ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा — पृष्ठ 81–90

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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* ब्रह्मविज्ञान र साराश आँख पर और आक्षेप – एक मनुष्य को दो भाँति से दिखलाना - एक और अनेक । प्रत्येक मनुष्य की दो ग्रात्मा है— शरीरात्मा और अन्तरात्मा एक स्थूल दूसरा सुक्ष्म, एक विकारी दूसरा निर्विकारी, एक चैतन्य निराकार होकर भी चेष्टा, इच्छा, क्रिया शरीर में वलवान् तन्न इत्यादि का कारण और जिसके अलग होने से यह शरीर मृत कहलाता है वह ग्रन्तरात्मा है और दूसरा शरीर श्रात्मा भौतिक विकारों को ग्रहण करता हुआ कई अवस्था अर्थात् ३, ५, ६, इत्यादि को धारण करता है । शरीर में ऐसे नाना विकार है ग्रात्म - निर्विकार जन्म से मृत्यु तक एक ही है- ' ग्रहम् ' अर्थात् ' मैं हूँ ' इस एकही रूप " जन्म से मृत्यु तक भासता है किन्तु इसका वाह्य शरीर विचारी होने के कारण प्रतिक्षण बदलता हुग्रा अनेक रूप धारण करता है । इस प्रकार मनुष्य के दो भाग हैं एक बहुता और दूसरा एक ही रूप । ग्रतः एक ही व्यक्ति ग्रात्मा के सम्बन्ध से एक है और शरीरानुरोध से अनेक अवस्था का है । एक व्यक्ति में ये दो पदार्थ है एक तो सदैव और दूसरा प्रतिक्षण भिन्न अतः अनेक । इसी कारगा आँखि एक व्यक्ति में दो पदार्थ देख कर दो बतलाती है अर्थात् ग्रात्मा और शरीर तो अब प्राँस का ऐसा बतलाना यथार्थ और सत्य ही है । यदि श्रख ऐसा न बतलावे तो धोखा देने वाली कहलावे श्रतः ग्रांस धोखा देने वाली कदापि नहीं प्रत्युत यथार्थ और वास्तविक स्वरूपदर्श है जो कि इसका कर्तव्य है वही सदा किया करती है । प्रत्येक इन्द्रियां अपने - अपने पृथक - पृथक नियमित कार्य को ही सदा करती रहती हैं अन्य कार्य कदापि नहीं करती ग्रतः ये प्रमाण हैं । प्रतिबन्धक दोष से इन्द्रिय प्रमाण्य में त्रुटि नहीं हो सकती । चन्द्रमा के नीचे बादल या सूर्य के नीचे चन्द्रमा क् चन्द्रमा प्रकाशरहित समझे जा सकते हैं? कदापि नहीं । तव इसी प्रकार इन्द्रियों में भी समझना चाहिये । दोष सहित इन्द्रियों पर गहरे विचार करने के पश्चाद विदित होगा कि उनमें जो दोष आगया है उस दोष को बताने वाली भी तो इन्द्रियां ही हैं । जैसे पीले शंख को दर्शित करती हुई अपने में पीले दोष को ग्राँख ही तो सूचित करती है और जिह्वा चीनी को कडुवा कहती हुई कडुवे दोष को सूचित करती है । यह दोनों दोष हमारे अन्दर के पित्त के संयोग से भासित होते हैं । श्राँख के पिलास तथा जिल्ला के कडुवास के विकारी को जो कि पित्त के संयोग से हैं इन्द्रियों ने ऐसा स्पष्ट रूप से दिखलाया कि इस विकार " का हमको विश्वास होकर हमने इसका निदान कराया । इस दोष रूपी रोग की चिकित्सा कराने वाली भी ये ही तो इन्द्रियाँ हैं । तो सिद्ध है कि दोष की दशा में भी दोष को बताने वाली इन्द्रियां ही प्रमाण हैं । इसको फिर समझ कि जैसे हरे काँच में होकर आने वाला हरा प्रकाश हरे काँच का भी ज्ञान कराता है और ऐसा ज्ञान कराने में प्रमाण हैं किन्तु इससे यह नहीं पाया जाता कि सूर्य या दीपक जिससे वह प्रकाश श्राता है वे भी हरे हैं प्रत्युत यह भी पक्के तौर से कह सकते हैं कि रंग रहित किरण जिस रंग में होकर आती है उसी रंग को धारण करके उस रंग रूपी दोष के बताने में भी प्रमाण है वस अब पूर्णतया सिद्ध है कि इस प्रकार सभी इन्द्रियों में जो कुछ जिस प्रकार का ज्ञान पैदा होता है उस ज्ञान की उपलब्धि के लिये वही इन्द्रिय प्रमाण है । ३ - मनः प्रमाण्य सिद्धिसूत्र जिस प्रकार इन्द्रियों का प्रमाण होना सिद्ध है उसी प्रकार मन को प्रमाण मानना उचित है । क्योंकि प्रमाण का अर्थ है - मा - श्रन अर्थात् ज्ञान का साधन या ज्ञान उपजाने वाला । जबकि हम मन [ ४६ ]

