ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 401–410

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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ॐ ब्रह्मविज्ञान होता है उसी प्रकार भूतात्मा सुनामा पृथ्वी से उत्पन्न होती जीवित दशा में है । तो संभव है कि पूर्वोक्त नियमानुसार वह भी पृथ्वी जिन प्रकार पृथ्वी से का वृद्ध होकर पृथ्वी में रहती है उसी प्रकार मृत्यु के रस होने से पृथ्वी पश्चात् भाव कैसे में ही रहेगी । वह पृथ्वी को छोड़कर भिन्न भिन्न लोकों में जाने रख सकती - का स्व-ही गति है । यदि उसमें स्वाभाविक मानी जा सकती धर्म के अनुसार गति मानी जावे तो पृथ्वी में लय होना भिन्न लोकों है किन्तु यदि में गति आप इस भूतात्मा की मृत्यु के पश्चात् पृथ्वी को छोड़कर भिन्न-ऐसी होना स्वीकार करते है तो दशा में यह अवश्य नोदना से ही परवश गति माननी पड़ेगी । तो ग्रात्मा प्रश्न उठता है कि को अपना वह नोदना इस आत्मा में किसकी है कि जिसके कारण इस भूत-उत्तर प्रशव पृथ्वी यही कहा लोक को छोड़कर भिन्न - भिन्न लोकों में परवश जाना पड़ता है । इसका विद्या जाता है कि भाग, विद्या और अविद्या ये दोनों जो आत्मा के अंश उनमें अविद्या के कारण इन्ही में प्रथममन प्राण के , , वाक् इन तीनों तीनों रूपों को रूपों की सृष्टि कही गई हैं और विद्या रूपी आत्मा वाकू से लेकर श्रविद्या में भी तीन जाते से काम प्राण से कर्म और कलेश रूप उत्पन्न हो हैं । मन, तीनों विद्या के तीनों जाती है । में भी काम रूपों की ग्रात्मा परिच्छिन्न बनकर गतियुक्त हो और उस ही मुख्य कारण है क्योंकि अर्थात् इच्छा के द्वारा ही प्राणी कुछ कर्म करता है लिये कर्म, काम से के क्लेश ग्रात्मा में जो अतिशय संस्कार उत्पन्न होता है वही बन्धन रूप होकर आत्मा राग बन जाता या अस्मिता , द्वेष है । जिस क्लेश को हिरण्यगर्भ, पतञ्जलि आदि योगाचार्यों ने अविद्या,, काम, ग्रभिनिवेश कर्म का कारण है । नाम से ५ प्रकार है । इन सब का कारण कर्म है और नोदना जब तक का कहा की ही से नानालोकों प्राणी के हृदय में काम रहता है तब तक वह आत्मा कामवश होकर काम( प्रेरणा = में भ्रमरण आत्मगति का काररण काम की ही नोदना करता है । इसलिये प्रत्याघात ) है, यह सिद्धहुआ । संसर्ग अव यहां है विद्या और अविद्या सहचर से तो यह प्रश्न होता है कि काम जो अविद्या का अंश है और अखण्ड सदा रहते यह संसर्ग ) होती है तब सृष्टि होती पाँच श्रात्मासखण्ड ही हैं, किन्तु इन दोनों की जब चिति ( विद्या रूपी आत्मा में कही गई है, किन्तु वह आत्मा आत्मायों में हो जाती है । विद्या रूपी ग्रात्माओं महान् आत्मा और भूता-जिस इन पाँचों से पहली आत्मा है । अर्थात चिदात्मा, सूत्रात्मा, क्षेत्रआत्मा, गया है और में चिदात्मा चिदात्मा की गति न होना कहा होते भूतात्मा ही विद्या रुपी है । किन्तु उस के कारण काम कर्म इत्यादि पैदा हैं । की गति है जिस विद्या है कि जिस तो फिर कही गई है वह विद्या रूप नहीं मानी जाय । इसका उत्तर यह से विद्या काम कर्म क्लेश के गति किस आत्मा में शुद्ध विद्या होने ,, द्वारा तक वह गतिहीन को चिदात्मा विद्या का सरांग नहीं है तब और अविद्या सह-चर मानी गई कहते हैं, उसमें जब तक चितिसर्ग से विद्य!, और संसर्ग से है । किन्तु जब वही विद्या रूपी चिदात्मा है तब सृष्टि होती है, श्रखण्डआत्मा तो सदा ( संसर्ग ) होती के कारण रहती हैं किन्तु इन दोनों की जब विति है तब उसे अविद्या के तारतम्य कारण है वही संखण्ड हो जाती है, अविद्या शवलित ( मैली ) हो जाती के होने में भी वह काम ही जब क्षेत्रज्ञ है इन रूपों है, उसमें क्लेश काम महान् या भूतात्मा के रूप में आ जाती भूतात्मा बनती , कर्म क्लेशों ग्रावरण वाला वही की मात्रा की अधिकता हो जाती है तब अधिक भोग भोगती है । इसलिये अधिक होती है और उसी कारण यह भूतात्मा नाना [ ३६ ९ }

