बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 991–1000
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000
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[ अध्याय 8 ठीक ही कही गयी प सब प्रकार के-है; चूँकि यहाँ इस यह रूप कामरहित, - और अभय होता - लोका अलो-स्नो स् डाल: पौल्क-नापसोऽनन्वा-दा सर्वाञ्छो-अमाता हो जाती वेद वेद हो जाते अ स, श्रमण अश्रमण पुण्यसे असम्बद्ध शोकोंको पार कर अर्थात् जनक- जन्म उसका पुत्र प्रति होता है, वह ' कर्म ' है, उस कर्मसे इस में ) यह असम्बद्ध पता - पुत्र - सम्बन्धके हित होने के कारण -ता भी अर्पिता हो प्रकार पुत्र भी जाता है - ऐसा ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं भवतीति सामर्थ्याद् गम्यते; । उभयोर्हि सम्बन्धनिमित्तं कर्म, तदयमतिक्रान्तो वर्तते; ‘ अपद्दत-पाम ' इति ( ४ | ३ | २१ ) ह्युक्तम् । तथा मातामाता, लोकाः कर्मणा जेतव्या जिताश्च - तत्कर्म-सम्बन्धाभावान्लोका अलोकाः । तथा देवाः कर्माङ्गभूताः -- तत्कम सम्बन्धात्ययाद् देवा अदेवाः । तथा वेदाः साध्यसाधनसम्बन्धा-मिघायकाः, मन्त्रलक्षणाञ्चाभि-धायकत्वेन कर्माङ्गभूताः, अधीता अध्येतव्याश्च — कर्मनिमित्तमेव सम्बध्यन्ते पुरुषेण; तत्कर्माति क्रमणादेतस्मिन् काले वेदा अन्य वेदाः सम्पद्यन्ते । न केवलं शुभकर्मसम्बन्धा-तीतः, किं तर्हि १ अशुभैरप्यत्य-न्तघोरैः कर्मभिरसम्बद्ध एवायं वर्तत इत्येतमर्थमाह — अत्र स्तेनो ९ ७७ वाक्यके सामर्थ्य से जाना जाता है, क्योंकि दोनोंहोके सम्बन्धका कारण कर्म है, उसका यह अति-क्रमण कर जाता है; क्योंकि इसके स्वरूपको ' अपहतपाप्म ' ( पाप-रहित ) ऐसा कहा गया है । इसी प्रकार माता अमाता हो जाती है । कर्मसे जीते जानेवाले तथा जीते हुए लोक, उस कर्म-सम्बन्धके न रहनेके कारण अलोक हो जाते हैं । और कर्मके अङ्गभूत देवता, उस कर्मसम्बन्धका अति-क्रमण हो जानेके कारण देव अदेव हो जाते हैं । तथा साध्यसाधन-सम्बन्धका वर्णन करनेवाले और अभिधायकरूपसे कर्मके अङ्गभूत मन्त्रात्मक वेद, वे अध्ययन किये हुए हों अथवा अध्ययन किये जाने-वाले हों, कर्मके कारण ही पुरुषसे सम्बद्ध हैं; उस कर्मका अतिक्रमण करनेके कारण इस अवस्था में वेद भी अवेद हो जाते हैं । [ उस अवस्थामें ] यह केवल शुभ कर्मके सम्बन्धसे ही परे नहीं होता, तो क्या बात है? यह अशुभ अर्थात् अत्यन्त घोर कर्मोंसे भी असम्बद्ध ही रहता है - यही बात श्रुति बतलाती है- यहाँ चोर अर्थात् वृ ० उ ० ६२-
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९ ७८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्राह्मणसुवर्णहर्ता, भ्रूणना सह पाठादवगम्यते - स तेन घोरेण कर्मणैतस्मिन् काले विनिर्मुक्तो भवति, येनायं कर्मणा महा-पातकी स्तेन उच्यते । तथा भ्रूणहा भ्रूणहा; तथा चाण्डालो न केवलं प्रत्युत्पन्ने -नैव कर्मणा विनिर्मुक्तः, किं तर्हि? सहजेनाप्यत्यन्त निकृष्ट-जातिप्रापकेणापि विनिर्मुक्त एवा यम्, चाण्डालो नाम शूद्रेण ब्राह्मण्यामुत्पन्नश्चण्डाल एव चाण्डालः, स जातिनिमित्तेन कर्मणासम्बद्धत्वादचाण्डालो भवति । पौन्कसः, पुल्क