बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1001–1010
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
पृष्ठ 1001
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय ४ और परमात्मा की के कारण वह नहीं नात्मा स्वयंज्योति या; स्वयंज्योतिष्ट् तन्यात्मस्वरूपता । णत्वादिके समान वरूप है तो पर-एकत्व होनेपर भी Tant कैसे छोड़ कि वह नहीं दि वह स्वभावको यहाँ सुषुप्ति में है? वह चैतन्य-दूसरेको नहीं थन तो सर्वथा हविरुद्ध नहीं है, सम्भव हो हैं ।. न पश्यति न वात् । न तु पश्येत् ॥ २३ ॥
देखता; द्रष्टा की है । उस समय ३ ॥ में नहीं देखता सो यामें देखता हुआ तुम जो ऐसा ह सुषुप्ति में नहीं ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ८७ पश्यतीति जानीषे तन्न तथा । गृह्णीयाः कस्मात् १ पश्यन् वै । भवति तत्र । नन्वेवं न पश्यतीति सुषुप्ते जानीमो यतो न चक्षुर्वा मनो वा दर्शने करणं व्यापृतमस्ति । व्यापृतेषु हि दर्शनश्रवणादिषु पश्यतीति व्यवहारो भवति -णोतीति वा । न च व्यापृतानि करणानि पश्यामः; तस्मान्न । पश्यत्येवायम् । न हि किं तर्हि? पश्यन्नेव भवति, कथम्? न हि यस्माद् । द्रष्टुष्टिकर्तुर्या दृष्टिस्तस्या दृष्टे-विपरिलोपो विनाशः, स न विद्यते । यथाग्नेरौष्ण्यं यावद-ग्निभावि, तथायं चात्मा द्रष्टा-विनाशी, अतोऽविनाशित्वादा-मनो दृष्टिविनाशिनी, यावद्द्रष्टृभाविनी हि सा । देखता सो वैसा मत समझो; क्यों? क्योंकि वहाँ भी वह देखता ही रहता है । शङ्का - किंतु वह सुषुप्ति में इस प्रकार नहीं देखता – ऐसा हम जानते हैं; क्योंकि वहाँ चक्षु या मन कोई भी इन्द्रिय दर्शनमें व्यापार करनेवाली नहीं होती । दर्शन और श्रवणादि इन्द्रियोंके व्यापार करनेपर हो ' देखता है ' अथवा ' सुनता है ' ऐसा व्यवहार होता है । और वहां हम इन्द्रियोंको व्यापारयुक्त नहीं देखते; इसलिये यह नहीं ही देखता है । समाधान- न --नहीं; तो फिर क्या बात है? - यह देखता ही है, किस प्रकार? क्योंकि द्रष्टा - दर्शनक्रियाके कर्ताकी जो दृष्टि है, उस दृष्टिका जो विपरिलोप - विनाश है, वह नहीं होता । जिस प्रकार अग्निकी उष्णता अग्निकी सत्तातक रहने-वाली है, उस प्रकार यह द्रष्टा आत्मा तो अविनाशी है, अतः आत्माके अविनाशी होनेके कारण आत्माकी दृष्टि भी अविनाशिनी है - वह द्रष्टाकी स्थितितक रहने-वाली ही है ।
पृष्ठ 1002
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९ ८८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ ननु विप्रतिषिद्धमिदमभिधी- शङ्का - किंतु द्रष्टाकी वह दृष्टि यते द्रष्टुः सा दृष्टिर्न विपरिलु- और उसका लोप नहीं होता - यह है । त कथन तो परस्परविरुद्ध है । दृष्टि तो शेन प्यत इति च । दृष्टिश्च द्रष्ट्रा द्रष्टाद्वारा ही की जाती है; दृष्टिकर्ता क्रियते, दृष्टिकर्तृत्वाद्धि द्रष्टेत्यु-च्यते; क्रियमाणा च द्रष्ट्रा विपरिलुप्यत इति चाशक्यं वक्तुम् । ननु न विपरिलुप्यत इति वचनादविनाशिनी स्थात्; ` न, वचनस्य ज्ञापकत्वात् । न हि न्यायप्राप्तो विनाशः कृतकस्य चचनशतेनापि वारयितुं शक्यते; वचनस्य यथाप्राप्तार्थज्ञापकत्वात् । नैष