ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 421–430
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 421–430
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* ब्रह्मविज्ञान इनमें देव दो प्रकार के हैं - ग्रग्नि और सोम । इन दोनों को पृथक् २ समझने के लिए सोमवाले प्राण को पितर कहते हैं और अग्निवाले को देवता । तात्पर्य यह है कि प्राण ३ प्रकार के हैं - देव, पितर, असुर । जो प्राण सूर्य से निकलता है जो अनन्तरूपों में आकर प्रकाशवान् हो जाता है उसे ही देवता कहते हैं । किन्तु जो प्राण देवता न होने पर भी अग्नि के साथ मिलकर अग्नि वन जाता है, और पहले जो अप्रकाशवान् था कृष्ण चा पश्चात् जलकर शुक्ल अर्थात् प्रकाशवान् हो जाता है, जो प्रायः चन्द्रमा से आया करता है उसे पितृप्रारण कहते हैं इन दोनों के अतिरिक्त तीसरा असुरप्रारण है जो कृष्ण रहता है और जलने पर भी कभी प्रकाशवान् नहीं होता, जैसा कि पृथ्वी का रात्रि के समय कृष्ण अन्धकार पृथ्वी का अपना रस़ है जो पृथ्वी के पृष्ठ से निकल कर रथन्तर साम तक चारों ओर व्याप्त है, वही असुर है । इसी प्रकार चन्द्रमा की भी कृष्ण छाया जो चन्द्रमा से निकल कर चारों ओर व्याप्त है, और जो अमावस्या की रात्रि जो कि हमारे सामने है वह भी असुरप्राण है । चन्द्रमा या पृथ्वी दोनों कृष्ण हैं और इनका प्राण असुर है । यद्यपि ये दोनों सूर्य के सन्मुख होकर प्रकाशमान् हो जाते हैं किन्तु विश्वास रखना चाहिये कि पृथ्वी या चन्द्रमा के काले किरण जलकर भी प्रकाशवान् नहीं होते । किन्तु वे दोनों किरणें निज के रूप में ज्यों के त्यों सदा बने रहते हैं । किन्तु सूर्य के किरण उनके ऊपर फैलकर उनको ढकेलते हैं । इसीलिए वेद में सोम की प्रशंसा में लिखा है कि-" त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ " अर्थात् तुम प्रकाश से अन्धकार को ढकेलते हो | यह सोम के वास्ते है | तात्पर्य यह है कि सूर्य का प्रकाश हट जाने पर वहां पहले से विद्यमान ही, अन्धकार दीखने लगता है । वह अन्धकार प्रकाश से कदापि नही मिलता, इसलिये उस कृष्ण अन्धकार मय प्राणों को असुर कहते हैं | किन्तु उसके विरुद्ध सूर्य का प्रकाशमय प्राण दिव्यमान होने के कारण देवता कहा जाता है । यह देव प्राण ग्रन्थकार में कदापि नहीं रहता । इन दोनों प्राणों के अतिरिक्त तीसरा वह प्राण है जो कि असुर प्राण वाले पिण्डों के ऊपर प्रतिमूर्छित होकर देवता का प्राण उन असुर प्राणों को ढके रहता है जैसे चन्द्रमा की चांदनी । खुलासा यह है कि गरम तादवाला प्रकाशवान् प्राण सब अग्नि है और देवता प्राण है, शीतल प्रकाशवान् सब सोम है, और पितर है और बिना प्रकाश के कृष्ण किरण जहां कहीं जगत् में दीखे सब असुर प्राण है । इन तीनों में पितृप्राण, देवता और असुर इन दोनों के मिलाव से बना हुआ है । इसलिये उसका सम्बन्ध देवता और असुर इन दोनों के साथ है, इसीलिये मनु भगवान् ने कहा है कि-" पितृभ्यो देव दानवाः " अर्थात् पितरों से देवता और असुर उत्पन्न होते हैं क्योंकि पितरों में ये दोनों प्राण शामिल हैं । इसलिए पितृप्राण को पृथक् न मानकर प्रधानरूप से दो ही प्राग माने जा सकते हैं देवता और असुर-इनमें देवता सदा शुक्ल है और असुर सदा कृष्ण है । जीवात्मा में देवी सम्पत्ति और आसुरी सम्पत्ति दोनों नियम से रहती है, किन्तु इनमें कर्मों के अनुसार मात्रायें घटती बढ़ती है । यदि आत्मा में देवी प्राण मात्रा बढ़ जावे तो वह श्रात्मा शुक्ल है और मृत्यु के पश्चात् वह ग्रात्मा शुक्लमार्ग से ही गमन करता है । किन्तु यदि उस श्रात्मा में आसुरी प्राण मात्रा अधिक हो गई है तो उसके प्रभाव से वह आत्मा कृष्ण है इसीलिये मृत्यु के पश्चात् वह आत्मा कृष्णमार्ग से ही गमन करता है । [ ३८६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान शुक्ल या कृष्ण मार्ग के ५ पर्व शुक्लमार्ग या कृष्णमार्ग