बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 101–110

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110

पृष्ठ 101

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- अध्याय १ ारण, उसकी कती है । कहना ठीक अर्थके ज्ञानसे सम्भव है; खा जाता है । विरुद्ध अर्थका अभीष्ट प्राप्त बचता है । ऐसा नहीं हां भी श्रुतिके अर्थके ज्ञानसे सम्भव है, । इसके सिवा न करनेवाली विज्ञानके कोई प्रमाण स विज्ञानका नहीं करती । प्ति दिखायी ता मानते ही रीत माननेमें जाती है । विपरीत-है, जैसे पुरुष-शत्रुको मित्र अनर्थको प्राप्त । यदि श्रुति ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ श्वरदेवतादीनामपि श्रयथार्था । नामेव चेद् ग्रहणं श्रुतितः, अनर्थ -प्राप्त्यर्थं शास्त्रमिति ध्रुवं प्राप्नु-याल्लोकवदेव, न चैतदिष्टम्; तस्माद्यथाभूतानेव आत्मेश्वर-देवतादीन् ग्राहयत्युपासनार्थं शास्त्रम् । नामादौ ब्रह्मदृष्टिदर्शनादयुक्त-मिति चेत्स्फुटं नामादेरब्रह्मत्वम्, तत्र ब्रह्मदृष्टिं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टि विपरीतां ग्राहयच्छास्त्रं दृश्यते I । तस्माद्यथार्थमेव शास्त्रतः प्रतिपत्तेः श्रेयः इत्ययुक्तमिति चेत् १ न, प्रतिमावद्भेदप्रतिपत्तेः । ना-मादाब्रह्मणि ब्रह्मदृष्टिं विपरीतां ग्राहयति शास्त्रं स्थाण्वादाविव पुरुषदृष्टिम्, इति नैतत्साध्ववोचः । कस्मात् १ भेदेन हि ब्रह्मणो ना-मादिवस्तुप्रतिपन्नस्य नामादौ नामादौ विधीयते ब्रह्मदृष्टिः प्रतिमादाविव विष्णुदृष्टिः । आलम्बनत्वेन हि ९ ५ आत्मा, ईश्वर और देवतादिका भी अयथार्थरूपसे ही ग्रहण होता तब तो लोककी तरह शास्त्र भी अनर्थंप्राप्तिके ही लिये है- ऐसी आपत्ति अवश्य हो सकती थीं । परंतु यह इष्ट नहीं है; अतः शास्त्र उपासनाके लिये यथार्थ आत्मा, ईश्वर और देवतादि-को ही ग्रहण कराता है । शङ्का - नामादिमें ब्रह्मदृष्टि देखी जानेके कारण तुम्हारा कथन ठीक नहीं है । नामादिका अब्रह्मत्वं स्पष्ट ही है । उनमें स्थाणु आदिमें पुरुष-दृष्टिके समान शास्त्र विपरीत ब्रह्म-दृष्टिका ग्रहण कराता देखा जाता है । अतः शास्त्रसे यथार्थ ज्ञान होनेके कारण ही श्रेयकी प्राप्ति होती है - ऐसा कहना ठीक नहीं । समाधान — ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रतिमाके समान उनका ब्रह्मसे भेदज्ञान रहता है । स्थाणु आदिमें पुरुषदृष्टिके समान शास्त्र नामादि अब्रह्ममें विपरीत ब्रह्मदृष्टि-का ग्रहण करता है — यह तुमने ठीक नहीं कहा । क्यों? क्योंकि जिसे ब्रह्मसे नामादि वस्तुका भेदरूपसे ज्ञान है उसीके लिये प्रतिमादिमें विष्णुदृष्टिके समान नामादिमें ब्रह्म-

