ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 411–420

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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* ब्रह्मविज्ञान * दुःखी हो जायतो वह ' मलिनी भी यदि प्रकृति कारण है किन्तु ब्राह्मण या राजा अपनी ही जाति या कक्षा पर रहकर का नीच करण " है दुष्ट हो जावे, समाज में उसकी दुर्वृत्ति कुपात्रता की निन्दा हो तो वह " प्रपात्री | इस प्रकार पाप है । आत्मा के किसी न किसी प्रकार का पतन जिनसे होता हो वे सब पातक या विश्राम इन सब पापों के अधीन मन वचन और काय हैं । मन से किये हुए पाप का ' काम ' ही पर होता है इसलिये, क्रोध आदि के द्वारा ही उत्पन्न होकर उसका भोग मन की आधि के द्वारा अर्थात् काम, ग्रादि वचनों ग्रात्मा को भोगना पड़ता है । इसी प्रकार वचन का संस्कार वचन में ही रखकर गाली यादि द्वारा ही में नाना प्रकार के रोग, ब्ररण, घात के ग्रात्मा भोगता है और काय का संस्कार शरीर द्वारा की अवनति पावे ग्रात्मा भोगती है । तात्पर्य जिनके द्वारा आत्मा किसी प्रकार यह है कि वह सब विकर्म हैं । अकर्म ( अकर्म ) में न आ सकते वह् है कि जिससे आत्मा के उन्नति करने का समय या साधन आत्मा हो ऐसेसाधनों सब अकर्म हैं । इनके द्वारा श्रात्मा का आत्मा के में जो कर्म विघ्न डाले वह संस्कार की साथ संयोग होने कर्म से आत्मा में जो उत्पन्न ग्रवनति है इसलिये को अकर्म कहते हैं । काम जन्य और होता है, ऐसे कर्मों सृष्टि की इच्छा से उत्पन्न दूसरा उस शुक्र कहते हैं । दो प्रकार का है एक में पाया जाता है भोग की यह शुक्र हैं, जो ईश्वर । किन्तु इच्छा से को माया कहते नहीं है । इसीलिये उत्पन्न होने वाला । पहले शुक्र ईश्वर भोग की कहते हैं, यह ईश्वर में ही पाये का इच्छा से उत्पन्न शुक्र को अविद्या और अविद्या दोनों जाते भोगने के जीव में माया है किन्तु हैं लिये परवश जन्म मृत्यु नहीं होते, किन्तु को उत्पन्न करता, । माया आदि अविद्या के कारण शोणित, मांस, अस्थि दुःख भोगता के स्वतन्त्र जीव आत्मा, में जाकर के सुख कारण वा नाना लोकों हो ) दो परतन्त्र होकर नाना योनि धारण करके शुक्र ( शुक्र काम से जो कर्म उत्पन्न है । इस प्रकार जीव में सृष्टि काम प्रकार भोग काम के दूसरा भोग-के एक के शुक्र, है । एक बन्धनरूप, अस्मिता नाश्य सिद्ध होते हैं फिर दो प्रकार का है । उसके अविद्या, । इनमें, किन्तु इनमें दूसरा शुक्र अविद्या बन्धन-राग पहला क्लेश बीज और वह भोग पञ्चपर्वा है अर्थात् यह रूप, द्वेष, ग्रभिनिवेश कहलाता है जीव आत्मा जीवात्मा को सहस्रों बार क्लेश ये पांच पर्व हैं । इसके कारण ही यह जीवन'त्मा जन्म अनेक इसी के कारण ही जीवात्मा जन्म तक ज्यों है और के छूटते जीवपने मृत्यु का त्यों बना रहता या हृद्ग्रन्थि एक जन्म के सिलसिले है । इस बन्धन है । एक में जीवन से मुक्त में परिभ्रमण करना पड़ता दूसरा शुक्र भोगनाश्य जीव आत्मा में होकर तत्काल परमात्मा हो जाता है । किन्तु हैं । इस प्रकार इस शुक्र । तीन अथवा नष्ट होते तीसरा भोगनाश्य प्रकार सम्पराय में भोगने के कारण वे संस्कार अविद्या, क्लेश, कर्म जो इनमें के शुक्र पचपर्वा प्रकार का है । एक कि ग्रन्त के सिद्ध हुए । एक मायाशुक्र, दूसरा कि कर्म दो दोनों शूक्रों को भी कर्म कहते हैं । तात्पर्य यह है कह-कर्म शुक्र के पहले है इसलिये संचित है हो गया नहीं किया यह तत्काल प्रारम्भ भोग देने के लिए प्रारब्ध नहीं है अर्थात् ) संचित-और भोगनाश्य ( पचपर्वा दोनों शुक्र है किन्तु ये वह प्रारब्ध कर्म [ ३७ ९ ]