इन दोनों में कई मंजिल या पर्व हैं । १ - कम, २- नाड़ी, ३ - दिक् ४-श्राकाश और ५ – काल । १ - कर्म प्रत्येक जीव आत्मा अपने इन्द्रिय और शरीर के कारण कुछ न कुछ कर्म सदा करता ही रहता ही रहता है । प्रत्येक कर्म करने के पश्चात् उस कर्म से उस ग्रात्मा पर कुछ - कुछ असर पहुंचता है और उसी असर को संस्कार कहते हैं । यह संस्कार यदि देव प्राणों का संग्रह करने वाला है तो उस कर्म को पुण्य कर्म कहेंगे । किन्तु यदि वह संस्कार आसुर प्राण से बना हुआ है तो उसे आत्मा कृष्ण हो जाता है जसलिये उस कर्म को पाप कर्म कहते हैं । पुण्य के बल से आत्मा हलका होता है और वह देवता की श्रोर ऊपर को जाना चाहता है । किन्तु पाप कर्म से ग्रात्मा भारी होता है और वह उपर न जाकर पृथ्वी की ओर नीचे ही गिरना चाहता है, इसलिये पाप को पातक प्रथांत गिराने वाला कहते हैं । यदि आत्मा में पुण्य कर्मों का संस्कार हैं तो यह शुल्क मार्ग से जायगा, और पाप कर्मों के संस्कार वाला कृष्ण मार्ग से जायगा । इन कर्मों में यज्ञ, तप, दान - यही तीन कर्म ऐसे हैं जिनसे ग्रात्मा शुक्र मार्ग से चलकर देवलोक में जाता है । किन्तु इष्ट, ग्रापूर्त, दत्त ये तीनों कर्म भी उत्तम कर्म माने जाते हैं, किन्तु इनके कृष्ण मार्ग में जाकर भी ग्रात्मा नरक न जाकर के कर्मों के अतिरिक्त जो पितृलोक में जाता है । इन दोनों प्रकार कर्म हैं जिनको पाप कहते हैं वे पातक, अनुपातक, उपपातक, महापातक, प्रतिपात, मलिनीकरण, संकरीकरण, अपात्रीकरण, जातिभ्रंशकर इस प्रकार पाप नो जाति के हैं । इनके ग्रपात्रीकरण करने से ग्रात्मा में श्रातुर प्राण का संस्कार होकर भारीपन आ जाता है, वह ऊपर सूर्य की ओर न जाकर पृथ्वी से नीचे गिरता है और ये ही अधोगति कहलाती है, यह मुख्य कृष्णमार्ग है । इस प्रकार कर्म से शुक्ल-मार्ग, कृष्ण मार्ग का भेद जानना चाहिये । २- नाड़ी ऊपर कहा जा चुका है कि ग्रात्मा का निवास स्थान से हितानाड़ी नाम की शरीर में व्याप्त हैं । उन नाड़ियों में हृदय से ऊपर मस्तक तक नाड़ी हृदय की सब चारों शाखायें ओर शुक्ल मार्ग हैं और हृदय से नीचे मूलाधार तक सब शाखाय कृष्ण मार्ग हैं | हृदय से उत्क्रमण करती हुई ग्रात्मा यदि ऊपर की नाड़ियों से गमन करे तो वह शुक्ल मार्ग से जाता है और नीचे की नाडी से करती हुई , उत्क्रमरण श्रात्मा कृष्ण मार्ग से जाती है । ३ - दिक् जो जीव आत्मा पृथ्वी पर बसते हैं- पृथ्वी से उत्क्रमण होने हैं । इस पर किसी ओर गति करते के प्रश्न का विचार करने पर दो ही मार्ग स्थिर होते हैं कि पृथ्वी , उत्तर और दक्षिण । तात्पर्ययह है [ ३६० ]
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* ब्रह्मविज्ञान * पूर्वापर वृत्त के द्वारा जो पांच भाग किये जाते कर्क ( Cancer हैं । १ - विषुवत् वृत्त के दोनों ओर चौबीस चोबीस अंशपर ( Torridzone ) और मकर ( Capricorn ) वृत्त ( Tropic ) हैं उन दोनों के बीच में ऊष्णकटिबन्ध ) है उसमें इसलिये उसमार्ग ग्रहों के सवार होने के कारण सूर्य की किरणों का दबाव अधिक रहता है में होकर, आत्मा को जाने में बाधा होती है इसी प्रकार दोनों ध्रुवों ( Poles ) से चौबीस थे. अंश तक शीत कटिबन्ध ( Frigidzone ) है, वहां तक बक्रमार्ग होनेके कारण आत्मा नहीं पहुँच सकता गत्या( लाचार में ) ऊष्णकटिबन्ध और होकर ही शीत कटिबन्ध के बीच में अर्थात् मध्यकटिबन्ध ( Temperatezone ) ग्रात्मा और दक्षिण जा सकता है वे जिनमें को देवयान को मध्य कटिबन्ध दो हैं - उत्तर और दक्षिण उत्तर कृष्णमार्ग पियान कहते का हैं शुक्ल मार्ग का आत्मा उत्तर मार्ग से अर्थात् देवयान से जाता है, और आत्मा दक्षिणमार्गअर्थात् पितृयान से जाता है यही दिक् का नियम है । इन दोनों मार्गों का निर्देश ( बताना ) पुराणों में इस प्रकार हैं— नाग वीथ्युत्तरं यच्च,
सप्तर्षिभ्यश्च दक्षिणम् ।
उत्तर: सवितुः पन्था देवयान इति स्मृतः ॥ १ ॥
