ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 381–390
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 381–390
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* ब्रह्मविज्ञान हैं । तथापि यह ग्रात्मा निज के स्वरूप में सर्वत्र एक ही प्रकार का है । ६ ऊर्मियां और प्रदान ( लेन ) विसर्ग ( निकालना ) जाग्रत् स्वप्नादि १० अवस्थायें जैसे मनुष्य में हैं । उसी प्रकार कृमि आदि नीचे के जीवों में और देवता प्रादि उत्कृष्ट जीवों में भी समान हैं । किन्तु फिर इन जीवों की प्रत्येक विक्तियों में जो बहुत सी बातों में विशेषता प्रतीत होती है, उसका कारण क्या है? उत्तर यह है कि इन जीवों में परस्पर जो भेद प्रतीत होता है वह दो ही प्रकार का है । एक आकृति का दूसरा प्रकृति का प्राकृति का भेद दो प्रकार का है । एक सजाति भेद और दूसरा विजाति भेद । मनुष्य, मनुष्य में, वृक्ष, वृक्ष में परस्पर विजातीय भेद हैं । इनमें सजातीय भेदों का कारण देश, काल आदि पांचों का चैपम्य है, किन्तु विजातीय भेद और प्रकृति भेद होना अवश्य ही एक प्रधान कारण से है | वह कारण महान् आत्मा हैं । यह महान् ही भिन्न - भिन्न जाति का है जिसे योनि कहते हैं | और इस योनि संख्या की प्राचीन काल में ऋषियों ने = ४ लाख की गणना की है । यह ८४ लाख महान् भिन्न - भिन्न आकार में होने पर भी कर्मों के द्वारा परस्पर परिवर्तनशील हैं । अर्थात् हाथी घोड़ा हो सकता है और घोड़ा मनुष्य । इस प्रकार महान् की प्राकृति भिन्न होने से ही जीवों में विजाति आकार दीखते हैं । किन्तु प्रकृति भेद का कारण केवल महान् ही नहीं है, किन्तु महान् और क्षेत्रज्ञ का सम्बन्ध भी कारण है । यह महान् श्रात्मा चन्द्रमा के रस से बना हुआ काच और जल के सदृश स्वच्छ होने पर भी स्वयं प्रकाश नहीं है | जिस प्रकार काच का गोला दीपक के सम्मुख रखने से उसका सामने का अर्थ भाग प्रकाशमान हो जाता है । किन्तु उसके विरुद्ध दिशा में अर्ध भाग तमोमय रहता है । किन्तु प्रकाश और तम दोनों के सन्धिस्थान में मन्द प्रकाश रहता है । इस प्रकार वह एक ही गोलक तीन रूप में परिणत हो जाता है । प्रकाश, छाया और तम । इसी प्रकार यह स्वच्छ महान् आत्मा भी स्वयं प्रकाशमान विज्ञान आत्मा के समीप रहकर तीन स्वरूप धारण करता है । विज्ञान विशिष्ट उसका भाग प्रकाशित होकर सत्त्वगुण कह लाता है और छाया भाग रजोगुण और शेम अन्धकारमय भाग तमोगुण है । इस प्रकार सत्व, रज, तम इन्हीं तीनों गुणों को महान् कहते हैं । किन्तु इनकी दो अवस्था होती हैं । एक तीनों गुणों की समता जो इस महान् का वास्तव रूप है उसको पुराने प्राचार्यों ने प्रकृति, प्रधान और अव्यक्त शब्दों से कहा है । किन्तु यह समता रूप जगत् के यादि में या प्रलयकाल में कदाचित् सम्भव होता है । किन्तु जगत् की अवस्था में कभी क्षुब्ध होकर विपय अर्थात् न्यूनाधिक हो जाता है, और अन्योन्य, ( परस्पर ) ग्रभिभव ( दवाना ) श्राश्रय, जनन ( पैदा करना ) मिथुन वृति का होता है, यही विषमता जगत् का रूप हैं । इस विषम अवस्था को ही महान् कहते हैं । क्योंकि इस अवस्था में वे तीनों गुण व्यक्त अवस्था में आकर सूक्ष्म की अपेक्षा महान् हो जाते । यही महान् किसी समय अव्यक्त था वही प्राशात्मा के सुख, दुःख, मोह नाम से विविध गोगों की जो जहां कुछ सामग्री उत्पन्न होती है उन सबकी प्रकृति अर्थात् मूल कारण ये ही महान् के ३ गुण हैं । इसलिये वे गुण प्रकृति कहलाते हैं । जिस आत्मा में यह प्रकृति जिस मात्रा में जैसी होती है वैसा ही भोग उस ग्रात्मा को मिलता है, इसलिये लक्षण से वह प्रकृति शब्द स्वभाव का वाचक हो गया है | ये ही तीन गुण ग्रात्मा के स्वभाव हैं । " स्व " करके विज्ञान ग्रात्मा से मिली हुई प्रज्ञान ग्रात्मा समझी जाती है । उसका “ भाव ” अर्थात् अवस्था विशेष का होना ही " स्वभाव " है । [ ३४६ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ग्रात्मा में हो इसलिये गीता में स्वभाव या प्रकृति के अनुसार जो भाव प्रज्ञान में उबुद्ध होता है वैसा ही भोग प्रज्ञान जाता है । उस भोग को प्रज्ञान ग्रात्मा कदापि रोक नहीं सकता, उसके परतन्त्र है