पृष्ठ 412

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* ब्रह्मविज्ञान ( मूलाविद्या ) ही मृत्यु भाग धीरे २ [ ३८० ] न के और मृत्यु से अपने तन्तुओं लाता है । तात्पर्य यह है कि कर्मों का प्रक्रम ( एक सिलसिला ) भेद से भेद है । जैसे ढेले में हाथ से दिया हुआ बल अनेक बार में न्यूनाधिक तारतम्य से या दिशाओं के भेद से भिन्न २ हो सकते हैं । उनमें एक बल अपना भिन्न २ समय लेता है, यही दृष्टांत आत्मा में जानना चाहिए । अर्थात् ग्रात्मा एक बार की इच्छा से जितना बल प्रयोग करता है अर्थात् एक इच्छा ले जितना कर्म होता है उसका संस्कार रूपी शुक्र दूसरी इच्छा के कर्म से भिन्न रहता है और प्रत्येक शुक्र भिन्न २ प्रक्रम में भोग कराकर नष्ट होता है । ऐसी स्थिति में जो वल था शुक्र भोगने के लिए अपने प्रक्रम का प्रारम्भ कर देता है उस शुक्र शुक्र कहकर प्रारब्धकर्म कहते हैं । जिनका वर्णन ऊपर हो चुका है । शेष जितने शुक्र हैं अर्थात् जिनका प्रक्रम भोगने के लिए प्रारम्भ नहीं हुया है वे सञ्चितकर्म होने के कारण शुक्र के ही नाम से कहे जाते हैं । इन दो कर्मों के अतिरिक्त एक तीसरा कर्म श्रागामी कहलाता है, वह नया उत्पन्न होता है । अर्थात् प्रारब्ध कर्मों के अनुसार सुख दुःख भोगने से जैसा प्रारब्ध कर्म नष्ट होता रहता है उसी प्रकार उसी समय में पुण्य पाप अर्थात् अच्छे बुरे बर्मों के करते रहने से नये र संस्कार भी उत्पन्न होते रहते हैं । उन संस्कार रूपी शुक्रों को श्रागामी कर्म कहते हैं । इस प्रकार आत्मा में प्रारब्ध कर्म को छोड़कर शेष जितने संस्कार हैं, उन सबको शुक्र कहते हैं । इन शुक्रों के प्रथम जो तीन भेद कहे गये हैं अर्थात् एक सिसृक्षा याने सृष्टि की इच्छा और बुभुक्षा याने भोगने की इच्छा । यह बुभुक्षा बीजरूप और भोग्यरूप इस प्रकार दो भेद होने से शुक्र के तीन भेद सिद्ध होते हैं । इनमें सिसृक्षा के लिए कुछ वक्तव्य नहीं है किन्तु बुगुक्षारूपी जो अविद्या का स्वरूप , शुक्र | है उसके दो प्रकार होने से वह अविद्या दो प्रकार की मानी जाती है । मूलाविद्या और दूसरी तुलाविद्या इन दोनों में मूलाविद्या बीजरूप है जिसके कारण यह जीवात्मा जीवात्मा बनकर परतन्त्र होकर संसार , यह समुद्र के भ्रमर में पड़कर जन्म मृत्यु के चक्र में भ्रमण करता है । यह मूलाविद्या हृदग्रन्थि बन्धन है, ग्रन्थि अनेक होने पर भी मुख्यतया जीवनात्मा में तीन है । क्षेत्रमात्मा महान्यात्मा, भूतात्मा । , ये तीनों, कार्य में ग्रात्मा भिन्न २ स्वरूप भिन्न २ सूत्र तन्त्र संस्था रखने पर भी किसी एक मूलाविद्या द्वारा तीनों के परम्पर तीन ग्रन्थि ऐसी बंधी हैं कि जिनके के तीनों लोकों द्वारा ये तीनों एक होकर परस्पर में ग्रर्थात् पृथ्वी चन्द्र सूर्य में यातायात ग्रन्थियाँ एक ,, ( आना जाना ) करते रहते हैं । ये तीन प्रकार के बन्धन का कारण ( हेतु ) है । अत्र इन तीनों के प्रत्येक में दो दो भाग है, अमृत से बाह्य पुद्गलरूप शरीर मृत्य भाग हैं किन्तु उसमें परिव्याप्त भाग , प्राणरूपअमृतभाग है । इस श्रमृत उत्पन्न होता रहता है । जिस प्रकार कोपकार कीट ग्रपने नाना ऊपर अपनी रक्षा के वास्ते कोप रूपी है किंतु घर बनाता है और उससे अपने को सुरक्षित करना चाहता उसकी अज्ञानता से किसी समय है कि वह कोप इस प्रकार जटिल ( जाता से जिसमें जालदार ) और धन बन फसकर बहु कीट अपना प्राण दे देता है इसी इच्छा , प्रकार यह अमृतात्मा अपना ही प्राण अपनी ही मन की लगाकर अपने ही वाक भाग को परिवर्धित अपना ( बढ़ाकर ) और परिवर्तित करके । आवरण मृत्युमय शरीर बनाकर उस अधिष्ठान है ( घर, जगह ) में रहकर भोगने की लालसा करता किन्तु कभी र अविवा के प्रबलता के कारण वह है कि प्रावरण शरीर ऐसा जटिल और घन वन जाता

