बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 111–120

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120

पृष्ठ 111

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[ अध्याय १ स्वर्गकामादि ये किया गया कारके अनर्थ-दि दोषवान् इष्टप्राप्ति और छा एवं इष्ट-प्तिके द्वेषरूप उन रागद्वेष नरूपसे प्रवृत्त -प्राप्ति और हावाले पुरुषोंके विधान किया शास्त्रजनित ग्निहोत्र, दर्श पशुबन्ध और : कोई काम्यत्व क नहीं होता । न्धिनी कामना-सकामता सिद्ध जो अविद्यादि जिसे स्वभाव-और अनिष्टकी , उसीके लिये मानना उचित 5 लिये उनका के वास्तविक ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ वतः शमोपायव्यतिरेकेण किञ्चि | स्वरूपका ज्ञान है उसके लिये तो कर्म विहितमुपलभ्यते । कर्म निमित्तदेवतादिसर्वसाधन विज्ञा-नोपमर्देन ह्यात्मज्ञानं विधीयते, न चोपमर्दितक्रियाकारकादिवि ज्ञानस्य कर्मप्रवृत्तिरुपपद्यते । विशिष्ट क्रियासाधनादिज्ञामपूर्व-कत्वात्क्रियाप्रवृत्तेः । न हि देश-कालाद्यनवच्छिन्नास्थूलद्वयादिन-प्रत्ययधारिणः कर्मावरोऽस्ति । भोजनादिप्रवृत्यवसरवत्स्यादि-ति चेत् १ न विद्यादिकेवलदोषनिमित्त-त्वाद्भोजनादिप्रवृत्तेरावश्यकत्वानु -पपत्तेः । न तु तथानियतं कदाचि क्रिपते कदाचिन्न क्रियते चेति नित्यं कर्मोपपद्यते । केवलदोष-शम ( शान्ति ) का साधन करने-के सिवा और कोई भी कर्म विहित नहीं देखा जाता, क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्मके निमित्तभूत देवतादि सब प्रकारके साधनोंके विज्ञानकी निवृत्ति करके ही होता है और जिसके क्रिया - कारकादि विज्ञानकी निवृत्ति हो गयी है उसकी कर्ममें प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है; कारण, क्रियाकी प्रवृत्ति तो विशिष्ट क्रिया और साघनादिके विज्ञानपूर्वंक ही होती है । जिसकी देश - कालादि-से अनवच्छिन्न, अस्थूल और अद्वयादिस्वरूप ब्रह्मप्रत्ययमें धारणा है उसे तो कर्मका कोई अवसर ही वही नहीं है । पूर्व ० - भोजनादिकी प्रवृत्तिके अवसरके समान उसे कर्मका भी अवसर हो सकता है - ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती — नहीं, क्योंकि भोज-नादिमें प्रवृत्त होनेकी आवश्यकता केवल अविद्यादि दोषके ही कारण होती हो - ऐसा मानना उचित नहीं है । इसके सिवा भोजनादिके समान नित्य कर्मका, कभी किया जाय और कभी न किया जाय - ऐसा अनियत होना भी सम्भव नहीं है । भोजनादि कर्म केवल क्षुधादि दोषके कारण होते

