ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 71–80

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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* ब्रह्मविज्ञान टैंड छोटा और रात बहुत बड़ी होनी चाहिये । क्योंकि आकाश का गोला जो ३६० ग्रंथ में बटा हुआ है, वह ' क ' रेखा से ग्राचे ( मध्य ) में कटता है | १५० ग्रंश पृथ्वी के नीचे ग्रहश्य ग्राकाश है । किन्तु ' क ' से ' ख ' और उतना ही अंश हमारी ओर पृथ्वी के ऊपर दृश्य ग्राकाश है । रेखा का ग्रन्तर ४००० मील का है । इसलिये संभव है कि ४००० हजार पूर्व ४००० ही पश्चिम ग्राकाश का प्रदेश हमारे गाँव से न दीखे, क्योंकि वह प्रदेश हमारी ग्रांख वाली ' ख ' रेखा के नीचे है तो इस प्रकार पूर्व - पश्चिम मिलाकर ८००० मील ग्राकाश का भाग अदृश्य श्राकाश मिल गया । अदृश्य ग्राकाश का भाग अधिक हो जाने से दृश्य ग्राकाश का भाग छोटा हो गया । दृश्याकाश ही की चीज हमें दीखती है । सूर्य के दीखने को ही दिन कहते हैं । इसलिये सदा दिन छोटा और रात बड़ी होनी चाहिये किन्तु ऐसा नहीं होता, दिन - रात वरावर होते, वरावर घटते भी हैं, इसलिये लाचार मानना होगा कि सूर्य ' क ' रेखा पर आने से ही पूर्व में उगता है, पश्चिम में छिपता है । परन्तु वह ' क ' रेखा हमारी ग्रांख वाली ' ख ' रेखा से ४००० मील नीचे है, हमें सूर्य कैसे दीख जाता है, इसका उत्तर यह है कि पृथ्वी के चारों ओर १२ योजन की दूरी में भू वाबु दरियाव के समान गहरा है । जिस प्रकार किसी दरीयाव में कोई लकड़ी खड़ी करने से जितना अंश पानी के भीतर जाता है वह टेढ़ा होकर दिखता है इसी प्रकार ' क ' स्थान में ग्राया हुआ सूर्य के किरण इस भू वायु में घुसते हुये टेढ़े हो जाते हैं और उनका टेढ़ापन ऐसा कोना बनाता है कि जिससे यह किरण उसी समय मेरे ग्रॉस पर ग्रा लगते हैं और वायु में जिस स्थान पर यह लम्बन होता है, उसी सीध में उस रेखा को यदि आगे बढ़ा दें तो वह रेखा ठीक ' ख ' रेखा से मिल जायगी । इसी लम्बन के कारण ' क ' स्थान पर आए हुये सूर्य को हमारी आँख उस लम्बन रेखा के द्वारा ' ख ' रेखा पर देख लेती है । यह देखना उसका प्रकृति नियमानुसार है । उसने अपने पास ग्राये हुने सूर्य के रूप को देखा है, इसलिये उस आँख का दोष नहीं, अब यह जानना चाहिये कि इस प्रकार सूर्य के स्थान में है, इसलिये हमारे प्रदेश में भूमा अर्थात् पृथ्वी छाया जो वास्तव में काली है और जिस के द्वारा रात में कालापन दीखता है, वह आधे पृथ्वी के भाग में अर्थात् पृथ्वी के जिस प्राधे भाग की तरफ सूर्य का आकाश रहता है उसके परली ओर १८० अंश के बराबर भू पृष्ठ पर वह अंधेरा रहता है । सूर्य के ' क ' स्थान पर रहने के समय उसकी सीधी रेखा पृथ्वी पर जहाँ पड़ती है उससे ६० अंश दूरी पर इस पृथ्वी की छाया का अन्धकार सदा स्थिर रहती है, इसलिये ' क ' स्थान पर सूर्य के रहने के समय हम या हमारी ग्राँख ग्रवश्य ही इस पृथ्वी की छाया के भीतर है । यह पृथ्वी की छाया पारदर्शक काला आव-रण है इसके अन्दर से लम्बन के द्वारा प्राते हुये भास्वर शुक्ल सूर्य की किरणें काला- सफेद के रासायनिक संयोग के कारण लाल होकर ग्राँख पर आते हैं । इसलिये वास्तव में ग्राए हुए लाल रूप को देखती हुई ग्राँख सच्चाई का काम कर रही है । इसलिये प्रमाण है । एक और आक्षेप आँख पर यह किया गया है कि जब हम आँख के ठीक सामने कुछ दूरी पर चिराग रखते हैं; उस चिराग और आँख के दर्मियान में कोई भी ग्रावरक ( रोकने वाली ) चीज न रखखे, किन्तु अपनी एक हथेली को इस अन्दाजे ग्राँख के पास सामने रक्खे कि उस हथेली से जो सामने की जगह रुकती हो अर्थात् न दीखती हो उस जगह का उस चिराग से एक अंगुल का फासला हो । इसी तरह दूसरी ग्राँख की तरफ भी दूसरी हथेली को इस तरकीब से रक्खो कि उस हथेली से रुकने वाली जगह का भी चिराग से दूसरी छोर में एक ही अंगुल का फासला हो; ऐसी सूरत में यद्यपि रोकने वाली दोनों I ३६ ]

