ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 391–400
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 391–400
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* ब्रह्मविज्ञान इनमें ग्रखण्ड आत्मा दिक्, देश, काल से अनवच्छिन्न होने के कारण गति नहीं रखता । गति परिच्छिन्न की ही होती है । एक देश को छोड़कर दूसरे देश का ग्रहण करना हो गति है । इसलिये जो तत्व सर्वदेश में एक न्म व्याप्त है उसकी गति कहना असंभव है । इससे जो आत्मा सब आत्माओं में मुख्य है उसके लिये यह गतिविद्या सम्बन्ध नहीं रखती । किन्तु दूसरी जो यौगिक आत्मा है जिनके अनेक भेद गत प्रकरण में कहे जा चुके हैं उन्हीं के सम्बन्ध से यहाँ पर गतिविद्या दिखाई जाती है । यहाँ यह जानना चाहिये कि इन यौगिक आत्माओं में मौलिक या यौगिक जिन तत्वों के योग से यौगिक ग्रात्मसृष्टि हुई है वे सब तत्व जो कि यौगिक आत्मा के अंशरूप हैं, भिन्न - भिन्न स्थानों से आकर एकत्र सम्मिलित होकर यौगिक ग्रात्माओं का रूप बनाते हैं वे नव अंश जिन जिन स्थानों से आते हैं उन स्थानों को उन ग्रंथों का प्रभव या योनि कहते हैं । इन यौगिक आत्माओं में से जब ये भिन्न - भिन्न श्रंश किसी कारण से पृथक् होते हैं तो वे अंश तत्क्षण प्रकृति नियमानुसार अपनी योनि में जा मिलते । इस प्रकार किसी यौगिक आत्मा के भिन्न - भिन्न ग्रंथों का भिन्न - भिन्न अपनी योनि में जाना ही आत्म-गति है, और यही गति इस आत्मगति परिच्छेद में दिखाई जायगी । २ - गतिप्रभेद ग्रात्माओं की गति सब मिलाकर यद्यपि अनेक प्रकार की होती है । किन्तु उनमें से केवल सब से प्रथम, सबसे प्रधान भूतात्मा की ही गति यहाँ दिखाई जाती है । भूतात्मा की गति सब मिलाकर १० प्रकार की हैं । १ - संसारगति, २ अतिमुक्ति, ३ - प्रतिमृत्यु, ४- पञ्चत्व, ५ - ब्राह्मी, ६- दैवी, ७- पॅंत्री, ८ - नारकी, ε– ग्रगति, १० - समवलय । इन दशों में से कोई न कोई गति भूतात्मा की अवश्य होती है । यद्यपि क्षेत्रज्ञग्रात्मा, महान्यात्मा, देवआत्मा, हंसग्रात्मा इन चारों के लिये ये १० गति नहीं कही गई हैं । किन्तु हंसग्रात्मा भी भूतात्मा का रूपान्तर होने के कारण गतिमान् अवश्य है । किन्तु उसका एक ही लोक ( गन्धर्वलोक ) नियत होने के कारण एक ही गति नियत है । इसी प्रकार देवात्मा की भी एक ही गति नियत है | क्षेत्रज्ञ और महान्त्रात्मा इन दोनों की निज स्वरूप से यद्यपि एक ही गति है, किन्तु भूतात्मा के साथ रहने से उन दोनों की अन्यान्यगति भी कितनी ही हो सकती हैं जिनका विशेष वर्णन आगे होगा और चिदात्मा सूत्रात्मा की गति नहीं है । १ - संसारगति भूतात्मा की सब गति मिलकर दो प्रकार की हैं । १ - संसारगति और २ संपररायगति । इस भूतात्मा के यात्रा संचार के लिये तीन ही लोक नियत हैं । १ मनुष्य लोक, २ देवलोक, ३ पितृलोक | इनसे अतिरिक्त ब्रह्मलोक आदि लोकों में गई हुई आत्मा स्थिर हो जाती है, फिर वहां से चलकर लोका-न्तर में नहीं जाती, और उसका इस पृथ्वी में पुनरावर्तन होता है । इसलिए वे सब इस आत्मा के संचार योग्य लोक नहीं है । जब तक ग्रात्मा की मुक्ति न हो तब तक यह आत्मा मनुष्य लोक प्रादि तीनों लोकों * प्रननिर + ग्रवच्छिन्न । [ ३५ ९ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कै में कहीं न कहीं ग्रवश्य रहती है । उन तीनों में से देवलोक, पितृलोक के जिस प्रकार बहुत से भेद हैं, उसी प्रकार इस मनुष्यलोक में भी ब्रह्मा से लेकर स्तम्ब - पर्यन्त बहुतसी योनियां हैं समास और व्यास, १४ भूतसर्ग अथवा ८४ लाख योनि जिनमें यह जीवात्मा जनमकर, मरकर एक योनि में भ्रमण करता रहता है यही योनि " परिवर्तन " मनुष्यलोक में इस जीवात्मा की संसारगति हैं । संसार का अर्थ संसरण श्रर्थात् जन्म मृत्यु के द्वारा एक योनि से दूसरी योनि में नियति ( नियम ) के साथ सरकना ही संसार है । जिन - जिन कर्मों के द्वारा जिन - जिन योनियों में जिस - जिस प्रकार यह ग्रात्मा संसार गति पाता है, वह संसार गति की कर्मगति मनुस्मृति १२ ग्रव्याय में विशद्रूप से दिखाई गई है । इस संसार गति के अतिरिक्त भूतात्मा की जितनी गतियां हैं उन सब को सम्परायगति कहते हैं । ( नित्यगति ) सम्परायगति सब मिलकर दो प्रकार की है । नित्यगति और कालगति । नित्यगति को संसृति और कालगति को देहान्त कहते हैं । तात्पर्य यह है कि इस प्राणी