बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1011–1020
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020
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[ अध्याय ४ की कल्पना विव-जानने के कारण वणखण्डकेसमान रूप है ' ऐसा प्रति-श्रुति से विरोध भी यह कल्पना तथा " ब्रह्म विज्ञान पहे " " ब्रह्म सत्य है " एवं " प्रज्ञान श्रुतियोंसे विरोध यह ठीक नहीं है । त्ति से भी | [ चैतन्य-ठीक नहीं है ]; नता है, श्रोत्रसे है, रसना अन्न हे ' ऐसी शब्दकी भी सर्वत्र ही दृष्टि वाच्योंको विज्ञान दिखलाती है और प्रमाण ही है । दृष्टान्त भी बन प्रकार लोकमें - स्फटिक मणि लोहितादि उपा-केवल उन्हींके आकारकी हो - स्फटिकके तो सिवा हरित, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९ ७ नीललोहितादिलक्षणा धर्ममेदाः स्फटिकस्य कल्पयितुं शक्यन्ते तथा चक्षुराद्युपाधिमेदसंयोगात् प्रज्ञानघनस्वभावस्यैव आत्म-ज्योतिषो दृष्टया दिशक्तिभेद उप- । लक्ष्यते; प्रज्ञानघनस्य स्वच्छ-स्वाभाव्यात् स्फटिकस्वच्छ स्वा-भाव्यवत् । स्वयंज्योतिष्ट्राचः यथा च श्रादित्यज्योतिरवभास्य भेदः संयुज्यमानं हरितनीलपीतलोहि-तादिभेदैरविभाज्यं तदाकाराभासं भवति, तथा च कृत्स्नं जगद -वभासयच्चक्षुरादीनि च तदा कारं भवति । तथा चोक्तम् — “ आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते " ( ४ । ३ । ६ ) इत्यादि । न च निरवयवेष्वनेकात्मता शक्यते कल्पयितुम्, दृष्टान्ता- । भावात् । यदप्याकाशस्य सर्वगत-त्वादिधर्मभेदः परिकल्प्यते, पर-माण्वादीनां च गन्धरसाद्यनेक-गुणत्वम्, तदपि निरूप्यमाणं परोपाधिनिमित्तमेव भवति । नील एवं लोहितादि धर्मभेदकी कल्पना की ही नहीं जा सकती, उसी प्रकार चक्षु आदि उपाधिभेद-के संयोगसे ही प्रज्ञानघनस्वरूप आत्मज्योतिके दृष्टि आदि शक्तिभेद उपलक्षित होते हैं; क्योंकि स्फटिक-की स्वच्छस्वभावताके समान प्रज्ञा-नघन भी स्वच्छस्वभाव है । स्वयंज्योति होनेके कारण भी आत्मभेद अनुपपन्न है, जिस प्रकार सूर्यका प्रकाश प्रकाश्यभेदोंसे संयुक्त होनेपर हरित, नील, पीत एवं लोहितादि भेदोंसे अभिन्न और उन्हींके आकारका भासता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् और चक्षु आदिको प्रकाशित करनेवाली चैतन्यात्मज्योति तदाकार हो जाती है । ऐसा ही कहा भी है- " सुषुप्ति -में यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता है " इत्यादि । इसके सिवा निरवयव पदार्थों में अनेकरूपताकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है | आकाशके जो सर्वगतत्वादि धर्मभेद और परमाणु आदिके जो गन्ध - रस आदि अनेक गुणयुक्त होनेकी कल्पना की जाती है, वह भी विचार करनेपर अन्य उपाधिके कारण ही है ।