लिखा है कि-प्रकृत्या क्रियमाणनि, गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा, कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ श्र. ३, श्लांक २७ ॥
यद्यपि इस प्रकार प्राज्ञात्मा परतन्त्र है, किन्तु उसको प्रेरणा करने वाली दूसरी आत्मा विज्ञानमय क्षेत्रज्ञ स्वतन्त्र है । वह प्रकृति को अवश्य दबा सकती है किन्तु मात्रा की आवश्यकता अवश्य है । प्रज्ञान की प्रकृति महान् ग्रात्मा की मात्रा यदि विज्ञान ग्रात्मा से अधिक है तो विज्ञान ग्रात्मा के कहने पर भी प्रकृति दुर्निवार होगी, विचार शक्ति व्यर्थ होगी । किन्तु विज्ञान की मात्रा यदि महान् से अधिक है तो वह प्रकृति को दबा कर क्रम - क्रम से अपने स्वभाव का परिवर्तन कर लेगा । प्रायः ऐसा भी देखने में आया है कि अपनी विज्ञान ग्रात्मा की विशेषता ( लियाकत ) विशेष बल न रहनेपर भी दूसरे किसी महापुरुष की प्रवल विज्ञान ग्रात्मा एकाएक क्षणभर में किसी दुर्बल मनुष्य की प्रकृति का परिवर्तन कर देती । इसी विज्ञान आत्मा के प्रभाव से प्रकृति परिवर्तन होते - होते दुराचार करते हुए ग्रात्मा उन्नति पथ पर अग्रसर होता है । और कई जन्म के अनन्तर सर्वथा विशुद्ध होकर मुक्ति पा जाता है । जैसा कि
गीता में लिखा है-अनेक जन्म संसिद्ध, स्ततोयाति परांगतिम् ।
बहूनां जन्मनामन्ते, ज्ञानवान् मां प्रपद्यते ॥१ ॥
महान् श्रात्मा के सत्व, रज, तम ये तीनों गुण जगत् के सभी भात्रों के मुख्य कारण हैं । सभी ग्रात्मायों की सभी वृत्तियां इन्हीं तीनों गुणों के कारण प्रतिक्षण बदलती रहती हैं । गुण यद्यपि तीन ही हैं, तथापि उनसे उत्पन्न होते हुए भाव ग्रनन्त प्रकार के हैं । उन सबमें सत्वगुण से उत्पन्न होते हुए जितने भाव या वृत्तियां हैं वे सब विज्ञान ग्रात्मा के अनुकूल है, पोषक हैं; किन्तु रजो गुण से उत्पन्न होते हुए भाव और वृत्तियां विज्ञान के प्रतिकूल हैं, विक्षेपक हैं । किन्तु तीरारे तमोगुण से उत्पन्न हुए भाव और वृत्तियां विज्ञान के आवरण ( ढकनेवाले ) होते हैं । विज्ञान में सत्वगुण से शान्ति, रजोगुण से क्षोभ, तमोगुण से स्थम्भन हुआ करते हैं । जिनके कारण विज्ञान में न्यूनातिरेक ( कमोवेश ) विशेषता होती रहती है | अर्थात् सत्वगुण की अधिकता से विज्ञान बढ़ता है, रजोगुण की अधिकता से विज्ञान में हल चल उत्पन्न होकर विज्ञान की कमी न होने पर भी विज्ञान की शक्ति कम हो जाती है, तमोगुण की अधिकता से विज्ञान के बहुत ग्रंश ग्रावृत होकर कम हो जाते हैं । इसलिये विज्ञान की वृद्धि के लिये तम और रज की वृत्तियों को घटाकर के सत्व की वृत्ति बढ़ानी चाहिये । इस प्रकार महान् के द्वारा विज्ञान की विशे-बता जैसे होती हैं, उसी प्रकार विज्ञान के द्वारा महान् में भी विशेषता होती रहती है । केवल इन दोनों में मात्रा और बल की अधिकता में ही निर्भर है । इस प्रकार जैसे प्रकृति के द्वारा विज्ञान में विशेषता उत्पन्न होती है, वैसे ही प्राकृति के द्वारा भी विज्ञान में विशेषता पाई जाती है । इसलिये कृमि, कीट [ ३५० ]
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ब्रह्मविज्ञान आदि जीवों के शरीरायतान कम होने से विज्ञान की मात्रा कम होती है, किन्तु मनुष्य में अपेक्षाकृत बहुत होती है । हाथी का शरीर प्रायतन अधिक होने पर भी बुद्धिनाशक मेद ( चवीं ) और श्लेष्मा आदि दोषों की अधिकता के कारण विज्ञान की मात्रा कम है । इसलिये उसका सिर मनुष्य के समान ऊँचा न होकर पशु के समान तिरछा है, दो पाँव पर खड़ा न होकर चार पाँव पर खड़ा है । यही प्रमाण है कि पशु योनि के महान् की अपेक्षा मनुष्य योनि की महान् स्वभाव से हो अधिक विज्ञान रखते हैं । इनके अतिरिक्त विज्ञान की मात्रा अधिक होने पर भी महान् के रजोगुण से उत्पन्न काम और शुक्र की धारा यदि बढ़ जावे तो जिस प्रकार ' उल्व ' ( भिल्ली ) से गर्भ और मल से दर्पण और धूम दीपज्योति प्रावृत होकर अपनी शक्ति का अपकर्ष कर लेते हैं, उसी प्रकार उस काम से विज्ञान भी अप-कर्ष पा जाता है । काम, कोच. लोभ, मोह, मद, मात्सर्य यादि किसी भी वृत्ति की अधिकता होने पर उसके आक्रमण से बड़े - बड़े गहानुभाव विद्वानों की प्रबल विज्ञान की विचार शक्ति पर परदा पड़ जाता है । जिससे विचार न कर वे भी कितने ही अनाचार कर बैठते हैं । इनके अतिरिक्त सत्संगति, कुसंगति, सुशिक्षा, कुशिक्षा