का शरीर भिन्न - भिन्न नाना पदार्थों के एकत्र मिलने से या उनके परस्पर बन्धन से उत्पन्न होता है । इस बन्धन को हृद्ग्रन्थि बन्धन कहते हैं | इसी हृद्ग्रन्थि के उघड़ने से या इस बन्धन के खुलने से ग्रात्मा की मुक्ति कही जाती है । परन्तु स्मरण रहे कि इस हृद्ग्रन्थि की गांठ में जो तत्त्व गठे हुए हैं, और जिनका बन्धन है वे सब तत्त्व प्रतिक्षण ग्रन्थि से उधड़कर बन्धन से मुक्त होकर ग्रपनी अपनी योनि में जाते रहते हैं और उनकी जगह दूसरे तत्व आ-आ कर उनके ब'धन या ग्रन्थि स्थान को पूर्ण करते हैं । जिस प्रकार दीपक की ली में ग्रङ्गिरा की धारा तेल से ग्राकर सूर्य से प्राते हुए ग्रादित्य प्रारण के साथ ग्रन्थि में बद्ध होता है उसी ग्रन्थिबन्धन से प्रकाश का स्वरूप ‘ लो ' के रूप में उत्पन्न होता है । परन्तु जिन का वन्धन होता है वे प्रतिक्षरण निकलते रहते हैं, किन्तु उनका स्थान दूसरे श्रङ्गिरा और ग्रादित्यप्राण पूरा करते रहते हैं । काच या पानी में सूर्य का बिम्ब जिन - जिन रश्मियों से उत्पन्न होता है, वे रश्मियां प्रतिक्षण बदलती रहती हैं किन्तु उनका स्थान दूसरी रश्मियों से पूर्ण होते रहने के कारण प्रतिविम्ब स्थिर दीखता है । किसी नदी के किसी तीर्थ पर या उसके पाट पर जिन जलों को इस समय देखते हैं वे जल दूसरे ही क्षण में नहीं रहते । किन्तु उनका स्थान जलों से पूरा रहने के कारण सहस्रों वर्षों से उस तीर्थ में उस धारा की स्थिति मानी जाती है । तात्पर्यं यह जिस प्रकार राजा बदलता है, पहरायती बदलता है, किन्तु गद्दी या पहरे का नियम नहीं बदलता उसी प्रकार इस शरीर में भी शरीर के बनाने वाले भूत और देवता अपने - अपने ग्रंथिबन्धन से निर्मुक्त होकर प्रतिक्षण गति करते रहते हैं । किन्तु दूसरे भूत और देवताओं से स्थान की पूर्ति होने के कारण शरीर की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई दीखती है । तात्पर्य यह है कि बंधे हुए पदार्थ प्रतिक्षण लुटते रहते | किन्तु ग्रन्थि या वन्धन नहीं छूटता, बस इसी कारण दो गति सिद्ध होती हैं । यदि ग्रन्थि या बन्धन छूट जाय तो उसे कालगति या देहान्त कहेंगे । किन्तु ग्रन्थि या वन्धन न छूटकर बंधे हुए तत्व ग्रन्थि से छूटते हैं तो उसी गति को नित्यगति या संसृप्ति कहते हैं । * मनुष्यलोक से ग्रन्य लोकों में जाना । [ ३६० ]
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ब्रह्मविज्ञान २- प्रतिमुक्ति = भूतगति यह नित्यगति दो प्रकार की है । भूतगति और देवगति । क्योंकि प्रत्येक प्राणी आत्मा और शरीर इन दोनों के संयोग से बना हुआ है । इनमें ग्रात्मा पांच देवताओं से और शरीर पांच भूतों से बना हुआ है । इस आत्मा और शरीर का जब तक परस्पर घनिष्ठ संबन्ध बना रहता है, तभी तक प्राणी का जीवन है । इन दोनों में प्रतिक्षण नित्यगति हुआ करती है, जिसके कारण शरीर से पञ्चभूत, आत्मा के देवताओं से पृथक् होकर निकलने रहते हैं । और वे वायु में जाकर क्रम से पांचों भुत पृथ्वी के पांचों भूतों में मिलते रहते हैं । इसी प्रकार आत्मा के पांचों देवता भी शरीर के पांचों भूतों से पृथक् होकर आकाश के बांचों देवनायों में सम्मिलित होते रहते हैं । किन्तु इस नित्यगति में विशेषता यह होती है कि शरीर के धातु पञ्चभूतमय होने पर भी शरीर में उनके स्वरूप आध्यात्मिक हो जाते हैं, जो कि लोम, त्वचा, रक्त. मांन, वगा, अस्थि, मज्जा, शुक्र ये सब देवता से सम्बन्ध छोड़ने पर अपने आध्यात्मिक स्वरूपों से च्युत होकर पृथ्वी के पञ्चभूतों के स्वरूप में या जाते हैं । इस प्रकार शारीरक धातुओं का देवताओंों से सम्बन्ध टूटकर पृथ्वी वाले भूतों के स्वरूप में आ जाने को अतिमुक्ति कहते हैं । ( ३ - अतिमृत्यु = देवगति ) देवता और भूत इन दोनों के संयोग से जैसे भूतों का आध्यात्मिक रूप भिन्न होता है, उसी प्रकार पञ्चदेवताओं का भी यह श्राध्यात्मिक रूप भिन्न हो जाता है । वह अग्नि, वायु, सूर्य, दिकू, चन्द्र इन पाँचों देवताओं का आध्यात्मिक रूप क्रम से इस प्रकार है । वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत और मन जब ये पाँचों इन्द्रियां नित्य गति के कारण शरीर के भूतों से पृथक् होते हैं, तो उनका उस समय यह ग्राध्या-त्मिक रूप का भी सङ्गठन निवृत्त हो जाता है और वाक् अग्नि के रूप में आ जाता है । इसी प्रकार प्राण आदि भी वायु आदि