ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 51–60
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 51–60
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ही हम द्रष्टा को भी पाते हैं; इसलिए द्रष्टा भी एक प्रकार का दृश्य ही है । दृश्य से अलग करके द्रष्टा को कोई सत्ता नहीं । अथवा द्रष्टा प्रत्यक्ष को ही समझना चाहिए । यह प्रत्यक्ष ३ प्रकार का है - सामान्य, बाह्य और श्रान्तर । बाह्य इन्द्रियों से जो देखना - सुनना आदि ज्ञान होता है, वह बाह्य इन्द्रियों के द्वारा होने के कारण बाह्य प्रत्यय है । किन्तु मन ही मन विचार करता हुआ जब किसी बाह्य इन्द्रियों की सहायता नहीं लेता है उसका मानसिक विचार अथवा सुख - दुःख आदि ज्ञान - यह सब प्रान्तर प्रत्यय है । इन दोनों में वाह्य इन्द्रियों और मन का संयोग है । किन्तु इन्हीं दोनों प्रत्ययों में बाह्य इन्द्रिय का और मन का जितना भाग है उसको जुदा करके उनसे अलग एक तीसरे भी ज्ञान का भान प्रतीत होता है । जो देखना, सुनना या मन से समझना सब में एक रूप दीखता है, वही सामान्य प्रत्यय है । इनमें वह सामान्य प्रत्यय जितना मन के संयोग से प्रान्तर प्रत्यय पैदा करता है अथवा बाह्य इन्द्रिय के संयोग से जितना वाह्य प्रत्यय पैदा करता है; यह दोनों प्रत्यय मन और इन्द्रिय के संयोग से उसी समय नये बन गये हैं | ये वास्तव में कोई तत्त्व नहीं हो सकते । तात्त्विक न होने से उनका ज्ञान सत्य नहीं है | अब रहा सामान्य प्रत्यय, सो इन दोनों प्रत्ययों अर्थात् बाह्य और प्रान्तर प्रत्यय इन दोनों के बिना मिलाये कहीं कभी दीखता ही नहीं । तात्पर्य यह है कि जो तत्त्व है, उसका ज्ञान किसी को न कभी हुआ न होगा । और जो ज्ञान हम सब को सदा होते रहते हैं, वे उसी समय के बने हुए प्रतात्त्विक हैं । इसीलिए मिथ्या है । ऐसी सूरत में कोई ज्ञान सत्य नहीं । ४ - दोषमूल का प्रामाण्यखण्डनसूत्र प्रत्यक्ष के अप्रमारण सम्बन्ध में प्रत्यक्ष को सर्वथा अप्रमाण ही मानते हुए कितने ही दार्शनिकों ने इस प्रकार की व्यवस्था रची है कि - प्रांख अपने स्वभाव से जहां जो कुछ देखती है वह सब यथार्थ है, सत्य है, और प्रामाणिक है । किन्तु ग्रांख और वस्तु के मध्य में यदि कोई दोष आजावे तो उस दोष के कारण उस ज्ञान को ग्रप्रमाण कह सकते हैं, किन्तु दोष के संयोग से प्रप्रमाण होने पर भी यह दृष्टि सर्वथा श्रप्रमाण नहीं मानी जाती । हरे काच के संयोग से सूर्य का प्रकाश हरा दीखने पर भी सूर्य का प्रकाश सर्वथा हरा ही नहीं माना जा सकता इत्यादि इत्यादि । किन्तु इस आक्षेप पर यह कहा जा सकता है कि जहां आप दृष्टि के साथ किसी दोष का सयोग समझते हैं, अथवा जहां पर विना दोष के शुद्ध दृष्टि समझते हैं – इन दोनों स्थानों में आँख से किसी विषय का देखना बराबर है, फिर उसमें दोष का प्रदोष की व्यवस्था करना सर्वथा असंगत है । जबकि दृष्टि से कोई वस्तु दीखती अथवा जहां विशुद्ध दृष्टि समझते हैं है तो वहां किसी दोष को दोष कहकर तिरस्कार करना अनुचित है; वहां भी क्या किसी दोष का होना सम्भव नहीं है । हम कह सकते हैं यदि हमारी दृष्टि और किसी प्रकार की बनी होती तो हम इन सब वस्तुनों को दूसरे प्रकार से देखते हुए विचार से जानते, जैसे कि जल के प्रत्येक परमाणु गोल होते हैं, इसलिए जल का धरातल उच्चावच होना चाहिए किन्तु हमारी दृष्टि जल की सतह को समधरातल देखती है । ग्रतः इस प्रांत को हमेशा के लिए क्यों न दोष-| १ ९ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान के दिखाई देते । युक्त मानी जाय । यदि यह दृष्टि निर्दोष होती तो अवश्य ही जल के दाने - दाने पृथक् ऐसी स्थिति में जबकि सभी ग्रांख दोषयुक्त ही हैं तो कहीं सदोष या निर्दोष की पृथक् व्यवस्था करना मिथ्या है अथवा जहां आप दोष मानते हैं वहां उस दोष को दोष मानने के लिए भी कोई प्रमाण आपके पास नहीं है । यदि बुखार में चीनी कड़वी लगे और इसको श्राप दोषयुक्त मानें तो यह आपकी भूल है । यह रसना इन्द्रिय चीनी का मिठास बनाती हुई जिस प्रकार प्रमाणभूत है उसी प्रकार कडवा बताती हुई भी कड़वा बताने के लिए प्रमाणस्वरूप होगी । यदि यह प्रमाण नहीं है तो कडुवे के ज्ञान का विश्वास भी ग्रापको नहीं