पृष्ठ 413

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* ब्रह्मविज्ञान जिसके कारण वह किन्तु चेतनात्मा अपनी चेतनता को नष्ट कर पापाण आदि जड़रूप में दिखाई देता है । वाणी यदि उकताकर उसमें विद्या की हानि नहीं होती तो उस अपने से बना हुये मृत्यु रूपी आवरण से उसको दया के शरीर को छोड़कर करता है । कावली ( कक = केचुआ ) को छोड़कर सर्प अनुसार यह प्रात्मा से अपना आवरण रूप वैसा शुद्ध रूप में अलग हो जाता है । किन्तु फिर अपने स्वभाव ही शरीर बनाने रूपी से उस अमृतभाग का लगता है इस प्रकार बनाये हुए अपने शरीर मृत्युभाग एक हृदयन्थिबन्धन अविद्या होता रहता है और टूटता रहता है । इस अमृतमृत्यु भाग के परस्पर बन्धन टूटने को मृत्यु सुन से या ही देहारत उत्पन्न कहते हैं । ( शरीर आत्मा के तीनों लोकों में भ्रमण के तीन कारण ) के मर्त्य तीन स्थिति के कारण हैं । अर्थात् भुत आत्मा भाग के भाग ही तीनों लोकों में यात्रा या है क्योंकि इस मत्यं भाग की ग्रन्थि कारण उसका अमृत भाग मर्त्य भाग से बद्ध होकर पृथ्वी लोक में रहता सूर्य आदि लोकों में न इस पृथ्वी शरीर कहीं भी चन्द्रमा, जा से है । पृथ्वी से अलग पाञ्चभौतिक भूतआत्मा सकता के कारण है, और शरीर से हृदयन्थि बन्धन का प्रमृतभाग न रह सकता है, उस पावनतिक की ग्रन्थि टूटने पर मृत्यु मृत्यु शरीर भी पृथ्वी लोक में बना है । किन्तु भूतात्मा के अमृत, के प्रावरण नष्ट होने को पृथ्वी में रहता क्योंकि भौतिक मृत्यु पर छोड़कर अमृतात्मा चन्द्रमा में जाता है । सौमिक मृत्यु भाग की उस रहता है और उस सोम के ग्रात्मा में सौमिक मृत्यु भाग ही शरीर से प्रावरण शेष अमृतभाग से हृद्ध्रथि बंधन कारण चन्द्रमा मृत्युभाग का सौमिक ग्रंथि टूटने है, वह से हृन्थि है और उस सौमिक सोमिक अमृत, मृत्यु की जब तक में रहना पड़ता है । जाने के लिए पर सौमिक टूटे उस ग्रात्माको लोक जाता है । सूर्य में के सूर्य में चला उस मृत्यु को चन्द्रमा में छोड़कर वह अमृत आत्मा योर मृत्युभाग की सूर्यमण्डल आत्मा में है । उस तक उस साथ सौर मृत्युभाग का शरीररूपी आवरण ही कारण है इसके कारण जब हृद्ग्रन्थि की ग्रन्थि रहती है और उस मृत्यु भाग के साथ अमृतआत्मा , सौर ग्रात्मा के । इसलिए आत्मा मृत्यु की में शेष नहीं रह जाती केवल भी ग्रन्थि यदि कोई उस आत्मा प्रकार " भौतिक स्थूल टूट जाय तो फिर मृत्यु " है और इस ही शुद्ध अमृतभाग का " कैवल्य आवरणों से मुक्ति को शरीर " " ही शेप रह जाता है यही आत्मा " इन तीनो मृत्यु के से हृद्ग्रन्थि के मुक्ति कहते सौमिक सूक्ष्मशरीर " और " सौर कारणशरीर भूतात्मा का महान् क्षेत्रज्ञ के जाल टूटने हैं । इस प्रकार की तीनों हृदुग्रन्थि या तक इन सब हृद्ग्रन्थियों पर अमृत मृत्यु जाता है । जब शुद्धात्मा सच्चिदानन्द रूपी ईश्वर में लय हो उस अमृत है । संभवतः में आत्मा रहती अमृत मृत्यु की ग्रन्थि न टूटे तब तक सूर्यलोक होने पर शेष श्रात्मा । भूत भाग से मुक्ति भूतात्मा कहलाता था पृथ्वीलोक मे था तब से बंधा में जाकर क्षेत्रज्ञ -हुआ ग्रात्मा आत्मा सूर्य चन्द्रमा होने पर शेष न , में रहकर सोम से भी मुक्त न भूतात्मा रहा आत्मा गहान्ग्रात्मा था । होने हर शेषआत्मा अमृतब्रह्म ही कहलाने कहलाता सूर्यरस से मुक्त से मुक्त होकर वह शुद्ध महान्आत्मा लगा । किन्तु वहा पर भी क्लेशों सूक्ष्म और सब, हो जाता, न क्षेत्र आत्मा । सब ग्रावरण, सब बन्धन, के या स्थिति के निमित्त स्थूल है | पृथ्वी लोकों में गति , चन्द्र यासूर्य इन तीनों [ ३८१ ]

पृष्ठ 414

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कारण यही तीन शरीर थे । इन तीनों लोकों में यातायात नहीं कर सकता यही ( प्रेत्य = * ब्रह्मविज्ञान मर्त्य शरीरों के न रहने पर ग्रात्मा पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य इन तीनों मुक्ति का कारण है । ४- प्रेत्यस्थिति मरने के उत्तर याने पीछे । अनुशय के नाश का प्रभाव ) यहां पर यह प्रश्न हो सकता है कि हमारी ग्रात्मा चार आत्माओं की बनी हुई है । सबसे बाहर भूतश्रात्मा उसके भीतर क्षेत्रज्ञग्रात्मा और उसके भीतर चिदात्मा है । इस चिदात्मा को छोड़कर पीछे की तीन आत्माओं के अमृत औरं मृत्यु में दो दो भाग हैं । भूतात्मा के भौतिकशरीर टूटने पर उसका अमृत-भाग कहां गया यह स्पष्ट ज्ञात नहीं होता क्योंकि चन्द्रमा में गए हुए आत्मा को महान्यात्मा कहा है जो कि भूतआत्मा के दोनों भागों से पृथक् है । इसी प्रकार महान् का भी सौमिकशरीर छूटने पर क्षेत्रज्ञग्रात्मा सूर्य में गया, किन्तु महान् का ग्रमृतआत्मा कहां गया यह स्पष्ट ज्ञात नहीं होता तो इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है कि इन पहले की तीनों ग्रात्माओं में मर्त्यभाग दो प्रकार के हैं । एक शरीररूप और दूसरा अनुशयरूप । इनमें केवल शरीर का ही त्याग होता है, किन्तु अनुशय का त्याग नहीं होता । कारण यह है है कि इन तीनों आत्माओं में भूतात्मा ही कर्म श्रात्मा है अर्थात् कर्मजन्य संस्कार इस भूतात्मा में ही होते हैं और यही ग्रात्मा सुख दुःख भोगता है । इसलिए जब तक मोक्ष की अवस्था न हो अर्थात् कर्म संस्कार के बने हुए सब मृत्यभागों से मुक्त होकर शुद्ध विद्यारूप न हो तब तक उस भूतात्मा में कर्म सर्वथा निवृत्त नहीं होते इस से वह कर्म भोग उत्पन्न करने के लिये बीजरूप से अवश्य ही भूतात्मा में रहता है, उसी बीज को अनुशय कहते हैं, तो ऐसी दशा में पृथ्वी में स्थूलशरीर छूटने पर भी उस शरीर का अनुशय रूप मर्त्यभाग ग्रात्मा से नहीं छूटता । इसलिए अमृत मृत्यु दोनो भागों का बना हुया भूतात्मा ही रहता है । इसी प्रकार चन्द्रमा का बना हुआ सौम्यशरीर चन्द्रमा से छूटने पर भी उसका अनुशय ग्रात्मा से नहीं छूटता । इसी प्रकार क्षेत्रज्ञ का शरीर छूटने पर भी उसका श्रनुशय ग्रात्मा से नहीं छूटता । तात्पर्य यह है कि जैसे यहां पृथ्वी में भूतआत्मा में महान् और उसमें क्षेत्रज्ञ, इसे प्रकार तीनो मिले हुए रूप में हैं उस प्रकार चन्द्रमा में श्रीर सूर्य में भी उन तीनों ग्रात्माओं का मिलाव है । यही कारण है कि जो आत्मा पृथ्वी पर था वहीं चन्द्रमा या सूर्य पर गया ऐसा कहा जा सकता है । यही भूतात्मा चन्द्रमा में नहीं जाता और महान् भी सूर्य में नहीं जाता तो एक ही ग्रात्मा का तीनों लोकों में परिभ्रमण कहना अनुचित होगा । अलबत्ता एक ही ग्रात्मा रहने पर भी उसका इन तीनों स्थानों में तीनों ग्रात्मा की बनी हुई शरीर की विशेषता अवश्य रहती है । तात्पर्य यह है कि मृत्यु के पश्चात् भी तीनों ग्रात्माओं के अमृत और मृत्युभाग पृथ्वी में जीवन के अनुसार ही बने रहते हैं और उसी मर्त्यभाग के स्त्री के उदर में शुक्र, शोणितरूपी मर्त्य-भाग के साथ यह भूतात्मा चन्द्रमा से प्राकर मिल जाता है । किन्तु यह ऊपर की अनुशय की कथा उसी दशा में जाननी चाहिए जब नष्ट न होने से श्रात्मा भोग चक्र या जन्म मृत्यु के चक्र में परिभ्रमण करता हो । हो हो कर आत्मा शुद्ध विद्यारूप हो जावे तो उस समय की यात्रा में भूतात्मा का [ ३८२ ] तक कर्मों की वासना कर्मों के संस्कार नष्ट स्थूलशरीर लुटने पर