देवताओंों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं । इस प्रकार इन्द्रियों के देवता रूप में परिवर्तन होने को ही के " प्रतिमृत्युगति " कहते हैं । मृत्युरूपी भूत के बन्धन से अमृत रूपी देवताओं का अतिक्रान्त ( छुटकारा ) होना ही प्रतिमृत्यु कहलाता है । ( ४ - पंचत्व = भूतगति ) पूर्व में संपरायगति के नित्यगति और कालगति इस प्रकार दो भेद कहे गये थे । जिनमें नित्यगति के दो भेद जिस प्रकार ऊपर दिखायें गये हैं उसी प्रकार कालगति के भी दो भेद हैं, भुतगति और प्राण-गति । पञ्चभूतों का बना हुआ शरीर और पञ्चप्रारणों से बनी हुई ग्रात्मा इन दोनों का परस्पर जो सुत्रा-त्मा के द्वारा संबन्ध है वह सूत्रात्मा के शिथिल होने से टूटकर जब पृथक् - पृथक् दोनों हो जाते हैं तो इस शरीर के पांचों भूत इस पृथ्वी के पांचों भूतों में जुदे २ मिलकर लीन हो जाते हैं । अर्थात् एक शरीर पांच जगह बट जाता है । इसी एक के पांच होने को ' पञ्चत्व ' कहते हैं । पञ्चत्व होने की पुरानी बुद्धि श्रव नहीं रहती, इसलिये इस पञ्चत्व की देहान्त भी कहते है । * प्रति = परेजाना [ ३६१ ।
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* ब्रह्मविज्ञान ( प्रारणगति - उत्क्रान्ति के ४ भेद हैं ) अब दूसरी प्राणगति को उत्क्रान्ति कहते हैं । जिस प्रकार पञ्चत्व में पांचों भूतों का शरीर श्रात्मासे पृथक् हो जाता है, उसी प्रकार पांचों देवों की आत्मा भी शरीर से पृथक हो जाती है । किन्तु यह विशेष है कि शरीर के पाँचों भूत अलग होकर पांच जगह बट जाते हैं । परन्तु ग्रात्मा के पाँचों देवता अलग होकर भी अपने प्रभव के रूप में पाँच जगह नहीं बटते! हमारी इस भूतात्मा में काम कर्म, शुक्र आदि विद्या के द्वारा जो पांचों देवताओं की हृदग्रन्थि बन्धन हो रहा है वह मुक्ति के पहले विद्या का निवृत्ति न होने से टूटने नहीं पाता, इसलिये वहु पाँचों देवताओं की बनी हुई ग्रात्मा शरीर से पृथक् होकर भी पूर्ववत् परस्पर जुडे हुए रूप में कर्मगति से कही की कही परिभ्रमण करती रहती है । वह पृथ्वी को छोड़कर ऊपर को देवलोक या पितृलोक में जाती है, इसलिये उस जाने को प्राप् की उत्क्रान्ति गति कहते हैं । यह उत्क्रान्तिगति दो मार्गों में होती है । देवयाण, पितृयाण । किन्तु देवगण के दो शाखाएँ हैं । १ – ब्रह्मपथ, २ – देवपथ । ब्रह्मपथ में जाने से मुक्ति होती है और देवपथ में जाने से दैवत स्वर्ग होता है । इसी प्रकार पितृयाण की भी २ शाखाएं हैं ३ - पितृपथ और ४- नरकपथ । इनमें पितृषय से पितृस्वर्ग को जाता है और नरकपथ से नरक को । इसी भेद के कारण उत्क्रान्ति ४ प्रकार की होती हैं । ( ५- ब्रह्मगति, ६- दैवीगति, ७ - पैत्रीगति, ८- नारकीगति, ६- प्रगति ) श्रव यहाँ यह विषय जानना आवश्यक है कि ग्रात्मा में गति से अधिक संबन्ध है । विशेषतः इस ग्रात्मा में जितना कर्म विद्या और कर्म इन दोनों धर्मों का इस का कषाय बढ़ता जाता है, उतनी ही आत्माकषाय के परतन्त्र होकर उसी के अनुसार न्यूनाधिक ऊपर नीचे गति पाता है । किन्तु विद्या या ज्ञान की वृद्धि से वह कषाय निवृत होकर आत्मा को विशुद्ध बनाता है, तो उस समय श्रात्मा का निज स्वरूप जो विद्या है वह प्रबल होकर ग्रात्मा व्यापक बन जाती है, जिससे आत्मा का गति क्रम भी जाता रहता है । तात्पर्य यह है कि श्रात्मा में विद्या और कर्म इन दोनों का न्यूनाधिक से समुच्चय रहता है, तब तक आत्मा की गति होती है । जिसमें विद्या की अधिकता से ऊर्ध्वगति या स्वर्गगति और कर्म की अधिकता से अधोगति या नरकगति होती है । किन्तु दोनों दशा में ग्रात्मा विद्या और कर्म से युक्त रहता है | किन्तु यदि इस प्राणी के इन्द्रिय युक्त चेतन संसार में जन्म होने की क्षुदतम ( बहुत छोटी ) निकृष्ट कर्मों की इतनी प्रबलता हो जावें कि जिसे ग्रात्मा की विद्या का अत्यन्त न्यून ग्राभास होता हो अथवा नष्ट हो गया हो तो इन दोनों दशानों में ग्रात्मा अत्यन्त दुर्बल और कर्म के कपाय का भार अत्यन्त प्रबल हो जाने से भी ग्रात्मा की ऊर्ध्वगति या अधोगति दोनों बन्ध हो जाती हैं । इन दोनों में विद्या का ग्राभास रहने की दशा में नीचे के वे क्षुद्र जीव उत्पन्न होते हैं, जिनमें अस्थि नहीं होती जैसे दंश ( डाँस ) मशक ( मच्छर ) यूका ( जू ) लिक्षा ( लीख ) मत्कुण ( उटकरण ) आदि और दूसरे जिनमें विद्या का कुछ भी आभास नहीं है । कर्म के दबाव से सर्वथा विद्या का आवरण रहता है वह सोती हुई ग्रात्मा श्रौषधि फल देने पर मर जाता है वनस्पति यादि इन दोनों प्रकार के जीवों की अगति होती है । ग्रर्थात् ये जीव [ ३६२ ]