होना चाहिए । और उसके द्वारा रोग समझ कर उसके हटाने का उद्योग नहीं करना चाहिए । जब ग्राप कड़वेपन पर विश्वास करते हैं तो ग्रवश्य ही वह रसना यापकी प्रमाण है— इसलिये दोष वाली इन्द्रियों को प्रमाण मानना आपका सर्वथा असत्य है । अथवा जिस प्रकार ग्राप चीनी को कड़वी समझने के लिए रसनेन्द्रिय में कोई दोष मानते हैं उसी प्रकार चीनी को मीठी समझने के लिए उसी रसना में कोई दोष हम मान सकते हैं । सम्भव है कि यह दोष सम्पूर्ण जगत् की रसना में साधारण रीति से आगया हो; जिससे बिना मीठे, चीनी को मीठी बनाकर दिखाता हो । इसी प्रकार सफेद शंख को, पीला दिखाने वाले पीलिया रोग में भी समझना चाहिए । मानना चाहिए कि यह पीलिये की बीमारी यदि साधारण रीति से सभी प्राणियों की प्राँखों महांती तो पीला देखते हुए भी ग्राप इसको कभी दोष नहीं कहते । इसलिए कहीं दोष मानना, कहीं न मानना यह ग्रापकी इच्छा पर निर्भर है । उसके द्वारा किसी इन्द्रिय का प्रमाण होना न होना सर्वथा ग्रसम्भव है | इसके अतिरिक्त हम यह भी कहते हैं कि इन्द्रियजन्य ज्ञान को प्रमाण मानने वाले दार्शनिक भी निरिन्द्रियजन्य ज्ञान को प्रमाण नहीं मानते हैं । क्योंकि कितने ही दार्शनिकों ने स्पष्ट स्वीकार किया है कि प्रत्यक्ष होते समय चार व्यापार होते हैं- प्रवग्रह, ईहा, श्रवगम श्रौर धारणा । श्रर्थात् सबसे पहले इन्द्रिय का वस्तु के साथ साधारण संयोग होता है अर्थात् इन्द्रिय के मैदान की हद में वह वस्तु या जाती है । इससे जो संयोग होता है उसको वह कहते हैं । इसके अनन्तर यह क्या झलक पड़ी, यह क्या बस्तु है— इस बात को जानने के लिये उत्सुक होकर मन ग्रपनी चेष्टा करने लगता है और कितनी ही वस्तु का वहां सन्देह उठाकर — किसी अंग का छोड़ना, किसी अंग का उसमें मिलाना इत्यादि – प्राबाप ( मिलाना ) उद्वाप ( हटाना ) करता हुआ औरों को छोड़कर किसी एक वस्तु पर स्थिर हो जाता है— इस प्रकार वस्तु की परीक्षा करना मन की ईहा कहलाती है । जिस प्रकार अवग्रह से इन्द्रिय ने कुछ रंग रूप देख कर मन को निवेदन किया था उसी प्रकार मन अपनी ईहा से कुछ वस्तु स्थिर करके ग्रात्मा को निवेदन करता है । आत्मा उस वस्तु को मन के अनुसार स्वीकार करता है । इसी को श्रव॒गम कहते हैं । श्रवगम होने पर ग्रात्मा उस वस्तु के रूप को चिरकाल के लिए अपने में धारण करता है, जिसके द्वारा समय - समय पर स्मरंग होता रहता है । इसी को धारणा कहते है । इस प्रकार ज्ञान के चार काण्ड हैं । जिनमें प्रथम इन्द्रिय से दूसरा मन से और तीसरा ग्रात्मा से होकर तीसरे दर्जे में ज्ञान का स्वरूप पूर्ण हो जाता है और वही प्रमाण है । ऐसी स्थिति में ईहा जो मन की चेष्टा है उससे पहले ज्ञान का स्वरूप ही पूर्ण नहीं बना फिर वह प्रमाण क्यों कर हो सकता है । ग्रलबत्ता मन [ २० ]
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* ब्रह्मविज्ञान नेहा करके जो वस्तु स्थिर करली है उसी को आत्मा स्वीकार करती है । इसीलिये इन्द्रिय को प्रमाण 11 न मान कर मन के विवेक की ही आप भी प्रमाण मानते हैं और सब को भी वैसा ही मानना चाहिये । चाहे इन्द्रियजन्य ज्ञान हो या बिना इन्द्रिय के कोई ज्ञान हो । सभी में मन की चेष्टा श्रावश्यक है, मन ने विचार कर जो जैसा कहा वही यथार्थ है, सत्य है और प्रमाणिक है । ५ मनःप्रामाण्यखण्डनसूत्र उपर्युक्त रीति से मन को प्रमाण कहा गया है, किन्तु हम देखते हैं कि यथार्थ में मन भी प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि यह मन ही बहुधा मिथ्याविज्ञान उत्पन्न करता है । हम देखते हैं कि किसी वस्तु को कोई मनुष्य अपने मन से अच्छी या बुरी समझता है उसी वस्तु को दूसरा मनुष्य अपने मन से दूसरे प्रकार से देखता है । एक ही वस्तु अच्छी होकर एक ही काल में बुरी नहीं हो सकती ग्रतः इन दोनों प्रकार के मन में एक मन अवश्य मिथ्या है । जबकि एक ही वस्तु को भिन्न - भिन्न भावों से भिन्न प्रकार का मन प्रत्यक्ष कराता है तो उसमें सत्यता नहीं मानी जा सकती । एक मन किसी बात को सत्य कह कर देखता है और उसी वस्तु को दूसरा मन मिथ्या सिद्ध करता है । जिस मन के विवेक को आपने प्रमाण माना है, उसी विवेक का यह काम है कि कोई दार्शनिक इस जगत् को पूर्ण