पृष्ठ 402

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* ब्रह्मविज्ञान चिदात्मा रूपी विद्या ही अविद्या की अधिकता से भूतात्मा नाम धारण करके गति योग्य वन जाती है | अब यहां यह प्रश्न होता है कि अविद्या के तारतम्य से क्षेत्रज्ञ, महान् भूतात्मा ग्रादि नाना रूप उत्पन्न होते हैं उन सबों में काम, कर्म, क्लेश बराबर हैं या न्यूनाधिक? यदि बराबर होने तो सब एक रूप समान बर्मा वन जाते । किन्तु यदि हम उनमें भेद देखते हैं तो ग्रवश्य ही उन तीनों में ग्रविद्या के चिति संसर्ग की न्यूनाधिकता माननी होगी तो ऐसी अवस्था में काम, कर्म, शुक्र कितनी मात्रा की अविद्या से किस ग्रात्मा में कितने उत्पन्न होते हैं इस प्रश्न पर विचार या परीक्षा करने से यह सिद्धान्त हुआ है कि काम और कर्म दो प्रकार के हैं । एक सृष्टि का काम और सृष्टि का कर्म और दूसरा भोग का कर्म । इन दोनों में सृष्टि सम्बन्धी काम और कर्म तो चिदात्मा से लेकर भौतिक सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में उसके श्रायतनानुसार बराबर है । प्रत्येक बस्तु सृष्टि की इच्छा रखती है और सृष्टि के लिये कुछ न कुछ कर्म करती रहती है । किन्तु इन कर्मों से जो अतिशय संस्कार उत्पन्न होता है वह बन्धन, बन्धन रूप न होने के कारण शुक्र होने पर भी क्लेश नहीं है । इसी कारण सृष्टि करता हुआ ईश्वर जैसे जन्म, मृत्यु के बन्धन में नहीं ग्राता, उसी प्रकार संसार के ग्रन्यान्य आत्मा या पदार्थ कुछ न कुछ सृष्टि करते हुए रहने पर भी उसके द्वारा बन्धन में नहीं याते । किन्तु दूसरे काम और कर्म जो भोग सम्बन्धी हैं, उससे जो संस्कार उत्पन्न होता है वह बन्धन होने के कारण क्लेश कहलाता है और वह बीजरूप होकर आत्मा की भोग सामग्री उत्पन्न करता रहता है । इन दोनों प्रकार के काम और कर्मों में से भोग सम्बन्धी काम, कर्म, चिदात्मा, सूत्रात्मा और क्षेत्रज्ञआत्मा इन तीनों में न होकर केवल महान् आत्मा में देखा गया है । भूतात्मा में प्रज्ञा होने पर भी तीनों गुणों के न होने से भोगने का काम नहीं हो सकता क्योंकि भोग सामग्री में प्रीति ग्रप्रीति और विषाद होना आवश्यक है । इन तीनों के न होने से कोई भी वस्तु भोग के योग्य नहीं हो सकती । सुख दुःख मोह साक्षात्कार को ही भोग कहते हैं । सो प्रीति प्रीति विपाद के बिना हो नहीं सकते | किन्तु मे तीनों ( प्रीति, प्रीति, विपाद ) सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों से ही उत्पन्न होते हैं और ये तीनों गुण महानुग्रात्मा के लक्षण हैं जिसे प्रकृति कहते हैं । इसलिये भूतात्मा में भी काम, कर्म, जो भोग की सामग्री है नहीं हो सकते । ऐसी दशा में फिर यह प्रश्न उठता है कि काम, कर्म महान् ग्रात्मा में है, किन्तु गति भूतात्मा की कही जाती है जब कि इस भूतात्मा में भोगने का काम नहीं है तो काम की नोदना से भोग के लिये भूतात्मा की नानालोक में गति कैसे संभव हुई, इसका उत्तर इस प्रकार हैं | यह महानुग्रात्मा चन्द्रमा के रस से उत्पन्न होता है । इस चन्द्रमा का सूर्य और पृथ्वी दोनों से घनिष्ठ सम्बन्ध है चन्द्रमा में जो प्रकाश है वह सूर्य से ही जाता है । सूर्य के प्रकाश का ही रूपान्तर है, इसलिये सूर्य से उसका सम्बन्ध अधिक है । किन्तु यह चन्द्रमा सूर्य से बहुत दूर रहकर इस पृथ्वी के बहुत सन्निहित ( निकट ) है और सूर्य से जो सुषुम्णा नाड़ी इस पृथ्वी पर ग्राती है उसी के अन्तर्गत यह चन्द्रमा सदा रहता है । इसलिये उस सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा इस चन्द्रमा और पृथ्वी का बहुत सन्निकट सम्बन्ध है । इन्हीं दोनों सम्बन्धों के कारण सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी इन तीनों के रस परस्पर में इतना मिलकर इस शरीर में आते हैं, कि उन तीनों के रस से भिन्न - भिन्न तीन आत्मा बनने पर भी तीनों के रस से भिन्न - भिन्न तीन आत्मा बनने पर भी तीनों एक ही हृदयाकाश में सम्मिलित रूप में एक ही ग्रात्मा बने [ ३७० ]

