ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 441–450

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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* ब्रह्मविज्ञान * रहता, परीक्षा से स्थिर हुआ है कि भोजन, जलपान, भाषण, शयन, मूत्र, पुरीषोत्सर्ग, मैथुन, सूर्य चन्द्र-ग्रहण, तीर्थं विशेष संसर्ग, किसी तपस्वी योगी का दृष्टि प्रभाव, किसी मन्त्रशास्त्र के मन्त्र का प्रभाव, भूतावेश इत्यादि निमित्त के समय प्रत्येक प्राणी के शारीरक वैश्वानर ग्रग्नि में एक प्रकार का क्षोभ अवश्य उत्पन्न होता है । जिससे शारीरक विद्युत् प्रवाह एक दूसरे को मिलाकर याज्ञिक का सम्बन्ध उत्पन्न कर देता है, परन्तु यह शक्ति नैमित्तिक होने से सर्वदा बनी रहती । इसलिये अग्न्याधान संस्कार से इस वैश्वानर अग्नि में सदा के लिये दूसरा अग्नि उत्पन्न कर दिया जाता है जिसके कारण हमारे विज्ञानमय ग्रात्मा के देवताओंों में सूर्य सम्वत्सर के देवताओं का संयोग याज्ञिक सम्बन्ध से होकर विज्ञान-मय आत्मा में विशेष बलाधान किया जाता है यही बलाधान अग्न्याधान आदि हविर्यज्ञों का फल है । वैश्वानर अग्नि में इस प्रकार याज्ञिक अग्नि उत्पन्न होने पर उस अग्नि की रक्षा के लिये अन्न की आहुति की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार प्राकृत शरीर की वैश्वानर अग्नि की रक्षा के लिये सायं प्रातः भोजन किया जाता है, और उसमें अग्नि नष्ट नहीं होने पाती उसी प्रकार इस नये याज्ञिक अग्नि की रक्षा के लिये भोजन दिया जाता है उसी को आहुति कहते हैं जिस प्रकार प्राणी के भोजन में दिन-भर अग्नि को स्थिर रखने का ही सामर्थ्य है । इसलिये रात्रि में फिर भोजन करना पड़ता है । अर्थात् भोजन की शक्ति के अनुसार अग्नि की तृप्ति होकर पश्चात् फिर भूख लगती है । इस प्रकार सायं प्रातः श्राहुति का भी ऊर्क ( बल ) अहोरात्र के प्राधे काल तक ही बना रहता है अर्थात् अग्निहोत्र की प्रातः श्राहुति का बल सायंकाल तक, और सायं श्राहुति का बल प्रातः काल तक बना रहता है । यही अग्नि-होत्र में सायं प्रातः ग्राहुति का फल है । प्राणोत्क्रमण के पश्चात् भी जन्म भर अग्निहोत्र करने को याज्ञिक ऊर्क सूर्य सम्वत्सर के अहोरात्र भाग में ही पर्याप्त होकर कार्यकारी हो सकता है । अर्थात् वह ग्रात्मा सम्वत्सर के ग्रहोरात्र के ग्रहोभाग में ही रहकर उसका आनन्द भोग करता है । किन्तु अग्निहोत्र के बल से ग्रहोरात्र की अपेक्षा बड़ा भाग शुक्ल कृष्ण पक्ष का सुख नहीं ले सकता, इसलिये अग्निहोत्र करने वाले को इष्टि अर्थात् दश पूर्णमास की आवश्यकता है । इस इष्टि से हमारे विज्ञानमय आत्मा में जो याज्ञिक ग्रग्नि है उसकी रक्षा होकर प्राणोत्क्रमण के पश्चात् उस याज्ञिक ऊर्क के प्रभाव से शुक्ल, कृष्णपक्ष रूपी विभाग में जा सकती है । किन्तु उससे विस्तृत विभाग अर्थात् ऋतु विभाग में नहीं जा सकती, परन्तु दर्श पूर्णमास करता हुआ यदि चातुर्मास याज्ञिक यज्ञ करे तो उस आत्मा में चार मास तक ग्रग्निस्थिति का ऊर्क