पृष्ठ 72

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श्र ख रेखा प्रहोरा कल्पितः वास्तद-ग्रहोराब्रखण्ड वास्तव खण्ड रात्र अहो अहोरात्र कल्पित रव

पृष्ठ 73

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# ब्रह्मविज्ञान क हथेली एक दूसरे मे फासले पर रहते हैं, तो शी बीच वाले चिराग की तो बिल्कुल गायब हो जाती है । ग्राश्चर्य है कि जब बाँयी या दहनी किसी भी हथेली को हटा लें तो चिराग दीख ग्राती है यह नहीं समझ में बाता की वह चिराग किस हथेली से ढकी हुई थी; क्योंकि हथेली दो हैं और दोनों अलग जगह पर हैं फिर एक चिराग अलहदा जगह किसी हथेली से ढकी नहीं कही जा सकती । और दूसरा ग्राश्चर्य यह है कि हथेली से जो जगह रोकी गई है उसमें किसी जगह वह चिराग नहीं है, यह सिद्ध हो चुका है कि उन ढकी हुई दोनों जगहों से अलग दोनों जगहों के बीच में वह चिराग है जो कि किसी से ढकी नहीं गई किन्तु फिर भी दिखाई नहीं पड़ती । इसी से आँख का झूठापन सिद्ध है । किन्तु इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि ग्रां दो हैं और दोनों देखकर स्वतंत्र रूप से अलग - अलग वस्तु के ग्राकार को ग्रहण कर के मस्तक में पहुँचाने का सामर्थ्य रखती हैं, इनमें दोनों आँखों का फासला चार गुल का है । दोनों की काली पुतलियों में से दो दृष्टिसूत्र ग्रलग - अलग रवाना होकर एक विषय पर जाते हैं । विषय के एक होने के कारण उस विषय पर झुकते हुए दोनों दृष्टिसूत्र टेढ़े होकर उसी एक वस्तु पर संपात करते हैं अर्थात् दोनों मिल जाते हैं । यदि दोनों ग्राँख की ग्रन्तर की ४ अंगुल रेखा कायम करें तो वहां से उसके दृश्य विषय तक दोनों दृष्टिसूत्रों के मिलने से एक विषम त्रिभुज क्षेत्र बनेगा, इन दोनों दृष्टिसूत्र मार्गों में यदि हथेली या और कोई ग्रावरक रख दें तो दृष्टिसूत्र का उसके विपय से संयोग न होगा । माना कि चिराग आपके नाक के ठीक सामने है और उसके बीच में कोई ग्रावरक नहीं है किन्तु जहां से दृष्टिसूत्र चला था उसके मार्ग में कहीं भी यदि कोई आवरक रख दिया जाय तो दृष्टिसूत्र का विषय तक संयोग नहीं होगा, इसी संयोग को ये दोनों हथेलियाँ अलग - अलग रोकती हैं इसलिये हथेलियों के अलग रहने पर भी बीच की चिराग गायव हो जाती है क्योंकि दोनों दृष्टिसूत्र विषय पर जाकर संपात नहीं कर सकते हैं । जब एक हथेली कोई सी हटा दी जाय तो बजाय दो सूत्र के एक दृष्टिसूत्र जाकर विषय को ग्रहण कर लेता है । तात्पर्य यह है कि दृष्टि का विषय से किसी न किसी प्रकार संयोग होना आवश्यक है । संयोग होने से ग्राँख अवश्य उस वस्तु को ग्रहण करेगी, किन्तु संयोग न होने से आँख वस्तु को ग्रहण न करे तो इसमें आँख का कुछ भी दोष नहीं । आँख पर एक और यह भी ग्राक्षेप है कि बड़ी वस्तु भी दूर से देखने पर छोटी दिखाई देती है, किन्तु इसमें श्राँख का दोष नहीं समझना चाहिये, क्योंकि ईश्वर के समान वेद भी इस जगत् में एक सत्य वस्तु है जोकि प्रत्येक वस्तु में नियमानुसार पाया जाता है । उसी वेद के कारण बड़ी वस्तु दूर से देखने पर छोटी दीखती है । इस वेद को पहले इस प्रकार जानना चाहिए कि वेद उस वस्तु को कहते हैं कि जिसके द्वारा प्रत्येकवस्तु को हम जानते हैं और जिस ज्ञान से उस वस्तु का अस्तित्व ( सत्ता ) सिद्ध होती है, कोई भी वस्तु भासती है— इस कारण से ' है ' और ' है ' इसी कारण से भासती है । इसी ज्ञान और सत्ता के मूलतत्त्व को वेद कहते हैं । वेद यह शब्द ' विद् ' धातु से बना है । जिनका अर्थ ज्ञान है अथवा सत्ता है । ग्रर्थात् ' येन वेत्ति, और येन विद्यते स वेदः । ग्रर्थात् जिससे जाने श्रौर जिससे वह है, वही वेद है । [ ४१ ]