पृष्ठ 403

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हुए हैं । यही कारण है कि हम इन तीनों ग्रात्मा के भिन्न - भिन्न धर्मों ॐ ब्रह्मविज्ञान तीनों आत्माओं का · भिन्न - भिन्न होना अनुभव नहीं करते । प्रत्युत प्रात्मा में होना अनुभव करते हैं । साँख्य के धर्मों को दो ही आत्मा में निर्भर करके क्षेत्रज्ञ को एक ही अपनी आचार्य भगवान् कपिलदेव ने भूतात्मा को न मानकर सब को पुरुष और महान को उसकी प्रकृति माना है । अर्थात् तीनों गुणों के द्वारा महान् रूपी प्रकृति में जितने विकार उत्पन्न होते है वे सब अत्यन्त स्वच्छ ज्ञान स्वरूप क्षेत्रज्ञ पुरुष में प्रतिविम्बित होते हैं इसी इसी को साक्षात्कार कहते हैं, और यही क्षेत्रज्ञ आत्मा का भोग कहलाता है । इसी महान् प्रकृति के द्वारा उत्पन्न हुए लिङ्ग शरीर में बद्ध होकर क्षेत्रज्ञात्मा की नाना लोकों में गति होती है और वहां भी उसी महान् प्रकृति के द्वारा सुख दु: ख साक्षात्कार रूपी भोग क्षेत्रज्ञ आत्मा में हुआ करता है । इस प्रकार सांख्य के मत से प्रकृति पुरुषभाव भी महान् और क्षेत्रज्ञ के सम्मिलित रूप के कारण से ही होता है । किन्तु जो वैशेषिक ग्रादि श्राचार्यों ने जीव आत्मा का स्वरूप वर्णन किया है उसमें क्षेत्रज्ञ, महान्, भूत-आत्मा के भेद न करके एक ही प्रात्मा मानी है और उसमें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छ, द्वेप, प्रयत्न, धर्म, में अधर्म ये आठ वैशेषिक गुण माने हैं । इसके अनुसार महान् या क्षेत्रज्ञ के सब धर्म इस भूतात्मा मान लिये गये हैं, और उसी भूतात्मारूपी जीबात्मा की धर्म अधर्म के अनुसार नाना लोकों में गति कही गई है | तात्पर्य यह है कि ऐसे ऐसे मत भेद होने का मुख्य कारण यही है, कि ये तीनों ब्रात्मा ( क्षेत्रज्ञ, महान्, भूतात्मा ) सर्वथा सम्मिलित होकर एक ही रूप में सदा रहते हैं । यही कारण है कि काम, कर्म और क्लेश ये तीनों महान् में होकर भी उनका प्रभाव भूतात्मा में पड़ता है । महान् ग्रात्मा का प्रभाव भूतात्मा में दो प्रकार से होता है । प्रथम तो यह भूतात्मा पृथ्वी के उस रस से बना है जिसमें चिदात्मा, सूर्य और चन्द्र श्रादि अनेक रस सम्मिलित हैं । सूर्य, चन्द्र से जो रस पृथ्वी के केन्द्र में जाते हैं, उनके साथ पृथ्वी का रस घुलकर बाहर आता है और उससे मेरी आत्मा बनती है | उसमें जो चन्द्रमा का रस है वह भी एक प्रकार महान् का भाग है उसमें भी सत्व, रज तम इन तीन गुणों के ग्रंश हैं, जिनके कारण राग, द्वेष, सोह भूतात्मा में भी प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहते हैं | इन तीनों से भूतात्मा का वियोग नहीं होता किन्तु ये उस भूतात्मा में बीजरूप से ही विद्यमान् रहते हैं । इनका उद्बोध या विशेष प्रभाव दूसरे महान् के संसर्ग से ही होता है । यह दूसरा महान् वह चन्द्रमा का रस है, कि जो माता - पिता के शुक्र शोणित के मिलने पर उसमें सीधा चन्द्रमा से आता है । इस महान् के सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों से जितने प्रभाव उत्पन्न होते हैं उनसे महान् में सम्मिलित यह भूतात्मा पूर्ण आवृत हो जाता ( घिर जाता ) है । जिससे यह भूतात्मा ही गुणत्रय विशिष्ट हो जाता है इसी अभिप्राय से भगवान् ने गीता में कहा है-धूमेना व्रियते वह्निर्यथा दर्शो मलेन च । यथोल्वेनावृतोगर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ग्रर्थात् जैसे धूम से ग्रग्नि व्याप्त रहती है, जैसे दर्पण नाक की भाप से मलिन हो जाता है, और जैसे उल्ब ( ग्रोनाल = जर ) से बच्चा पेट में घिरा रहता है उसी प्रकार अज्ञान से घिरा हुआ ज्ञान मलिन हो जाता है । [ ३७१ ]

पृष्ठ 404

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के ब्रह्मविज्ञान दि

आवृतं ज्ञानमेतेन, ज्ञानिनोनित्य वैरिणा ।

कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणा नलेन च ॥

यह काम, कर्म, और शुक्र विद्या से उत्पन्न हुए हैं, इसलिये ये सब अविद्या स्वरूप हैं | विद्या का विरोध करना अविद्या का स्वभाव है, इसलिये काम से श्राक्रांत ( घिरा हुग्रा ) आत्मा अविद्यामय हो जाता है औौर खण्डवत् होने से जो अपूर्णता उसमें श्राती है उसी से चारों ओर शून्यता समझकर आत्मा उस अपूर्णता या शून्यता को भरकर पूर्ण या व्याप्त होने के लिये आत्मा उसी प्रकार उद्विग्न ( उचाट ) हो जाता है । जैसे केवल सहस्र मुद्रावाले दरिद्री के पास सब चोरी हो जाने से उसको चारों ओर शून्यता दीखती है श्रौर उद्विग्न हो जाता है । यही उद्विग्नता श्रविद्या के कारण जगत् के प्रत्येक जीव ग्रात्मा में पाई जाती है । क्योंकि प्रत्येक ग्रात्मा जन्मकाल से लेकर यावत् जीवन अपनी उन्नति के लिए भरपूर यत्न करता रहता है और सदा ग्रुपनी सम्पत्ति को कम समझता है इसी श्रात्मोन्नति की इच्छा को काम कहते काम का हैं । जो कि विद्या रूपी आत्मा पर अविद्या का प्रवल ग्राक्रमण ग्रावरण ) स्वरूप है । इस विरोधी तृप्ति है, और तृप्ति ज्ञान का मात्रा विशेष है । ज्ञान तृप्त पुरुष होने पर काम का प्रभाव न्यून होता है, इसी तृप्ति के लिये विद्याभ्यास करके ग्रात्मा में ज्ञान की वृद्धि करना प्रत्येक जीव का ग्रावश्यक कर्त्तव्य है | इस तृप्ति बढ़ाने के दो उपाय हैं । एक तो निष्काम होकर विद्या की उपासना करना सगुरंग और दूसरा निष्काम होकर निर्गुण विद्या का उपार्जन करना । पहले को भक्तिमार्ग और दूसरे को ज्ञानमार्ग कहते हैं । भक्तिमार्ग से अर्थात् सगुण आत्मज्ञान से आत्मा स्वर्गलोक अथवा साकार या सगुण ब्रह्मलोक जाकर ग्राकाम्य ( इच्छा सिद्धि ) पाकर अनन्त सुख भोग भोगता है और जन्म मृत्यु के बन्धन में न आने से मुक्त समझा जाता है । किन्तु दूसरे ज्ञानमार्ग से निराकार ब्रह्म की प्राप्ति होती है और वह श्रात्मा स्वयं ब्रह्म होकर मुक्त हो जाता है इसी को बरागति कहते हैं, और ये दोनों ही मार्ग उत्तम है । किन्तु निष्काम होने से इन नार्गों से उत्तमगति प्राप्त होती है अन्यथा नहीं, यही बात श्रुति भी कहती है—