दोषः आदित्यादिप्रकाश-कत्ववद् दर्शनोपपत्तेः; यथा श्रादित्यादयो नित्यप्रकाशस्व-भावा एव सन्तः स्वाभावि-केन नित्येनैव प्रकाशेन प्रकाशयन्ति, न ह्यप्रकाशा-स्मानः सन्तः प्रकाशं कुर्व-न्तः प्रकाशयन्तीत्युच्यन्ते कि ल होनेके कारण ही वह द्रष्टा कहा जाता है; द्रष्टा द्वारा दृष्टिको द्रष्ट जानेवाली है और उसका लोप नहीं होता यह तो कहा ही नहीं जा सकता । यदि कहो कि ' न विपरि- य लुप्यते ' इस वचनके अनुसार वह अविनाशिनी होनी ही चाहिये तो दृष्ट यह ठीक नहीं; क्योंकि वचन तो त्व केवल ज्ञापक है कृतक वस्तुका का विनाश न्यायप्राप्त है, अत: उसका त्व सैकड़ों वचनोंसे भी निवारण नहीं किया जा सकता; क्योंकि वचन तो श्रा जो वस्तु जैसी प्राप्त हुई है, उसे नि वैसी ही सूचित कर देनेवाला है । न समाधान - यह दोष नहीं है; यि क्योंकि आदित्यादिके प्रकाशकत्वके समान इसका देखना भी उपपन्न हो राज है । जिस प्रकार आदित्यादि नित्य- विं प्रकाशस्वभाव होते हुए ही अपने षेध नित्यस्वाभाविक प्रकाशसे प्रकाश न करते हैं, वे स्वयं अप्रकाशस्त्ररूप होकर उससे अपनेसे भिन्न प्रकाश एक उत्पन्न करके प्रकाशित करते हैं-- ऐसा प्रय उनके विषय में नहीं कहा जाता तो,
पृष्ठ 1003
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय४ ' द्रष्टा की वह दृष्टि है प नहीं होता - यह रविरुद्ध है । दृष्टि तो जाती है; दृष्टिकर्ता ही वह द्रष्टा कहा के द्वारा दृष्टि की उसका लोप नहीं कहा ही नहीं जा हो कि ' न विपरि नके अनुसार दह नी ही चाहिये तो क्योंकि वचन तो है कृतक वस्तुका न है, अतः उसका श्री निवारण नहीं ; क्योंकि वचन तो प्त हुई है, उसे र देनेवाला है । ह दोष नहीं है; दिके प्रकाशकत्व के ना भी उपपन्न हो बादित्यादि नित्य-हुए ही अपने प्रकाशसे प्रकाश अप्रकाशस्त्ररूप से भिन्न प्रकाश शत करते हैं-- ऐसा कहा जाता तो, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ८ ९ तर्हि? स्वभावेनैव नित्येन प्रका-शेन । तथायमध्यात्मा विपरि-लुप्तस्वभावया दृष्टया नित्यया द्रष्टेत्युच्यते । गौणं तर्हि द्रष्टृत्वम् । न, एवमेव मुख्यत्वोपपत्तेः; यदि ह्यन्यथाप्यात्मनो द्रष्टृत्वं दृष्टम्, तदास्य द्रष्टृत्वस्य गौण त्वम्, न त्वात्मनोऽन्यो दर्शनप्र-कारोऽस्ति तदेवमेव मुख्यं द्रष्टृ-त्वमुपपद्यते नान्यथा — यथा श्रादित्यादीनां प्रकाशयितृत्वं नित्येनैव स्वाभाविकेनाक्रियमाणे. न प्रकाशेन, तदेव च प्रकाश-यितृत्वं मुख्यं प्रकाशयि तृत्वान्त-रानुपपत्तेः तस्मान्न ' द्रष्टुष्टि-विपरिलुप्यते ' इति न विप्रति पेगन्धोऽप्यस्ति । ननु - अनित्य क्रियाकर्तृविषय एव तृच्प्रत्ययान्तस्य शब्दस्य प्रयोगो दृष्टः, यथा छेत्ता भेत्ता फिर क्या वात है? वे अपने स्वभावरूप नित्यप्रकाशसे प्रकाशित करते हैं । इसी प्रकार यह आत्मा भी अपनी अविनाशस्वरूपा नित्य-दृष्टि के कारण ' द्रष्टा ' ऐसा कहा जाता है । शङ्का तब तो इसका द्रष्टृत्व गौण है । समाधान- -नहीं, इसी प्रकार तो इसका मुख्यत्व सिद्ध हो सकता है । यदि आत्माका द्रष्टृत्व किसी दूसरे भी प्रकारसे देखा गया होता तो इसके द्रष्टृत्वको गौणता हो सकती थी, किंतु आत्माके