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१ ९ ८ · वृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय श्राकाशस्य तावत् सर्वगतत्वं नाम न स्वतो धर्मोऽस्ति 1 । सर्वो-पाधिसंश्रयाद्धि सर्वत्र स्वेन रूपेण सस्वमपेक्ष्य सर्वगतस्वव्यवहारः । न त्वाकाशः क्वचिद् गतो वा अगतो वा स्वतः । गमनं हि नाम देशान्तरस्थस्य देशान्तरेण संयोगकारणम्, सा च क्रिया नैवाविशेषे सम्भवति एवं धर्म मेदा नैव सन्त्याकाशे । तथा परमाण्वादावपि । पर-माणुर्नाम पृथिव्या गन्धधनायाः परमसूक्ष्मोऽवयवो गन्धात्मक एव । न तस्य पुनर्गन्धवन्त्वं नाम शक्यते कन्पयितुम् ॥ अथ । तस्यैव रसादिमत्वं स्यादिति चेन्न, तत्राप्यबादिसंसर्गनिमित्त त्वात् । तस्मान्न निरवयवस्या-नेकधर्मवत्त्वे दृष्टान्तोऽस्ति । एतेन हगादिशक्ति मेदानां पृथक्चक्षुरूपादि मेदेन परिणाम- । ४ ब्रा आकाशका जो सर्वगतत्व है वह स्वत: उसका धर्मं नहीं है । सम्पूर्ण उपाधियोंका आश्रय होने के कारण ही जो उसकी स्वरूपसे सर्वत्र सत्ता है, उसकी अपेक्षासे उसके सर्वगतत्वका व्यवहार होता है । स्वतः आकाश तो कहीं गया है और न नहीं गया है, किसी देशान्तर में स्थित वस्तुके किसी य अन्य देशसे संयोग होनेका जो कारण है, उसे ही गमन कहते हैं । न वह गमनक्रिया किसी निर्विशेष वि वस्तुमें होनी सम्भव नहीं है, इस प्रकार आकाशमें धर्मभेद हैं ही नहीं । वि इसी प्रकार परमाणु आदिमें भी समझना चाहिये । गन्धघन- वि भूता पृथिवीका जो अत्यन्त सूक्ष्म द गन्धात्मक अवयव है, उसे ही पर-माणु कहते हैं । उसीके गन्धवत्त्व ( गन्धगुणयुक्त होने ) की कल्पना नहीं की जा सकती । यदि कहो कि उसीका रसादियुक्त होना तो सम्भव है ही, तो यह कथन ठीक नहीं, क्योंकि उसमें जो रसा-दिमत्त्व है, वह जलादिके संसर्गके कारण है । अतः निरवयव वस्तुके अनेक धर्मयुक्त होने में कोई दृष्टान्त नहीं है । इसीसे परमात्मामें दृष्टि आदि शक्तिभेदोंके जो चक्षु एवं रूपादि-
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[ अध्याय ४ - जो सर्वगतत्वहै, का धर्म नहीं है । का आश्रय होने के उसकी स्वरूपसे - उसकी अपेक्षासे का व्यवहार होता काश तो न कहीं नहीं गया है, किसी वस्तु किसी संयोग होनेका जो ही गमन कहते हैं । किसी निर्विशेष म्भव नहीं है, इस में धर्मभेद हैं ही परमाणु आदिमें चाहिये । गन्धघन-जो अत्यन्त सूक्ष्म व है, उसे ही पर-I उसीके गन्धवत्त्व होने ) की कल्पना सकती । यदि - रसादियुक्त होना हो, तो यह कथन क उसमें जो रसा-जलादिके संसर्गके : निरवयव वस्तु में कोई दृष्टान्त में दृष्टि आदि चक्षु एवं रूपादि-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं ९९९ भेदकल्पना परमात्मनि प्रत्युक्ता | भेदके परिणामभेदोंकी कल्पना को गयी है, उसका भी खण्डन कर ॥ २४-३० ॥ दिया गया ' ॥ २४-३० ॥ जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होने में हेतु जाग्रत्स्वप्नयोरिव यद् विजानी- / यात्तद् द्वितीयं प्रविभक्तमन्यत्वेन नास्तीत्युक्तम् । अतः सुषुप्ते न विजानाति विशेषम् । ननु यद्यस्यायमेव स्वभावः किन्निमित्तमस्य विशेषविज्ञानं स्वभाव परित्यागेन? अथ विशेष-विज्ञानमेवास्य स्वभात्रः; कस्मा-देष विशेषं न विजानातीति? उच्यते, भृणु -जागरित और स्वप्न के समान जिसे पुरुष जाने, ऐसी उससे अन्य-रूपसे विभक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है - यह बात ऊपर कही गयी । इसलिये सुषुप्ति में उसे किसी विशेष -का ज्ञान नहीं होता । शङ्का- - किंतु इसका यदि यही स्वभाव है तो अपने स्वभावको छोड़कर इसे विशेष ज्ञान होता ही क्यों है? और यदि विशेष विज्ञान ही इसका स्वभाव है तो इसे सुषुप्ति-में विशेषका ज्ञान क्यों नहीं होता? समाधान- बतलाते हैं, सुनो-यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्ये-दन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद् रसयेदन्योऽन्यद् वदेदन्यो-ऽन्यच्छृणुयादन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्यो-ऽन्यद् विजानीयात् ॥ ३१ ॥
