ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 431–440

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 431 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान यहां प्रश्न होता है कि कर्म, काम और शुक्र ये तीनों ही श्रात्मा स्वरूप विद्या से भिन्न होने के कारण श्रविद्या कहे जा सकते हैं । अथवा यों कहिये कि काम और शुक्र ये दोनों ही अविद्या रूप कर्म से भिन्न नहीं हो सकते । यदि भिन्न माने जावें तो विद्या और कर्म ये दो ही तत्व मानने का सिद्धान्त विरुद्ध होगा अथवा विचार करने से यह सिद्ध भी होता है कि शुक्र और काम ये दोनों ही कर्म्म हैं । क्योंकि जैसे कागज के दबाने से उसमें मोड़ उत्पन्न हो जाता है, मृतिका में मुट्ठी दवाने से चिन्ह हो जाता है, इसी प्रकार सर्वत्र ही क्रिया द्वारा कुछ न कुछ विशेषता अवश्य हो जाती है, उसी कर्म जन्य अतिशय को शुक्र कहते हैं । काम भी एक प्रकार का शुक्र है । कर्म के द्वारा न होने के कारण काम और शुक्र ये दोनों भी कर्म ही कहे जा सकते हैं । इसलिये अविद्या से या कर्म से पृथक् रूप में काम शुक्र को गति का निमित्त कहना अनुचित है । इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि अवश्य ही अविद्यारूप कर्म से अतिरिक्त काम और शुक्र नहीं हैं, तथापि किसी विशेष वैचित्र्य के कारण पृथक् पृथक् तीनों को गतिका निमित्त कहना अनुचित नहीं है । तात्पर्य यह है कि मन, प्राण, वाक् ये तीन हमारी आत्मा के स्वरूप हैं । इनमें मन असङ्ग और निर्विकार है, और प्राण भी लगभग उसी के सदृश है इसलिये सृष्टि के सारे विकार केवल वाक् में ही होते हैं । यह बाक् दो प्रकार का है- मन प्रधान और प्राण प्रधान । जबकि मनोमय वाक् में कर्म के द्वारा कुछ अतिशय उत्पन्न होता है तो उसे काम कहते हैं, और वह काम किसी विषय के रूप में जमी हुई इच्छा है, वही इच्छा ग्रात्मा को उसी विषय की ओर ले जाती है । इसके अतिरिक्त जबकि प्राणमय वाक् में कर्म के द्वारा कोई अतिशय उत्पन्न होता है तो उसे शुक्र कहते हैं । जिस प्रकार काम में प्रकाश हैवैसा शुक्र में प्रकाश नहीं । ग्रर्थात् जैसे काम को हम देखते पहचानते हैं, वैसे प्राण के विकार शुक्र को हम स्पष्ट नहीं समझते, इसलिये उन दोनों का भेद कहना अनुचित नहीं है । किन्तु ये दोनों इच्छा-पूर्वक क्रिया करने से उत्पन्न होते हैं, अर्थात् इन्द्रियरूप मन के योग से और बुद्धि के विचार से जो कर्म किया जाय उससे ही काम या शुक्र उत्पन्न होते हैं । किन्तु दिना बुद्धि के क्रिया चेतन प्राणी में या जड़ पदार्थों में होती रहती हैं उनसे उत्पन्न सब बिना मन के जो जहाँ जितनी प्रतिशयों को काम और शुक्र न कहकर केबल कर्म शब्द से ही निर्देश किया जाता है ( बताया जाता है ) इसलिये क्लेशों में अर्थात् श्रविद्या, ग्रस्मिता, राग, द्वेप, अभिनिवेश इन पांचों में राग, द्वेष, आदि से पृथक् अविद्या कही गई है । यद्यपि सभी क्लेश प्रविद्या ही हैं तथापि इनके अवान्तर भेदों का पृथक् दिखाने के तात्पर्य से भिन्न - भिन्न पाँच क्लेश कहना ग्रथवा कर्म, काम, शुक्र इन तीनों को पृथक् पृथक् गति का निमित्त कहना अनुचित नहीं । अब इन तीनों निमित्तों से गति में जैसे जैसे भेद उत्पन्न होते हैं, वे सब भिन्न भिन्न करके यहाँ दिखाये जाते हैं । यहां इतना ग्रौर भी जानना श्रावश्यक है कि कर्म, शुक्र, काम इन तीनों को कर्म कहते हुए भी जो काम, शुक्र से पृथक कर्म कहा गया है, वह बिना इच्छा और बिना यत्न के प्रकृति नियमानुसार श्रपने ग्राप होने वाले कर्मों से तात्पर्य है । इसलिये ऐसे कर्म जड़ या चेतन दोनों में सामान्यरूप से सर्वत्र पाये जाते हैं । किन्तु दूसरा शुक्र प्राण में होने के कारण दूसरे की इच्छा से स्थावर वृक्षों में पाये जाते हैं । और ग्रब तीसरा काम मनोधर्म होने के कारण चेतन प्राणी में ही पाये जाते हैं । तात्पर्य यह है कि [ ३६६ ]