दर्शनका कोई अन्य प्रकार तो है नहीं; अत: इसी प्रकार आत्माका मुख्य द्रष्टृत्व उप-पन्न हो सकता है, किसी अन्य प्रकारसे नहीं; जिस प्रकार कि आदित्यादिका प्रकाशकत्व अपने स्वरूपभूत, नित्य एवं अकृत्रिम प्रकाशके कारण है, और यही प्रकाशकत्व मुख्य भी है; क्योंकि उसका कोई अन्य प्रकाशक होना सम्भव नहीं है, अतः ' द्रष्टा की दृष्टिका सर्वथा लोप नहीं होता ' इस उक्ति में विरोधका लेश भी नहीं है । हा - किंतु वृच्प्रत्ययान्त शब्द-का प्रयोग शङ्का- तो अनित्य क्रिया के कर्ता-के विषयमें ही देखा गया है, जैसे | छेत्ता, भेत्ता, गन्ता इत्यादि, उन्होंके
पृष्ठ 1004
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय गन्तेति, तथा द्रष्टेत्यत्रापीति चेत् १ न, प्रकाशयितेति दृष्टत्वात् । भवतु प्रकाशकेष्वन्यथासम्भ-वात्, न त्वात्मनीति चेत् १ न, दृष्टविपरिलोपश्रुतेः । पश्यामि न पश्यामीत्यनुभव-दर्शनान्नेति चेत् १ न, करणव्यापारविशेषापेक्ष-. त्वात्; उद्धृतचक्षुषां च स्वप्ने आत्मदृष्टेर विपरिलोपदर्शनात 1 तस्मादविपरिलुप्तस्वभावैवात्मनो दृष्टिः, अतस्तयाविपरिलुप्तया । १. कभी नष्ट न होनेवाली । ४ ब्रा | समान द्रष्टा पदमें भी समझता चाहिये - ऐसा कहें तो? छ समाधान - ऐसी बात नहीं है, प क्योंकि [ नित्यप्रकाशस्वरूप आदि-त्यादिके विषय में ] ' प्रकाशयिता ' ऐसा प्रयोग देखा जाता है । शङ्का - प्रकाशकोंमें कोई अन्य त प्रकार न हो सकनेके कारण वहाँ भले ही ऐसा प्रयोग हो जाय, द परंतु आत्माके विषयमें तो ऐसा य नहीं हो सकता । द समाधान -- नहीं, क्योंकि यहाँ भी आत्मदृष्टिके लोप न होनेका च प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है । प शङ्का- मैं देखता हूँ, मैं नहीं क देखता - ऐसा विपरीत अनुभव देखा जाने के कारण आत्माकी दृष्टि नित्य प नहीं हो सकती - ऐसा कहें तो? चि समाधान - ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह अनुभव तो [ चक्षु ] इन्द्रियके विशेष व्यापारकी अपेक्षासे है; इसके सिवा जिनकी आँखें नष्ट हो स गयी हैं, उनकी भी स्वप्न में आत्म-प दृष्टिका अविपरिलोप. ( सद्भाव ) देखा जाता है । अतः आत्माकी दृष्टि f तो अविपरिलुप्तस्वभावा ही है, इस-लिये यह पुरुष उस अविनाशिनी क
पृष्ठ 1005
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय४ पदमें भी समझना कहें तो? - ऐसी बात नहीं है, प्रकाशस्वरूप आदि. में ] ' प्रकाशयिता ' खा जाता है । कोंमें कोई अन्य सकने के कारण वहाँ - प्रयोग हो जाय, विषयमें तो ऐसा -नहीं, क्योंकि यहाँ के लोप न होनेका वाली श्रुति है । देखता हूँ, मैं नहीं परीत अनुभव देखा आत्माकी दृष्टि नित्य - ऐसा कहें तो? ऐसी बात नहीं है, नुभव तो [ चक्षु ] व्यापार की अपेक्षा से जिनकी आँखें नष्ट हो भी स्वप्न में आत्म ब्लोप. ( सद्भाव ) अतः आत्माकी दृष्टि स्वभावा ही है, इस उस अविनाशिनी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९ १ दृष्ट्या स्वयंज्योतिःस्वभावया । पश्यन्नेव भवति सुषुप्ते । कथं तर्हि न पश्यतीति? उच्यते - न तु तदस्ति । किं तत्? द्वितीयं विषयभूतम् । किं विशिष्टम् १ ततो द्रष्टुरन्य-दन्यत्वेन