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* ब्रह्मविज्ञान को ज्ञान का साधन देखते हैं तो अवश्य ही प्रमाण मानना पड़ेगा । यह गंभव है कि गन किसी दोप के कारण कभी - कभी भूल करे अर्थात् ठा ज्ञान पैदा करे । किन्तु फिर भी हम कहेंगे कि झूठा ज्ञान भी ज्ञान है | ज्ञान को पैदा करता हुआ मन ग्रवश्य प्रमाण होगा किन्तु उसमें झूठ का जितना सम्बन्ध है उतना दोष के सम्बन्ध के कारण हैं जैसाकि रस्सी को सर्प समझ लेना झंडा ज्ञान है किन्तु इसमें समझ लेना ज्ञान का भाग है वही मन का काम है इसमें रस्सी का साँप झूठा भाग है बह दोष का काम है । मन श्रौर दोष दोनों अपना - अपना काम करते हैं ग्रतः दूसरे के काम का ग्राक्षेप दूसरे पर नहीं किया जा सकता अर्थात् दोष के कारण जो मूंठापन ज्ञान में ग्राया है उसका प्राक्षेप मन पर नहीं हो सकता । यहाँ पर ज्ञान से हुमाय तात्पर्य उपलब्धि से है । उपलब्धि का अर्थ है पाना जो दो प्रकार का है, एक तो सत्तावान् का ज्ञान अर्थात् मौजूद का जानना और दूसरा जाने हुए की सत्ता अर्थात् मौजूद होना । इस प्रकार जिसकी उपलब्धि होवे उसको सत्य कहते हैं । वह सत्य जिससे जाना जावे उसको प्रमाण कहते हैं । तात्पर्य यह है कि जिसको हमने जैसा जाना है उसको उसी प्रकार का होना चाहिए अथवा जो जिस प्रकार का है वह उसी प्रकार का जाना जावे । सारांश यह है कि जिसका ज्ञान है उसी की सत्ता है अथवा जिसकी सत्ता है उसी का ज्ञान है । ऐसा ज्ञान कराने वाला प्रमाण कहलाता है । जैसा श्राकाश में हम चन्द्रमा को देखते हैं और वह चन्द्रमा आकाश में वास्तव में है अतः ऐसा ज्ञान उपजाने वाली आँख या किसी का वचन प्रमाण होगा किन्तु यदि ग्राकाश में हम एक साथ दस चन्द्रमा देखें तो वह ग्राँख के तिमिर रोग का दोष है और वह ग्रप्रमाण है इस प्रकार प्रमाण या अप्रमाण की व्यवस्था व्यवहार दशा की है । किन्तु पारमार्थिक दशा में ज्ञान और सत्ता ये दोनों भिन्न वस्तु नहीं हैं अतः जिसका ज्ञान हुआ है उसकी सत्ता भी हो चुकी । ग्रतएव व्यावहारिकों का यह कहना कि जिसका ज्ञान हुआ है उसकी सत्ता भी होनी चाहिए क्योंकि विना सत्ता के ज्ञान भ्रम है, मिथ्या है । ऐसा ज्ञान उपजाने वाला अप्रमाण है इत्यादि, व्यावहारिकों की भाषा स्वीकार के योग्य नहीं है क्योंकि पारमार्थिक दशा में जबकि ज्ञान और सत्ता एक है तो ज्ञान होने से ही सत्ता का होना माना जा सकता है । जितना सा अंश ज्ञान का है उतना ही ग्रंश सत्ता का साथ है । ' ग्रस्ति ' अर्थात् ' है ' यही तो ज्ञान का स्वरूप है । इस ज्ञान को उपजाता हुआ मन पारमार्थिक दशा में ग्रवश्य ही प्रमाण माना जा सकता है क्योंकि किसी भी प्रकार का ज्ञान उपजाता हुआ मन अप्रमाण कैसे हो सकता है । जबकि मन का धर्म केवल प्रकाश करना है तो प्रकाश करता हुआ मन अपना कर्तव्य कर चुका ग्रतः प्रमाण है । जबकि उस प्रकाश की दुष्टता किसी दोष के योग से है तो सिद्ध हुआ कि दोष के असंयोग दशा में यह मन ग्रवश्य विशुद्ध है और इसलिये वह ग्रपने स्वरूप से प्रमाण है । ज्ञान में जो कभी दोष का सम्बन्ध देखते हैं उस दोष के प्रवेश के कई द्वार हैं | प्रथम प्रवग्रह में इन्द्रियों के द्वार दोष का प्रवेश होना है, ग्रतः श्रवग्रह अप्रमाण माना जाता है, दूसरा ईहा में मन के द्वारा दोष का प्रवेश होना है ग्रतः ईहा ग्रप्रमाण है और तीसरा ग्रवगम में ग्रात्मा के द्वारा दोष का प्रवेश होता है ग्रतः प्रवगम अप्रमाण होता है । इन तीनों में एक भी दूषित हो तो ज्ञान ग्रसत्य हो जाता है और उसका कारण ग्रप्रमाण होता है क्योंकि अवग्रह ईहा और ग्रवगम ये तीनों ज्ञान के भाग हैं और तीनों भागों के मिलने से ज्ञान का पूरा स्वरूप बनता है अतः तीनों में से कोई भी भाग दूषित हो तो सम्पूर्ण ज्ञान ग्रवग्रह हो जाता है । [ ५० ]