कामान् यः कामयते मन्यमानः, सकामभिर्जायते यत्र तत्र ।

पर्याप्त कामस्य कृतात्मनस्तु, इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कासाः ॥

ज्ञात्वादेवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्म मृत्युप्रहारिणः ।

तस्याभिध्यानात् तृतीयं देहभेदे, विश्वैश्वर्यं केवल आप्तकामः ॥

यं यं लोकं मनसा संविभाति, विशुद्ध सत्वः कामयते यांचकामान् ।

तं तं लोकं जायते तांश्चकामान्, तस्मादात्मज्ञंह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥

सर्वदैतत्परमं ब्रह्मधाम, यत्र विश्वं निहितं भाति उपासते पुरुषं ये कामा, स्ते शुक्रमे तदति वर्तन्ति शुभ्रम्

धीराः । ॥

[ ३७२ ]

पृष्ठ 405

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* ब्रह्मविज्ञान

विद्यया तदा रोहन्ति यत्र कामाः परागताः ।

न तत्र दक्षिणायन्ति ना विद्वांसस्तपस्विनः ॥

( कर्म ) दो अवस्थायें विद्यापीबात्मा में अनिर्वचनीय अविद्या होती हैं का अनिर्वचनीय सम्बन्ध है जिसके कारण आत्मा की शुद्ध विद्या । एक शुद्ध विद्यारूप और दूसरी अविद्या शबलित ( घिलमिल ) विद्यारूप | इनमें भोग्य होना श्रात्मा की या जगत् मुक्तावस्था है और वह जगत् से पार है । किन्तु दूसरी अवस्था जगत् रूप से नियम की अधिष्ठाता ( मालिक के से काम ) कर्ता, भोक्ता होता है । वह अविद्या शवलित आत्मा नित्य , कम सम्बन्ध शुक्र से युक्त रहता है । इन तीनों में काम का स्वरूप ऊपर दिखा चुके हैं, अब कर्म की में कहा जरूरत जाता है । यह कर्म है १ - विद्या सापेक्ष ( आत्मज्ञान रखता आत्मा में चार प्रकार का होता । कर्म या है ) २ विद्या निरपेक्ष विद्या विरोधी ४- प्रप्रयोजक । इनमें पहले दोनों को शत--, कर्म कहते, ३ हैं, तीसरे को विकर्म तीनों भेदों को लेकर श्री-और चौथे को अकर्म कहते हैं । इन्हीं भगवान् ने

गीता में कहाहै--कर्मणोह्यपि बोद्धव्यं, बोद्धव्यं च विकर्मणः ।

कर्मगोपि बोद्धव्यं, गहना कर्मणो गतिः ॥

हैं । इस प्रकार कर्म के चार भेद सिद्ध होते. उन चारों इन तीन भेदों में कर्म दो प्रकार का है । जिससे की में विद्या पहला ही केवल न होकर विज्ञान आत्मा के भी सहायता सापेक्ष वह कर्म है जो भूतात्मा के प्रज्ञान द्वारा अर्थात विज्ञान द्वारा ली जाती है विज्ञान ही अन्त में फल उत्पन्न होता है । का उत्पन्न होकर और उस कर्म से सापेक्ष है ऐसे कर्म से आत्मा अभ्युदय जो कर्म विज्ञान को ही उत्पन्न करे वह कर्म विद्या, विद्या निरपेक्ष होता है की ओर चढ़ता है और दूसरा । अर्थात् विद्यमान कक्षा से उन्नति संस्कार वह कर्म आत्मा अपनी क्षेत्रज्ञ आत्मा का कुछ भी है जो विज्ञान के भी उससे विज्ञानमय न होकर द्वारा उत्पन्न होकर से आत्मा का न अभ्युदय होता है केवल प्रज्ञानमय संस्कार करता है । ऐसे कर्मों न प्रत्यवाय भूतात्मा का ही त्यों विद्यमान कक्षा में ज्यों का बना ( अवनति उल्टा नीचे की ओर झुकना ) अर्थात् अपनी गिना जाता है और रहता है इसलिये यह भी अच्छा ही । किन्तु इससे अवनति नहीं होती, से म विज्ञान तीसरा आत्मा की तमोगुण विद्या विरोधी होने पर भी रजोगुण, होने कर्म है जो विज्ञान से उत्पन्न विद्या का विरोधी होकर विद्या के कारण कर्म का संस्कार का उससे जो कर्म उत्पन्न होता है, उस प्रायः कर डालता है और ग्रावरण कहीं मलिन और कहीं लुप्त नीचे इस करता है । अपने बल के तारतम्य से से आत्मा उलटा की ओर कर्म के अर्थात् उस संस्कार है गिरता संस्कार को प्रत्यवाय ( पाप ) कहते हैं । के प्रज्ञान से उत्पन्न होता और है और विज्ञान के ही केवल भूतात्मा का बाधक है । वह निरर्थक चौथा अकर्म है, जो बिना ) पर भी विज्ञान है । वह प्रज्ञान का विनोद करने ( दिल बहलाव वह भी नेष्ट है| [ ३७३ ]