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ब्रह्मविज्ञान इसी पृथ्वी में जन्मते मरते, योनि बदलते रहते हैं । किन्तु पृथ्वी को छोड़कर ऊपर को सबसे समीप चन्द्रमा में भी नहीं जाते और न कही नीचे के लोकों में जाते हैं । यदि ये प्रगति वाले जीव भी दैवयोग से ऐसा सुयोग प्राप्त करें कि धीरे - धीरे ऊंचे वृक्ष गुलर इत्यादि उत्पन्न होकर कुछ - कुछ अंशों से कृमि, कीट वन जाय और फिर उसी सुयोग कर्म से अस्थि वाले जीव की दशा आ जाय तो फिर गति के मार्ग में ऊपर या नीचे जाने योग्य हो जाता है । किन्तु जब तक वृक्ष की या अनस्थि की दशा रहती है तब तक उनकी गति को अगति ही कहते हैं । ( १० - समवलय ) पहले कहा जा चुका है कि विद्या और कर्म ये दोनों ग्रात्म धर्म ग्रात्म गति के कारण है । विद्या और कर्म ये दोनों परस्पर के तारतम्य से आत्मा में रहते हैं । कभी विद्या बढ़ जाती और कभी कर्म बढ़ जाता है । दोनों ही दोनों के परम विरोधी प्रबल शत्रु हैं, तथापि ये दोनों प्रायः अव्यभिचार से सहचरित ही ग्रात्मा में रहते हैं, इतना विशेष है कि विद्या श्रात्मा का स्वरूप है, किन्तु कर्म उसमें श्रागन्तुक है । विद्या की विरोधी ग्रविद्या जो कि ग्रनिर्वचनीय रूप से ग्रात्मा में प्रकस्मात् उत्पन्न होती है और जो श्रात्मा से भिन्नाभिन्न हैं उसी के द्वारा ग्रात्मा में क्लेश, कर्म, विपाक, आशय उत्पन्न हो जाते हैं । यही सब उस विद्या का मुख्य स्वरूप हैं । इसलिये विद्या इन का विरोध करती है । जितनी ही विद्या बढ़ती है उतना ही कर्म का वल घटता रहता है । यदि विद्या का प्रभाव आत्यन्तिक पराकष्ठा को पहुंच जाय तो सब कर्म निः शेष विलुप्त हो जाते हैं, और ग्रात्म विशुद्ध हो जाता है । किन्तु इसके विपरीत कर्म कितना भी बढ़जाय विद्या का नाश नहीं होता । केवल कर्म जन्य, कषाय से उसका प्रावरण होता है । आवरण की मात्रा बढ़ते - बढ़ते संभव हो जाता है कि विद्या पूर्ण श्रावृत्त होकर विलुप्त प्रायः हो जाय ऐसी अवस्था में यद्यपि उसमें किसी प्रकार का ज्ञान अणुमात्र भी नहीं होता तथापि वह दूसरे के ज्ञान का प्रमेय अवश्य रहता है | ज्ञान का विषय होकर विद्या से विषय संबन्ध अवश्य रहता है, किन्तु उसमें स्वयं बुद्धि न होने से विद्या काल लोप कह सकते हैं । इस प्रकार इस ग्रात्मा की तीन अवस्था सिद्ध होती हैं । एक वह जिस में कर्म ह्रीं कर्म है, कर्म के प्रावरण से विद्या लुप्तवत् हो गई है दूसरी अवस्था वह है, जिसमें विद्या और कर्म दोनों तारतम्य से विद्यमान दीखते हैं । और तीसरी अवस्था वह है, जिसमें कर्म सर्वथा लुप्त होकर विशुद्ध विद्या रूप ग्रात्मा रहता जाता है । इन तीनों में दूसरी जो मध्यम अवस्था है, जिसमें विद्या और कर्म इन दोनों का समुच्चय है केवल उसी अवस्था में आत्मा की गति होती है । जिसमें भी विद्या की अधिकता से उर्व्वगति या स्वर्गगति होती है और कर्म की अधिकता से अधोगति या नरकगति होती है । इस मध्यम अवस्था को छोड़कर शेष दोनों प्रान्त ( छोर ) में आत्म गति शून्य हो जाती है । कर्म की अधिकता में कषाय के भार से ग्रात्मा इतनी भारी हो जाती है कि उसमें स्तम्भन ( ठहराव जैसे पत्थर ) होने से गति रहित हो जाती है, उसको भी उपरोक्त अनुसार अगति ही कहते हैं । किन्तु दूसरी छोर में जब कर्म का सर्वथा लोप होकर आत्मा विशुद्ध हो जाता है तो उस व्यापक आत्मा को सीमा बद्ध परिच्छिन्न बनाने वाला कर्म नष्ट हो जाता है । इसलिये घड़ा फूटने से घटाकाश के अनुसार कर्म आवरण के क्षय होने से जीवात्मा भी अपने स्वरूप में लय होकर व्यापक हो जाता है । व्यापक की गति होना असंभव है, इसलिये उसकी गति नहीं होती । इसी ग्रभिप्राय से उस निष्कर्म आत्मा के लिये वेद कहता है-[ ३६३ ]
