ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 371–380

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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ब्रह्मविज्ञान और संज्ञा व स्नायु में मूर्च्छना होने से इन्द्रियों में ज्ञान का सम्बन्ध नहीं होता इसी को निद्रा कहते है । इन्द्रियों के अवरोध ( स्कान ) से आत्मा के सहायक बाहर वाले ४ ज्योति प्राज्ञश्रात्मा से सम्बन्ध नहीं रख्नते, इसी से निद्रा अवस्था में ज्ञान नहीं होता । किन्तु यह हंसात्मा जो प्राज्ञ से मिला हुआ था प्राज्ञ का अनुशय लेकर बाहर याता हुआ जाग्रत् के अनुसार ज्ञान रखता है । वह वायव्य जीव वायुमय होने पर भी भूतानुशय से भौतिक शरीर बनाता है, और प्राज्ञ के अनुशय से ज्ञान रखता है । इस हंम के बाहर जाने पर भीतर वाला प्राज्ञ अन्वकार में भौतिक प्रकाश न होने के कारण भौतिक पदार्थ नहीं देखता । इसीलिये हृदयग्राकाश में विज्ञानमय आत्मा के प्रकाश में रहकर भी आनन्द का ज्ञान रखता हुआ भी बाह्यज्ञान कुछ नहीं रखता, इस कारण उसकी अज्ञानता नहीं है, किन्तु जानने के विषय के अभाव के कारण से है । जिस प्रकार संमुख घट न होने से घट का प्रत्यक्षज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार निद्रा के समय भौतिक ज्योतियों के न होने के कारण भौतिक ज्ञान नहीं होता । तात्पर्य यह है कि जो कुछ हम स्वप्न देखते हैं वह उस समय हंस आत्मा देखता है । और जिन वस्तुनों को वह देखता है वे गन्धत्रं जगत् के सच्चे पदार्थ हैं । जो जगत् पृथ्वी से ऊपर चन्द्रमा से नीचे इस ग्रन्तरिक्ष में वायव्य जीवों से बना है उन प्राणियों की भी जन्म मृत्यु होती है । किन्तु उनका शरीर अपञ्चीकृत से बना हुआ है, इसलिए सूर्य के प्रकाश में वे बहुधा नहीं देखे जाते । किन्तु अष्टसिद्धि नवतुष्टि इस प्रकार १७ शक्तियां अधिक होने के कारण वे कभी मनुष्य शरीर धारण करके सूर्य के प्रकाश में भी दीख प्राते हैं अथवा बहुधा दुर्बल प्राणियों के शरीर में प्रवेश करके जाग्रत अवस्था में भी जीवों के साथ व्यवहार करते हैं किन्तु यह व्यवहार उनका विजातीय जगत् होने के कारण विषम होता है । किन्तु स्वप्न में हंस आत्मा का गन्धर्व होने के कारण उसके साथ उन गन्धर्व जीवों का व्यवहार सजातीय होने के कारण अनुकुल पड़ता है | जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में ये जाग्रत् के सब पदार्थ भासते है, उसी प्रकार स्वप्न जगत् के सब पदार्थ सूर्य के प्रकाश को स्पर्श न करते हुए चन्द्रमा के प्रकाश में ही भासते हैं । पहले के मरे हुए सभी जीवों के हंसग्रात्मा पितृलोक या देवलोक या अन्य किसी स्वर्ग नरक में कहीं न जाकर केवल पृथ्वी चन्द्रमा के बीच ग्रन्तरिक्ष में वायु धारा तक पर विचरते हुए गन्धर्व जीवों का जगत् बनाते हैं उनका शरीर बायव्य होने के कारण परिवर्तनशील होता है । अर्थात् मोटा, पतला, छोटा, बड़ा, मनुष्य, पशु, पक्षी श्रादि स्वरूपों में अपने स्वरूप को बड़ी शीघ्रता से बदल सकते हैं और वायु के कारण ही दूसरे के शरीर में भी प्रवेश कर सकता है वहुरुपिये के समान गन्धर्व के प्रावेश में प्राणी का स्वभाव स्वरूप आदि बदल जाते हैं । उसमें प्रथम स्वभाव का आवरण हो जाता है । उस प्राणी की प्रत्येक इन्द्रिय उस शरीर के प्रथम हंस को छोड़कर इस ग्रागन्तुक गन्धर्व की प्राज्ञाकारी हो जाती है । किन्तु स्वप्न में पृथक् रहकर ये गन्धर्व बातचीत करते हैं । इन गन्धर्व जीवों में भी कितने सज्जन महानुभाव या कितने दुर्जन धूर्त होते हैं । जाग्रत् के आवेशकाल में अथवा स्वप्नकाल में कितने ही सज्जन गन्धर्वो की कही हुई सब बाते ज्यों की त्यों सत्य होती हैं । किन्तु दोनों ही समय में धूर्तों की कही हुई मिथ्या होती हैं । इन गन्धर्वो के कुल १८ भेद चरक, सुश्रुत प्रादि वैद्यक आचार्यो ने लिखा है उनमें सज्जन भूलों का या दुष्ट भूतों का लक्षण भी पृथक् पृथक् दिखलाया है और सब बातें गन्धर्व जीत्रों में [ ३३६ ]