विभक्तं यत् पश्येद् यदुपलभेत । यद्धि तद्विशेष-दर्शनकारणमन्तःकरणं चक्षुरूपं च, तदविद्ययान्यत्वेन प्रत्यु-पस्थापितमासीत् । तदेतस्मिन् काल एकीभूतम्, आत्मनः परेण परिष्वङ्गात् । द्रष्टुर्हि परि -च्छिन्नस्य विशेषदर्शनाय करण-मन्यत्वेन व्यवतिष्ठते । अयं तु स्वेन सर्वात्मना सम्परिष्वक्तः स्वेन परेण प्राज्ञेनात्मना प्रिययेव पुरुषः; तेन न पृथक्त्वेन व्यव -स्थितानि करणानि विषयाश्च । तदभावाद् विशेषदर्शनं नास्ति, करणादिकृतं हि तन्नात्मकृतम्; INNAN स्वयंज्योतिःस्वरूपा दृष्टिसे स्वप्नमें देखता ही रहता है । शङ्का - तो फिर ' नहीं देखता ' ऐसा क्यों कहा जाता है? समाधान - बतलाते हैं - यहां तो वह वस्तु ही नहीं है । वह कौन? दूसरी विषयभूत वस्तु । किस विशे-षण से युक्त? उस द्रष्टासे अन्य अर्थात् अन्यरूपसे विभक्त, जिसे कि वह देखे - उपलब्ध करे । क्योंकि जो उस विशेष दर्शनका कारण चक्षुरूप अन्तःकरण था, वह अविद्या के द्वारा अन्यरूपसे प्रस्तुत किया हुआ था । इस समय प्रत्यगात्माका परमात्मा के साथ आलिङ्गन होनेके कारण वह एकरूप हो गया है । परिच्छिन्न द्रष्टा के विशेष दर्शन के लिये ही इन्द्रियाँ अन्य रूप से स्थित होती हैं । किंतु इस समय, जैसे पुरुष अपनी प्रियासे आलिङ्गित होता है, उसी प्रकार यह स्वयं सर्वात्मभावसे अपने परमरूप प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित रहता है; इसलिये उस अवस्थामें इन्द्रिय और विषय पृथकरूपसे विद्यमान नहीं रहते और उनका अभाव होनेके कारण विशेषदर्शन भी नहीं होता, क्योंकि वह तो इन्द्रियादिका किया | हुआ ही होता है, आत्माका किया
पृष्ठ 1006
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ आत्मकृतमिव प्रत्यवभासते; | हुआ नहीं होता; आत्माका किया ब्रा हुआ - सा तो भासता ही है, अतः तस्मात् तत्कृतेयं भ्रान्तिरात्मनो उसीके कारण ऐसी भ्रान्ति होती है । कि आत्माकी दृष्टिका लोप होता वि दृष्टिः परिलुप्यत इति ॥ २३ ॥ । है ॥ २३ ॥ मा
यद् वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जितिन हि धातुर्घातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्- अवगन्ध द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्त यजिघेत् ॥ २४ ॥ वह
यद् वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते न हि कर होत रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु पद तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्त ं यद् रसयेत् ॥ २५ ॥ बो
यद् वै तन्न वदति वदन् वै तन्न वदति न हि वक्तु- सव वक्त ेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीय- वहउस मस्ति ततोऽन्यद् विभक्त ं यद् वदेत् ॥ २६ ॥ यद् वै तन्न श्रव
शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति न हि श्रोतुः श्रुतेर्विप- अव रिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति त- सुननह तोऽन्यद् विभक्त ' यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥ यद् वै तन्न क्य
मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरि- कर लोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततो- स्प ऽन्यद् विभक्त ं यन्मन्वीत ॥ २८ ॥ यद् वै तन्न स्पृशति अव
स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेविपरि- विज्ञ लोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततो- वहहो ऽन्यद् विभक्त ं यत् स्पृशेत् ॥ २६ ॥ यद् वैतन्न
वै तन्न बृ ०
पृष्ठ 1007
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय४ -; आत्माका किया बसता ही है, अतः ऐसी भ्रान्ति होती है दृष्टिका लोप होता जिघ्रति न त्वान्न तु तद्-येत् ॥ २४ ॥
रयते न हि नाशित्वान्न तु सयेत् ॥ २५ ॥
न हि वक्तु-त्रु तद् द्वितीय-३६ ॥ यद् वै तन्न तुः श्रुतेर्विप-तीयमस्ति त-। यद्वैन्न -तुर्मतेर्विपरि-यमस्ति ततो-तन्न स्पृशति • स्पृष्टेविपरि-यमस्ति ततो-यद्वैतन्न ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९ ३ 22 ~ Y विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातु-र्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ऽविनाशित्वान्न तु तद्वितीय-मस्ति ततोऽन्यद् विभक्त यद् विजानीयात् ॥३० ॥
वह जो नहीं सूंघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता । सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे सूंघे ॥ २४ ॥
वह जो रसास्वाद नहीं करता सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता । रसास्वाद करनेवालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे ॥ २५ ॥ वह जो नहीं
बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता । वक्ताकी वचन शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषयमें वह बोले ॥ २६ ॥
वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता । श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्था में उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने ॥ २७ ॥ वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन
नहीं करता । मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषय में वह मनन करे ॥ २८ ॥ वह जो स्पर्श नहीं
करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता । स्पर्श करनेवालेकी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे ॥ २६ ॥ वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता ।
विज्ञाताकी विज्ञाति ( विज्ञानशक्ति ) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ ३० ॥
बृ ० उ ० ६३–
पृष्ठ 1008
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९९ ४ वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ समानमन्यत्, यद् वै तन्न जि-घ्रति । यद् वै तन्न रसयते । यद् वै तन्न वदति । यद् वै तन्न शृणोति । यद् वै तन्न मनुते । यद् वै तन्न स्पृशति । यद् वै तन्न विजानातीति । मननविज्ञा-नयोः दृष्टथादिसहकारित्वेऽपि सति चक्षुरादिनिरपेक्षो भूतभवि -' यद् वै तन्न जिघ्रति ' ' यद् वै ' तन्न रसयते ' ' यद् वे तन्न वदति ' ' यद् वै तन्न शृणोति ' ' यद् वै तन्न मनुते ' ' यद् वै तन्न स्पृशति ' और ह ' यद् वै तन्न विजानाति ' इत्याद अन्य मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । मनन