात्मा, सूत्रात्मा, विज्ञानगय क्षेत्रज्ञग्रात्मा । ये तीनों प्रत्येक शरीर में और प्रत्येक ग्रवस्था में सहज स्वभाव से प्राप्त हो जाते हैं इसीलिये इनको सहजात्मा कहते हैं । अव्यभिचरितरूप से शरीर में रहने पर भी ये तीनों शरीर के अभिमानी नहीं हैं । शरीर का कोई भी संस्कार इनमें संक्रात नहीं होता इसीलिये गीता में कहा है-कुर्वन्नेवेह कर्माणि न करोति न लिप्यते ॥ 1 अर्थात् शरीर में सब काम करता हुआ भी कुछ नहीं करता और न क्रियाजन्य संस्कारों से लिप्त होता है । इन से अतिरिक्त जो दूसरा मानुपग्रात्मा है वह दो प्रकार का है - महान्यात्मा और भूतात्मा इन दोनों में भूतात्मा फिर तीन प्रकार का है- वैश्वानरात्मा, तेजस ग्रात्मा और प्राज्ञात्मा | ये तीनों प्रत्येक प्रत्येक भी भूतात्मा है और तीनों मिलकर के भी भूतात्मा हैं । ये तीनों भूतात्मा भी महान्यात्मा के साथ संमिलित ही होकर रहती हैं । यही सम्मिलित ग्रात्मा शरीर में प्रवेश करने से जन्म होता है और इनके निकलने से मृत्यु होती है, यही नाना लोकों में जाता है, कर्म का भोग करता है, इसी आत्मा को मनुष्य कहते हैं, इसलिये इसे मानुषात्मा कहते हैं । यही ग्रात्मा मुख्य है । इसी ग्रात्मा के लिये शास्त्र के सब विधि निषेध है । ये दो ग्रात्मा - प्राज्ञ और महान् तथा ऊपर के तीन- चिदात्मा, सूत्रात्मा, क्षेत्रज्ञश्रात्मा यही पांचों आत्मा मुख्य हैं और प्रत्येक जीव में पाये जाते हैं । इन पांचों के अतिरिक्त दो ग्रात्मा कृत्रिम हैं-इन दोनों को दैव कहते हैं । इनमें देव दो प्रकार का है याज्ञिक और हंस- इनमें याज्ञिक को सुपर्ण भो कहते हैं, और हंस को गन्धर्व आत्मा भी कहते हैं । इनमें यज्ञ ग्रात्मा यज्ञ करने से उत्पन्न किया जाता है, वह श्रात्मा मानुष ग्रात्मा पर ही उत्पन्न होता है, और उसी पर अधिकार रखता है । जिस प्रकार घोड़े का सवार अपनी इच्छा को घोड़े की इच्छा से मिलाकर चलने से जिधर जैसा सवार चाहता है । उबर वैसे ही घोड़ा जाता है । उसी प्रकार मानुष ग्रात्मा पर याज्ञिक ग्रात्मा सवार होकर एक जीव हो जाता है । और यज्ञ ग्रात्मा स्वभाव से सूर्य के प्रोर जाता हुया बलात्कार से प्राज्ञग्रात्मा को साथ ले जाता है । जिस से प्राज्ञ आत्मा अन्यान्य लोकों में न जाकर सूर्य के सप्तलोकों में से ' सातवें नाकलोक में ही जाता है । उसी प्रकार इस मानुषआत्मा में से वायु के द्वारा यह वायव्य ग्रात्मा उत्पन्न होता है, जिस को हंस या गन्धर्व आत्मा कहते हैं । जिस प्रकार विज्ञान ग्रात्मा पर मानुष आत्मा अर्थात् महान् सहित प्रज्ञानग्रात्मा मिला हुआ रहता है, उस प्रकार उस प्रज्ञान आत्मा के ऊपर यह हंस ग्रात्मा भी सवार रहता है । प्रज्ञानग्रात्मा में प्रधानतया चन्द्रमा और पृथ्वी का रस है । उसी प्रकार इस हंस श्रात्मा में मध्यलोक अर्थात् ग्रन्तरिक्ष से श्राया हुआ व्यानवायु का रस है । इन तीनों रसों से मिले हुये होने के कारण सम्पूर्ण शरीर के भूतों में मन का संचार और वायु का संचार मिला हुआ होता रहता है । जिस समय हंस ग्रात्मा शरीर से बाहर निकलता है, तो उस समय पृथ्वी रस और सोम रस से वायु रस के विच्छेद होने के कारण हमारे शरीर में ग्रङ्गों का प्रनुसंधान नहीं रहता । किन्तु इसी कारण शिरोभाग में रक्त की गति शिथिल हो जाती है । [ ३३८ ]