पृष्ठ 74

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* ब्रह्मविज्ञान * यह वेद तीन प्रकार का है— ऋक्, साम और यजुः । संसार की प्रत्येक वस्तु अलग - अलग ऋक्, साम, यजुः का हो स्वरूप है । इसमें साम वह है, जो किसी वस्तु के बाहर बड़ी दूर तक अनेक ग्रदृश्य मडण्ल बनाता है और वह एक २ मण्डल पहले मण्डल से क्रमशः बढ़ता जाता है । उसका फैलाव बढ़ने पर भी सत्र मण्डल ग्रंशों में बराबर माने जाते हैं । जो सब से छोटा मण्डल है जो ख़ास उस वस्तु का पृष्ठ है, यदि उसको हम ३६० ग्रंथों में विभक्त करें तो उससे बहुत दूर का सब से बड़ा मण्डल भी उतने ही श्रंशों में विभक्त होगा, किन्तु पहले मण्डल के ग्रंश का जितना प्रदेश है, उससे बहुत अधिक प्रदेश बाहर वाले मण्डल के एक अंश का होगा । यह बाहर बाला मण्डल उस स्थान पर माना जाता है कि जहाँ से उस वस्तु के देखने न देखने की सीमा बनती हो अर्थात् जिस रेखा से उस वस्तु की नजदीकी की ओर झुकने पर वह वस्तु दीखे किन्तु उस प्रदेश से वस्तु की दूरी की थोर झुकने पर वह वस्तु कुछ भी न दीखे, वही साम की अन्तिम सीमा है । उस सीमा से वस्तु की पीठ तक जितने आकाश के प्रदेश हैं उनमें इस साम को सूक्ष्म रूप से सर्वत्र व्याप्त होने पर भी समझने के लिए उसको सहस्र ( १००० ) भाग में बाँटना उचित है । अर्थात् प्रत्येक वस्तु के चारों ओर साम के १००० मण्डल नियम से रहते हैं, उन मण्डलों के केन्द्र में वह वस्तु घिरी हुई रहती है । यद्यपि इन साम के १००० मण्डलों में से एक भी हमें नहीं दीखता तथापि वह साम का प्रदेश इसलिये नियमानुसार माना जा सकता है कि उतने ही आकाश के प्रदेश में ग्रांख रखने पर हम उस वस्तु को देख सकते हैं । उस सीमा से बाहर होते ही वह वस्तु हमारी आँख से अदृश्य हो जाती है । इसलिये उतनी दूरी में वह वस्तु अपना रूप चारों ओर अवश्य भेजती है जो कि मेरी ग्रांख पर ग्राकर उस वस्तु का ग्राकार या चित्र उतारती है । यदि उस वस्तु का रूप उस देश में न जाता तो मेरी श्रख कदापि उस वस्तु का ज्ञान नहीं कर सकती, इस-लिए प्रत्येक वस्तु के रूप के जाने की सीमा अवश्य ही माननी पड़ेगी और उसी को साम मण्डल कहते हैं । इन सामों का अर्थात् मण्डलों का आलम्बन ( प्राधार ) अर्थात् जिस वस्तु से वह मण्डल बनता है वह ऋक् है; यह ऋक् उस वस्तु का आकार है । जितनी दूरी में साम माना गया है उसमें आँख रखने से वह वस्तु एक रूप में दीखती है परन्तु उतने में कहीं भी हम अपनी ग्राँख को लगावें वहाँ सभी जगह उस वस्तु को देखते हैं, इसलिए जाना गया कि उस वस्तु से ग्रारम्भ करके साम की अन्तिम सीमा तक श्रदृश्य दशा में अनन्तानन्त संख्या में वह वस्तु भरी हुई है । जिस प्रकार एक सरोवर करोड़ों जल बिन्दुत्रों से भरा हुआ रहता है, जहाँ हाथ डालें — पानी मिलता है, उसी प्रकार इस साम समुद्र में करोड़ों उस वस्तु के ग्राकार इस तरह से जमे हुये हैं कि जहाँ ग्राँख डालो वहां ही वह वस्तु श्रांख पर चढ़ जायगी । अलबत्ता इतना विशेष अवश्य है कि सरोवर में जल के बिन्दु सब समान हैं किन्तु इस साम समुद्र में वस्तु के ग्राकार सब छोटे वड़े होते हैं तात्पर्य यह है कि जो साम के १००० मण्डल कल्पना किये गये हैं उनमें एक - एक मण्डल पर सब ग्राकार श्रापस में समान होते हैं, उनमें अणु मात्र भी छोटा-वड़ा नहीं होता, किन्तु प्रत्येक मण्डल के ग्राकार की अपेक्षा भीतरी मण्डल के आकार ग्रवश्य ही और बाहरी मण्डल के ग्राकार भीतरी वाले की अपेक्षा छोटे होंगे । इनमें बड़े से बड़ा वही आकार है बड़े जिसको होंगे आप हाथ से टटोल कर अन्दाजा कर सकते हैं और छोटे से छोटा वह ग्राकार है जो कि सामकी सीमा पर बहुत ही छोटे बिन्दु के आकार पर कठिनता से कुछ भासता है । एक चमत्कार और है कि इस [ ४२ ]

