बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 91–100

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

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अध्याय १ वेदमन्त्रों द्वारा सर्वदेवसम्बन्धी आलभन किये ही देवता सरे ग्राम्य और = य देवताओंके वयवभूत विभिन्न न किये जाते हैं-लिये आजकल देवताओंके लिये भषिक्त किये हुए शुका आलभन अश्वमेध य एष तख्या की जाती जो शुद्वारा ' एष ह वा अश्व-साक्षात् फलस्व-जाता है । वह कि सूर्य तपता जगत्को प्रका-उस इस यज्ञफल-सर - काल- विशेष रीर है, क्योंकि वत्सर निष्पन्न का साधनभूत यह होता है । यहाँतक का सूर्यत्व बतलाया ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५ साध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुत्वरूपे - । णैव निर्देशः, श्रयं पार्थिवोऽग्नि-रर्कः साधनभूतः । तस्य चार्कस्य क्रतौ चित्स्येमे लोकाखयोऽप्या-त्मानः शरीरावयवाः । तथा च व्याख्यातं ' तस्य प्राची दिक ' इत्यादिना । तावग्न्यादित्यावेतों यथाविशेषितावश्वमेधौ क्रतु-फले 1 । अर्को यः पार्थिवोऽग्निः स साक्षात्क्रतुरूपः क्रियात्मकः । क्रतोरग्निसाध्यत्वात्तद्रूपेणैव नि-र्देशः । क्रतुसाध्यत्वाच्च फलस्य क्रतुरूपेणैव निर्देश आदित्योऽश्व-मेध इति । तौ साध्यसाध ऋतुफलभूता-चग्न्यादित्यौ, सा उ पुनर्भूय एकैव देवता भवति । का सा? मृत्युरेव । पूर्वमप्येकैवासीत्क्रिया-साधनफलभेदाय विभक्ता । तथा चोक्तम् " सत्रेधात्मानं व्यकुरुत " ( बृ ० उ ० १ । २ । ३ ) इति । सा पुनरपि क्रियानिर्वृत्त्युत्तरकाल- । ANNA पार्थिव अग्नि अकं है; यज्ञफल अग्निसाध्य है, इसलिये उसका यज्ञरूपसे निर्देश किया गया है । यज्ञमें चयन किये जानेवाले उस अकंके तीनों लोक आत्मा शरीरके अवयव हैं । इसीसे ' उसका पूर्वदिशा शिर है ' इत्यादि वाक्यसे उसकी व्याख्या की गयी है । वे ये अग्नि और आदित्य ऊपर दिये हुए विशेषणके अनुसार अर्क और अश्व-मेध क्रमशः यज्ञ और फल हैं । अर्क जो पार्थिव अग्नि है वह साक्षात् क्रियात्मक यज्ञरूप है । यज्ञ अग्नि-साध्य है, इसलिये अग्निरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है । तथा फल यज्ञसाध्य है इसलिये ‘ आदित्य अश्वमेध है ' इस प्रकार यज्ञरूपसे ही उसका निर्देश किया जाता है । वे यज्ञ एवं फलभूत अग्नि और आदित्य साध्य और साधन हैं । वे भी आपस में मिलकर पुनः -फिर भी एक ही देवता हैं । यह एक देव कौन है? वह मृत्यु है । पहले भी वह ( मृत्युदेवता ) एक ही था, क्रिया के साधन और फलभेदके लिये उसका विभाग हो गया । ऐसा ही कहा भी है- " उसने अपनेको तीन प्रकारसे विभक्त किया " इत्यादि । वह फिर भी अर्थात् क्रियानिष्पत्तिके

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८६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ मेकैव देवता भवति मृत्युरेव । फलरूपः । यः पुनरेवमेनमश्वमेधं मृत्यु-मेकां देवतां वेद । श्रहमेव मृत्यु-रस्म्यश्वमेध एका देवता मद्रपा अश्वाग्निसाधनसाध्येति सोऽप-जयति पुनर्मृत्युं पुनर्भरणं सकृ-न्मृत्वा पुनर्मरणाय न जायत इत्यर्थः । अपजितोऽपि मृत्युरेनं पुनराप्नुयादित्याशङ्कयाह —— नैनं मृत्युराप्नोति । कस्मात्? मृत्युर-स्य एवंविद आत्मा भवति ।