जहाँ ( जागरित या स्वप्नावस्था में ) आत्मासे भिन्न अन्य सा - होता है वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, अन्य १. भर्तृप्रपञ्चका मत है कि परमात्मा में दृष्टि, घ्राति इत्यादि भिन्न - भिन्न शक्तियाँ हैं 1 । उनमें दृष्टिका चक्षु और रूपाकारसे परिणाम होता है तथा घ्रातिका घ्राणेन्द्रिय और गन्धाकारसे । इसी प्रकार अन्यान्य शक्तियों के भी पृथक् - पृथक् परिणाम होते है । इस कल्पनाका ' परमात्मा निरवयव और एकरस है ' इस युक्ति-से निराकरण करा दिया गया ।
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१००० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको 22 सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है ॥ ३१ ॥
यत्र यस्मिञ्जागरिते स्वप्ने वा अन्यदिव श्रात्मनो वस्त्वन्तरमि वाविद्यया प्रत्युपस्थापितं भवति, तत्र तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापिता-दन्यः अन्यमिव आत्मानं मन्य-मानः, असत्यात्मनः प्रविभक्ते वस्त्वन्तरे, असति चात्मनि । ततः प्रविभक्ते, अन्योऽन्यत् पश्येदुपलमेत् । तच्च दर्शितं स्वप्ने प्रत्यक्षतो ' घ्नन्तीव जिन-न्तीव ' इति । तथान्योऽन्यजिघ्रेद् रसवेद् वदेच्छृणुयान्मन्वीत स्पृ-शेद् विजानीयादिति ॥ ३१ ॥ ।
जहाँ - जिस जागरित या स्वप्न-में अन्य के समान अर्थात् अविद्या-द्वारा उपस्थित की हुई आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु होती है, वहाँ आत्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुके न होनेपर तथा आत्माके उससे भिन्न न होनेपर भी उस अविद्याद्वारा प्रस्तुत की हुई वस्तुसे अपनेको अन्यवत् मानता हुआ अन्य अन्यको देखता अर्थात् उप- ३ लब्ध करता है । यह बात स्वप्ना-वस्थामें ' मानो मारते हैं, मानो वशमें करते हैं ' इस अनुभवद्वारा प्रत्यक्ष दिखायी गयी है । इसी प्रकार अन्य अन्यको सूँघ सकता है, चख सकता है, बोल सकता है, सुन स्पर्श सकता है, मनन कर सकता है, कर सकता है, जान सकता है ॥ ३१ ॥
सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति यत्र पुनः साविद्या सुषुप्ते वस्त्वन्तरप्रत्युपस्थापिका शान्ता तेनान्यत्वेन अविद्याप्रविभक्तस्य वस्तुनोऽभावात् तत् केन कं पश्येजिघ्रेद् विजानीयाद् वा १ अत: -किंतु जहाँ सुषुप्तावस्था में अन्य वस्तुको प्रस्तुत करनेवाली बह अविद्या शान्त हो जाती है, वहाँ उससे भिन्न रूपसे अविद्याद्वारा विभक्त वस्तुका अभाव हो जाने के कारण वह किस इन्द्रियसे किसे देखे, सूँघे अथवा जाने? इसलिये-
