ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 61–70
ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 61–70
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* ब्रह्मविज्ञान नहीं है | अर्थात् जो कुछ है सब ईश्वर है तो अब कहिये कि आप तो ईश्वर से अलग जगत् औौर जगत् से भिन्न ईश्वर को मानते हैं । जब ईश्वर से खाली कोई जगह नहीं है तो इस जगत् को रक्खें तो भी जितना भाग जगत् का है वह ईश्वर से प्रतिरिक्त मानना होगा और ऐसा मानने से ईश्वर की व्यापकता जाती रहती है और यदि ईश्वर में रहते हुए जगत् को अलग न मान कर ईश्वर ही मान लें तो दो शब्दों में हमारे - प्रापका विवाद खतम हो जायगा । आपका एक शब्द यह होगा कि यह सब जगत् नहीं, केवल ईश्वर ही ईश्वर है । इसी के पलटे में हमारा एक शब्द यह होगा कि यह सब कुछ जो हम अपने विचार से देख रहे हैं सो जगत् ही जगत् है । इसके अतिरिक्त ईश्वर कोई पदार्थ नहीं । इस प्रकार ईश्वर के न मानने में कितनी ही ग्रनुपपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं कि जिनके मानने से वितंडवाद कायम हो जाता है । जो बिना प्रमाण के व्यर्थ ही कोई बात जोर देकर कायम या कबुल करवायी जाय उसी को वितंडावाद कहते हैं । वितंड का मानना विचारशैली से बाहर हैं और अनुचित है । ग्रतः ईश्वर का मानना व्यर्थ है और मिथ्या है । हम कह सकते हैं कि यह जगत् इसी प्रकार बनता -बिगड़ता हुआ अनादि काल से चला ग्रा रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार सदैव चलता रहेगा । कितने ही दार्शनिकों का यह विश्वास है कि यह जो जगत् ग्रनादिकाल से दीख रहा है । इस जगत् की यही सत्ता वास्तव में ईश्वर है । इसी सत्ता में यह जगत् है । यदि सत्ता न रहती तो जगत् भी नहीं रहता - इत्यादि । किन्तु इस पर मेरा कहना है कि इस जगत् की सत्ता जगत् के अधीन है या सत्ता के अधीन जगत् है | यह विचार करना कुछ कठिन काम है आपका सिद्धान्त है कि सत्ता के अधीन जगत् है, उसके पलटे में मेरा सिद्धान्त है कि जगत् ही सत्ता है । ज्ञान से ही इन दोनों में भेद या गया है । वास्तव में यह जगत् ही सत्ता है । इसी ईश्वर के सम्बन्ध में कितने ही देवताओंों को भी बहुत से विद्वान मानते हैं और उनके ग्रदृश्य होते हुए भी शरीरवारी मानते हैं । उनको भी स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु, कुल परिवार ग्रादि समाज बन्धन माने जाते हैं और पाप - पुण्य के सम्बन्ध से उनकी भी सुख - दुःख का भोग होता रहता है । इतने पर भी कितने ही भोले - भाले मनुष्य उन देवताओं की ईश्वर के समान उपासना करते हैं । और उनकी प्रसन्नता से अपनी मन - मानी कामनाओं की सिद्धि होने का विश्वास रखते हैं । किन्तु ये सब वृथा विडम्बना है जो स्वयं पाप पुण्य के बल से सुख - दुःख आदि कर्मो का भोग परतंत्रता से पाते हैं, स्वयं अपनी ही रक्षा नहीं कर सकते, वे मनुष्यों को कर्मों के भोग से कैसे छुड़ा सकते हैं । सत्य तो यह है कि देवताओं के शरीरधारी होने में ही कोई प्रमाण नहीं है, न उनकी उपासना से कोई फल होना संभव है । १२ — सर्वसिद्धान्तखण्डनसूत्र विज्ञान चार करने से जो सिद्धान्त हृदय में अपने आप निश्चित रूप से जम जाता है उसी विश्वास को उपनिषत् कहते हैं क्योंकि धर्म या अधर्म सभी कर्ममार्ग में प्रत्येक मनुष्य _का_ठहरना या_उसके अनुसार चलना उसी उपनिषत् के अधीन है । उपनिषत् शब्द का अर्थ है विश्वास पर अच्छी तरह जमकर ठहरना । जिस विश्वास पर ठहर कर प्रत्येक मनुष्य बिना किसी दबाव [ २६ ]