पृष्ठ 432

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 432 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान * असंज्ञ, ग्रन्तःसंज्ञ और ससंज्ञ इन तीनों में कर्म है, किन्तु ग्रन्तःसंज्ञ यार सगंज इन दोनों में शुक्र है, और केवल मंसज्ञ में काम है । अथवा यों कहिये कि ससंज्ञ जीवों में कर्म, शुक्र, काम तीनों हैं, और ग्रन्तःसंज्ञों में कर्म शुक्र दो हैं, और काम नहीं है ऐसे ही प्रमंन पदार्थों में केवल कर्म है शुक्र या काम दोनों ही नहीं यद्यपि ग्रसंज्ञ, ग्रन्तःसंज्ञ और मसंज्ञ ये तीनों हीं जीव के भेद हैं, इसलिये तीनों ह्रीं का गति से सम्बन्ध है, तथापि यहां पर केवल चेतन के ही विषय में गति का विचार होने के कारण जड़ या वृक्षादि जड़ों को छोड़कर केवल चेतन के सम्बन्ध में कर्म, शुक्र, और काम इन तीनों से गति के भेद दिलाये जाते हैं । प्रत्येक प्राणी के शरीर में ७ ग्रात्मा हैं तथापि उनमें प्रधान तीन हैं । १ - क्षेत्रज्ञ जिसका सम्बन्ध सूर्य से हैं, २ – महान् जिसका सम्बन्ध चन्द्रमा से है, ३ - भूतात्मा जिसका सम्बन्ध पृथ्वी से है । ये तीनों ही ग्रापस में ग्रत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध से मिले रहने के कारण सहसा ही पृथक नहीं होते - जिस प्रकार पृथ्वी पर जीवन दशा मिले जुले रूप से रहते हैं, उसी प्रकार प्राणोत्क्रमण काल में भी साथ ही मिले हुये रूपों में तीनों जाते हैं । पृथ्वी छोड़ने के उपरान्त पीछे, महान्यात्मा और क्षेत्रज्ञश्रात्मा का प्रभाव भूतात्मा पर अधिक पड़ता है । उन दोनों में भी महान् की अपेक्षा विज्ञान आत्मा का प्रभाव अधिक रहता । इसीलिये यह भूतात्मा सबसे समीप चन्द्रमा में जाकर भी सूर्य की ओर जाने का प्रबल बेग से उत्क्रान्त होता है । यदि विज्ञान का विरोधी कोई पातक विशेष भूतात्मा पर आ जाने से सूर्य रस रूबी विज्ञान का प्रभाव कम हो जाने से वह ग्रात्मा सूर्य के विरुद्ध मार्ग में नरक की ओर चला जावे तब तो परवश भूतात्मा की गति सूर्य के विरुद्ध दिशा में हो जाती है । परन्तु जब कोई ऐसा पातक भूतात्मा में न हो तो वह भूतात्मा ग्रवश्य ही विज्ञानग्रात्मा का सहयोग के कारण चन्द्र के परे सूर्य के ओर जाने को अग्रसर होता है और सूर्य के सम्वत्सर में अपने विज्ञान का सम्बत्सर मिलाकर एक हो जाता है, इसी को देव स्वर्ग प्राप्ति कहते हैं । इस देव स्वर्ग प्राप्ति में अपने किये हुये कर्मों के द्वारा जो उस सम्वत्सर में भिन्न - भिन्न सात स्थानों की प्राप्ति होती है, वही सात देवलोक कहे जाते हैं । जिनका वर्णन पृथक् हो चुका है । किन्तु इस भूतात्मा का पृथ्वी पर १०० वर्ष का जो जीवन काल है उस १०० वर्ष में न्यूना -धिकता से उस सम्वत्सर के सम्बन्ध में जो विशेषता या जाती है वह काम, शुक्र से सम्बन्ध रखता हुआ केवल प्राकृतिक कर्मों से ही सम्बन्ध रखता है । इसलिये प्रथम गति भेद यहाँ पर दिवाया जाता है । कम गति भेद दिखाने से प्रथम कुछ सूर्य सम्वत्सर के भेदों का दिखाना यहां पर आवश्यक है और वह इस प्रकार है जो सूर्य के प्रकाश का विशाल मण्डल है उसी चक्र को सम्वत्सर कहते हैं । उस सम्ब-त्सर में किसी नियतस्थान पर हमारी मह पृथ्वी चन्द्र सहित घूमती है । ये दोनों ही स्वयं अप्रकाश रहते हुये भी सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं । किन्तु इन दोनों के स्वतः ग्रप्रकाश होने के कारण वह तमो भाग उस सम्बहार में नियतरूप से भ्रमण करता है जिसके कारण सम्वतसर के ५ भेद होते इनका हैं | १ - अचि श्रीर धूम, २– ग्रह और रात्रि ३ - शुक्लपक्ष र कृष्णपक्ष, ४- उत्तरायण और दक्षिणायन, ५ - पूर्ण सम्बत्सर । तात्पर्य यह कि इस पृथ्वी पर कितने ही भौतिक पदार्थ या कितने ही प्रकार के वायु दिन में या रात्रि में लगकते हुए प्रकाश से प्रकाशित होने का स्वभाव रखते हैं जैसे अग्नि, विद्युत् [ ४०० ]