विचार करके सच्चा कह रहा है तो दूसरे दार्शनिक अनेकानेक युक्तियों से विचार करके उसी जगत् को असत् अर्थात् मिथ्या कह रहे हैं । जिस आचार - विचार को एक समाज अच्छा समझ कर उसका यादर करता है और नित्य ही उसका श्राचरण करता है उसी ग्राचार - विचार को दूसरा मनुष्य समाज बड़ी घृणा दृष्टि से देखता है और निन्दा करता है । कहा तक इस मन के विवेक की यह महिमा है, दार्शनिकों के विचार में नाना मतमतान्तर प्रचलित हैं, उपासना में भी कई मतभेद हैं, इन सब में किसका मत सत्य है और किसका मिथ्या यह निर्णय करना कठिन है । अथवा परस्पर प्रत्याघात और प्रतिद्वन्द्विता से सभी मिथ्या कहे जा सकते हैं । यह तो हुई भिन्न पुरुषों के मन की कथा । किन्तु हम एक ही मनुष्य के एक ही मन में देखते हैं कि वह किसी काम को कभी अच्छा या कभी बुरा समझता है । कभी किसी काम के लिये संकल्प-विकल्प करके विरुद्ध दो भाव खड़ा करता है तो ऐसी दशा में सब ही मन को एक रूप से प्रमाण कैसे माना जा सकता है और जब मन के ऊपर पूरा विश्वास नही रहा तो अब इस जगत् के प्रत्येक भाव को जैसा कुछ जिस प्रकार हम देखते हैं, वह बिल्कुल सब वैसा ही है यह निर्धारण करना अत्यन्त कठिन हो गया है, इसीलिये हम कह सकते हैं कि संसार का सब ज्ञान या ज्ञान के सभी पदार्थ संशयरूप में हैं । ६ — आत्माप्रामाण्यखण्डनसूत्र अब यहां पर तीन प्रश्न उठते हैं । प्रथम यह है कि उपर्युक्त प्रकार से ग्रन्यान्य प्रमाण, प्रत्यक्ष प्रमाण और मन के विवेक का प्रामाण्य भी खंडित हो जाने से आपके कथनानुसार माना कि ये सम्पूर्ण जगत् के भाव संदेहमय हैं । इनमें कोई कुछ भी निश्चित रूप से यथार्थ जाना नहीं जा सकता । किन्तु इन्हीं कारणों से यह निश्चित रूप से ही जान लिया गया है कि सब कुछ संदेह से भरा हुआ है । इन सब संदेहों के होने का जो आपका ज्ञान है वह ग्रवश्य निश्चित है । उसमें अब आपको किसी प्रकार का संदेह बाकी [ २१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान नहीं रह गया । एक यही निश्चय ऐसा है कि जिससे आपके संम्पूर्ण संशयबाद की इमारत ढक जाती है । माना कि यह सम्पूर्ण जगत् संदिग्ध है किन्तु इस प्रकार परीक्षा करके सब को सन्दिग्ध निर्धारण करने वाली कोई मेरी श्रात्मा ऐसी बलवान् सत्य बस्तु है, जो विना प्रमाण ही ग्रपने ग्राम को सत्यरूप से प्रकाश करती हुई अपने से अतिरिक्त संपूर्ण जगत् को सन्दिग्ध रूप में हम को दिखा रही है | दूसरा प्रश्न यह है कि हम ग्राप ही से पूछते हैं कि ग्रापने जब सब प्रमाणों का खण्डन कर 11 दिया तो ऐसी स्थिति में यह सम्पूर्ण जगत् संदिग्ध है यही ज्ञान ग्रापको किस प्रमाण से हुआ, या ग्रापका यह ज्ञान सत्य है या नहीं इसमें क्या प्रमाण है । तीसरा प्रश्न यह है कि—यह - यहां पर ग्राम अवश्य यहीं उत्तर देंगे कि बिना अन्तरात्मा इस बात की साक्षी है कि यह सब जगत् संदिग्ध है तो उस पर हम आप अपनी उस ग्रात्मा को अवश्य प्रमाण मानते हैं कि जिसके साक्षी होने से संदिग्धता में विश्वास करते हैं और उसको सत्य मानते हैं तो इससे सिद्ध हुआ मन से भी परे है महाप्रमाण है । यही ग्रापके पक्ष पर बड़ा ग्राक्षेप है । प्रमाण ही मेरी अवश्य कहेंगे कि सम्पूर्ण जगत् की कि यह ग्रात्मा जो इस प्रश्न पर संशयवादियों की ओर से यह कहा जा सकता है कि मेरी ग्रात्मा का मुझको निश्चित हैं इसी प्रकार ग्रन्यान्य व्यक्तियों को भी अपनी - अपनी ग्रात्मा का निश्चित है किन्तु उस पर यह बड़ा भारी संदेह उठता है कि यह हमारा निश्चय ही सत्य है । जिस निश्चय के द्वारा मेरी ग्रात्मा के ज्ञान से तुम या अन्यान्य व्यक्ति सब भासित हो रहे हैं । अथवा तुम्हारे या ग्रन्य किसी व्यक्ति के ज्ञान से हम भासित हो रहे हैं । क्योंकि ग्रात्मा मानने वाला यही कहता है कि एक आत्मा ही सत्य है श्री सम्पूर्ण जगत् मिथ्या है वह सब ग्रात्मा से ही भास रहा है । श्रात्मा के ज्ञान से अतिरिक्त वास्तव में वे सब पदार्थ पृथक् कुछ नहीं है तो ग्रव कहिये कि तुम या अन्यान्य व्यक्ति जिनको मैं देखता हूँ, जिनसे वात कर रहा हूँ यह सभी मेरे ज्ञान की बना -वट हैं | वास्तव में न तो तुम कुछ हो, न ग्रन्य कोई व्यक्ति है, न उनके किसी प्रकार के व्यबहार ही सत्य हैं - इस