उत्तरं यदगस्त्यस्य, अजवीथ्याश्च दक्षिणम् ।
पितृवानः सर्वेपन्था, वैश्वानर पथाद् वहिः ॥२ ॥
कहते हैं अर्थात् नागवीथी से जो उत्तर की तरफ मार्ग है उसे देवयान दक्षिण सूर्य का || १ उत्तर और सप्तर्षि से से पितृ-यान का || गस्त्य वो वैश्वानर मार्ग बाहर मार्ग के तारे से जो उत्तर और ' अजवीथी ' दक्षिण है 11211 ) ( ना ratat और वीथी मैं विषुववृत्त जितना प्रकाश मण्डल है उन्हीं सब ( चौबीस शतक अंश नक्षत्र Equatar ) के दोनों तरफ चौबीस के हिसाब से ४८ का पूर्वोक्त मण्डल या हैं उनमें नौ - नौ नक्षत्र " और मव्यवाले ग्रहमण्डल विद्यमान हैं । नक्षत्र २७ को " ऐरावतमार्ग श्राकाश वाले तृतीयांश मण्डल तीन में बंट जाता है । उत्तर इन तीनों मार्गों तृतीयांश को भाग " वैश्वानरमार्ग " कहते हैं । मे " जरद्गवमार्ग हैं । इस प्रकार से " और दक्षिण तृतीयांशको " ( गली ) कहते तीन हरएक तीन भागों को " वीथी " नागवीथी ", -" मार्ग तीन भाग में बंटा हुआ है, उन ओर क्रम से गजवीथी और नौ से दक्षिण " जरद्गवीथी " वीथीयां हैं जिनमें ऐरावत मार्ग में उत्तर " थी" " गोवीथी "ऐरावतवीथी, मार्ग में " ऋषभवी " हैं । और मध्य के अरद्गव हैं, श्रौर वैश्वानर मार्ग में - अजवीथी है । वैशानरमार्गे अगवीथी । है, उससे भी दक्षिण पितृयान है में सब से दक्षिण इस है और मध्याकाश प्रकार देवयान, सब से उत्तर नागवीथी है, जिससे उत्तर [ ३ ९ १ ]
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उध्रुव देवयान ० नाग * ब्रह्मविज्ञान ऐरावत जरद्गव वैश्वानर कर्क विपुत्रत् मकर ४- श्राकाश पितृयान दधव ० आकाश में सूर्य जहां स्थिर है वहां से वह चारों ओर किरणों को फेंकता हुआ प्रकाश का एक महाविशाल मण्डल बनता है, पुराणों में उसी को ब्रह्माण्ड कहते हैं । इस ब्रह्माण्ड का सिर सूर्य हैं, किन्तु यह प्रकाशमण्डल चारों ओर जहां समाप्त होता है उस सीमा को लोकालोक ( प्रकाश अप्रकाश ) कहते हैं — यही लोकालोक ब्रह्माण्ड का ' पॉव ' है । सूर्य से लेकर लोकालोक तक जो ग्राकाश है उसी के भीतर कहीं यह हमारी पृथ्वी है । इस पृथ्वी के कारण उस श्राकाश के दो भाग होते हैं । एक पृथ्वी से सूर्य तक जो कि सिर की ओर होने के कारण ऊँचा कहलाता है, श्रीर दूसरा पृथ्वी से लोकालोक तक जिसे पाँव की ओर होने के कारण नीचा कहते हैं । ऊँचा आकाश उत्तर मार्ग है वही देवयान है और नीचा आकाश दक्षिण मार्ग है वही पितृयान है । इस पृथ्वी से जब कोई श्रात्मा उत्क्रमण करेगा तो उसके लिये ग्राकाश के दो ही मार्ग हो सकते हैं— उत्तर अर्थात् सूर्य की ओर अथवा दक्षिण अर्थात् लोकालोक की ओर । सूर्य की श्रोर जाने को उत्तम मार्ग और ऊर्ध्वगति कहते हैं, किन्तु उस के विरुद्ध जाने को प्रथम मार्ग या अधोगति कहते हैं इसीलिए वेद में लिखा है-द्वे सती प्रणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् || ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यद्न्तरा पितरं मातरं च ॥१ ॥
श्रर्थात् जो सूर्य पिता और पृथ्वी माता के बीच में जहां जो कुछ है वह सारा विश्व पृथ्वी को छोड़कर यदि जावे तो उसके लिये मैंने दो ही मार्ग सुने हैं । एक पितरों का और दूसरा देवों का अर्थात् पितृयान और देवयान ये दो ही मार्ग मरणधर्मा जीवों के लिये निश्चित हैं । ५ - काल काल के सम्बन्ध से शुवलमार्ग और कृष्णमार्ग पांच - पांच पर्व के नियत हैं में जितने । इन पर्वों . काल - वाचक शब्द हैं वे वास्तव में कालवाचक न होकर उन उन कालों में सोम की रहते हुए अग्नि और स्थिति को करते हैं । शुक्लमार्ग के पांच पर्व ये हैं — ग्रर्ची वर्ष का उत्तरायण, और देवलोक संवत्सर ये सब पर्व काल, ग्रह, मासका शुक्लपक्ष, केअवयव हैं | काल के देवता सूर्य और चन्द्रमा के | काल स्वरूप का निर्णय इन्हीं दोनों की चालों से होता है । इनमें सूर्य की गति है कि सूर्य मुख्य है । तात्पर्य यह [ ३ ९ २ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * उस देवलोक संवत्सर कहते हैं । ओर फिर आने को से कटने के का जो प्रकाशमण्डल चारों ओर व्याप्त है उसके चारों इसलिये विषुवत् वृत्त ६ मास नीची, अग्नि संवत्सर में ६ मान तक सूर्य से पृथ्वी नी जाती है और और न्यूनता के कारण में सोम की अधिकता ६ मास कारण संवत्सर के दो भाग हो जाते हैं । उन दोनों नीचे जाने पर जो सूर्य का प्रकाश को अवस्था भिन्न भिन्न की हो जाती है । पृथ्वी के और सोम की कम । इसी प्रकार जब - प्रकार रहती है कम और तक पृथ्वी पर अग्नि की मात्रा अधिक उसमें अग्नि की मात्रा याता है उसमें आता है की होती है-पृथ्वी सूर्य से ऊंची चढ़ती है तो उस पर जो सूर्य का प्रकाश की दो अग्नि भिन्न प्रकार , मास के द्वारा सूर्य ऊपर से सोम की जाती है इसलिए ये छ बढ़कर चन्द्रमा मात्रा अधिक आ का प्रकाश ग्रव इनमें भी में भी अधिमास में चन्द्रमा मास की प्रतिमास दिन दिन होने के कारण की कला क्षीण चन्द्रमा दूसरे पक्ष में पर बढ़ता रहता है, किन्तु प्रकाश द्वारा सूर्य का प्रकाश पृथ्वी में चन्द्रमा के भाग एक मास में दो दो सूर्य का प्रकाश है । इसके कारण के प्रत्येक अहोरात्र । की चन्द्रमा के द्वारा कम श्राता अहोरात्र रात्रि में नहीं आता बढ़ती घटती में भी ३० है, किन्तु | सूर्य होते दो अवस्था होती है, इस मास समुख आता । अर्ची और धूम हैं - दिन और प्रकाश पृथ्वी पर दो अवस्थायें हैं पृथ्वी से रात्रि दिन में, सूर्य का में भी का भाग इस ग्रहोरात्र रात्रि प्रकाश रस के दोनों भागों में अर्थात् दिन और जो जहाँ कुछ वायु का का बिजली का जो निराकार या अग्नि का या तक का या चन्द्रमा का या तारो छोड़कर एक क्षण ऊपर जाता का सम्बन्ध वर्ष से लेकर प्रकाश एक हैं-( विना हुआ हो वह सब अची है किन्तु है कि पर्व हो जाते रोशनी है । तात्पर्य यह के पांच काल को का ) धूम है, ( gas ) कहलाता होत होते काल बांटा जाय तो बड़े में छोटा भाग प्रविष्ट । भाग ५ - सूर्य सम्वत्सर , ४- उत्तरायण । शुक्ल - १ - ग्रर्थी २- दिन - शुक्लपक्ष, चन्द्र सम्वत्सर , ५ -, । मनुष्यलोक ४- दक्षिणायन है कृष्ण -, करता रहता में १ - श्रम, २ - रात्रि, ३ - कृष्णपक्ष भ्रमण पितृलोक लोकों में सदा से निकलकर कहे जो पहले पितृलोक तात्पर्य यह है कि यह जीव आत्मा तीनों ही हैं । किन्तु पृथ्वीलोक निति दो ही हैं पड़ता देवलोक कहते में गति, लोक में ही जाना अथवा | पृथ्वीलोक को मनुष्यलोक आत्मा है कि प्रायः देवलोक क्योंकि इस उसको में आता चुके में ग्रात्मा जाया करता है, होता है देखने और पितृलोक है किन्तु हैं कर्म कर्म प्रधान है । परन्तु देवलोक वाली और विद्या । जब कि त्या में जाता को प्रायः में जाने यदि देवलोक ही लोकों अधो-ग्रात्मा ग्रात्मा विद्याप्रधान हो तो वह ग्रात्मा दोनों है तो दोनों में कर्म रहते हैं इसलिए में और विद्या ये दोनो ही स्रोतप्रोत या देवलोकय कर्मप्रधानात्मा मामा ही परिभ्रमण । किन्तु पिलोक है । यदि पृथ्वी करना पड़ता है में ही जाती *. छोड़ने के पश्चात् सबसे प्रथम चन्द्रमा चन्द्रलोक होती हुई दक्षिणायन , रात्रि, कृष्णपक्ष से धूम, निकलकर दक्षिणमार्ग से निकल-शरीर हिना नाड़ी नाड़ी द्वारा है जो काल द्वारा शरीर है तो उर्ध्वहिता भाग रहती है कर भाग विद्याप्रधान के उस रुख सूर्य की घोर उत्तरमार्ग में पहुंचती है । किन्तु यदि ग्रात्मा होती हुई चन्द्रमा आत्मा की सूर्यके से शर्ची दिन उत्तरायण में हुई , मिलिए प्रकाश शुक्लपक्ष, भाग से प्रकाशित के प्रकाश है । चन्द्रमा लोकालोक की रुख हुई आत्मा में गई भाग • वहां के तमोमय से देवलोक चन्द्रमा में जाती है किन्तु ] [ ३६३