पृष्ठ 75

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* ब्रह्मविज्ञान * सामसमुद्र के अन्दर जितने ग्राकार आँख पर आते हैं उसी स्थान में उस ग्राकार की अपेक्षा क्रम से छोटे होते हुए अन्तिम सीमा के छोटे ग्राकार तक सभी ग्राकार तह के तह जमे हुए रहते हैं जो कि काँच इत्यादि छोटे २ विम्व ग्राहक वस्तु पर उस क्षेत्र के छोटे - बड़े होने के अनुसार दीखा करते हैं इस सामसमुद्र के भीतर इस प्रकार छोटे - बड़े जितने वस्तु के ग्राकार चारों ओर भरे पड़े हैं उन्हीं को ऋक् कहते हैं । वेद कहता है कि— “ सर्वं तेजः साम रूपं हि शश्वत् " अर्थात् संसार में जितने प्रकार के तेज हैं वे ही साम के नमूने हैं । सदैव सभी प्रकार के साम का इसी तेज के रूप से अन्दाजा करना चाहिये तात्पर्य यह है कि सूर्य, चन्द्रमा या दीपक कोई भी तेज हो उसका स्वभाव है कि उसका कुछ भाग ली के रूप से केन्द्र में रहता है और उस केन्द्र की लो से चारों ओर बहुत दूर तक एक प्रकाश मण्डल में चलने फिरने वालों को उस प्रकाश के किरणों से कोई आपत्ति या रूकावट नहीं होती, किन्तु वह प्रकाश मण्डल उसी बीच की ली से सर्वदा दृढ़ता से बंधा रहता है । यदि प्रकाश को हटाना चाहें तो उस बीच की लौ को हटाने से हटा सकते हैं. कमी वेशी कर सकते हैं । ठीक इसी प्रकार संसार की जितनी वस्तु हैं सब एक ली हैं उनके चारों ओर दूरतक उसी वस्तु का रूप मण्डल घेरे रहता है उस रूप मण्डल में चलने - फिरने वालों को किसी प्रकार की रूकावट नहीं होती । यदि उस रूप मण्डल को हटाना चाहें तो उस मूल वस्तु को हटाने से हटा सकते हैं । अब इनमें जानने की मुख्य बात यह है कि वह ग्राकाश मण्डल जिस प्रकार चारों प्रोर व्याप्त है उसको यदि चारों चोर मण्डल के रूप में खयाल करें तो उसे हम साम कहेंगे । किन्तु उस प्रकाश मण्डल के भीतर अनन्तानन्त उसी ली कि सूरत भिन्न २ पड़ी हैं, जिनको हम सीधी ग्राँख से ली के रूप में नहीं देखते । किन्तु यदि उस प्रकाश मण्डल के अन्दर कहीं भी एक काच रखदें तो एक लो दीखेगी और हजार काँच रखने से हजार ली दीखेगी । तात्वयं यह है कि अनन्त ली रहने पर भी किसी वस्तु पर प्रतिबिम्बत होकर वे लौ भिन्न २ दीखती हैं किन्तु यह कभी ख्याल नहीं करना चाहिये कि वे काँच के टुकड़े लो को नये सिरे से गढ़ते हैं क्योंकि ऐसा करने से काँच का कुछ भाग अवश्य खर्च हो जाता, किन्तु हम देखते हैं कि उस प्रतिबिम्ब के दिखाने में काँच सर्वथा वेलोग इसलिये मानना होगा कि लौ उस स्थान पर आकाश में मौजूद थी जो कि काँच के वहाँ रखने से उस पर सवार होकर प्रतिफलित कर हमें दीखती है, बस वे ही सब लौ जो प्रकाश मण्डल के ग्रन्दर है उनको हम ऋक् कहते हैं । यही ऋक् और साम दोनों की पहचान है । जिस प्रकार सोम के मण्डल में केन्द्र से साम की सीमा तक यदि रेखा चारों ओर खीचें तो केन्द्र से दूरी के अनुसार वे रेखाएँ आपस में अधिक अन्तर पैदा करेंगी । अर्थात् वे रेखाएँ सूचीमुख होंगी किन्तु इसके विरुद्ध केन्द्र से जो ऋक् की धाराएँ चारों ओर साम की सीमा तक जाती हैं वे दूरी के अनुसार अपने व्यासों को कम करती जाती हैं, यही कारण है कि उस मूल वस्तु के जितने समीप हम आँख रक्खेंगे उतनी ही वह वस्तु बड़ी दीखेगी और ज्यों - ज्यों हम दूर हटेंगे उस वस्तु को छोटी देखेंगे, क्योंकि हमारी आँख के पास उस वस्तु की ऋक् उतने ही छोटे रूप में है । इसका प्रालेख्य ( नक्शा ) भी सरलता से समझने के लिये दिया है । [ ४३ ]