का भी प्रबल प्रभाव विज्ञान पर पड़ता है इसलिये जो प्राज्ञात्मा जीव अपनी आत्मिक उन्नति के लिये अपने विज्ञान की उन्नति चाहे तो उसको चाहिये कि अपनी प्रकृति में सत्त्वगुणों के भावों की वृद्धि करने का अभ्यास करे, और सुशिक्षा लाभ करे, सत्संगति करे, इन सबसे प्राकृतिक नियमानुसार अपने आप ही विज्ञान शक्ति धीरे धीरे बढ़कर प्रकृति के रजोगुण, तमोगुण, के प्रभाव को दबाकर प्रत्यन्त कल्याण गुण प्राप्ति का कारण होगा और सत्वगुण की वृद्धि से धीरे धीरे प्रज्ञान ग्रात्मा विशुद्ध होता हुआ अन्त में विज्ञानमय हो जायगा । यही प्रज्ञान जीव-आत्मा की मुक्ति है, यही उसको परम लाभ है, यही परम पद् और पराशान्ति है और परमानन्द है । आत्मशास्त्र समन्वय आत्मा के निरूपण में जितने शास्त्र प्रचलित हैं वे आचार्य पृथक होने के कारण भिन्न - भिन्न भले ही प्रतीत होते हो परन्तु वास्तव में वे सब शास्त्र किसी एक ही आत्म रत्र के भिन्न - भिन्न प्रकरण हैं । सब प्रकरणों के समन्वय से किसी एक ही आत्मा का अथवा उस एक आत्मा के भिन्न भिन्न स्वरूपों का निरूपण समझना चाहिये । दर्शनों में प्रायः तीन शास्त्र मुख्य हैं । वैशेषिक, प्राधानिक और शारीरक । इनमें वैशेषिक शास्त्र केवल भूतात्मा का निरूपण करता है और प्राधानिक अर्थात् सांख्य शास्त्र क्षेत्रज्ञआत्मा का निरूपण करके महान् श्रात्मा को उस क्षेत्रज्ञ की प्रकृति कहकर निरूपण करता है । तात्पर्य यह है कि सांख्यशास्त्र में प्रकृति पुरुष नाम से जिन दो तत्वों का निरूपण है, उनमें पुरुष तो क्षेत्रज्ञ है और प्रकृति महान् है । और श्रीर तीसरा शारीरक जिस ग्रात्मा का निरूपण करता है, वह ऊपर की तीनों आत्मानों से पृथक् परो-रजा चिदात्मा है । इस प्रकार तीनों शास्त्र सत्य हैं, किन्तु श्रात्मा का एक स्वरूप उनका विषय है । किन्तु नवीन नैयायिक जीव ईश्वर दो भिन्न मानकर दो आत्मा कहते हैं । किन्तु उनका ईश्वर आत्मा एक क्षेत्रज्ञ है, अथवा ब्रह्माण्ड का अधिष्ठाता शरीर से बाहर की श्रात्मा है, जो विचारणीय है [ ३५१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान यद्यपि ऊपर के तीनों शास्त्र जिन - जिन आत्मायों का जिस प्रकार निरूपण करते है, वह उन्ही २ ग्रात्मा-त्रों के सम्बन्ध में सत्य ही प्रतीत होते हैं । किन्तु एक आत्मा को मान कर दूसरे का खंडन करना साहस है । ग्रर्थात् क्षेत्रज्ञ और महान् को मानता हुग्रा सांख्य यदि भूतात्मा चिदात्मा को व्यर्थ कहता हो तो यह अनुचित है, और भूतात्मा को मानता हुग्रा वैशेषिक यदि क्षेत्रज्ञ, चिदात्मा महान् इन तीनों को व्यर्थ कहे, तो ग्रनुचित है । इसी प्रकार शारीरक ग्रर्थात् वेदान्त शास्त्र भी केवल चिदात्मा ही को मानता हुग्रा यदि क्षेत्रज्ञ, महान्, भूतात्मा इन तीनों की उपेक्षा करें तो वह भी अनुचित है । तात्पर्य यह है कि चिदात्मा सूत्रात्मा, क्षेत्रज्ञ, महान्, भूतात्मा ये पाँचों ही ग्रात्मा हमारे शरीर में भिन्न - भिन्न तन्त्रों की प्रकृति करके शरीर की स्थिति नियत करते हैं । उनमें किसी एक ही ग्रात्मा पर निर्भर करके ग्रन्यान्य ग्रात्माओं का तिरस्कार करना विचार सम्मत नहीं है । समन्वय जगत् में प्रत्येक पदार्थ को देखने से यह सिद्ध हो चुका है कि जो जहां कुछ पदार्थ दीखता है वह सब पाच भौतिक है । ग्रर्थात् पाँच भूतों से बना है । वाक् ग्रर्थात् श्राकाश से पैदा होने के कारण इन पाँचों भूतों को वाक् भी कहते हैं । प्रत्येक वाक् के भीतर प्राण रहता है, और प्राण के भीतर मन रहता है । इस प्रकार मन, प्रारण, वाक इन तीनों की जो समष्टि है वह मन के भीतर विद्यमान एक ग्रन्तर्यामी चिदात्मा के आश्रय से है । इसलिये कोई चित्त को अथवा कोई मन, प्राण, को प्रधान ग्रात्मा भले ही मानता हो किन्तु जबकि ये सब ग्रात्मा वाक् प्रर्थात् भूत में ही मिलते हैं । भूत में उनकी सबकी समष्टि है तो इस एक भूत को ग्रहण करने से इसके अन्तर्गत वे सभी ग्रात्मायें ग्रहीत हो जाते हैं । कोई भी आत्मा पृथक् अवशिष्ट नही रहता इसलिये एक भूतात्मा ही को मानना उचित है । इस प्रकार के विचार से कणाद भगवान् यदि केवल भूतात्मा ही को मुख्य ग्रात्मा मानकर सन्तुष्ट हो गये हो और किसी ग्रात्मा को इस भूतात्मा से पृथक् न देखकर उनका निरूपण न किया