पृष्ठ 372

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* ब्रह्मविज्ञान जाग्रत् के ग्रनुसार ही होती है । किन्तु १७ इन्द्रियां अधिक होने के कारण बहुत सी बातों में विशेषता होती है । जैसा कि एक क्षणभर में स्वप्न के जीव बहुत दूर देश जा सकते हैं, और एक घड़ी के स्वप्न काल में कितने ही दिन रात बीत जाने का अनुभव होता है । यह सब बातें यद्यपि मिथ्या प्रतीत होती हैं, तथापि स्वप्न जगत् की विलक्षणता यदि मानी जाने तो जाग्रत् के विरुद्ध होने पर भी उनको हम सत्य मान सकते हैं । इसलिये ये स्वप्न के जगत् सत्य हैं । इस प्रकार पूर्ववत और इस मत में दो बातों का विशेष वैधर्म्य ( अनमोल ) है प्रथम मत में स्वप्न के पदार्थों को देखने का प्रकाश क्षेत्रज्ञात्मा का विज्ञान-मय प्रकाश है, और उस प्रकाश में दीखते हुए सब पदार्थ प्राज्ञश्रात्मा के कल्पित हैं और मिथ्या हैं । किन्तु इस द्वितीय मत के स्वप्न के पदार्थों को देखने के लिये विज्ञान का न होकर चन्द्रमा का प्रकाश है और उस प्रकाश में दीखते हुए: सब पदार्थ नित्य सिद्ध सर्वदा विद्यमान रहते हैं और ज्यों के त्यों सत्य हैं । यद्यपि यह हंसात्मा माता पिता के शुक्र शोणित के भ्रूण की चेतना से नया ही उत्पन्न होता है । तथापि वह हंस इतना प्रधान हो जाता है कि प्राज्ञ यादि सभी आत्मा और यह शरीर भी सूत्र के द्वारा उसी हंस में गुथा हुआ रहता है । हंस के वायुमय होने के कारण वायुमय सूत्र से इस शरीर को पकड़े रहकर इस शरीर से बाहर बहुत दूर धावा करता है उस समय प्राज्ञयात्मा अपनी सञ्चालक वायु के न रहने के कारण निर्व्यापार ( बेकार ) होकर वैश्वानर में गिरकर रह जाता है वह बाहर नहीं जा सकता किन्तु हंस के आने पर उसी हंस वायु के कारण उस प्राज्ञ श्रात्मा में हलचल होने की चेष्टा हो जाती । किन्तु किसी कारण से जब वह हंसात्मा वायुरूपी सूत्र को तोड़कर इस शरीर से बाहर निकलता है तो फिर उसको इस शरीर में प्रवेश करने का द्वार बन्द हो जाता है और वह इस शरीर से पृथक् रहने लगता है । वह उस समय + प्रेत की दशा में होता है । इस प्रकार हंस के चले जाने पर शरीर के वैश्वानर प्राज्ञ यादि सभी प्रात्मायें उत्कान्त ( उछट जाना ) हो जाते हैं । उन सबका बन्धन जिस • सूत्र से था, उसके टूटने से प्राज्ञ ग्रादि आत्मा भी शरीर में नहीं रह सकते उसी को मृत्यु कहते हैं । यही हंस-आत्मा जिसके आधार से शरीर में वैश्वानर, प्राज्ञ ग्रादि सभी ग्रात्मा बड़े सौकर्य ( सुगीते ) से रहते थे उसी हंसआत्मा के दूसरे किसी प्राणी के शरीर में प्रवेश होने पर उस प्राणी के प्राज्ञ यादि सभी ग्रात्मा-ग्रों को दबाकर ग्रावरण कर देता है, और उन पर अपना प्रभाव जमा लेता है | ३- सुषुप्ति पांच प्रकार की प्रज्ञा जिनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, घारा कहते हैं, इन पाचों के साथ पांच प्रकार के प्राण और इनसे प्रतिरिक्त पांच प्रकार के कर्मेन्द्रिय रूपी पांच प्राण और पांचों प्रज्ञात्रों के विषयरूप पांच ग्रर्थ जिनको शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध कहते हैं । इन पांचों ग्रर्थों के सम्बन्ध से पाच प्रकार के भूत जिनको आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी कहते हैं । इस प्रकार इन २५ पदार्थों की समष्टि की प्राज्ञ कहते हैं, तथा जन्म समय से प्रारम्भ करके मरण पर्यन्त जो कुछ यथार्थ ज्ञान, ज्ञान और अन्यथा ज्ञान ( यह ज्ञान व्यवहारिक है ) होता है उसका संस्कार सश्चित होता रहता है उसी को काम + प्र = बिल्कुल, इत = गया हुआ । प्रेत = बिलकुल गया हुआ । [ ३४० ]

पृष्ठ 373

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* ब्रह्मविज्ञान * कहते हैं । उन संस्कारों के उत्पन्न होने में अपेक्षा बुद्धि अर्थात् इच्छा ही कारण होती है, इसलिये उन संस्कारों को काम कहते हैं इसी प्रकार जन्म से मृत्यु तक जो सुकर्म विकर्म और कर्मो को प्राणी करते हैं उनका भी संस्कार उत्पन्न होकर संचित होता रहता है, जिनको शुक्र कहते हैं । काम और शुक्र ये दोनों जन्म जन्मान्तर में और मृत्यु के पश्चात् लोकान्तर में भी आत्मा के साथ - साथ रहते हैं इसलिये इन दोनों की समष्टि को भी मिलाने से प्राज्ञश्रात्मा का स्वरूप सिद्ध होता है । अर्थात् विज्ञानात्मा पर महान् ग्रात्मा अर्थात् योनिका आकार जो सोम रस का बना हुआ है मिला रहता है उस आकार के महान् आत्मा पर जो पश्ञ्च प्रज्ञा ग्रादि २५ मात्रा समष्टि मिली रहती है उसे ही प्राज्ञआत्मा कहते हैं । किन्तु वह प्राज्ञश्रात्मा काम और शुक्र से कदापि शून्य नहीं रहता । इसीलिये ऋषियों का सिद्धान्त है कि-" काममय एवायं पुरुष " इति अर्थात् सम्पूर्ण प्राणमय और भूतमय होने पर भी वास्तव में इस प्राज्ञग्रात्मा की काममय ही कहना चाहिये । क्योंकि—–

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते, कामायेऽस्य हृदिस्थिताः ।