एव पौन्कसः, शूद्रेणैव क्षत्रियाया-मुत्पन्नः, सोऽप्यपौल्कसो भवति । तथा आश्रमलक्षणैश्च कर्मभिर-सम्बद्धो भवतीत्युच्यते, श्रमणः १. ‘ भ्रूणहा ’ श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला, यह बात स्तेन शब्दका भ्रूणहा के साथ पाठ होनेसे जानी जाती है, वह इस कालमें उस घोर कर्मसे मुक्त हो जाता है, जिस कर्मके कारण कि यह महापापी स्तेन ( चोर ) कहा जाता है । इसी प्रकार भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब्राह्मणकी हत्या ) करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है; तथा चाण्डाल केवल आगन्तुक कर्मसे ही मुक्त नहीं होता, तो फिर क्या - क्या होता है? वह अत्यन्त निकृष्ट जाति- व की प्राप्ति करानेवाले अपने स्वाभा-विक कर्मसे भी मुक्त हो जाता है; चाण्डाल -- शूद्रसे ब्राह्मणी में उत्पन्न हुए चण्डालको कहते हैं, वह चण्डाल ही चाण्डाल है । वह अपने जाति सम्बन्धी कर्मसे असम्बद्ध होने के कारण अचाण्डाल हो जाता है । पौल्कस - शूद्रसे क्षत्राणी में उत्पन्न हुआ पुल्कस ही पौल्कस कहलाता है; वह भी अपौल्कस हो जाता है । इसी प्रकार पुरुष आश्रमसम्बन्धी कर्मोंसे भी असम्बद्ध हो जाता है, सो बतलाते हैं - श्रमण अर्थात् जिस करनेवालेको कहते हैं, इसलिये ' स्तेन ' शब्दसे भी साधारण चोर न समझकर ब्राह्मणका सुवर्ण चुरानेवाला समझना चाहिये ।
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[ अध्याय ४ चुरानेवाला, यह भ्रूणहा के साथ जाती है, वह घोर कर्मसे मुक्त सकर्मके कारण नी स्तेन ( चोर ) भ्रूणहत्या ( श्रेष्ठ ब ) करनेवाला जाता है; तथा नागन्तुक कर्मसे ही तो फिर क्या - क्या व्यन्त निकृष्ट जाति-वाले अपने स्वाभा-मुक्त हो जाता है; ब्राह्मणी में उत्पन्न हुए हैं, वह चण्डाल वह अपने जाति असम्बद्ध होनेके ल हो जाता है । क्षत्राणीमें उत्पन्न पौल्कस कहलाता कस हो जाता है । रुष आश्रमसम्बन्धी बद्ध हो जाता है, चमण अर्थात् जिस ' हैं, इसलिये ' स्तेन ' ला समझना चाहिये । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्याथ ९ ७ ९ परिव्राट् -- यत्कर्मनिमित्तो भवति । स तेन विनिर्मुक्तत्वादश्रमणः, तथा तापसो वानप्रस्थोऽतापसः । सर्वेषां वर्णाश्रमादीनाम् उपलक्ष-गार्थमुमयोर्ग्रहणम् । किं बहुना! अनन्वागतम् -नान्वागतमनन्वगतम् असम्बद्ध -मित्येतत्, पुण्येन शास्त्रविहितेन कर्मणा, तथा पापेन विहिता । करणप्रतिषिद्धक्रियालक्षणेन; रूप-परत्वान्नपुंसकलिङ्गम्; ' अभयं रूपम् ' इति ह्यनुवर्तते । किं पुनरसम्बद्धस्वे कारणम् १ इति तद्धेतुरुच्यते - तीर्णोऽति-क्रान्तः, हि यस्मात् एवंरूपः, तदा तस्मिन् काले सर्वाञ्छो-कान् — शोकाः कामाः, इष्ट-विषयप्रार्थना हि तद्विषयवियोगे शोकत्वमापद्यते । इष्टं हि विषय । मप्राप्तं वियुक्तंचोद्दिश्य चिन्तया-नस्तद्गुणान् संतप्यते पुरुषः, अतः शोकोऽरतिः काम इति पर्यायाः । कर्मके कारण पुरुष परिव्राट् होता है, अश्रमण उससे मुक्त होनेके कारण वह हो जाता है. तथा तापस यानी वानप्रस्थ अतापस हो जाता है । इन दोनोंका ग्रहण सम्पूर्णं वर्णं और आश्रमोंके उपलक्षके लिये है । अधिक