पृष्ठ 415

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ब्रह्मविज्ञान उसका अनुणम भी जाता रहता है । तो उसका अमृत भाग उपाधि निर्मुक्त होकर महान् के अमृत भाग में लीन हो जाता है और बिना भूतात्मा के महानुग्रात्मा चन्द्रमा में जाता है । इसी प्रकार वहां भी सौमिक -शरीर छूटने पर उसका अनुशय भी छूट जाता है, और महान् का अमृतभाग क्षेत्रज्ञ के प्रमृत भाग में लीन हो जाता है । महान् के बिना ही एक क्षेत्रज्ञ रह जाता है, इसका भी शरीर और अनुशय दोनों नष्ट होने पर उसका अमृतश्रात्मा शुद्ध चिदात्मा रूप रह जाता है, यही मुक्ति है । ( भिन्न लोकों में भिन्न शरीर ) जब तक अनुशय निवृत्त नहीं होता तब तक पृथ्वी में आने पर भौतिक ग्रनुशय ही पृथ्वी से पञ्च-भूतों को ग्रहण करके नया शरीर बनाता है और इस प्रकार शरीर संयुक्त होने को ही पृथ्वी में जन्म कहते हैं । किन्तु पृथ्वी से दूसरे लोकों में जाने के समय पृथ्वी का भौतिक शरीर पृथ्वी पर ही रह जाता है । केवल अनुशय लेकर चन्द्रमा में जाता है वहां भी सोम के अनुशय भाग से चन्द्रमा का रस संमिलित होकर एक सौमिक शरीर बनाता है । उसी शरीर से चन्द्रमा में कुछ समय तक जीवन निर्वाह करता है, वह शरीर भी चन्द्रमा से अन्यत्र नहीं जा सकता । इसी कारण चन्द्रमा दूसरे लोक जाते समय उस शरीर को छोड़कर केवल अनुशय को लेकर सूर्य या पृथ्वी में आता है । सूर्य में भी वहा के अनुशय के कारण सूर्य का मिश्रित होकर सौर शरीर बनाता है और उसी शरीर से कुछ समय तक सूर्य में स्थिति रखता है किन्तु सूर्य से दूसरे लोक में जाते समय उस और शरीर को वही छोड़कर केवल वहां के अनुशय को लेकर जाता है | यही कर्म बन्धन चक्र में परिभ्रमण का क्रम है, और ये ही भिन्न - भिन्न तीन शरीर इन तीनों लोकों में जीवन के लिये स्थिति के कारण हैं । ( लोकों में बीच की स्थिति ) अब यहां प्रश्न यह होता है कि पृथ्वी से शरीर छूटने पर और चन्द्रमा में नया शरीर धारण करने के पहले इस बीच की दशा में इस आत्मा का कोई शरीर रहता है या नहीं । इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार होगा कि प्रथम भूतात्मा में ३ भाग हैं वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ इनमें वैश्वानर प्राण और प्राज्ञ ये दोनों ही साथ ही शरीर में प्रवेश करते हैं, साथ ही रहते हैं और साथ ही शरीर से बाहर जाते हैं ऐसा ही कौषितक ऋषि ने सिद्धान्त किया है । उसमें प्रज्ञा से चेतना बनी रहती है, और वैश्वानर - अग्नि के सम्बन्ध से पांचों भूतों का अनुशय साथ रहता है । इसी अनुशय के कारण से प्राकाश में जाते समय वायु के द्वारा पांचों भूतों के कुछ - कुछ अंश अपने आप उस अनुशय में आ लगते हैं । जिस प्रकार वायु द्वारा वस्त्र पर या घर में गर्द जम जाता है उसी प्रकार पञ्च भूतों का एक स्तर जम जाने से वही उस वैश्वानर या प्रज्ञात्मा का शरीर बन जाता है । इस शरीर को यातना ( तकलीफ ) शरीर या भोग शरीर कहते हैं । जब तक दूसरे लोक में वहां के तत्त्वों को लेकर ग्रात्मा नया शरीर ग्रहण न करें तब तक यह भोग शरीर नहीं मिटता किन्तु नरक लोक में जाने पर यह नया शरीर नहीं छूटता इसी भोग शरीर से नरक का भोग पाता है, इसलिये इस शरीर को विशेष रूप से यातना शरीर कहते हैं । सूर्य आदि लोकों से प्रत्यावर्तन के समय चन्द्रमा में होकर जब यह श्रात्मा पृथ्वी की ओर आता है तो फिर वायु द्वारा [ ३८३ ]