पृष्ठ 76

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* ब्रह्मविज्ञान कु जाता फैलता को आगे , है जो है वह साम सामधाराये ऋक धाराय वह है है । जो आगे जाता को सुकडता [ ४४

पृष्ठ 77

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* ब्रह्मविज्ञान इस प्रकार ऋक् और साम जो प्रत्येक वस्तु में नियमित रूप से पाये जाते हैं, उनमें प्रकृति के अनुसार ऋग्वेद प्रत्येक वस्तु की दूरी के अनुसार छोटा बनता है । यही कारण है कि ऊपर, नीचे, तिरछे कहीं भी कोई वस्तु हो दूरी के अनुसार छोटी हो जाती है । किसी - किसी का ख्याल है कि पृथ्वी की गोलाई के कारण प्रत्येक वस्तु दूर से छोटी दीखती है । परन्तु जब हम प्रत्येक वस्तु के ऊपर से पैंदे तक बराबर देखते हैं तो उनका कोई भी भाग पृथ्वी की गोलाई के कारण डूबा हुग्रा प्रतीत नहीं होता और जो आकाश में सूर्य, चन्द्रमा, तारे यादि बड़ी वस्तुएँ छोटी होकर दीखती हैं उनमें पृथ्वी की गोलाई का दबाब सर्वथा असम्भव है । इसलिये छोटा होने का जो कारण ऊपर दिखाया जा चुका है - वही सत्य है । माना कि वह सूर्य पृथ्वी से भी बहुत बड़ा - चौड़ा है । कितने ही तारे उस सूर्य से भी बहुत चीड़े और बड़े हैं | किन्तु दूर बहुत से आने का कारण उनका ऋक् हमारी आँख पर जिस अन्दाजे का पड़ता है, उसी का ग्रहण करना आँख के लिए संभव है । ऐसा करती हुई आँख यथार्थग्राही होने के कारण सत्य और प्रमाण है । इतना और समझना चाहिये कि यह ऋक् यद्यपि प्रत्येक वस्तु में उसी वस्तु के स्वाभाविक धर्मानुसार पृथक् - पृथक् रहता है किन्तु यदि उस वस्तु पर सूर्य प्रादि तेजस्वी पदार्थों का प्रकाश न पहुँचे तब तक उस ऋक् का स्फोट नहीं होता । इसलिये बहुतों का यही सिद्धान्त है कि यह सूर्य ही वास्तव में ऋक्, यजुः, साम इन तीनों वेदों का भण्डार और उत्पत्ति स्थान है- " त्रयी वा एष यस्तपति " ( शत ० ब्रा ० ) यह लिखा भी है । इसीलिये सूर्य को वेदमूर्ति कहते हैं । इसी सूर्य से ऋक्, साम और यजुः ग्राकार प्रत्येक वस्तु में लगे हुए दीखते हैं, इसलिये वह ऋक् जो कि दूर से छोटा होता जाता है वह भी सूर्य का प्रकाश ही है । समस्त वस्तु तीन प्रकार की हैं— कोई ज्योतिष्मान् अर्थात् अपने आप प्रकाशक है— जैसे सूर्य, ग्रादि । कितने ही परज्योति है, जो स्वयं प्रकाशक न होकर दूसरे के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं जैसे — चन्द्रमा - काँच आदि, इसी प्रकार कितने ही अज्योति पदार्थ हैं जिनके शरीर से वह प्रकाश नहीं निकलता कि जिसके द्वारा समीप की अन्य वस्तुत्रों को प्रकाश मिलता हो किन्तु एक प्रकार का प्रकाश उनके शरीर से भी चारों ओर अवश्य ही निकलता है, जिसको उस वस्तु का रूप मण्डल कहते हैं । जिस प्रकार परज्योति पदार्थ सूर्यज्योति लेकर ज्योतिर्मय प्रकाश से प्रकाशित होते हैं उसी प्रकार ये अज्योति पदार्थ भी सूर्य से ही रूपमय प्रकाश पाकर प्रकाशित होते रहते हैं । प्रकाशित होना ही वेद का रूप धारण करना है । इसलिए कहा जा सकता है कि " स्वज्योति " " परज्योति " और " ग्रज्योति " इन तीनों पदार्थों को सूर्य से ही वेद का लाभ होता है, यह सूर्य साक्षात् वेद का प्रत्यक्ष रूप है । सूर्य से ही रूप मिलता है और उस रूप को ऋक् कहते । इसी सूर्य से मिले हुए रूप के किरणों को जब दूरवीक्षण ( दुर्बीन ) आदि उत्कृष्ट यंत्र से विक्री करते हैं तो किरण फैलाने के कारण कभी - कभी वस्तु छोटी भी बड़ी दीखने लगती है । इसमें भी आँख का दोष नहीं है । क्योंकि दूरवीक्षण यन्त्र रूप के किरणों को फैलाकर जितना बड़ा बनाकर आँख पर पहुँचाता है, उसको ज्यों का त्यों प्राँख ग्रहण करती है । इसमें फैलाना यदि दोष है तो यन्त्र का है न कि आँख का । यहां पर एक यह भी कह देना अनुचित नहीं है कि जिस सूर्य या तारे को छोटे रूप में ग्रांख देखती है, उसको जो ग्राप बहुत बड़ा समझते हैं, यह आपके मन के विचार का काम है । उसकी सत्यासत्य परीक्षा हम मनः प्रामाण्यपरीक्षा में करेंगे । यहाँ इतना ही कहना है कि सूर्य की किरणों से वस्तुनों को रूप मिलता है और रूप ही ऋक् कहलाता है और ऋक् की धारा का उत्तरोत्तर [ ४५ 1