पृष्ठ 112

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ १०६ निमित्तत्वात्तु भोजनादिकर्मणो । ऽनियतत्वं स्यात् । दोषोद्भवामि भवयोरनियतत्वात् कामानामिव काम्येषु । शास्त्रनिमित्तकालाद्यपेत-त्वाच्च नित्यानामनियतत्वानुप-पत्तिः । दोषनिमित्तत्वे सत्यपि यथा काम्याग्निहोत्रस्य शास्त्रवि-हितत्वात् सायंप्रातःकालाद्यपेक्ष-त्वमेवम् । तद्भोजनादिप्रवृत्तौ नियम-वत्स्यादिति चेत्? ब्राह हैं, इसलिये उनका तो अ होना सम्भव है, क्योंकि काम्य त्म्य विषयोंकी कामना के समान उन द्वैता दोषोंकी उत्पत्ति और निवृत्ति अनियत हैं; किंतु शास्त्रजनित मध्य कालादिकी अपेक्षावाले होनेसे नित्य कर्मोंका अनियत होना नहीं बन सकता । जिस प्रकार काम्य अग्नि- तुल्य होत्रको शास्त्रविहित होनेके कारण तस्म सायंकाल, प्रातःकालादिकी अपेक्षा प्रति है उसी प्रकार दोषनिमित्तक होने-पर भी नित्यकर्मोंको नियमकी शास्त्र अपेक्षा है । पूर्व ० - वह नियम भोजनादिकी प्रवृत्ति होनेपर + भिक्षाटनादिके नियमके समान हो सकता है । ऐसा कहें तो! वार क्रिया- सिद्धान्ती - ऐसा नहीं कहा जा न, नियमस्याक्रियात्वात् नियम क्रियारूप नहीं कल सकता, क्योंकि है और क्रिया प्रयोजक नहीं होती; त्येष याचाप्रयोजकत्वान्नासौ ज्ञानस्या - इसलिये यह ( भिक्षाटनादिका नियम ) ज्ञानका विरोधी नहीं है । ' अतः यदे पवादकरः । तस्मात् परमात्मयाथा - परमात्मस्वरूपके ज्ञानसे सम्बन्ध वाक्न १ तात्पर्य यह है कि भिक्षाटनादिके विषयमें जो शास्त्रको विधि है वह जिज्ञासुके लिये है । ज्ञानवान् शास्त्रविधिसे प्रेरित होकर उसका अनुसरण नहीं करती करता, अपि तु उसमें उसकी प्रवृत्ति स्वभावतः ही होती है । इसलिये वह विधि ज्ञानकी विरोधिनी नहीं है । किंतु नित्यकर्मादिके लिये जो विधि है उसमें हेयोपा-देयबुद्धिवाले पुरुषकी ही प्रवृत्ति हो सकती है, इसलिये बोधवाका उसमें प्रवृत्त न उसी प्र है । इ होना स्वाभाविक ही है ।

पृष्ठ 113

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अध्याय १ तो अनियत नोंकि काम्य समान उन और निवृत्ति शास्त्रजनित ल होनेसे नित्य ना नहीं बन काम्य अग्नि-होने के कारण दिकी अपेक्षा निमित्तक होने-को नियमकी ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ त्म्यज्ञानविधेरपि तद्विपरीतस्थूल -द्वैतादिज्ञाननिवर्तकत्वात् सा-मर्थ्यात्सर्वकर्मप्रतिषेधविध्यर्थत्वं सम्पद्यते; कर्मप्रवृत्त्यभावस्य तुल्यत्वाद् यथा प्रतिषेधविषये । तस्मात् प्रतिषेधविधिवच्च वस्तु-प्रतिपादनं तत्परत्वं च सिद्धं शास्त्रस्य ॥ १ । १०७ रखनेवाली ( तत्त्वमसि आदि ) विधि भी उससे विपरीत स्थूल एवं तादि ज्ञानकी निवृत्ति करने वाली होनेसे अपनी सामर्थ्यंसे ही सब प्रकार से कर्मका प्रतिषेध करनेवाली हो जाती है, क्योंकि उसमें कर्मकी प्रवृत्तिका अभाव वैसा ही है जैसा कि प्रतिषेधविषयक वाक्योंमें ' । अतः प्रतिषेधविधिके समान ही तत्त्वमसि आदि शास्त्रका वस्तुप्रतिपादक और कर्म - निषेधपरक होना भी सिद्ध होता है ॥ १ ॥

भोजनादिकी भिक्षाटनादिके नकता है । ऐसा नहीं कहा जा म क्रियारूप नहीं जक नहीं होती; नादिका नियम ) नहीं है । ' अतः ज्ञानसे सम्बन्ध की विधि है वह को अनुसरण नहीं इसलिये वह विधि है उसमें हेयोपा-का उसमें प्रवृत्त न वाक्का उद्गान और उसका पापविद्ध होना ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुद्गायत् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत् कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रा-त्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥

उन देवताओंने वाक्से कहा, " तुम हमारे लिये उद्गान करो । ” वाक्ने ' बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर उनके लिये उद्गान किया । उसने जो वाणीमें भोग था उसे देवताओंके लिये गान किया और जो शुभ भाषण करती थी उसे अपने लिये गाया । तब असुरोंने जाना कि इस उद्गाता के १ जैसे निषेध शास्त्रको मानकर निषिद्ध भक्षण आदिमें प्रवृत्ति नहीं होती, उसी प्रकार ' तत्त्वमसि ' आदि वचनोंके सामर्थ्यसे कर्मोंमें प्रवृत्तिका अभाव होता. है । इस प्रकार दोनों में समानता है ।