पृष्ठ 433

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 433 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान सूर्यकान्त चन्द्रकान्त आदि पृथ्वी के । इन सबके अत्यन्त प्रकाश को ही अचि कहते हैं और ये सब स्वरूप अत्यन्त क्षुद्र होते हैं प्रदेश में कहीं, दग्ध हो जाने कहीं प्रकाशित होते हैं किन्तु उनकी सीमा से बाहर अथवा उनके पर अन्धकार ऊपर जाता व्याप्त हो जाता है । उस समय पृथ्वी से है उसे उठकर जो रस वाक के रूप में रूपवान प्रकाशमय न होने के दीखती कारण घुम कहते हैं । अथवा यों समझिये कि प्रत्येक वस्तु जो है उस कुछ पर सूर्य के किरण पड़ते ही प्रत्याघात से उल्टे प्रतिफलित होकर सूर्य की दूर तक प्रकाश ओर वस्तु मण्डल बनाते हैं की छाया । किन्तु उसके विपरीत दशा में अर्थात् सूर्य के विरुद्ध दिशा में उस ओर मण्डल कुछ ग्रन्धकार दूर तक रहता है । इस प्रकार प्रत्येक वस्तु में सूर्य की ओर प्रकाश और दूसरी लगाव से देखने में प्राता सूर्य है, इसी प्रकाश को अचि और अन्धकार को धुम कहते हैं । प्रत्येक वस्तु मान रहते हैं । प्रकाश रूपीसम्वत्सर में इस प्रकार अचि और घूम ये दोनों शुक्ल और कृष्ण भाग विद्य सम्भवतः मेरे शरीर के भी दोनों ओर ये दोनों में के में भाग दिन या दीपक प्रकाश ग्रवश्यहोंगे उत्तर । अव यदि है कि ग्रात्मा शरीर से उत्क्रमण करें तो वह किस ओर जायगा । इस प्रश्न का यही शरीर यदि श्रात्मा विज्ञान कर्म है तो मेरे के प्रधान है तो शुक्ल भाग में से निकलेगा और यदि प्रधान कृष्णभाग में से निकलेगा । आत्मा का यही प्रथम उपक्रम है । यहशुक्ल या कृष्ण में होने के कारण बहुत छोटे छोटे हैं, किन्तु भाग पृथ्वी पर के प्रत्येक वस्तु इनसे बड़ा भाग पृथ्वी का कार है क्योंकि जिस प्रकार प्रत्येक में ओर प्रकाश और दूसरी ओर अन्ध-रहता है वस्तु एक दोनों । उसी ओर अन्धकार रहता है, इन्हीं को प्रकार इस पृथ्वी के भी एक ओर प्रकाश और दूसरी ग्रहः या रात्रि बड़े होते हैं । उत्क्रमण करता हुआ ग्रात्मा कहते हैं । ये दोनों भाग अर्ची, घुम की अपेक्षा छोटे चलते चलते या रात्रि सम्बन्ध कर लेता है | अर्थात् भाग से ग्रच या घुम से सम्बन्ध तोड़कर अहः बड़े में प्रक्रम है । भाग में ग्रा जाता है । आत्मा की यात्रा यह दूसरा है वे अब इसके रात्रि के भाग से भी बड़े भागों में जा पहुंचती भाग अनन्तर आगे बढ़ती हुई आत्मा अहः वा दिन में संपूर्ण भू-मण्डल चन्द्रमा के जिस प्रकार पृथ्वी एक भोगती सम्बन्ध से पृथ्वी पर उत्पन्न होते हैं । में मास का दिन-रात है है । इसलिए चन्द्रमा एक होता है, उसी प्रकार चन्द्रमा एक मास में भोगता । कृष्णपक्ष में चन्द्रमा का काला । उसमें को रात्रि कहते हैं मार्ग भाग शुक्लपक्ष को दिन और कृष्णपक्ष की ओर आता है । धूम पृथ्वी की ओर में प्रकाश भाग पृथ्वी रहता है, और शुक्लपक्ष से जाता और अचि मार्ग से हा में चला जाता है जाता आत्मा रात्रि के अन्धकार भाग भाग में ग्राकर कृष्णपक्ष यात्रा में यह है । आत्मा की या अहः में चला जाता प्रकाश में ग्राकर शुक्लपक्ष के प्रकाश तीसरा प्रथमहै | दक्षिणायन अचि मार्ग से जाता है और हुआ से सम्बन्ध सबसे बड़ा वही भाग है । यह आत्मा की श्रात्मा करता है, क्योंकि कृष्णमार्ग सबसे में चला जाता बड भाग शक्ल पक्ष से भाग के सम्बन्ध तोड़कर उत्तरायण से सम्बन्ध तोड़कर इसी कृष्णमार्ग में कृष्णपक्ष प्रकार और उसी आत्मा क्रम से जाता हुआ यात्रा में चतुर्थ प्रक्रम है । [ ४०१ ]

पृष्ठ 434

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 434 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान इसके अनन्तर यात्रा के अन्तिमस्थान पृथ्वी के दोनों छोर पर दो होते हैं । अर्थात् सूर्य की ग्रोर स्थान है, अथवा सूर्य के सम्वत्सर का वह पूर्ण कुछ भी कृष्णभाग का संसर्ग नहीं । इसी प्रकार शुक्लमार्ग से जाती हुई आत्मा के लिए सूर्य ही ग्रन्तिम प्रकाशभाग है । जिसमें किसी पर प्रकाश पिण्ड न होने से कृष्णमार्ग से जाती हुई आत्मा के लिए अन्तिम स्थान घोर अन्धकारमय है, जहां पर सूर्य सूक्ष्मतारा के तुल्य दीखने के कारण अपना प्रकाश भली प्रकार नहीं देता यही ग्रात्मा के लिये पश्चम या अन्तिम प्रक्रम है । पृथ्वी को छोड़ने के अनन्तर आत्मा के लिये ग्रन्त से ग्रन्तिम विश्राम स्थान यही पञ्चम प्रक्रम है क्योंकि ग्रात्मा दो ही ओर जा सकती है । शुक्लमार्ग से या कृष्णमार्ग से इन दो को छोड़ तीसरा कोई मार्ग ही नहीं हो सकता । इनमें शुक्लमार्ग से जाती हुई यदि कर्मानुसार बीच के लोकों में एक न जावे तो ग्रन्त को सूर्य में ही जाकर विश्राम करेगा और सूर्य के रस से बनी हुई आत्मा अपने कारण ज्योतिर्धन में लवलीन हो जाती है, और इसी को ज्योति से ज्योति का मिलना अथवा मुक्तिपाना कहते हैं इसके विरुद्ध यदि श्रात्मा कृष्णमार्ग से जावे तो यह यदि कर्मानुसार बीच के किसी प्रक्रम में न रुक जावे तो जाते - जाते अन्त में किसी घोर अन्धकार में प्रवेश करती है और उसी ग्रन्थकार को नरक कहते हैं । वह् नरक इस आत्मा के लिए घोर भयङ्कर दुःखस्थान है, क्योंकि यह ग्रात्मा सूर्य के रस से बनी हुई है, उसको उस अन्धकार नरक में ज्योति का रस नहीं मिलता, इसलिए उसकी विकलता होना सम्भव है उसी को दुःख कहते हैं | इसलिए कृष्णमार्ग ग्रन्त में दुःख और शुक्लमार्ग से अन्त में परमानन्द मोक्ष मिलता है, वह यही आत्मगति में दोनों मार्गों का रहस्य है । इस प्रक्रिया से जो सूर्य सम्वत्सर के ५ विभाग सिद्ध हुए हैं उनमें पूर्व भाग की अपेक्षा उत्तर भाग बड़ा है, और उनमें क्रम से जाती हुई अन्त को सूर्य में प्राप्त हो जाती है यही बात यहां कही गई है । श्रब इनमें हम वह विशेषता दिखाते है जो कि प्राणी के शरीर धारण करने पर जीवन की अवस्था से सम्बन्ध रखती है और वह इस प्रकार है । चेतन प्राणी की आत्मा, मन, प्राण, वाक् से बनी हुई है ये तीनों किसी न किसी परिमित मात्रा में ही ग्राकर शरीर धारण करते है । यह सम्भव नहीं है कि कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य श्रादि सभी की आत्मा समान मात्रा की हो, ऐसी स्थिति में मनुष्य की आत्मा के लिये परीक्षा से सिद्ध हुआ है कि मन, प्राण, वाक् ये तीनों ही उसमें छत्तीस छत्तीस हजार मात्रा की होती है और वह ३६००० हजार दिन तक ही शरीर धारण कर सकता है । किसी नियम के अनुसार ग्राहार विहार में फरक पड़ने से उसी ३६००० हजार मात्रा को कुछ कम या अधिक दिन में खर्च करने से कम आयु या अधिक ग्रायु भी हो सकती है | परन्तु उनका प्रधान परिमाण ३६००० दिन का ही है । इसीलिए वेद में सिद्धान्त किया है कि- - " शतायुर्वै पुरुषः " अर्थात् मनुष्य की आयु १०० वर्ष की या ३६००० दिन की होती है । ग्रव इस १०० वर्ष के यदि ५ भाग किये जायें तो प्रत्येक भाग २० वर्ष का होगा । इस प्रकार एक एक बीसी ही में ग्रात्मा में सूर्य संवत्सर के उन पांच भागों में जाने के लिए बल उत्पन्न होता है । हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि बाल्यावस्था के बल की अपेक्षा उत्तरोत्तर बल की वृद्धि होती है । यद्यपि वृद्धावस्था में शरीर का [ ४०२ ]