अथमत्योंऽमृतो भवति श्रत्र ब्रह्म समश्नुते ॥

अर्थात् जबकि कभी कामनायें जो कि इसके हृदय में ठहरे थे सर्वथा मिट जाते हैं, तो उस समय यह मरणधर्मा प्राज्ञश्रात्मा प्रमृत हो जाता है और उस समय वह ब्रह्म को प्राप्त होता है, अर्थात् बुद्ध ब्रह्मरूप होकर मुक्त हो जाता है । तो इससे सिद्ध हुआ कि काम और शुक्र के हट जाने से अन्यान्य उप-रोक्त २५ मात्राओंों की समष्टि भी नहीं रहने पाती जिसके कारण प्राज्ञ का स्वरूप ही नष्ट हो जाता है और उस प्राज्ञ का काम और शुक्र के नष्ट होने से ही प्राज्ञ आत्मा का जन्म लेने के लिए योनि का संबन्ध भी टूट जाता है इसीलिये महान्त्रात्मा का सम्बन्ध भी नहीं रहता तो ऐसी दशा में केवल शुद्ध विज्ञानमय ग्रात्मा ही बचा रहता हूं इसी को कैवल्य ( अकेलापन ) मुक्ति कहते हैं । वह विज्ञानमय आत्मा सूर्य के रस से उत्पन्न होता है, इसलिये सभी प्रकार के ' कपाय ( मैल ) दूर होने पर वह विज्ञानमय आत्मा अपने प्रभव सूर्य में ही लीन हो जाता है इसी को सूर्यभेदी ( मिलने वाली ) मुक्ति कहते हैं । इस प्राज्ञ आत्मा में से काम और शुक्र ये दोनों प्राज्ञ में रहकर भी प्रकृति के द्वारा सब काम करने के कारण प्रकृति में ही अपना आशय बनाते हैं इसी से काम और शुक्र ये दोनों प्राज्ञ और महान् इन दोनों ग्रात्माओंों से सम्बन्ध रखते हैं । इनमें से यह प्रज्ञान आत्मा विज्ञान की ओर अधिक अनुशक्त रहता है क्योंकि प्राज्ञग्रात्मा इन्द्रियों से सम्बन्ध रखता है, और इन्द्रियां देवताओं से बना हैं और देवता विज्ञान-मय ग्रात्मा से निकलते हैं, इसलिए प्रज्ञान और विज्ञान का अन्तरङ्ग सम्बन्ध है । महान् आत्मा का विज्ञान से सम्बन्ध रहने पर भी इन दोनों का संयोग मात्र है, समन्वय सम्बन्ध नहीं है । जिस प्रकार पानी से प्रतिबिम्ब का सम्बन्ध है, उसी प्रकार विज्ञान का महान् से सम्बन्ध है । किन्तु जिस प्रकार पानी में लवण का सम्बन्ध है, उसी प्रकार विज्ञान में प्रज्ञान का सम्बन्ध है । यह विज्ञानमय ग्रात्मा सूर्य से उत्पन्न है । इसी कारण से सूर्य के ग्रस्त होने पर या सूर्य रस के प्रतिबन्धक तमोमय किसी दोष के आने पर [ ३४१ ]

पृष्ठ 374

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* ब्रह्मविज्ञान I शरीर के शोणित में से सूर्य का रस न्यून हो जाता है, तो उस दशा में इस विज्ञानमय ग्रात्मा की रश्मियाँ चारों ओर से संकुचित होकर केवल हृदय मात्र में ग्रा ठहरती हैं । उस समय हृदय आकाश में केवल प्रकाश रहता है | प्रज्ञानयात्मा उससे समन्वित होने के कारण वह भी हृदय मात्र में ग्रा ठहरता है इन्द्रियगोलकों में उसकी रश्मियां नहीं रहती, किन्तु हृदय में प्राज के साथ सब इन्द्रियां विद्यमान रहती हैं, काम और शुक्र भी रहते हैं, उसी अवस्था को स्वप्न कहते हैं । किन्तु संकुचित होते होते जबकि विज्ञानमय आत्मा हृदय ग्राकाश को भी छोड़ देता है, तो उस समय उसकी स्थिति पुरीतत नाड़ी में आ ठहरती है । यह पुरीतत नाड़ी हृदय से नीचे के भाग में होती है | हृदय से चारों १०० नाड़ियां निकलती हैं, आगे चलकर एक - एक में सो - सी नाड़ी होती हैं । फिर उनके प्रत्येक में से बहत्तर - बहत्तर हजार नाड़ियां निकलती हैं । ये इतनी सूक्ष्म हैं कि सूक्ष्मदर्शक यंत्रों से भी कठिनता से दीखती हैं । उन्हीं सूक्ष्म नाड़ियों के अग्रभाग से रोमावली निकलती हैं । इन नाड़ियों से सर्वाङ्ग शरीर जाल के अनुसार गुथे हुए हैं । इन नाड़ियों में कितनी ही लाल, पीले, नीले आदि रङ्ग की हैं, इन नाड़ियों को हितानाड़ी कहते हैं । इन हिनानाड़ियों में जो नाड़ी हृदय के नीचे पेट की ओर गई हैं उनमें होकर यह विज्ञानमयग्रात्मा प्रज्ञानमय ग्रात्माओं को साथ लेकर पुरीतत नाड़ी में चला जाता है, किन्तु महान् श्रात्मा जो सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है, जो इस शरीर का एक प्रकार का सांचा है, वह संकुचित न होकर ज्यों का त्यों बना रहता है । इसलिए महान् के प्राशय में जमे हुए काम और शुक्र भी ज्यों के त्यों हृदयस्थान में ही रह जाते हैं । काम शुक्र के बिना ही प्राज्ञयात्मा को साथ लेकर विज्ञानग्रात्मा पुरीतत नाड़ी के भीतरी चर्म को भी स्पर्श न करता हुआ उस नाड़ी के आकाश में बेलाग स्थित रहता है, इसी अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं । इस अवस्था में काम, शुक्र न रहने के कारण यह विज्ञानात्मा प्रज्ञान के साथ रहकर भी मुक्तिदशा के अनुसार सत्र संसार के मृत्युरूप जञ्जाल से रहित हो जाता है । उस समय वह आत्मा न स्त्री है न पुरुष है, न बाप है न बेटा है, न गृहस्थ है न सन्यासी है. न दीन है न धनाढ्य है केवल स्वरूप में रहकर अानन्दमय है । उसी प्रानन्द को हमारी प्राज्ञग्रात्मा अनुभव किया करती है, उस समय यह प्राज्ञश्रात्मा देखता सुनता हुआ भी देखता सुनता नहीं है । अर्थात् देखने सुनने यादि इन्द्रियों की शक्ति जाग्रत के अनुसार उसमें ज्यों की त्यों बनी हुई है किन्तु केवल विषय के समीप न होने के कारण किसी विषय का ज्ञान नहीं होता, यह उस ग्रात्मा की परमाशान्ति कही जाती है | दूसरा मत है कि यह विज्ञानग्रात्मा हृदय में ही रहकर सर्वाङ्ग है । किन्तु सर्वाङ्ग शरीर से इसकी रश्मिया संकुचित भले ही हो जाय, छोड़ती । हृदय के छोड़ने को ही मृत्यु कहते हैं । शरीर में अपनी रश्मि फैलाती किन्तु यह हृदय को कभी नहीं यह विज्ञानमय श्रात्मा सूर्य से उत्पन्न होती है, इसलिए हृदय को छोड़ने पर भी यह हृदय से ऊपर ही नाड़ियों में जा सकती है नीचे की ओर इसका जाना ठीक नहीं जचता । इसलिए मानना होगा कि मृत्यु के समय हृदय से उत्कान्त होकर ( छोड़कर ) ऊपर की नाड़ियों के द्वारा यह सूर्य में चली जाती है । किन्तु जीवन के सुषुप्तिकाल में ऊपर नीचे कहीं न जाकर केवल हृदय में ही संकुचित होकर रहती है । [ ३४२ ]