पृष्ठ 114

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१०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ III I III II ब्राह द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह वाक् जो अननुरूप ( निषिद्ध ) भाषण पर करती है वही वह पाप है, वही वह पाप है ॥ २ ॥ अन

ते देवा हैवं विनिश्चित्य, चाचं वागभिमानिनीं देवताम्रचु-रुक्तवन्तः । त्वं नोऽस्मभ्यमुद्रा -- यौगात्रं कर्म कुरुष्व । वाग्देवता-निर्वर्त्त्यमौद्गात्रं कर्म दृष्टवन्तः तामेव च देवतां जपमन्त्राभिधेयाम् । " असतो मा सद्गमय ” ( बृ ० उ ० १ । ३ । २८ ) इति । अत्र चोपासनायाः कर्मणश्च कर्तृत्वेन चागादय एव विवक्ष्यन्ते । कस्मात्? यस्मात्परमार्थतस्ततु-कर्तृकस्तद्विषय एव च सर्वो ज्ञानकर्मसंव्यवहारः । वक्ष्यति हि " ध्यायतीव लेलायतीव " इत्यात्मकर्तृकत्वाभावं विस्तरतः षष्ठे । इहापि चाध्यायान्ते उपसंहरि-ष्यति अव्याकृतादिक्रियाकारक-फलजातम् " त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म ” ( १ । ६ । १ ) इति अविद्या-विषयम् । अव्याकृतात्तु यत्परं ने उन देवताओंने ऐसा निश्चय कर वाक् – वाक्के अभिमानी देवता ख्य कहा, " तुम हमारे लिये उद्गान यानी उद्गाताका कर्म करो । ” वाग उन्होंने औद्गात्रकर्मको वाग्देवतासे संस ही सम्पन्न होने योग्य देखा और पक्ष उसी देवताको " मुझे असत्से सत्के " ए प्रति ले जा " इस जपमन्त्रका भी अभिधेय जाना । यहाँ भी उपासना तान और कर्मके कर्तारूपसे वागादि ही इति विवक्षित हैं । क्यों? क्योंकि ज्ञान ज्ञान और कर्मसम्बन्धी सारा व्यवहार वस्तुतः उन्हींसे होनेवाला और उन्हीं चात का विषय है । छठे अध्यायमें " मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता दुगा है " इत्यादि श्रुति विस्तारपूर्वक देवेभ उस ( व्यवहार ) की आत्मकतृ कता वाच ( आत्माके द्वारा किये जाने ) का इत्यु अभाव बतलावेगी । भूता यहाँ भी अध्यायकी समाप्तिमें " त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म ” इस उपक पारेप वाक्यद्वारा अव्याकृतादि क्रिया, कारक और फलसमूह अविद्याके ही विषय हैं - इस प्रकार श्रुति उप- फलम । संहार करेगी । तथा अव्याकृत