पृष्ठ 435

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 435 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञानं * बल फिर घट जाता है, परन्तु इसका कारण आत्मा के शरीर से बन्धन की स्थिरता है अर्थात् बाल्या-वस्था में ग्रात्मा दुर्बल होने के कारण शरीर के भौतिक भाग को अधिक प्रयत्न से पकड़ती है, इसीलिए आत्मा की मधुरता से ( प्रिय होने से ) बालक का शरीर सुन्दर प्रतीत होता है | किन्तु ज्यों-ज्यों ग्रात्मा बल पाकर स्वतन्त्र होती जाती है त्यों - त्यों शरीर का सहारा लेने से विमुख वे परवाह ] होती जाती है, यहां तक कि जब आत्मा में पूर्ण बल आ जाता है तो वह इस भौतिक शरीर को छोड़कर ज्योतिर्मय जगत् में जाने के लिए उत्सुक हो जाती है और इसी को मृत्यु कहते हैं । इसी बल से निश्चित-रूप से जानना चाहिए कि प्रत्येक बोसी से आत्मा का बल बढ़ता हुआ भिन्न - भिन्न प्रकार का हो जाता है और उन्हीं बलों के अनुसार आत्मा का ऊंचा बढ़ना संभव होता है । प्राचीन महर्षियों ने परीक्षा करके निश्चय किया है कि २० वर्ष के पहले मरने में दुर्बल आत्मा प्रचि वूम में ही पहुंचकर रह सकती है । किन्तु उससे ऊपर अहोरात्र भाग में उत्क्रमण नहीं कर सकती, बीस से ऊपर चालीस के गीतर अहोरात्र तक चढ सकती है उससे ऊपर नहीं । किन्तु चालीस और साठ के भीतर शुक्ल, कृष्णपक्ष तक ही जा सकती है और साठ - प्रस्ती के भीतर उत्तरायण या दक्षिणा-यन तक ही जा सकती है । ग्रस्सी से १०० वर्ष तक पूर्ण सम्वत्सर में जाने का बल पाती है । किन्तु सौ ( १०० ) वर्ष से अधिक जीने पर सम्वत्सर के सप्तम् " नाकलोक " से भी ऊपर " काम प्रलोक " में जाने की शक्ति पाती है । यह विषय भगवान् याज्ञवल्क्य महर्षि ने अग्नि रहस्य काण्ड में निर्णय किया है, किन्तु यह प्रकृति नियम के अनुसार साधारण परिस्थिति मात्र है । जब कि विद्या का या कर्म का पूर्ण बल उपर्युक्त नियम के विरुद्ध ग्रा जाता है, तो उसके अनुसार व्यभिचार होता है । अर्थात् शुक्रदेव जैसे ज्ञानी पुरुष की आत्मा प्रबल होने के कारण बाल्यावस्था में ही पूर्ण संवत्सर में की जा सकती है, और १०० वर्ष से अधिक जीने पर भी घोर पानी देवस्वर्गलोक में नहीं जा सकता । किन्तु ये दोनों कर्म बल काम और शुक्र इन दोनों से सम्बन्ध रखते हैं । इन दोनों के अलावा केवल स्वभाविक कर्म के अनुसार श्रात्मा की गति का नियम उपरोक्त ५ अवस्थाओं के नियमानुसार ही निश्चित है । काम स्वाभाविक कर्म के अतिरिक्त अब हम उन प्रधान कर्मों की चर्चा करेंगे, जिन्हें काम या शुक्र कहते | काम उन कर्मों को कहते हैं जिनका करना प्राणी की इच्छा पर निर्भर है, और जिन कर्मों के लिये करने वाला ही उत्तरदायी समझा जाता है । प्रायः जगत् भर के प्राणी ऐसे ही कर्मों को करते हुए नेक-नाम या बदनाम होते हैं, यश प्रतिष्ठा या राजदण्ड पाते हैं । ऐसे कर्म तीन प्रकार के होते हैं - सुकर्म, विकर्म और अकर्म । इनमें अकर्म वह है जिसके करने न करने में हानि लाभ कुछ नहीं । किन्तु समय का व्यर्थ जाना और शरीर के बल का व्यर्थ व्यय होना श्रवश्य संभव है । इसलिये ऐसे कर्मों से भी प्राणी का अनिष्ट ही होता है इसी से यह भी पाप में गिना जाता है । इसके प्रतिरिक्त जिन कर्मों से अपनी या दूसरे की हानि होती है वही विकर्म अथवा पाप कर्म हैं ऐसे कर्मों के लिए शास्त्र में निषेध और समाज के विरुद्ध है । यह विकर्म भी दो प्रकार का है । एक [ ४०३ ]