पृष्ठ 375

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* ब्रह्मविज्ञान स्वप्न से इसकी विशेषता यह है कि स्वप्नकाल में संपूर्ण हृदय के बाहरी परिवेष्ठन ( झिल्ली ) तक व्याप्त होकर प्रकाश करती है । किन्तु सुषुप्तिकाल में हृदयाकाश के भीतर और भी सूक्ष्म एक दहर पुण्डरीक नाम की ब्रह्मपुरी कहकर एक आकाश है उसमें चारों ओर के चर्मों का स्पर्श न करता हुआ निरालम्ब विश्राम करता है, उसको सुपृप्ति कहते हैं । जो कि श्रुति सुपुप्तिकाल में विज्ञानमय आत्मा का पुरीतत-नाड़ी में जाना कहती है उसके मतानुसार यह पुरीतत नाड़ी उदर में न होकर इसी हृदय के वेष्टन को कहते हैं । जो हृदय के भीतर बाहरी परदे में जाली के समान एक प्रकार की झिल्ली है उस झिल्ली के वारदिवारी के अन्दर उस दहराकाश में रहने में ही उस श्रुति का तात्पर्य है इसलिए इस श्रुति का विरोध नहीं आता । शङ्कराचार्य ने भी शारीरक भाष्य में इस पुरीतत शब्द का यही अर्थ माना है । इस विज्ञानग्रात्मा के साथ प्रज्ञानआत्मा का जो सम्बन्ध है उसमें भी दो मत हैं । पहले जो ऊपर कहा गया है कि सुपृप्तिकाल में काम, शुक्र को छोड़कर केवल इन्द्रियों को ही लेकर यह प्रज्ञानप्रात्मा उस विज्ञानग्रात्मा में अनुषक्त ( चिपका हुआ ) रहता है । उसकी कुछ भी रश्मि शरीर के मांस, त्वचा श्रादि में नहीं रहती । सोते हुए पुरुष का नाम लेकर पुकारने से जो वही पुरुष जाग उठता है वह इस ग्रात्मा का काम है | यह हंसआत्मा सुनता है, सुनकर शरीर में प्रवेश करता है, और विज्ञान में बैठे हुए प्रज्ञान को खींचकर इन्द्रियों की ओर त्वचा तक ले आता है यही पहला मत है । किन्तु दूसरा मत यह है कि सुपुप्तिकाल में भी जान के अनुसार ही प्रज्ञान आत्मा की स्थिति रहती हैं । जाग्रत् में जिस प्रकार विज्ञानआत्मा के साथ बंधा हुआ प्रज्ञानग्रात्मा सर्वाङ्ग शरीर में अपनी रश्मि व्याप्त रखता है, उसी प्रकार सुपुप्ति में भी रखता है । केवल विशेषता यही है कि विज्ञानआत्मा संकुचित होकर हृदय मात्र में विश्रांत ( बैठ जाता है ) हो जाता है । उसकी रश्मि बाहर त्वचा तक न रहने से प्रज्ञानश्रात्मा का व्यापार निष्फल हो जाता है । जिस प्रकार दीपक न रहने से घोर अन्धकार में देखती हुई आंख का व्यापार निष्फल हो जाता है उसी प्रकार विज्ञान का प्रकाश न रहने से देखता हुआ प्रज्ञान भी नहीं देखता । इस-लिए घोर निद्रा में कांटे चुभाये जायं, ठण्डा पानी डाला जाय, शरीर पर ग्राग की चिनगारियां डाली जाय तो श्रवश्यमेव वह प्राणी जाग उठता है । उसका उठानेवाला त्वचा तक विद्यमान प्रज्ञानात्मा ही है | यदि हंसात्मा पृथक् न भी मानी जाय तो भी कांटे, जल, अग्नि से त्वचा में व्याप्त प्रज्ञान में जो क्षोभ उत्पन्न होता है, उसका प्रवाह हृदय तक पहुंचकर निरालम्ब श्राकाश में विद्यमान विज्ञानग्रात्मा को भी हृदय के चर्म से स्पर्श कराकर बाहर त्वचा तक फैला देता है जिससे वह प्राणी जाग उठता है । इस मत में हंसग्रात्मा को न मान करके भी काम चल सकता है इस मत में हंसात्मा के न होने से स्वप्न जगत् की सृष्टि या उसका दर्शन भी शरीर से बाहर न होकर शरीर के भीतर हृदय में ही होता है । ४-५ - मोह और मूर्छा शारीरकसूत्र में वेदव्यासजी ने मोह और मूर्छा अवस्था में अर्ध सम्पति कही है । जिसका तात्पर्य यह है कि आधा जाग्रत् और ग्राधी निद्रा क्योंकि मोह और मूर्छा की दशा में भूत और इन्दियों के रहते भी स्तम्भन ( रुकावट ) के कारण निद्रा के अनुसार ही बोध नहीं होता । निद्रा नही है इसलिए उसे जाग्रत् के रादृश कहते हैं | किन्तु जाग्रत् के अनुसार उसमें किसी प्रकार का ज्ञान देखा नहीं जाता इस-| ३४३ ]