पृष्ठ 416

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* ब्रह्मविज्ञान पूर्ववत् नया भोग शरीर उत्पन्न हो जाता है | कितनों ही का मत है कि यह वायु पृथ्वी से ऊपर बहुत ही थोड़ी दूर हैं, चन्द्रमा में वायु सर्वथा नहीं है, परन्तु यह मत विशेष ग्रादरणीय नहीं है प्रत्युत श्रमपूर्ण है । यह विश्वास रखना चाहिये कि ग्राकाश का तिलमात्र प्रदेश भी कहीं वायु से शून्य नहीं है गलबत्ता पृथ्वी चन्द्र सूर्य ग्रादि घन पिण्डों के चारों ओर यह वायुस्तर कुछ स्थूल हो जाता है । किन्तु शेष स्थानों में प्रति सूक्ष्म रूप से स्तब्ध ( डटा हुआ ) रहता है यही सूक्ष्म वायु होने का कारण है, कि आधुनिक यन्त्रों में बायु का सञ्चार स्पष्ट रूप से न मालूम होता हो पर्वतों के उच्च शिखर पर जाने से श्वास में बाधा पड़ती है वह ग्राक्सीजन की कमी के कारण है न कि सर्वथा वायु के अभाव से चन्द्रा में भी वायु है और यहां भी जीव हैं, विष्णु पुराण में लिखा है-अङ्ग ुलस्याष्ट भागोपि न सोऽस्ति सुनि सत्तम । न सन्ति प्राणिनो यत्र, कर्मबन्ध निबन्धना ॥१ ॥

स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मैः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरैरपि ।

स्थूलैः स्थूलतरैश्चैतत् सर्व प्राणिभिरावृतम् ॥२ ॥

इस सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी से चन्द्रमा तक जाने में अथवा चन्द्रमा से पृथ्वी तक ग्राने में पञ्च-भूत के संयोग से एक कल्पित शरीर हो जाता है । किन्तु उस शरीर में विशेषता यह है कि पृथ्वी पर जन्म लेने के पश्चात् यह भौतिक शरीर जिस प्रकार जीवन काल में बढ़ता घटता रहता है, उस प्रकार वह भौतिक शरीर नहीं बढ़ता है । पाषाण खण्ड के अनुसार १३ नक्षत्र मास तक समान भाव से रहता है, अर्थात् बाल्य, युवा ग्रादि यवस्था का परिवर्तन नही होता । जिस अवस्था की आत्मा प्रेत होती है उसी ग्रवस्था में रहती हैं इसका कारण यह है कि इस भूतात्मा में जिस प्रकार वैश्वानर और प्राज्ञ ग्रात्मा बने रहते हैं, उस प्रकार तैजस श्रात्मा नहीं रहता । तेजस श्रात्मा सूर्य, चन्द्र और विद्युत् से बनी हुई है । तँजस आत्मा में सूर्य चन्द्र का भाग अलग होकर केवल विद्युत्का भाग ही साथ रहता है । किन्तु बढ़ने घटने की शक्ति वृक्ष या प्राणियों का ऊपर की ओर उठाना या शरीर का फैलाव इस विद्युत् में सूर्य चन्द्र के रस के याज्ञिक संयोग से होती है । प्रेतात्मा में सूर्य, चन्द्र के रस नष्ट होने से वह ऊपर जाने की शक्ति जाती रहती है । इस वास्ते यह यातना शरीर ज्यों का त्यों समान भाव से बना रहता है । इस सम्बन्ध में यातना शरीर की उत्पत्ति या परिवर्तन का क्रम मनुस्मृति के १२ अध्याय में १६ से २२ श्लोक तक विद्रूप से निरूपण किया है । इस प्रकार भूतात्मा की प्रेत अवस्था में उसके साथ महान् श्रात्मा और क्षेत्रज्ञग्रात्मा भी अवश्य ही रहती है । किन्तु यदि वह भोगकर ग्रात्मा चन्द्रमा या पितृ स्वर्ग में भोग की यदि सूर्य में जाती है तो उसके साथ महान्त्रात्मा है है । किन्तु , रहती या विषय विचाराधीन अधिक सम्भव यही है कि जब तक ब्रह्मपथ ग्रर्थात् गुक्तिमार्ग में यह नहीं भूतात्मा यह न जावे, तब तक इस भूता त्मा का महान् और क्षेत्रज्ञ इन दोनों ग्रात्माओं से सम्पर्क ( मेल ) नहीं टूटता ऐसा ही मनु ने कहा है--तौ धर्मं पश्यतस्तस्य, या पञ्चातन्द्रितौ सह । याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम्॥ [ ३८४ ]