उत्पन्न होकर सूर्य सन्वत्सर के ऋतु भाग में जाने के योग्य हो जाता है इसी प्रकार पशु बन्ध करने से ग्रात्मा की याज्ञिक अग्नि में षाण्मासिक ऊर्क उत्पन्न होकर सम्वत्सर के आधे भाग में अर्थात् उत्तरायण में व्याप्त होकर उसका आनन्द पाने के योग्य हो जाता है । इसके अनन्तर ज्योतिष्टोम यादि सोम यज्ञ करने से शरीर की याज्ञिक अग्नि में पूर्ण सम्वत्सर का बल उत्पन्न होकर सूर्य के बिना अन्धकार वाले नित्य प्रकाश भाग में आत्मा प्रविष्ट होकर परमानन्दरूपी स्वर्ग सुख भोगता है, यही यज्ञ का फल है । [ ४०६ ]

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माघः फाल्गुनः पौषः * ब्रह्मविज्ञान पृथिवी परिभ्रमणा परिलेख: -पृथ्वी चैत्र 8 वैशारण: ज्येष्ठः O सूर्य 2hue आषाढ ! श्रावण : यदि सोमयज्ञ न भी किया जाय तो भी यदि ३० वर्ष तक लगातार दर्शपुर्ण मास करे तो ३६० दर्श ( अमावस्या ) या पूर्णमास का संस्कार होने से सम्पूर्ण सम्वत्सर का चारों ओर संस्कार हो जाता है जिसे केवल ३० वर्ष की पूर्णमासष्टि से ही सोमयज्ञ का काम पूर्ण हो जाता है । इसके अतिरिक्त यदि कोई निरग्निक ब्राह्मण हो तो वह ८० वर्ष से ऊपर जीवन पाने से पूर्ण सम्वत्सर में जा सकता है । यही तीन उपाय अर्थात् सोम यज्ञ और ३० वर्ष की नवच्छिन्न इष्टि और ८० वर्ष से अधिक जीवन प्राणी को समान रूप से सम्वत्सर में पहुंचा सकते हैं । किन्तु श्रग्नि चयन में सप्तविद्या अग्नि की विद्या को जानकर उसके चयन करने से अथवा बिना विद्या के भी एक शतविद्य-[ ४१० ।

पृष्ठ 443

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* ब्रह्मविज्ञान अग्नि के चयन से अथवा १०० वर्ष से अधिक आयु पाने से श्रात्मा सम्वत्सर के सातों देवलोक को पार करके नाकलोक से भी परे काम प्रलोक में जाकर अवर मुक्ति पाती है । इस अवर मुक्ति के ये तीनों उपाय वराबर हैं । यहां यह प्रश्न होता है कि सोमयज्ञ से मुक्ति न होकर अग्नि चयन से ही मुक्ति क्यों होती है । इसका उत्तर इस प्रकार है कि सोमयज्ञ महावेदी पर किया जाता है इसके पश्चिम भाग में ऐष्टिक वेदी होती है, जिसके पश्चिम भाग में गार्हपत्यायतन होता है । जिसका तात्पर्य पृथ्वी की अग्नि से है, और उस वेदी के पूर्व भाग में ग्राहवनीय यतन होता है जिसका तात्पर्य सूर्य की अग्नि से है । दर्श पूर्णमास आदि इष्टियों में इसी ग्राहवनीय ग्रग्नि में आहुतियाँ दी जाती है । किन्तु सोमयज्ञ में यही ग्राहवनीयाग्नि सूर्य से नहीं होने पर भी पृथ्वी में होने के कारण गार्हपत्यअग्नि माना जाता है और महावेदी के पूर्व भाग में यूप के सन्निहित पश्चिम में उत्तर वेदी बनाई जाती है, उस पर असली आहवनीय यतन होता है जिसमें सोम की प्राहुति दी जाती है । यह विधान मनुष्य की आत्मा से संबन्ध रखता है । अर्थात् मनुष्य का शरीर ऐप्टिक वेदी है, उसके पश्चिम भाग अर्थात् नाभिकुण्ड में गार्हपत्या यतन है उसी पृथ्वी का रसरूपी अग्नि प्रज्वलित रहता है, और उस वेदी के पूर्वभाग अर्थात् शिर में देवाग्नि का आहवनीया यतन है । इसी