पृष्ठ 436

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 436 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ब्रह्मविज्ञान * वह है कि जिससे इसी जन्म में या इसी समाज में अपना या दूसरे का अनिष्ट होता हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देता हो जैसे कूप में पड़कर मरना या दूसरे की चोरी या हत्या करना इत्यादि २ । दूसरा वह विकर्म है जिसका परिणाम इस जन्म या इस समाज में भलि भांति न दीखता हो किन्तु काल पाकर इसी जन्म में या दूसरे जन्म में अनिष्ट होता हो जैसे मिथ्या भाषण करना, दूसरे का अपमान करना, बहुत से वर्जित पदार्थों को खाना इत्यादि २ । इनके अतिरिक्त सुकर्म वे हैं जिनके करने से अपनी या समाज की सुख-शांति होती हो, अपनी आत्मा को या दूसरे की ग्रात्मा को सन्तोष या प्रसन्नता होती हो । बस ये ही तीन कर्म हैं । इनमें देश, काल, पात्र के विचार से ये तीनों ही परिवर्तित हो जाते हैं, अर्थात् जो अत्यन्त सुकर्म है वही कभी विकर्म और विकर्म भी कभी सुकर्म हो सकता है । जैसा कि सत्य बोलना, दान करना सुकर्म है, किन्तु यदि सत्य भाषण से किसी उत्तम या श्रेष्ठ प्राणी की प्राण हानि होती हो तो उस सत्य से पाप होता है । शूद्र को वेद प्रदान, चोर को अभय दान, ब्रह्मचारी को पान [ ताम्बूल ] देना पाप है | इसी प्रकार किसी प्राणी का वध करना महापाप है । किन्तु वही किसी हत्यारे पापी की हत्या करना पुण्य है इत्यादि २ | ऐसी स्थिति सुकर्म और विकर्म आदि का निश्चय करके सेवन करना या वर्जन करना प्राणी के अपने विचार पर निर्भर है । उसके विचार के लिये विद्या या विज्ञान की आवश्यकता है । बिना विद्या के ज्ञान या अन्यथा ज्ञान के संयोग से प्राणी पुण्य करता हुया कभी पाप कर बैठता है । इसे ही शास्त्र में ‘ प्रज्ञापराध ' कहते है | बस इससे यह सिद्धांत निकला कि सम्यक्ज्ञान, अन्यथा ज्ञान और प्रज्ञान इसी प्रकार सत् कर्म, विकर्म और कर्म ये ६ ही व्यवहार के निमित्त ( कारण ) हैं । इनमें सम्यग्ज्ञान से सत्कर्म होकर उससे ग्रात्मा को सुख शांति मिलती है किन्तु अज्ञान या अन्यथा ज्ञान से विकर्म और ग्रकर्म होते हैं और उनमें श्रात्मा को दुःख मिलता है । सुख का कारण केवल एक ही और के दुःख कारण दो हैं, इसी से आजन्म सुख की इच्छा या सुख के लिये प्रयत्न भरपूर करते रहने पर भी जगत् के सभी प्राणी अधिकतर दुःखी दीखते हैं, जिन कर्मों से दुःख मिलता है, वही पाप हैं । इस प्रकार सम्यक्ज्ञान से उत्पन्न हुए सत्कर्म से जो अतिशय उत्पन्न होता है उससे ग्रात्मा की गति उत्तम होती है । ऐसे सत्कर्म प्राणी की व्यक्तिगत कामना या देश, काल पात्र के अनुरोध से अनन्त प्रकार के होने पर भी उनकी जाति मुख्यतः तीन ही होती हैं । इष्ट, ग्रापूर्त और दत्त - इष्ट एक प्रकार का लघु [ पाक ] यज्ञ है जैसे किसी अनाथ कन्या, बालक का विवाह और यज्ञोपवीत आदि संस्कार करना । आपूर्त वह कर्म है जो सकल साधारण जनता के सुख के लिये कोई शाश्वतिक कर्म किया जाय जैसे कूप, वापी [ बावड़ी ] सरोवर, उपवन, पन्था [ राजमार्ग ] वृक्ष लगाना, देवालय बनवाना, सदावर्त, धर्मशाला, चिकित्सालय [ श्रोषधालय ] पाठशाला, पुस्तकालय इत्यादि । दत्त वह दान है जिस में ग्रङ्ग हीन, रोगी दुःखी या कोई जाति को दिया जावे | इस प्रकार तीन जाति के कर्म प्रायः जगत् भर शास्त्र विरुद्ध सम्पूर्ण जगत् के प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ न कुछ पाप कर्म भी किया ही करते हैं । पाप उसी कर्म को कहते हैं जो पराई ग्रात्मा को या पराये प्राण, शरीर, धन सम्पदा का हरण करके दुःख पहुंचाता हो और अकर्म भी यद्यपि दूसरी आत्मा को दुःख न देकर होता है, तथापि समय नष्ट होने से अपनी ग्रात्मा का बल व्यर्थ नष्ट होता है, इसीलिये पाप ही है । इसीलिये सत्कर्म, विकर्म, अकर्म के भेद से तीन प्रकार के कर्म होने पर भी विचार से दो ही कर्म सिद्ध होते हैं । पुण्य और पाप और इन से ग्रात्म [ ४०४ ]