किश्च मृत्युरेव फलरूपः सन्ने-तासां देवतानामेको भवति ।

तस्यैतत् फलम् ॥ ७ ॥

उत्तरकालमें भी एक ही देवता अर्थात् फलस्वरूप मृत्यु ही हो जाता है । द्वय । जो इस प्रकार इस अश्वमेधको प्रव मृत्युरूप एक देवता जानता है; सम अर्थात् मैं ही अश्वमेधरूप मृत्यु हूँ — अग्नि और अश्वरूप साधनसे मृत्य सिद्ध होनेवाली एक देवता मेरा ही अथ रूप है - ऐसी जो उपासना करता भूत है वह पुनमृत्युको जीत लेता है । तात्पर्य यह है कि एक बार मरकर स्प्रक वह पुन: मरनेके लिये उत्पन्न मार नहीं होता । इस प्रकार परास्त हो जानेपर भी मृत्यु इसे पुनः प्राप्त ज्ञान कर लेगा — ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है - इसे मृत्यु पुनः ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता । क्यों? क्रम क्योंकि इस प्रकार जाननेवालेका आत्मा हो जाता है । विष बल्कि मृत्यु ही फलरूप होकर दूभ इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है । उस उपासकको यही फल प्राप्त होता ता है ॥ ७ ॥ त्म

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये क द्वितीयमग्निब्राह्मरणम् ॥ २ ॥ देव

' म

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[ अध्याय१ एक ही देवता मृत्यु ही हो इस अश्वमेधको ना जानता है; श्वमेधरूप मृत्यु श्वरूप साधनसे देवता मेरा ही उपासना करता -जीत लेता है । एक बार मरकर लिये उत्पन्न कार परास्त हो इसे पुनः प्राप्त करके इसे मृत्यु पुनः सकता । क्यों? जाननेवालेका जाता है । फलरूप होकर ई एक हो जाता को यही फल नाये तृतीय ब्राह्मण द्वया हेत्याद्यस्य कः सम्बन्धः १ प्रकरण - कर्मणां ज्ञानसहिता-सम्बन्धः नां परा गतिरुक्ता मृत्य्वात्मभावोऽश्वमेधगत्युक्त्या । अथेदानीं मृत्य्वात्मभावसाधन-भृतयोः कर्मज्ञानयोर्यत उद्भवस्त -स्प्रकाशनार्थमुद्गीथब्राह्मण-मारभ्यते । ननु मृत्य्वात्मभावः पूर्वत्र ज्ञानकर्मणोः फलमुक्तम् ॥ उद्गीथ-' द्वया ह ' इत्यादि वाक्यसे आरम्भ होनेवाले इस ब्राह्मणका पूर्वब्राह्मणसे क्या सम्बन्ध है? — यहाँतक अश्वमेघकी गति ( फल ) बतानेके द्वारा ज्ञानसहित कर्मोंकी मृत्युस्वरूपताकी प्राप्तिरूप परागति बतलायी गयी है । आगे मृत्युस्वरूपताके साधनभूत कर्म और ज्ञानका जिससे उदय होता है । उसका प्रकाशन करनेके लिये उद्गीथ ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है | शङ्का — पहले तो ज्ञान और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताकी प्राप्ति बतलाया गया है; किंतु उद्गीथज्ञान ज्ञानकर्मणोस्तु मृत्य्वात्मभावाति - - और कर्मका फल मृत्युस्वरूपताका क्रमणं फलं वक्ष्यति यतो भिन्न-विषयत्वात्फलस्य न पूर्वकर्मज्ञानो-द्भवप्रकाशनार्थमिति चेत् । नायं दोषः श्रग्न्यादित्या-। पूर्व-त्मभावत्वादुद्गीथफलस्य त्राप्येतदेव फलमुक्तम् ' एतासां देवतानामेको ' भवति ' इति । ननु ' मृत्युमतिक्रान्तः ' इत्यादि अतिक्रमण बतलाया जायगा । अतः इसके फलका विषय भिन्न होनेसे यह पूर्वोक्त कर्म और ज्ञानके उद्गम-स्थानको प्रकाशित करनेके लिये नहीं हो सकता । समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि उद्गीयका फल अग्नि एवं आदित्यस्वरूपताकी प्राप्ति है । पहले भी ' इनमें से कोई कोई ए एक देवता हो जाता है ' इस वाक्यसे यही फल बतलाया गया है । यदि कहो कि ' मृत्युसे अतिक्रान्त हो जाता है ' | इतना कथन तो पहले की अपेक्षा