में हमारे विज्ञानमय आत्मा सूर्य रस से उत्पन्न होकर प्रज्वलित रहती है, इन्द्रिय रूपी सूची-स्रवा से घी की उसमें नित्य प्रति प्राहुतियाँ होती रहती हैं । अब इस मनुष्य शरीर से आरम्भ करके सूर्यं तक त्रैलोक्यरूपी महावेदी समझनी चाहिए । जिसके पूर्व के छोर में सूर्य मण्डल ही यूप है, उसके सन्निहित पश्चिम में उत्तरवेदी निर्धारित करके उसमें पूर्ण सम्वत्सर रूपी सूर्याग्निमय आहवनीया यतन स्थिर किया जाता है । जो कोई यजमान सोमयज्ञ करता हुआ उत्तर वेदी में सोम की आहुति देता है उससे इस यजमान की आत्मा से प्रारम्भ करके सूर्य तक जो महावेदी है उसके आहवनीया यतन में सोम की प्राहुति होकर उससे अग्नि उत्पन्न होता है जिस अग्नि से यजमान का ज्योतिर्मय नवीन शरीर सूर्य के समीप उत्पन्न होता है जिसको यजमान की दैव आत्मा सदा उस आहवनीया यतन में ही स्थिर रहती है उस ग्राहवनीया यतन को वेद में बार बार स्वर्ग नाम दिया है । उस दैवप्रात्मा से यजमान की मानुष--आत्मा याज्ञिक सम्बन्ध से संबद्ध रहती है । अर्थात् त्रिवृत्त, पञ्चदश सप्तदश, एकविंश, त्रिणव, त्रयस्त्रिंश, इस प्रकार वषट्कार ही याज्ञिक संबन्ध है । किन्तु इसमें एकविंशस्तोम पर ही सूर्य का मण्डल मिलता उसके ग्रागे दो स्तोम के हैं, उसको छोड़कर एकविशस्तोम ही स्वर्ग माना जाता है । मनुष्य की आत्मा से उस एक विंशस्तोम पर विद्यमान देवप्रात्मा तक वेद के मन्त्रों में उत्पन्न हुई वाक् व्याप्त होती है । उसमें यज्ञ की क्रिया से प्राण का संचार होता है और यजमान या ऋत्विकों का विज्ञान, श्रद्धा, विश्वास आदि मनोयोग के द्वारा मन का प्रवेश होता है इस प्रकार मनुष्य आत्मा से देवी श्रात्मा तक मन, प्राण, वाक् से सुदृढ़ मार्ग उत्पन्न हो जाता है । जिस मार्ग में मानुपश्रात्मा से दैवग्रात्मा तक और देवमात्मा से मनुष्यआत्मा तक विद्युतरूपी इन्द्र के प्रबल वेग से सञ्चार होता रहता है और प्राणोत्क्रमण के पश्चात् उसी विज्ञानमय प्रात्मा में मिली हुई प्रज्ञानमय आत्मा उस ही मार्ग से जाती हुई देवप्रात्मा में पहुंच जाती है और वह मार्ग भी टूट जाता है और यह मानुषआत्मा देवप्रात्मा से एक होकर जब तक यज्ञ का बल रहता है तब तक वहां पर स्वर्ग सुख भोगती रहती है । यज्ञ बल नष्ट होने पर वह श्रात्मा फिर [ ४११ ]

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ॐ ब्रह्मविज्ञान यूप प्राहवनीय उत्तर वेदिः सोम युद्ध की वेदी उत्तर धि प्याग्नि महा वेदिः ग्राहवनीय अग्नि दक्षिण हविर्यज्ञ कौवेदी दृष्टिकवदी D यकृत गार्हपत्यग्रग्नि पश्चिम [ ४१२ ] दक्षिणाग्नि