पृष्ठ 376

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* ब्रह्मविज्ञान छै लिए निद्रा के सदृश कहते हैं । इस प्रकार ज्ञान का प्रभाव दो प्रकार से होता है, गोह से और मूर्छा से इन दोनों में विशेषता इस प्रकार है, कि जैसे कोई तीरन्दाज तीर की बारीकी बनाने में इतना एकाग्रचित्त हो जाय कि उसके सामने आते जाते जीवों का ज्ञान न हो । इसी प्रकार अत्यन्त शोक या ग्रत्यन्त ग्रानन्द की मात्रा ग्राकस्मिक, ग्रविचारित, सहसा ग्रा पड़ने से हृदय पर इस प्रकार आघात पड़े कि उसकी चित्त वृत्ति एकदम ही रुक जाय तो उसे मोह कहते हैं । मोह में प्रज्ञा के जाग्रत् रहने पर भी प्रज्ञा की गति का स्तम्भन है । न बुद्धि की वृत्ति होती है न किसी विषय का ज्ञान होता है, यहां तक कि अपनी आत्मा का भी बोध नहीं होता । किन्तु प्रज्ञा नष्ट नहीं होती केवल प्रज्ञा की वृत्ति नष्ट होती है । किन्तु मूर्छा वह है कि जिसमें आत्मा के सामने अंवेरा छा जाता है मृत्यु के समान श्रात्मा के सामने घोर अन्धकार है । यहां केवल बुद्धि या प्रज्ञा की केवल वृत्ति ही नष्ट नहीं होती प्रत्युत प्रज्ञा का भी पूर्ण ग्रावरण हो जाता है, प्रज्ञा रहते भी न रहने के बराबर है । मोह में प्रज्ञा के रहने से प्रकृति के नियम के अनुसार प्रथम से ही प्राण पर प्रज्ञा का जो अधिकार प्रेरणा करने की जन्मकाल में प्रवृत्ति हो चुकी थी उसका निरोध न होने के कारण शरीर का प्रारण इस शरीर करने में जाग्रत् के अनुसार ही समर्थ रहता है । इसी से मोह की दशा में बैठा, खड़ा जैसा भी हो वैसा ही निश्चल रहकर भी शरीर को सम्हाले रहता है । किन्तु मूर्छा की दशा में उस प्राण पर आज्ञा करने वाले प्रज्ञात्मा पर ऐसा आवरण याता है कि जिससे प्राण की क्रिया भी केवल मूलस्थान अर्थात् हृदय में ही रह जाती है, शोणित चलता रहता है किन्तु श्रीर सब प्राण की क्रिया रुक जाती है जिससे श्वास भी अच्छे प्रकार नहीं प्राता । इस प्रकार प्राण के हरने पर भी शोणित के अतिरिक्त शरीर पर उसका अधिकार न रहने से शरीर गिर पड़ता इसी दशा को मूर्छा कहते हैं । यद्यपि इस मूर्द्धा की दशा और सुपुप्ति की दशा में अज्ञानता बराबर है, अन्धकार वरा-बंर है तथापि यह मूर्छा सुषुप्ति नहीं है । क्योंकि सुषुप्तिकाल में यह विज्ञान आत्मा और प्रज्ञानात्मा निज प्रकाश में रहती है, ग्रानन्द में मग्न रहती है । जगत् के जितने प्रकार के दुःख हैं सब से उस समय छुटकारा पा जाता है, यहां तक कि थकान भी मिट जाती है किन्तु मूर्छा में इसके विपरीत स्थिति है, यहां निज प्रकाश भी नहीं रहता । घोर अन्धकार है और ग्रानन्द की मात्रा बिल्कुल नहीं प्रत्युत सभी दुःखों की मात्रा में रहता है, ( डूब जाता ) है | उसमें थकान मिटने के बदले थकान की मात्रा अधिक होती है । सुषुप्ति में नासिका से श्वासोच्छ्वास इस प्रकार शान्ति से निकलता है, कि जिससे सोनेवाले का सुख दूसरे मनुष्यों को भी जान पड़ता है । सुपुप्ति में शान्ति में प्रसन्नता है । किन्तु गुर्छा में श्वासो-च्छ्वास इस प्रकार बन्द रहता है कि उसकी दशा देखकर उसके दुःख का अनुभव दूसरों को भी होता है, उसके मरजाने का भय रहता है उसके मुख और नेत्र की चेष्टा भयङ्कर हो जाती है । दूसरा मत है कि मूर्द्धा ये दोनों ही नई अवस्था नहीं है अर्थात् प्रज्ञा की ७ अवस्था न होकर ५ अवस्था ही हैं | क्योंकि मोह और मूर्छा इन दोनों का स्वप्न और सुषुप्ति में अन्तर्भाव हो सकता है । यह प्राज्ञआत्मा बाहर की इन्द्रियों पर बैठकर पांचों प्रकार की ज्योतियों से संसर्ग करके जब कि बाहर के विषयों का भोग करता है, ग्रर्थात् उनके ग्राकाश में आकर संस्कार ग्रहण करता है, वही जायत् अवस्था है । किन्तु जब इन्द्रियों का संसर्ग छोड़कर केवल स्वरूप मात्र में स्थिर होकर केवल ग्रात्मा की ज्योतिमात्र के संसर्ग से केवल ग्रानन्द का ही अनुभव करता है और किसी विषय का अनुभव नहीं करता. [ ३४४ ]