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[ अध्याय४ है, अन्य अन्यको अन्य अन्यका स्पर्श जागरित या स्वप्न-न अर्थात् अविद्या-की हुई आत्मासे वस्तु होती है, भिन्न किसी अन्य नर तथा आत्माके होनेपर भी उस तुत की हुई वस्तुसे वत् मानता हुआ खता अर्थात् उप-• यह बात स्वप्ना-मारते हैं, मानो इस अनुभवद्वारा है । इसी प्रकार च सकता है, चख न सकता है, सुन कर सकता है, है, जान सकता न्त झुषुप्तावस्थायें अन्य करनेवाली वह जाती है, वहाँ पसे अविद्याद्वारा अभाव हो जाने के इन्द्रिय से किसे देखे, -? इसलिये -LIBRAR, Mate, VARANASI Jangamwadi 210..... ब्राह्मण ३ ] Acc शाङ्करभाष्यार्थ . No. १००१ सलिल एको द्रष्टाद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषो ऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है । हे सम्राट्! यह ब्रह्मलोक है - ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया । यह इस ( पुरुष ) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परम
लोक है, यह इसका परमानन्द है ।
अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥
स्वेनैव हि प्राज्ञेनात्मना स्वयंज्योतिः स्वभावेन सम्प-रिष्वक्तः समस्तः सम्प्रसन्न आप्तकाम आत्मकामः सलिल -वत्स्वच्चीभूतः सलिल इव सलिल एको द्वितीयस्याभावात् । अविद्यया हि द्वितीयः प्रविभ-ज्यते सा च शान्तात्र अत एकः । द्रष्टा दृष्टेरविपरिलुप्त-स्वादात्मज्योतिः स्वभावायाः; अद्वैतो द्रष्टव्यस्य द्वितीयस्या-भावात् । इस आनन्दकी मात्राके माश्रित ही ३२ ॥ अपने ही स्वयंज्योतिः स्वभाव प्राज्ञात्मासे सम्यक् प्रकारसे आलि-ङ्गित, अपरिच्छिन्न, सम्यक् प्रसाद-युक्त, आप्तकाम, आत्मकाम, जलके | समान. स्वच्छ, मानो जलमें [ अर्थात् जैसे जलमें प्रतिविम्बित उसका साक्षी शुद्ध जलरूप ही है वैसा ही ] एक द्रष्टा है, क्योंकि उससे भिन्न दूसरेकी सत्ता नहीं है । दूसरेका विभाग तो अविद्या-द्वारा ही होता है और वह यहाँ शान्त हो गयी है; इसलिये एक द्रष्टा है । आत्मज्योतिःस्वभावा दृष्टिका लोप न होने के कारण वह द्रष्टा है तथा अन्य द्रष्टव्यका अभाव होने के कारण वह अद्वैत है ।:
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१००२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय 8 एतदमृतमभयम् । एष ब्रह्म-लोको ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोकः । पर एवायमस्मिन् काले व्यावृत्त-कार्यकरणोपाधिभेदः स्वे श्रात्म-ज्योतिषि शान्तसर्वसम्बन्धो वर्तते, हे सम्राट! इति है हैनं जनकमनुशशास अनुशिष्टवान् याज्ञवल्क्य इति श्रुतिवचन-मेतत् । कथं वानुशशास? एषास्य विज्ञानमयस्य परमा गतिः । या-स्त्वन्या देहग्रहणलक्षणा ब्रह्मा-दिस्तम्बपर्यन्ता अविद्याकल्पि तास्ता गतयोऽतोऽपरमा अवि-द्याविषयत्वात् । इयं तु देवत्वा दिगतीनां कर्मविद्यासाध्यानां परमोत्तमा यः समस्तात्मभावः, यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छ-णोति नान्यद् विजानातीति । एषैव चपरमा सम्पत् सर्वासां सम्पदां विभूतीनामियं परमा स्वाभाविकत्वादस्याः; कृतका ह्यन्याः सम्पदः । तथैषोऽस्य परमो लोकः, येऽन्ये कर्मफलाश्रया । ब्रा / यह अमृत और अभय है । यह ब्रह्मलोक है - जहाँ ब्रह्म ही लोक है लो । ऐसा यह ब्रह्मलोक है । हे सम्राट्! इस समय अपनी देहेन्द्रियरूप उपो- स्व