क्या, वह पुण्य अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे अनन्वागत— असम्बद्ध रहता है तथा विहितका न करना और अविहितका करनारूप पापसे भो असम्बद्ध रहता है; रूपपरक होनेके कारण अनन्वागतम् ऐसा नपुंसकलिङ्ग प्रयोग किया गया है; क्योंकि ' अभयं रूपम् ' इसकी यहाँ अनुवृत्ति की जाती है । किंतु उसको असम्बद्धतामें कारण क्या है? सो उसका हेतु बतलाया जाता है — चूँकि उस समय इस प्रकारका यह पुरुष सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है; शोक अर्थात् काम, क्योंकि इष्ट विषयकी प्रार्थना ही उस विषयका वियोग होनेपर शोकरूप हो जाती है । अप्राप्त अथवा वियुक्त हुए इष्टविषयके उद्देश्य से उसके गुणोंका चिन्तन करनेवाला पुरुष संतप्त होता है, इसलिये शोक, अरति, काम - ये पर्याय शब्द हैं ।
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९ ८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ यस्मात् सर्वकामातीतो ह्यत्रायं भवति, ' न कञ्चन कामं काम यते ' ' अतिच्छन्दा ' इति ह्युक्तम्, तत्प्रक्रियापतितोऽयं शोकशब्द: कामवचन एव भवितुमर्हति ॥ कामश्च कर्महेतुः, वक्ष्यति हि — स यथाकामो भवति तत्क्रतु-भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते ' इति । अतः सर्वकामाति -तीर्णत्वाद् युक्तमुक्तम्- ' अनन्वा गतं पुण्येन ' इत्यादि । हृदयस्य - हृदयमिति पुण्डरीका-कारो मांसपिण्डः, तत्स्थमन्तः-करणं बुद्धिर्हृदयमित्युच्यते; तास्स्थ्यात् मश्चक्रोशनवत् । हृदयस्य बुद्धेर्ये शोकाः बुद्धि-संश्रया हि ते, " कामः । संकल्पो विचिकित्सेत्यादि सर्वं मन एव " ( १ । ५ । ३ ) १. जिस प्रकार ‘ मञ्चाः क्रोशन्ति ' शब्दसे मञ्चस्थ पुरुष ग्रहण किये जाते हैं, बुद्धि ग्रहण करनी चाहिये । क्योंकि इस अवस्थामें पुरुष सम्पूर्णं कामनाओंसे पार हो जाता 4 है, कारण, ' वह किसी कामको कामना नहीं करता ', अतिच्छन्दा ( है ' ऐसा उसके विषयमें कहा गया है, इसलिये उस प्रकरणमें आया हुआ यह ' शोक ' शब्द कामका ही वाचक होना चाहिये । काम ही कर्मका कारण है; श्रुति ऐस ब कहेगी भी कि ' वह जैसी कामना -वाला होता है, वैसे संकल्पवाला स होता है, और जैसे संकल्पवाला । होता है वैसा कर्म करता है । ' च अतः समस्त कर्मोंसे अतिक्रान्त होने के कारण ' वह पुण्यसे असम्बद्ध स है ' इत्यादि कथन ठीक ही है । त ' हृदयस्य ' - हृदय f आकारवाले मांसपिण्डको कहते हैं, प उसमें स्थित अन्तःकरण अर्थात् बुद्धि हृदयस्थ होनेके कारण मञ्चके चिल्लाने के समान ' हृदय ' कही स जाती है । हृदयके अर्थात् बुद्धिके " जो शोक हैं; वे बुद्धिके ही आश्रित होते हैं; क्योंकि " काम, व | संकल्प, विचिकित्सा - ये सब ( मञ्च चिल्लाते हैं ) इस वाक्यके ' मञ्च ' उसी प्रकार यहाँ ' हृदय ' शब्दसे हृदयस्थ