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दद बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ विरुद्धम्; न स्वाभाविकपाप्मा । सङ्गविषयत्वादतिक्रमणस्य । कोऽसौ स्वाभाविकः पाप्मा-सङ्गो मृत्युः १ कुतों वा तस्योद्भवः १ केन वा तस्याति-क्रमणम् १ कथं वा १ इत्ये-तस्यार्थस्य प्रकाशनायाख्यायि-कारभ्यते । कथम् — ब्राह विरुद्ध है ही तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि इस अतिक्रमणका पत्य विषय स्वाभाविक पापका सङ्ग होना है । स्या यह स्वाभाविक पापका सङ्गरूप ते मृत्यु क्या है? कहाँसे उसकी उत्पत्ति होती है? किसके द्वारा प्रजा उसका अतिक्रमण हो सकता है? और किस प्रकार हो सकता है? प्राण इन सब बातोंको प्रकाशित करने के लिये यह आख्यायिका आरम्भ की देवार जाती है । सो किस प्रकार-- निर्व देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका त ए उद्गीथ - सम्बन्धी विचार जनि द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानी-यसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त अस ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥१ ॥

सुरे प्रजापतिके दो प्रकारके पुत्र थे -- देव और असुर । उनमें देव थोड़े ही थे और असुर अधिक थे । इन लोकों में वे परस्पर स्पर्धा ( डाह ) करने लगे । उनमेंसे देवताओंने कहा, ' हम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा असुरोंका अतिक्रमण करें ' ॥ १ ॥ भाव

द्वया द्विप्रकाराः । हेति पूर्व- द्वयाः – दो प्रकारके । ' ह ' यह वृत्तावद्योतको पूर्ववृत्तान्तका द्योतक निपात है । नीय निपातः । वर्तमान- वर्तमान प्रजापतिके पूर्वजन्ममें जो यस प्रजापतेः पूर्वजन्मनि यद् वृत्तं कुछ हुआ था उसे ही श्रुति ' ह ' शब्दसे द्योतित ' करती है । सो तदवद्योतयति हशब्देन । प्राजा- ' प्राजापत्या: ' - जिस जन्ममें पूर्ववृत्त

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[ अध्याय१ यह बात भी अतिक्रमणका पापका सङ्ग पापका सङ्गरूप कहाँसे उसकी G किसके द्वारा हो सकता है? हो सकता है? प्रकाशित करनेके का आरम्भ की प्रकार --का ततः कानी-केष्वस्पर्धन्त नामेति ॥ १ ॥

। उनमें देव स्पर्धा ( डाह ) उद्गीथके द्वारा करके । ' ह ' यह तक निपात है । के पूर्वजन्ममें जो से ही श्रुति ह ' ' करती है । जन्ममें पूर्ववृत्त ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ पत्याः प्रजापतेर्वृत्तजन्मावस्थ- । स्यापत्यानि प्राजापत्याः । के ते? देवाश्चासुराश्च । तस्यैव प्रजापतेः प्राणा वागादयः । कथं पुनस्तेषां देवासुरत्वम्? प्राणानां उच्यते-- शास्त्रजनि देवासुरत्व- तज्ञानकर्मभाविता निर्वचनम् द्योतनाद्देवा भवन्ति । त एव स्वाभाविकप्रत्यक्षानुमान -जनितदृष्टप्रयोजन कर्मज्ञानभाविता असुराः । स्वेष्वेवासुषु रमरणात् सुरेम्पो वा देवेभ्योऽन्यत्वात् । यस्माच्च दृष्टप्रयोजनज्ञानकर्म-भाविता असुराः, ततस्तस्मात्का-नीयसाः, कनीयांस एव कानी-यसाः, स्वार्थेऽणि वृद्धिः । कनीयां-सोऽल्पा एव देवाः । ज्यायसा ८ ९ घटित हुआ था उसमें होनेवाले प्रजापतिके पुत्र प्राजापत्य कहे गये हैं । वे कौन थे? देवता और असुर; अर्थात् उसी प्रजापतिके वागादि प्राण [ इन्द्र - विरोचनादि नहीं ] किंतु उनका देवासुरत्व कैसे माना जाता है? सो बतलाया जाता है । शास्त्र - जनित ज्ञान और कर्मसे भावित जो प्राण हैं, वे द्योतनशील ( प्रकाशमय ) होनेके कारण देव हैं; तथा वे ( प्राण ) ही स्वाभाविक प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित दृष्ट प्रयोजनवाले कर्म और ज्ञानसे भावित होनेपर असुर हैं ॥ अपने ही असुओं ( प्राणों ) में रमण करनेके कारण अथवा सुर यानी देवोंसे भिन्न होनेके कारण वे असुर कहलाते हैं । क्योंकि असुरगण दृष्ट प्रयोजन-वाले ज्ञान और कर्मकी भावनासे युक्त हैं, इसलिये देवगण कानीयस हैं । कनीयान ही कानीयस हैं । यहाँ [ कनीयस् शब्दसे ] स्वार्थमें ' अण् ' प्रत्यय होनेपर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है, जिससे ' कानीयस ' शब्द सिद्ध हुआ है । तात्पर्य यह कि देवगण कनीयान् अर्थात् थोड़े