पृष्ठ 406

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ॐ ब्रह्मविज्ञान ( १ - विद्या सापेक्ष कर्म ) इन चार कर्मों में विद्या सापेक्ष कर्म दो प्रकार का है । ज्ञान विशेषक और देवलौकिक । जिन कर्मों से विद्या ज्ञान रूप में परिणत होकर नाना भेद वाला हो जाता है उन कर्मों को ज्ञान विशेषक ( भेद करने वाला ) कहते हैं । नारद पाञ्चरात्र में नारदने पांच प्रकार का भेद करने वाला ज्ञान बताया है— १ – नित्य विशुद्ध ब्रह्मज्ञान, २– निर्गुण ब्रह्मज्ञान, ३ - सगुण ब्रह्मज्ञान, ४ – दिव्यज्ञान, ५ – इन्द्रिय ज्ञान । विद्या को ही ब्रह्म कहते हैं उसमें कर्म का कुछ भी प्रभाव न हो, न कर्म का स्वर्ण हो तो वह प्रथम दोनों प्रकार का ज्ञान होगा । दोनों में विशेषता यह है कि जो स्वतन्त्ररूप से कर्मों को स्पर्श न करता हुश्रा जो सर्व जगत् व्यापक भूमा रूप पर ब्रह्म है वह परमतत्व पहला नित्य विशुद्ध ब्रह्मज्ञान है । किन्तु यदि जीव श्रात्मा ऐसा कर्म करे कि जिस कर्म से कनक, रज के अनुसार सब कर्मों की निवृति हांती हो तो वह कर्मजन्य ग्रात्मा की विशुद्धि होने से दूसरे प्रकार का ज्ञान अर्थात् निर्गुण ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न होता है, जिस से जीव आत्मा की परामुक्ति होती है और तीसरा कर्म वह है कि जिस से ब्रह्म के गुण निवृत्त नहीं होते किन्तु श्रविद्या के दांप बहुत से निवृत्त हो जाते हैं तो उन कर्मों को उपासना कहते है । इन उपासना कर्मों से अवरमुक्ति होती है । अर्थात् दास - स्वामी की बुद्धि रहने से ऊँचे नीचे का भाव अपनी ग्रात्मा का तिरस्कार स्वामी के प्रसन्नता का अनुरोध ( लिहाज ) यादि कितने ही भाव मुक्ति दशा में भी जीव आत्मा में बने रहते । जिससे कितने ही दुःख के भावों का उस जीव ग्रात्मा में रहना अनिवार्य माना जा सकता है | इसलिये जन्म मृत्यु बन्धन छूटने से मुक्ति होने पर भी उसको अवर मुक्ति कहते हैं । अब चोया कर्म यह है जिससे इस जीव आत्मा में इन्द्रियजन्य ज्ञान सामर्थ्य के अतिरिक्त १७ प्रकार के पूर्वज्ञान विशेष रूप से उत्पन्न हो जाते हैं । उन्हीं ज्ञानों को दिव्य हैं । वे ज्ञान ( अष्टसिद्धि ) कहते इस प्रकार हैं— १ अणिमा - छोटा शरीर धारण करने की शक्ति । २ महिमा - महाविशाल शरीर धारण करने की शक्ति । ३ लघिमा - परमलघु अर्थात् हलके होने की शक्ति । ४ गरिमा — परमगुरु अर्थात् भारी होने की शक्ति । ५ व्याप्ति - बहुत देश में पसरने की शक्ति । ६ प्राकाम्य — इच्छा सिद्धि ग्रर्थात् चाहते ही तत्काल प्राप्ति होना । ७ ईशित्व — सहस्रों प्राणियों पर प्रभुत्व जमाना । ८ वशित्व — सर्प, व्यात्र, राक्षस यादि वशीभूत होना । ( 2 - तुष्टि या निधन ) ६ भूत भविष्यत् ज्ञान — प्रवधान ( खयाल ) करते ही भूत, भविष्यत् को जान लेना। [ ३७४ ]