हो तो यह उनका विचार सर्वथा उचित और सत्य ही प्रतीत होता है । इसी प्रकार सांख्यशास्त्रों में भी विचार करने से विरोधाभाव प्रतीत होता है, क्योंकि जिस प्रकार क्षेत्रज्ञ के प्रकाश से महान् की तीन अवस्था होकर तीन गुण कहे जाते हैं, और वही महान् क्षेत्रज्ञ पुरुष को प्रकृति माना जाता है । उसी प्रकार मन, प्राण, वाक् इन तीनों की समष्टि को यदि सांख्य का महान् मान लिया जाय तो वह समष्टि मन ग्रण में प्रकाशमय होने के कारण सत्व है । प्राण ग्रश में क्रिया प्रधान होने के कारण रज है । वाक् ग्रश में ज्ञान क्रिया भिन्न ग्रर्थ स्वरूप होने के कारण तम है | इस गुणसूत्र समष्टि को यदि चिदात्मा पुरुष की प्रकृति मानी जायें तो भगवान् कपिल के माने हुए प्रकृति पुरुष इन्हीं दो तत्वों में चिदात्मा, क्षेत्रज्ञ, महान् भूतात्मा इन चारों ग्रात्माओं का संग्रह हो जाता है । यदि इसी अभिप्राय से भगवान् कपिल ने दो ही तत्व मानकर सन्तोष किया हो और इन दोनों से पृथक् कोई आत्मा न मानते हो तो यह उनका विचार सर्वथा उचित है और सत्य है । अब तीसरे शारीरक ग्रर्थात् वेदान्तशास्त्र ने ब्रह्म और माया ये दो तत्व मानकर ब्रह्म को नित्य सद्रूप और माया को ग्रनिर्वचनीय या असद्रूप मानकर श्रद्वैत माना है । उसमें चिदात्मा ही एक मुख्य [ ३५२ ]
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६ ब्रह्मविज्ञान ब्रह्म है, और उसी की माया द्वारा मन, प्राण. वाक ऐसे ३ भेद अथवा क्षेत्रज्ञ, महान् भूतात्मा ऐसे ३ भेद उत्पन्न होने से इन तीनों को माया मय माना जावे और इन भेदों को अनिर्वचनीय मिथ्या समझकर शुद्ध एक चिदात्मा को ही माना हो तो यह भगवान् वादरायण का विचार सर्वथा उचित और सत्य है । इस प्रकार विचार दृष्टि से देखने पर वैशेषिक, प्राधानिक, शारीरक इन तीनों दर्शनों में विरोधाभाव होने से समन्वय प्रतीत होता है, और तीनों मतों के अनुसार एक ही अव्याकृत आत्मा सिद्ध होता है, जिसके चिदात्मा, क्षेत्रज्ञ ग्रात्मा, महान् आत्मा, भूतात्मा इस प्रकार ४ व्याकरण हैं । इन तीन दर्शनों के अतिरिक्त आजकल के नवीन विद्वन्मण्डली में और भी तीन दर्शनों की प्रसिद्धि पाई जाती है । न्याय, योग, मीमांसा । किन्तु इन तीनों को दर्शनशास्त्र मानना उनका केवल साहस है । क्योंकि दर्शन उस शास्त्र को कहते हैं जो कि सामान्य रूप से सम्पूर्ण जगत् का एक क्रम से निरूपण करे | जिसके नियम त्रैलोक्य के पदार्थों पर और उसके बाहर भी सर्वत्र ही एक रूप से लागू हो । किन्तु यदि जगत् के किसी विशेष स्कन्ध पर विशेष रूप से निरूपण किया जाय, जैसा वनस्पति विज्ञान, शरीर-विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, दकार्गल विज्ञान तो वह एकदेशी विज्ञान होने के कारण सार्वदेशिक विज्ञान रूप-दर्शन होने के योग्य नहीं है । यह न्यायशास्त्र जिसको तर्क का न्याय कहते हैं, वह तर्क अर्थात् अनजान विषय में कई कारणों से उसका यथार्थता निश्चय करने के लिये जो ऊहा ( बुद्धि का ले जाना ) उसके न्याय को अर्थात् मार्ग को तर्कन्याय कहते हैं । इस कारण वह तर्कन्याय केवल कथाशास्त्र ( वाद, गल्प, -वितण्डा ) है | यह न्याय जगत् का निरूपण न होकर जगत् का एक देशी कथा का निरूपण है, इसलिये उसको दर्शन कहना ग्रनुचित है! इसी प्रकार पूर्व मीमांसा भी वाक्यार्थं निरूपण है, अर्थात् एक वाक्य का दूसरे वाक्य के साथ क्या सम्बन्ध है और वाक्यों का किस प्रकार के अर्थ होने में सामर्थ्य है, इसके न्याय को ही मीमांसा कहते हैं, और यह भी एकदेशी होने के कारण दर्शन नहीं है । प्रत्येक मनुष्य की प्रवृत्ति में तीन कक्षायें होती है । दर्शन, विज्ञान चरित्र प्रत्येक मनुष्य किसी विषय की ओर प्रथम अपनी दृष्टि डालता है, उस दृष्टि का कोई ढंग होता है उसी ढंग या दृष्टि के प्रकार को दर्शन कहते हैं । किन्तु देखते - देखते परीक्षा के द्वारा जो विषय निर्धारित होकर ज्ञान में स्थिर हो जाता है, श्रर्थात् देखने के विषय का एक स्वरूप स्थिर हो जाता है वह उस विषय का विज्ञान है । दर्शनकाल में ज्ञान उस ज्ञान से जो के लिये प्रयत्न था, विज्ञान होने पर वह यत्न रुक जाता । किन्तु मनुष्य अपना कुछ उपयोग सिद्ध करता है, अर्थात् उस ज्ञान के द्वारा जो जैसा बर्ताव करता है वही उसका