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* ब्रह्मविज्ञान इससे पृथ्वी की ओर सुतानुशय के द्वारा ग्रवती होकर पुनर्वार जन्म लेती है, यही सोमयज्ञ का रहस्य है । सिद्धहुआ कि सोमयज्ञ के द्वारा यज्ञ में सूर्य के समीप यज्ञ तक ही जा सकता है, उससे ऊपर ले जाने का बल नहीं है । उसीग्रात्मा के लिए वेद में लिखा है कि-“ एष देवे यजमानस्यामुष्मिन् लोके श्रात्मा भवति, यद् यज्ञः ” और भी लिखा है कि-" तं नयन्त्येताः " सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः पहली श्रुति का परिच्छेद – एष व वे - यजमानस्य - समुय् मिन् लोके - प्रात्मा - भवति - यत् यज्ञः । दूसरी का - तं नयन्ति एताः सूर्यस्य रश्मयः यत्र देवानाम् पतिः - टुकः - स्रब्रिवासः । पहली जाता है । श्रुति का ग्रथ में आत्मा बनती है जोकि यज्ञ किया यह है — यही यजमान की परलोक दूसरी श्रुति है कि देवताओं का स्वामी का अर्थ है कि - उसको ले जाते हैं ये सूर्य की किरण जहां पर और जहां देवताओं का एक प्रधान निवास स्थान है । चयनयज्ञ का तो संस्कार नाम के मनुष्याग्नि नहीं होता इस प्रकार सोमयज्ञ के करने से प्राण के शरीर में वैश्वानर का अग्नि मण्डल समाप्त है, उसके सूर्य के पास जहां पृथ्वी सोम यज्ञ होता है सम्बन्धी विज्ञान आत्मा के द्वारा या सूर्याग्नि का ही इस से संस्कार और सूर्य का अग्नि उससे मिलता है उस स्थान पर दिव्याग्नि हमारे भूतात्मा से मिले हुए होता है आहवनीय बनकर उसमें जिससे मेरी आत्मा हमारे । उस स्वर्गीय दिव्याग्नि को हैं । विज्ञानमय ही उसका संस्कार ही वह उत्क्रमण क्षेत्रज्ञात्मा को साम के द्वारा बांध देना । यज्ञ के ऊर्क के अनुसार दैव के पश्चात् ठहर सके आत्मा के द्वारा आत्मा उसी दिव्याग्नि में जाकर जिरकाल तक संसर्ग से हमारे विज्ञान है । किन्तु भूतात्मा कुछ समय तक विद्यमान है और उसके सुख पा सकती भी रह सकती स्वर्ग है ) रहकर उसी स्थान में ( स्तोम तक जो १७ स्तोम से २१ यज्ञ का अग्नि चयन फिर ऊर्फ समाप्त का विधान है । पृथ्वी के लिये अग्नि चयन में दो पर ग्राना की पूर्ति पड़ता है, इसी न्यूनता को के नष्ट हो जाने पर भूतात्मा हो जाती है । आलम्बन होनेपर व ग्रात्मा नष्ट है । संस्कार होता है और प्रकार का यज्ञ विज्ञान आत्मा का न होने के चित्य आत्मा रूपी का संस्कार किन्तु हमारी श्रग्नियज्ञ है । सोमयज्ञ के कारण देव वैश्वानर आत्मा का वैश्वानर कारण उसके साथी से हमारी भूतात्मा सवर्था मानुष आत्मा की विज्ञान आत्मा और चयनयज्ञ भूतात्मापना भूतात्मा इस कि उसका सूर्य से आत्मा को को पृथ्वी पर लौटना पड़ता है । इसलिये किया जाता है बनकर नष्ट साथ लेकर यहां तक होकर शुद्ध विज्ञानमय कर दिया हमारी ग्रात्मा का संस्कार परिपक्व जाता है जिससे का भौतिक भाग भूतात्मा सोम यज्ञ इनमें अध्वर ) २ - चित्य-डावाडोल नहीं होता है । १ - प्रव्वर ( जिससे भीआगे है । " काम लेती प्रलोक " से जाने की शक्ति उत्पन्न कर / [ ४१३

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* ब्रह्मविज्ञान * मनुष्य के शरीर में मनुष्य के जन्मने पर पृथ्वी के केन्द्र से अङ्गिरा अग्नि प्रपद के द्वारा प्रवेश करता है और द्यौ लोक से श्रादित्य अग्नि ब्रह्मरन्ध्र के द्वारा प्रवेश करता है । ये दोनों ग्रग्नि विरुद्ध दिशा से आकर परस्पर में घर्षण करते हैं जिससे शरीर में उत्ताप ( गर्मी ) उत्पन्न होती है और इसी उत्ताप को वैश्वानर ग्रग्नि कहते हैं । वैश्वानर कहने का तात्पर्य यह है कि