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९ ० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ असुरा ज्यायान्सोऽसुराः । स्वाभा - । विकी हि कर्मज्ञानप्रवृत्तिर्महत्तरा प्राणानां शास्त्रजनितायाः कर्म ज्ञानप्रवृत्तेर्दृष्टप्रयोजनत्वात् । अत एव कनीयस्त्वं देवानां शास्त्रजनितप्रवृत्तेरन्पत्वात् । अत्य-न्तयत्नसाध्या हि सा । ते देवाखासुराश्च प्रजापति-शरीरस्था एषु लोकेषु निमित्त-भूतेषु स्वाभाविकेतर कर्मज्ञानसा-ध्येषु अस्पर्धन्त स्पर्धां कृतवन्तः । देवानां चासुराणां च वृच्युद्भवा-भिभवौ स्पर्धा । कदाचिच्छास्त्र-जनितकर्मज्ञानभावनारूपा वृत्तिः प्राणानामुद्भवति । यदा चोद्भवति तदा दृष्टप्रयोजना प्रत्यक्षानुमान-जनित कर्मज्ञानभावनारूपा तेषामेव प्राणानां वृत्तिरासुर्यभिभूयते । स देवानां जयोऽसुराणां पराजयः । कदाचित्तद्विपर्ययेण देवानां वृत्ति-रभिभूयत आसुर्या उद्भवः । सो-ब्राह्म ही हैं । तथा असुरगण ज्यायस— ज्यायान् यानी अधिक हैं, क्योंकि ऽसुर दृष्ट प्रयोजनवाली होनेसे प्राणोंकी एवं शास्त्रजनित कर्म - ज्ञानप्रवृत्तिकी अपेक्षा स्वाभाविकी कर्म - ज्ञानप्रवृत्ति दुत्क ही अधिकतर होती है । इसीसे असुर शास्त्रजनित प्रवृत्तिकी अल्पताके कारण देवताओंकी भी अल्पता है, स्थाव वह अत्यन्त यत्न करनेपर मनुष्य सिद्ध होनेवाली है । त प्रजापतिके शरीर में रहनेवाले वे देव और असुर स्वाभाविक एवं माना अस्वाभाविक ( शास्त्रजनित ) कर्म किंकृ और ज्ञानसे साध्य लोकोंके निमित्त स्पर्धा ( डाह ) करने लगे । दैवी असुर और आसुरी वृत्तियोंका उठना और क्तवन दबना ही देवता और असुरोंकी स्पर्धा है । कभी तो प्राणोंकी शास्त्र- अस्मि जनित कर्मज्ञानभावनारूपा वृत्ति उद्गीथ उठती है, और जिस समय वह उठती है उस समय उन्हीं प्राणोंकी णेन दृष्ट प्रयोजनवाली प्रत्यक्ष एवं अनु- रानगि मानजनित कर्मज्ञानभावनारूपा आसुरी वृत्ति दब जाती है । यही शितं देवताओंका जय और असुरोंका पराजय है । तथा कभी इसके न्योन विपरीत देवताओं की वृत्ति दब जाता स्वरूप | है और आसुरी वृत्तिका उत्थान