चरित्र है । परमेश्वर न दीखने पर भी है कि नहीं इसका निश्चय करने के लिये जो गुरुवाक्य सुना जाय, शास्त्रों के वचन देखे जांय या स्वयं कुछ अनुमान किया जाय, विद्वानों से वादानुवाद किया जाय, इत्यादि इत्यादि विचार करना दर्शन का विषय है । किन्तु ईश्वर है ऐसा विश्वास हो जाना विज्ञान और ईश्वर के होने के विश्वास पर उससे प्राथना करना, जप करना और उसके प्राप्ति करने का काम करना ही चारित्र्य है । इस नियम के अनुसार दर्शन विज्ञान का पूर्वाङ्ग है और उपाय है किन्तु चारित्र्य उस विज्ञान का उतराङ्ग है और फल है । तात्पर्य यह [ ३५३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान है कि यह चारित्र्य भाग दर्शन न होकर दर्शन के फल विज्ञान का भी फल है, इसी कारण इन तीनों को माने जायं तो अनुचित नहीं । इसी कारण से सांख्य और योग इन समझकर दोनों का एक ही नाम सांख्य प्रवचन कहा है । गीता में भी यदि एक ही शास्त्र के ३ विभाग दोनों शास्त्रों को एक ही शास्त्र कहा है: -सांख्य योगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । ( ५,४ ) एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ( ५,५ ) तात्पर्य यह है कि इसी सांख्य दर्शन का अथवा उसके विज्ञान का चारित्र्य भाग ही योग है । यह न तो दर्शन भाग है और न यह सांख्यशास्त्र से भिन्न शास्त्र है । वास्तव में दर्शन का विषय यह है कि इस विशाल जगत् को देखकर प्रत्येक मनुष्य के विचार में प्रायः स्वभाव से ही यह शंका उठा करती है । यह जगत् कब से हुआ, कैसे हुआ, किसी ने बनाया या अपने ग्राप ही हो गया । यदि आप ही हुआ तो नियमानुकूल विज्ञान सिद्ध सब काम कैसे हुए हैं, ग्रस्त-व्यस्त ( उलट - पुलट ) क्यों नहीं होता । और यदि इसका कोई नियन्ता पूर्ण ज्ञानवान् इसका श्रव्यक्ष माना जाय तो वह कहाँ है, जगत् के भीतर या बाहर । जगत् के भीतर रहने पर जगत् पहले ही सिद्ध होता है ईश्वर से जगत् की रचना ग्रसम्भव होगी । यदि वह जगत् से बाहर है तो भी असम्भव है, क्योंकि जगत् देश और काल दोनों से अनादि अनन्त दीखता है । इसलिये जगत् से बाहर कोई स्थान ही सम्भव नहीं है, और वहाँ ईश्वर का रहना भी संभव नहीं है; इत्यादि इत्यादि इस जगत् के विषय में शतशः प्रश्न उपस्थित होते हैं । इन्हीं प्रश्नों पर विचार करके इनका समुचित समाधान करना ही दर्शनशास्त्र का विषय है । इस प्रकार के दर्शन यद्यपि अनन्त हैं तथापि उनमें से छः बहुत प्रसिद्ध हैं: - लोकायतिक १, वैनाशिक २, स्याद्वादिक ३, वैशेषिक ४ प्राधानिक ५, शारीरक ६ । इनमें प्रथम तीन जगत् कर्त्ता ईश्वर को " नास्ति " कहते हैं, इसलिये तीनों नास्तिक दर्शन हैं । शेष तीनों इस जगत् के बनाने वाले एक ईश्वर को ग्रस्ति कहते हैं, इसलिये ये तीनों आस्तिक कहे जाते हैं । इस प्रकार दर्शन के दो भाग हैं । यह विभाग जगत् के कर्त्ता के अनुरोध से है । किन्तु जगत् के उपादान द्रव्य के अनुरोध से इन दर्शनों के तीन विभाग है । १ कर्मदर्शन, २ ब्रह्मदर्शन और ३ उभयदर्शन तात्पर्य यह है कि इस जगत् की रचना में दो भाव स्पष्ट दिखाई देते हैं, एक प्रत्येक पदार्थ में परिवर्तन और दूसरा अनादिकाल से जगत् का एक ही प्रकार से स्थिर रहना इन्हीं दोनों बातों से दो तत्व सिद्ध होते है । एक परिवर्तनशील क्षणिक, विनश्वर और दूसरा सर्वदा, एक रस, शाश्वतिक अविनाशी । इन दोनों तत्वों में प्रथम को कर्म और द्वितीय को ब्रह्म कहते है । इन दोनों में ब्रह्म को न मानकर विनश्वर तत्व से ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति देखना " कर्म दर्शन " है उसे ही वैनाशिक कहते हैं | माध्यमिक, सौत्रान्तिक, वैज्ञानिक, वैभाषिक आदि कितने ही अवान्तर भेद नास्तिक दर्शनों के है, वे सब वैनाशिक की शाखा हैं । इन सबके विरुद्ध जो दर्शन इन परिवर्तनशील क्षणिक विनश्वर पदार्थों के भीतर निगूढ़ रूप से एक अविनाशी ब्रह्म को जगत् का उपादान कारण मानता है, वही ग्रास्तिकदर्शन है । वैशेषिक [ ३५४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * यदि सब इसी विभाग में हैं । वे दोनों ब्रह्म गौर कर्म - दर्शन अद्भुत पक्ष में हैं । किन्तु कितने ही अन्य दर्शन ब्रह्म और कर्म अर्थात् ग्रविनाशी और विनश्वर दोनों तत्वों के मेल से जगत् की सृष्टि मानते हैं । वे भक्ति दर्शन वा उपासना दर्शन कहे जाते हैं वे सब द्वैत पक्ष के हैं । इनके मत में परिवर्तनशील विनश्वर पदार्थों में नित्य विद्यमान एक सच्चिदानन्द सदा एक रस अविनाशी आत्मा भी है, वही मेरी आत्मा है । इसीलिये हम उन नास्तिकों के अनुसार असद्रूप न होकर सदा सद्रूप नित्य परमानन्द हैं । इसी अभिप्राय को लेकर एक महर्षि कहते हैं ।
असन्नेव स भवति, प्रसद् ब्रह्मेति वेदचेत् ।
अस्ति ब्रह्मेतिचेद्वेद सन्तमेन ततोविदुः ॥
ग्रर्थात् वह स्वयं ग्रसत् अपने को बनाता है, जो कि ब्रह्म को सत् मानता हुआ आत्मा को असत् मानता है | किन्तु जो ब्रह्म को ग्रस्ति कहता हुआ प्रांत्मा की सत्ता मानता है उसकी आत्मा सदा के लिये नित्य अविनाशी और स्थिर है । इसीलिये ब्रह्म मानने वाले पुरुष को सन्त अर्थात् सदा रहने वाला कहते है । आत्मसार समुच्चय इस प्रकार इस ग्रात्म प्रकरण में कुल ७ ग्रात्मायें दिखाई गई हैं । १ -- चिदात्मा, २ – सूत्रात्मा ३ – क्षेत्रज्ञग्रात्मा, ४ – महानात्मा, ५ – भूतात्मा, ६ - हंस आत्मा, ७ – दैव आत्मा । इन सातों में देवात्मा कृत्रिम है जो कि यज्ञ करने से क्षेत्रज्ञात्मा में ही विशेष रूप से उत्पन्न होता है, और यह भी क्षेत्रज्ञात्मा का ही रूपान्तर है । किन्तु यह देवात्मा सभी प्राणियों में नहीं पाया जाता केवल याज्ञिक मनुष्यों में ही उत्पन्न होता है । और इस आत्मा के उत्पन्न होने पर वह पुरुष मनुष्य न कहा जाकर दैव कहलाता है । प्राचीन समय में भूमि स्वर्ग के नाम से जो उत्तराखण्ड में स्वर्ग स्थान नियत था वहाँ के बसने वाले सभी बुरूप प्रायः इस देवश्रात्मा के प्रबल होने से ' भूमिदेव ' कहे जाते थे । ऐसे देवों की आत्मा देहावसान के उत्तर नियम से सूर्यमण्डल के देव लोक में ही जाती थी । वह आत्मा पितृलोक में अन्य मनुष्य के अनुसार नहीं जाती थी । यह आत्मा तीन प्रकार की है परब्रह्मपथ, अपरब्रह्मपथ, देवपय । परब्रह्मपथ की ग्रात्मा निराकार ब्रह्म में लीन होकर अपने परिच्छिन्न स्वरूप से निर्मुक्त हो जाती है और भूमा होकर ग्रानन्दघन वन जाती है, और दूसरे अपरब्रह्मपथ की दैवात्मा अपने परिच्छिन्न स्वरूप से निर्मुक्त न होकर भी संसार यात्रा से निर्मुक्त हो जाती है, और साकार ब्रह्म में सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य के भेद से प्रपन्न हो जाता है । इन दोनों गतियों को अपवर्ग मोक्ष कहते हैं । इस गति में जाने वाली श्रात्मा का पृथ्वी में ग्रावागमन नहीं होता, किन्तु तीसरी दवात्मा देवपयी होने से देवलोक में जाती है और वहाँ स्वर्ग का यानन्द भोग करके किश्चित् अवशिष्ट कर्म को लेकर फिर पृथ्वी में जन्म लेती है । इस प्रकार दैवग्रात्मा के तीन भेद सिद्ध होते हैं । इसी प्रकार हंस श्रात्मा भी भूतात्मा का ही रूपांतर है । और वह इस जन्म में ही नयी उत्पन्न होकर देहावसान के पश्चात् इस स्थूलशरीर से सम्बन्ध छोड़कर गन्धर्वयोनि में प्रविष्ट होकर पृथ्वी और [ ३५५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान चन्द्र के मध्याकाश में गन्धर्वलोक में मनुष्यों के अनुसार ही सुख दुःख भोगती हुई अपना जीवन निर्वाह द्वारा करती है | इस ग्रात्मा में मनुष्यों के ११ इन्द्रियों के अतिरिक्त १७ इन्द्रियां अधिक होती है, जिनके योगियों के सब धर्म उसमें स्वभाव से ही विद्यमान रहते हैं । यह ग्रात्मा सात्विक, राजम, तामस के भेद से तीन प्रकार के हैं । सात्विकों को देवता, राजसों की गन्धर्व श्रीर तामसों को भूत कहते हैं । किन्तु साधारण बोलचाल की भाषा में इन तीनों को तीनों शब्दों से प्रायः व्यवहार करते हैं । इसीलिये इन तीनों भेदों के अवान्तर भेदों को लेकर १८ भेद आयुर्वेद के चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट ग्रंथों के भूतोपशम-नीयाध्याय में विशेष रूप से निरूपण किया है । इस प्रकार ये दोनों श्रात्मायें क्षेत्रज्ञे श्रीर भूतात्मा के ही रूपान्तर होने से गौणग्रात्मा है । इन दोनों के अतिरिक्त पांच ग्रात्मा सभी प्राणियों के शरीर में सामान्य रूप से पाई जाती हैं । जिनमें भी चिदात्मा और सूत्रात्मा ये दोनों शरीर का अभिमान न रखने से देही, शरीरी, शारीरक नहीं कहलाते और शेष तीनों शरीर भेद से भिन्न होने के कारण