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* ब्रह्मविज्ञान के अपनी ही इच्छा से किसी काम को करें या छोड़ें वही उसका विश्वास उपनिपत् है । किन्तु जबकि यह संपूर्ण जगत् सब प्रकार से सन्दिग्ध है, तो कोई निश्चित रूप से सिद्धान्त स्थिर नहीं किया जा सकता । श्रतः हमारा विचार है कि किसी प्राणी को किसी काम के लिए करने या छोड़ने का दबाव डालना अनु-चित है | यह ग्राचार - विचार का वन्धन सब मनुष्य के बनाये हुए मिथ्या है । पशु - पक्षियों के अनुसार स्वतंत्र रहकर, जिससे अपनी आत्मा को सुख हो, करना चाहिए । जो कुछ जब कभी जिस तरह तुम्हें पसन्द हो, वही उस समय उसी प्रकार मानना चाहिये । व्यर्थ हृदय पर इच्छा के विरुद्ध दबाव डालकर हृदय पर आघात नहीं पहुंचाना चाहिये । अलबत्ता तुम्हारे पसंद होने के समय पर इतना अवश्य सांचना चाहिये कि पसंद किये हुए काम करने से तुमको किसी प्रकार के अनिष्ट का भय सामने न हो तो निःशंक होकर उस काम को करो । तात्पर्य यह है कि किसी नियम का बंधन डालकर अपनी आत्मा को न सताओ, जिस बात से सुख मिले सो करो । १३ – ग्रज्ञानश्रेयस्त्वसूत्र दार्शनिक विज्ञानों के लिये विचार का परिश्रम उठाना व्यर्थ है । क्योकि ज्ञान से किसी प्रकार का श्रेय अर्थात् कल्याण किसी को प्राप्त नहीं हो सकता । विद्वानों के विचार करते समय परस्पर विरुद्ध मत-मतान्तर की भाषा समझने से विवाद की संकट पैदा होती है और अपनी बात की पुष्टि के जिद्द में श्राकर बहुत कुछ चित्त में कलुषता अर्थात् मलिनता पैदा हो जाती है । हम देखते हैं कि अनादि काल से ये ज्ञानी विद्वान् लोग जगत् के तत्त्व जानने की उत्कट इच्छा से व्याकुल होते आये हैं । किन्तु श्रत्यन्त परिश्रम करने पर भी ग्राम तक पहाड़ में राई के बराबर भी सत्य किसी ने नहीं जाना । क्योंकि वास्तव में जगत् का तत्त्व ग्रज्ञ ेय है अर्थात् जानने की वस्तु नहीं । इसलिए व्यर्थ काम में पड़कर अपने हृदय और मस्तिष्क को यहां तक कि अपने शरीर जीवन को नष्ट करके हाथ में रक्खे हुए मधुर ग्रन्न की भी स्वाद नहीं लेते । स़स़ार का ग्रानन्द जानबूझ कर छोड़कर और परमार्थ का ग्रानन्द तो मिल ही नहीं सकता । इसलिये ऐसे ज्ञानी दोनो सुख से वंचित रहते हैं । किन्तु इसके विरुद्ध अज्ञानियों को न अहंकार है न चित्त में कलुषता है, न किसी बात की सोचने की चिन्ता है । सुख से हैं, सुख से जगते है श्रीर प्रायः संपूर्ण जीवन उनका सुखमय व्यतीत होता है । बस, इस प्रकार प्राचीन समय में कितने ही ग्रज्ञानवाद को पुष्ट करने वाले अज्ञानिक नाम से दार्शनिक हो गये हैं; उनमें प्रधान हैं— सात्यमगि, शाकल्य और वसु श्रादि इन ग्रज्ञानिक दार्शनिकों का यही सिद्धान्त है कि इस जगत् की सत्यता को जानने के लिए श्रम करना सर्वथा व्यर्थ है, अर्थात् ग्रज्ञानी रहना ही सुखदायक है । इति संशयोपनिषत् [ ३० ]
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अथ प्रसत्योपनिषत् [ ३ ] ( तृतीया ) इस प्रकार संणयवादियों के मत मे जगत् के संपूर्ण पदार्थ जैसे तैसे अनिश्चित रूप से भले ही मान लिये गये हों, किन्तु हम जहां तक देखते हैं जबकि प्रमाणों का निःशेष खण्डन हो चुका ग्रर्थात् किसी वस्तु की सिद्धि करने के लिये जब कोई प्रमाण न रहा फिर संदेह क्यों न निश्चित रूप से सव पदार्थों का श्रसत्य होना मान लिया जाय क्यों किसी स्थान पर पानी का रहना किसी प्रमाण से ही सिद्ध होता है । विचारशील पुरुष जब उन प्रमाणों को नहीं देखता तो निश्चित रूपसे यही स्थिर करता है कि यहाँ पानी नहीं । तात्पर्य यह है कि वस्तु की सत्ता जिन प्रमाणों से सिद्ध होती है उन्हीं प्रमाणों के न रहने से उन वस्तुओंों का प्रभाव सिद्ध हो जाता है । अथवा यों कहिये कि सत्ता के लिये प्रमारण की श्रावश्यकता है किन्तु वस्तु के प्रभाव के लिये किसी प्रमाण का न होना ही आवश्यक है न कि अभाव के लिये भी दूसरे प्रमाण की श्रावश्यकता होती है । जैसे प्रकाश के लिये दीपक को श्रावश्यकता है, किन्तु अन्धकार के लिये किसी वस्तु की श्रावश्यकता नहीः प्रत्युत दीपक का न होना ही पर्याप्त है । जब कि साधारण रीति से सब प्रमाणों का अभाव है तो फिर संशय कहाँ रहा । प्रमाण के प्रभाव में सिद्ध हो गया कि जगत् का