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अध्याय १ - ज्यायस-हैं, क्योंकि प्राणोंकी तानप्रवृत्तिकी -- ज्ञानप्रवृत्ति है । इसीसे 7 अल्पताके अल्पता है, न करनेपर में रहनेवाले T भाविक एवं जनित ) कर्म कोंके निमित्त लगे । दैवी उठना और असुरोंकी णोंकी शास्त्र-रूपा वृत्ति समय वह न्हीं प्राणों की यक्ष एवं अनु-नभावनारूपा ती है । यही असुरोंका कभी इसके त्ति दब जाता नका उत्थान ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ S सुराणां जयो देवानां पराजयः । एवं देवानां जये धर्मभूयस्त्वा -दुत्कर्ष प्रजापतित्व प्राप्तेः । असुरजयेऽधर्मभूयस्त्वादपकर्ष श्री स्थावरत्वप्राप्तेः । उभयसाम्ये मनुष्यत्वप्राप्तिः । त एवं कनीयस्त्वादभिभूय-माना असुरैर्देवा बाहुल्यादसुराणां किं कृतवन्तः १ इत्युच्यते — ते देवा असुरैरभिभूयमाना ह किलोचुरु-क्तवन्तः । कथम्? हन्तेदानीम् अस्मिन्यज्ञे ज्योतिष्टोमे, उद्गीथेन उद्गीथकर्मपदार्थ कर्तृस्वरूपाश्रय-णेन अत्ययामातिगच्छामः । सु- । रानभिभूय स्वं देवभावं शास्त्रप्रका -शितं प्रतिपद्यामह इत्युक्तवन्तोऽ-न्योन्यम् । उद्गीथकर्मपदार्थकर्तृ-स्वरूपाश्रयणं च ज्ञानकर्मभ्याम् । ९ १ । होता है । वह असुरोंका विजय और देवोंका पराजय है । इस प्रकार देवताओंका विजय होनेपर धर्मंकी अधिकता होनेके कारण प्रजापति--पदकी प्राप्तिपर्यन्त उत्कर्षं ( ऊर्ध्व-गमन ) होता है तथा असुरोंका विजय होनेपर अधर्मकी अधिकता होनेके कारण स्थावरत्वप्राप्तिपर्यन्त अधोगति होती है और दोनोंकी समानता होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार असुरोंकी अपेक्षा स्वयं अल्पसंख्यक होनेसे तथा असुरोंकी अधिकता होनेके कारण उनके द्वारा दबे हुए उन देवताओंने . क्या किया? सो बतलाया जाता है । कहते हैं, असुरोंसे अभिभूत होते हुए उन देवताओंने कहा । क्या कहा? - ' अहो!. अब इस ज्योतिष्टोम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा—-उद्गीथनामक जो कर्मका अङ्गभूत पदार्थ है उसे करनेवाले प्राणके स्वरूपका आश्रय करके हम असुरों--का अतिक्रमण करेंगे; अर्थात्ः असुरोंका पराभव कर अपने शास्त्र--प्रकाशित देवभावको प्राप्त करेंगे ' --इस प्रकार उन्होंने आपसमें कहा । उद्गीथ कर्मरूप पदार्थके कर्ताके स्वरूपका आश्रय ज्ञान और कर्मके