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९ ६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ नामादिप्रतिपत्तिःप्रतिमादिवदेव, । न तु नामाद्येव ब्रह्मेति । यथा स्थाणावनिर्शाते न स्थाणुरिति, पुरुष एवायमिति प्रतिपद्यते त्रिप-रीतम्, न तु तथा नामादौ ब्रह्म-दृष्टिर्विपरीता । ब्रह्मदृष्टिरेव केवला नास्ति ब्रह्मेति चेत् । एतेन प्रतिमाब्राह्म-णादिषु विष्ण्वादिदेवपित्रादि-दृष्टीनां तुल्यता । न; ऋगादिषु पृथिव्यादि-दृष्टिदर्शनात् । विद्यमान पृथिव्या-दिवस्तुदृष्टीनामेव ऋगादिविषये क्षेपदर्शनात् । तस्मात्तत्सामान्या-नामादिषु ब्रह्मादिदृष्टीनां विद्य-मानब्रह्मादिविषयत्वसिद्धिः । एतेन प्रतिमाब्राह्मणादिषु विष्ण्वादिदेव पित्रादिबुद्धीनां च सत्यवस्तुविषयत्वसिद्धिः । मुख्या-पेत्तत्वाच्च गौणत्वस्य । पञ्चाग्न्या-ब्राह्म दृष्टिका विधान किया जाता है । AVA प्रतिमादिके समान नामादिका ज्ञान दिषु भी ब्रह्मके आलम्बनरूपसे ही होता मुख्य है, नामादि ही ब्रह्म है, ऐसा ज्ञान ब्रह्मत नहीं होता । जिस प्रकार स्थारणुका ज्ञान न होनेपर ' यह स्थाणु नहीं सद्भ है, पुरुष ही है ' ऐसा विपरीत ज्ञान वि होता है, नामादिमें वैसी विपरीत बुद्ध्युत ब्रह्मदृष्टि नहीं होती । ज्ञानवा क्रियाथ पूर्वपची — किंतु इससे ‘ केवल सामान ब्रह्मदृष्टिही होती है, वस्तुतः ब्रह्म कर्तव्य है नहीं ' यही बात सिद्ध होती है । प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु इत्येत आदि देव और पितृ आदि दृष्टियां विषयं भी इसीके समान हैं । सिद्धान्ती —— ऐसा कहना ठीक ज्ञादय नहीं, क्योंकि ऋगादिमें पृथिवी आदि दिवस्त दृष्टि देखी जाती है अर्थात् ऋगादि विषयोंमें पृथिवी आदि विद्यमान याद्यती वस्तुविषयक दृष्टियोंका ही आरोप देखा गया है । अतः उनसे समानता वेदवाक होनेके कारण नामादिमें जो ब्रह्मादि-दृष्टि हैं उनकी विद्यमान ब्रह्मादि- कत्वात्त विषयता सिद्ध होती है । न च इससे प्रतिमा और ब्राह्मणादिमें विष्णु आदि देवदृष्टि और पित्रादि बुद्धयुत दृष्टियोंका भी सत्यवस्तुविषयक होना १. सिद्ध होता है, क्योंकि गौणता तो ' यवर्यजेत मुख्यकी अपेक्षासे होती है । जिस बृ ०

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[ अध्याय १ जाता है । मादिक ज्ञान रूपसे ही होता है, ऐसा ज्ञान कार स्थाणुका - स्थाणु नहीं विपरीत ज्ञान. सी विपरीत इससे ' केवल - वस्तुतः ब्रह्म सद्ध होती है । दिमें विष्णु आदि दृष्टियां कहना ठीक में पृथिवी आदि अर्थात् ऋगादि दि विद्यमान काही आरोप उनसे समानता में जो ब्रह्मादि-मान ब्रह्मादि-है । ब्राह्मणादिमें और पित्रादि तुविषयक होना कि गौणता तो है । जिस ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ दिषु चाग्नित्वादेर्गौणत्वाद् मुख्याग्न्यादिसद्भाववन्नामादिषु ब्रह्मत्वस्य गौणत्वान्मुख्यब्रह्म-सद्भावोपपत्तिः । क्रियार्थैश्चाविशेषाद्विद्यार्थानाम् बुद्ध्युत्पादकत्वे यथा च दर्शपौर्ण-ज्ञानवाक्यानां मासादिक्रियेदम्फ-क्रियार्थ वाक्यैः सामान्यम् ला विशिष्टेति-कर्तव्यताका एवंक्रमप्रयुक्ताङ्गा च इत्येतदलौकिकं वस्तु प्रत्यक्षाद्य-विषयं तथाभूतं च वेदवाक्यैरेव ज्ञायते । तथा, परमात्मेश्वरदेवता-दिवस्तु अस्थूलादिधर्मकमशना-याद्यतीतं चेत्येवमादिविशिष्टमिति वेदवाक्यैरेव ज्ञाप्यते, इत्यलौकि-कत्वात्तथाभूतमेव भवितुमर्हतीति । न च क्रियार्थैर्वाक्यैर्ज्ञानवाक्यानां बुद्धयुत्पादकत्वे विशेषोऽस्ति ॥ ९ ७ | प्रकार पञ्चाग्नि आदिमें अग्नित्वकी गौणता होनेसे मुख्याग्नि आदिका सद्भाव सिद्ध होता है उसी प्रकार नामादिमें ब्रह्मत्वकी गौणता होनेसे मुख्य ब्रह्मकी सत्ता सिद्ध होती है । इसके सिवा ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंकी कर्मपरक वाक्योंसे समा-नता होनेके कारण भी [ यही सिद्ध होता है ] । जिस प्रकार दर्शपौर्णं-मासादि क्रिया इस फलवाली है, [ अमुक - अमुक प्रकारसे ] विशिष्ट इतिकर्तव्यता वाली है और इस प्रकारके क्रमसे उसके अङ्गोंका प्रयोग होना चाहिये – ये सब अलौ-किक बातें, जो प्रत्यक्षादि प्रमाणकी विषय नहीं हैं किंतु यथार्थ हैं, वेद-वाक्योंसे ही जनायी जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मा, ईश्वर एवं देव-तादि पदार्थं स्थूलत्वादि धर्मोसे रहित एवं क्षुधादिसे अतीत हैं तथा इस प्रकारके गुणोंसे विशिष्ट हैं — ये बातें वेदवाक्योंसे ही जानी जा सकती हैं । अतः अलौकिक होनेके कारण वे सत्य ही होनी चाहिये । इसके सिवा क्रियार्थवाक्योंसे ज्ञानसम्बन्धी वाक्योंका बुद्धि उत्पन्न करने में कोई भेद भी नहीं १. करणके सहायकरूपसे अपेक्षित कार्यं ' इतिकर्तव्यता ' कहलाते हैं, जैसे ' ययैर्यजेत् ' इस यव - यागमें करणभूत ' यव ' का प्रोक्षण आदि कार्य ' इतिकर्तव्यता ' है । बृ ० उ०७-

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९ ८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ ब्राह न चानिश्चिता विपर्यस्ता वा । है । उनसे परमात्मादि वस्तुविषयक परमात्मादिवस्तुविषया बुद्धिरु त्पद्यते । अनुष्ठेयाभावादयुक्तमिति चेत् ज्ञानवाक्यानां क्रियाथैव क्यैित्र्यंशा क्रियार्थं वाक्यै - भावनानुष्ठेया ज्ञा-रसमानत्व- प्यतेऽलौकिक्यपि । शङ्कनम् न तथा परमात्मेश्वरादिविज्ञाने -ऽनुष्ठेयं किञ्चिदस्ति । अतः क्रियार्थैः साधर्म्यमित्ययुक्तमिति चैत १ 15 न, ज्ञानस्य तथाभूतार्थविषयत्वात् । तस्य परिहारः न ह्यनुष्ठेयस्य त्र्यंशस्य भावनाख्यस्यानुष्ठेय-त्वात्तथात्वम्, किं तर्हि? प्रमाण-समधिगतत्वात् । न च तद्विष-याया बुद्धेरनुष्ठेयविषयत्वा-तथार्थत्वम्, किं तर्हि १ वेदवाक्य-जनि अनिश्चित या विपरीत बुद्धि उत्पन्न नहीं होती । गत पूर्व ० - ज्ञानपरक