लोक को विश्व कहते हैं और उसके नायक अर्थात् अधिष्ठाता शासक को नर कहते हैं, अर्थात् चलाने वाला । तीन लोक होने से उन तीनों का लोकपति विश्वानर कहा जाता है । विश्व तीन होने से विश्वानर भी तीन हैं— पृथ्वी में अङ्गिराग्नि, अन्तरिक्ष में यम या वायु अग्नि, और द्यौ लोक में ग्रादित्याग्नि इन तीनों के मेल से जो नया शारीरक अग्नि उत्पन्न होता है, वह विश्वानरों से उत्पन्न होने के कारण वैश्वानर कहा जाता है इस वैश्वानर में तीन अग्नि के मेल होने के कारण इस शरीर के वैश्वानर से तीन प्रकार का प्राण शरीर में सञ्चार करता है | श्रादित्याग्नि के भाग को प्राण और पार्थिव, अग्नि के भाग को अपात और अन्तरिक्षाग्नि को को व्यान कहते हैं । आाता हुया प्रारण व्यान के प्रत्याघात से प्रतिफलित होकर जब उलटा ऊपर को जाता है तब उसको उदान कहते हैं इसलिये प्राण और उदान एक ही ग्रग्नि है । इसी प्रकार पार्थिव प्राण वायु भी व्यान से प्रत्याघात पाकर जब नाड़ियों में विश्राम पाता है तो उसे समान कहते हैं और जब कभी शरीर से बाहर पृथ्वी की ओर निकलता है तो उसे प्रपान कहते हैं । इसलिये समान और अपना एक अग्नि है । अभिप्राय यह कि तीनों ही अग्नियों के मेल से पांच प्राणों का भाव शरीर ये दीखता है किन्तु उन तीनों अग्नियों के मेल से उत्पन्न हुआ वैश्वानर अग्नि एक ही प्रकार का है यह वैश्वा-नर अग्नि तब तक ही जीवित रह सकता है, जब तक प्राकृत नियमानुसार तीनों अग्नियों का मिश्रण समान मात्रा में हो, किन्तु यदि किसी की मात्रा भी अधिक हो जायगी तो वैश्वानर का उत्पन्न होना स्वभावतः बन्द हो जाता है । देखा गया है भस्मान्तक रोग में पार्थिव अग्नि इस प्रकार प्रबल वेग से क्षुब्ध हो जाता है कि कितना ही अधिक भोजन करने से भी तृप्ति नहीं होती किन्तु वह मनुष्य थोड़े ही काल में मर जाता है । इसी प्रकार इस चयन प्रक्रिया से पार्थिव ग्रग्नि पर प्राकृत नियमानुसार जितना दिव्या-ग्नि ग्राता था उससे अधिक मात्रा में अग्नि लाकर उस पार्थिव ग्रग्नि पर केवल ग्राद्यात प्रत्याद्यात न करके याज्ञिक प्रक्रिया से चिति की जाती हैं । जिससे प्रत्याभात नष्ट होकर दोनों एक जीव हो जाते हैं और दिव्य ग्रग्नि की मात्रा बढ़ जाती है । अर्थात् इसका क्रम इस प्रकार है कि इस शरीर में वैश्वानर अग्निका श्रावारभूत जो पार्थिव ग्रग्नि है उसके ऊपर पांच चिति पांच प्रकार के अग्नियों का होता है । यद्यपि यह श्रग्नि एक ही जाति की है, तथापि लोक तीन होने के कारण इसके कर्म ये सब बदल जाते हैं । इसलिये यह एक ही अग्नि तीन रूप में इसका परिणत स्वभाव होकर, इसकी ग्रग्नि अवस्था के, भेद कहे जाते । ग्रग्नि जो ऊपर जाने का स्वभाव रखता है उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं और जो ऊपर तीन * प्राण व्यान समान उदान → प्रपान [ ४१४ ]

पृष्ठ 447