पृष्ठ 78

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* ब्रह्मविज्ञान छोटा होना स्वभाविक धर्म है और सत्य है । इसी सत्य रूप को ग्राँख ग्रहण करती है इसलिये ग्राँव सत्य है और प्रमाण है । आँख पर एक और आक्षेप है कि वह रज्जु को कभी सर्प, वृक्ष के ठूंठ को मनुष्य, सीप को चाँदी दिखाती है किन्तु उत्तर यह है कि रज्जु को देखते समय वक्र और काला भाग जो सर्प और रज्जु सादृश् में यभाव से रहता है उसी को केवल ग्रांख देखती है । वह न उसको सर्प कहती है और न रज्जु किन्तु पश्चाद हमारा मन का विचार रज्जु और सर्प के भेद करने वाले धर्मो को न पाकर कभी धोखा खा जाता है, रज्जु को सर्प मान बैठता है । यह मन के विचार का दोष है न कि आँख का 1 इसी प्रकार ठूंठ और मनुष्य में जो सादृश्यभाव है उसी को ग्राँख ने ग्रहण किया किन्तु उनके परस्पर भेद बताने वाले धर्म किसी कारण श्राँख पर नहीं आ सके | इसी कारण मन के विचार में कुछ का कुछ हो गया । सीप को देखने में भी जो सीप और चाँदी में श्वेतता की समानता की झलक है वह ही ग्रां पर आई, उनके भेद बत-लाने वाले धर्म नही ग्राये । अतः मानसिक विचारों में भूल होना सम्भव हो गया किन्तु गाँव का दोष कदापि सम्भव नहीं । इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी समझना चाहिए । मरुस्थल में मध्याह्न की तेज धूप में दूर से देखने पर जो लहराते हुए जल की सतह दृष्टिगोचर होती है वह भी ग्राँख का दोष नहीं है क्योंकि उस स्थान पर सूर्य की किरणें जमीन की बालू से टकरा कर उलटी ऊपर को जाती है । जिस समय श्राने जाने वाली किरणों में टक्कर होती है तो उनमें लहर पैदा हो जाती है | सूर्य के तप्त तेज से वायु का ताप बढ़ जाता है और यह तप्त वायुस्तर हलका होकर ऊपर को उठता है और उसके स्थान पर ऊपर का शीतल वायु आने लगता है इस प्रकार वायुस्तरों में एक प्रकार की लहर पैदा हो जाती है । ये लहरें ठीक जल की लहरों के समान होती हैं । इन लहरों की जल की लहरों से घनिष्ट समानता तथा वायु के लहरों के देखने कि मन को विचार करते समय किरण का अभ्यास न होने के कारण बार बार देखे हुए जल के लहर की ओर मन का वेग शीघ्रतया पहुंच जाता है | यह भी दोष मन के विचार का है न कि आंख का क्योंकि आँख का काम लहर ग्रहण करने का है उस लहर के साथ जल का सम्बन्ध ठहरा लेना मन के विचार का कार्य है । अथवा हम इस प्रकार कहेंगे किसी दर्शन के अनुसार बानी ४ प्रकार का होता है - प्रम्भ, मरीचि, मर, ग्राप – इनमें द्यौ से ऊपर द्यो तक जिस मूलतत्त्व से यो अथवा उसकी सब वस्तुएँ बनी है उस जल को ' ग्रम्भ ' कहते हैं । सूर्य से पृथिवी तक जो बीच का ग्रन्तरिक्ष है और उसमें जितने पदार्थ हैं, वे जिस मूलतत्त्व से बनते हैं उसको ' मरीचि ' नाम का जल कहते हैं । और जिस जल तत्त्व से हमारी यह पृथिवी बनी है उसको ' मर ' कहते हैं | और पृथिवी से जिस ओर सूर्य है उसकी दूसरी ओर लोकालोक तक जितना श्राकाश है उसके सब पदार्थ जिस मूल-तत्त्व से बनते हैं उसको ‘ ग्राप ' नाम का जल कहते हैं । इन चारों तत्त्वों में मरीचि जल वह है जो सूर्य से पृथिवी तक सूर्य के किरणी तथा वायु सूक्ष्म रूप से फैला हुआ है, जिसके कारण सूर्य की धूप की गरमी लगने पर भी कोई वस्तु सहसा जलने नहीं पाती । सूर्य के तप्त तेज के साथ मरीचि की नमी श्राया करती है । यह मरीचि सूक्ष्म रूप में एक प्रकार का वास्तव जल है उसके लिए यह ग्राकाश का मैदान समुद्र है उसमें यह मरीचि जल सूर्य से गरमी पाकर बहते हुए हवा से वास्तव में लहराने लगता है । यह ही कारण है [ ४६ 1