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* ब्रह्मविज्ञान दूति ग्रह से ईहा निर्दोषित रहते हुए भी दूषित हो जाती है और उसी के द्वारा निर्दोषी अवगम भी दूषित हो जाता है । इस प्रकार प्रमाण ग्रप्रमाण की व्यवस्था व्यवहार दशा में मानी जाती है किन्तु परमार्थ दशा में यही सिद्धान्त है कि ज्ञान दोषयुक्त हो अथवा निर्दोष हो किन्तु जितना भाग ज्ञान का है वह प्रकाश रूप है वह कभी प्रमाण नहीं हो सकता । हरे काँच के अन्दर से आने के कारण सूर्य का प्रकाश हरा होकर भले ही दूषित हो गया हो किन्तु जो दोष हरेपन का है वह भी प्रकाश का विषय है और प्रकाश की अपेक्षा वह रंग दूमरी वस्तु हैं किन्तु उस रंग का भी प्रकाश करने वाला जो वास्तव में प्रकाश वस्तु है वह अपने रूप से सदा शुद्ध व निर्दोष है । इसीप्रकार ज्ञान को भी सर्वत्र निर्दोष समझना चाहिये । कितने ही व्यक्ति यह कहते हैं कि जो ज्ञान सामग्री बुरी न होने से अपूर्ण हो वह ग्रप्रमाण है जैसा बालक या पशु का ज्ञान । किन्तु इस पर भी विचार का स्थान है । यदि पूर्ण होने से ज्ञान ग्रप्रमाण माना जाय तो जगत् के पामर से लेकर विद्वान् तक सभी के ज्ञान प्रमाण मानने पड़ेंगे । यह निश्चित रूप से कहा जाता है कि आज तक जो कुछ जाना गया है वह बहुत ग्रंश निर्णय करने पर भी अभी तक अपूर्ण है । ग्रतः व्यवहार दशा में भी उस अपूर्ण ज्ञान को प्रमाण मानते हुए ऊपर की बात का विरोध करते हैं | यथार्थ तो यह है कि अपूर्णता में भी जितना अंश उसका प्राप्त होता है उतने प्रश के लिए उसको अवश्य प्रमाण मानना उचित है और उसकी पूर्णता के वास्ते प्रयत्न करना चाहिए न कि अपूर्ण कह कर उसको छोड़ना चाहिए । बहुत ग्रधिक जल में बहुत अल्प मधुर मिलाने से सम्भव है कि जल मीठा नहीं होगा किन्तु जितना सा मधुर उस जल में डाला गया है वह भी मधुर नहीं था ऐसा मान लेना शुल है । एक सौ गन मधुर में जिस प्रकार का मधुर है उसका एक कण भी अपने रूप में उतना ही मधुर है । इसी प्रकार इस ज्ञान में भी जितने बढ़ाये जावें उतना ही ज्ञान बढ़ेगा किन्तु सारे जगत् का ज्ञान जिस प्रकार ज्ञान है एक तुच्छ वस्तु का ज्ञान भी उसी प्रकार अपने रूप में परिपूर्ण ज्ञान है वह ज्ञान अपूर्ण कदापि हो ही नहीं सकता । श्रतः यह ज्ञान सर्वदा नित्य प्रमाण है । ज्ञान और सत्ता ये दोनों ही उपलब्धि के रूप हैं इसी उपलब्धि को धातु ' विद् ' जिसका अर्थ सत्ता, ज्ञान और प्राप्ति है- जब वस्तु की सत्ता है, श्रवश्यमेव उसका वेद सिद्ध हुग्रा और वेद सर्वदा प्रमाण होता है अतः विद्वान् वेदाः प्रमाणम् । वेद कहते हैं । वेद शब्द का ज्ञान है और प्राप्ति है तो लोगों का सिद्धान्त है कि-ऊपर कहा जा चुका है । कि प्रत्यक्ष ज्ञान के तीन भाग हैं ग्रवग्रह, ईहा और ग्रवगम । इनमें अव-ग्रह इन्द्रियों से होता है तत्पश्चात् ईहा मन के विचार को कहते हैं और अवगम ग्रात्मा में होता है - इसमें श्रात्मा के न रहने से ये तीनों ही नहीं हो सकते । अतः प्रथम आत्मा के संबंध से ज्ञान की परीक्षा की गई, तत्पश्चात् ज्ञानइन्द्रियों के द्वारा अवग्रह की परीक्षा करके मन के द्वारा ईहा की परीक्षा की गई है इस प्रकार तीनों भागों की परीक्षा करके प्रत्यक्ष ज्ञान का प्रामाण्य सिद्ध किया गया है । मनः प्रामाण्य सिद्धिसूत्र का सारांश इन्द्रियों के समान मन भी ग्रोर ग्रन = साधन | मन भी ज्ञान प्रमाण है- प्रमाण का अर्थ प्रमाण का साधन है अर्थात् प्रमा == ज्ञान उपजाने का साधन होने से प्रमाण है । कभी - कभी मन दोष के [ ५१ 1

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* ब्रह्मविज्ञान कारण कुछ का कुछ समझ लेता है यहाँ पर समझ लेना मन का मुख्य काम है और कुछ का कुछ दोप का काम है | समझ लेने के कार्य में मन कभी धोखा नहीं देता अतः दोप सहित ग्रथवा दोष रहित दोनों दशा में मन ज्ञान उपजाने में प्रमाण है । यहाँ ज्ञान उपलब्धि अर्थात् प्राप्ति का बोधक है वह पाना या प्राप्ति दो प्रकार से है - एक तो सत्ता-वान् का ज्ञान या पाना और दूसरा ज्ञान या पाई हुई की सत्ता; या होना । ऐसी उपलब्धि को सत्य कहते हैं श्रौर इसलिये प्रमाण है । सारांश यह है कि ज्ञात वस्तु की सत्ता हो श्रीर सत्तावान् का ज्ञान हो, ऐसी एकता की उपलब्धि सत्य होने से प्रमाण है । ज्ञान और सत्ता एक होने से प्रमाण और भिन्न होने से ग्रप्रमाण यह कच्ची निगाह व्यावहारिकों की है । वैज्ञानिकों की पारमार्थिक दशा ज्ञान और सत्ता की एकता है । ज्ञान होने से सत्ता भी साथ में हो चुकी, जितना श्रंश ज्ञान का है उतना ग्रंांश सत्ता का ज्ञान में जड़ से चोटी तक है । ' ग्रस्ति ' या है यह ही ज्ञान का स्वरूप है और ऐसा ज्ञान उपजाता हुआ मन पारमार्थिक दशा में प्रमाण है । ग्रव सिद्ध है कि मन किसी न किसी सत्ता को लिए हुए एक प्रकाश है । सत्ता सहित ज्ञान ही ज्ञान का स्वरूप है, सत्ता रहित ज्ञान का कोई स्वरूप नहीं ग्रतः ज्ञान सत्ता का बोधक है सत्ता चाहे कैसी ही क्यों न हो ज्ञान सत्य- सत्ता का बोध कराता है । व्यावहारिकों ने ज्ञान की सत्य सत्ता को न समझकर अन्य सत्ता कि जो ज्ञान का विषय नहीं हुआ है उसका बोध न कराने पर ज्ञान को दूषित मान लिया । वह उनकी बड़ी भारी भूल है । यह दोष जो यथार्थ विचार से निश्चित नहीं है तीन द्वारों से यह प्रवेश हो सकता है -- ग्रवग्रह, ईहा और ग्रवगम । इन तीनों में एक भी दूषित हो तो ज्ञान असत्य हो जाता है, क्योंकि ये तीनों ही ज्ञान के भाग हैं और इनके मिलने से ज्ञान का स्वरूप वनता है । इन में कोई भी भाग दूषित हो तो संपूर्ण ज्ञान दूपित हो जाता है यह प्रमाण अप्रमाण की व्यवस्था व्यवहार दशा में हैं किन्तु परमार्थ दशा में ज्ञान दोप युक्त हो या निर्दोष हो वह प्रकाश रूप होने से जो सत्ता उस पर बैठी हुई है वह सत्य है जैसे हरे काँच की किरण हरी होने पर भी वह शुद्ध और निर्मल रह कर अपने विषय हरे पन को बताती है । ज्ञान सामग्री अपूर्ण होने से ज्ञान को भी अपूर्ण मान कर ग्रप्रमाण मानना यथार्थ नहीं है । बालक या पशु का ज्ञान एक बड़े विद्वान के सामने ( ज्ञान के जाति में ) तो दृश्य है किन्तु विषयों में या मात्रा में भिन्न है । एक कण शर्करा का भू - मण्डल समस्त शर्करा से जाति में एक है किन्तु गात्रा में भिन्न है । दोनों का मिठास एक परन्तु मात्रा भिन्न है । ऐसे ही एक ज्ञान बिन्दु समस्त ज्ञान सागर की अपेक्षा प्रकाश रखने में तो परिपूर्ण है किन्तु ग्रनन्त विषय रूपी सत्तायों से तुच्छ है । अतः ज्ञान छोटा बड़ा कैसा ही हो वह सदा नित्य प्रमाण है । ज्ञान और सत्ता ये दोनों ही उपलब्धि के रूप हैं । इसी उपलब्धि को ' वेद ' कहते हैं । ' वेद ' का |, धातु ' विद् ' है जिसका अर्थ ' सत्ता, ज्ञान, प्राप्ति ' है । वस्तु की ' सत्ता, ज्ञान, प्राप्ति ' से उसका वेद सिद्ध होता है और वेद सर्वदा प्रमाण है अतः सिद्धान्त है कि ' वेदाः प्रमाणम् ' प्रत्यक्ष ज्ञान के तीन भाग हैं— अवग्रह, ईहा और अवगम । इन्द्रियजन्य ज्ञान अवग्रह है, मानसिक ज्ञान ईहा है और ग्रात्मा का माना हुआ ज्ञान अवगम है । आत्मा के न रहने से कोई ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता ग्रतः पहले ग्रात्मा के सम्बन्ध से ज्ञान की परीक्षा की गई तत् पश्चात् इन्द्रिय द्वारा ईहा ज्ञान की परीक्षा करके तीनों ज्ञान के भागों की परीक्षा करके प्रत्यक्ष ज्ञान प्रमाण सिद्ध किया गया । [ ५२ ]