पृष्ठ 377

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* ब्रह्मविज्ञान उसे सुपुप्ति कहते हैं । इन दोनों के बीच की अवस्था को स्वप्न कहते हैं । ग्रात्मा की यही तीन मुख्य ग्रवस्थायें - हैं । उन तीनों में से जाग्रत् की अवस्था में वे तीनों अवस्थायें सम्मिलित हैं, अर्थात् पञ्चज्योति के रहने से जानत है । जाग्रत् में भी जब प्राणी दूसरे से बात न कर अपने आप ही कुछ सोचता विचा-रता रहता है उस समय उसकी सारी वृत्तियां स्वप्न की दशा है । किन्तु जब किसी आनन्द का अनुभव करता है तो क्षणभर दूसरे किसी भी विषय का अनुसंधान नहीं करता, यह जाग्रत् में सुषुप्ति की दशा है | किन्तु स्वप्न की दशा में केवल जाग्रत् का लक्षण नष्ट हो जाता है । स्वप्न और सुषुप्ति दोनों का समावेश हो जाता है, क्योंकि स्वप्न में भी प्रज्ञानाआत्मा की सुपुप्ति के अनुसार संयोग रहता है | उस से जो कुछ आत्मा का ग्रानन्द प्रज्ञान में हुआ करता है वह स्वप्न में सुषुप्ति है । इस प्रकार जाग्रत में ३ ग्रवस्थाओं का और स्वप्न में २ ग्रवस्थाओं का समन्वय होता है । किन्तु सुपुप्ति में अवस्था का द्वन्द्वभाव नष्ट होकर अद्वैतभाव हो जाता है । इन तीन अवस्थाओं में स्वप्न के अनुसार मोह में भी प्रज्ञा अपने हृदय स्थान में स्तब्ध रहती है । बाहर उसकी वृत्ति रुक जाती है, इस-लिये मोह को भी यदि जाग्रत् अवस्था का स्वप्न कहैं तो अनुचित होगा । इसी प्रकार मूर्छा का भी जाग्रत् अवस्था की सुपुप्ति में अन्तर्भाव कर सकते हैं । क्योंकि पित्त क्षोभ के कारण अथवा स्नायु दोष के कारण अथवा मस्तिष्क के दोष से जो हृदय पर अन्धकार का धक्का लगता है वह सुषुप्ति और मूर्छा दोनों में बराबर है । इसलिये ३ अवस्था जीवनकाल में और मृत्यु, मुक्ति २ अवस्था उत्तर काल में इस प्रकार ५ ही अवस्था हैं । इन दोनों का वर्णन आगे किया जायगा । ६–७ – मृत्यु, मुक्ति ग्रात्मा की १० ग्रवस्था पुराने श्राचार्यों ने कही हैं— जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मोह, मूर्छा, जन्म, मृत्यु, सगुणमुक्ति, निर्गुणमुक्ति, लय । इन १० अवस्थाओं में प्रथम ५ का वर्णन यहां किया है, अनविष्ट पांचों में से मृत्यु, मुक्ति प्रादि के विषय अधिक होने के कारण पृथक् प्रकरण में दिखायेजायें गे । यहां सम्बन्ध में परिशिष्ट विषय निरूपण करके इस श्रात्मापरिवछेद को पर केवल थोड़ा सा श्रात्मा के समाप्त करेंगे । आत्मा का परिशिष्ट भाग प्रज्ञान [ आत्मा का समन्वय प्रकरण है ] यद्यपि श्रात्मा अनेक हैं, तथापि उनमें प्रज्ञात्मा ही सबसे अधिक उल्वण ( उभरा हुआ ) है श्रुति भी कहती है-" नून जनाः सूर्येणप्रसूताः " जिनका जन्म है वे अवश्य सूर्य से ही उत्पन्न हैं । और शौनक ऋषि ने वृहद्देवता ग्रंथ में कहा है-भवद् भूतं भविष्यच्च जङ्गम स्थावरं च यत् अस्यैके सूर्य्यमेवेकं, प्रभवं प्रययं विदुः ॥ [ ३४५. ]

पृष्ठ 378

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान कुछ अर्थात् जो कुछ मौजूद है, जो हो चुका है, और जो होने वाला है स्थावर या जङ्गम जो जहां है इन सबका एक सूर्य ही प्रभव और प्रलय है । इसलिये यह पृथ्वी भी सूर्य से ही उत्पन्न हुई है और इस पृथ्वी में जो धारणा शक्तिवाला श्रग्नि देवता है वह भी सूर्य का ही रूपान्तर है सौनिक ऋषि ने भी ऐसा ही कहा है-" सूर्य प्रसूता वग्नी तु दृष्टौ पार्थिवमध्यमौ " अर्थात् पृथ्वी का अग्नि और अन्तरिक्ष का अग्नि ये दोनों भी सूर्य से ही उत्पन्न हुए हैं । तो ऐसी स्थिति में जिस प्रकार सूर्य की अग्नि के साथ ग्रग्नि, वायु, सूर्य, दिक्, चन्द्र ये पांच से देवता हैं उसी प्रकार पृथ्वी का अग्नि में भी इन पांचों का मेल है । किन्तु ये पांचों जिसके आधार होकर मिले हैं वह शुद्ध सूर्य का रस है । किन्तु इन देवों के मिलने के कारण उसके रूप में परिवर्तन मृत्युऔर श्रमृत के भेद से दो रूप हो गये हैं । मृत्यु रूप को पृथ्वी और अमृत रूप को ग्रग्नि कहते हैं । यह अग्नि पृथ्वी के केन्द्र से निकलकर पृथ्वी के पृष्ठ पर नाना ग्रोवधि या सभी प्राणियों के शरीरों को पृथ्वी से उठाकर बनाता है, और उनमें प्रवेश करता है इसी नियम के अनुसार यह ग्रग्नि पृथ्वी से निकलकर मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता हुआ प्रपद ( पांव ) के द्वारा धीरे - धीरे हृदय तक जाकर सूर्य से साक्षात् श्राये हुये पांचों देवताओं से मिलता है । जिससे यह पृथ्वी की ग्रग्नि में निगूढ़ पांचों देवताओं मात्रायें विकसित हो जाती हैं और सूर्य के खिचाव के कारण हृदय से सिर तक उठकर शिरोभाग में ही उद्भूत होती हैं । जिनको वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मन के नाम से पांच इन्द्रियां कही जाती हैं । ये पांचों ही इन्द्रियां जिसके आधार से मिलती हैं और जिसमें वृद्ध हैं वह पृथ्वी का प्राण इन पांचों के भीतर निगूढ़ है और वास्तव में वह सूर्य का ही रस है । इसलिये हृदय में कर सूर्य से साक्षात् आये हुए सूर्य का रस या उसके पांचों देवता इनसे मिलकर घिलमिल हो जाते हैं । इसी पृथ्वी से आये हुए पञ्चदेवता युक्त प्राण को प्रज्ञात्मा कहते हैं । जो कि सूर्य के रस रूप विज्ञानग्रात्मा के साथ वद्ध रहती है । यह प्राज्ञश्रात्मा जो वास्तव में पृथ्वी का प्राण है, वही इस शरीर की ग्रात्मा है । अर्थात् इस शरीर रूपी रथ का वही रथी है और रथ के वाहन के लिये जिस प्रकार अश्व की आवश्यकता है वही काम यहां पर पांचों इन्द्रियां या विशेषकर मन, प्राण, करते हैं । वाक् बोलने के लिये घ्राण गन्ध, श्वास के लिये, चक्षु दृष्टि या सत्यता के लिये श्रोत्र श्रवण के लिये और मन संकल्प या विचार के लिये द्वार मात्र हैं । किन्तु इन पाचों के अतिरिक्त जो एक ही पांचों का अभिमान करता है, अर्थात् मैंने कहा, सूघा, देखा, सुना और उन पर विचार किया, इस प्रकार पांचों का अपने में एक ही स्थान में अभिनय करती है, वही इन पांचों से भिन्न और पांचों की प्रेरक प्राज्ञश्रात्मा है और वहीं ग्रहमस्मि ( मैं हूँ ऐसा अभिमान करती है । इस प्राज्ञग्रात्मा रूपी मुख्य प्राण के ऊपर सात प्राणों का आवरण । मन, वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, कर्म और अग्नि । इनमें क्षेत्र तक ५ प्राण चेतन शरीर में ही उद्भूत होते हैं । वृक्षादि स्थावर जीवों के प्राज्ञ पर कर्म, ग्रग्नि ये दो ही आवरण हैं, किन्तु प्रस्तरादि जड़ जीवों की ग्रात्मा पर केवल [ ३४६ ]