शरीराभिमानी या शरीरी कहलाते हैं । ( सांख्य क्षेत्रज्ञ को अनेक श्रीर वेदान्त इसको एक ही समझता है ) इन पांचो में प्रथम चिदात्मा उस बड़े महासूर्य उत्पन्न होता है । जिस महासूर्य के चारों योर यह हमारा सूर्य परिक्रमा करता है और जिसे इनमें ब्रह्मा या ग्रभिजित् का तारा कहते हैं, उस चिदात्मा के तीन भेद हैं । प्रभु श्रभ्व और सहस्र-आभु उस ग्राधार को कहते हैं जो अखण्ड रूप से सम्पूर्ण जगत् में व्यापक है और प्रशान्त है । और जिस धरातल पर इस सम्पूर्ण जगत् की चिति अर्थात् चुनाव हो रहा है इसलिये उसको चिदात्मा कहते हैं, और वह सर्वत्र विभृ अर्थात् व्यापक है इसलिये आम ( चारों योर ) कहते हैं और यह ज्ञान स्वरूप हैं । इस चित्र या ज्ञान में सर्वत्र एक प्रकार का बल व्याप्त है, जो जल, अग्नि, वायु के अनुसार खण्ड २ बाला है. उन्हीं बल खण्डों के न्यूनाधिक परिमाण से चयन होने पर प्रथम गुणों की उत्पत्ति और फिर गुणों के चयन से भिन्न - भिन्न द्रव्यों की उत्पत्ति हुआ करती है । जो जहां देखते हैं सब कुछ भिन्न-भिन्न बलों का ढेर है । जिन बलों के मेल से वस्तु बनती है उससे अधिक हम कुछ बल आधीन वह करने पर उस वस्तु की हृदयग्रन्थि उधड़ जाती है और वह वस्तु नष्ट हो सकती है, इन्ही बलों को कहते हैं । जां असत् होकर भी बांधनेवला, ग्रात्मा को परतन्त्र करनेवाला एक महा - भयानक तत्व है । इन्हीं अभ्वों के भिन्न - भिन्न मात्रा में चिति अर्थात् चुनाव होने से भिन्न भिन्न ग्रभ्व को -वस्तु के स्वरूप बनते हैं, इसलिये भी विवात्मा कहते हैं । इन दोनों के अतिरिक्त तीसरा और किरण सहस्र है जो कि प्रत्येक वस्तु में पिण्ड का भेद उत्पन्न करता है । जैसा कि सूर्य का विम्ब ओर एक या दीपक की लौ एक पिण्ड है उसके चारों किरण मण्डल जो दीखता है उसे ही बल्कि सहस्र कहते हैं । यह सहस्र प्रकाशवान पदार्थ में ही नहीं होते प्रकाश आदि सभी पदार्थों में समान रूप से । उसमें अपना किरण मण्डल बनाते हैं, वे सब सहस्र है उस पिण्ड से किरण मण्डल की परिधि तक पिण्ड रस भी चिदात्मा का चुनाव होता है इसलिये सहस्र को कहते हैं, । हमारे शरीर के हृदय में जो तिल की पिण्ड बराबर ज्योति रखता हुग्रा हमारी क्षेत्रज्ञात्मा का है उस पिण्ड से शरीर के धर्म तक या बाहर के पदार्थों मण्डल तक जो ग्रात्मरश्मि निकलकर अपना बनाता है उसे ही विद्वानों ने विज्ञान कहा है । हमारे विज्ञान रश्मि मण्डल या बुद्धि हमारी आत्मा का है, जोघट - पट आदि बाहर के विषयों पर जाकर उनका प्रकाश के सहस्र करता है । इसलिये उस आत्मा [ ३५६ ]
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ब्रह्मविज्ञान को विज्ञान कहने से विज्ञान ही, चेतना चैतन्यचिद संवित्यादि , तीन चिदात्मा के शब्दों से व्यवहार करते हैं ॥ इस प्रकार वे स्वरूप हैइन तीन रूपों में विदात्मा सम्पूर्णजगत् में व्यापक है । से भिन्न दूसरा सूत्रात्मा है और है जो कि एक को दूसरे से जोड़ता है सर्वत्र रखते चित्रात्मा क्षेत्रमात्मा यह तत्व व्यापक होकर भी चिदात्मा हैं, उन सब आदि सभी प्रात्मा जो कि अपना भिन्न - भिन्न स्वतन्त्र संस्था से बद श्रमानों हो पर अपना प्रभाव रखता है । इस सूर्य जाती है सूरमा के द्वारा एक आत्मा दूसरी मारमा से और । जिस प्रकार चिदात्मा इस महान् चन्द्र से ईश्वर रूपी सूर्य से या जिस प्रकार क्षेत्रज्ञमात्मा प्रकाश के महान् विशाल करते हैं उस प्रकार यह सुत्रात्मा किसी पिण्ड से नहीं माता किन्तु यह , घन है अथवा आकाश में सर्वत्र यो कहिये व्यापक होकर एक ब्रह्माण्ड को दूसरे ब्रह्माण्ड से भी जोड़ता रहता होने कि यह अन्तरिक्ष पर भी से माता है और वायु स्वरूप है । यह सूचारमा अनन्त प्रकार का मुख्यतया, से और अमृत ३ प्रकार का है मृत्यु को अमृत को मृत्यु सत्य, योजक, श्रद्धा इनमें सत्य वह सूत्रात्मा है जो तत्वोंके समुच्चय से जोड़ता है । तात्पर्य यह है कि जगत् के सभी पदार्थ अमृत और मृत्यु इन दो पृथक रूप हैं । जिन अभिमानी भूतों को हम देखते हैं वे सब मृत्यु रूप हैं । किन्तु इन सब में पृथक्-मृत रूप से है और अग्नि अमृत देवता रहता है जिसके कारण उस वस्तु की सत्ता रहती वह कारण, बाबू, इन्द्र रूप है । इसी है । इन तीनों अमृतों का मृत्य से जो बन्धन अन्य बनी है वह