प्रकार हम समझते हैं । और हमारी ग्रात्मा यदि प्रमाण है तो यही सत्य भी है, किन्तु सोचो कि ठीक इसी प्रकार जैसा कि मैं समझता हूँ तुम भी समझते होंगे । ग्रव सिद्ध यह हुआ कि हमारी ग्रात्मा सच्ची, हमारा ज्ञान सच्चा और हमारे ज्ञान के बने हुए तुमस ब ग्रन्यान्य जगत् के पदार्थ के अनुसार झूठे अथवा इसके विरुद्ध तुम्हारी ग्रात्मा सच्चो, तुम्हारा ज्ञान सच्चा और हम तुम्हारे ज्ञान के बने हुए हैं, वास्तव में हैं झूठे । यह बड़े प्रबल सन्देह के दो पक्ष उठते हैं जिनका निर्धारण करना न तुम्हारी ग्रात्मा के ग्राधीन हैं, न हमारी आत्मा के । यह जाना ही नहीं जा सकता कि हमारे ज्ञान से तुम बने हुए हो या तुम्हारे ज्ञान से हम । वस, इस प्रकार ग्रात्मा में संदेह है । इसलिये कोई भी ग्रात्मा प्रमाण नहीं । ग्रात्मा मेंएक प्रकाश के समान एक और यह संदेह है कि मैं हूँ — इसलिये मेरा ज्ञान है; अर्थात् मुझमें से सूर्य के प्रकार का प्रकाश निकलता है उसी को मेरा ज्ञान कहते हैं । श्रीर उसी ज्ञान के [ २२ ]
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* ब्रह्मविज्ञान कारण यह जगत् भागता हुआ नजर आता है, यह एक बात हुई । दूसरा पक्ष यह है कि - इस जगत् का जो ज्ञान हो रहा है अर्थात् कुछ जाना जा रहा है उसी जानने से मैं अपने आप को भी जानता हूँ । इसीलिये मैं भी कोई वस्तु हैं । सारांश यह है कि मैं हूँ इसलिये यह ज्ञान है, अथवा यह ज्ञान है जिसमें मैं हूं - इस संदेह का निर्धारण किसी प्रमाण से नहीं हो सकता जबकि दोनों पक्षों में से कोई भी पक्ष स्थिर नहीं होता तो सिद्ध हो गया कि मैं हूं, न ज्ञान है और न ज्ञान का विषय ही है । भी संदेह हो सकता है कि अभी तक जो युक्तियां दी जा चुकी है । ज्ञान का तात्पर्य यहां प्रत्यय से है । प्रत्यय उस हों । श्रर्थात् जानने वाला, जानने की चीज और हूँ और यही प्रत्यय यह जगत् है । क्योंकि वह जिसके द्वारा मैं और जगत् ये दोनों आपस में विरूद्ध दूसरा पक्ष यह उठता है कि ज्ञाता ( १ ) अथवा इस आत्मा में यह हैं, उनसे यही सिद्ध हुआ कि आत्मा ज्ञानरूप ज्ञान को कहते हैं कि जिसमें तीन टुकड़ जुड़े हुए जानना । वही प्रत्यय मैं हूँ । क्योंकि मैं जानने वाला जानने की चीज है और वही प्रत्यय यह जानना है कि जुड़े हैं । यह आत्मा के सम्बन्ध में एक पक्ष हुआ । इसके ज्ञान ( २ ) श्रौर ज्ञेय ( ३ ) ये तीनों मिलकर जो एकरूप बना है वह आत्मा है, यह बात नहीं, किन्तु यह तीनों ही अलग २ अलग चीज़ । इनमें ज्ञाता को ही ग्रात्मा कहते हैं । किन्तु ज्ञान और ज्ञेय इस आत्मा से पृथक् चीज हैं क्योंकि मूर्छा की अवस्था में ज्ञान और ज्ञेय नष्ट हो जाते हैं, लेकिन आत्मा बनी रहती है यदि ये तीनों मिलकर श्रात्मा का स्वरूप होता तो मूर्छा में भी आत्मा की सत्ता रहने के कारण ज्ञान और ज्ञेय की सत्ता भी नष्ट नहीं होती । यह दूसरा पक्ष है । तीनों जो तुम्हारे प्रत्ययज्ञान में भासते हैं उस ज्ञेय अधीन तुम्हारे प्रत्यय का ज्ञेय और ज्ञान है । किन्तु तीसरा पक्ष यह है कि ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय ये से सर्वथा भिन्न एक ग्रौर परोक्ष ज्ञेय है, जिसके वह ज्ञेय तुम्हारी ग्रात्मा के अधीन नहीं है । चौथा पक्ष यह है कि मेरा ज्ञान बिना विजय को पकड़े हुए कुछ - भासता ही नहीं है, अपनी सत्ता को धारण ही नहीं करता । किन्तु विषय को पकड़ कर उसी के रूप में भासता है और इसी प्रकार वह विषय भी जब ज्ञान पर चढ़ता है तभी उसकी सत्ता या स्वरूप कायम होता है । यदि ज्ञान की मात्रा पृथक करदी जाय तो उस विषय का न स्वरूप ही रहेगा और न सत्ता ही रहेगी । इससे सिद्ध हुआ कि ज्ञान और ज्ञेय ये दोनों ही पृथक् रहकर कुछ अपना स्वरूप ही नहीं रखते । यदि रखते भी हों तो हमारे ज्ञान के बाहर होने से उन पर हमारा सामर्थ्य नहीं है । ऐसी स्थिति में हम अपने ज्ञान और ज्ञेय को जो पृथक् २ दो चीज मानते हैं वही मेरा ज्ञेय है और वही मेरा ज्ञान है । तात्पर्य यह है कि ज्ञान और ज्ञेय ये दोनों भिन्न वस्तु नहीं है । यह चौथा पक्ष हुआ है । इस प्रकार इस आत्मा के जो जो रूप दार्शनिकों ने स्थिर किये हैं, उनके एक - एक अश का यदि हम विचार करने लगें तो प्रत्येक श्रंश में अनेकानेक संशय उपस्थित होते हैं जिनका लाखों प्रयत्न करने पर भी यथार्थ रूप से निर्धारण करना असंभव है । १ जानने वाला, २ जाना जाना, ३ जिसको जाना जाय । [ २३ ]