पृष्ठ 437

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 437 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान गति भी दो ही प्रकार की होती है । आत्मा को सुख देने वाला पितृ स्वर्गलोक और आत्मा को दुःख दे वाला नरकलोक ये दोनों ही लोक एक मार्ग में मिलते हैं, जिसको पितृयान कहते हैं । यह मार्ग चन्द्रमा से लोकालोक तक फैला हुआ है । जिसमें चन्द्र से यम तक जितने लोक हैं वे सब पितृस्वर्ग कहे जाते हैं और उनमें सर्वत्र ग्रात्मा को सुख शांति मिलती है । यदि इस पितृयान को मनुष्य देखना चाहे तो उसकी दिशा की आज्ञा बिना भी प्रत्येक प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार कुछ न कुछ किया ही करता है । किन्तु इनके यही बनाई जा सकती है, कि आकाश में वैश्वानर मार्ग अथवा अजवीथी अथवा मकरवृत से दक्षिण और अगस्त्य के तारे से उत्तर ४२ अक्षाश से परिच्छिन्न प्रदेश की ओर है इसी में सत्कर्म करने से पितृस्वर्ग तक या कुकर्म, अकर्म करने से नरकलोक में जाती है । इनमें पितृस्वर्ग तीन प्रकार का है— उदभ्वती, पीलुमती और प्रद्यौ । इनमें प्रद्यो सबसे उत्तम है और नरकलोक मुख्यतः सात माने जाते हैं उनमें प्रत्येक चार २ प्रकार के होने से कहे गये हैं उनमें भी प्रत्येक तीन २ शाखा होने से ८४ नरक कहे जाते हैं । सात लोकों के ( नरकों ) के नाम – १ - रौरव, २- महारीरव, ३ - कुम्भीपाक, ४ – कालसूत्र, ५ – संघान, ६- तपन ७- प्रवीचि र २८ नरक भागवत् के पञ्चमस्कन्ध के २६ वें अध्याय में है । १ तामिस्र २ अन्धतामिस्र ३ रौरव ४ महारोरव ५ कुम्भीपाक ग्रन्थकुप १३ वज्रकण्टक १७ विशसन २१ श्रयःपान १४ वैतरणी १८ लालाभक्ष २२ क्षारकर्दम ६ कालसूत्र ७ सिपत्रवन १० कृमिभोजन ११ संदेश सूकर मुख १२ तप्तसूमि १५ योद १६ प्राणरोध १६ सारमेपादन २० ग्रवीचि २३ रक्षोगण भोजन २४ शूलप्र २५ दन्दणूक २६ वट निरोधन २७ पर्यावर्तन २८ सूचीमुख इस प्रकार पितृयान मार्ग के दो प्रधान विभाग हैं - १ - तीन पितृ स्वर्गलोक और दूसरा ८४ यम यातना ( कष्ट ) के नरक लोक । इन की अनेक शाखा प्रशाखा होने पर भी उनमें सुख दुःख भोगने के तारतम्य ग्रवश्य हैं । उस तारतम्य का कारण मुख्यकर कर्मों का बोलबाला है । किन्तु उन कर्मों के बला-बल का कारण कामना ही है | कामना विशेष से वह एक ही कर्म प्रवल पाप या कम पाप अथवा निष्पाप, इसी प्रकार प्रबल पुण्य या कम पुण्य या अपुण्य हो सकता है । तात्पर्य यह है कि कोई भी कर्म स्वतन्त्ररूप से पाप या पुण्य नहीं हो सकता, केवल उनके पाप पुण्य होने का कारण उस करने वाले के श्रद्धा, विचार और कामना पर निर्भर है । इसलिये कामना ही गति का मुख्य निमित्त है इसीलिये वेद में कहा है—

कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते यत्र तत्र ।

पर्याप्त कामस्य कृतात् मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥

अर्थात् जो समझ बूझकर नाना प्रकार की कामनाओं की इच्छा रखता है, वह उन्हीं कामनाओं के बल से जहां तहां जन्म लिया करता है और जिसकी कामनायें आत्म शक्ति पहचानने के कारण नष्ट हो गई हैं, उसकी सब कामनायें अपनी आत्मा में ही पूरी हो जाने के कारण श्रात्मा में ही विलीयमान हो जाती है । इसीलिए उसकी कही भी ग्रन्यत्र गति न होकर यहां ही समवलय मुक्ति हो जाती है । [ ४०५ ]

पृष्ठ 438

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 438 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* ब्रह्मविज्ञान हैं यहां पर यह प्रश्न उठता है कि यदि कामना को गति में निमित्त माना जाता है तो पितृयान मार्ग से जाने वाले को सर्वदा स्वर्ग ही मिलना चाहिए, नरकलोक में गति होना असंभव है । क्योंकि आबाल वृद्ध, ग्रापामर विद्वान् कोई भी प्राणी नरक में दुःख भोगने के लिये कामना नहीं रखता और कहा गया है कि कामना ही से खिचा हुआ प्राणी नीचे ऊँचे लोकों में जहां तहां भटकता । तो जब कि नरक के लिये कामना नहीं तो वह प्राणी नरक में किस निमित्त से जा सकेगा । इसका उत्तर यह है कि कामना किसी लोक में जाने की नहीं हुआ करती, क्योंकि यह कामना प्रायः सम्पूर्णा जगत् के प्राणियों में उनके व्यवहारों में देखी जाती है । बिना काम के कोई भी व्यवहार जगत् का महीं चलता, परन्तु इन प्राणियों में बहुत ही कम ऐसे हैं जो स्वर्ग, नरक जानते हों, या जानकर भी उनमें विश्वास रखते हों, तो ऐसी स्थिति में स्वर्ग, नरक की कामना के विचार का यहां प्रस्ताव नहीं है । कामना से तात्पर्य यह है कि जो कुछ कोई कर्म करता है वह कुछ न कुछ अवश्य ही उस कर्म का उद्देश्य या प्रयोजन रखता है । निष्काम कोई भी प्रवृत्ति नहीं होती, तो ऐसी स्थिति में जिस काम से या जिस विचार से वह किसी कर्म को करता है, वह काम या विचार यदि समाज का या दूसरी आत्मा का विद्रोह या हानि को उद्देश्य रखकर किया जाता है तो पाप है और उस पाप के अनुसार जैसा दुःख प्राप्त होना प्रकृति में नियत है वह दुःख उस आत्मा को न्यून या अधिक परवश अवश्य ही मिलेगा यही नरक का तात्पर्य है । इसीलिये काम के द्वारा सुख या दुःख पाने योग्य स्थान में आत्मा का जाना अवश्यमेव है । शुक्र शुक्र उस प्रतिशय का नाम है जो कर्म के द्वारा आत्मा में उत्पन्न हुवा करता है । परन्तु कर्म यदि किसी कामना से इच्छानुसार किया जाय तो उस कर्म से जो शुक्र उत्पन्न होता है उसे काम कहते हैं और उसका वर्णन पहले हो चुका है | परन्तु व शुक्र उस कर्मजन्य प्रतिशय के लिये विवक्षित ( कथनीय ) है कि जो कर्म अपनी इच्छा पर निर्भर न करके बुराने ऋषि श्राचार्य ग्रादि महानुभावों की आज्ञा के अनु-सार् अपना कर्तव्य समझकर किया जाता हो, जैसे सन्ध्यावन्दन या साग्नि द्विजातियों के लिये यज्ञ विधि कही गई हैं इसी प्रकार तप और दान की भी माना है जिनकी कर्तव्यता ग्रपना इच्छानुसार न होकर आचार्यों की आज्ञानुसार ही किसी विशेष नियम के रूप में किये जाते है । अपनी इच्छानुसार मनमानी कार्यबाही न होने के कारण इनको काम तो कदापि नहीं कह सकते, इसलिये इनको शुक्र कहते हैं । यज्ञ ऐसे कर्म तीन जाति के हैं । यज्ञ, तप, दान- इनमें ग्रग्निचयन यज्ञ के अतिरिक्त और किसी भी यज्ञ से मुक्ति नहीं होती, किन्तु केवल स्वर्ग होता है जैसा कि वेद का सिद्धान्त हैं— " यज्ञेषु नामृतत्वस्याशास्ति, ऋते चयनयज्ञात् " श्रर्थात् यज्ञों में मोक्ष की आशा नहीं है सिवाय अग्निचयन यज्ञ के । [ ४०६