पृष्ठ 379

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ॐ ब्रह्मविज्ञान * इस प्रकार निःसंग जीवों में एक आवरण और अन्तः संग जीवों में दो आवरण अग्नि ही ग्रावरण और संसग जीवों में ७ ग्रावरण हैं । इन सातों ग्रावरण रूपी प्राणों की मात्रा छत्तीस हजार हैं । इन सब को ग्रहण करने वाली मुख्य प्राण की मात्रा भी ३६००० ही हैं । उनमें से एक - एक मात्रा सूर्योदय से सूर्यास्त तक जितना प्राण सूर्य से आता है उसे ग्रहः कहते हैं । प्रत्येक मात्रा इस प्रत्येक अहः प्राण का भोजन करती है । एक बार खाने के उपरान्त पत्रव होने के कारण पुनः भोजन नहीं करती इसलिये प्राज्ञ प्राण के ३६००० मात्रायें बारी - बारी से सूर्य के ग्रहः का सम्बन्ध करके १०० वर्ष में निःशेष हो जाती हैं, इसी में मनुष्य की आयु १०० वर्ष की नियत है | इसी प्रकार यह प्राज्ञ प्राण अपनी जीवन सत्ता को रखता हुआ उक्थ कहलाता है, प्रत्येक उक्थ से चारों ओर ग्रर्क प्राण निकलकर अन्न का ग्रहण और संचय करता हैं । उन अन्नों को अशिति कहते हैं | उक्थ, ग्रर्क, प्रशिति इन तीनों का समन्वय आत्मा का स्वभाव है । जिस प्रकार ग्राकाश में सूर्य का विम्व एक उक्थ है, क्योंकि उससे चारों ओर रश्मियां उठती हैं ये रश्मियां चारों ओर फैली हैं, अर्क कहलाती हैं । यह अर्क चारों ओर से सोम और आप को खींचकर अपने में ले लेते हैं यही उनकी अशिति या ग्रन्न हैं । ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर में प्राज्ञ प्राण एक उक्थ है । उससे उठे हुए मन, प्राण, वाक् इत्यादि ७ चर्क हैं, ये ही जगत् के नाना विषयों को ग्रहण करके उस प्राज्ञात्मा में पहुँचाते हैं यही उनकी अशिति है । इसका उक्थ, अर्क, प्रशिति का सम्बन्ध होकर शरीर में रहना ही आयु है । इन्हीं सातों ग्रकों को ऐतरेय ऋषि ने अपने आरण्यक में ब्रह्मगिरि कहा है । इन सातो ब्रह्म ( प्राणों ) की रक्षा करना अर्थात् व्यर्थ व्यय करके नष्ट न करना ही ब्रह्मचर्य है । इस प्राज्ञ प्रारण पर जो ७ प्राण हैं उनमें सातवां अग्नि प्रारण दो प्रकार का है । अमृत और मृत्यु इनमें मृत्यु अग्नि चित्य है, जिसका शुक्र, मज्जा, अस्थि, मंदा, मांस, शोणित, चर्म और लोग इस प्रकार चयन होकर शरीर का रूप बनता है, किन्तु अमृत अग्नि चितेनिधेय होकर लोम भिन्न नातों चयनों पर व्याप्त होकर पृथ्वी के प्राज्ञात्मा रस को या अन्यान्य श्रात्माओं को भी धारण करता है । इस प्रकार इस अग्नि प्राण के द्वारा यह प्राज्ञ ग्रात्मा रूपी मुख्य प्राण सशरीर हो जाता है, परन्तु अपने स्वरूप से वह अशरीर है । इस प्रकार प्राज्ञात्मा की दो अवस्था होती है । सशरीर, ग्रशरीर इनमें सशरीर की दशा में यह प्राज्ञात्मा द्वन्द्वों के नियम से संयुक्त होता है । प्रिय और अप्रिय काम और शुक्र, विद्या और कर्म । किन्तु अशरीर दशा में केवल विद्या को रखकर वह आत्मा निर्द्वन्द्व हो जाता है, क्योंकि उसके प्रिय और अप्रिय कुछ भी नहीं रहते । किन्तु सशरीर दशा में श्रात्मा इन दोनों से विनिर्मुक्त नहीं होता । इसी प्रकार काम रहने से नाना प्रकार की क्रिया करता है, जिससे नाना प्रकार के शुक्र उत्पन्न होते हैं और उन शुक्रों से फिर नाना प्रकार के काम उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार के धारा प्रवाह में पड़कर आत्मा परतन्त्र हो जाता है । जब तक सब कामों या कामनायों को न छोड़े तब तक शुक्र के अधीन होकर नाना लोकों में आत्मा को परिभ्रमण करना पड़ता है । ये ही काम और शुक्र दोनों कर्म के बीज रूप हैं । काम से कर्म और कर्म से शुक्र और शुक्र से फिर काम होते रहते हैं । इस प्रकार कर्म की धारा ग्रात्मा में काम से उत्पन्न होती है । किन्तु विद्या की धारा आत्मा की स्वाभाविक धारा है । इसलिये जब कोई कर्म नहीं रहता तब भी विद्या विद्यमान रहती है । विद्या और कर्म ये दोनों ग्रात्मगति के लिये रथ चक्रवत् हैं, क्योंकि कर्म के द्वारा श्रात्मा की संसार गति होती रहती [ ३४७ ]