धिसे छूटकर सब सम्बन्धोंसे मुक्त लो हो परमात्मा ही अपनी आत्मज्यो-तिमें वर्तमान रहता है । इस प्रकार या याज्ञवल्क्यने इस जनकको अनुशा- ज सन - उपदेश किया - यह श्रुतिका वाक्य है । किस प्रकार उपदेश किया? -इस विज्ञानमयकी यह परम गति है । इससे भिन्न जो ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यंन्त शरीरग्रहणरूपा गतियां हैं वे अविद्याकल्पित हैं, अतः म अविद्याकी विषय होनेके कारण व वे अपरमा ( निकृष्ट ) हैं । किंतु यह जो सर्वात्मभाव है, वह कर्म और उपासनाद्वारा साध्य देवत्वादि म गतियोंसे परम - उत्तम है, जहाँ कि पुरुष किसी अन्यको नहीं देखता, किसी अन्यको नहीं सुनता और न किसी अन्यको जानता है । यही परम सम्पत् है, सम्पूर्ण सम्पदाओं अर्थात् विभूतियों में यह श्रेष्ठ है; क्योंकि यह स्वाभाविक है और दूसरे प्रकारकी सम्पत्तियां कृत्रिम हैं तथा यह इसका परम लोक है, दूसरे जो कर्मफल के आश्रित
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[ श्रध्याय४ और अभय है । यह ब्रह्मही लोक है क है । हे सम्राट्! देहेन्द्रियरूप उपा-ब सम्बन्धोंसे मुक्त अपनी आत्मज्यो-हता है । इस प्रकार जनकको अनुशा-या यह श्रुतिका - उपदेश किया? -की यह परम गति जो ब्रह्मासे लेकर रग्रहणरूपा गतियां कल्पित हैं, अतः न्य होनेके कारण कृष्ट ) हैं । किंतु भव है, वह कर्म साध्य देवत्वादि उत्तम है, जहाँ कि को नहीं देखता, नहीं सुनता और जानता है । नम्पत् है, सम्पूर्ण विभूतियों में यह ह स्वाभाविक है की सम्पत्तियां यह इसका परम कर्मफल के आश्रित ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १००३ लोकास्तेऽस्मादपरमाः । अयं तु । न केनचन कर्मणा मीयते, स्वाभाविकत्वात् एषोऽस्य परमो । लोकः । तथैषोऽस्य परम आनन्दः । यान्यन्यानि विषयेन्द्रियसम्बन्ध-जनितान्यानन्दजातानि तान्यपे क्ष्य एषोऽस्य परम आनन्दो नित्यत्वात् ॥ “ यो वै भूमा तत् सुखम् " ( छा ० उ ० ७।२३।१ ) इति श्रुत्यन्तरात् । यत्रान्यत् । पश्यत्यन्यद् विजानाति तदन्पं मर्त्यममुख्यं सुखम्, इदं तु तद्विपरीतम्, अत एवैषोऽस्य परम आनन्दः । एतस्यैवानन्दस्य मात्रां कला-मविद्याप्रत्युपस्थापितां विषयेन्द्रि-यसम्बन्धकालविभाव्यामन्यानि भृतान्युपजीवन्ति । कानि तानि? तत एवानन्दादविद्यया प्रविभज्य-मानस्वरूपाण्यन्यत्वेन तानि ब्रह्मणः परिकल्प्यमानान्यन्यानि सन्त्युपजीवन्ति भूतानि विषये -न्द्रियसम्पर्कद्वारेण विभाव्य-मानाम् ॥ ३२ ॥
लोक हैं, वे इससे निकृष्ट हैं । किंतु यह स्वाभाविक होने के कारण किसी भी कर्मद्वारा प्राप्त नहीं होता; अतः यह इसका परम लोक है । तथा यह इसका परम आनन्द है । दूसरे जो विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे होनेवाले आनन्द हैं, उनकी अपेक्षा यह उत्कृष्ट आनन्द है, क्योंकि यह नित्य है, जैसा कि " जो भूमा है, निश्चय वही सुख है " इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है जहाँ अन्यको देखता है, अन्यको जानता है, वह अल्प, मत्यं और अमुख्य सुख है, किंतु यह उससे विपरीत है, इसीसे यह इसका परम आनन्द है । इसी आनन्दकी अविद्याद्वारा प्रस्तुत तथा विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धके समय होनेवाली मात्रा कलाके आश्रित दूसरे जीव जीवन धारण करते हैं । वे जीव कौन हैं? जो उस आनन्दसे ही अविद्यावश विभक्त स्वरूप तथा ब्रह्मसे पृथक्-रूपसे परिकल्पित अन्य जीव हैं, वे विषय और इन्द्रियोंके सम्पर्क-द्वारा उस आनन्दकी कल्पित मात्रा-के उपजीवी होते हैं ॥ ३२ ॥