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* ब्रह्मविज्ञान से नीचे आाता है वह आदित्य अग्नि कहता है, किन्तु जो अग्नि तिरछा चलता है उसे अन्तरिक्ष अग्नि कहते हैं । इस प्रकार तीन अग्नि मुख्य हैं किन्तु पृथ्वी और अन्तरिक्ष को सन्धि और अन्तरिक्ष और द्यौ-लोक को सन्धि में दो - दो प्रति के शिवाब से स्वभाव में परिवर्तन होकर एक भिन्न प्रकार का अग्नि बन जाता है जिससे कुल पांच प्रकार की अग्नि सिद्ध होती हैं । इन पांचों अग्नियों की दो - दो अवस्थायें हैं विरलावस्था और संहतावस्था । इन दोनों में विरल अवस्था से ये पांचों अग्नि आकाश में भिन्न - भिन्न पांचों स्थानों में व्याप्त रहते हैं अर्थात् तीनों लोक और दो सन्धि इनमें वायु रूप से फैले हुए पदार्थ हैं, उनका उत्पन्न संग्रह करना कठिन है । इसलिये इस पृथ्वी पर उन पांचों अग्नियों ) के करके सम्बन्ध उन से ग्रग्नियों जो भिन्न का ग्रहण करना हुए हैं उनको अग्नि में डालकर विशकलन ( भिन्न करना = Analyis ही सम्भव है | से ६८ प्रकार के पदार्थ सिद्ध परीक्षा करके देखने से सिद्ध हुआ है कि पार्थिव अग्नि के सम्बन्ध द्रव्यों होते हैं । अर्थात् पुष्करपर्ण, रुक्म, मोरिडा, दूब, काछना इत्यादि इन जैसे - डाम, ढेला, विकारों की शक्तियों का विशकलन से पार्थिव विकार नष्ट होकर उन सब अग्नि के भिन्न - भिन्न सब संकलन ( इकट्ठा ( जमा ) एक ) अग्नि की सब वैकारिक शक्तियां संकलित - एकजाति लेने पर कुल = द्रव्यों के द्वारा पार्थिव करना यही प्रथम चयन हो जाती हैं पार्थिव अग्नि का आधान । उन सब द्रव्यों का चयन करना कुल किन्तु उनमें से अग्नि के बने हुए अनन्त द्रव्य हैं करना है पृथ्वी में यद्यपि पार्थिव कहलाता है1 के इसलिये ४१ जाति विकार पृथ्वी में ४१ हैं, । पृथ्वी र अन्तरिक्ष की संधिगत ग्रग्नि के कुल होता है, यह दूसरा चयन है अग्नि का चयन सिद्ध ( रखने ) करने में सन्धिगत द्रव्यों के प्रधान होता है । से तीसरा चयन हैं जिनके आधार इसी प्रकार अन्तरिक्ष की अग्नि के कूल ७१ विकार सिद्ध होता है । से चतुर्थ चयन हैं जिनके प्रधान अन्तरिक्ष द्यलोक के संधिगत अग्नि के विकार ४७ । सिद्ध होती है से पञ्चमचिति सूर्याग्नि के कुल विकार १३८ हैं जिनके आधार ) होता है । ' उपघन ( स्थापन ' इष्ट का है -- १ यजुष्मति दो प्रकार की होती इस प्रकार इन पांच चितियों में कुल ३६५ है । ये इष्टकायें यजुष्मती तात्पर्य से ही होता हैं । इनमें प्रथम का लोकपणा यह है कि चिति अर्थात् चयन इष्टकाओं ईंट जिसे यजुष्मती कहते ऊपर लोकपूरणाओं नाम अर्थात् मिट्टी पानी का ईंट २ - कल्पित करके उनके की ईटों को हैं उनका उपघात अर्थात् जो भिन्न - भिन्न द्रव्यरूप होने से का चयन की अग्नियों पांच प्रकार सूर्य तक की जिससे पृथ्वी से लेकर वैश्वानर अग्नि । जिससे हो जाता अग्नि सिद्ध का विलक्षण ' होकर एक ही प्रकार उपधान किया के स्थान इन पांचों जाता है और देवग्रात्मा से जाता न होने या पार्थिव का रूप नष्ट नष्ट हो पार्थिव भाव आत्मा में अग्नि और सूर्याग्नि आदि अग्नियों का भेद । वह ग्रग्निरूपी रह सकती । इसलिये एक विलक्षण बन जाता है में भी नहीं पृथ्वी अग्नि उत्पन्न होकर आत्मा से देवलोक संवत्सर पर लौटकर होने नहीं आती और सूर्याग्नि न [ ४१५ ।