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* ब्रह्नाविज्ञान 3 आत्मप्रामाण्यखण्डनसारांश जब संदेह ही संदेह है तो संदेह निश्चित हो चुका और उस निश्चित होने में संदेहवाद की जड़ कट गई । क्योंकि जब संदेहवाद में संदेह नहीं रहा तो संदेहवाद ही कहां रहा और यदि संदेहवाद में भी संदेह रक्खा जाय तो जिनमें संदेह किया गया है उनके संदेह में संदेह हो गया ग्रर्थात् वे निश्चित ठहर गये और संदेहवाद बिल्कुल उठ गया । ε- सत्यज्ञानाशक्यतामूत्र उपर्युक्त सारे प्रमाणवाद का सारांश यह है कि सभी प्रमाण ग्रप्रमाण हैं । क्योंकि किसी भी प्रमाण के प्रमाण होने में कोई दूसरा प्रमाण दिया नहीं जा सकता । जबकि इस तरह प्रमाणु सभी अप्रमाण हैं तो वे सत्य नहीं माने जा सकते और जो असत्य है उसके द्वारा सत्य की खोज करने पर भी सत्य वस्तु नहीं मिल सकती; तो ऐसी स्थिति में अब सत्य वस्तु को प्राप्त करने के लिये कोई भी उपाय दृष्टिगत नहीं होता और बिना उपाय के किसी उद्देश्य की सिद्धि हो ही नहीं सकती । अतः जो बात मनुष्य की शक्ति के बाहर है उसकी परीक्षा के लिये श्रम उठाना सर्वथा व्यर्थ है । इसलिये उचित है कि इस विषय में चुप रहै । १०- जीवखण्डनसूत्र कितने ही दार्शनिकों का यह विश्वास हो गया है कि इस शरीर में शरीर से सर्वथा पृथक् वस्तु एक आत्मा है जो कि इस शरीर के स्थूल भाग श्रीर सूक्ष्म भाग इन दोनों से अतिरिक्त एक अलौकिक रूप में है जिसका वास्तविक स्वरूप मनुष्य की बुद्धि में नहीं आ सकता । यह ग्रात्मा जिसको जीव कह्ते हैं वस्त्र बदलने के अनुसार इस शरीर को बदला करता है । पुराने शरीर को छोड़ कर नवीन शरीर धारण करता है । इसमें भी दो मत हैं । एक दल का कहना है कि इस शरीर को छोड़ते ही उसी क्षण दूसरे शरीर में प्रवेश करता है अर्थात् मरने के अनन्तर ही जन्म ले लेता है । क्योंकि बिना शरीर के यह जीव क्षण भर भी पृथक नहीं रह सकता । दूसरे दल का यह मत है कि मरने या शरीर छोड़ने के पश्चात् यह जीव अपने कर्मानुसार कुछ काल के लिये ऐसी जगह जाता है, जहां उसको कुछ काल सुख्ख या दुःख भोगना पड़ता है । पश्चात् उस स्थान से लौट कर फिर पृथ्वी में जन्म लेना पड़ता है - इत्यादि-इत्यादि । किन्तु इस पर मेरा कहना यह है कि यह सब कल्पनामात्र है, निरी गप्प है । क्योंकि इन सब बातों में प्रमाण दिया नहीं जा सकता । वास्तव में सही वात यह है कि इस शरीर की बनावट एक अद्भुत ढंग पर है । इसके अन्तर्गत श्रत्यन्त सूक्ष्म कोई भाग है, जिससे धीरे - धीरे स्थूल भाग बनता रहता है । स्थूल भांग को हम देखते हैं; किन्तु सूक्ष्म भाग उसकी क्रिया से पाया जाता है । इनमें जो मुक्ष्ग भाग है उसी को जीवात्मा कहते हैं । और बही जीव इस बहिरंग शरीर का अन्तरग भाग है और इसी शरीर के साथ पैदा होता है और इसी स्थूल के अनुसार वह सूक्ष्म भी बदलता बिगड़ता रहता है । तथा इस शरीर के साथ ही नष्ट भी हो जाता है । मसे के बाद यह ग्रात्मा पृथ्वी से बाहर किसी दूसरे लोक में कुछ काल के लिये जाती है और वहां सुख - दुःख भोगती है, यह सब धोखे की बात है, [ २४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान भुल है और बच्चों की कहानी है । इसीलिये इस शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जन्म लेना भी झूठी बात है, इसमें कुछ तत्व नहीं है । ११ - ( क ) ( ग्रानन्द ) खण्डनसूत्र नीच मनुष्य से लेकर विशिष्ट विद्वानों तक बड़े बड़े यत्न करके भी ग्राज तक जिसको किसी ने भी नहीं देना है, न कभी देखने की आशा है, ऐसे एक मिश्रया पदार्थ की कल्पना करके कितने ही भोले-भात मनुष्य उसके लिए नाना प्रकार के उपासनाकर्म व्यर्थ करते हमें दिखाई देते हैं । उन लोगों का विश्वास है कि वह परमेश्वर सचिदानन्दरूप है । अर्थात् सत् याने सत्य जो तीनों काल में रहने वाला हो, कभी नष्ट न हो और चित् अर्थात् चेतन याने ज्ञानमूर्ति हो, सर्वज्ञ हो और आनन्द अर्थात् दुःख रहित हो, इत्यादि इत्यादि । इस पर मेरा यह कहना है कि वह परमेश्वर कभी प्रानन्दरूप नहीं हो सकता । क्योंकि ऐसी