पृष्ठ 407

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ब्रह्मविज्ञान * १० दूरपरोष्ट ११ दूर - दूर - दूर सैकड़ों श्रवण हजारों कोसों तक देखना । १२ परकाय - दूर देशस्य बातों का सुनना । प्रवेश १३ कायव्यूह दूसरे के शरीर में प्रवेश करना । १४ जीवदान १५ परजीव हरण - एक ही समय अनेक रूप धारण करना । -मरे को जिलाना । - जीन्दों को मार देना । १६ संगकारण नई सृष्टि रचना । १७ सर्ग हरण – सृष्टि का संहार करना । २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ६ इसे विषय इसके अतिरिक्त पांचवां है ज्ञान कहते ज्ञान वह है जो प्रत्येक प्राणी के पांचों इन्द्रियों के द्वारा करती है । प्राकृतिक हैं । इन पांचों हुआ, ज्ञान कर्मों ज्ञानों में विषय ज्ञान के लिये किसी विशेष कर्म की आवश्यकता नहीं हैं के उसमें किसी अनुसार प्रत्येक प्राणी में नियम से यह होता है और सबसे प्रथम जो नित्य विशुद्ध प्रकार के कर्म का से अतिरिक्त के तीनों अणुमात्र भी संसर्ग नहीं है इन दोनों मध्य ज्ञानोंमें व्यवसायात्मक वृद्धि के द्वाराज्ञान प्रकारका संस्कार साथ कर्मसमुच्चय रहता है, और इन तीनों कर्मों से एक उत्पत्तिमें ग्रात्मा में गति के हैं विशेष उत्पन्न होता है । जिसकी वासना का आत्मा में जन्म मृत्यु क्रम और । इस सम्बन्ध प्रकार ज्ञानों है । इन तीनों कर्मों को निवृत्ति कर्म, उपासना कर्म, योग कर्म, क्रम से कहते में विशेषता गये हैं उत्पन्न करने वाले विसापेक्ष कर्म कहे । शक्ति व देवलौकिक है । पैदा करने कर्म कहे जाते हैं । जिन कर्मों के करने से देव स्वर्ग नाम के देव लोकों में जाने की यज्ञ वाला संस्कार देव लौकिक कर्म हैं और वे तीन प्रकार के , तप ग्रात्मा में होता है वे ही मनुष्य, दान उत्पन्न यद्यपि - मनुष्य भूतात्मा की ग्रात्मा की ग्रात्मा दो प्रकार की होती हैं । १- मानुष्य आत्मा, २ - देव आत्मा एक ही होती है और मिली होती है । सबसे प्रथम उसके अन्दर उसमें विशेष कर चार ग्रात्मा चिदात्मा ये चारों महान् ग्रात्मा उसके भीतर क्षेत्रज्ञ आत्मा और उसके भी भीतर हीअपना - अपना तन्त्र यासंस्था रखते बनालेते एक ही तन्त्र या संस्था के हैं तथापि हुए भी सुत्रात्मा के द्वारा परस्पर बद्ध होकर मेल । अर्थात् इन चारों से इस जन्म और विशेषतायें उत्पन्न होती हैं प्रधान उत्पन्न जीवन की प्रक्रिया से दो और दूसरा पृथ्वी रस का । माता हुई जो एक दो हो जाती हैं । एक सूर्य रस प्रधान जन्म के गर्भ आत्मा है सो के रस प्रधान । हं ने से कन्या को होता में वालक दो भाव को ग्रहण करता है, अर्थात् माता हो है और उसी प्रकार आत्मा भी दो प्रकार मिल जाया पिता के से का होता है । दोनों भेदों में जाया करती है रस प्रधान होने पुत्र संस्था न बनाकर उन्हीं श्रीर करते । चिदात्मा और महान् ग्रात्मा पृथक् अपनी की बनी होती है । सूर्य हैं । इसी आत्मा भी चार आत्मा श्रात्मा रूपी द्यौ से पृथ्वी माता के रस से बनी हुई हई होती है । इस प्रकार कारण के पिता के आत्माओं की बनी के दो भेद रस वाली आत्मा भी चारः भी सूत्रात्मा से बद्ध होने जीवन जन्म के जाते हैं । किन्तु ये दोनों समय से ही बनते शुरू हो से एक आत्मा सदा काल में भी उन दोनों में भिन्न नहीं होने पाते किन्तु जुड़े रहने पर , पृथ्वी से और दूसरी सदा देव आत्मा और दोनों में सूर्य वाली को सूर्य से खिची हुई रहती है । इन [ ३७५ ]

पृष्ठ 408

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* ब्रह्मविज्ञान पृथ्वी वाली को मानुष्य ग्रात्मा कहते हैं । इन दोनों को जोड़ने वाली सूत्र के टूटते ही प्राणी की मृत्यु होती है, उस समय ये दोनों ग्रात्मा भिन्न - भिन्न रुख के दो मार्गो का अवलम्बन करते है । देव प्रात्मा | किन्तु क एकदम ऊपर की ओर अपना रूख करके चन्द्रमा में होता हुआ सूर्य में जाने प्रयत्न करता के बोझ के दबाव से चन्द्रमा और सूर्य के भीतर कहीं - कहीं फिरता रहता है, किन्तु उस ग्रात्मा की स्वा भाविक गति सर्वदा सूर्य की ही औौर दूसरा मानुष्य ग्रात्मा ऊपर की ओर न जाकर चन्द्रमा के नीचे ही इस पृथ्वी पर कहीं न कहीं विचरता रहता है, उस अवस्था में उस मानुष्य आत्मा को गन्धर्व आत्मा या हंसग्रात्मा कहते हैं | यह गन्धर्व चात्मा वायु प्रधान और देव आत्मा श्रग्नि प्रधान होता है । इस प्रकार इन दोनों ग्रात्माओं का शरीर में होता और मृत्यु काल में इन दोनों का बिछुड़ना प्रकृति नियमानुसार सभी प्राणियों में अवश्य होता है । इन दोनों में हंसग्रात्मा के लिये हमें कोई प्रयत्न करने की यावश्यकता नहीं है । किन्तु देवश्रात्मा के सम्बन्ध में बहुत कुछ वक्तव्य है । वह देवग्रात्मा अपने स्वभाव से सीधा सूर्य में जाना चाहता है, किन्तु कर्मों के संस्कार का भिन्न - भिन्न बल पाकर मार्गच्युत हो जाता है । सूर्य के मुख्यज्योति में न मिलकर भिन्न – भिन्न स्थानों में भ्रमण करता हुया फिर पृथ्वी में उलटकर या जाता है । जब कि ग्रात्मा का स्वाभाविक रुख सूर्य की ओर है किन्तु कर्मवश उसकी गति में बाबा पड़ती है, इस से ग्रात्मा को दुःख होना ग्रवश्य संभव है, इसी दुःख को मिटाने के लिए सूर्य बिरोधी कर्मों के वल को घटाकर सूर्य में जाने की शक्ति बढ़ाने के लिए कितने ही कर्म चुने गये हैं । वही कर्म ये तीन प्रकार के हैं जिनको यज्ञ, तप, दान कहते हैं । ( १ - यज्ञ ) यज्ञ दो प्रकार का है । १ - प्रग्नि में ग्रग्नि की पांच चिति करके हमारे शरीर की अग्नि का प्राय-तन जो शरीर परिच्छिन्न था, उसका ग्रायतन सूर्य तक बढ़ा दिया जाय ग्रग्निचित्या यज्ञ से यह जीव-श्रात्मा सूर्यं तक बढ़कर दैवग्रात्मा बन जाता हैं, जिससे उसकी गति सूर्य इस में अवश्य ही हो जाती है । यह यज्ञ विद्वान् ब्राह्मण ही अपने लिये ही कर सकता है । २- दूसरा यज्ञ अग्नि में सोम की आहुति देना है । सोन की ग्राहति देने के लिये शरीर की मामूली अग्नि को याज्ञिक ग्रग्ति बनानी पड़ती है । उसके लियेअग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, चातुर्मास्य पशुवन्ध पांच पूर्व प्राक्सौमिक यज्ञ करने पड़ते हैं । ये पांचों क्रम से अग्नि संस्कार और दैनिक, मासिक, वह श्राव, अयन,, संस्कार रूप हैं । इनके अनन्तर ' ताम्वत्सरिक संस्कार है ' रूप सोमयज्ञ करना होता सात प्रकार का है । ग्रग्निष्टोम ग्रत्यग्निष्टोम उवथ्यस्तोम वाजपेयस्तोम ,, पोडशीस्तोम ग्रतिरात्रस्तोम, , ग्रातीयमस्तोम इन सब को ज्योतिष्टोम कहते हैं अग्नि पुष्ट । इस सोमयाग से भी शरीर की वैश्वानर होकर इतना प्रवल हो जाता है कि ग्रात्मा की गति उन्हीं पांचों मार्गों, अयन, से अर्थात् दिन, मांस, ऋतु सम्वत्सर के द्वारा सूर्य में पहुंच जाती है । इस यज्ञ के द्वारा करके हमारा जन्मसिद्ध दैवग्रात्मा में संस्कार श्रात्मा का ग्रायतन बढ़ाकर एक नया ( यज्ञ प्रभाव है जिससे ग्रहण करने योग्य ) ऐसा वल डाला जाता [ ३७६ ]