अभाव है । वस्तु का अभाव किसी प्रमाण की अपेक्षा नहीं रखता । वह स्वतः सिद्ध ही रहता | किन्तु किसी वस्तु की सत्ता प्रमाण की अपेक्षा रखती है । ग्रतः जो किसी ने यह प्रश्न किया था कि कोई भी वस्तु प्रमाण से ही सिद्ध होती है इसलिये प्रमाण न होने से यदि जगत् की सत्ता नहीं, तो उसी प्रकार प्रमाण के न होने से ही जगत् का प्रभाव भी नहीं सिद्ध हो सकेगा, इत्यादि । किन्तु यह प्रश्न सर्वथा असार है क्योंकि मैं कह चुका हूँ कि वस्तु सत्ता के लिये प्रमाण की अपेक्षा होती है । वस्तु के अभाव के लिये प्रमाण की अपेक्षा नहीं । प्रमाण का न होना ही पर्याप्त है, अथवा यदि प्रमाण के न होने जैसे वस्तु की सत्ता नहीं उसी प्रकार यदि प्रभाव भी नहीं कह दिया जाय तो भी मेरा ही पक्ष सिद्ध होता है । क्योंकि मेरा पक्ष है कि भाव - प्रभाव ये दोनों ही जगत् के रूप हैं । वास्तव में न कुछ भाव है न अभाव है । एक प्रश्न और उपस्थित होता है कि भाव या प्रभाव संपूर्ण जगत् के पदार्थो को मिथ्यां मान भी लिये जायँ तो भी वह ज्ञान कि जिस ज्ञान में जगत् का न होना निश्चित रूप से भास रहा है वह सत्य है, उस ज्ञान की सत्ता अवश्य माननी होगी क्यों कि उसी ज्ञान के प्रभाव से जगत् का प्रभाव श्राप देख रहे हैं इत्यादि । तो इस प्रश्न पर हम यह कहेंगे कि स्वप्न के समान वह ज्ञान भी मिथ्या है क्योंकि यह नियम है कि जिस ज्ञान का विषयभाग मिथ्या है, वह ज्ञान भी मिथ्या है । स्वप्रज्ञान के विषय सभी मिथ्या होते हैं इसीलिये वह ज्ञान भी मिथ्या है ठीक इसी प्रकार हम यहाँ पर भी कह सकते हैं कि हमारे ज्ञान का विषय भाव या अभाव यह जगत् ही हो सकता है । जब प्रमाण के न होने से यह जगत् मिथ्या है तो उस विषय का [ ३१ ]
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* ब्रह्मविज्ञान र ज्ञान भी अवश्य ही प्रसार और मिथ्या है । जिस प्रकार तृणों के अत्यन्त सघन और विशाल ढेरे में ग्रग्नि लगाने से वह अग्नि उसे शान्त करता हुआ साथ ही ग्राम भी शान्त होता रहा है, यहाँ तक कि उस ढेर के नष्ट होने पर, उस ढेर को नष्ट करने वाली ग्रग्नि भी साथ ही नष्ट हो जाती है । ठीक इसी प्रकार जिस ज्ञान के विचार से विचार करते - करते इस विशाल जगत् के पुरजे- पुरजे को प्रमाण सिद्ध करके मिथ्या सिद्ध किया गया है उसके साथ ही वह विचार करने वाला मेरा ज्ञान भी मिथ्या ठहराता है । यहाँ तक कि संपूर्ण जगत् के मिथ्या सिद्ध होने पर सिद्ध हो गया कि मेरा विचार और मेरा यह ज्ञान भी सब मिथ्या है, न जगत् है, न जगत् का ज्ञान वाला मैं हूँ । तात्पर्य यह है कि ग्रव संदेह करने का अवसर नहीं रहा । प्रमाण के न होने से निश्चित रूप से सिद्ध हो गया कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय यह सब ग्रसत्य हैं ॥। इति ॥ [ ३२ ]
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विशिष्ट - तिसत्योपनिषत् [ ४ ] १ - ज्ञानप्रामाण्यसिद्धिसूत्र संशयवादियों ने संशय दिखाकर ' वेद्य ' अर्थात् जानने की वस्तु जगत् को तथा ' वेत्ता ' ग्रर्थात् जानने वाली जीवात्मा और तीसरा ' ईश्वर ' इन तीनों का प्रत्याख्यान ( खण्डन ) करके सब कुछ संदेह-मय निर्धारण किया है? किन्तु वह प्रत्याख्यान उनका सर्वथा भ्रममूलक है । उनका सवसे प्रधान ग्राक्षेप यह है कि प्रमाण से वस्तु की सिद्धि होती है । किन्तु प्रमाण सब बिना प्रमाण के ही मान लिये जाते हैं, इसलिये सव प्रमाण प्रमाण हैं । इस पर मेरा कहना यह है कि ' प्रमेय ' वस्तुओं में प्रमाण की श्रावश्यकता होती है, न कि प्रमाण के लिये भी प्रमाण की आवश्यकता है । यह तो साधारण मनुष्य भी जानते हैं कि जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों के प्रकाश के लिये जिस सूर्य की श्रावश्यकता है उस सूर्य के लिये दूसरे सूर्य की श्रावश्यकता नहीं होती । तात्पर्य यह है कि जगत् में दो प्रकार के