पृष्ठ 115

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[ अध्याय १ के पास जाकर निषिद्ध ) भाषण ऐसा निश्चय कर मानी देवता लिये उद्गान कर्म करो । " को वाग्देवतासे य देखा और के असत्से सत्के जपमन्त्रका भी हाँ भी उपासना नसे वागादि ही ? क्योंकि ज्ञान सारा व्यवहार वाला और उन्हीं नध्यायमें " मानो नो चेष्टा करता विस्तारपूर्वक आत्मकर्तृकता किये जाने ) का I यकी समाप्ति में रूपं कर्म " इस कृतादि क्रिया, वह अविद्याके ही कार श्रुति उप-तथा अव्याकृतसे ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १० ९ परमात्माख्यं विद्याविषयम् | आगे जो नाम, रूप और कर्मसे अनामरूपकर्मात्मकम् “ नेति रहित परमात्मसंज्ञक विद्याका विषय है उसका " नेति नेति " इस वाक्य-नेति ' ( २ | ३ | ६ ) इति इतरप्रत्या- द्वारा परमात्मेतर वस्तुका बाध ख्यानेनोपसंहरिष्यति पृथक् । यस्तु करके अलग ही उपसंहार करेगी । बागादिसमाहारोपाधिपरिकल्पितः संसार्यात्मा तं च वागादिसमाहार -पक्षपातिनमेव दर्शयिष्यति । " एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति ' ( २ | ४ | १२ ) इति । तस्माद्युक्ता वागादीनामेव ज्ञानकर्मकर्तृत्वफलप्राप्तिविवक्षा । तथेति तथास्त्विति देवरुक्ता वाक्तेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय उदगाय-दुद्गानं कृतवती । कः पुनरसौ देवेभ्योऽर्थाय उद्गानकर्मणा वाचा निर्वर्तितः कार्यविशेषः १ इत्युच्यते — यो वाचि निमित्त-भूतायां वागादिसमुदायस्य य उपकारो निष्पद्यते वदनादिव्या-पारेण, स एव । सर्वेषां ह्यसौ वाग्वदनाभिनिर्वृत्तो भोगः फलम् । और जो वागादिसंघातरूप उपाधिसे कल्पित संसारी आत्मा है उसे " इन भूतोंसे उत्पन्न होकर वह इन्हींके नाशके साथ नष्ट हो जाता है " इस वाक्यद्वारा वागादि संघात-का पक्षपाती ही प्रदर्शित करेगी । अतः वागादिको ही ज्ञान और कर्मका कर्तृत्व है तथा उन्हें ही उनके फलकी प्राप्ति होती है--ऐसी विवक्षा उचित ही है । देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे. जानेपर वाक्ने ‘ तथा ' – तथास्तु. ( ऐसा ही हो ) यह कहकर उन प्रार्थी देवताओंके लिये उद्गान किया । किंतु इस उद्गानकर्मके द्वारा वाणीसे देवताओंके लिये कौन-सा कार्यविशेष निष्पन्न हुआ? बतलाते हैं । वाणीके निमित्तभूत होनेपर उसके भाषणादि व्यापार-द्वारा वागादि समुदायका जो उप-कार होता है वही उनका कार्य-विशेष है । उन सबको वाणीके भाषणसे होनेवाला यह भोगरूप फल ही प्राप्त होता है ।

पृष्ठ 116

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११० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तं भोगं सा त्रिषु पवमानेषु कृत्वा श्रवशिष्टेषु नवसु स्तोत्रेषु चाचनिकमार्त्विज्यं फलं यत्क -कल्याणं शोभनं वदति वर्णान-भिनिर्वर्तयति तद् आत्मने महा-मेव । तद्ध्यसाधारणं वाग्देवतायाः कर्म यत्सम्यग्वर्णानामुच्चारणम् । अतस्तदेव विशेष्यते यत्कल्याणं वदतीति । यत्तु वदन कार्यं सर्वसंघातोपकारात्मकं तद्याज-मानमेव । तत्र कल्याणवदनात्मसम्बन्धा-सङ्गावसरं देवताया रन्ध्रं प्रति लभ्य ते विदुरसुराः, कथम् १ अनेनोद्गात्रा नोऽस्मान्स्वाभाविकं ज्ञानं कर्म चाभिभूयातीत्य शास्त्र ब्रा उस भोगको तीन पवमानोंमें 90 करके उसने शेष नौ स्तोत्रोंमें जो ऋत्विकसम्बन्धी वाचनिक ' फल नि था अर्थात् वह जो कल्याण यानी मा सुन्दर भाषण – वर्णोच्चारण करती ल थी उसे अपने लिये अर्थात् यह चन मेरे लिये ही हो – इस प्रकार गान किया | वर्णोंका जो ठीक-ठीक उच्चारण है यही वाग्देवताका पूर्व असाधारण कर्म है । अतः ' यत्क - एष ल्याणं वदति ' इस वाक्यद्वारा यद उसीको विशेष्यरूपसे बतलाया गया प्रति है । तथा समस्त संघातका उपकारक इस जो भाषणकार्य है है वह यजमान-चद सम्बन्धी ही है | तब कल्याणवदनका मेरेसे चद सम्बन्ध है - इस प्रकारके अभिनि- काय वेशका अवसररूप वाग्देवताका छिद्र स देखकर उन असुरोंने जाना; क्या सप्र जाना? इस उद्गान कर्मद्वारा ये हमें अर्थात् स्वाभाविक ज्ञान और कार - मिि कर्मको दबाकर उद्गातारूप शास्त्र-जनितकर्मज्ञानरूपेण ज्योतिषोद्गा- जनित कर्म - ज्ञानरूप ज्योतिसे हमारा १. “ अथात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् ” – इसके पश्चात् अपने लिये भक्ष्यरूप अन्नका प्राण आगान करे - इस वचनद्वारा श्रुत जो ऋत्विजोंका फल था । * ज्योतिष्टोममें बारह स्तोत्र हैं । उनमेंसे ' पवमान ' नामक तीन स्तोत्रोंसे यजमानके फलका सम्पादन कर शेष नौ स्तोत्रोंसे उसने कल्याणवदनका सामर्थ्य प्राण अपने लिये गान किया । 1