पृष्ठ 380

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* ब्रह्मविज्ञान । वह संसार की ओर बढता जाता हैं— जन्मता है, मरता है, सन्तान उत्पन्न करता है और अपनी सांसारिक उन्नति करता है । परन्तु कर्म से ग्रात्मा में कपाय पड़ता है और ग्रात्मा कलुषित है, जाती किन्तु इसके विपरीत विद्या से ग्रात्मा की ब्रह्म गति होती है । वह ब्रह्म की ओर बढ़ जाता हैं और परम शान्ति में आता है ग्रात्मा में कषाय दूर होकर ग्रात्मा शुद्ध स्वरूप में आती है । यही ग्रात्मा की दो गतियां हैं जिनको संसार या मोक्ष कहते हैं । जबकि ग्रात्मा तीनों द्वन्द्वों से निर्मुक्त होकर विद्या के प्रभाव से शुद्ध स्वरूप में आता है, उसी समय ग्रात्मा में ग्रप्ट गुणों का उदय होता है । इसलिये वह जीव अष्ट गुणी ईश्वर के समान हो जाता है, और यही सगुण मुक्ति है । इसी को रामानुज मानते हैं वे गुण ये विपालमा, विमृत्यु, विजर, बिशोक अविजिधित्सा ( न खाने की इच्छा ) ग्रपिपासा, सत्यसंल्प, सत्यकाम | रामानुज के मन में इन गुणों के ग्राने से जीव भी ईश्वर तुल्य हो जाता है । किन्तु फिर भी वह जीव जगत् की रचना, रक्षा, संहार करने की सामर्थ्य नहीं रखता इसलिये वह वास्तव में ईश्वर नहीं बनता केवल मुक्त श्रात्मा कहलाता है । ऐसे मुक्तात्मा असख्य हो सकते हैं । किन्तु ईश्वर सदा एक है । इस मत के विरूद्ध दूसरा मत यह है कि जीव जब विद्या के प्रतिशय होने से सर्वथा विशुद्ध हो जाता हूँ तो वह अपने प्रभाव ज्योति में जा मिलने से एक रूप हो जाता है जिस प्रकार पानी में बना हुआ प्रतिबिम्ब पानी की सत्ता से पृथक् अपना स्वरूप धारण करता है । वह ग्रल्प आयतन अल्प वीर्य ( शक्ति ) रखता है किन्तु पानी की सत्ता नष्ट होने पर वह केवल सूर्य के सदृश ही बनता है । प्रत्युत ज्योति में ज्योति मिल जाने से लय होकर सूर्य ही बन जाता है । ठीक उसी प्रकार काम, कर्म, शुक्र ये तीनों अविद्या के संयोग से यह जीव ईश्वर से पृथक् बन कर अपना स्वरूप बारगा करता है । किन्तु वह विद्या की सत्ता नष्ट होने पर ज्योति में ज्योति मिल जाने से लय होकर यह जीव भी साक्षात् ईश्वर हो जाता है | जैसे पृथ्वी से वृक्ष, पृथक् स्वरूप धारण करके भी अन्त में वृक्ष के स्वरूप से मुक्त होकर पृथ्वी हो जाता है । उसी प्रकार ईश्वर से ये सब जीव पृथक स्वरूप धारण करके भी ग्रन्त में जीव स्वरूप से निर्मुक्त होकर ईश्वर ही बन जाते हैं । क्योंकि यदि ईश्वर से पृथक् जीव की सत्ता मानी जाये और ईश्वर की शक्ति से उसकी शक्ति न्यून मानी जाय तो उसको अपनी ग्रात्मा की अल्प शक्ति पर अवश्य ही ग्लानि होगी इसते वह अशोक नहीं रह सकता, और उसने ससार की दशा में ईश्वर में मुक्त होने का संकल्प किया था | वह संकल्प उसका पूर्ण न होने से उस सायुज्य मुक्ति दशा में भी वैसा संकल्प होना निश्चित है, तो यदि वैसा संकल्प रह्ते भी वह साक्षात् ईश्वर नहीं हुआ तो उसका सत्य संकल्प होना मिथ्या ठहरेगा । इसलिये मुक्ति की दशा में भी संसार दशा के अनुसार जीव की ईश्वर से पृथक् दशा मान कर द्वैत मानना सर्वथा भूल है | सभी जीव ईश्वर से ही उत्पन्न होकर ग्रन्त में ईश्वर में ही लीन हो जाते हैं, और वह एक ही ईश्वर सदा विद्यमान रहता है, यही सिद्धान्त है । महान् यह प्राज्ञात्मा कृमि से लेकर ब्रह्मा तक प्रत्येक जीव में एक ही रूप है । यद्यपि यह प्राज्ञात्मा प्रत्येक शरीर में शरीर भेद से भिन्न है | शरीरावच्छिन्न है, और शरीरों के ग्रनन्त होने से संख्या में भी अनन्त [ ३४८ ]