पदार्थ हैं - एक भास्वर ( चमकदार ) और दूसरा प्रभास्वर अर्थात् जिसमें से स्वयं प्रकाश नहीं निकलता हो । इनमें ग्रभास्वर वस्तुओं को प्रकाश के लिये भास्वर वस्तु की अपेक्षा होती है | किन्तु जो स्वयं भास्वर है, वह अपने जिस प्रकाश से ग्रन्य प्रभास्वरों को प्रकाशित करता है; उसी प्रकार ग्रपने आप को भी प्रकाशित करता है । यह कब संभव है कि वह स्वयं बिना प्रकाश हुए ही दूसरे को प्रकाश करे । यह ज्ञान जो कि सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान पदार्थ है, वह स्वयं प्रकाशित न होकर दूसरी वस्तु का प्रकाश कैसे कर सकता है । सूर्य के समान यह स्वयं अपने को प्रकाशित करता हुआ ही अपने विषय को भी प्रकाशित करता है । यही ज्ञान तो वास्तव में प्रमाण है । फिर प्रमाण यदि स्वयं ग्रप्रमाण होगा तो दूसरे के लिये कैसे प्रमाण माना जा सकता है । श्रथवा यह संभव ही कब है कि जो दूसरे के लिये प्रमाण है वह जैसा कि सूर्य को स्वयं ग्रप्रमाण । प्रमाण को ग्रप्रमाण मानना ठीक वैसा ही है -अन्धकारमय मानना । इस प्रमाण के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता भी ठीक वैसी ही है - जैसे दीपक के प्रकाश के लिये दूसरे दीपक की प्रावश्यकता मानना । जब कभी कुछ ज्ञान होता है तब उसमें कुछ न कुछ अवश्य भासता । अवश्य ही किसी वस्तु का हमें बोध होता है । यह कदापि संभव नहीं है कि ज्ञान है और मुझको उससे कुछ बोध न हो । जिसके द्वारा किसी वस्तु का बोध होता है, उसी को प्रमाण कहते हैं । जबकि ज्ञान से अवश्य ही हम को किसी विषय का बोध होता है तो अवश्य ही यह ज्ञान भी प्रमाण हो सकता है | " ज्ञान है परन्तु प्रमाण नहीं है " यह कहना ठीक वैसा ही है जैसा कि सूर्य है, किन्तु प्रकाश नहीं करता । इस सब के कहने का तात्पर्य यह है कि जब ज्ञान है तो बिना दूसरे प्रमाण के ही वह प्रमाण सिद्ध हो चुका, उसके लिये दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं । अब रही यह बात कि ज्ञान होने से वह प्रमाण कायम किया जा सकता है; किन्तु जब यह कहा जाय कि ज्ञान ही नहीं है तो ऐसी स्थिति में कौन सा प्रमाण कायम किया जा सकता है तो इसके उत्तर [ ३३ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान ॐ में यही कहना होगा कि यह प्रतिज्ञा ठीक वैसी ही है कि जैसे कोई कहें कि मेरी माता बन्ध्या है, उसने मुझे कभी पैदा किया ही नहीं । जबकि वह वादी जिस अपने ज्ञान व विचार के बदौलत यह दावा करता है कि ज्ञान नहीं है यदि वह ज्ञान न था तो ज्ञान के न होने की प्रतिज्ञा कैसे उत्पन्न हुई । ज्ञान के बल से ज्ञान को ही काटना ठीक वैसा ही है, जैसे किसी वृक्ष की शाखा पर सवार होकर उसी शाखा को काटना । भन्ना यह कौन कह सकता है कि जगत् में ज्ञान पदार्थ ही नहीं है यदि ज्ञान एक वस्तु न होती तो जगत् के सम्पूर्ण पदार्थ रहते हुए भी यह जगत् ग्रन्धकारमय सर्वथा शून्य हो जाता । फिर ग्राप मा हम ही क्या होते और विचार ही किस का होता । बड़े ग्राश्चर्य का विषय है कि जो मनुष्य इस जगत् को अपने ज्ञान के द्वारा देखता हुआ अपना विचार प्रकट करता है और उस जगत् के लिये मन् श्रीर श्रमत् का निर्णय करता है किन्तु साथ ही यह भी कहता जाता है कि मैं कुछ नहीं देखता और न कुछ करता जबकि वह इस जगत् का विचार करता है, सत्य या श्रसत्य का निर्णय करता है तो वह अवश्य ही उस जगत् को कुछ न कुछ देखता है | जब देखता है तो अवश्य ही उसे यह जगत् कुछ न कुछ भागता है । यह भासना ही ज्ञान है । इस ज्ञान के आधार पर जब वह विचार करता है तो कहना श्रवण्य होगा कि यह ज्ञान तुम्हारे - मारे सबके लिये सत्य है । इस ज्ञान में जितने पदार्थ हैं भासते हैं उन्हीं को जगत् कहते हैं । यह् जगत् ग्रर्थात् उस ज्ञान में भासता हुआ पदार्थ सब सत्य हो या ग्रसत्य हो यह ग्रागे चल कर पृथक विचार करना होगा । किन्तु यहाँ इतना कह देना