पृष्ठ 439

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 439 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ॐ ब्रह्मविज्ञान कु यज्ञ ४ प्रकार के हैं । + पाकयज, नियंश. महायज्ञ, प्रतियज्ञ ( बड़ा ) इनमें पाकयज्ञ दिना श्रग्नि के या एक अग्नि से भी होता | शेष सवयश तीन - तीन अग्नि से होते हैं और वे अग्नि ये हैं - प्राहवनीय गाहपत्य, दक्षिणाग्नि ( एक प्रकार की चन्द्रमा की अग्नि ) इन तीनों से हविर्यज्ञ होता है । किन्तु महायज्ञ और अनियज्ञ में आहवनीय, गार्हपत्य श्रौर धिष्ण्याग्नि, इन तीनों अग्नियों से यज्ञ होता है इन यज्ञों से एक नवीन ग्रात्मा देवलोक या सूर्य सम्वत्सर में उत्पन्न की जाती है । अर्थात् जो विज्ञानमय आत्मा सूर्य रस से सपने आप प्राकृतिक नियमानुसार सभी प्राणियों में उत्पन्न होती रहती है । वह वृक्ष श्रौर कृमि श्रादिक्षुद्र जीवों से लेकर मनुष्य पर्यन्त कम २ से बढ़ती हुई मात्रा में उत्पन्न होती है किन्तु मनुष्य में भी साधारण मनुष्य की अपेक्षा विद्वान्, तपस्वी, सम्राट आदि में विशेषमात्रा से रहती है । तथापि वह् विज्ञानमय आत्मा प्रज्ञानमय आत्मा के प्रवल पातक कर्मों से दब जाता है | जिसके कारण अपने स्वभावानुसार सूर्य रूपी स्वर्ग में जाने की इच्छा रखती हुई भी उधर न जाकर दक्षिणामार्ग में चली जाती है इसी दुर्बलता की मिटाने के लिये यज्ञ का विधा है, इन यज्ञों से उस मानुषी विज्ञानमय ग्रात्मा में प्रत्येक देवता का संस्कार करके उसी विज्ञानमय मानुषी ग्रात्मा पर देवी आत्मा उत्पन्न करली जाती है, जिसके कारण वह ग्रात्मा देवताओं का घनरूप सूर्य सम्वत्सर में जाने के लिये अधिक बलवान् हो जाती है, और ग्रवश्य ही चन्द्रमा से उसकी गति सूर्य की ओर जाने की स्वभाविक हो जाती है यही यज्ञों का रहस्य है । यज्ञ करने से विज्ञानमय मानुषी प्रात्मा में जो भिन्न - भिन्न देवताओं के रसों का संस्-कार उत्पन्न होता है उसे ही शुक्र कहते हैं और वही शुक्र उस आत्मा को प्रबल वेग से सूर्य की ओर श्रीकृष्ट करके ले जाता है । इन यज्ञों में हविर्यज्ञ ही मुख्य है । यद्यपि महायज्ञ अर्थात् सोमयज्ञ ही मुख्य यज्ञ है, अथवा यों कहिये कि अग्नि में सोम की प्राहुति देना इसी का नाम यज्ञ है । यह आहुति महायज्ञ और प्रतियज्ञ में ही दी जाती है, इसलिये उन्हीं को यज्ञ कहना चाहिये । हविर्यज्ञ में पुरोडास के साथ घृत की आहुति दी + पाकयज्ञ स्मार्तयज्ञ है और शेष श्रीतयज्ञ है । ( पाक = छोटा ) ऐहिलौकिक कामनाओं को सिद्ध करने के लिये है । * प्राज्ञात्मा जिन - जिन विषयों से संयोग करता है उनमें उसका योग ४ प्रकार का होता है । सुयोग, हीनयोग, प्रतियोग, मिथ्यायोग | इनमें विज्ञान के सम्बन्ध से प्रज्ञान सुयोग करता है, किन्तु विज्ञान के सहयोग की ग्रपेक्षा न रखकर स्वतन्त्र रूप से यदि प्रज्ञान योग करें तो हीनयोग, अतियोग, मिथ्यायोग होंगे । यही तीन कुयोग त्रिविध दुःखों का मूल कारण है । इसीलिये प्रज्ञापराध से ही सब दुःखों का होना माना गया है प्रज्ञापराध से होते हुए तीनों कुयोग ही पाप के मुख्य लक्षण हैं । यदि विज्ञानआत्मा को यज्ञ संस्कार करके ग्रत्यन्त प्रबल बनाई जाय तो वह प्रज्ञापराव से उत्पन्न प्रज्ञान के सब दोषों को अर्थात् पापों को नाश करके उस प्रज्ञान को अपनी योनि अर्थात् सूर्य की ओर बलात्कार से ले जाती है यही यज्ञ से लाभ है । X जी के आटे का लुगद ( पुरो = ग्रागे और डास = देना ) - प्रागे याने घृत के पहले । [ ४०७ ]