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१००४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ निष्पाप और निष्काम श्रोत्रियके सार्वभौम प्रानन्दका दिग्दर्शन यस्य परमानन्दस्य मात्रा श्रव- ब्रह्मासे लेकर मनुष्यपर्यन्त सभी जीव जिस परमानन्दकी यवा ब्रह्मादिभिर्मनुष्यपर्यन्तैर्भूतै- मात्रा -अवयवके उपजीवी हैं उस रुपजीव्यन्ते, तदानन्दमात्राद्वा- आनन्दको मात्राके द्वारा सेंधा म रेण मात्रिणं परमानन्दमधिजि - नमक के टुकड़ेसे नमकके पर्वतका व ज्ञान कराने के समान उसके मात्री वि गमयिषन्नाह, सैन्धवलवण- ( अंशी ) परमानन्दका बोध कराने- क शकलैरिव लवणशैलम् | की इच्छा से श्रुति कहती है- ह स यो मनुष्याणा राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषा- द्व मधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनु- हैं नि ष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः अ स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं नि पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्ते-ऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवा- तो नामानन्दो यश्च श्रोत्रियो ऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोक रा व आनन्दो यश्च श्रोत्रियो ऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये प शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियो ऽवृजिनोऽकामहतो ऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच स याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव 1 ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो हो,
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[ अध्याय ४ दका दिग्दर्शन मनुष्यपर्यन्त परमानन्दकी उपजीवी हैं उस के द्वारा घा नमक के पर्वतका न उसके मात्री का बोध कराने-कहती है-भवत्यन्येषा-मः स मनु-णामानन्दाः ऽथ ये शतं गन्धर्वलोक दाः स एकः भिसम्पद्यन्ते-आजानदेवा-महतोऽथ ये जापतिलोक हतोऽथ ये ब्रह्मलोक तोऽथैष एव ति होवाच ददाम्यत याज्ञवल्क्यो ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १००५ बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो मान्तेभ्य उदरौ-त्सीदिति ॥ ३३ ॥
वह जो मनुष्यों में सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है । अब जो मनुष्योंके सौ मानन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है । और जो पितृलोक-को जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है । तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है । जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान ( जन्मसिद्ध ) देवोंका एक आनन्द है और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द