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* ब्रह्मविज्ञान न तस्य प्रारणाः उत्क्रामन्ति, अत्रैव समवलीयन्ते अर्थात् उस ग्रात्मा का उत्क्रमण नहीं होता, यहाँ ही वह ग्रात्मा परमात्मा में मिल जाता है । इस प्रकार स्वर्ग या नर्क किसी भी लोक में ऊपर या नीचे कहीं न जाकर जो परिच्छिन्न क्षुद्र यह जीवात्मा अपने ही स्थान में सर्वजगत् व्यापकता को पा जाता है, उसी को समवलय गति कहते हैं । ( सम = ग्रच्छी तरह ) ग्रव = वहाँ का वहाँ, लय = ( लीन होना ) । अभी यह कहा गया है कि कर्म से विद्या नष्ट नहीं होती, किन्तु विद्या से कर्म आत्यन्तिक नष्ट हो जाता है, किन्तु यह एक मत है । इसके विरुद्ध दूसरा मत यह है, कि जिस प्रकार कर्म से विद्या नष्ट नहीं होती, उसी प्रकार विद्या से कर्म भी नष्ट नहीं होता । विद्या और कर्म ये दोनों ग्रात्मा के नित्य धर्म हैं, इन दोनों से ग्रात्मा कदापि शून्य नहीं होता । इन दोनों का परस्पर सहचार भी नित्य है । एक के बिना दूसरा कदापि नहीं रह सकता, तो ऐसी स्थिति में ग्रात्मा की मुक्ति कैसे होती है? यह प्रश्न है । इसके उत्तर के लिये दूसरे मत का स्वरूप विशद रूप से दिखाया जाता है इस मत में ग्रात्मा दो भाग से बना है, जिसका एक भाग अमृत और दूसरा मृत्यु है । अमृत को विद्या और मृत्यु को ग्रविद्या कहते हैं । विद्या और विद्या दोनों मिलकर एक आत्मा का स्वरूप सिद्ध होता है । इन में विद्या जिस प्रकार ज्ञान स्वरूप है, उसी प्रकार विद्या भी ज्ञान स्वरूप है । विशेषता यह है कि विद्या अविनाशी, अखण्ड व्यापक, ग्रनवच्छिन्न एक तत्व है । किन्तु ग्रविद्या विनश्वर, सखण्ड दैशिक, परिच्छिन्न तत्व है संसार में एकत्व अनेकत्व ये दोनों भाव प्रत्येक वस्तु में देखे जाते हैं, क्योंकि १०० वर्ष की प्रायु में, बाल्य, युवा, जरा यादि अवस्थाओंों के द्वारा अनेक भेद रहने पर भी वह एक ही मनुष्य माना जाता है । ३- गतिनिमित्त ४ - ज्ञानरूपी विद्या - प्रविद्या ) इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु में एक विद्या के संबन्ध से एकत्व और अविद्या की अनेकता से अनेकत्व सर्वत्र देखे जाते हैं इन दोनों में परिच्छिन्न ग्रविद्या के संयोग से अपरिच्छिन्न विद्या में भी परिच्छेद हो जाता है । अखण्ड बिद्या भी खण्ड - खण्ड हो जाती है उन प्रत्येक खण्डों को मन कहते हैं । विद्या पर यह अविद्या का पहला प्रभाव है, जिस से अपरिच्छिन्न भी परिच्छिन्न हो जाता है । फिर इस मन पर अविद्या का प्राघात होता है, जिसके द्वारा प्रकाशवान् मन ग्रप्रकाश हो जाता है । प्रकाश की अवस्था में जो मन शान्त था वह अब ग्रप्रकाश की दशा में प्रशान्त प्रर्थात् क्षुब्ध हो जाता है । इसी प्रकार भिन्न स्वभाव होने के कारण वह मन न कहला कर प्राण कहलाता है । इस प्राण पर तीसरी बार विद्या का श्राघात पड़ने पर दो प्राण ग्रथवा अनेक प्राण परस्पर मिलकर एक दूसरे को मार कर एक नया मृतक तत्व बन जाता है । ग्रर्थान् जिस प्रकार प्राण कुर्वद्र प था ( करती हुई हालत ) प्रतिक्षण चेष्टा करता था वैसा ग्रब न कर सर्वथा ग्रकर्मण्य, निश्चेष्ट हो गया इस दशा को वाक् कहते हैं । ग्रर्थात् जो व्यापक ग्रात्मा थी वह खण्ड - खण्ड होकर प्रथम मन, फिर प्राण और अन्त में वाक् हो गयी । अविद्या के प्रभाव से एक ही विद्या के मन, प्राण, वाक् के तीन रूप हो गये । अव इन तीनों के प्रभाव से अविद्या के भी तीन रूप हो [ ३६४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * जाते हैं । जिस ग्रविद्या पर मन का संसर्ग हुग्रा वह काम कहलाता है और प्राण के संसर्ग से वही अविद्या कर्म कहा जाता है | और वाक् के संसर्ग से वही प्रविद्या शुक्र या क्लेश कहलाता है । जब कि विद्या और अविद्या ये दोनों एक ही आत्मा के दो भाग हैं तब विद्या के तीनों भेद मन, प्राण, वाक् और अविद्या के तीनों भेद काम, कर्म, शुक्र ये छत्रों धर्म आत्मा के स्वरूप से पृथक् नहीं हो सकते । इसलिये मुक्ति की दशा में यह कहना कि विद्या के प्रभाव से काम, कर्म, क्लेश तीनों आत्मा में से सर्वथा छूट जाते हैं यह भूल है, मिथ्या है । तो ऐसी दशा में जिस प्रकार संसार में जीव आत्मा छः धर्म वाला है तो मुक्ति दशा मे मी वैसा ही रहेगा तो फिर मुक्ति किसे कहना चाहिये, इसका उत्तर इस प्रकार है । २ - कर्मरूपी विद्या, अविद्या विद्या और अविद्या जो आत्मा के दो भाग कहे गये हैं उनमें व्यापक होने से अविद्या छोटी बड़ी कम ज्यादा हो सकती है । उसी के प्रभाव से विद्या भी छोटी बड़ी कम ज्यादा हो जाया करती है । कम अविद्या होने से ग्रावरण थोड़ा होता है, इसलिये विद्या भाग अधिक और अविद्या कम ऐसी दशा में आत्मा को ईश्वर या परमात्मा कहते हैं । किन्तु यदि अविद्या का प्रभाव अधिक हो तो आवरण