पृष्ठ 409

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 409 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान ग्रात्मा कर्मो के वेग में न प्रकार ग्राकर अपने मार्ग में निष्प्रतिबन्ध ( बिना रुकावट ) चला जाता है । इस जन्मसिद्ध है । वह प्रात्मा में संस्कार करके नया देवसात्मा बनाना हो यज्ञकर्म का मुख्य दृश्य है । ( २ - तप ) उससे भिन्न में दिव्य कक्षा का कम तप है । तप उसको कहते हैं कि अपनी शरीर की शान्त वैश्वानर वा अन्तरिक्ष नया की अग्नि प्रवेश कर के क्षुब्ध करना और उन तीनों अग्नियों के परस्पर संघर्षण से एक अग्नि ऐसा को कर दे ओर उत्पन्न किया जाय जो इस आत्मा के ऊपर प्राय हुए कर्म के संस्कारों दग्ध ग्रात्मा के के नये संस्कार जमने न पावें धरातल को इस प्रकार पका दे कि जिससे उस पर फिर कर्मों , इस उनमें प्रकार के कर्मों ये भी प्रकार के हैं, किन्तु ब्रह्मचर्य को ही तप कहते हैं । यज्ञ के अनुसार बहुत , सत्यभाषण और अनशन ( अन्न अशन ) ये तीन मुख्य हैं । ( ३ - दान ) का अन्तरङ्ग ही अन्तर है कि तप में आत्मा - तप और दान में इतना भाग तीसरी कक्षा के लिए व्यय होकर का दान है - अंश की कमी की पूर्ति एक महा दूसरे की आत्मा में सम्मिलित होता है और उस गये हुए पर दुर्बल जल के स्थान बलवान सत्यधर्म जैसे कच्चा ईंटा सुखाया जाने उस स्थान पर आ बैठता है । ईंटा पककर बलवान् हो जाता है । जैसे व्यायाम पर बलवान् ग्रग्नि अन्तर्यामी ) आ बैठता है, जिससे में उत्तम और उस अङ्ग अधिक करने वाला व्यय करता है कि जिससे कर्म पुरुष अपने बल को इसलिए उसके लिए दान है इसमें बल उत्पन्न हो ठीक है किन्तु जो ऐसा नहीं कर सकता जिनसे हमारी , यही उद्देश्य तप का । उनमें भी आत्मा के आत्मीय वस्तु हो ग्रात्मा का बहिरङ्ग भागों का त्याग है । अर्थात् जो हो उन वस्तुओं पर आत्मा का अधिक अधिक उपकार और जो ग्रात्मा के अधिक प्रिय छोटा तप है । जो ग्रंश रहने होता हो सदृश ही एक प्रकार का उचित अपनी के कारण उनका भी आत्मत्याग समर्पण करना आत्मा दान करना आत्मीय वस्तु का है । सर्वथा के भाग को सकते उनकों अपनी दान का रहस्य हैं । समर्पण नहीं कर तप और ग्रात्मदान करने उत्पन्न होता है वही से आत्मा में अधिक बल कर्म २ - विद्या निरपेक्ष शक्ति उत्पन्न होती है, उसी जिस रूपी स्वर्ग में जाने की प्रकार प्रकार देवलौकिक कर्म के करने से देवलोक विद्या का है इष्ट, यापूर्त, तिरपेक्ष भी तीन प्रकार है । दत्त कर्म पितृलौकिक में होन करना पड़ता । इनमें कहते हैं । देवलौकिक के अनुसार स्मार्च से बाहुति यज्ञ उष्ट शक्ति या में बैठकर स्वाहा में उन छोटे यज्ञों का नाम है, जिनमें एक के होम धर्मशाला देनी खड़े होकर । किन्तु इष्ट बाग सड़क, कुप, पड़ती वषट्कार से आहति देनी पड़ती है है जैसे, और आदि है और करना पड़ता ( अन्न सन त्याग करना निःस्वार्थ आपूत एक प्रकार का द्रव्य ही व्यय सदावर्त के केवल कन्या, पाठालय, है जो बिना मन्त्र विवाह स्थान बनाकर उत्सर्ग करना औषधालय दत्त वह दान, इत्यादि इत्यादि पूर्व कर्म हैं और तीसरा [ ३७७ ]