पृष्ठ 448

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* ब्रह्मविज्ञान पृथ्वी पर शरीर का सम्बन्ध छूटते ही ग्रात्मा का उत्क्रमण होकर सूर्य के नाकलोक से भी परे स्कम्भ में जाता है | वहां पहले विद्य ुत् फिर वरुण फिर इन्द्र फिर प्रजापति और ग्रन्त में ब्रह्म ये जो सब कामप्र-लोकों के भेद हैं, उनमें यथेच्छ विहार करता हुग्रा परमानन्द को प्राप्त होता है यही चयनयज्ञ से मुक्ति की प्राप्ति है । सुतर्मा - साग्निक नौका सुबु मार्ग निरग्निक पृथ्वी सम्बत १७ से २१ तक ३३ २१ पृथ्वी सम्वत्सरअसली [ ४१६ ]

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प्रकार गति छ प्रकार की हुई । कुल ८ प्रकार की सिद्ध होती हैं— १- पितृयान -१ – स्वर्ग = ( पितृस्वर्ग ) २ - नरक * ब्रह्मविज्ञान दक्षिणमार्ग १ २ उत्तरमार्ग ४१७ ] जो कि पृथ्वी पर देवयजन अर्थात् यज्ञ करने के लिये कल्पित भूमि में ऐष्टिक बेदी या महावेदी नियत की जाती है, उस पर इष्ट या सोमयज्ञ करने से जिस प्रकार यजमान के शरीर की आध्यात्मिक वेदी में संस्कार का प्रभाव पड़ता है, अथवा जिस प्रकार त्रैलोक्य रूपी आधिदैविक महावेदी में सोम आदि की ग्राहृति होकर सूर्य के समीप देवग्रात्मा बनता है वह इस पृथ्वी पर यज्ञ करने से इतनी दूर आकाश में सूर्य के पास उसका कैसे और कैसा प्रभाव पड़ा यह सब सिद्धान्त जानने के योग्य होते पर भी अधिक विस्तृत और अधिक गम्भीर विषय होने के कारण यहां पर गति के प्रसङ्ग में उसका उल्लेख करना अ-प्रासङ्गिक होगा अतएव ये विषय यक्ष मधुसुदन ग्रन्थ के आध्यात्मिक और प्राधिदैविक आध्यायों में देखना चाहिये वहां विस्तार से वर्णन है । नारकी गति और पितृस्वर्ग गति दो प्रकार की हैं — पितृयान, देवयान । इनमें पितृमान दो प्रकार का का है- है- निरग्निको के । देवयान दो प्रकार और ब्रह्मपथ । देवपथ दो प्रकार लिये का है- देवपथ मार्ग है। ब्रह्मपथ भी सुषुम्णा मार्ग है और साग्निक अर्थात् याज्ञिकों के लिये यज्ञ मार्ग अर्थात् सुतर्मा दो प्रकार कर्म मार्ग है, किन्तु आत्मज्ञानियों के का है- अग्नि चयन याज्ञिकों के लिये अग्नि मार्ग है यह लिये विद्या दोनों ब्रह्मपथों से मुक्तिलोक होता है । इस मार्ग है । दोनों देवपथों से स्वर्ग लोक और और दो पितृयान इस प्रकार दो हैं । चार देवयान देवपथ दो ब्रह्मपथ इन चारों को देवयान मार्ग कहते V उर्ध्वगति और अधोगति ही महापापों से इन छयों के प्रतिरिक्त दो प्रगति हैं - जिनमें कितने प्रगति निकृष्ट पक्ष की है । कुछ न होकर में हो विचरता है, यह किन्तु दुर्गति होती है । अर्थात् पृथ्वी के भू वायु निःशेष कश्मल दूर होने पर जब कि जिसकी सबके आशय और आत्मा मुक्त कहा आत्मा ग्रात्मा से क्लेश, कर्म, विपाक इन शेष न रहने से वह सर्वथा विशुद्ध के लिये कर्म हो जाता है तो उसके पुनर्जन्म कर्म का भी ज्ञान से प्रारब्ध के नाश होने पर सब कर्मों आत्मज्ञान होने पर भी अन्य जाता है भोगने के । किन्तु भी प्रारब्ध कर्म नाश मुक्ति होने पर शरीर नहीं होता