अधिक होने से विद्या के छोटे २ खण्ड हो जाते हैं उनमें विद्या की अपेक्षा अविद्या अधिक होने से उस दशा में आत्मा को जीवात्मा कहते हैं | जीवात्मा में सृष्टि की इच्छा की अपेक्षा भोग की इच्छा अधिक होती है क्योंकि अपूर्ण होने से बह् आत्मा पूर्णता के लिये जो अपने में बाहर से सामग्री लेने की इच्छा करता है वही भोग का इच्छा है । किन्तु ईश्वर या परमात्मा में जीव की अपेक्षा पूर्णता अधिक है, इसलिये भोग की इच्छा कम होकर उदारता से अपनी शक्ति का फैलाव करके नई २ वस्तु की सृष्टि की ईच्छा अधिक होती है । जीव में अविद्या और ईश्वर में विद्या अधिक होती है, इसलिये अविद्या के सम्बन्ध से जो काम, कर्म, शुक्र या क्लेश बताये गये थे वे जीव में ही समझने चाहिये किन्तु रचने वाले ईश्वर में विद्या अधिक होने से सृष्टि के अनुकूल तीन भाव उत्पन्न होते हैं । इच्छा, तप और श्रम ये तीनों भी मन, प्राण और वाक् इन्हीं तीनों से सम्बन्ध रखते हैं | आत्मा के वाक् भाग में मन के प्रभाव से इच्छा और उसी वाक् में प्राण के प्रभाव को तप, और इच्छा और तप के सम्बन्ध से वाक् की शान्ति भङ्ग होकर नये रूप धारण के लिये जो क्षोभ है उसे ही श्रम कहते हैं । इच्छा, तप, श्रम इन तीनों के बिना कोई भी सृष्टि नहीं होती । वाक् खण्ड रूप होने से ग्रनन्त मात्रा में होती है । प्रत्येक मात्रा में आत्मा के मन के संयोग से इच्छा उत्पन्न होती है, उसको अशनाया कहते हैं । अर्थात् एक एक वाक् का परमाणु अन्यान्य सब परमाणु को अपने उदर में लेने के लिये अपनी और आकर्षण करता है । यही आकर्षण शक्ति वाक् परमाणु के प्रत्येक में श्रशनाया कहा जाता है इस की इच्छा के कारण प्रत्येक परमाणु दूसरे परमाणुओं पर आक्रमण करके जो परस्पर का संघर्षण पैदा करता है, उस से सब परमाणु गर्म हो जाते हैं इसी अवस्था को तप कहते है । इसी तप से जो उन में परिपाक होने लगती है, वह जब तक प्रथम रूप को छोड़कर वैकारिक नये रूप की पूर्ण रूप से धारण करले तब तक बीच की अवस्था के क्षोभ को ही श्रम कहते हैं । इसी परि-पाटी ( तरीके ) से ईश्वर अपने वाक् से अनन्तानन्त प्रकार की सृष्टियां करता रहता है, जिनमें वाक् समवायि कारण है, प्राण श्रसमवायि कारण है और मन निमित्त कारण है । इन सृष्टियों में अभूतपूर्वं [ ३६५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ( पहले ) नहीं था नया कोई अर्थ नहीं उत्पन्न होता केवल वाक् के खण्डों का जो परस्पर संसर्ग. ( एक होना ) होता है वही नया रूप धारण कर लेता है । इसीलिये नई वस्तु की रचना को संसर्ग या संसृष्टि कहने के अभिप्राय से सर्ग या सृष्टि कहा करते हैं । यह संसर्ग दो प्रकार का है । एक संयोगरूप जिसमें कोई नई चीज नहीं बनती और यह संयोग वाक् के प्रत्येक परमाणु का नित्य ही बना रहता है । क्योंकि वाक् के सब परमाणु एक ही श्रात्मा में एकत्र मिलकर ही सदा रहते हैं । किन्तु दूसरा संसर्ग दो तत्त्वों का एक विलक्षण संयोग है जिसमें दोनों तत्त्वों के प्राचीन रूप नष्ट एक नया रूप ग्रा जाता है । इस संसर्ग को हम चिति या चयन शब्द से व्यव-हार करते हैं । जब वाक् के एक परमाणु के स्थान में ही दूसरा परमाणु रख दिया जाय तो वह परमाणु पर परमाणु की चिति कही जायगी । एक ही स्थान पर दो परमाणु का रहना असंभव होता है, किन्तु बल दोनों परमाणुओंों की एक परमाणु के स्थान में रखना चाहता है । इसीलिये पुराने दोनों रूप नष्ट हो कर नया एक ही ऐसा परमाणु बन जाता है जो उस संकुचित परमाणु स्थान में बैठ सकें यही चिति या चयन संपूर्ण नई वस्तुओं की उत्पत्तियों का प्रर्थात् तात्विक सृष्टियों का मूल कारण है । शब्द, वायु, तेज, जल, पृथ्वी इन पांचों तत्वों की सृष्टियां ऐसी प्रकार की चितियों से हुई है और इस प्रकार के तत्वों से जव कि वर्धमान् अर्थात् बड़ने वाली चिति की जाती है, तो उससे यौगिक सृष्टियां होती हैं जैसे वृक्ष, वस्त्र आदि । हम सृष्टि के पदार्थों को अनन्तरूप में देखते हैं इसलिये श्रवश्य ही ये चितियां भी अनन्त प्रकार की कही जा सकती हैं किन्तु उनमें से यहां केवल तीन ही ऐसी चितियां कही जायेंगी जिनसे जीव की सृष्टि हुई है औौर जिनसे जीव ग्रात्मा की गतियों का सम्बन्ध है वे तीन चिति ये हैं । जीव चिति, देव चिति, भूत चिति । पहले ज्ञान के रूप में विद्या और अविद्या कही गई है, जिनमें विद्या विशुद्ध ज्ञान