पृष्ठ 85

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* ब्रह्मविज्ञान ४ – ( क ) जीवसिद्धिसूत्र जहाँ कहीं हम रहें यह जगत् हमको भासता है इस भासने को हम कहें कि कुछ नहीं भासता तो इस कहने का बल हम में नहीं है । क्योंकि यह भासना स्वतः अपने को सिद्ध करता हुआ इतना बल -शाली है कि इस की सिद्धि के लिए किसी भी दूसरे प्रमाण की आवश्यक नहीं होती किन्तु विचार यह है कि जो कुछ यह जगत् हमें भासता है उसमें जगत् का हिस्सा यदि अलग कर दिया जावे तो केवल भासना अर्थात् एक प्रकार का प्रकाश रह जाता है । उस प्रकाश का यदि मूल ढूंढे तो हमारे सिवाय और कोई उसका मूल नहीं पाया जाता है । जिस प्रकार लोक में सभी वस्तुओंों के प्रकाश का कारण ज्योति मंण्डल का मूल सूर्य है ठीक उसी प्रकार इस जगत् के भासने के प्रकाश का मूल भी कोई इस मेरे प्रकाश के केन्द्र में प्रतीत होता है वही मैं हूँ । जो युक्ति या प्रमाण प्राप्ति के द्वारा विवेचना करके किसी एक विषय का निर्धारण करता है अथवा जो विचारता हुग्रा किसी संशय में आ जाता है वही सब ज्ञान का मूलभूत कोई सत्य पदार्थ है जो ' मैं ' हूँ ' ऐसा कहकर जाना जाता है । किन्तु उस अहम् अर्थात् आत्मा का उस ज्ञानीय प्रकाश के साथ इतना घनिष्ठ संबंध है कि न ग्रहम् के बिना यह जगत कां प्रकाशन रूप ज्ञान रहता है और न इस ज्ञान के बिना वह ' अहम् ' रूप आत्मा ही रह सकता है प्रत्युत यह कह सकते हैं वह ज्ञान ही हम हैं और हम ही वह ज्ञान है जब यह ज्ञान जगत् का प्रकाश करने वाला भासता है तो मिथ्या नहीं हो सकता । अतः इसको दूसरे प्रमाण बिना ही मान लेना होगा कि वह सत्य है | इस प्रकार ज्ञान के द्वारा जिसको हमने सत्य रूप में पाया है, वही जीव आत्मा है । १ – हम देखते हैं कि कोई मनुष्य या पशु जब दूसरे मनुष्य या पशु को देखता है तो एकाएक ही उसके हृदय में तुलना करने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है और वह अपने को और उस दीखते हुए दूसरे को शीघ्रता के साथ झट तोल कर जान लेता है कि यह मेरे समान बलशाली है । अथवा कम या अधिक बलवाला है । कम वल का अन्दाज होते ही आत्मा उठने लगती है और उस पर आक्रमण करने की ठान लेती है यदि वाह्य क्रिया से आक्रमण न भी करें तो भी ग्रात्मा एक प्रकार निर्भय और स्वतन्त्रता का ग्राडम्बर अवश्य रचा बैठता है जिससे अपने में कुछ गौरव की झलक आ जाती है किन्तु जब उस दूसरी आत्मा को अपने से वलशाली पाता है तो उसकी अपनी आत्मा सहसा ही कुछ संकुचित होने लगती है यहाँ तक कि उससे दूर हटने की इच्छा प्रकट हो जाती है, अथवा यदि उस दूसरे को बल में सदृश देखता है तो अकस्मात् इस बात का विचार करने लगता है कि देखें यह मेरे साथ क्या बर्ताव करता है । बस इस प्रकार की तुलना करने में जो तराजू का काम करता है, जहाँ से यह तुलना का बल उठता है वही जीव आत्मा का असली बिन्दु अथवा केन्द्र है | २ - तात्पर्य यह है कि किसी काम को करते समय उस कार्य को देखते ही शीघ्रता से यह अन्दाज बँध जाता है कि यह काम मेरे वश अथवा काबू का है या नहीं । इस प्रकार उस कार्य की जिस बल के साथ तुलना की जाती है उस बल का मुख्य आधार ही हमारी जीवन आत्मा है । [ ५३ ]