यावश्यक है कि वे सब विषय जिसमें भासने हैं वह ज्ञान निश्चित रूप से सत्य है । अब दूसरी बात है कि अन्य अन्य ग्रास्तिक दार्शनिकों ने भी किसी - किसी ज्ञान को ग्रसत्य स्थिर किया है किन्तु इस पर यह कहना है कि इन्द्रिया के द्वारा बाह्य ज्ञान हुआ करता है, अतः उन इन्द्रियों के किसी प्रकार के दोष याने से वह दोष उस अर्थज्ञान में शामिल हो जाता है । दोष वाले बाह्य ज्ञान से पैदा हुए मानसिक विचार में ग्रर्थात् ग्रान्तरिक ज्ञान में भी कभी - कभी वह दोष शामिल हो जाता है । इसलिये उस ज्ञान को दोषयुक्त कहना या ग्रसत्य कहना किसी ग्रंश में अनु-चित नहीं है, किन्तु उस दोषभाग को छोड़ कर जो आत्मा का शुद्ध अपना ग्रंण विवेक रूप प्रकाश है वह कभी असत्य नहीं हो सकता । उसे प्रप्रकाश नहीं कह सकते जैसा कि दोषयुक्त तेल के सम्बन्ध से यदि दीपक का प्रकाश ठीक न हो या घर में घूंग्रा भरने से यदि दीपक का प्रकाश ठीक न होता हो तो क्या उस से यह सिद्धान्त निकाला जा सकता है कि दीपक में प्रकाश ही नहीं है | कभी नहीं । दीपक सदा स्वच्छ प्रकाशमान पदार्थ है और सदा प्रकाशक है । इसी प्रकार हमारा ज्ञान भी सदा प्रकाशक है । ॥ इति ज्ञानप्रामाण्यसिद्धि सूत्र ॥ २- प्रत्यक्ष प्रामाण्य स्थापनसूत्र प्रत्यक्ष, अनुमिति और शब्द - इस प्रकार ज्ञान के मुख्य तीन भेद हैं । इनमें प्रत्यक्ष ही मुख्य ज्ञान है, क्योंकि इसी के प्रामाण्य से अन्य ग्रनुमिति प्रादि भी प्रमाण सिद्ध होते हैं । कितने ही प्रामाणिक मनुष्यों ने इस प्रत्यक्ष को भी प्रमाण माना है । किन्तु यह उनका मत ही प्रमाण है, क्योंकि ज्ञान होते ही किसी न किसी वस्तु की हमें उपलब्धि होती है । अर्थात् ज्ञान में कुछ न कुछ वस्तु अवश्य भासती है । किसी वस्तु का भासना ही उपलब्धि । उपलब्धि के हेतु को ही प्रमाण कहते हैं । श्रुतः ज्ञान से जब हमें उपलब्धि होती है तो अवश्य हम उसको प्रमारण कहेंगे । [ ३४ ]
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ॐ ब्रह्मविज्ञान किसी न किसी इन्द्रिय के स्थान में गंध - रूप - रस यदि कितने ही तात्कालिक भावों को हम प्रत्यक्ष के द्वारा ही पाते हैं । इसलिये उन इन्द्रियों को हम अवश्य प्रमाण कहते हैं । उन गंध - रस ग्रादि भावों का जो हमें ज्ञान होता है, उसकी इन्द्रिय के स्थान में नया उत्पन्न हुग्रा जो तात्कालिक भाव माना जाता है, इसमें भी कोई हानि नही । मान लिया जाय कि ये गंध - रूप रस ग्रादि भाव पहले न थे किन्तु इन्द्रिय संयोग से इन्द्रियों के स्थान में ही नये उत्पन्न होते हैं तो भी उन नये भावों का ज्ञान हमें इन्हीं इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त हुआ है और ज्ञान के प्राप्त होने के कारण को ही प्रमाण कहते हैं तो फिर क्यों न इन इन्द्रियों को प्रमाण मानें । श्रनवत्ता जो उन इन्द्रियों पर यह ग्राक्षेप किया गया है कि ये इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं हो सकती, क्योंकि ये हमें धोखा देती है; जो आकाश स्वच्छ साफ बिना रंग का है उसको नीला दिखलाती है, इत्यादि इत्यादि, किन्तु इस पर भी हम कहेंगे आकाश का कि यह नीलापन यदि हमारी आँख दिखलाती है और उस नीलेपन का किसी दूसरे काल में या किसी दूसरे व्यक्ति की आँखों से कभी भी यदि ग्रन्तर नहीं पड़ता तो हम इस ग्राकाश को वास्तव में ही नीला क्यों न मानें । इसके क्या मायने कि जिसको हम सदैव से एक ही रूप में देखते हैं उसको झूठा मान लें । जबकि नीला ही हम देखते हैं तो निस्सन्देह कह सकते हैं कि यह ग्राकाश नीला है । अब विचार इस बात का है कि जो प्रकाश मेरे पास है उसको नीला नहीं देखते, इसलिये ग्राकाश नीला नहीं है तो हो सकता है कि ग्राकाश नीला न हो, किन्तु यह् जो नीला दीखता है यह ग्राकाश है, इसमें क्या प्रमाण है । संभव है कि इस विशाल ग्राकाश मंडल में जिस प्रकार सूर्य - चन्द्रमा धूमकेतु - मदाकिनी ग्रादि विविध भाति के पदार्थ दृष्टिगत होते हैं, उसी प्रकार कोई नीले रंग का पदार्थ भी बहुत दूर ग्राकाश में चारों ओर फैला हो । अब भी जगत् में कितने ही ऐसे पदार्थ हैं जो शक्ति से बाहर हैं, परन्तु इसका क्या अर्थ है कि उस नीले असली पदार्थ का ठीक - ठीक न जानने के कारण हम उसको श्राकाश ही मानलें और उसके नीलेपन को झूठा मानकर देखने वाले की आँख को भी झूठा मान बैठें | हम देखते हैं कि बहुत से दार्शनिक इसलिये पदार्थ की खोज करते हुये कुछ - कुछ उसका तत्त्व जान पाये हैं, जैसा कि एकमत है कि सूर्य का प्रकाश बहुत विशाल होने पर भी परिच्छिन्न है, कहीं न कहीं उसका अन्त ग्रवश्य है, किन्तु उस प्रकाश मंडल से बाहर ग्रनन्तानन्त साकाश मंडल घोरतम अन्ध-कार से भरा पड़ा है । वही वोर अन्धकार सूर्य के प्रकाश के अन्दर से ग्राकर हमें नीला दिखाई देता है | दूसरा मत है कि सूर्य का यह प्रकाश पृथिवी के धरातल से १२ योजन ( ४८ कोस ) ऊपर तक ही है | क्योंकि पृथिवी के चारों ओर से घेरे हुए भू वायु नाम की एक वायु इतनी ही दूर ऊँचे फैली हुई है । उसी वायु में जब सूर्य की काली किरणें जोर से धक्का मारती हैं और उसका दबाव पड़ता है तो इस भू वायु के अन्दर की कोई खास तरह की जलने वाली वस्तु जल उठती है । वह जब तक जलती रहती है तब तक प्रकाश नजर आता है । इस प्रकाश के होने का इस १२ योजन के अन्दर ही संभव है, इसके ऊपर भु वायु के न होने से दबाव पड़ना या किसी वस्तु का जलना संभव नही, इसलिये १२ योजन के ऊपर सूर्य मंडल तक चारों ओर घोर अन्धकार है, वहीं अन्धकार प्रकाश के अन्दर से दीखता हुआ हमें नीला दीखता है । और तीसरा मत है कि पृथिवी से ऊपर सूर्य तक इस आकाश मंडल में ७ जाति के, ७ वायु [ ३५ ]
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धोखा देने वाली नहीं मान सकते । सकता । * तह * ब्रह्मविज्ञान के सारांश [ ३६ ] के ७ स्तर * हैं । वे ग्रापस के दबाव के कारण इतने घने हो गये हैं, कि दूर से देखने पर वे घन नीले दिखाई देते हैं, । यद्यपि निकट से उन वायुत्रों के परमाणु छी - छीदे विखरे होने के कारण उनकी घनता वा उनके ग्रन्तरे न देखने से एक ही स्तर दीखता है । उसी प्रकार वायु सघन होने के कारण उनका कोई खास वर्गं नीला बनके हमें दीखता है । इस प्रकार बहुतों ने बहुत तरह से इस नीले रंग पर अनुमान वाँधा है । संभव है कि इन्हीं में से कुछ न कुछ हो, ग्रथवा संभव है कि ये सब कुछ न होकर और ही कुछ हो, परन्तु यह बात अवश्य है कि कोई न कोई नीले रंग का पदार्थ ग्राकाश में चारों ओर फैला हुआ है, उसी को देखती हुई हमारी ग्राँखें बहुत सच्चाई का काम कर रही हैं । हम ऐसी ग्रांस को मूंटा कहकर प्रत्यक्ष, अनुमिति और शब्द ये तीन ज्ञान के मुख्य स्थल हैं । प्रत्यक्ष और अनुमिति प्राकृत हैं क़िन्तु शब्द ( शब्दों के द्वारा ) सांकेतिक ज्ञान है । इनमें प्रत्यक्ष ही प्रमेय के ज्ञान का मुख्य द्वार है और इसीलिये प्रत्यक्ष को वैज्ञानिकों ने मुख्य प्रमाण रक्खा है । क्योंकि अनुमिति इत्यादि इसी पर निर्भर है और यही ज्ञान उपलब्धि का हेतु है इसलिये ग्रमिट और अटल प्रमाण है । गंधादि भावों का ज्ञान इन्द्रियों के स्थानों में यद्यपि नया है, तथापि इन्द्रियों के ही तो द्वारा होता है, इसलिये ज्ञान प्राप्ति का कारण इन्द्रियाँ प्रमाण सिद्ध हो चुकीं । इन्द्रियों पर धोखा देने का प्राक्षेष स्वच्छ, रंगहित ग्राकाश को नीला दिखलाना । उत्तर— १ – भूत - भविष्यत् वर्तमान के सकल मनुष्यों को जो नीला दीख रहा है, वह धोखा नहीं कहा जा २ - ग्राकाश के दो भाग - स्वच्छ ( वर्णरहित ) और नीला संभव है कि सूर्य चन्द्रादि समान श्व ेत प्रकाश के ऊपर नीले रंग का पदार्थ हो उस आकाश को भी श्व ेत ही मान लेने में क्या प्रमाण है । विना प्रमाण ही नीले को श्वेत मान बैठना ग्रप्रमाण और मिथ्या है । नीले को नीला बताना सत्य