स्वरूप है, निर्विकल्पक है वह किसी भी विषयों को ग्रहण नहीं करता इसलिये निर्विषयक है और वास्तव में वही ब्रह्म-स्वरूप है | उसके साथ की ग्रविद्या भी ज्ञान स्वरूप है, किन्तु विशेष यह है कि विद्या प्रखण्ड है और यह अविद्या सखण्ड है । विद्या शुद्ध है, अविद्या मलिन है - विद्या निःसंग, निर्लेप और एक रस एक रूप है । किन्तु अविद्या संगवाला, भिन्नरस नाना रूप हैं । किन्तु अब हम यह उस विद्या अविद्या का वर्णन करेंगे जो कर्म रूप हैं । आत्मा के मन, प्राण, वाद में मन और वाक् दोनों निष्क्रिय हैं, प्राण के ही द्वारा उनमें क्रिया होती है । यदि प्रारण मन के पेट में जाता है तो कुर्वद्र प वाक् ही विद्या कहलाती है । इन दोनों विद्या और विद्या में ग्रविद्या तीन प्रकार की होती है, काम, कर्म और शुक्र या क्लेश इन तीनों श्रविद्या धर्मों का प्रारम्भण, ( उत्पादन ) बन्धन और स्थिति इसी कर्म रूपी प्रविद्या के द्वारा जीव आत्मा में ये तीनों धर्म प्रारब्ध ( पैदा होना ) होते रहते हैं । और उनका आत्मा का साथ सम्बन्ध होता रहता है और जब तक मोक्ष न हो तब तक जीव ग्रात्मा में उन काम, कर्म शुक्रों की स्थिति का सिलसिला बना रहता है | किन्तु साथ हो दूसरी विद्या इन तीनों का निरोध ( रोकना ) उद्बन्धन ( उघड़ना ) और क्षय करती रहती है जिनके कारण जीव ग्रात्मा में काम, कर्म, क्लेशों की प्रवृत्ति, निवृत्ति दोनों साथ ही निरन्तर होते रहते हैं । श्रविद्या की अधिकता से जीव ग्रात्मा अधिकतर फंसता रहता हैं । किन्तु विद्या की अधिकता से धीरे - धीरे उन तीनों से मुक्त भी हो जाता है । इस प्रकार प्रवृत्ति और [ ३६६ ।
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बहाविज्ञान ड निवृनि इस प्रकार जटिल ( फें हुये ) हैं, कि उन दोनों में कब, कौन कितनी होगी यह नियम पूर्वक नही कहा जा सकता | किन्तु ये दोनों जीव आत्मा में तारतम्य से रहते अवश्य हैं । इन्हीं काम, कर्म, शुक्रों के द्वारा जीव ग्रात्मा में पद् उमिया ( जन्म मृत्यु आदान, विसर्ग, सुख, दुःख ) पैदा होते हैं । इस प्रकार ६ उर्मियां को पैदा करने वाले काम, कर्म, वेश ये तीनों जीव आत्मा में जिन विद्या अविद्या के द्वारा उत्पन्न हो हो कर नष्ट होते रहते है. वहीं दोनों इस आत्मा में बीज चिति हैं । इसके अतिरिक्त इस आत्मा में गायत्री रूप से देव चिति होती है । अर्थात् चित् ईश्वर, ब्रह्म, सूर्य, चन्द्र पृथ्वी इन ६ अक्षरों का वाक्, पिण्ड, शरीर, हृदय उन चार पादों से गायत्री का रूप सिद्ध होता है । जैसे पृथ्वी का रथन्तर साम चन्द्रमा का राजन साम है, सूर्य का बृहत् साग है, इन साम मण्डलों को ही वाक् कहते हैं । किन्तु पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य यादि गोलों को पिण्ड कहते हैं और हमारा शरीर उन छनों वाक् या पिण्डों, से पृथक् - पृथक् साक्षात् सम्बन्ध रखते हैं । शरीर के द्वारा फिर हृदय में उन छओं का सम्बन्ध होता रहता है । ये सब साम मण्डल अपने - अपने विम्ब मण्डलों के अर्थात् पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य आदि पिण्डों के छाया मण्डल हैं । इस प्रकार हृदय में ६ देवताओं का सर्वदा मंजय होना ही देव चिति कहलाती है । इसके उपरान्त शुक्र, मज्जा, अस्थि, मेदा, मांस, रक्त, रस, त्वचा और लोम इस प्रकार भूत चिति होकर आत्मा ने शरीर धारण करलिया है । यह शरीर स्थूल है, इसके भीतर देव चिति सूक्ष्म शरीर है, उसके भीतर बीज चिति कारण शरीर है इन तीनों आवरणों से परिवेष्टित ( घिरा हुआ ) भीतर ही भीतर को जीव की आत्मा है इनमें बीज चिति के कारण ही जीव आत्मा की सृष्टि होती है । अर्थात् स्वरूप बनता है और उसमें देव चिति से उन छनों देवताओं के पास इस ग्रात्मा का चला जाना ही गति है यदि आत्मा में देव चिति न होती तो इस आत्मा की किसी भी देवता के लोक में गति नहीं हो सकती । इसलिये देव चिति ही जीव आत्मा की गति का निमित्त है । ज्ञानस्वरूप विद्या और अविद्या ये दोनों ही इस मत में नित्य माने जाते हैं । अर्थात् विद्या के अनुसार अविद्या का भी नाश कदापि नहीं होता, ये दोनों ही सदा मिले रहते हैं और इन दोनों के मिले रूप को ही ब्रह्म कहते हैं । किन्तु विशेषता यह है कि विद्या और अविद्या इन दोनों भागों का समर्ग सदा बने रहने पर भी उस संसर्ग की स्थिति दो प्रकार की होती रहती है । सहचर संसर्ग