पृष्ठ 86

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* ब्रह्मविज्ञान * ३ - प्रीर भी इस प्रकार समझना चाहिए कि जब कभी ग्रात्मा कुछ काम करने लगती है तो पहले उसमें यह विचार उठता है कि इस कार्य की करने में बन्न खर्च करने से कितना दुःख होगा और इस कार्य के होने पर कितना सुख होगा, इन दोनों दुःख और सुख को जिस पात्र में रखकर न्यूनाधिक का ग्रन्दाजा बाँधा जाता है वही हमारी जीव ग्रात्मा है । इस प्रकार क्रिया के द्वारा भी जीव ग्रात्मा पहचानी जाती है । जीवसिद्धिसूत्र का सारांश यह सव जगत् मुझको भासता है, मेरे ज्ञानरूपी प्रकाश में यह जगन भासता है । इस जगत् प्रकाश करने वाले दो प्रकाश हैं - १ - सूर्य का प्रकाश जिसका केन्द्र सूर्य है, २- मेरे ज्ञान का प्रकाश जिसके प्रकाश से सूर्य का प्रकाश भी प्रकाशित है । अतः मेरे ज्ञानप्रकाश के महामंडल का केन्द्र ' मैं ' हैं । मेरी ग्रटल ' ग्रहम् बुद्धि ' ही मेरे विश्वप्रकाशक ज्ञान का केन्द्र है । इस ग्रटल ' अहम् बुद्धि ' को ही जीव श्रात्मा के नाम से कहते हैं । वाद - विवाद के पश्चात् युक्ति अथवा प्रमाण से किसी सिद्धान्त का निर्धारण या संशय स्थित करना ज्ञान का व्यापार है । इस ज्ञान का मूलभूत जो सत्य पदार्थ है वही ' मैं ' हैं वही मेरी जीवात्मा है निर्णय या संशय निर्धारण करने पर उससे जहाँ से सत्यता आती है वही जीवात्मा है । मेरी ' ग्रहम् ' बुद्धि या ' ग्रात्मा ' का मेरे ज्ञान प्रकाश मंडल से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि न ग्रहम् बिना यह ज्ञान है और न ज्ञान बिना ग्रहम् है जैसे सूर्य बिना प्रकाश और प्रकाश बिना सूर्य असम्भव है । कह सकते हैं कि ग्रहमु ज्ञान है और ज्ञान ही ग्रहम् है । जगत् का जितना ज्ञान है वह वस्तु की सत्यता को लिये हुए प्रकाश है क्योंकि उस प्रकाश में किसी वस्तु का सत्य रूप में होता पाया जाता है । इसी सत्यता को लिये हुए प्रकाश को अथवा प्रकाश को लिये हुए सत्यता को जीव ग्रात्मा कहते हैं । यह जगत् का ज्ञान प्रकाश रूप है इसको प्रकाश करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह स्वयं प्रकाश है ग्रतः स्वयं सिद्ध होने से सत्य है । इस प्रकार ज्ञान के द्वारा ही इस ज्ञान का सत्य रूपी केन्द्र जो ' अहम् बुद्धि ' है वही जीव ग्रात्मा है यह जीव - सिद्धि ज्ञान के द्वारा हुई । सब सारांश का सारांश यह है कि मेरा विश्वप्रकाशक ज्ञान जिस से फैलता है उसी को मेरी आत्मा कहते हैं और वह मेरा ज्ञानप्रकाश ही मेरे जीने की दशा या अवस्था है अतः इसको जीबात्मा कहते हैं । मेरे सकल ज्ञान का केन्द्र ' ममत्व ' है । यही ममत्व जीवात्मा है । ज्ञान का केन्द्र जो ' मैं ' हूँ वह जीवात्मा है । सत्य - असत्य रूपी प्रकाश का जो स्रोत है वही जीवात्मा है । ' मैं ' और मेरे ज्ञान के प्रति विशालग्राकाश एकता करने वाला भी जो ज्ञानविम्व है वही जीवात्मा है । ज्ञानकेन्द्र, ज्ञानविवेक श्रीर ज्ञान एकता ही जीवात्मा है । ग्रात्मा का सत्य - स्वयं - सिद्धि वोध तो ज्ञान ही ज्ञान से होता है और यह ज्ञान तीन स्वरूपों से हुआ है । १ – जब हमको किसी जीव के बल से हमारे बल की तुलना करने का ज्ञानबल होता है तो उस बल का जो केन्द्र या बिन्दु है वही जीवात्मा है । २ – किसी काम करने की योग्यता के बल का अनुमान जिस बिन्दु से होता है वह जीवात्मा है । [ ५४ ]