पृष्ठ 417

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* ब्रह्मविज्ञान तात्पर्य यह है कि महान् सावधानी से और क्षेत्रज ये दोनों साथ के पहले रहकर देखते रहते हैं ग्रात्मा इस भूतात्मा पाप और र पुण्य को बड़ी इस मनुष्य । जिन दोनों के साथ मिलकर क्षेत्रज्ञ जीवन में यह भूतात्मा मृत्यु के पश्चात् भी मुख दुःख भोगता है या आत्मा सम्बन्धी यह मनुका सिद्धान्त उचित भी प्रतीत होता लिये विज्ञान के विचार है क्यों पाप से ही समझ बुझ कर पुण्य का संस्कार यह भूत आत्मा पाप पुण्य करता है उत्पन्न, इस यह पाप होने में भी उस विज्ञान का सहयोग पुण्य संस्कार विशेषकर आवश्यक है । इसके अतिरिक्त महान आत्मा में उत्पन्न होता है क्योंकि , महान आत्मा में ही ग्रहङ्कार इन संस्कारों संस्कार को उत्पन्नकरता है । ' मैंने किया ' ऐसा ग्रहङ्कार यदि विज्ञान उत्पन्न ही नहीं ग्रात्मा में न हो तो सम्बन्ध हो सकता । तात्पर्य से जो एक यह है कि विज्ञान, महान और भूतात्मा इन तीनों के परस्पर उत्पन्न आत्मा का स्वरूप होते हैं बनता है उसी में परस्पर के कार्य कारण भाव से कर्मों के संस्कार इसलिये यदि ये तीनों मानना आत्मा पृथक - पृथक हो जायें तो किसी कर्म का संस्कार उत्पन्न नहीं हो सकता ये तीनों होगा कि मनुष्य जीवन के ग्रात्मा अनुसार मृत्यु के पश्चात् भी चन्द्रलोक या सूर्य लोक में भी अभिमान साथ रहते हैं इसलिये किये भी, उसे अपनी योनि का ज्ञान और अपने हुए पाप पुण्य का बना रहताहै । ५ - गतिमार्ग ( १ - शरीर के भीतर आत्मा का गतिमार्ग ) सुपुप्ति येतीन अवस्था किसी होकर सवार विहार धारण करके विहार करता है किन्तु जिस प्रकार कोई रथी रथ पर इस करता प्रकार विज्ञान सहित प्रज्ञान शरीर हुआ अन्त में कभी उस रथ को छोड़ देता है । उसी यह कारण रूपी रथ को है । इस रथ के छोड़ने का यह छोड़कर दूसरे रथ का अन्वेषण ( तलाश ) करता बड़े है कि इस अतिरिक्त और भी शरीर में बड़े-छिद्र हैं शरीर में अनुमान ३ || करोड रोमकूप हैं इनके में प्रतिक्षण । इन्द्रियादि की अग्नि या शरीर के मैल पसीने रूप इन सुक्ष्म स्थूल छिद्रों के द्वारा शरीर , पूर्व बाहर निकलते धीरे चौड़े होते जाते हैं जिसके कारण अपेक्षा रहते हैं । जिसके घर्षण से ये छिद्र धीरे - के भोजन पश्चात् तात्पर्य यह है कि २५ वर्ष तक अन्नादि से वो अग्नि अधिक ग्रग्नि का क्षय होता रहता है । अपेक्षा अधिक होने के कारा बचरहती उत्पन्न होती है वह इन छिद्रों के द्वारा अग्नि क्षय की बन्द होकर है, वह आती है । २५ से ४० तक वृद्धि पुष्टि शरीर के अद्धों की वृद्धि में या पुष्टि में काम से शरीर की होती रहती है निगम ( आमद खर्च ) बराबर होने । ४० से ७० तक ग्रागम इसभूतात्मा में प्रधान ही शरीर में जायत् स्वप्न प्रज्ञात्मा विज्ञान आत्मा से संयुक्त होकर इस,, वृद्धि और पुष्टि में मांस वन्द करने की कमी के कम होने से अन्न के ग्रहण के साथ अग्नि भी कम होती जाती है । अग्नि - साथ जिससे शरीर निगंग अधिक होता है हो जाती है । ७० के पश्चात् आगम की अपेक्षा की शक्ति भी कम की कमी से फिर उसकी भी पाचन ' होती जाती है की कमी और । इस प्रकार अन्न ग्रग्निमें अन्न नष्ट होने लगता है । यह यज्ञ ही की ग्राहति यज्ञ धीरे - धीरे के कितने ही प्रज्ञान को न्यूनता के कारण प्राध्यात्मिक इस शरीर ग्रंश की स्थिति स्वरूप नष्ट होने पर सडकर का मुख्य कारण है । यज्ञ का वास्तव से घूरा करके प्रज्ञान ग्रात्मा अनात्मिक होकर उन हो जाते हैं । जिनके दबाव से व्याकुल [ ३८५ ]

पृष्ठ 418

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* ब्रह्मविज्ञान इस शरीर रूपी रथ को छोड़ देता है और दूसरे नवीन दृढ़ रथ का अन्वेषण करता है । उस समय यह प्रज्ञान आत्मा शरीर के प्रत्येक अङ्ग को इस प्रकार छोड़ता है जैसे कोई फल पकने पर अपनी टहनी को छोड़कर नीचे पृथ्वी की ग्रोर गिरता है । उसी प्रकार यह प्रज्ञान ग्रात्मा शरीर को छोड़कर ऊपर आकाश की ओर उड़ता है । किन्तु प्रथम यह गांव की ओर हटता हुआ सर्वाङ्ग शरीर से धीरे - धीरे हृदय के अग्रभाग में एक तिल मात्र ज्योति को लेकर प्रकाशित होता है, उस ममय सर्वाङ्ग शरीर को स्पर्श करने पर कहीं भी ज्ञान उद्बोध न होते हुए भी केवल हृदय में कुछ होश रहता है और नाड़ी की फड़कन बन्द होने पर भी हृदय की धड़कन बनी रहती है । अन्त में हृदय को छोड़कर जाते समय ये सब इन्द्रियां और मुख्य प्राण और पश्चभूतों का ग्रनुशय, वैश्वानर और विद्यतु इन सब को साथ लिये हुए प्रज्ञान ग्रात्मा हृदय को लात मार कर ऊपर जाता है । नित्य उसके साथ रहने वाला महान् और विज्ञान-ग्रात्मा भी प्रज्ञान के साथ चला जाता है । प्रज्ञान ग्रात्मा यदि पापी है तो पाप के बोझसे दबकर हृदय के नीचे किसी न किसी अङ्ग से निकलता है । पाप पुण्य समान होने पर हस्त यादि के द्वारा निकलता है, और उत्तम जीवों की ग्रात्मा मुन्य, चक्षु, श्रोत्र या मस्तक के मार्ग से निकल जाता है । उसके निकलने के लिये हृदय से चारों ओर नीचे ऊपर फैले हुए जो हिलाना की नाड़ियां जो पहले कही जा चुकी हैं, उन्हीं नाड़ियों के नीचे या ऊपर किसी ओर प्रज्ञात्मा निकलता है । यही हितानाड़ी शरीर से बाहर निकलने के लिये इस भूतात्मा का शरीर के भीतर सबसे प्रथम गति का मार्ग है । ( र - स्थूल शरीर छोड़ते समय आत्मा के सूक्ष्म शरीर का परमाणु ) इस भूतात्मा की सब मिलकर ७ अवस्थायें होती हैं— जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, मोह, मूर्छा, मृत्यु और मुक्ति इनमें मूर्छा, सुपृप्ति और मुक्ति इन तीनों दशा में श्रात्मा - धूम, ज्योति, जल, वायु, मेघ यादि के अनुसार ग्रशरीर होता है । क्योंकि श्रात्मा के निजरूप में कोई शरीर नहीं है । किन्तु जाग्रत् या मोह अवस्था में बाह्य स्थूलशरीर का अभिमान रखता हुया श्रात्मा स्थूलशरीर परिच्छिन्न होता है, केवल नखाग्र और केशाग्र को छोड़कर सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । इसलिये शरीर का परिमाण ही उस श्रात्मा का परिमाण है । अबशिष्ट दो अवस्था स्वप्न और मृत्यु - इन दोनों में यह श्रात्मा अङ्गष्ठ परि-मित शरीर रखता है । यह ग्रात्मा यद्यपि श्रङ्गष्ठ परिमित ही इस शरीर में सर्वदा रहता है, किन्तु वही इस विशाल शरीर में सूक्ष्म रूप मे पसर ( फैल ) कर अधिक देश व्यापी हो जाता है । किन्तु इस स्थूलशरीर का सम्बन्ध लूटने पर फिर वह अपने परिमाण में ग्राकर श्रङ्गष्ठ परिमित हो जाता है । स्वप्न अवस्था में भी यह आत्मा इसी श्रङ्गष्टमात्र शरीर से विचरता है और मृत्युकल में भी ग्रङ्ग ुष्ठ-मात्र शरीर से ही इस स्थूलशरीर से बाहर होता है इसीलिये सावित्री में पुराणों में लिखा है- सत्यवान् के उपाख्यान भूतों का