और विज्ञान यद्यपि दृष्टि आदिके सहकारी हैं, तथापि इनका चक्षु आदि इन्द्रियों से निरपेक्ष रह-कर भूत, भविष्यत् और वर्तमान ष्यद्वर्तमान विषयव्यापारो विद्यत । विषयसम्बन्धी व्यापार रहता ही इति पृथग्ग्रहणम् । किं पुनर्दृष्ट्यादीनाम् अग्नेरौ -ष्ण्य प्रकाशनज्वलनादिवधर्म-मेद ', होस्विदभिन्नस्यैव धर्मस्य परोपाधिनिमित्तं धर्मा-न्यत्वमिति १ अत्र केचिद् व्याचक्षते -श्रात्मवस्तुनः स्वत एवैकत्वं नानात्वं च; यथा गोर्गोद्रव्य-तयैकत्वम्, सास्नादीनां धर्माणां परस्परतो मेदः । यथा स्थूले-ष्वेकत्वं नानात्वं च, तथा निर-वयवेष्वमृर्तवस्तुष्वेकत्वं नाना-त्वं चानुमेयम् । सर्वत्रान्यमि-है, इसलिये इनका पृथक् ग्रहण वि किया गया है । प्रश्न- क्या अग्नि के धर्म उष्णता, प्रकाशन और ज्वलनादिके समान दृष्टपादि धर्मोंका भेद है, अथवा एक [ धर्मसे ] अभिन्न धर्मका ही अन्य उपाधिके कारण विभिन्न-धर्मत्व है? उत्तर- इस विषय में कोई - कोई त ऐसी व्याख्या करते हैं — आत्मवस्तु-का एकत्व और नानात्व स्वतः हो 1- है; जिस प्रकार गौका गोद्रव्यरूपसे एकस्व है और उसके सास्नादि धर्मोका परस्पर भेद है । जिस प्रकार स्थूल पदार्थोंमें एकत्व और नानात्व हैं, उसी प्रकार निरवयव f और सूक्ष्म वस्तुओंमें भी एकत्व और नानात्वका अनुमान करना चाहिये । इस नियमका सर्व १. गौके गलेकी लटकती हुई खालको सास्ना कहते हैं । गौके सास्ना, च सींग, खुर आदि धर्मोका परस्पर भेद है ।
पृष्ठ 1009
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ श्रध्याय ४ न्त जिघ्रति ' ' यद् वै “ यद् वे तन्न वदति ' णोति ' ' यद् वै तन्न तन्न स्पृशति ' और विजानाति ' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है । वज्ञान यद्यपि दृष्टि हैं, तथापि इनका योंसे निरपेक्ष रह-यत् और वर्तमान व्यापार रहता ही नका पृथक् ग्रहण नग्निके धर्म उष्णता, ज्वलनादिके समान भेद है, अथवा अभिन्न धर्मका ही कारण विभिन्न-विषय में कोई - कोई ते हैं - आत्मवस्तु-नानात्व स्वतः हो गौका गोद्रव्यरूपसे उसके सास्नादि भेद है । जिस में एकत्व और प्रकार निरवयव ओंमें भी एकत्व अनुमान करना नियमका सर्वत्र हैं । गौके सास्ना, ब्राह्मण ३ ] - शाङ्करभाष्यार्थ ९९ ५ चारदर्शनादात्मनोऽपि तद्वदेव । ष्टादीनां परस्परं नानात्वम्, ' आत्मना चैकत्वमिति । न, अन्यपरत्वात् । न हि आत्मनि दृष्टचादि- दृष्ट्यादिधर्मभेद-शक्तिभेदकल्पना- प्रदर्शनपरमिदं वा-निरसनम् इयं यद् वै तदित्या-दि । किं तर्हि १ यदि चैतन्यात्म-ज्योतिः, कथं न जानाति सुषुप्ते १ नूनमतो न चैतन्यात्म-ज्योतिः इत्येवमाशङ्काप्राप्तौ, तन्निराकरणायैतदारब्धं यद् वै तदित्यादि । यदस्य जाग्रत्स्वप्न-योश्चक्षुराद्यने कोपाधिद्वारं चैतन्या -स्मज्योतिः स्वाभाग्यमुपलक्षितं दृष्टथाद्यभिधेयव्यवहारापन्नम्, सुषुप्ते उपाधिभेदव्यापार- । निवृत्तावनुद्भास्यमानत्वादनुप-लक्ष्यमाणस्वभावमप्युपाधि-मेदेन भिन्नमिव यथाप्राप्तानु-वादेनैव विद्यमानत्वमुच्यते । अव्यभिचार देखा जाता है; अतः इसी न्यायसे आत्माकी भी दृष्टि आदिका तो परस्पर नानात्व है और आत्मदृष्टिसे एकत्व है । किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इन वाक्योंका तात्पर्य और ही है । ये ' यद् वै तत् ' इत्यादि वाक्य दृष्ट्यादि धर्मों का भेद प्रदर्शित करने-के लिये नहीं हैं । तो फिर किस लिये है? - [ बताते हैं, सुनो- ] यदि चैतन्यात्मज्योति है तो वह सुषुप्त-में क्यों नहीं जानती? अतः निश्चय ही चैतन्यात्मज्योति है नहीं; ऐसी आशङ्का प्राप्त होनेपर, उसका निराकरण करनेके लिये ही ' यद् वै तत् ' इत्यादि वाक्यका आरम्भ किया गया है । जागरित और स्वप्न अवस्थाओं में जो इसकी चैत-न्यात्मज्योति: स्वभावता चक्षु आदि अनेकों उपाधियों के द्वारा दृष्टि आदि नामके व्यवहारको प्राप्त हुई देखी गयी है, सुषुप्ति में उपाधिभेद-रूप व्यापारकी निवृत्त हो जानेपर वह अभिव्यक्त नहीं होती और इस लिये उसका स्वभाव भी उप-लक्षित नहीं होता, तो भी यथा-प्राप्त भेदका अनुवाद करते हुए उपाधिभेदसे भिन्न हुएके समान हो उसको विद्यमानता बतलायी गयी है । अतः उस अवस्थामें
पृष्ठ 1010
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
९९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद [ अध्याय 8 तत्र दृष्टादिधर्मभेदकल्पना विवक्षितार्थानभिज्ञतया । सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघन-श्रुतिविरोधाच्च; “ विज्ञानमा नन्दम् ” ( बृ ० उ ० ३।९ ।२८ ) " सत्यं ज्ञानम् " ( तै ० उ ० २ । १ । १ ) " प्रज्ञानं ब्रह्म " ( ऐ ० उ ० ३ । १ । ३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । शब्दप्रवृत्तेश्व; लौकिकी च शब्दप्रवृत्तिश्चक्षुषा रूपं विजाना- । ति, श्रोत्रेण शब्दं विजानाति रसनेनान्नस्य रसं विजानाति, इति च सर्वत्रैव च दृष्टयादिशब्दा-भिधेयानां विज्ञानशब्दवाच्यता-मेव दर्शयति शब्दप्रवृत्तिश्च प्रमाणम् । दृष्टान्तोपपत्तेश्च, यथा हि लोके स्वच्छस्वाभाव्ययुक्तः स्फ-टिकस्तन्निमित्तमेव केवलं हरि-तनीललोहित । द्युपाधि मेदसंयोगात् तदाकारत्वं भजते; न च स्व-च्यस्वाभाव्यव्यतिरेकेण हरित - । दृष्ट्यादि धर्मभेदकी कल्पना विव-क्षित अर्थको न जाननेके कारण है । ' आत्मा लवणखण्डके समान प्रज्ञानैकरसघन स्वरूप है ' ऐसा प्रति त पादन करनेवाली श्रुतिसे विरोध प्र होनेके कारण भी यह कल्पना उचित नहीं है । तथा " ब्रह्म विज्ञान प और आनन्दस्वरूप है " " ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त है " एवं " प्रज्ञान भ ब्रह्म है " इत्यादि श्रुतियोंसे विरोध होनेके कारण भी यह ठीक नहीं है । शब्दकी प्रवृत्तिसे भी [ चेतन्य- स के भेदकी कल्पना ठीक नहीं है ]; त ' नेत्रसे रूपको जानता है, श्रोत्रसे शब्दको जानता है, रसनासे अन्नके रसको जानता है ' ऐसी शब्दकी व लौकिकी प्रवृत्ति मी सर्वत्र ही दृष्टि क आदि शब्दोंके वाच्योंको विज्ञान 46 शब्दकी वाच्यता दिखलाती है और शब्दकी प्रवृत्ति भी प्रमाण ही है । इस विषय में दृष्टान्त भी बन सकता है; जिस प्रकार लोकमें श स्वच्छस्वभावयुक्त स्फटिक मणि भा हरित, नील एवं लोहितादि उपा- ख घियोंके संसर्गसे केवल उन्होंके मा कारण उनके आकार की हो जाती है; स्वतः स्फटिकके तो स्वच्छस्वरूपत्वके सिवा हरित,