पृष्ठ 87

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * ३ – जब किसी काम के करने में बल का कार्य होता है उस दुःख से अधिक सुख प्राप्ति हो तो कार्य किया जाता है वरना नहीं । इस सुख - दुःख का तुलनात्मक यन्त्र है वह जीवात्मा है । यह तो हुई ज्ञानधारक और क्रियाधारक जीवसिद्धि अब अर्थवारक जीवसिद्धि को यों समझना चाहिये: -४- - ( ख ) अर्थधारक जीवसिद्धिसूत्र इस शरीर में मुख्यतया तीन प्रकार की ग्रात्मा दीखती है १ अग्नि २ वायु और इ इन्द्र । यदि इस शरीर में से गरमी निकल जावे तो तथा श्वास बंद हो जाय प्रथवा श्रख का टिमटिमाना बंद हो जावे तो मनुष्य जी नहीं सकता । इसमें शरीर की गरमी अग्नि है उसे ' वैश्वानर ' कहते हैं और श्वास का ग्राना - जाना वायु से होता है उसे ' सूत्रात्मा ' कहते हैं और तीसरा जिससे आँख की पलक खुलती - जुड़ती है वहु ' इन्द्र ' है, इन्द्र का स्थान मस्तक है. इन्द्र की ज्योति कुछ हरे नीले रंग की भाँई देती हुई कभी-कभी ग्राँखों के पलक के अन्दर दीख ग्राती है, ज्योति के कारण हम वस्तुएं देखते हैं अर्थात् यह सब वाह्यप्रकाशगोचर है और उसीसे हमारे शरीर में चेतना है । तलवकार ऋषि कहते हैं कि यह इन्द्र वही विद्युत् है जो कभी बादल से निकलकर सम्पूर्ण ग्राकाश में दौड़ता हुग्रा दीखता है और इसी विद्युत् की क्रिया के द्वारा शरीर में हमारा मन जो वास्तव में प्राण के साथ बंधा हुआ है सर्वत्र दौड़ता हुआ भासित होता है यह इन्द्र सूर्य से प्राता है और धौलोक का पदार्थ है । किन्तु वायु अन्तरिक्ष का पदार्थ है और अग्नि पृथ्वी का पदार्थ है इस प्रकार तीनों लोक से पृथक पृथक ये तीनों रस शरीर में एकत्र होते हैं । इनका शरीर में पृथक - पृथक स्थान है । इन्द्र का प्रकाश मुख से शिर में प्रकाशित होकर सर्वाङ्ग शरीर में काम करता है वायु वक्षस्थल में रहकर सब शरीर में काम करता है और ग्रग्नि उदर में रहकर सर्वाङ्ग शरीर में कार्य करता है । इस प्रकार यद्यपि ये तीनों भिन्न - भिन्न स्थानों से ग्राकर शरीर में भिन्न स्थानों में रहकर ज्ञान, क्रिया तथा भूत या अर्थ उत्पन्न करना इत्यादि पृथक - पृथक कार्य करते हैं तथापि इन तीनों का परस्पर इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि एक के नष्ट होने से शेष दोनों भी नष्ट हो जाते हैं । अतः निस्संदेह प्रतीत होता है कि ये तीनों हीं अवश्य किसी न किसी एक सूत्र में बंधे हैं । एक के नष्ट होने पर वह सूत्र नष्ट हो जाता है जिससे तीनों की मात्रा एक साथ नष्ट हो जाती है । वही इन तीनों में तुरीय अर्थात् चौथा है | वास्तव में वही जीवात्मा है जो प्रत्यक्ष न होने पर भी प्रत्यक्ष इन तीनों पदार्थों के परस्पर मेल कराने के कारण प्रतीत होता है । इसी आत्मा में जिस प्रकार ये तीनों ग्रात्मायें तीन लोक से आकर ग्राश्रय पाती हैं उसी प्रकार चन्द्रमा से ग्राकर उसका रस मन के रूप में एक और ग्रात्मा बन-कर प्राण के साथ बँधा रहता है । तात्पर्य यह है कि शरीर में पांच ग्रात्मायें हैं किन्तु जिस प्रकार अँगुलियाँ हथेली के ग्राश्रय से मिली रहती हैं उसी प्रकार ग्रग्नि, वायु, इन्द्र और मन चारों ग्रात्मा जिसके ग्राश्रय से मिलकर शरीर में रहती हैं अथवा इन चारों का कार्य पृथक् - पृथक् होने पर जिस एक ग्रात्मा का काम कहलाता है वही ग्रात्मा जीव ग्रात्मा है और वही " मैं " हूँ । इस प्रकार प्रर्थ द्वारा श्री जीवात्मा की सिद्धि की गई है । अर्थधारक - जीवसिद्धिसूत्र का सारांश इस शरीर में ३ प्रकार की आत्मा हैं- अग्नि, वायु, सूर्य । इन से क्रमशः सर्वत्र शरीर में गर्मी, श्वास का आना - जाना और आँख का निमेष – उन्मेष होता है । इनका ग्राफ्स में ऐसा घनिष्ट संबन्ध है [ ५५ ]

पृष्ठ 88

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६ ब्रह्मविज्ञान और कि एक दूसरे के बिना नहीं रह सकता । इनको मनुष्य शरीर में वैश्वानर, नीले तं जरा रंग या की सूत्रात्मा झांई देती हुई प्राज्ञात्मा कहते हैं । इन्द्र मस्तिष्क में रहता है किन्तु इसका ज्योति कुछ हरे को देखते हैं कभी कभी आँखों की पलक के अंदर दीख ग्राती है । इसी ज्योति के कारण हम सब वस्तुओं और यह जगत् प्रकाशित हो रहा है । इस ज्योति से ही हमारे शरीर में चेतना स्थिर रहती है । तलवकार ऋपि कहते हैं क्रि कभी कभी आकाश में जो विद्युत् दौड़ती और चमकती है वह इन्द्र है । हमारा मन जो प्राणु से बँधा हुआ है इसी विद्युत् की क्रिया द्वारा सर्वत्र दौड़ता या भासित होता है यह इन्द्र सूर्य से ग्राता है और द्यौलोक का पदार्थ है । वायु अन्तरिक्ष का और अग्नि पृथिवी का पदार्थ है । तीनों इस शरीर में मस्तिष्क, हृदय और उदर स्थान में रहकर सर्वत्र शरीर में कार्य करते हैं । ज्ञान किया और ग्रर्थ उत्पन्न करना इनका कार्य है । ये तीनों आत्मायें किसी न किसी सूत्राधार पर अवलम्बित हैं । इनमें से किसी के भी नष्ट होने पर वह सूत्र ही नष्ट हो जाता है और जिसके नष्ट होने से तीनों ही नष्ट हो जाती हैं वही सूत्र इन तीनों का तुरीय ग्रर्थात् चौथा है, वास्तव में यही जीवात्मा है जो प्रत्यक्ष न होने पर भी इन ग्रात्माओंों में मेल कराने के कारण प्रतीत होता है । इसी ग्रात्मा में इन तीनों ग्रात्माओं की तरह ही चन्द्रमा का रस मन के रूप में एक ओर आत्मा वनकर बँधा रहता है । इस प्रकार ये चारों श्रात्मायें ग्रग्नि, वायु, इन्द्र और मन जिसके ग्राश्रय से हथेली में यँगुलियों के सदृश रहते हैं वही जीवात्मा है । इन चारों का कार्य पृथक् पृथक् होने पर भी जिस ग्रात्मा का एक कार्य कहलाता है वही जीवात्मा है और वही " मैं " हूँ | इस प्रकार अर्थ द्वारा भी जीवात्मा की सिद्धि को गई है । ५ - ग्रन्तर्जगत् सिद्धिसूत्र जबकि ' मैं ' हूँ इस प्रकार का भान निर्विवाद सिद्ध है तो इस भान से वेत्ता की सिद्धि से वित -और ' बेच ' इन दोनों की भी साथ ही सिद्धि हो जाती है क्योंकि वेत्ता, वित्त और वेद्य इन तीनों से त्रिपुटी बनकर एक प्रत्यय होता है जिसको ज्ञान कहते हैं । इस प्रत्ययज्ञान का एक तो उससे वित्ति प्रौर वैद्य की भी सिद्धि श्रवश्य ही माननी पड़ेगी क्योंकि वह भाग वेत्ता वेत्ता पृथक् यदि कोई सिद्ध हो गया किन्तु त्रिपुटी - प्रत्यय ज्ञान का एक अंश है । अतः वेत्ता का मत्य मानना ही त्रिपुटो ज्ञान नहीं है बिना वित्ति योर वेद्य के वह प्रत्यय जिसका वेत्ता है सिद्ध नहीं हो सकता । प्रत्यय की प्रत्यय श्रसिद्धि को में सत्य वह मानना वेत्ता है । मिद्ध नहीं हो भी सकता किन्तु वेत्ता यदि निर्विवाद सिद्ध है तो जव मानना होगा कि प्रत्यय भी सिद्ध है और प्रत्यय की सिद्धि मान ली गई तो उसके अंश त्रिपुटी होने के कारण वह भी मानना होगा कि वित्ति और वेद्य ये दोनों भी सिद्ध हो चुके। कोई कहे कि वेत्ता वित्ति और कि , वेद्य ये तीनों तीन ज्ञान हैं तो इस पर हम कहेंगें यह उनकी भूल है क्योंकि खूब ढूंढ कर देखने से भी कोई ऐसा ज्ञान नहीं दीखता कि जिसमें जानने वाला, जानना और जानी गईवस्तुयें तीनों मिले प्रत्येक ज्ञान इन तीनों में से हुए न हों अथवा इन तीनों में से एक ही हो । जवकि मिलकर बनता है तोअवश्य मानना होगा कि एक अवयव हैं । ऐसी स्थिति में जब प्रत्यय ज्ञान के ये तीनों उस एक ही प्रत्यय ' ज्ञान का एक भाग जिसको ' ग्रहम् रूप है वह यदि सत्य मान लिया वेत्ता कहते हैं और जिसका गया तो यह कब हो दो सकता है कि उसी एक प्रत्यय ज्ञान के दसरे [ ५६ ]