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* ब्रह्मविज्ञान की प्रोर रहती है, इसलिए चन्द्रमा से वह आत्मा भी नीचे दक्षिण की ओर जाती हुई नीचे दक्षिण में लोकालोक तक जा सकती है । तात्पर्य यह है कि दोनों ग्रात्माओं को चन्द्रमा तक अवश्य जाना पड़ता है, किन्तु चन्द्रमा से ग्रागे पितृलोक या देवलोक के लिए आत्मा के मार्ग भिन्न - भिन्न हो जाते हैं । यद्यपि शास्त्र में चन्द्रमा को स्वर्गद्वार कहा है, तथापि यह प्रशंसामात्र है । चन्द्रमा से जिस प्रकार स्वर्ग में जाते हैं, उसी प्रकार चन्द्रमा से नरक में भी जाते हैं । गति का स्वरूप अच्छी तरह जानने के लिये ब्रह्माण्ड की स्वरूप संस्था जानना आवश्यक है और वह इस प्रकार है । ब्रह्माण्ड के मध्य में सूर्य है उसका प्रकाश मण्डल जहां तक जाता है उसे ही लोका-लोक कहते हैं । लोकालोक उस अचल सीमा का नाम है, जिसके भीतर की ओर लोक ग्रर्थात् आलोक प्रकाश है और बाहर की ओर अलोक अर्थात् अन्धकार है । इस सूर्य प्रकाश के भीतर सूर्य से लेकर लोकालोक तक करीब २ समानान्तर धरातल में कितने ही ग्रहों की संस्था उत्तरोत्तर वृहत् मण्डल बनाती हुई सूर्य की परिक्रमा करती है । उनमें यह हमारी पृथ्वी भी एक है, पृथ्वी और सूर्य के बीच में बुध, शुक्र प्रादि शतशः ग्रह हैं, उन सबको पुण्य लोक कहते है । ये सब लोक पृथ्वी की अपेक्षा सूर्य का प्रकाश अधिक रखते हैं और हमारी ग्रात्मा भी सूर्य के प्रकाश से ही बनी हुई है । इसलिये उन लोकों में सूर्य का प्रकाश अधिक पाकर आनन्दित होता है, यही उनके पुण्यलोक होने का कारण है । उन सबसे अधिक आनन्द सूर्य में है इसलिये सूर्य ही प्रधान स्वर्ग है । ऐसी दशा में पृथ्वी से लेकर सूर्य तक प्रकाशमय समधरातल को सुषुम्णा नाड़ी कहते हैं, इसी सुषुम्णा नाड़ी से बद्ध होकर हमारा जीव श्रात्मा पृथ्वी से सूर्य तक जा सकता है और इसको “ देवपथ ” कहते हैं । ग्रथर्ववेदसंहिता में " स्कम्भ " के नाम से एक देवता का वर्णन है । वह ठीक इस सुषुम्णा नाड़ी से तिर्यक् मार्ग में जाता है । यह हमारी पृथ्वी प्रतिदिन ६० घड़ी में परिक्रमण करती हुई अपने परिक्रमण का पृष्ठीय केन्द्र आकाश में जिस बिन्दु को बनाती है उसे ' ध्रुवबिन्दु ' कहते हैं । इस ध्रुव से २४ अंश के अन्तर पर एक दूसरा विन्दु है जिसे ' कदम्ब ' कहते हैं वह इस पृथ्वी की वार्षिक गति के मार्ग श्रर्थात् क्रान्तिवृत्त ( Eeliptic ) का पृष्ठीय केन्द्र है । इस कदम्ब बिन्दु से ध्रुवबिन्दु तक रखा को त्रिज्या ( Radius ) मानकर यदि वृत्त बनाया जाय तो वह ४८ अंश के विष्कम्भ या व्यास ( Diameter ) की व्याप्ति का रहेगा | इसी प्रकार दक्षिण ध्रुव और दक्षिण कदम्व में भी ४८ अंश का विष्कम्भवृत होगा । यह विष्कम्भ दक्षिण कदम्व से उत्तर कदम्ब तक सर्वथा खड़ा माना जाता है इसको ही प्रथर्वण संहिता में स्कम्भ कहा है । पृथ्वी से सूर्य तक जिस प्रकार सुषुम्णा मार्ग है और जिसे देवपथ कहा है वैसे ही सूर्य से ऊपर की ओर कदम्ब का ऊपर वाला प्राधा भाग है वह देवयान मार्ग की दूसरी शाखा है और इसे ही ' ब्रह्म-पथ ' कहते है | जिस प्रकार देवपथ में जाने वाली आत्मा सूर्य में पहुंचकर पूरा करती है, उसी प्रकार सूर्य से चलकर ब्रह्मपथ में जाती हुई जीवात्मा कार्य ब्रह्म स्वर्ग तक के पहुंच मार्ग कर को सगुण मुक्ति पाती है किन्तु उससे भी आगे चलकर कारणब्रह्म तक पहुंचे तो निगुर्ण मुक्ति पाता है । तात्पर्य यह है कि सूर्य से ब्रह्म तक मुक्ति का मार्ग है इसलिये ब्रह्मपथ कहलाता है । देवपथ में गया हुया फिर उलटा [ ३६४ ]
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* ब्रह्मविज्ञान * आकर्षण के कारण इस छोटी सी पृथ्वी में जाता है किन्तु ब्रह्मपथ में गया हुआ आत्मा इस प्रथम मार्ग को प्रकाश " पुनरावंतन के " भी कहते हैं । इस प्रकार पृथ्वी की छोर का अबसर नहीं पाता, इसीलिये मार्ग की भी दो शाखायें हैं । एक पितृ-देवयान मार्ग की दो शाखायें सिद्ध होती हैं । इसी प्रकार पियान के प्रकाश भाग तक करके यम ( धनि वर्गपथ दूसरा नारकीयय । चन्द्रमा के अप्रकाश भाग से आरम्भ नारकीय पथ है वहां करके लोकालोक तक पितृ स्वर्ग पथ है और यम ( शनि ) अप्रकाश भाग से आरम्भ को अत्यन्त क्लेश होता है क्योंकि सूर्य का प्रकाश अत्यन्त मन्द होने से सूर्य प्रारण से बनी हुई प्रात्मा कारण है । इस प्रकार उसके दुःख का उसको अपनी जीवनसत्ता के लिये पर्याप्त प्रकाश नहीं मिलता यही ईश्वर या प्रजापति विद्युत ९ ब्रह्मणस्पति? प्रभिभित् अधिक निकृष्ट है, - जिनमें नरकमार्ग सबसे, और इन ४ मार्ग सिद्ध होते हैं भी उत्कृष्ट देवस्वर्ग है है, उससे उससे उत्कृष्ट पितृस्वर्ग है । सबसे उत्कृष्ट मुक्तिमार्ग घूमता है, उसी प्रकार के चारों ओर चन्द्रमा ओर घूमती है । जिस प्रकार पृथ्वी को साथ लिये सूर्य के चारों सूर्य वरुण रूपी यह पृथ्वी भी चन्द्रमा पृथ्वी सबको साथ लिये और ग्रह भी चन्द्रमा के बीच में एक इसी प्रकार सूर्य । सूर्य और मरण ' कहते हैं और घूमता है ' ब्रह्मणस्पति के चारों ओर ओर फिरता है जिसको है उसके प्रागे अभि-वरुण के चारों ' पवमान ' सोम का बना हुआ अनि प्रधान है, उसी यह ब्रह्मणस्पति । जिस प्रकार सूर्य की किरण यह वरुण भी एक सचिदा जिद वरुण है की किरण जल प्रधान है ईश्वर कहते हैं और जिसके है । प्रकार वरुण ' जिसको प्रजापति चारों ओर फिरता का कार्यब्रह्म है उसके । वरुण के नन्द नाम, चेतना आनन्दमय विद्युत् और ग्रह है है, किरण सत्ता के बीच में एक रूपी कार्यब्रह्म मिलता और वरुण ईश्वर पृथ्वी से लेकर उस ईश्वर और उसके पश्चात् । इस प्रकार मंजिल कहते हैं उसके पर्व पश्चात् विद्युत् को वेद में प्रजापति देखें तो इस प्रकार ) ३ बहरा इस ईश्वर का लक्षण सोम ( ब्रह्मणस्पति इन्छ ) मार्च यदि मार्ग, २- पक्षों में ( ब्रह्म तक, वायु, आदित्य इन पांचों मार्ग है और होगे । १- अग्नि ( इन्द्र ) और 2 ब्रह्म चन्द्रमा तक गन्धर्व हो जाता 1 ४- विद्यत् प्रकार हैं पृथ्वी से का प्रवेश से यम में जीवात्मा । लोकालोक के पर्व इस आगे सूर्य सम्वत्सर चार पर्व हैं चन्द्रमा से हुए ) हैं उसके ( बने तक सनिविष्ट पृथ्वी 9 ' – — ( चन्द्र ) ९ यम -0- ( शनि ) -जीवों को कर्म वाले लोका लोक तक उसम के लिये आग्य-सम्वत्सर से चन्द्र जो कि लोकालोक से सूर्य तक और यम वालों के यातायात तक, नारकीय लिये याम्यमार्ग प्रधानकर्म लोगों के यातायात के के यातायात तक मुक्तात्मा यातायात सूर्य कार्य का मार्ग के लिये सौम्यमार्ग है 1 । चन्द्रमा से ु होता हुमा है और वरुण, विद्य सूर्य से लेकर ब्रह्मणस्पति, ] [ ३६५
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* ब्रह्मविज्ञान के विद्यतु मार्ग है । इन चारों पर्वों से अतिरिक्त वह पांचवा पर्व है जो कि पृथ्वी से चन्द्रमा तक पहले कहा गया है । इन पांचों मार्गों के द्वारा जीव श्रात्मा जिन - जिन स्थानों में जाकर अपने कर्म भोगों के लिये कुछ दिन विश्राम करता है, उनको लोक कहते हैं । ये लोक मुख्यतया यद्यपि तीन ही हैं | मनुष्य-लोक, पितृलोक, देवलोक अर्थात् कई ग्रात्मानों को साथ लेकर प्राज्ञात्मारूपी जीव इस पृथ्वी पर जन्म लेकर ३६००० प्राण मात्राओं को धारण करता हुया पृथ्वी से बद्ध रहता है । प्रतिक्षण इसका विज्ञान आत्मा सूर्य की ओर जाने की चेष्टा करता हुआ भी पार्थिव शरीर से मनुष्यलोक में रहने वाला कहा जाता है, किन्तु जब यह जीवग्रात्मा पृथ्वी से बन्धन के कारण इस पार्थिव शरीर से अपना सम्बन्ध तोड़-कर चन्द्रमा में पहुंच जाता है तब पितृलोक में रहने वाला कहा जाता है । जिस प्रकार मनुष्य लोक में रहने का कारण पार्थिव शरीर है, उसी प्रकार पितृलोक में रहने का कारण प्राणी का श्रद्धामय सूक्ष्म शरीर है और मन प्रधान सोमरस से बना हुआ है । जब कि यह जीव आत्मा उस सूक्ष्म शरीर से भी अपना सम्बन्ध तोड़कर अलग हो जाता है तब सूक्ष्म शरीर को चन्द्रमा में ही छोड़कर विज्ञानग्रात्मा के साथ लिये हुये सूर्य की ओर अग्रसर होता है । जब तक विज्ञानरूपी कारण शरीर इस प्राज्ञश्रात्मा में बना रहता है, तब तक देवलोक में