अथ सत्यवतः कायात्, पाशबद्धं वशङ्गतम् ।

अङ्ग ुष्ठमात्रं पुरुषं निश्र्चकर्म यमोवलात् ॥ १ ॥

यद्यपि प्राज्ञात्मा अपने स्वरूप से अशरीर होने के तथापि कारण कुछ भी श्रायतन नहीं रखता ग्रनुशय, पञ्चदेवता, छन्द, स्ताम आदि दश ग्रवयव का आदि विराट् महान्ग्रात्मा, क्षेत्रज्ञश्रात्मा [ ३८६ ]

पृष्ठ 419

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ब्रह्मविज्ञान कितने ही कर्म वसन संस्कार के इन्हीं शरीर सम्बन्ध से वह यज्ञात्मा अशरीर भी सशरीर बना हुआ निकलता है । के अवयवों के और कारण इस भूतात्मा म गुप्ता, लघुता भी देखी गई है । लघुता से ऊपर की गुरुता से नीचे की ओर गतिहोती है । उसी शरीर का प्रायतन अङ्ग ष्ठ मात्र कहा गया है । प्रत्ययज्ञान ( मृत्यु के पश्चात् इन्द्रियजन्य ज्ञान ) भूत ग्रात्मा शरीर से पांचों इन्द्रिय प्राणों को साथ ले जाता है । उस समय बाहर निकलते समय से इन इन्द्रियों देवताओं के साथ जो चक्कर इन्द्रियों देवताओं का अग्नि सूर्य दिक चन्द्र- इन पांचों , वायु,, टूट तक और देवताओंों से इन्द्रियों सम्बन्ध जीवनकाल में बना हुआ था वह जाता तक पतिसन्धान के है इस प्रतिसन्धान सम्बन्ध नष्ट होने कारण कारण जिस प्रकार आँख बन्द करने से सर्व रश्मि का दृष्टि नहीं देवताओं का सम्बन्ध टूटने के कारण किसी भी इन्द्रिय होती, उसी प्रकार मृत्यु के पश्चात् पांचों के साथ छठा मुख्य प्राण से ज्ञान उत्पन्न पांचों इद्रिय प्रारणों जिसे नहीं होना चाहिये था, तथापि की मात्रा-इन्द्र कहते हैं है वही उस समय पूर्वोक्त पञ्चभूतानुशय , जिससे पांचों इन्द्रियों का सम्बन्ध ग्रों को लेकर स्मरणकालीन ज्ञान के अनु । जिससे शब्द, स्पर्श गन्धों का उद्बुद्ध करता है , रूप, रस, जन्य-सार उस किञ्चित् किचित् इन्द्रिय समय में पहुंचने तक ज्ञान अर्थात् पृथ्वी को छोड़ने के पश्चात् चन्द्रमा के साथ सहयोग बना उत्पन्न होता से का मुख्य प्राण रहता है रहता है । वैश्वानर के बने रहने प्राज्ञात्मा केवल विद्यत् ही मन का सच्चा-। किन्त तैजस होने के कारण होता लन किया प्राण का सूर्य रस चन्द्र रस नष्ट होते हैं मन का भी व्यापार , है करता है इन्द्रियजन्य ज्ञान में शब्द, जिससे । तात्पर्य यह है कि जिस समय के पश्चात् बाह्यजगत् मन पर हो जाता है । मृत्यु को ही लेकर स्मरण स्पर्श आदि उन पांचों विषयों का संस्कार उत्पन्न के संस्कारों मात्र विषयों का संयोग यथार्थ स्पष्ट न होने से केवल मन उन मलिन ज्ञान होता है । ज्ञान होता ज्ञान न होकर है, पूरा ज्ञान नहीं होता इसलिये यथार्थ शुक्ल, कृष्णमार्ग किन्तु शेष प्र स्वरूप है. । इनमें मन ज्योति ये तीनों ही ज्योति ग्रात्मा मन तीनों से विधातु है में बटा हुआ है, और हैं ।, प्रारण, वाकू इन तीन स्वरूपों कहा जाता है और मन यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञान क्रिया अर्थात् इन होने से शुक्ल करता ,, प्राण प्रकाश स्वरूप भावों को पुष्ट अर्थ, वाकू से हैं इनमें ज्ञान का भाग है जो मन के के ग्रज्योति उत्पन्न होते दो प्रकार का भी दो प्रकार है वह होने से है । किन्तु प्राण प्राणजन्य कर्म आत्म ' ग्रच्छ कृष्ण कहलाता ' है इसी कारण कहते हैं, और हुये ' है ' अनच्छ को पुण्य । | वाक की पुष्टि करने वाला ऐसे कर्मों कहते हैं ज्ञान सहकारी हो कमों को पाप विरोधी को उत्पन्न करने वाला अथवा ज्ञान का वाले हों ऐसे विकार हैं, धर्मो नाश करने ही वाकू के पुण्य को उत्पन्न करने वाले अथवा ज्ञान का ये तीनों शुक्ल और और भूतों के पांच गुरण पाप कृष्ण हैं । काम और शुक्र | * इन्द्रियों तक चक्कर से इन्द्रियों से देवताओं तक और देवताओं [ ३८७ ]