पृष्ठ 89

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 89 का मूल पृष्ठ
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ब्रह्मविज्ञान अवयव वित्त और वेद्य मिथ्या व्हराये जायें । बेना को सत्य कहने के लिये जबकि जरा प्रत्ययज्ञान को ही सत्य मान लेना पड़ेगा तो उसके और भी प्रवयव अर्थात् वित्ति और वैद्य सत्य हो चुके । ग्रतः हमारे इस प्रत्ययज्ञान के जिस ज्ञान में मैं अपने को सत्य रूप में पाता हूं उसी ज्ञान का विषय यह सम्पूर्ण जगत् जो मेरे ज्ञान में भासता है उसको भी सत्य कहने की मैं प्रतिज्ञा करता हूं । दूसरी बात है कि प्रत्यय ज्ञान के प्रकाश से जो प्रथम ' ग्रहम् ' अर्थात् वेता का शान हुआ है उस वेत्ता को भी हम वेद्य कह सकते हैं और वित्ति को भी वेद्य कह सकते हैं क्योंकि जो वेद्य नहीं है वह जानी ही नहीं गई गौर नहीं जानी हुई वस्तु की सत्ता ही नहीं की जा सकती । यदि वित्ति और वेत्ता वेद्य नहीं होते तो हम त्रिपुटी का भी अनुभव नहीं कर सकते, ऐसी स्थिति में जब कि तीनों ही वेय हैं तो उनमें से एक जो ग्रहम् है उसी को सत्य मानें और शेष दोनों वेद्यों को मिथ्या कहें यह कदापि संभव नहीं हो सकता । क्योंकि एक ही ज्ञान के प्रभाव से एक साथ तीनों ही बेच हुए हैं, यदि उनमें कोई भी एक सत्य है तो वैद्य होने के कारण तीनों को ही सत्य कहना होगा । यह वह प्रत्यय है कि जिसमें ' मैं ' और सम्पूगा जगत् के साथ मेरा संबंध तीनो ही शामिल हैं और वह प्रत्यय हम सब को अपने ग्राप स्वतः सिद्ध भासता है ग्रतः दूसरे प्रमाणों की अपेक्षा न रखकर उसको स्वतः प्रमाण कहते हैं श्रीर उसका कोई बाधक न होने से त्रिकाल में बाधा रहित है ग्रतः सत्य है । तात्पर्य यह हैं कि पहले सूत्र में जिस प्रकार ' अहम् ' का सत्य होना निश्चित हुया था उसी प्रकार अब हम इस संपूर्ण जगत् को भी सत्य समझते हैं । अन्तर्जगत् सिद्धिसूत्र का सारांश जगत् दो प्रकार का है - प्रन्तर्जगत् वाह्यजगत् । ग्रन्तर्जगत् वह है जो हमारे ज्ञान में चित्र होकर भासित है । इस ग्रन्तर्जगत् को सत्य सिद्ध करना है । यह दो प्रकार से सत्य सिद्ध किया जा सकता हैं - प्रत्यय के सत्य होने से और प्रत्यय का विषय होने से । प्रत्यय के सिद्ध होने से जगत् सत्य सिद्धि - जानना या ज्ञान प्रत्यय कहलाता है । इस प्रत्यय ज्ञान के तीन अवश्य हैं - जानने वाला वेत्ता, जानना वित्ति, और जानने की वस्तु अर्थात् वस्तु चित्र वेद्य कहलाते हैं । ग्रन्तर जगत् ही वेद्य कहलाता है । जीवसिद्धिसूत्र में वेत्ता को सत्य सिद्ध किया है किन्तु वेत्ता सत्य नहीं हो सकता जबतक की प्रत्यय न हो लेवे । प्रत्यय जब सत्य है तो इसके तीनों श्रवयव भी सत्य हैं । इन तीनों में से वेत्ता तो सत्य है ही किन्तु वित्ति और वेदच भी सत्य हो चुके । बस जब वेत्ता सत्य है तो वेद्य भी सत्य है । प्रत्यय का विषय वैद्य है क्योंकि वेत्ता और वित्ति भी जाने जाते हैं अतः जानने या प्रत्यय के विषय हैं । प्रत्ः वेत्ता, बित्ति और वेद्य ये तीनों ही प्रत्यय के विषय सिद्ध हो गये । किन्तु इनमें वेत्ता सत्य सिद्ध हो चुका है तो वित्ति और वेद्य भी सत्य सिद्ध हो चुके । इस प्रकार वेद्य विषय होने से सत्य है । बस इस प्रकार वेव अर्थात् अन्तर्जगत् की सत्यसिद्धि हुई । वेत्ता, वित्त और वेद्य ये जिस प्रत्ययज्ञान से होती है उसी से ६ - जीवानन्त्य सिद्धिसूत्र तीनों एक ही वेत्ता की सिद्धि होते हैं अर्थात् वेत्ता जीव की सिद्धि वेद्य जगत् की भी सिद्धि होती है ऐसा इससे पूर्व के दोनों सूत्रों में [ ५७ ]