वाक्योंद्वारा नुष्ठ कोई अनुष्ठेयकर्म नहीं होता, इस-लिये उन्हें क्रियार्थवाक्योंके समान नो कहना अनुचित है । क्रियार्थंवाक्योंसे तिष्ठ अलौकिक होनेपर भी [ फल, साधन तथा इतिकर्तव्यतारूपसे ] तीन ' अंशोंवाली भावना अनुष्ठेयरूपसे अनन बतलायी जाती है । परमात्मा एवं ज्ज्ञान ईश्वरादि - विज्ञान में वैसा कोई नामा शङ्कन अनुष्ठेय कर्म नहीं होता । अतः पद्यत विज्ञानवाक्योंकी जो क्रियार्थवाक्यों-से सधर्मता बतलायी गयी है वह ताद ठीक नहीं है । तत्रा - सिद्धान्ती - ऐसा कहना ठीक भर्चा नहीं, क्योंकि ज्ञान यथार्थं वस्तु- नति विषयक होता है । त्र्यंश ( तीन पदश अंशवाली ) भावनासंज्ञक अनुष्ठेय कर्मकी, अनुष्ठेय होनेके कारण, ' कुय दिति कारणसे है? श्रुतिप्रमाणद्वारा ज्ञात मन्य होनेके कारण । इसी प्रकार रमेश्व परमात्मविषयक बुद्धिकी यथार्थता भी अनुष्ठेयवस्तुविषयक होनेसे नहीं पदाथ है, तो फिर किस कारण से है? त्वम् १. उन तीन अंशोंका स्वरूप यह है— ( १ ) क्या भावना करे? न ( २ ) किसके द्वारा भावना करे? ( ३ ) किस प्रकार भावना करे? -

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[ अध्याय १ द वस्तुविषयक बुद्धि वाक्योंद्वारा हीं होता, इस-क्योंके समान क्रियार्थं वाक्योंसे [ फल, साधन रूपसे । तीन ' अनुष्ठेयरूपसे परमात्मा एवं वैसा कोई होता । अतः क्रियार्थवाक्यों-गयी है वह T कहना ठीक यथार्थ वस्तु-त्र्यंश ( तीन संज्ञक अनुष्ठेय होनेके कारण, तो फिर किस माणद्वारा ज्ञात इसी प्रकार द्धिकी वयक होनेसे नहीं कारण से है? भावना करे? रे?.. ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९ जनितत्वादेव । वेदवाक्याधि - । वेदवाक्यजनित होनेसे ही उसकी गतस्य वस्तुनस्तथात्वे यथार्थता है । वेदवाक्यद्वारा ज्ञात सत्य - वस्तुके यथार्थं सिद्ध होनेपर यदि नुष्ठेयत्वविशिष्टं चेदनुतिष्ठति । नो चेदनुष्ठेयत्वविशिष्टं नानु-तिष्ठति । अननुष्ठेयत्वे वाक्यप्रमाणत्वा-अननुष्ठेयत्वा- नुपपत्तिरिति चेत् । नामानर्थक्या- ज्ज्ञानवाक्या- न ह्यनुष्ठेयेऽसति शङ्कनम् पदानां संहतिरुप पद्यते । अनुष्ठेयत्वे तु सति तादर्थ्येन पदानि संहन्यन्ते । तत्रानुष्ठेयनिष्ठं वाक्यं प्रमाणं भवति इदमनेनैवं कर्तव्यमिति । नं त्विदमनेनैवमित्येवं प्रकाराणां पदशतानामपि वाक्यत्वमस्ति ' कुर्यात्क्रियेत कर्तव्यं भवेत्स्या दिति पञ्चमम् ' इत्येवमादीना-मन्यतमेऽसति । अतः परमा-रमेश्वरादीनामवाक्यप्रमाणत्वम्, पदार्थत्वे च प्रमाणान्तरविषय-त्वम् । श्रतोऽसदेतदिति चेत् १ न, ' अस्ति मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः ' वह अनुष्ठेयत्वविशिष्ट होती है तो पुरुष उसका अनुष्ठान करता है और यदि अनुष्ठेयत्वविशिष्ट नहीं होती तो उसका अनुष्ठान नहीं करता । पूर्व - किंतु अनुष्ठेयत्व न होने-पर तो वह वाक्यप्रमाणका विषय ही नहीं हो सकता । अनुष्ठेय न होनेपर पदोंका संहत होना ही सम्भव नहीं है ॥ अनुष्ठेयत्व होनेपर ही उसे प्रकाशित करनेके लिये पदोंका मेल होता है । ' इसे यह इस प्रकार करना चाहिये ' इस प्रकार अनुष्ठेयपरक वाक्य ही प्रमाण होता है । ' कुर्यात्, क्रियेत, कर्तव्यम्, भवेत्, स्यात् ' ये पाँच विधि - बोधक क्रियापद हैं । ऐसे क्रियापदोंमेंसे किसीके भी न होनेपर तो ' इसे यह इस प्रकार ' ऐसे सैकड़ों पदोंके मिलनेपर भी उनमें वाक्यत्व नहीं आ सकता । अतः परमात्मा एवं ईश्वरादि वाक्य-प्रमाणके विषय नहीं हो सकते । यदि वे पदार्थ हैं तो किसी अन्य प्रमाणके विषय होंगे । अतः [ वे शास्त्रप्रमाणजनित हैं ] यह मानना ठीक नहीं ॥ सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है,

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१०० बृहदारण्यकोपनिषद्. [ अध्याय १ इत्येवमाद्यननुष्ठेये- । तस्य परिहारः ऽपिवाक्यदर्शनात् । न च ' मेरुर्वर्णचतुष्टयोपेतः ' । इत्येवमादिवाक्यश्रवणे मेर्वादाव-नुष्ठेयत्वबुद्धिरुत्पद्यते । तथा अस्तिपदसहितानां परमात्मेश्व-रादिप्रतिपादकवाक्यपदानां विशेषणविशेष्यभावेन संहतिः वार्यते । मेर्वादिज्ञानवत्परमात्मज्ञाने प्रयोजनाभावादयुक्तमिति चेत्? न, " ब्रह्मविदाप्नोति परम् " ( तै ० ज्ञानवाक्यानां उ ० २ । १ । १ ) निष्प्रयोजनत्व- “ भिद्यते हृदयग्रन्थिः ' परिहारः ( मु ० उ ० २ । २ । ८ ) इति फलश्रवणात्, संसार-बीजाविद्यादिदोषनिवृत्तिदर्शना च्च । अनन्यशेषत्वाच्च तज्ज्ञान-ब्रा क्योंकि ' मेरु चार वर्णोंसे युक्त है ' इत्यादिमें अनुष्ठेय न होनेपर भी स्य वाक्य देखा जाता है । ' मेरु चार वर्णोंसे युक्त है ' इत्यादि वाक्य सुन- नुप नेसे मेरु आदिमें अनुष्ठेयत्वबुद्धि भी उत्पन्न नहीं होती । इसी प्रकार वेद परमात्मा और ईश्वरका प्रतिपादन करनेवाले ' अस्ति ' पदयुक्त वाक्योंके सः पदोंकी विशेष्यविशेषणभावसे होने-बाली संहतिको भी कौन रोक क्रि सकता है? स्ति पूर्व ० - किंतु मेरु आदिके ज्ञानके समान परमात्माके ज्ञान से तो कोई परम प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, इसलिये ऐसा मानना व्यर्थ है । क्षुध सिद्धान्ती - ऐसा कहना ठीक अभ नहीं, क्योंकि परमात्मज्ञानका तो कल " ब्रह्मवेत्ता परम पद प्राप्त कर लेता है " " उसकी हृदयग्रन्थि टूट जाती मदो है " इत्यादि फल सुना गया है तथा तद्वि उससे संसारके बीजभूत अविद्यादि दोषकी निवृत्ति भी होती देखी गयी है । परमात्माका ज्ञान किसी अन्य पेयज्ञ कर्मका शेष भी नहीं है; इसलिये न पर्णमयीत्वाधिकरणकी ] ' जुहूके विपरी १. क्योंकि जिस प्रकार ' जुहू ' को अन्य कर्मका शेषत्व प्राप्त करानेवाला ' यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति ' इत्यादि प्रमाण मिलता है, वैसा भोज ब्रह्मज्ञानको ' यह किसी अनुष्ठानका अङ्ग है ' - इस प्रकार अन्यशेषत्व प्राप्त कराने-वाला कोई प्रमाण नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतिको अर्थवाद नहीं कहा जा सकता ।