पृष्ठ 410

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 410 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान संकल्पमात्र से किया जाता है । यज्ञ, तप और दान में जो दान है वह शास्त्रीयदान है, जो भारतवर्ष के अतिरिक्त श्रीर देशों या समाजों में नहीं है और इष्ट, ग्रापूर्त, दत्त का जो दत्तदान है वह लौकिक दान है । इस प्रकार प्रायः सभी देश और समाजों में है । देवलौकिक दान अर्थात् भूमिदान, अन्नदान, के विद्या- द्वारा दान, अभयदान, जीवदान, गौदान, हिरण्यदान ग्रादि दानों में वेदमन्त्र से संकल्प अपेक्षा पूर्वक है । जल मूर्ख, दरिद्री, दान करना पड़ता है । इनमें देश, काल, पात्र और श्रद्धा आदि की विशेष अङ्गहीन आदि को देने से वह दान निष्फल होता है । किन्तु इसके विपरीत पितृलौकिक दत्त वह दान है, जिसमें भूमिदान, अन्नदान आदि ऊपर लिखे सब दान बिना वेदमन्त्र के बिना जल के दिया जाता है और उसमें देश, काल, पात्र की विशेष अपेक्षा नहीं होती वल्कि ऊपर लिखे हुए के बिरुद्ध मूर्ख, दरिद्री, श्रृङ्ग-हीन, असमर्थ, अनाथ को देने से अधिक पुण्य होता है । इस प्रकार इन तीनों इष्ट, ग्रापूर्त, दत्त, कर्मों के करने से देवस्वर्गं में न जाकर भी पितृस्वर्ग में जाता है, इस कारण से वे कर्म भी अच्छे गिने जाते हैं । इन तीनों कर्मों के अतिरिक्त जितने कर्म हैं वे सब पाप गिने जाते हैं और वे ६ प्रकार के हैं । ( विकर्म अर्थात् विद्या विरोधी ) ७-१- अतिपातक, २ - महापातक, ३ - अनुपातक, ४- पातक, ५ – उपपातक, ६ - जातिभ्र शकर, संकरीकरण, ८- मलिनीकरण - अपात्रीकरण । इनमें पांच वे विद्याविरोधी संस्कार हैं, जिनका सम्बन्ध से उत्पन्न आत्मा की गति से है । आत्मा विद्यारूप है और वह विद्या अर्थात् विज्ञान या बुद्धि सूर्य रस होता है । इसलिये आत्मा में विद्या की अधिकता से अथवा विद्याविरोधी संस्कारों के ग्रात्मा में न रहने से वह आत्मा स्वभावतः सूर्य की ओर गति करता है । अर्थात् उसकी गति पृथ्वी सूर्य के बीच में होकर ऐसे सूर्य में ख़तम होती है, इससे ही ग्रभ्युदय कहते हैं । किन्तु इसके विपरीत यदि ग्रात्मा में कर्म्मजन्य संस्कार हो गये हों जिनसे विद्या के प्रकाश का ग्रावरण होता हो तो वह आत्मा में भार रूप होकर में वह ग्रात्मा को सूर्य की ओर न जाने देकर पृथ्वी और लोकालोक के बीच में होती है और लोकालोक गति खतम होती है । ऐसे ही संस्कारों को पातक कहते हैं उससे आत्मा का पतन होता है, और उसे ही प्रत्यवाय कहते हैं । कह इस प्रकार आत्मा का पतन जिन कर्मों से होता है कर्मों को यद्यपि पातक ही , उन सब सकते हैं किन्तु उनके बल के तारतम्य से पांच भेद किये को अति-गये हैं । सबसे अधिक गिराने वाले जैसे पातक, उससे कम गिराने वाले को महापातक हैं । इसी प्रकार क्रम से अनुपातक, पातक, उपपातक का आत्मघात करना ग्रतिपातक है सुवर्ण , चुराना महापातक, गुरुद्रोह करना अनुपातक, प्राणीमात्र अनिष्ट करना पातक, ऐसा मिथ्याभाषण ' है । शेष करना जिससे किसी को हानि न पहुँचे वह ' उपपातक ४ संस्कार ग्रात्मा के पृथ्वीलोक में विद्य जन्म की विशेषता से सम्बन्ध रखते अपनी हैं । जिनसे ग्रात्मा मान योनि से गिरकर छोटी योनि में जन्म पावे । अर्थात् क्रीम आदि योनि परिवर्तन के " मनुष्य से पशु और पशु से कीट, ही छोटे कारण जातिभ्रंशकर " कहते हैं । किन्तु यदि में वर्णों में मनुष्य विद्यमान वर्णं मनुष्य यदि जन्म लेवे तो उसका कारण " संकरीकरण " है लेकर भी । ब्राह्मण का ब्राह्मण ही में जन्म दरिद्री, उसका प्राचीन उदाराशय नष्ट होकर नीचता ग्रा जाय, जाय तो उच्च दशा से नीच दशा में हो [ ३७८ ]