और चिति संसर्ग, सहचर संसर्ग में अविद्या के स्वरूप काम, कर्म, शुक्र, क्लेश, आदि ( ऊर्मि ) ये सब एक साथ ले रहने से विद्या भाग में भी कहे जा सकते हैं । किन्तु उनका प्रभाव किंचित् भी विद्या पर नहीं पड़ता । तात्पर्य यह है कि विद्या और अविद्या इन दोनों के संसर्ग में जो न्यूनाधिकता होती रहती है, उसमें कोई एक सीमा ऐसी नियत है कि उस सीमा से न्यून ग्रविद्या रहने पर उसका प्रभाव विद्या पर नहीं पड़ता, किन्तु उस नियत सीमा से अधिक प्रविद्या की मात्रा होने से उस अविद्या के स्वरूप काम कर्म, शुक्र या क्लेश में एक प्रकार का बीज भाव उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण उन तीनों की विद्यारूपी आत्मा के साथ बन्धन और स्थिति का सिलसिला उत्पन्न हो जाता है । उस अवस्था में अविद्या के विद्या के साथ संसर्ग को चिति संसर्ग कहते हैं, जिससे जीव आत्मा की गृष्टि होकर उसमें क्लेश भोग का सिलसिला अधिक समय के लिये जारी हो जाता है, और इसी को बीज चिति कहते हैं । इसी बीज से देव और भूत का चिति संसर्ग भी उत्पन्न हो जाता है और इस त्रिचित्या चिति से विद्या रूपी ग्रात्मा अपना स्वरूप, अपनी स्वतन्त्रता नष्ट [ ३६७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान अवस्था में यदि विद्या और विज्ञान का अभ्यास करके करके अल्पज्ञ और परतन्त्र हो जाता है । इस उसकी वृद्धि की जाय तो वह विद्या ग्रात्मा के स्वरूप को बढ़ाती हुई उपर्युक्त नियत सीमा को पार करके ज्यों उस ग्रविद्या में उत्पन्न हुए वीजाभाव को नष्ट कर देता है । जिससे विद्या में अविद्या का संसर्ग , और न का त्यों बने रहने पर भी उसका वीज भाव नष्ट होने से काम, कर्म, क्लेशों की चिति नहीं होती देव चिति, भूत चिति होती है, जिससे विद्या रूपी ग्रात्मा अविद्या के साथ रहते हुए भी नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव या निरञ्जन बना रहता है इसी को मुक्ति अवस्था कहते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि इस मुक्ति की अवस्था में भी अबिद्या का नाश नहीं होता, केवल विद्या का बीज भाव नष्ट हो जाता है जिससे षट् ऊर्मियां ग्रौर संसार ग्रात्मा में नहीं होने पाता । यही बात स्मृतिकारों ने पुराणों में स्पष्ट
लिखी है--बीजान्यग्न्युप दग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः ।
ज्ञानदग्धैस्तथाक्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ॥१ ॥
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥२ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदिस्थिताः ।
श्रथ मर्त्योऽमृतो भवति श्रत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ ३ ॥
काम आत्मा की गति के सम्बन्ध में यह प्रश्न उठता है कि ग्रात्मा की गति क्यों होती है । अर्थात् इसके श्रात्मा अपनी इच्छा से फिरना डोलना चाहती है अथवा परवश गति क्रिया उत्पन्न होती है । , नरक उत्तर में कहा जा सकता है कि यदि ग्रात्मा अपनी इच्छा से गति करती तो उसकी अधोगति या गति न होती । जैसे परवश वह नरक के लिये यात्रा करती है तो उर्ध्वगति या स्वर्गगति सभव है कि यदि गतियाँ भी उसमें परतन्त्रता से ही उत्पन्न होती हैं तो ऐसी में उठता है कि उस , दशा यह प्रश्न से ग्रात्मा में किस का पारतन्त्र्य है । ग्रात्मा के स्वाभाविक धर्म के ग्रात्मा कारण गति होती है, अथवा भिन्न किसी पदार्थ की नोदना ( प्रेरणा ) से होती पड़ेगी, है तो इसके उत्तर में नोदना से ही गति माननी क्योंकि ग्रात्मा के स्वाभाविक धर्म से गति होना विचार हैं जिनमें सिद्ध नहीं होता क्योंकि ग्रात्मा पांच चिदात्मा, सूत्रात्मा इन दोनों में व्यापक होने के क्षेत्रज्ञ आत्मा कारण गति नहीं । शेष तीन ग्रात्माओं में सूर्य में और महान् ग्रात्मा चन्द्रमा में इस प्रकार ग्रपने वैदिक ऋषियों प्रभव में गति करते हैं । ऐसा ही किये का सिद्धान्त है । तो ऐसी दशा में उन दोनों आत्माग्रों की अपने लोकगति नहीं हो सकती । अर्थात् नहीं कर्म भोगने के लिये नीचे भिन्न - भिन्न लोकों में ग्रनियम से संभव यातायात ( ग्राना जाना ) करना उसके होता, शेष एक भूतात्मा की ही लोकगति मानी जाती है उसके लिये भी के क्षेत्रज्ञ महान् । अनुसार प्रभव में ही नियम से गति हो सकती है । क्योंकि जिस से उत्पन्न प्रकार क्षेत्रज्ञ सूर्य से, महान् चन्द्रमा [ ३६८ ]