पृष्ठ 440

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 440 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

के ब्रह्मविज्ञान जाती है न कि सोम की, इसलिये इसको यज्ञ नहीं कहना चाहिये तथापि बिना हविर्यज्ञ के सोमयज्ञ नहीं किया जा सकता क्योंकि देव चक्र रूपी सूर्य सम्बत्सर के ५ विभाग किये जाते हैं— १ – ग्रहोरात्र, २ – शुक्लपक्ष प्रोर कृष्णपक्ष, ३ ऋतु ( ग्रीष्म, वर्षा, शीत ) ४- दोनों प्रयन और ५-सम्वत्सर । इनमें ग्रहोरात्र आदि सम्वत्सर के अवयवों का संस्कार किये बिना पूर्ण सम्वत्सर का संस्कार नहीं हो सकता और सम्वत्सर संस्कार बिना सम्वत्सर में व्याप्त हुए देवताओं का मानुषी विज्ञानग्रात्मा में संस्कार नहीं हो सकता इसलिये अग्निहोत्र आरम्भ करके पांच प्रकार के हविर्यज्ञों से सम्वत्सर के अवयवों का प्रथम संस्कार करके पूर्ण सम्बत्सर का संस्कार करना सोम यज्ञ रूपी महायज्ञ कहलाता है । इसलिये महायज्ञ की सिद्धि का कारण होने से हविर्यज्ञ भी यज्ञ कहा जाता है । यह हविर्यज्ञ ५ प्रकार के हैं – १ - प्रभ्याधान, २ - ग्रग्निहोत्र, ३ - दर्शपूर्णमास, ४ – चातुर्मास, ५– पशुबन्ध । इनमें ग्रम्याधान से केवल अग्नि का संस्कार होता है अर्थात् लौकिक अग्नि के अतिरिक्त एक नया वैध अग्नि उत्पन्न की जाती है जिसमें देवता के ग्रहण करने की शक्ति है । इसी अग्नि पर शेष पांच हविर्यज्ञ किये जाते हैं, जिनसे सम्वत्सर के पांच अवयवों का क्रम से संस्कार होता है । जैसे सायं प्रातः ग्रग्निहोत्र करने से ग्रहोरात्र का संस्कार होता है, और दर्शपूर्णमास से शुक्ल कृष्णपक्ष का संस्कार होता है और तीन चातुर्मास यज्ञ से ऋतु के तीन चातुर्मास का संस्कार होता है और पशुबन्ध से दोनों अयनों का संस्कार होता है | इसके पश्चात् यह विज्ञानग्रात्मा महाविशाल होकर पूर्ण सम्वत्सर में पहुंचता है, तब सोमयज्ञ से उस सम्वत्सर को संस्कार करने से मानुषी विज्ञानग्रात्मा में वब देवताओं का समावेश हो जाता है | जिससे विज्ञानमय मानुषी ग्रात्मा में ३३ देवताओं से ६ वषट्कारों के द्वारा यज्ञमय देवी आत्मा उत्पन्न हो जाती है । वही दैवग्रात्मा अपने साथ श्लिष्ट ( संयुक्त ) प्रज्ञानात्मा को सूर्य सम्वत्सर में ले जाती है और वह सूर्य सम्बत्सर श्रानन्द घन है, इसलिये उसे देवस्वर्ग कहते हैं । उसमें जाना ही यज्ञ का फल है । इन यज्ञों से हमारी विज्ञानग्रात्मा में एक प्रकार का बल उत्पन्न होता है, जिसको यज्ञ का ' ऊर्क ' कहते । यह ऊर्क आहुति के अनुसार उत्पन्न होता है । अर्थात् सबसे प्रथम प्रभ्यादान संस्कार से ब्राह्मण साग्निक बनता अर्थात् ब्राह्मण के शरीर में प्राकृत नियमानुसार जो वैश्वानर ग्रग्नि है, उसमें एक नये प्रकार का अग्नि संस्कार किया जाता है जिसके द्वारा ब्राह्मण की भूतात्मा विज्ञान में आये हुये देवताओं को धारण करने में समर्थ होता । एक देवता को दूसरे देवता के साथ एक प्रकार का याज्ञिक सम्बन्ध होता है, जिस सम्बन्ध को ग्राजकल पाश्र्वत्यविद्या ( Science ) के विद्वान्लोग रासायनिक संयोग के नाम से व्यवहार करते हैं । इस सम्बन्ध या संयोग से मिलने वाले दोनों पदार्थों के निज का स्वरूप सर्वथा नष्ट होकर एक नई वस्तु उत्पन्न होती है जिसमें कर्म, रूप, नाम तीनों बदल जाते हैं । इसी को सम्बन्ध उत्पन्न करने के लिये प्रत्येक संस्कार में ग्रग्नि की आवश्यकता होती है । परन्तु यह सामर्थ्य प्रत्येक ग्रग्नि में नहीं होती, इसके लिये कोई विशेष ग्रग्नि उत्पन्न करनी पड़ती है उसी को वैध ग्रग्नि कहते हैं । वैश्वानर ग्रग्नि प्रत्येक प्राणी के शरीर में स्वभाव से उत्पन्न होता है, किन्तु उसमें याज्ञिक संस्कार करने का बल किसी किसी समय अपने आप उत्पन्न हो जाने पर भी प्रतिक्षण वह बल नहीं [ ४०८ ]