सूत्रामा के प्रकार प्रत्येक शक्तियों और शक्तिमानों वस्तु म कुछ न कुछ शक्ति पाई जाती है उन का परस्पर सम्बन्धभी इसी सुत्रात्माके कारण । कासम्बन्ध से शक्तिमान् कराने वाले । इस प्रकार अमृत, मृत्यु श्रीर शक्ति दोनों सुत्रात्माओं को ' सत्य ' कहते हैं । इसी प्रकार अमृत को अमृत से जोड़ने इनसबमृत्यु को, भृतात्मा ग्रमृतों का मृत्यु से जोड़ने वाला योजक सुत्रात्मा है । जैसा चिदात्मा, क्षेत्रज्ञ बनी , महान् है अमृतों परस्पर एक जो प्राणी शरीर रूपी एक संस्था वह सूत्र में बांधकर का का चन्द्रमा से जो पर-( गोड़नेवाला ) सुत्रात्मा है. श्रीर सूर्य का पृथ्वी से, पृथ्वी मृत्यु से मृत्यु माणुओं का जो परस्पर सम्बन्ध है ये सब को अमृतों स्पर से योजक बन्धन ( का योजक मुत्रात्मा है। से तीसरा सूर्य बन्धन सूत्रात्मा है, जैसा सूर्य की किरणों का है । मिट्टी अवयवों को अवयवी से नित्य सम्बन्ध कराता ऐसे बन्धन जिस सूत्रात्मा का केले पर पृथ्वी है इत्यादि इत्यादि सभी का आकर्षण भूमण्डल उसी है । और श्रद्धान पर रहते पीढ़ी तक सम्बन्ध बना रहता के हुए पुत्रों की आत्माओं के साथ सात से ऊपर चढ़कर पितरों के द्वारा पुत्रों चन्द्रकिरण मार्ग के दिये हुए अन्न पिण्डों का रस रिक्त के अति-जो तीन के तीन भेद सिद्ध होते हैं । इन दोनों श्रात्माओं । इस प्रकार हैं, वे भी प्रत्येक ग्रात्मा सूत्रात्मा के भेद से भिन्न - भिन्न होते शरीरी माने जाते हैं, अर्थात् शरीर श्रात्मा में पहुँच जाता है रोन- तीन प्रकार के हैं " ये तीनों मिलकर एक ज्ञात्मा और विराट है ॥ जैसा कि विज्ञान, इन्द्र अर्थात् मुख्य प्रारण गो, साथ इनमें ज्योति से जब क्षेत्रज्ञ है । ज्योति, सूर्य से आता है उस सूर्य में तीन तत्व ज्ञान , आयुसे इन्द्र और गो से विराट की उत्पत्ति है । [ ३५७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान आकाश के सूर्य में ज्योति श्रादि तीन तत्वों के अनुसार शरीर के सूर्य में विज्ञान, इन्द्र और विराट् ये तीन तत्व होते हैं | इनमें भी ज्योति मनोमय है । आयु प्राणमय है और गौ वाङ्मय है । इसी प्रकार महान् ग्रात्मा जो चन्द्रमा से श्राता है वह भी तीन प्रकार के हैं । श्राकृति, प्रकृति और ग्रहंकृति । तात्पर्य यह है कि ग्रात्मा के ग्रावरण स्वरूप यह शरीर तीन प्रकार के हैं । स्थूल सूक्ष्म और कारण । इनमें स्थूलशरीर को ही प्राकृत कहते हैं, यह सबके बाहर है और स्पष्ट दीचता है, इसी स्थूल साँचे को योनि स्वरूप महान् कहते हैं । किन्तु इसके भीतर जो सूक्ष्म शरीर है उसे ही प्रकृति कहते हैं वह गुण स्वरूप महान् है और उसके भी अन्तर्गत कारणशरीर है, उसे ही अहंकृत कहते हैं, वह विद्या स्वरूप है, महान् है । ये तीनों ही महान् तीनों शरीरों के तीन सांचे हैं जो कि कर्म सूत्र द्वारा भूतात्मा मिले रहते हैं । श्रव तीसरी भूतात्मा जोकि पृथ्वी के रस से उत्पन्न होता है, वह भी तीन प्रकार के हैं - वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ इनमें कहीं केवल वैश्वानर ही रहता है जिन्हें ग्रसंज्ञ बीच कहते हैं जैसा प्रत्तर- पत्थर यादि और कहीं पर वैश्वानर, तैजस ये दो ग्रात्मा होती हैं, उनको अन्तःसंशक कहते हैं । जैसे वृक्षादि और कहीं वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ ये तीनों ग्रात्मा होते हैं उनको ससंज्ञ जीव कहते हैं- जैसे मनुष्य यादि । इनमें वैश्वा-नर सबसे अधिक व्यापक है, उससे कम तेजस और उससे भी कम प्राज्ञ का उद्बोध है | इस प्रकार चिदात्मा, सूत्रात्मा, क्षेत्रज्ञ, महान्, भूतात्मा, दैवग्रात्मा, हंसग्रात्मा इन सातों ग्रात्मायों के तीन तीन भेद होने से कुल २१ ग्रात्मा सिद्ध होते हैं । इन सबका अधिष्ठान स्वरूप यह शरीर वाई-सवीं ग्रात्मा है | इन्हीं बाईस श्रात्मायों की गतिविद्या आगे के प्रकरण में दिखाई जायेंगी । श्रात्मागति परिच्छेद इस आत्मागति परिच्छेद में ८ प्रकरण हैं - १ - गतिस्वरूप, २ - गति-प्रभेद, ३ - गतिनिमित्त, ४ - प्रेत्यस्थिति, ५ - गतिमार्ग, ६ - गन्तव्यलोक या स्थान, ७- भोग और ८ - अर्थवाद । १- गतिस्वरूप श्रात्मा दो प्रकार का है, १ अखण्ड र २ यौगिक । * बिलकुल चले जाने पर ग्रात्मा की दशा अर्थात् शरीर से बाहर निकलने पर श्रात्मा की दशा । L ३५८ ]