पृष्ठ 90

ब्रह्म विज्ञान पं. मधुसूदन ओझा, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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* ब्रह्मविज्ञान * कहा गया है । उसमें वेद्य कहकर जो जगत् समझा जाता है उसमें नदी, पर्वत यादि जड़ पदार्थों को छोड़ कर कुछ ऐसे चेतन पदार्थ भी दीखते हैं जो शरीर की बनावट में धर्म और व्यवहारों में हमारे समान ही प्रतीत होते हैं । सब प्रकार समान धर्म होने पर भी हम उनमें कुछ ऐसे विरुद्ध धर्म ग्रर्थात् देश - काल आदि का भेद पाते हैं कि जिनमें हम उनको अपने से भिन्न कहते हैं । जबकि मैं जीव हूँ और मुझ में जो जीव के लक्षण हैं वे ही सब धर्म उन दूसरों में भी हम पाते हैं जिसमे उनको भी हम अवश्य जीव कह सकते हैं परन्तु ' मैं ' और ' वे ' कदापि एक नहीं हो सकते । देश, काल, शरीर आदि के भेद से हम अपने से उन सब में विभिन्नता पाते हैं ग्रतः कहना पड़ता है कि ' हम ' और ' वे ' सब भिन्न भिन्न प्रकार के अनन्त जीव हैं । सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण इस प्रकार प्रत्येक जीव ग्रात्मानों की प्रकृति में भेद पाते हैं और जन्म - मृत्यु यादि की भी भिन्नता है ग्रतः सांख्य वाले कहते हैं जीव अनन्त है । जिस प्रकार एक ब्रह्माण्ड के नियन्ता एक २ सूर्य भिन्न होकर अनन्त ब्रह्माण्ड के अनन्त सूर्य हैं उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य के ज्ञान मण्डल भिन्न हैं । प्रत्येक ज्ञान मण्डल का नियन्ता जीवात्मा भी भिन्न २ ही हैं । यदि कोई कहे कि इस प्रकार जीवात्मा की अनन्तता भी वास्तविक नहीं किन्तु प्रात्यायिक अर्थात् केवल ज्ञान मात्र से है ( ख़याली है ) । किन्तु इस पर हम कहेंगे कि इस प्रकार जीवों का ग्रनन्त रूप से भासना किस जीव के प्रत्यय का फल कहा जा सकता है क्योंकि जिस प्रकार हम अपने में सोचते हैं और अपने ज्ञान से मंत्र को अपने ज्ञान का वेद्य समझते हैं । उसी प्रकार मंत्र भी अपने श्राप को सोचता हुआ मुझको श्रपने ज्ञान का वेद्य समझता है इसी प्रकार और भी सब समझने हैं । ऐसी स्थिति में किसको, किसके खयाल को माना जाने यह निर्णय करना कठिन है । उचित यह ही है कि भिन्न जीवात्मा माना जावे । प्रत्येक जीवात्मा ग्रपने २ ज्ञान मण्डल में संपूर्ण जगत् को वे बनाते हुए सब ही जीवात्माओं को वेद्य-रूप से ग्रहण करता है । हमारा वैद्य जिस प्रकार मंत्र और अन्य सत्र है उसी प्रकार मैत्र का भी वैद्य हम और अन्य सत्र हैं और अपने २ रूप में इन वेद्यों को ग्रहण करने के कारण ये सब जीवात्मा भिन्न ता हैं । जीवानन्त्यसिद्धिसूत्रसारांश पूर्व के दोनों सूत्रों में प्रत्ययज्ञान से ही वेत्ता और वेद्य की सिद्धि हुई है । उसमें वेद्य कह कर जो अन्तर जगत् सिद्धं किया गया है उस अन्तर्जगत् में दो प्रकार के पदार्थ भासते हैं - एक तो धर्म और व्यवहार में मुझ से सदृश है किन्तु देश, काल, शरीरादि धर्मों में भिन्न हैं और दूसरे ऐसे हैं जो मुझसे धर्म व्यवहार में भी भिन्न हैं और देश, काल इत्यादि में भी तो भिन्न हैं ही । ऐसे दो प्रकार के पदार्थों में से प्रथम को चेतन या जीव कहते हैं और दूसरे को जड़ या ग्रजीव कहते हैं । मेरे वेद के विषय में जीव और जड़ है । उन जीवों में ' मैं ' भी एक जीव हूँ वैसे ही दूसरे भी मुक्त जैसे जीव हैं । वेत्ता ग्रौर वेद होने में ' मैं ' और, ' वे ' एक हैं किन्तु देश, काल, पात्र से भिन्न हैं । इस एकता से जाति स्थिर होती है और भिन्नता से व्यक्ति नियत होते हैं । ग्रतः सजाति में भिन्न २ व्यक्तियों हैं । अतः मुझ जसे जीव व्यक्तिगत अनेक या ग्रनन्त हैं । देश, काल ग्रादि से जीवों का अनन्त होना इस प्रकार सिद्ध हुआ । सांख्यदर्शन मतानुसार जीव ग्रनन्त क्योंकि सत्व, रज और तम गुणों से प्रत्येक जीव की प्रकृति में भिन्नता रहती है । इस भिन्नता से जीव अनन्त हैं और जन्म - मृत्यु आदि की भी भिन्नता से भिन्न हैं । [ ५८ ]