से ही होता है । इसलिये कहते हैं उसकी मृत्यु से लिये, किन्तु भोगने नाश भी शरीर आत्मा को जीवनमुक्त फटने पर घटाकाश या जीवन बना रहता है । ऐसी ही है । जैसे घट हो छूटते ही वह लीन होकर एक हो जाती शरीर छूटते ही ब्रह्म महाकाश ग्रात्मा व्यापक परमब्रह्म में रहित होने के कारण जाते इसलिये अगति जाता हो जाता है । उसी प्रकार यह श्रात्मा उपाधि नीचे कहीं भी नहीं, मिलने से गति है इसी उसके प्राण ऊपर ग्रगतियों के ' होने, को समवलय मुक्ति कहते हैं । इन दोनों पर भी उसको हैं । इस प्रकार परमगति या अतिगति कहते

पृष्ठ 450

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* ब्रह्मविज्ञान * २- देवयान-१- देवपथ – १ – सुषुम्णामार्ग २- सुतर्मामार्ग २- ब्रह्मपथ– १ - चितिमार्ग २ - विद्यामार्ग ३- प्रगति-१ - दुर्गति २- परमगति ( समवलयः ) ३ = देव स्वर्गमार्ग । ४ = 11 ५ = मुक्तिमार्ग | ६ = ७ ८ " पितृयान में पृथ्वी से चन्द्रमा तक नारकीय गति के लिये घूममार्ग नियत है । अर्थात् शरीर में हृदय वाहिनी के द्वारा प्राण निकलकर घूम, रात्रि, कृष्णपक्ष होता हुआ चन्द्रमा के काले भाग में दक्षिण की ओर शनि तक जाकर उससे परे लोकालोक तक जा सकता है । इस प्रकार नारकीय गति में गति की ४ भूमिका है । १- हृदय से नाभि तक । २- नाभि से चन्द्रमा के कृष्ण भाग तक । ३ – चन्द्रमा के कृष्णभाग से शनि तक । ४ – शनि में लोकालोक तक । यह चौथी भूमिका ही नरकलोक है - जिसके सात भेद पहले कहे जा चुके हैं, उन सातों का अधिष्ठाता यम है । यह यम घोर श्रग्नि है जो सोम की अग्नि में आहुति का विच्छेद ( ग्रलग ) करता है । ग्रमृत सोम के न मिलने से हमारा वैश्वानर अग्नि बुभुक्षित ( भूखा ) होकर सोमरूपी अन्न न पाने से दुःखी रहता है यह निकृष्ट गति कहलाती है । किन्तु पितृस्वर्गं जो पितृया न की दूसरी शाखा है उसमें भी ऊपर की तीन भूमिका समान है । किन्तु चौथी भूमिका नहीं होती किन्तु समान होने पर भी सर्वथा समानता नहीं है । पितृस्वर्ग जाने वालों की नाड़ी सीधी नीचे न जाकर दक्षिण उत्तर पार्श्व में तिर्यक् जाती है । दूसरी भूमिका भी सूर्य के प्रकाश में न जाकर चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में होकर चन्द्रमा में जाती है और चन्द्रमा से शनि तक जो वास्तव में पितृलोक है वह भी चन्द्रमा का अथवा श्रर किसी पिण्ड का प्रकाश भाग है । यह पितृलोक तीन प्रकार का है । उदन्वती ( जलवाली ) २ - पीलुमती ( औषधि अर्थात् ) ३- प्रद्यो शुष्क सोमवाली ( प्रकाशवाली ) यद्यपि इन पितृस्वर्गों का भी अधिष्ठाता यम है तथापि सोम की अधिकता होने के कारण यहां का यम ( धर्मराज ) दुःखदाई नहीं है । इस प्रकार यम की अध्यक्षता में नरक और दक्ष पितृस्वर्गं ये दोनों पितृयान अर्थात् दक्षिण मार्ग के लोक सिद्ध होते हैं । देवयान जो ४ प्रकार के हैं उनका रुख पितृयान से सर्वथा दक्षिण-मार्ग है अब । जो पृथ्वी से लोकालोक की ओर जाता है । किन्तु देवयान विरुद्ध के ४ मार्ग है अर्थात् पृथ्वी पितृयान से सूर्य की ओर [ ४१८ ]