निवास करता है । इससे सिद्ध हुआ स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये ही तीन शरीर श्रभवा वैश्वानर, महान् और विज्ञान ये तीनों ग्रात्मा जो उन तीनों शरीरों के अभिमानी हैं, उनका प्राज्ञात्मा के साथ सम्बन्ध होना ही मनुष्यलोक, पितृलोक और देव-लोक में जीवात्मा की स्थिति का मुख्य निमित्त है । कि देवमय चन्द्रमा से यदि जीवात्मा अपने श्रद्धामय शरीर को चन्द्रमा में छोड़कर वैज्ञानिक अर्थात ( ग्राग्नेय ) शरीर को लेकर सूर्य की ओर अग्रसर होता है तो वह सूर्य के सम्वत्सर में पहुंचता है । उस जिनके सम्बत्सर में भिन्न - भिन्न देवताओंों के रस रहने के कारण उस सम्वत्सर के ७ विभाग किये जाते हैं नाम ये हैं-१ - अपोदक अग्निलोक २- ऋतवाम वायुलोक ३- पराजित् इन्द्रलोक ४- अधि द्यौः वरुणलोक ५- प्रद्यः मृत्युलोक ६- रोचन ब्रह्मलोक नाक लोक — अर्थात् स्वर्ग ७- नाक जिस प्रकार देव स्वर्ग के ये ' ७ मैद है - उसी प्रकार यह प्राज्ञात्मा यदि चन्द्रमा से पितृलोकपि की ओर अग्रसर होता है, तो चन्द्रमा की रश्मि मण्डल रूपी सम्वत्सर में रूपी पितृ-जाता है । उस सम्वत्सर स्वर्ग के तीन भाग हैं और उनके ये नाम हैं— [ ३६६ ]
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१ - उदन्वती २- पीलुमति ३- प्रद्योः योनि में ग्रावे अथवा ६ - ग्रनुकूल वह नहीं होता, क्योंकि * ब्रह्मविज्ञान * जलीय प्रदेश श्रादिका आरण्य प्रदेश अन्त का सुन्दर भूमि बीच का [ ३६७ ] पहले कहा जा चुका है कि गति में विद्या और कर्म ये दो निमित हैं । परन्तु इनमें विद्या ग्रात्मा का स्वरूप है और कर्म अनात्मिक होकर आत्मा में उत्पन्न विनष्ट होता रहता है । इसलिये कर्म के सम्बन्ध से विद्या की = अवस्थाएँ होती हैं - १ - व्यापन्ना, २ - प्रस्ता या निगृहीता, ३ - संवलिता ४ – कर्म पूर्वान्तरिता, ५ - विद्या पुर्वान्तरिता, ६ - अनुकुल कर्मा, ७ - मलिना, ८ - विशुद्धा । १- व्यापन्ना — वह अवस्था है जिसमें विद्या विरोधी कमों के प्रबल आघात से विद्या सर्वथा प्र = छन या विलीन ( गायब ) हो जाती है । जिससे विद्या के स्वरूप ज्ञान की कुछ भी मात्रा नहीं दीखती जैसा प्रस्थारादि में । से विद्या दबी हुई हो २ - ग्रस्ता या निगृहीता - वह अवस्था है जिसमें कर्म की मात्रा अधिक वृक्षादिकों होने की जीवित दशा में और उसका बहुत ही स्वप्न के अनुसार अन्तर्गत होता है । जैसा पिपासा कि स्थावर रोक शोक, रोदन, मृत्यु आदि आत्मा के सोते भी हर्ष विस्मय, निद्रां क्षुधा,,, हुए रहने पर ज्ञान का कुछ प्राभास स्वप्नवत् बहुत से प्राणियों के धर्म उनमें पाये जाते हैं । जिनसे वृक्षों में विद्या या माना जाता है । और कर्म दोनों समान भाव से मिश्रित होकर परस्पर ३ -- संवलित -- वह अवस्था है जिसमें विद्या बोलने वाले कृमिकीट के बलों के दबने भाव से बने रहते हैं । जैसे कि न पर भी दोनों के बल समान जिससे प्रज्ञान के अतिरिक्त विज्ञान का श्रादि क्षुद्रजीवों में मलिन है कि रहने पर भी वह ज्ञान इतना उनमें न होना ही माना जाता है । विरुद्ध होने कर्म और विद्या के परस्पर अवस्थाये हैं जिनमें संस्था में पृथक - पृथक ४- कर्म और ५ - विद्या पूर्वान्तरिता वे नहीं, भिन्न - भिन्न के कारण एक से एक दबते हैं । किन्तु उनमें दोनों के प्रबलवेग के कारण परस्पर उनको अन्तरिता कहते बने रहते हैं रहता है इसलिये कर्म पूर्वान्तरिता कहेंगे, किन्तु मिलते नहीं उन दोनों में अन्तर में आवे तो उसे यदि कर्म बल पीछे भोग तो विद्या पूर्वान्तरिता कहेंगे । जैसे का वल पहले और विद्या का पीछे आवे इसके विपरीत और कर्मकाल बल में जन्म लेवे अथवा मनुष्य यदि विद्या का बल पहले कीट आदि क्षुद्र योनि सब में विद्या कोई पक्षी, कृमि, भोग करे तो उन मनुष्य की योनि पाकर पश्चात् पशु, आजीवन दुःख लेकर पश्चात् मनुष्य में भी जीवन रहकर पश्चात् जीवों में जन्म की पूर्व अवस्था में सुखी, कीट आदि क्षुद्र पूर्वान्तरिता कहेंगे और इसके विपरीत जो प्रथम कृमि कहेंगे । उसे कर्म पूर्वान्तरिता पावें तो पश्चात् सुख दुःख पाकर मनुष्यों में भी पहले विद्याका प्रभाव कम कर्म रहने पर भी विद्या के साथ है जिसमें वह अवस्था है न कि विद्या का नाश करता कर्मों को ही कर्मा- से मलिन के अनुकूल होने • कर्म विद्या