सूरत में उसको अकाम होना चाहिये । अर्थात् उसमें किसी प्रकार की कामना व इच्छा नहीं हो सकती । कामनावाले को जब तक यह कामना पूरी नहीं होती तब तक एक प्रकार का दुःख रहता है । उसी दुःख को दूर करने के लिए प्रत्येक प्राणी भरपूर यत्न करता है । कामना पूरी होने पर दुःख मिटने से सुख मिलता है । यह एक साधारण नियम है । यदि इसी प्रकार ईश्वर भी कुछ कामना रखता होगा तो वह श्रवश्य दुःखी होगा । किन्तु यदि वह श्रानन्दघन है अर्थात् उसमें दुःख नहीं है तो ग्रवश्य यह कहना होगा कि उसमें किसी प्रकार की कामना भी नहीं है । अब यदि उसको निष्काम मान लेते हैं तो वह इस जगत् का कर्त्ता, विधाता हो ही नहीं सकता क्योंकि वह किस काम के लिये इतने विशाल जगत् को रचेगा, श्री क्यों रक्षा करेगा तथा संहार करेगा । यद्यपि इस प्रश्न का उत्तर कृष्णद्वैपायन ने यों दिया है कि-“ लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ” अर्थात् किसी प्रकार की कामना न रहने पर भी साधारण लोक व्यवहार के अनुसार यह परमेश्वर की भी केवल लीलामात्र है । परन्तु इस प्रकार का उत्तर ईश्वर के लिये ठीक नहीं जच्चता । यह एक विडम्वना मात्र है, या प्रतारण ( धोखा देना ) है | क्योंकि इतना बडा ईश्वर जिसने इस अगाध और विशाल विश्वमण्डल को बनाया है, क्या साधारण मनुष्य के अनुसार वह लीला या व्यर्थं काम कर सकता है | कभी नहीं । हम देखते हैं कि लोक में यह लीला दो ही अभिप्राय से की जाती है । या तो चित्तविनोद के लिये अथवा जलताडन के अनुसार व्यर्थ होती है । इनमें चित्तविनोद के लिये वही करता है, जिसके चित्त में कुछ व्याकुलता या उदासीनता हो । वह अपनी विफलता को दूर करने के लिये कुछ ऐसा काम करता है कि जिसमें मन लग जाय यदि इस प्रकार ईश्वर की रचना जगत् है तो श्रवश्य कहना होगा कि इस रचना से पूर्व उनके चित्त में किसी प्रकार की उदासीनता या खिन्नता थी; जिसको मिटाने के लिये जगत्- रचना का खेल किया गया और इसके से उनकी ग्रात्मा को संतोष हुआ; तो ऐसी स्थिति में सिद्ध होगया कि साधारण प्राणी के अनुसार परमेश्वर भी कभी दुःखी और सुखी होता रहता है । फिर वह आनन्दघन कैसे कहा जा सकता है । यदि तुम कहो कि उसको दुःख नहीं है किन्तु व्यर्थ ही उसने यह खेल रचा दिया है तो हम कहेंगे कि ईश्वर पापी है, क्योंकि व्यर्थ काम करना एक प्रकार का पाप है; फिर जो जगद्गुरु है, जो जगत् को पाप न करने का उपदेश देता है वह स्वयं [ २५ ]
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* ब्रह्मविज्ञान व्यर्थ लीला करे यह कदापि सम्भव नहीं । ग्रव ग्राप विचार सकते हैं इन दो प्रकार के अतिरिक्त और कोई लीला करना ईश्वर में कैसे सिद्ध हो सकता है । इसलिये हम कह सकते हैं कि ईश्वर अवश्य ही अपनो किसी ग्रावश्यकता को पूरी करने के लिये जगत् की रचना की है और वह बिना जगत् के बनाये आनन्द का लाभ नहीं कर सकता । जगत् की रचना से उसकी वह श्रावश्यकता पूरी होती है कि जिसकी उसको इच्छा थी । किसी प्रकार की भी इच्छा रहना दुःख का कारण होता है तो इच्छा रखते हुए ईश्वर में दुःख का होना मानना पडेगा, फिर वह ग्रानन्दमूर्ति कैसे हो सकता है । -११ - ( ख ) – ईश्वर खण्डनसूत्र ( प्रकारान्तरसे ) इसी प्रकार जो ईश्वर को विज्ञानरूप कहते हैं, सो भी ठीक नहीं जचता । क्योंकि उसमें भी कई शङ्कायें उत्पन्न होती हैं । प्रथम यह है कि विज्ञान को ही ईश्वर कहते हैं अथवा विज्ञानवाला ईश्वर है । ग्रर्थात् वह् ज्ञानस्वरूप है या ज्ञानवन् है । यदि ज्ञानस्वरूप माने तो ईश्वर जडरूप ठहरेगा । क्योंकि ज्ञान में ज्ञान नहीं है, और जिसमें ज्ञान नहीं होता वह जड़ कहलाता है । ग्रगर हम उसे ज्ञानवान् कहते हैं तो वह ज्ञान का ग्राशय होने से ज्ञान से भिन्न पदार्थ ठहरता है । याने वह ग्राधार और ज्ञान यावेय है किन्तु ईश्वर को ज्ञानमय कहा गया है । अर्थात् ज्ञान से भिन्न पदार्थ कहकर नहीं मानते है ग्रतः यह सन्देह होना है कि ईश्वर ज्ञानरूप है या ज्ञान का आधार है - यह हम कुछ नहीं कह सकते । दूसरी शङ्का यह होती है कि कोई भी ज्ञान बिना प्रमाण के उदय नहीं होता । परन्तु जगत् रचना के पहले जब केवल ईश्वर है तो उस समय ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी प्रमाण नहीं है । इसलिये बिना प्रमाण के ज्ञान नहीं होता तो वह ईश्वर ज्ञानमय कैसे हो सकता है । श्रोर वह ईश्वर ज्ञानमय है— इससे प्रमाण ही क्या है । प्रत्युत ईश्वर ज्ञानरूप नहीं है, इसमें प्रबल प्रमाण हम पाते हैं । वह यह कि बिना विषय को पकड़े किसी भी ज्ञान की स्वरूपसिद्धि नहीं होती, किन्तु ईश्वर जगत् का उत्पन्न करने वाला माना गया है तो अवश्य कहना होगा कि वह इस जगत् की रचना से पहले ही था । तो उस समय जबकि जगत् की रचना कुछ नहीं हुई थी किसी विषय का होना सम्भव नहीं है । ऊपर कहा गया है कि बिना विषयका ज्ञान कोई भी नहीं होता तो मानना होगा कि जगत् के पहले किसी भी विषय के न रहने से ज्ञान भी कोई नहीं हो सकता । इसलिये यदि ईश्वर ज्ञानमय ही है तो उस समय ज्ञान के न रहने से ईश्वर भी नहीं हो सकता और यदि जगत् के पहले ईश्वर का होना मान भी लिया जाय तो वह् ज्ञानमय नहीं हो सकता । इसी तरह के प्रमाण से हम कह सकते हैं कि ईश्वर ज्ञानमय नहीं है । तीसरी शङ्का यह हो सकती है कि सम्पूर्ण जगत् को ज्ञान के अन्दर बैठा हुआ हम देखते हैं, किन्तु साथ ही इस ज्ञान को क्रिया से भिन्न वस्तु हम देख रहे हैं । यहाँ तक कि जैसे क्रिया में ज्ञान नहीं है उसी प्रकार ज्ञान में भी क्रिया नहीं है । इसलिये जबकि हम इस जगत् को ज्ञान में ही भासता देख रहे हैं तो कहना होगा कि यह जगत् क्रिया से बना है यह मिथ्या हैं, न क्रिया से बना है श्रोर हुप्रा न [ २६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान ज्ञान ही इसे बना सकता है । क्योंकि ज्ञान में क्रिया ही नहीं है तो ऐसी स्थिति में यही मानना होगा कि यह जगत् इसी प्रकार का अनादिकाल से अनन्तकाल तक ज्ञान में ही भासता प्राया है और सदा - सर्वदा इसी प्रकार भासता रहेगा । न इसका आदि है न अन्त है; न इसका कोई पैदा करने वाला है तो फिर ईश्वर की ही क्या आवश्यकता है? -११ – ( ग ) ईश्वर खण्डनसूत्र ( प्रकारान्तर से ) ईश्वर के विषय में और भी बहुत सी शंकायें उत्पन्न होती है । जैसा कि यह ईश्वर नित्य है, अथवा जन्म लेने वाला यदि जन्म वाला है तो जन्म वाले को जगत् कहते हैं इसलिये वह भी जगत् हुआ, न कि जगत् का बनाने वाला ईश्वर । यदि यह कहें कि वह ईश्वर जिससे जन्म लेता है उसको हम ईश्वर कहेंगे तो वहाँ भी यह प्रश्न होगा कि वह किस से उत्पन्न हुया । यों अनवस्था प्राप्त होती है । और अनवस्था वाला पदार्थ मिथ्या कहा जाता है । यदि ईश्वर को प्राकस्मिक मान लें अर्थात् बिना कारण के अपने आप होने वाला मान लें तो उसी प्रकार जगत् को भी अपने आप होने वाला ग्राकस्मिक मान सकते हैं । फिर ईश्वर की क्या आवश्यकता रहेगी? इसलिये न ईश्वर ग्राकस्मिक है और न जन्मवाला है | किन्तु मानलें कि वह नित्य है अनादि प्रनन्त है तो ऐसी अवस्था में हम यह प्रश्न करेंगे कि यदि ईश्वर नित्य है तो वह इस जगत् की नित्य ही रचना करता है अथवा कभी करता है, कभी नहीं । तात्पर्य यह है कि जगत् की रचना की कामना या इच्छा उस की नित्य है अथवा मनुष्य के अनु-सार अनित्य है । यदि माने कि उसकी इच्छा नित्य है तो मानना होगा कि यह संसार सदा नित्य है, संसार का अभाव कभी था ही नहीं । इसीलिये संसार का कभी प्रादि नहीं । अतः ससार की रचना का ईश्वर से प्रारम्भ करना मिथ्या ठहरता है और यदि मानें कि ईश्वर जगत् को कभी रचता है, कभी नहीं, ग्रर्थात् जगत् रचना की इच्छा उसकी कभी होती है, कभी नहीं होती तो उस पर हम प्रश्न करेंगे कि ईश्वर की सृष्टि रचना की कामना क्यों होती है क्योंकि कामना उसी को होती है जो अपूर्ण हो । अपूर्ण होने से सभी वस्तु की सम्पदा की उसे इच्छा होती है परन्तु यह ईश्वर पूर्णरूप माना गया है अतः पूर्ण-काम है अर्थात् सभी सम्पदा सर्वदा उसको प्राप्त रहने से वह ' ग्रात्मकाम ' है । अर्थात् सब जरूरत उसको हासिल है इसलिये निष्काम है; निष्काम होने से सृष्टि रचना की कामना उसमें हो ही नहीं सकती, फिर उसकी इच्छानुसार सृष्टि कैसे हुई । क्योंकि इस सृष्टि से उसका कोई नया उद्देश्य सिद्ध होना नहीं पाया जाता । यदि मानो कि विनोद के लिए कहा जाय तो वही पुराना प्रश्न उठेगा कि सृष्टि के पहले उसमें ग्रानन्द या विनोद हुआ किन्तु ऐसा करना ईश्वरवादियों के सिद्धान्त के विरुद्ध है और निरर्थक सृष्टि रचना करना भी ईश्वर के लिये अनुचित ठहरता है । क्योंकि निरर्थक काम करना पाप है और यदि यह कहें कि कि उस ईश्वर की इच्छा की कोई आवश्यकता नही उस की इच्छा के बिना ही सृष्टि की रचना हो गई तो फिर ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं रहेगी, इत्यादि इत्यादि । दूसरा प्रश्न यह होता है कि ईश्वर को आप सामग्री न होते हुए भी अपनों इच्छा से और अपनी २७ स्रष्टा मानते हैं या निर्माता । स्रष्टा वह है कि श्रात्मा से सब कुछ बनवा ले । जैसे मकड़ी अपनी