पृष्ठ 420

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* ब्रह्मविज्ञान इसलिये पाप होने पर भी ज्ञान के सम्बन्ध होने न होने से इसमें भी तारतम्य है । प्रर्थात् काम ‘ अच्छ ’ हैं, भूतगण ' अनच्छ ' है, किन्तु पुण्य कर्मों का शुक्र ' अच्छ ' और पाप कर्मो का शुक्र ' श्रनच्छ है और इसी प्रकार अर्थ भी जो वाक् के विकार हैं वे तीन प्रकार के हैं । स्वतः प्रकाश, परप्रकाश, रूपप्रकाश या अ-प्रकाश । इनमें आदि के दो जो ग्रच्छ हैं वे शुक्ल कहे जाते हैं और तीसरा ग्रनच्छ होने से कृष्ण कहा जाता है । तात्पर्य यह है कि ग्रात्मा से लेकर जगत् का प्रत्येक पदार्थ दो भागों में बटा हुआ है । जो स्वयं प्रकाशवान् है, या प्रकाशवान् से सम्बन्ध रखता है वे सब शुक्ल हैं और शेष जो प्रकाश विरोधी हैं वे सब कृष्ण हैं । इस व्यवस्था के ग्रनुसार गति के मार्ग भी दो प्रकार के होते हैं । देवयान, पितृयान - शुक्लमार्ग को देबयान, और कृष्णमार्ग को पितृयान कहते हैं । इन दोनों मार्गों का शरीर में ही श्रात्मा के उत्क्रमणकाल से प्रारम्भ होता है । इस ग्रात्मा को उत्क्रमणकाल में इन दोनों मार्गों में से किसी एक मार्ग पर सवार होने के लिये कई कारण होते हैं, जिनमें दो मुख्य हैं, एक अवस्था, दूसरा कर्म । अवस्था जैसे स्वप्न की दशा में अथवा सुपुप्ति की दशा में जब कि प्रज्ञान आत्मा को साथ लेकर विज्ञानग्रात्मा पुरीतत नाड़ी में चला जाता है तो यदि उसी समय प्राण का उत्क्रमण हो जाय ती कृष्णमार्ग होता है । क्योंकि सोते से जागते समय जिस प्रकार प्रज्ञान, विज्ञान दोनों आत्मा एक बारगी भूतों में दौड़ आते हैं उसी प्रकार उत्क्रमण या मृत्यु में भी उन्ही भूतों में ग्रङ्ग २ में पृथक् २ समा जाते हैं और भूतों में ही ज्ञान या चेतना से भ्रष्ट होकर लीन हो जाते हैं | भूत के तम में प्रवेश होने के कारण वह ग्रात्मा कृष्ण मार्ग पर सवार हो जाता है, किन्तु उसकी गति नहीं होती । कृष्ण मार्ग पर ग्रारूढ़ होकर भी इस भूतमय पृथ्वी के उर्द गिर्द भूवायु में परिभ्रमण करता रहता है | यदि उस आत्मा में जीवनकाल के पुण्य कर्मों का बल हो तो वे पुण्यकर्म धीरे २ उस ग्रात्मा को अन्धकार से प्रकाश में लाने की चेष्टा करते हैं, और अन्त में किसी समय प्रकाश में ग्राकर गति वाली वह ग्रात्मा हो जाती है । कर्मानुसार लोक लोकातरों में कर्म भोग करके कदाचित् जन्म लेनी है यह एक कृष्णमार्ग का उदाहरण है । इसी प्रकार कितनी और भी यवस्थायें हैं जिनमें भी ऊपर लिखे अनुसार ग्रात्मा विह्वल होकर कृष्ण मार्ग पर सवार होता है, और उसकी भी गति नहीं होती । वे ग्रव-स्थायें ये हैं - विषप्रयोग, भृगुपतन, अर्थात् ऊपर से गिर पड़े, तनिपातन, जलमज्जन ( डूबना ) ग्रग्निदहन भयविह्वलता, पृष्ठेहत ( अर्थात् लड़ाई में खेत छोड़कर भागता हुआ मारा जाय ) इस प्रकार की श्रीर २ हालतों में भी आत्मा की गति नहीं होती किन्तु इनमें ग्रात्मघात की इच्छा न रहने से प्रगति कही गई है । किन्तु यदि ग्रात्महत्या की इच्छा से मरे तो उसकी बोर नरक में गति होती है, जैसा कि वेद में

लिखा है--सूर्या नाम ये लोकाः, ग्रन्धेन तमसा वृताः ।

तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति, येके चात्महतो जनाः ॥

आकाश के अनुसार व्यापक चिदात्मा प्राणों के राम्बन्ध से इस योग्य होजाता है, कि जिससे परिच्छिन्न होकर शरीर के साथ बद्ध रहता है । यह प्राण प्रधान रूप से २ प्रकार के हैं - देव और ग्रसुर । [ ३८८ ]