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ब्रह्मविज्ञान ग्रावरण करता है । वह ग्रनुकूल कर्म दो प्रकार का है – -- १ – स्वच्छ, २ - कर्मनाशक । इनमें स्वच्छ कर्म काच के अनुसार आवरण होने पर भी विद्या के ज्ञान प्रकाश का निरोध नहीं करता जैसे कि प्राणी के विषय ज्ञान में विषय रूपी कर्म का प्रवेश रूपी कर्म होते हुए भी ज्ञान का प्रकाश ज्यों का त्यों बना रहता है, विषय से ज्ञान का ग्रावरण नहीं होता । किन्तु दूसरा कर्म ग्रन्यान्य कर्मों की निवृत्ति करके उसके उसके साथ हीं ' कतक रज ' ( निर्मली ) के अनुसार स्वयं भी निवृत्त हो जाता है । जैसा कि वानप्रस्थ हो जाते हैं जिससे मुक्ति प्राप्त होती है । ७-मलिना – वह विद्या है जिसमें कर्मों का प्रभाव अत्यन्त स्वल्प होने के कारण उससे विद्या का सामर्थ्य नष्ट नहीं हो पाता । जैसे कि विदेहमुक्तों के संचित और ग्रागामी इन दोनों प्रकार के कर्मों के सर्वथा नाश होने पर भी प्रारम्भ कर्मों का नाश नहीं होता । ग्रात्मा के मुक्त हो जाने पर भी प्रारब्ध कर्म के अनुसार जीवन पर्य्यन्त सुख दुःख भोग होते रहते हैं । परन्तु उन भोगों से श्रात्मा व्याकुल नहीं होता इसलिये उस ग्रात्मा की विद्या को मलिना कहते हैं । ८- - विशुद्ध - वह विद्या है जो कि मुक्त ग्रात्मायों की अवस्था है । इस प्रकार विद्या की ७ अवस्थाओं में ५ अवस्था तक कर्म इस विद्या का विरोध करते हैं, किन्तु ग्रागे उनका प्रभाव विद्यापर अधिक नहीं होता । इसलिये उन पांचों ग्रवस्थाओं में ग्रात्मा का जाति भ्रंश होता है अर्थात् मनुष्य योनि से गिरकर पशु, पक्षी, कृमि, कीट आदि अधम योनियों में कर्म के प्रभाव से परवश आत्मा को जाना पड़ता है । किन्तु ६ ठी, ७ वी, ८ वीं ग्रवस्था में जाति भ्रांश न होकर एक ही योनि में ग्रपात्रीकरण या पात्रीकरण प्रादि प्रकृति का वैषम्य ही कर्म के प्रभाव से होता रहता है । इसी प्रकार इन ८ ग्रवस्थाओंों में ७ अवस्था कर्म वाली हैं, किन्तु ग्राठवी अवस्था नैष्कम्यंवाली है । इन प्राठों अवस्थाओं में से प्रारम्भ की पांच अवस्थाओं में कर्म दो प्रकार के होते हैं । शुभ और अशुभ अर्थात् पुण्य या पाप या अशुभ उन कर्मों को कहते हैं, जो किसी न किसी आत्मा से द्रोह रखता हो । उसमें दुःख पहुंचाने की चेष्टा करता हो या पञ्चवलेश, प्रविद्या, श्रस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश की वृत्तियों को बढ़ाता हो अथवा उसका वध करके उसे घोर अन्धकार में डालता हो बस इतना ही पाप का लक्षण है | इसके अतिरिक्त सब कर्म शुभ या पुण्य हैं । इन दोनों के के भेद ये पांच अवस्था दस ग्रव-स्था में परिणत होती हैं शेष जो दो अवस्था हैं उनमें विद्या का योग होने के कारण कोई कर्म अशुभ नहीं होता । किन्तु श्रात्मा की वास्तविक स्वरूप सिद्धि जिस प्रकार अशुभ कर्मों से नहीं होती, उसी प्रकार शुभ कर्मों से भी नहीं हो सकती । इसलिये मुक्तावस्था अर्थात् केवल्य के लिये पारमार्थिक दशा में पुण्य और पाप दोनों ही कर्म अशुभ माने जाते हैं । किन्तु व्यावहारिक दशा के अनुसार कर्म के सम्बन्ध से विद्या की २३ ग्रवस्थायें सिद्ध होती है । इस प्रकार गति के निमित्त विद्या और कर्म इन दोनों के संयोग से ग्रात्मा की तेरह ग्रवस्था होती हैं । जिनमें कर्म के कारण श्रात्मा में विद्या अर्थात् कर्म, काम और शुक्र ये तीनों त।रतम्य से रहकर आत्मा की गति में वैचित्र्य ( भिन्न - भिन्नपना ) उत्पन्न करते रहते हैं । जिनके कारण स्थूल रीति से गति का भेद इस प्रकार होता है । [ ३६८ ]