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[ अध्याय ४ अवस्था में पुरुष से पार हो जाता किसी कामको ता ', अतिच्छन्दा विषय में कहा गया प्रकरण में आया शब्द कामका ही हिये । काम ही है; श्रुति ऐसा ह जैसी कामना -वैसे संकल्पवाला जैसे संकल्पवाला कर्म करता है । ' से अतिक्रान्त पुण्य से असम्बद्ध ठीक ही है । हृदय कमल पिण्डको कहते हैं, न्तःकरण अर्थात् के कारण मञ्चके न ' हृदय ' कही अर्थात् बुद्धि M बुद्धिके ही आश्रित योंकि " काम, चकित्सा ये सब इस वाक्यके ' मञ्च ' दय ' शब्दसे हृदयस्थ ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ८१ इत्युक्तत्वात् । वक्ष्यति च--" कामा येऽस्य हृदि श्रिताः " ( ४ । ४ । ७ ) इति । आत्मसंश्रयभ्रान्त्यपनोदाय हीदं वचनम्, हृदि श्रिता हृदयस्य शोका इति च हृदयकरणसम्बन्धा-तीतश्चायमस्मिन् काले “ अति-क्रामति मृत्यो रूपाणि " ( ४ । ३ । ७ ) इति ह्युक्तम् । हृदयकरण -सम्बन्धातीतत्वात्, तत्संश्रयकाम-सम्बन्धातीतो भवतीति युक्ततरं चचनम् । ये तु वादिनो हृदि श्रिताः सविशेष ( त्मवाद- कामा वासनाश्च निराकरणम् हृदयसम्बन्धिनमा स्मानमुपसृप्यो पश्लिष्यन्ति, हृदय-वियोगेऽपि च आत्मन्यवतिष्ठन्ते पुटतैलस्थ इव पुष्पादि गन्ध इत्याचक्षते, तेषां " कामः संकल्पः ” ( १।५ । ३ ) " हृदये ह्येव रूपाणि " ( ३ । ९ । २० ) " हृदयस्य शोकाः " इत्यादीनां वचनानामानर्थक्यमेव । हृदयकरणोत्पाद्यत्वादिति | चेद, न, ' हृदि श्रिताः ' इति मन ही है " ऐसा कहा गया है । तथा " जो काम इसके हृदयमें आश्रित हैं " ऐसा श्रुति कहेगी भी । ' हृदि श्रिताः ' ' हृदयस्य शोकाः ' ये वचन शोकादिके आत्माश्रयत्व-की भ्रान्तिका निराकरण करने के लिये हैं । इस सुषुप्तावस्थामें यह पुरुष हृदयरूप इन्द्रियके सम्बन्धसे परे हो जाता है, जैसा कि " यह मृत्यु के रूपोंको पार कर जाता है " इस वाक्यद्वारा कहा गया है, अतः हृदयेन्द्रियके सम्बन्धसे अतीत होने-के कारण यह हृदयाश्रित कामके सम्बन्धसे परे हो जाता है - यह कथन उचित ही है । किंतु जो [ भर्तृ प्रपञ्चादि ] मतवादी ऐसा कहते हैं कि हृदयमें स्थित काम और वासनाएँ हृदय-सम्बन्धी आत्माके पास जाकर उसका आलिङ्गन करती हैं. तथा हृदयका वियोग हो जानेपर भी पुटतेल में स्थित पुष्पादिके गन्धके समान वे आत्मामें विद्यमान रहती हैं, उनके लिये तो " कामः संकल्पः ” " हृदये ह्य ेव रूपाणि ” “ हृदयस्य शोकाः " इत्यादि वाक्योंकी व्यर्थता ही है । यदि कहो कि कामादि हृदयरूप करण से उत्पाद्य होने के कारण [ हृदय-से सम्बद्ध हैं ] तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ' हृदि श्रिताः ' ( हृदयमें स्थित )
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९ ८२ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय ४ विशेषणात् । न हि हृदयस्य करण । मात्रत्वे ' हृदि श्रिताः ' इति वचनं समञ्जसम्, ' हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि ' इति च । आत्म-विशुद्धेश्च विवक्षितत्वाद् हृच्छ्रय-णवचनं यथार्थमेव युक्तम्; ' ध्यायतीव लेलायतीव ' इति च श्रुतेरन्यर्थासम्भवात् । ' कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ' इति विशेषणादात्माश्रया अपि सन्तीति चेन्न, अनाश्रितापेक्ष-त्वात् — नात्र आश्रयान्तरमपेक्ष्य ये हृदीति विशेषणम्, कि तर्हि? ये हृद्यनाश्रिताः कामास्तानपेक्ष्य विशेषणम् । ये त्वप्ररूढा भविष्या भूताश्च प्रतिपक्षतो निवृत्तास्ते नैव हृदि श्रिताः । सम्भाव्यन्ते ऐसा विशेषण दिया गया है । यदि हृदय उनकी उत्पत्तिका करणमात्र च ही हो तो ' हृदि श्रिताः ' तथा ‘ हृदये ह्येव रूपाणि प्रतिष्ठितानि ' ये f | वचन यथार्थं नहीं हो सकते; किंतु यहाँ आत्माकी विशुद्धि विवक्षित होनेके कारण उनका हृदयाश्रयत्व बतलाना यथार्थं एवं उचित ही है, क्योंकि ' ध्यायतीव लेलायतीव ' इस श्रुतिका कोई दूसरा अर्थ होना सम्भव नहीं है । यदि कहो ' जो काम इसके हृदय में स्थित हैं ' ऐसा विशेषण देनेसे ज्ञात होता है कि कुछ काम व आत्मा आश्रित भी हैं, तो यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यह हृदय-में अनाश्रित कामोंकी अपेक्षा से है-यहाँ ' ये हृदि ' ऐसा विशेषण कामों -के किसी अन्य आश्रयकी अपेक्षासे नहीं है, तो किस कारण से है? जो काम हृदयके आश्रित नहीं हैं, उनकी अपेक्षासे यह विशेषण है । भविष्य में होनेवाले जो काम हृदय-में आरूढ नहीं हैं, तथा जो भूत-कालमें होकर विरोधके कारण निवृत्त हो गये हैं, वे हृदय में स्थित नहीं हैं । उनकी भी सम्भावना
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अध्याय ४ या गया है । यदि त्तिका करणमात्र ता ' तथा ' हृदये प्रतिष्ठितानि ये हो सकते; किंतु विशुद्धि विवक्षित का हृदयाश्रयत्व एवं उचित ही है, लेलायतीव ' इस रा अर्थ होना तो काम इसके ऐसा विशेषण है कि कुछ काम भी हैं, तो यह योंकि यह हृदय-अपेक्षा है— विशेषण कामों-की अपेक्षा से कारण से है? जो श्रित नहीं हैं, विशेषण है । जो काम हृदय-तथा जो भूत-रोधके कारण हृदय में स्थित भी सम्भावना ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ८३ च ते, अतो युक्तं तानपेक्ष्य । विशेषणम् – ये प्ररूढा वर्तमाना विषये ते सर्वे प्रमुच्यन्त इति ॥ तथापि विशेषणानर्थक्यमिति चेन्न, तेषु यत्माधिक्याद् यार्थ-त्वात् । इतरथा अश्रुतमनिष्ट च कल्पितं स्यादात्माश्रयत्वं कामानाम् । ' न कञ्चन कामं कामयते ' इति प्राप्तप्रतिषेधादात्माश्रयत्वं कामानां श्रुतमेवेति चेन्न, ' सधीः स्वप्नो भूत्वा ' इति परनिमित्तत्वात् कामाश्रयत्व-प्राप्तेः । श्रसङ्गवचनाच्च न हि कामाश्रयत्वेऽसङ्गवचनमुपपद्यते, सङ्गश्च काम इत्यवोचाम । हो सकती थी, इसलिये उनकी अपेक्षासे ऐसा विशेषण देना कि ' जो आरूढ अर्थात् विषयमें विद्य-मान हैं वे सब ही मुक्त हो जाते हैं, ' उचित ही है | यदि कहो ऐसा माननेपर भी यह विशेषण निरर्थक है तो ठीक नहीं, क्योंकि हृदयारूढ़ काम ही हे हैं, कारण कि उन्हीं की निवृत्ति-के लिये अधिक यत्नकी आवश्यकता होती है । यदि यह विशेषण न दिया गया होता तो ' कामनाएँ आत्माके आश्रित हैं ' ऐसी कल्पना होती, जिसका न तो श्रुतिमें ही प्रतिपादन हुआ है और न उसको मानना इष्ट ही है । प्रतिषेध प्राप्त वस्तु का ही होता है, अत: ' किसी कामकी कामना नहीं करता ' ऐसा प्रतिषेघ होने के कारण कामों का आत्माश्रयत्व तो श्रुतिसम्मत ही है - ऐसा यदि कहो तो ठीक नहीं, क्योंकि ' बुद्धिके सहित स्वप्न होकर ' इस वाक्यके अनुसार आत्माको कामाश्रयत्वकी प्राप्ति अन्य ( बुद्धि ) के कारण है । आत्माको असङ्ग बतलानेसे भी यही सिद्ध होता है; कामका आश्रयभूत होनेपर तो आत्माको असङ्ग कहना उचित नहीं हो सकता, सङ्ग ही काम है— ऐसा हम कह चुके हैं ।