है, या नीले को श्वेत वताना सत्य है । इसीलिए नीले को नीला बताने वाली इन्द्रियों को झूठ कहना सर्वथा झूठ है | इस नीले ग्राकाश के विषय में दार्शनिकों का एक मत है कि सूर्य का प्रकाश ग्रन्नतानन्त घोरतम ग्रन्धकार को, जो सर्वत्र चलरूप से व्यापक है, नीला दिखलाता है । ३ – सूर्य की काली किरण से १२ योजन ही की भू वायु के प्रकाश से ऊपर का अन्धकार नीला दिखता है । ४ -- अन्तरिक्ष में ७ गति के, ७ पवनों के ७ स्तर दूर से घन एक स्तर हैं, ये नीले दिखते हैं, यद्यपि निकट से घन होने से नीले नहीं दिखते । दूर की वायु सघन होने के कारण, उनका कोई खास रंग या वर्ण नीला बनके दिखता है । ये सब मत सत्य हों या असत्य, किन्तु यह अवश्य है कि
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* ब्रह्मविज्ञान कोई न कोई नीले रंग का पदार्थ आकाश में फैला हुआ है, उसको देख कर ग्रांस जो नीला बताती है, वह काम सत्य है । इन्द्रियों पर दूसरा और आक्षेप यह था कि वर्तुलवृत्त अर्थात् चारों ओर से गोल इस पृथ्वी के स्तर को समधरातल के रूप में इन्द्रियां दिखलाती । यह इन्द्रिय का दोष है । किन्तु इसका उत्तर यह है कि किसी गोल दिखलाना यह प्रांख का काम नहीं है । यह स्मरण रहें कि दृश्य पदार्थ की उन्नत पृष्ठता ( पीठ की ऊंचाई ) दृष्टि में कभी नहीं आती, क्योंकि वह ग्रांख से नहीं पकड़ी जाती । बात असल यह है किख दीखती हुई वस्तु के प्रदेश में नहीं जाती है और न वह दीखती हुई वस्तु ही आंख पर आती ( हैं, ये दोनों ही अपने - ग्रपने प्रदेश पर स्थिर रहते हैं, किन्तु सूर्य ग्रादि प्रकाशक पदार्थों की किरण उस वस्तु के बाहरी सतह पर प्रत्येक परमाणु से धक्का खाकर वापस लौटते हुए आँख पर आकर उस वस्तु की उसी धरातल का ग्राकार बन कर ग्रॉस इन्द्रिय के हवाले करती है, जिस को आँख पर बैठी हुई प्रज्ञा-बुद्धि ग्रहण करके ग्रात्मा को समपर्ण करती है इसी को हम देखने का ज्ञान कहते हैं, तो ऐसी स्थिति में वस्तु के पृष्ठ ' के ऊँचे नीचे होने के कारण वह किरण यद्यपि ऊँचे नीचे सतह बना कर ही वस्तु पृष्ठ से रवाने होते हैं किन्तु ग्राँख पर श्राते हुए वे ग्राँख के समधरातल पर सम्प्रदान बनकर के ही बैठते हैं । इसलिये उस वस्तु की ऊँचाई तीचाई का ग्रांख पर थाना कदापि संभव नहीं है । यह जो कहा जा चुका है कि आँख किसी वर्तुत वृत्त के पीठ की ऊँचाई का ग्रहण नहीं करती । इसी कारण ग्राकाश में सूर्य या चन्द्रमा के विम्ब वर्तुल पिंड होने पर भी ग्राँख से थाली का धरातल के संमान छः सात अंगुल की चौड़ाई के दीखते हैं, उनकी पीठ की ऊँचाई हम ग्रॉस से अनुभव नहीं करते, उसका यही कारण है । किन्तु समधरातल पृष्ठ से वा ऊँच नीचे पृष्ठ से आए हुए किरणों के अवयव कुछ अन्तर अवश्य रहता है, वह यह कि बीच के भाग के किरा कुछ बिखरे हुए रहते हैं और दोनों बगल की किरणें घन रूप मेंकुछ तम का लिये हुए ग्राँख पर ग्राते हैं । इसी विशेषता के कारण देखने के पश्चात् मानस विचार उस वस्तु के पीठ की ऊँचाई की कल्पना कर लेता है क्योंकि उसी गोल पीठ को हाथ से टटोलने के समय गोलाई का अनुभव कर चुका था, इसलिये इस गोलाई और इस ऊँचाई की कल्पना मानस विचार का काम है न कि ग्राँख का । जब कि ग्रां पृथिवी के धरातल की वह ऊँचाई, जिकको स्पर्श कर के पहिले कभी मन में नहीं पहिचाना था, उस ऊंचाई को ग्राँख को ग्राँख के देखने के पश्चात् मन भी अनु-भव नहीं कर सकता और प्राँख का तो ऊंचाई ग्रहण करना, जिसका काम ही नहीं है । इसलिये पृथिवी के धरातल की ऊँचाई का ग्रहण करने से आंख कदापि प्रमाण नहीं हो सकती । जो कंदुक ( गेंद ) वर्तुलवृत्त होता है और मकानात ऊँचे नीचे रहते हैं और जो कितने हीं वस्त्र ईकटटे रक्खे हों या अनेक लकड़ियों के ढेर हों, ये सब एक ही जगह हों या दूर दूर फासले पर रक्खे हों इन सबके रूप में समधरातलता न होने पर भी किसी दीवार पर जब इसकी छाया पड़ती है, वह समधरा तल होती है | आसमान में जिन तारायों को वा ग्रहों को रात में हम देखते हैं, ये सब एक धरातल में [ ३७ ]