पृष्ठ 79

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* ब्रह्मविज्ञान * कि सागर के जल में जिस प्रकार वृक्ष का प्रतिबिम्ब पड़ता है उसी प्रकार कभी इस लहराते हुये मरीचि जल में भी वृक्षों का प्रतिविम्ब पड़ता देखा गया है अतः यदि उस ' मरु - मरीचिका ' को अर्थात् लहराती हुईकिरणों को हम वास्तव में ही जल कह सकते हैं । अब यदि मेरी माँ उसको जल रूप से देखती हैं । तो वह भी सत्य हो सकता है । साराश १ – रज्जु और सर्प के सादृश्य भाव को प्राँख ने देखा उस पर मन को विचार करके सर्प के निश्चित करने में धोखा हो गया । मन ने सर्प और रज्जु के भेद कारक धर्मों को न पाकर ऐसा किया । २ – इसी प्रकार वृक्ष के ठूंठ को मनुष्य समझ लेना भी मन का ही धोखा है न कि आँख का । ३ – सीप को चाँदी समझ लेना भी मन का ही धोखा है आँख का नहीं । %४ – ( क ) मरुस्थल में जल लहरों के दिखने का कारण किरणों का बालू से टकराकर उलटा ऊपर को जाने से और ऊपर से ग्राने वाली किरणों से टकराने से किरणों में लहरें दीख पड़ती हैं । ( ख ) बालू की, हल्की वायु का तथा ऊपर की शीतल और भारी वायु का सम्बन्ध होने से लहर दीखती है । ग्राँख केवल लहर को देखती है । पानी समझ लेना मन का धोखा है । ( ग ) अंतरिक्ष में ' मरीचि ' प्रकार का जल, सूर्य की गरमी के कारण लहराती हुई वायु से वास्तव में ही लहराते हैं सो ग्राँख का जल लहरें बतलाना वास्तव में सत्य ही है । सागर में वृक्षों की छाया के समान इस ' मरू मरीचिका ' रूपी जल में वृक्षों की छाया भी दीखती है । आँख पर एक और प्राक्षेप यह है कि वह एक ही मनुष्य को बाल्यावस्था में जवानी तथा वृद्धावस्था में भिन्न २ रूप से देखती हुई उसकी एकता को भी ग्रहण करती है । हम आँख के कहने से ही बालक, वृद्ध को भिन्न समझते हैं और उसी आँख के कहने से अवस्था भेद होने पर भी जन्म से बुढ़ापे तक मनुष्य को एक समझते हैं किन्तु एक को अनेक और अनेक को एक समझना दोनों मिथ्या है और माणिक है | जब एक ही ग्राँख विरुद्ध दो भाव को दरसाती है तो उनमें एक अवश्य असत्य है अथवा दोनों सत्य हैं | सत्य को ग्रहण करने वाली ग्राँख प्रमाण नहीं हो सकती । ग्रव इसका उत्तर यह है कि प्रत्येक मनुष्य को हमें दो भागों में विभक्त समझना चाहिये । एक शरीरात्मा, दूसरा ग्रन्तरात्मा । शरीर आत्मा वह स्थूल भाग है जो मरने पर भी यहां वना रहता है और जलाने ग्रादि क्रियाओं से पंच महाभूतों में मिल जाता है और ग्रन्तरात्मा वह सूक्ष्म भाग है जिसको मरने के पश्चात् हम नहीं पाते और जिसकी चेष्टा से यह शरीर चलता फिरता था जिसमें इच्छा थी, क्रिया थी, जो निराकार था किन्तु इस शरीर को धारण करने के लिए एक बलशाली तंत्र ( System ) रखता था, उसी ग्रन्तरात्मा और शरीरात्मा के वियोग को मृत्यु कहते हैं । इसमें शरीरात्मा भौतिक विकारों को ग्रहण करता हुआ जन्म से मृत्यु तक तीन अवस्था, पाँच ग्रवस्था, छः अवस्था अथवा अनन्त अवस्था धारण करता है । बाल्य यौवन श्रोर वार्धक्य ये तीन अवस्थायें हैं । शैशव, पौगंड, तारुण्य, प्रोढ़ और स्थविरता ये पाँच अवस्थाऐं [ ४७ । ]