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* ब्रह्मविज्ञान * ही आत्मा से जाल बनाकर अपने में ही उस जाल सूत्र को लीन कर लेती है । निर्माता उसे कहते हैं जो कुम्हार के समान किसी बाह्य सामग्री को लेकर उसके ग्राधार से किसी वस्तु की रचना करता हो; किन्तु सामग्री न मिलने पर इच्छा रखते हुए भी उस काम को न करते । इन दोनों में से ईश्वर की सृष्टि रचना किस प्रकार की है । यदि मानो कि वह स्रष्टा है तो ग्रवश्य उसी की ग्रात्मा या शरीर से यह सम्पूर्ण संसार बना हुआ है, कहना पड़ेगा । वह ईश्वर के विकार बिना हो नहीं सकता है । इसलिए ईश्वर को विकार कहना पड़ेगा । किन्तु ईश्वरवादियों ने ईश्वर को निर्विकार सिद्धांत किया है, उस सिद्धान्त से यह विरूद्ध होगा । अथवा यदि ग्राप ईश्वर को निर्माता मानते है तो अवश्य उसको बाह्य सामग्री अपेक्षा होगी । ऐसी स्थिति में दो प्राक्षेप उठते हैं । एक तो यह कि ईश्वर को परतन्त्र मानना पड़ेगा । सामग्री रहने पर रचना हो सकती । सामग्री न रहने पर इच्छा रखते हुए भी बह रचना नहीं कर सकता । यदि यह कहें कि वह सब सामग्री अपनी इच्छा से बना लेता है तो पुनः वही प्रश्न उठेगा कि वह उस सामग्री का स्रष्टा है या निर्माता स्रष्टा होने पर विकारी होगा और निर्माता होने परतंत्र होगा । इस प्रकार अनवस्था होगी और यदि उन सामग्रियों को ईश्वर के ग्रधीन पैदा हुई न मानकर नित्य मानले अर्थात् सदा सर्वदा ईश्वर के अनुसार उनको भी मौजूद ही मान लें तो एक प्रकार जगत् को ही नित्य मानना होगा, क्योंकि ईश्वर के अतिरिक्त जो कुछ है वह सब जगत् है । जब सामग्री नित्य है तो एक प्रकार से संसार नित्य है फिर उस सामग्री में बदलने बिगड़ने का स्वभाव यदि मानलें तो अपने ग्राप उस सामग्री से सृष्टि रचना बनती - बिगड़ती रहेगी और ईश्वर का मानना व्यर्थ होगा । इसलिए हम कह सकते हैं कि वह ईश्वर न स्रष्टा हो सकता है, न निर्माता और इन दो से अतिरिक्त कोई तीसरा प्रकार हो नहीं सकता । ग्रतः मैं मानता है कि ईश्वर नहीं है । और भी शंकाएं इस प्रकार की हैं कि परमेश्वर का शरीर क्या है और सृष्टि रचना के उपाय या सामग्री ईश्वर के पास क्या है, कहाँ स्थित होकर सृष्टि को किस स्थान पर कब, कैसे बनाई और जैसे मिट्टी से घड़ा बनाते हैं, उसी तरह यहाँ किस वस्तु से यह सृष्टि बनाई गई और इस जगत् में मकान बनाना, रसाई बनाना, कपड़ा बुनना इत्यादि २ भिन्न - भिन्न कामों में भिन्न प्रकार की जैसे चेष्टायें करनी पड़ती हैं, उसी प्रकार इस सृष्टि की रचना करने में परमेश्वर किस प्रकार की चेष्टा करता है । इन सब प्रश्नों का तात्पर्य यह है कि सृष्टि रचना के पूर्वकाल में मानना होगा कि केवल एक ईश्वर था । उसके अतिरिक्त न देश है, न काल है, न ग्राधार है. न प्राधेय है, न उपाय है, न सामग्री है, न चेष्टा है और न क्रिया है । क्योंकि ये सभी जगत् के रूप हैं । जगत् रचना के पहले इनका रहना कदापि संभव नहीं तो ऐसी स्थिति में इन सबके बिना जगत् की रचना भी सर्वथा असंभव है । ग्रतः मानना होगा कि वह समय कभी था ही नहीं जब कि जगत् न था और उनकी रचना के लिए ईश्वर ने कोई उद्योग किया हो । सत्य तो यह है कि जगत् की रचना ईश्वर ने कभी प्रारंभ की ही नहीं है । यह तो सर्वदा जैसा है वैसा ही चल रहा है । ईश्वर के सम्बन्ध में एक यह भी प्रश्न है कि वह व्यापक है या परिच्छिन्न । यदि परिच्छिन्न मानें तो एक प्रकार से उसे जगत् ही मानना होगा । क्योंकि परिच्छिन्न होना ही जगत् का रूप है । और यदि यदि ईश्वर को व्यापक मानें तो इसका यही अर्थ होगा कि ईश्वर के बिना कोई भी जगत् ईश्वर से खाली [ २८ ]