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९ ८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ ४ ' आत्मकामः ' इति श्रुतेरात्म | यदि कहो ' आत्मकामः ' ऐसी विषयोऽस्य कामो भवतीति श्रुति होनेके कारण इसे आत्म. सि सम्बन्धी कामना तो होती ही है, चेन्न, व्यतिरिक्तकामाभावार्थ- तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यह क त्वात्तस्याः । वैशेषिकादितन्त्रन्या- श्रुति आत्मभिन्न कामका अभाव योपपन्नमात्मनः कामाद्याश्रय-स्वमिति चेन्न ' हृदि श्रिताः ' इत्यादिविशेषश्रुतिविरोधादन-पेयास्ता वैशेषिकादितन्त्रोप-पचयः श्रुतिविरोधे न्यायाभास-स्वोपगमात् । स्वयंज्योतिष्ट्रबाधनाच्च; का-मादीनां च स्वप्ने केवल दृशि -मात्रविषयत्वात् स्वयंज्योतिष्टुं सिद्धं स्थितं च बाध्येत; आत्मसमवायित्वे दृश्यत्वानुप-पत्तेः, चक्षुर्गतविशेषवत् । दृश्यमर्थान्तरभूत-मिति द्रष्टुः स्वयंज्योति बतलाने के लिये है; यदि कहो कि प आत्माका कामाश्रयत्व वैशेषिकादि शास्त्रोंकी युक्तिसे सिद्ध होता है तो ऐसा कहना भी उचित नहीं है; क क्योंकि ' हृदि श्रिताः ' इत्यादि विशेष श्रुतियोंसे विरुद्ध होनेके कारण वे | वैशेषिकादि शास्त्रोंकी उपपत्तियाँ प्र उपेक्षाके योग्य हैं; कारण, श्रुतिसे विरुद्ध होनेपर उनको न्यायाभास प्र माना गया है । ख इसके सिवा ऐसा माननेसे g आत्माका स्वयंज्योतिष्ट्र भी बाधित हो जाता है; स्वप्न में कामादि केवल साक्षीमात्रके विषय हैं, इससे जो म उसका सिद्ध एवं विद्यमान स्वयं-पि ज्योतिष्व है वह बाधित हो जायगा; क्योंकि उनका आत्मासे समवाय- ख सम्बन्ध होनेपर वे आत्माका दृश्य क नहीं हो सकेंगे, जैसे नेत्रगत द शुक्लत्व- कृष्णत्व आदि विशेष नेत्रके दृश्य नहीं होते । द्रष्टा- स का दृश्य उससे भिन्न पदार्थ होता है, इसीसे द्रष्टाका स्वयंप्रकाशत्व
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[ श्रध्य४ ' आत्मकामः ' ऐसी रण इसे आत्म. तो होती ही है, नहीं, क्योंकि यह कामका अभाव ; यदि कहो कि यत्व वैशेषिकादि सिद्ध होता है तो उचित नहीं है; T: ' इत्यादि विशेष होने के कारण वे त्रोंकी उपपत्तियाँ कारण, श्रुतिसे नको न्यायाभास ऐसा मानने से तिष्ट भी बाधित में कामादि केवल न्य हैं, इससे जो विद्यमान स्वयं-धित हो जायगा; मासे समवाय-आत्माका दृश्य जैसे नेत्रगत आदि विशेष होते । द्रष्टा-पदार्थ होता स्वयंप्रकाशत्व ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९ ८५ सिद्धम् । तद् बाधितं स्याद् यदि । कामाद्याश्रयत्वं परिकल्प्येत । सर्वशास्त्रार्थविप्रतिषेधाच्च । परस्यैकदेशकल्पनायां कामाद्या-श्रयत्वे च सर्वशास्त्रार्थजातं कुप्येत ॥ एतच्च विस्तरेण चतुर्थेऽवोचाम । महता हि प्रयत्नेन कामाद्याश्रयत्वकल्पनाः प्रतिषेद्धव्याः, आत्मनः परेणैक-त्यशास्त्रार्थसिद्धये । तत्कल्पनायां पुनः क्रियमाणायां शास्त्रार्थ एव बाधितः स्यात् । यथेच्छादीना -मात्मधर्मत्वं कल्पयन्तो वैशे-षिका नैयायिकाश्च उपनिषच्छा स्त्रार्थेन न सङ्गच्छन्ते, तथेयमपि कल्पनोपनिषच्छास्त्रार्थबाधमान्ना-दरणीया ॥ २२ ॥