हे ] जो आजान देवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापतिलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ] जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ] तथा यही परम आनन्द है । हे सम्राट्! यह ब्रह्मलोक है - ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले- ] ' मैं श्रीमान्को सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें । ' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [ उत्तर देनेको ] बांध लिया ॥ ३३ ॥
स यः कश्चिन्मनुष्याणां मध्ये राद्धः संसिद्धोऽविकलः समग्रा-वयव इत्यर्थः, समृद्ध उपभोगो-पकरणसम्पन्नो भवति, किञ्चा-न्येषां समानजातीयानामधिपतिः स्वतन्त्रः पतिर्न माण्डलिकः, सर्वैः समस्तैः, मानुष्यकैरिति १. जो सम्पूर्ण भूमण्डलका मालिक हो, उसे माण्डलिक कहते हैं । मनुष्यों में जो कोई राद्ध— संसिद्ध – अविकल अर्थात् सम्पूर्ण अवयवोंसे युक्त, समृद्ध – भोग-सामग्रीसे सम्पन्न तथा अन्य सजातीय पुरुषोंका अधिपति स्वतन्त्र स्वामी होता है, मौण्डलिक नहीं; एवं सम्पूर्ण मानुष्यक ( मनुष्यसम्ब-। न्धी ) भोगोंसे – ' मानुष्यकेः ' न होकर किसी छोटेसे मण्डलका शासक
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१००६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ दिव्यभोगोपकरण निवृत्यर्थम्, मनु-ष्याणामेव यानि भोगोपकरणानि तैः सम्पन्नानामप्यतिशयेन स-म्पन्नः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम श्रानन्दः । तत्र आनन्दानन्दिनोरभेद-निर्देशान्नार्थान्तरभूतत्वमित्येतत् । परमानन्दस्यैवेयं विषय विषय्या-कारेण मात्रा प्रसृतेति ह्युक्तम् ,, " यत्र वा अन्यदिव स्यात् " इत्यादिवाक्येन । तस्माद् । युक्तोऽयम् ' परम आनन्दः ' इत्यमेदनिर्देशः । युधिष्ठिरादि-तुल्यो राजात्रोदाहरणम् । दृष्टं मनुष्यानन्दमादिं कृत्वा ' शतगुणोत्तरोत्तरक्रमेणोनीय पर-मानन्दं यत्र भेदो निवर्तते तम-इस पदका प्रयोग दिव्य भोगसामग्री-की निवृत्तिके लिये है अर्थात् जो मनुष्योंकी ही भोगसामग्रियाँ हैं, उनसे जो लोग सम्पन्न हैं, उनमें भी जो सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्यों का परम आनन्द है । U यहाँ आनन्द और आनन्दवान्-के अभेदका निर्देश किया गया है, इस लिये आनन्दी आत्मासे आनन्द कोई भिन्न पदार्थं नहीं है । विषय ल और विषयीरूपसे यह परमानन्दका ही अंश फैला हुआ है – यह बात " जहाँ कोई दूसरेके समान हो " इत्यादि वाक्यसे कही गयी है । अतः यहाँ ' यह परम आनन्द है ' ऐसी अभेदोक्ति उचित ही है । इसमें युधिष्ठिर आदिके समान राजा उदाहरण है । श्रुति अनुभवसिद्ध मानुष आनन्द- प से आरम्भ करके उसका उत्तरोत्तर क क्रमशः सौ - सौगुना उत्कर्ष दिखाते न हुए जहाँ भेदकी निवृत्ति हो जाती, उ है, उस परमानन्दको प्रदर्शित करती घिगमयति । अत्रायमानन्दः शत- है । यह आनन्द क्रमशः उत्तरोत्तर गुणोत्तरोत्तरक्रमेण वर्धमानो यत्र सौगुना बढ़ता हुआ जहाँ वृद्धिकी पराकाष्ठातक पहुँच जाता है, य वृद्धिकोष्ठामनुभवति, यत्र गणित- जहाँ अन्य दर्शन, श्रवण और ची मेदो निवर्तते, अन्यदर्शनश्रवण- मननका अभाव हो जानेके कारण