पृष्ठ 107

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अध्याय १ से युक्त है ' होनेपर भी | ' मैरु चार द वाक्य सुन-यत्वबुद्धि भी इसी प्रकार का प्रतिपादन युक्त वाक्योंके भावसे होने-कौन रोक आदि ज्ञान के नसे तो कोई ता, इसलिये 1 कहना ठीक मज्ञानका तो नाप्त कर लेता थं टूट जाती गया है तथा त अविद्यादि ती देखी गयी न किसी अन्य है; इसलिये की ] ' जुहके रानेवाला ' यस्य नलता है, वैसा प्राप्त कराने-हा जा सकता । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१ स्य, जुह्वामिव फलश्रुतेरर्थवादत्वा-नुपपत्तिः । प्रतिषिद्धानिष्टफलसम्बन्धश्व वेदादेव विज्ञायते । न चानुष्ठेयः सः । नच प्रतिषिद्धविषये प्रवृत्त-क्रियस्य करणादन्यदनुष्ठेयम-स्ति । अकर्तव्यताज्ञाननिष्ठतेव हि परमार्थतः प्रतिषेधविधीनां स्यात् । क्षुधार्तस्य प्रतिषेधज्ञान संस्कृतस्य अभक्ष्येऽभोज्ये वा प्रत्युपस्थिते कलज्जाभिशस्तान्नादौ ' इदं भदय-मदो भोज्यम् ' इति वा ज्ञानमुत्पन्नम्, तद्विषयया प्रतिषेधज्ञानस्मृत्या बाध्यते । मृगतृष्णिकायामिव पेयज्ञानं तद्विषययाथात्म्यविज्ञा-नेन । तस्मिन्बाधिते स्वाभाविक -विपरीतज्ञानेऽनर्थकरी तद्भक्षण-भोजनप्रवृत्तिर्न भवति । विपरीत- । | विषयमें जिस प्रकार फलश्रुति अर्थं-वाद है उस प्रकार उसके अर्थवाद होने की भी सम्भावना नहीं है । इसके सिवा प्रतिषिद्ध कर्मानु-ष्ठानसे अनिष्ट फलका सम्बन्ध होना भी वेदसे ही जाना जाता है और वह ( प्रतिषिद्ध कर्म ) अनुष्ठेय भी नहीं होता; तथा जो पुरुष क्रियामें प्रवृत्त है उसके लिये प्रतिषिद्ध विषय. के न करनेसे ही दूसरे प्रकारका कर्म अनुष्ठेय नहीं हो जाता; क्योंकि वस्तुतः प्रतिषिद्धसम्बन्धी विधियोंका तात्पर्यं उनकी अकत्तंव्यताका ज्ञान कराने में ही है । यदि प्रतिषेधज्ञानके संस्कारसे युक्त किसी क्षुधार्त्तं पुरुषके सामने अभक्ष्य और अभोज्य कलञ्ज ' या अभिशस्त अन्न उपस्थित हो तो उसे जो ' यह भक्ष्य है, यह भोज्य है ' ऐसा ज्ञान उत्पन्न होगा । वह उसकी भोजनसम्बन्धिनी प्रतिषेध-ज्ञानस्मृतिसे बाधित हो जायगा, जिस प्रकार कि मृगतृष्णाके स्वरूप-का ज्ञान होनेपर उसमें पेयबुद्धि नहीं रहती । उस स्वाभाविक विप-रीत ज्ञानके वाघित हो जानेपर उसके भक्षण या भोजन में अनर्थं-कारिणी प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्रवृत्ति तो विपरीतज्ञानजनित थी १. मांस । २. ब्रह्महत्यादि पापसे दूषित पुरुषका अन्न ।......... LIBRARY. Jangamwadi Math, VARANASI, Acc. No........