सिद्ध होता है । अत: यदि आत्मामें कामादिके आश्रयत्व की कल्पना की जायगी तो वह बाधित हो जायगा । सम्पूर्ण शास्त्रोंके तात्पर्यसे विरोध होनेके कारण भी [ यह सिद्धान्त अग्राह्य है ] । जीव पर-मात्माका एक देश है तथा आत्मा कामादिका आश्रय है - ऐसा मानने-से तो सम्पूर्ण शास्त्र के तात्पर्योका व्याकोप हो जायगा । यह बात हमने ' चतुर्थ अध्यायमें विस्तारसे कही है; अतः आत्माका परमात्मा-से एकत्व है - इस शास्त्र - तात्पर्यकी सिद्धिके लिये ' आत्मा कामादिका आश्रय है ' इस कल्पनाका पूरा प्रयत्न करके विरोध करना चाहिये । पुनः इस कल्पनाके करने-पर तो शास्त्रका तात्पर्यं ही बाधित हो जायगा । जिस प्रकार इच्छादि-को आत्माका धर्म कल्पना करने-वाले वैशेषिक और न्यायमतावल-म्बियों की औपनिषद शास्त्रतात्पर्य से सङ्गति नहीं होती, उसी प्रकार औपनिषद शास्त्रार्थकी बाधिका होनेके कारण यह कल्पना भी
आदरणीय नहीं है । २२ ॥
सुषुप्ति में स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु स्त्रीपुंसयोरिवैकत्वान्न पश्यती- | शङ्का- - स्त्री और पुरुषके समान १. उपनिषद् के द्वितीय अध्यायमें ।
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९ ८६ वृहदारण्यकोपनिषद [ अध्याय ४ ..त्युक्तम्, स्वयंज्योतिरिति च ॥ स्वयंज्योतिष्टुं नाम चैतन्यात्म-ब्रि स्वभावता । यदि ह्रीं श्रग्न्युष्ण-त्वादिवच्चैतन्यशत्मस्वभाव आत्मा स कथमेकत्वेऽपि हि स्वभावं जह्यात्, न जानीयात्? अथ न जहाति, कथमिह सुषुप्ते न पश्यति १ विप्रतिषिद्धमेतत् — चैतन्यमात्मस्वभावो न जानाति चेति । न विप्रतिषिद्धम्, उभयमप्येत-दुपपद्यत एव । कथम् — यद् वै तन्न पश्यति सुषुप्ति में जीव और परमात्मा ब्राह की N एकता हो जानेके कारण वह नहीं पर देखता तथा आत्मा स्वयंज्योति है — यह कहा गया; स्वयंज्योतिष्ट्र- गृह का अर्थ है चैतन्यात्मस्वरूपता । भव यदि अग्नि के उष्णत्वादिके समान आत्मा चैतन्यस्वरूप है तो पर-मात्मा के साथ एकत्व होनेपर भी जा वह अपने स्वभावको कैसे छोड़ देता है, जिससे कि वह नहीं वा जानता? और यदि वह स्वभावको व्य नहीं छोड़ता तो यहाँ सुषुप्तिर्मे देखता क्यों नहीं है? वह चेतन्य-स्वरूप है और दूसरेको नहीं णो जानता - यह कथन तो सर्वथा विरुद्ध है । करा समाधान- यह विरुद्ध नहीं है, ये दोनों बातें भी सम्भव हो हैं ।. पश किस प्रकार -पश्यन् वै तन्न पश्यति न भव हि द्रष्टु टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु द्रष तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्त यत् पश्येत् ॥ २३ ॥ चि
वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता; द्रष्टा की वि दृष्टिका कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है । उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे ॥ २३ ॥
यद् वै सुषुप्ते तन्न पश्यति वि वह जो सुषुप्तिमें नहीं देखता सो पश्यन् वै तत्, तत्र पश्यन्नेव न निश्चय उस अवस्थामें देखता हुआ त्म पश्यति । यत् तत्र सुषुते ही नहीं देखता । तुम जो ऐसा य न जानते हो कि वह सुषुप्तिमें नहीं