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९ २ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ कर्म वक्ष्यमाणं मन्त्रजपलक्षणं विधित्स्यमानं “ तदेतानि जपेत् " इति । ज्ञानं त्विदमेव निरूप्य --माणम् । नन्विदमभ्यारोहजपविशेषो-ऽर्थवादो न ज्ञाननिरूपणपरम् । न; ' य एवं वेद ' इति ‘ प्राणोपासनवाक्यस्य वचनात् । उद्गीथ . अन्यशेषत्व- प्रस्तावे पुराकल्प-निरास: श्रवणादुद्गीथविधि-परमिति चेन्न, अप्रकरणात् । - उद्गीथस्य चान्यत्र विहितत्वात् । विद्याप्रकरणत्वाच्चास्य । अभ्या-- रोहजपस्य चानित्यत्वाद, एवं चित्प्रयोज्यत्वात्; विज्ञानस्य च नित्यवच्छ्रवणात् । " तद्वैतल्लोक ब्राह्मण द्वारा किया जा सकता है । उनमें कर्म तो " तदेतानि जपेत् ” इस जिदेव वाक्यद्वारा जिसका विधान करना २८ ) इष्ट है वह आगे कहा जानेवाला वागाव मन्त्रजपरूप है और ज्ञान तो वही है जिसका निरूपण किया जा रहा है । नात् शङ्का - किंतु यह तो अभ्यारोह ' शुद्धि मन्त्रजपकी विधिका शेषभूत अर्थ -वाद है, ज्ञाननिरूपण परक नहीं है । न्यस्त समाधान — यह बात नहीं है, दिनि क्योंकि यहाँ ' जो ऐसा जानता है ' ऐसा वचन है । यदि कहो कि प्रेता उद्गीथके प्रकरणमें [ ' द्वया ह ' दीप्य इत्यादि ] पूर्वकल्पसम्बन्धी श्रुति प्राण होनेसे यह उद्गीथ - विधिपरक हैं-तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि गाद्यर यह उद्गीथका प्रकरण ही नहीं है । उद्गीथका विधान तो अन्यत्र ( कर्म- भ काण्डमें ) किया गया है । यह तो विद्या ( उपासना ) का प्रकरण है । न इसके सिवा अभ्यारोहजप अनित्य होता है, क्योंकि प्राणवेत्ताद्वारा ही ननु वह अनुष्ठान करनेयोग्य है और प्राण प्राणविज्ञान नित्यवत् सुना गया प्राण है । " तथा " यह प्राणविज्ञान इस १. जिसके जपसे देवभावकी सम्मुखता से प्राप्ति हो उस मन्त्रजपका नाम प्रकार अभ्यारोह मन्त्रजप है । पौर्णम २. अर्थात् उद्गीथविधिका शेषभूत अर्थवाद है । उसी ३. तात्पर्य यह है कि अभ्यारोहजपका अधिकार प्राणवेत्ताको ही होनेके कारण, विज्ञा

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[ अध्याय १ ना है । उनमें जपेत् ” इस विधान करना हा जानेवाला न तो वही है T जा रहा है । तो अभ्यारोह ' शेषभूत अर्थ-- परक नहीं है । बात नहीं है, जानता है ' कहो कि में [ ' द्वया ह ' सम्बन्धी श्रुति विधिपरक हैं'-हीं है, क्योंकि ण ही नहीं है । अन्यत्र ( कर्म-है । यह तो का प्रकरण है । रोहजप अनित्य णवत्ताद्वारा ही योग्य है और सुना गया प्राणविज्ञान मन्त्रजपका नाम ही होनेके कारण, ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ जिदेव " ( छा ० उ ० १ । ३ । २८ ) इति च श्रुतेः प्राणस्य वागादीनां च शुद्धयशुद्धिवच नात् । न ह्यनुपास्यत्वे प्राणस्य शुद्धिवचनं वागादीनां च सहोप-न्यस्तानामशुद्धिवचनम् । वागा दिनिन्दया मुख्य प्राणस्तुतिश्चाभि-प्रेता उपपद्यते । ' मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ' इत्यादि फलवचनं च । प्राणस्वरूपापत्तेर्हि फलं तद्यद्वा -गाद्यग्न्यादिभावः । भवतु नाम प्राणस्योपासनम्, न तु विशुद्धयादिगुणवत्तेत । ननु स्याछ्रुतत्वात्; न स्यात्; ९ ३ लोकोंकी प्राप्ति करानेवाला ही है " इस श्रुतिसे और प्राण तथा वागादि-की शुद्धि और अशुद्धि बतलायी जानेसे भी यह विज्ञानका ही प्रकरण सिद्ध होता है । प्राणको उपास्यता बतलाना अभीष्ट न होनेपर प्राणकी शुद्धिका प्रतिपादन करना और उसीके साथ जिनका उल्लेख किया गया है उन वागादिको अशुद्ध कहना सम्भव नहीं है । इससे वागादिकी निन्दाद्वारा मुख्य प्राणकी स्तुति अभिवं युक्तियुक्त जान पड़ती है । ' मृत्युको पार करके प्रकाशित होता है ' ऐसा इसका फलवचन भी है । वागादिको जो अग्न्यादिभावकी प्राप्ति है वह उनकी प्राणस्वरूपताकी प्राप्तिका ही फल है । शङ्का – यहाँ प्राणकी उपासना भ ही हो, परंतु उसका विशुद्धि आदि गुणोंसे युक्त होना तो सम्भव नहीं है । यदि कहो कि श्रुतिप्रतिपादित होनेके कारण ऐसा हो सकता है, तो ऐसा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुति प्राणविज्ञानसे पूर्व उसका अनुष्ठान नहीं हो सकता; इसलिये वह अनित्य है । किंतु प्राणविज्ञान उसकी अपेक्षा नित्य है । क्योंकि ' य एवं विद्वान् पौर्णमासीं यजते ' इस नित्य पौर्णमासयागके समान ' य एवं वेद ' ( जो इस प्रकार जानता है ) इस प्रकार नित्यवत् विज्ञान ( उपासना ) का श्रवण होता है । यहाँ प्रयाज आदि पौर्णमासीके प्रयोजक नहीं हैं, अपितु पौर्णमासी ही प्रयाज आदिको प्रयोजिका है, उसी प्रकार प्राणवित्प्रयोज्य जप प्राणविज्ञानका प्रयोजक नहीं है, बल्कि प्राण-विज्ञान ही जपका प्रयोजक है । अत: वह जपसे पूर्वसिद्ध है ।