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१०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ज्ञाननिमित्तायाः प्रवृत्तेर्निवृत्तिरेव । न पुनर्यत्वः कार्यस्तदभावे । तस्मात् प्रतिषेधविधीनां वस्तुयाथात्म्य-ज्ञाननिष्ठतैव, न पुरुषव्यापार-निष्ठतागन्धोऽप्यस्ति । तथेहापि परमात्मादियाथात्म्य-ज्ञानविधीनां तावन्मात्र पर्यवसान-तैव स्यात् । तथा तद्विज्ञानसंस्कृत -स्य तद्विपरीतार्थज्ञाननिमित्तानां प्रवृत्तीनामनर्थार्थत्वेन ज्ञायमान -त्वात् परमात्मादियाथात्म्यज्ञान -स्मृत्या स्वाभाविके तन्निमित्त-विज्ञाने बाधितेऽभावः स्यात् । ननु कलञ्जादिभक्षणादेरन-र्थार्थत्ववस्तुयाथात्म्यज्ञानस्मृत्या स्वाभाविके तद्भक्ष्यत्वादिविषय-विपरीतज्ञाने निवर्तिते तद्भक्षणा-द्यनर्थप्रवृत्यभाववदप्रतिषेधविष -यत्वाच्छास्त्रविहितप्रवृत्यभावो न युक्त इति चेत् । josmagast ब्राह 2 अतः उसकी निवृत्ति हो M है, उसके अभाव के लिये उसे फिर कोई यत्न नहीं करना पड़ता । अतः प्रतिषेधविधियोंका वस्तुके यथार्थं भत स्वरूपका ज्ञान कराने में ही तात्पयं नि है, उनमें पुरुषकी व्यापारनिष्ठताकी गन्ध भी नहीं है । यथ नाम इसी प्रकार यहाँ भी परमा-त्मादिके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली याथ विधियों का तात्पर्य केवल उतनेही में fai है । तथा उसके ज्ञानके संस्कारसे युक्त पुरुषको उससे विपरीत पदार्थों- नि के ज्ञानकी निमित्तभूता प्रवृत्तियोंकी तुल अनर्थार्थकताका ज्ञान हो जानेसे विप | परमात्मादिके स्वरूपज्ञानकी स्मृति-से स्वाभाविक प्रवृत्तिविषयक ज्ञान- एव | के बाधित हो जानेसे प्रवृत्तिका भाव ही हो जाता है । केव पूर्व ० – किंतु कलञ्जभक्षणादि अनर्थार्थंक वस्तुओंके स्वरूपज्ञानकी अन स्मृतिसे उनके भक्ष्यत्वादिविषयक युक्त स्वभावसिद्ध विपरीत ज्ञानके निवृत्त हो जानेपर जैसे उनके भक्षणादिकी अनर्थमयी प्रवृत्तिका अभाव हो न जाता है वैसे ही शास्त्रविहित प्रवृ- विहि त्तिका अभाव होना तो उचित नहीं है, क्योंकि वह प्रतिषेधका विषय. दोष नहीं है ।

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अध्याय १ व्ही हो जाती लिये उसे फिर पड़ता । अतः स्तु यथार्थ में ही तात्पर्य रनिष्ठताकी = भी परमा-करानेवाली चल उतनेही में संस्कार परीत पदार्थों-प्रवृत्तियों की हो जा ज्ञानकी स्मृति -विषयक ज्ञान-से प्रवृत्तिका है । कलञ्जभक्षणादि स्वरूपज्ञान की पत्वादिविषयक - ज्ञान के निवृत्त के भक्षणादिकी अभाव हो विहितप्रवृ-तो उचित नहीं निषेधका विषय. ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३ न, विपरीतज्ञाननिमित्तत्वान र्थार्थत्वाभ्यां तुल्यत्वात् । कलञ्ज- कलअ-भक्षणादिप्रवृत्तेः मिथ्याज्ञान-निमित्तत्वम् । अनर्थार्थत्वं च यथा, तथा शास्त्रविहितप्रवृत्ती-नामपि । तस्मात् परमात्म-याथात्म्यविज्ञानवतः शास्त्र-fae प्रवृत्तीनामपि मिथ्याज्ञान-निमित्तत्वेन अनर्थार्थत्वेन च तुल्यत्वात् परमात्मज्ञानेन विपरीतज्ञाने निवर्तिते युक्त DIF. एवाभावः । ननु तत्र युक्तः, नित्यानां तु केवलशास्त्र निमित्तत्वात्, अनर्थार्थत्वाभावाच्चाभावो न युक्त इति चेत्? न विद्यारागद्वेषादिदोषवतो ' विहितत्वात् । यथा स्वर्गकामादि-दोषवतो दर्शपूर्णमासादीनि 300 | सिद्धान्ती — ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि विपरीतज्ञान के कारण और अनर्थके लिये होनेसे ये दोनों समान ही हैं । जिस प्रकार कलञ्जभक्ष-णादिकी प्रवृत्ति मिथ्याज्ञान के कारण और अनर्थकी हेतु होती है । उसी प्रकार शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ मा भी हैं । अंतः जिसे परमात्माके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान हो गया है उसकी दृष्टिमें शास्त्रविहित प्रवृत्तियाँ भी मिथ्याज्ञानकी हेतु और अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली होनेमें कलञ्जभक्षणादिके समान ही हैं, इसलिये परमात्मज्ञानसे उनके विपरीत ज्ञानकी निवृत्ति हो जाने-पर उनका भी अभाव हो जाना उचित ही है । पूर्व ० – माना, वहाँ अभाव होना उचित है किंतु नित्य कर्मोंका त्याग करना तो उचित नहीं है; क्योंकि वे केवल शास्त्रविहित हैं और किसी प्रकारके अनर्थंकी भी प्राप्ति कराने-वाले नहीं हैं । ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती — यह बात नहीं है; ' उनका विधान भी अविद्या और राग - द्वेषादि दोषयुक्त पुरुषोंके ही लिये है । जिस प्रकार दर्शपूर्णमासादि

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१०४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ काम्यानि कर्माणि विहितानि । तथा सर्वानर्थबीजाविद्यादिदोषव-तस्तज्जनितेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहार-रागद्वेषादिदोषवतश्च तत्प्रेरिता-विशेषप्रवृत्तेरिष्टानिष्टप्राप्तिपरिहा -रार्थिनो नित्यानि कर्माणि विधीयन्ते, न केवलं शास्त्र-निमित्तान्येव । न चाग्निहोत्रदर्शपूर्णमास-चातुर्मास्य पशुबन्धसोमानां कर्मणां स्वतः काम्यनित्यत्व-विवेकोऽस्ति । कर्तृगतेन हि स्वर्गादिकामदोषेण कामार्थता । तथा अविद्यादिदोषवतः स्वभाव प्राप्तेष्ट | निष्टप्राप्तिपरिहारार्थिनः तदर्थान्येव नित्यानि इति युक्तम्, तं प्रति विहितत्वात् । न परमात्मयाथात्म्य विज्ञान-ब्राह काम्य कर्मोंका विधान स्वर्गकामादि दोषयुक्त पुरुषोंके लिये किया गया वत है, उसी प्रकार सब प्रकारके अनर्थ-के बीजभूत अविद्यादि दोषवान् स्क तथा उनसे होनेवाली इष्टप्राप्ति और " नि अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छा एवं इष्ट-निवृत्ति और अनिष्टप्राप्तिके द्वेषरूप नो दोषसे युक्त तथा उन रागद्वेषसे प्रेरित होकर समानरूपसे प्रवृत्त न होनेवाले एवं इष्ट - प्राप्ति ज्ञान अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छावाले पुरुषोंके लिये नित्यकर्मोंका विधान किया विश गया है, वे केवल शास्त्रजनित ही नहीं हैं । कत्व इसके सिवा अग्निहोत्र, दर्श, काल पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुबन्ध और सोमादि कर्मों का स्वतः कोई काम्यत्व प्रत या नित्यत्वका विवेक नहीं होता । कर्ताकी स्वर्गादिसम्बन्धिनी कामना- तिच के दोषसे ही उनकी सकामता सिद्ध होती है । इसी प्रकार जो अविद्यादि न दोषसे युक्त है और जिसे स्वभाव-प्राप्त इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी स्वार्द्ध निवृत्तिकी इच्छा है, उसीके लिये पपत्ते नित्य कर्म हैं - ऐसा मानना उचित ही है, क्योंकि उसीके लिये उनका स्क्रिप विधान है । नित्यं जिसे परमात्माके वास्तविक