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* ब्रह्मविज्ञान नहीं हैं । विज्ञान से मालूम है कि एक तारा दूसरे तारे से लाखों कोस दूर है, तो भी मुझ को आकाश में एक धरातल पर जमे हुए से दिखते हैं । दूब के हरे खेत जो कि दूब की शाखा पत्तों के कारण खेत के घरातल को ऊँचा - नीचा बना देते हैं, दूर से देखने पर यह ह्री चद्दर के समान समधरातल पर बने हुए दीखते हैं, वन में वृक्ष यद्यपि बिखरे हुए रहते हैं, किन्हीं - किन्हीं नदियों के पानी प्रबल तरंग के कारण ऊंची नीची सतह बनाते हैं, किन्तु दूर से दीखने पर वन या नदियाँ एक चादर के समान समतल बने हुए दीखते हैं । इन सब का कारण यही है कि इनको पीठ पर से उनकी रूप की किरणों इनके पीठ के अनुसार ऊँचे - नीचे प्रदेश से ही प्रारंभ होती हैं किन्तु मेरी आँख का धरातल समान होने के कारण वहाँ पर ये किरणें समधरातल बन कर ठहरती हैं इसलिये हमारी आँख उन सब के पीठ की ऊँचाई - नीचाई को या उनके ग्रापस की दूरी को कुछ भी ग्रहण नहीं करती । जिस प्रकार दीवाल पर उनकी छाया सम-धरातल होकर गिरती है, उसी प्रकार यांख पर भी उनका समधरातल होना प्रकृति के नियमानुसार है । जिस रूप में किरणें ग्रांख पर पड़ेगी, उसी प्रकार उनको ग्रहण करना, यह ग्रांच का कर्तव्य है, इसमें आँख का दोष नहीं, किन्तु ऐसा ही करने से आँख प्रमाणु होगी । एक और ग्राक्षेप ग्राँख पर यह है कि सूर्य को मध्याह्न में छोटा सफेद दिखला कर प्रातः काल में अपेक्षा कृत बड़ा श्रौर लाल दिखलाती है, किन्तु इस पर हमारा उत्तर है कि जिस प्रकार विषम बरातल के काच में किसी वस्तु को देखने से रूप की किरणों के बिखरने से दृश्य वस्तु का ग्राकार बड़ा हो जाया करता है, उसी प्रकार तिरछे फैले हुए भू वायु के स्तर का विषम धरातल होने के कारण सूर्य से बाते हुए किरण बिखर कर आँख पर पहुँचते हैं, इसलिये सूर्य का विम्ब प्रात: सांय बड़ा बनके दीखता है । किन्तु मध्याह्न में सीधी किरणें वायु को फाड़ कर आँखों पर श्राती हैं, वहीं किरणों के बिखरने का कोई कारण नहीं भाता, इसलिये सूर्य वास्तव में ज्यों का त्यों छोटे रूप में दीखता है, इसमें किरण का विस्र-रना प्रकृति सिद्ध है, यह विकार यदि दोष में गिना जाय तो इसमें वायुस्तर का दोष है, जिसने किरण को बिकीर्ण करके प्राँख पर पहुँचाया है, किन्तु ग्रांख ने अपने पास प्राये हुये रूप को ज्यों का त्यों ग्रहण किया है, इसमें आँख का दोष नहीं और यह भी एक नियम है कि कोई ग्रावरण काला होकर यदि पार. दर्शक हो और उसके परलीपार कोई भास्वर शुक्ल ( तेज चमकीली सफेद ) वस्तु हो तो उसकी सफेद किरणें उस पारदर्शक काले ग्रावरण के सन्दर होकर ग्रांख पर पहुंचे तो उस काले पर सवार होकर सफेद रंग लाल रंग में बदल जाता है । सभी जगह लाल रंग का यही कारण है । काली जमीन पर सफेद किरण के सवार होने से लाल रंग प्रकट होता है । जब वास्तव में दो रंग बनकर लाल रंग बन कर कोई किरण आँख पर आवे तो उसको लाल रंग में ग्रहण करना प्राँख का कर्त्तव्य है, इसीलिये ग्रांख प्रमाण है । बात यह है कि प्रातःकाल उगता हुआ सूर्य जिस स्थान पर ग्रापको दीखता है, वह उस स्थान पर नहीं रहता क्योंकि इस पृथ्वी का व्यास ८००० मील का उसके केन्द्र से हमारी ग्रांख तक ४००० मील की दूरी है | कल्पना करिये कि पृथ्वी के केन्द्र से पृथ्वी को ग्राधी काटती हुई एक रेखा पूर्व से पश्चिम आकाश में जाकर स्पर्श करती है उसको ' क ' कहते हैं । इसी प्रकार मेरे प्राँख से भी पूर्व - पश्चिम सम-धरातल में जाती हुई रेखा कहीं ग्राकाश में स्पर्श करती है, उसको ' ख ' कहते हैं । अब यह सूर्य हमको ' ख ' की ही जगह उगता हुआ दीखता है किन्तु यदि हम ' ख ' की ही जगह उगता हुआ मान लें तो दिन बहुत [ ३८ ।