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६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ उपास्यत्वे स्तुत्यर्थत्वोपपत्तेः । न; अविपरीतार्थप्रतिपत्तेः श्रेयः प्राप्त्युपपत्तेर्लोकवत् । यो ह्यविपरीतमर्थं प्रतिपद्यते लोके स अत इष्टं प्राप्नोत्यनिष्टाद्वा निवर्तते, न विपरीतार्थप्रतिपच्या । तथेहापि श्रौतशब्दजनितार्थप्रतिपत्तौ श्रेयः-प्राप्तिरुपपन्ना न विपर्यये ॥ न चोपासनार्थश्रुतशब्दोत्थविज्ञान-विषयस्य यथार्थत्वे प्रमाणमस्ति । न च तद्विज्ञानस्यापवादः श्रूयते । - ततः श्रेयःप्राप्तिदर्शनाद्यथार्थतां प्रतिपद्यामहे विपर्यये चानर्थ-प्राप्तिदर्शनात् । यो हि विपर्यये-णार्थं प्रतिपद्यते लोके, पुरुषं स्थाणुरित्यमित्रं मित्रमिति वा, सोऽनर्थं प्राप्नुवन्दृश्यते । श्रात्मे ब्राह्म तो, उपास्य होनेके कारण, उसकी स्तुति के लिये भी हो सकती है । श्वरदे नामे समाधान- ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि अविरुद्ध अर्थंके ज्ञानसे प्राप्त्य ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है; याल्ल ऐसा ही लोकमें भी देखा जाता है । तहमा लोकमें जो पुरुष अविरुद्ध अर्थंका देवत ज्ञान रखता है वही अभीष्ट प्राप्त शास्त्र करता है और अनिष्टसे बचता है । विपरीत अर्थके ज्ञानसे ऐसा नहीं ना होता । इसी प्रकार यहाँ भी श्रुतिके मिति शब्दसे निकलनेवाले अर्थके ज्ञानसे तत्र ही श्रेयःप्राप्ति होनी सम्भव है, पुरुष विपरीत अवस्थामें नहीं । इसके सिवा उपासनाका प्रतिपादन करनेवाली दृश्य श्रुतिके शब्दसे होनेवाले विज्ञानके प्रतिप विषयके मिथ्या होनेमें कोई प्रमाण चेत् भी नहीं है । श्रुति उस विज्ञानका न कहीं अपवाद भी नहीं करती ॥ अतः उससे श्रेयःप्राप्ति दिखायी मादा देनेसे हम उसकी यथार्थंता मानते ही ग्राहय हैं, क्योंकि इससे विपरीत माननेमें पुरुष अनर्थकी प्राप्ति देखी जाती है । कस्म लोकमें जो पुरुष वस्तुको विपरीत- मादि भावसे ग्रहण करता है, जैसे पुरुष-को स्थाणु अथवा शत्रुको मित्र विधी समझता है, वह अनर्थंको प्राप्त विष्ण । होता देखा जाता है । यदि श्रुतिसे