पृष्ठ 80

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* ब्रह्मविज्ञान * हैं । जब तक बालक नंगा रहता है वह शैशव ग्रवस्था है यह ५ वर्ष तक रहती है । खेलने - कूदने की अबस्था को पौगंड कहते हैं इसका समय १५ वर्ष तक है । चढ़ती जवानी ग्रर्थात् ताश्य ५० वर्ष तक रहती है, जवानी ढल जाने को वार्धक्य कहते हैं और उसका समय क्रम ८० वर्ष वर्ष तक रहता है और जब शरीर बहुत ही ग्रममर्थ और शियलता को प्राप्त हो जाये तो उस काल को स्थविरता कहते हैं और यह ८० वर्षं से ऊपर होता है अथवा जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, नश्यति ये ६ विकार हैं अर्थात् जन्मना, सत्ता कायम होना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना ये ६ विकार जिसमें पाये जावें उसको शरीर कहते हैं किन्तु जो इन विकारों से रहित है वह अन्तरात्मा है । किसी प्रकार के विकार न होने के कारण जन्म से मृत्यु तक एक ही रूप में प्रतीत होता है ' ग्रहम् ' अर्थात् ' मैं हूँ ' इसी एक रूप में जन्म से मृत्यु तक भासता है । किन्तु इसका वह शरीर विकारी होने के कारण प्रतिक्षण बदलता हुआ अनेक रूप ग्रहण करता है, वह जन्म से मृत्यु तक भिन्न २ रूपों में भासता है जबकि इस प्रकार एक ही मनुष्य नी भाग में वटा हुआ है तो बहुत संभव है कि उस एक ग्रात्मा के विचार व्यक्ति को एक कहकर दिखावे और शरीर के अनुरोध से से आँख उस लावे जबकि वस्तु दो हैं । एक और अनेक तो उनको उसी भिन्न प्रकार अवस्था के कारण भिन्न करके आँख का दोष नहीं है । देखना श्राँख का कर्त्तव्य है । इसमें दिख-यह ब्यान देने का विषय है कि कोई भी इन्द्रिय विषय नियत हैं अर्थात् जिस विषय में सब ही विषय को ग्रहण नहीं कर सकती । उनके इन्द्रिय प्रमाण होती है जैसे जिसकी शक्ति है उस ही विषय को ग्रहण करने से करने से श्रख प्रमाण है । इस शब्द, गधादि प्रकार विषयों को ग्रहण न करने पर भी केवल रूप के ग्रह वह को ग्रहण करने के समय भी यदि अन्य इन्द्रियों को भी समझना चाहिये; किन्तु अपने विषयों इन्द्रिय श्रपने काम को मध्य में कोई दोप या जावे तो उसके प्रतिबन्धक होने से यथार्थ रूप से नहीं कर सकती । परन्तु इससे उनके वह प्रमाण्य में किसी त्रुटि नहीं होती । सूर्य या चन्द्रमा के नीचे वादल आने सूर्य से या सूर्य के का प्रकाश नहीं होता ग्रतः क्या नीचे चन्द्रमा के ग्राने से कभी - कभी कदापि नहीं । इसी यह सिद्धान्त माना जा प्रकार इन्द्रियों में भी सकता है कि सूर्य । ऐसा को समझना चाहिये प्रकाशवान् नहीं है प्रमाण पाते हैं । माना कि श्वेत अर्थात् दोष की उपस्थिति में भी इन्द्रियों को शंख को कभी पीला हम कड़वा बताती हुई बतलाती हुई प्रदर्शित करती जिल्ला कभी भूल करती है किन्तु ग्राँख भूल करती है मीठी चीनी , हुई अपने अन्दर पित्त इस पर हम कहेंगे कि को की का संयोग यह ग्राँख पीले शंख तरफ संकेत बतला रही है करती है । पित्त के संयोग को इसी प्रकार जिह्वा भी पित्त के संयोग करते हैं अन्यथा बताने में ये ही इस पित्त रोग को इन्द्रियाँ प्रमाण दोष की अवस्था में भी दूर करने का हम कभी हैं और इन पर हम विश्वास पीले उन दोषों को प्रदर्शित प्रयत्न न करते कि , हरे काँच में होकर करने के लिये । अतः विश्वसनीय है करती जमीन वे इन्द्रियाँ, है कि उसी रंग के पर गिरती हुई सूर्य की ही प्रमाण हैं जैसा कि लाल काच के भीतर लाल, पीली हरी होकर ग्राई है सूचित , रोशनी हम को यही और इस बताने है के लिए प्रमाण वह रोशनी किन्तु इससे यह नहीं पाया जाता कि सूर्य का प्रकाश हरा इत्यादिहैं । अतः सभी इन्द्रियों में जो कुछ जिस प्रकार का ज्ञान पैदा होता है उसके लिये वही इन्द्रिय प्रमाण हो सकतीहै । [ ४८ 1