पृष्ठ 117

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- अध्याय १ न पवमानों में स्तोत्रोंमें जो चिनिक ' फल कल्याण यानी च्चारण करती अर्थात् यह - इस प्रकार का जो ठीक-वाग्देवताका अतः ' यत्क-न वाक्यद्वारा बतलाया गया तका उपकारक वह यजमान-दनका मेरेसे कारके अभिनि-देवताका छिद्र जाना; क्या कर्मद्वारा ये हमें 5 ज्ञान और गातारूप शास्त्र-ज्योति से हमारा भक्ष्यरूप अन्नका क तीन स्तोत्रोंसे वदनका सामर्थ्य ब्राह्मण ३ ] त्रात्मना अत्येष्यन्त्यतिगमिष्य-न्ति । इत्येवं विज्ञाय तमुद्गातार -मभिद्रत्याभिगम्य स्वेन आसङ्ग-लक्षणेन पाप्मनाविध्यंस्ताडित-वन्तः संयोजितवन्त इत्यर्थः । स यः स पाप्मा प्रजापतेः पूर्वजन्मावस्थस्य वाचि क्षिप्तः स एष प्रत्यक्षीक्रियते । कोऽसौ १* । यदेवेदमप्रतिरूपमननुरूपं शास्त्र-प्रतिषिद्धं वदति येन प्रयुक्तो-सभ्यवीभत्सानृताद्यनिच्छन्नपि चदति । अनेन कार्येणाप्रतिरूप-चदनेन अनुगम्यमानः प्रजापतेः कार्यभूतासु प्रजासु वाचि वर्तते । स एवाप्रतिरूपवदनेनानुमितः स प्रजापतेर्वाचि गतः पाप्मा, कारणानुविधायि हि कार्य-मिति ॥ २ ॥

१११ । अतिगमन – उल्लङ्घन करेंगे । इस प्रकार जानकर उस उद्गाताके पास जाकर उन्होंने अपने अभिनि-वेशरूप पापसे उसे विद्ध – ताडित ' अर्थात् संयुक्त कर दिया । वह जो पाप पूर्वजन्मावस्थित प्रजापतिकी वाणी में डाला गया था वही यह प्रत्यक्ष किया जाता है । वह कौन का - सा है? यह जो अप्रतिरूप - - अननुरूप यानी शास्त्रसे प्रतिषिद्ध भाषण करती है । जिससे प्रेरित होकर ही यह इच्छा न होनेपर भी असभ्यतापूर्ण, बीभत्स और अनृतादि भाषण करती है । इस अननुरूप भाषणरूप कार्यंसे अनुगत होता हुआ वह पाप प्रजापतिकी कार्यंभूता प्रजाओंकी वाणीमें विद्य-मान है । प्रजापतिकी वाणीमें पहुँचा हुआ वही पाप अननुरूप भाषणसे अनुमित होता है, क्योंकि कार्यं तो कारणका अनुवर्त्तन करनेवाला होता है ॥२ ॥

प्रारण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यः प्राण उद्गायद्यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं

पृष्ठ 118

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११२ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय १ ब्राह्म जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदम- न्ती प्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥ वेद

फिर उन्होंने प्राणसे कहा, “ तुम हमारे लिये उद्गान करो । ” तब प्राणने ' तथास्तु ' कहकर उनके लिये उद्गान किया । प्राणमें जो भोग है श्रोत्र उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ सूंघता उसे है उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उनके समीप जाकर उसे हमार विद्ध पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अननुरूप सूँघता है, यही वह पाप है, यह यही वह पाप है ॥ ३ ॥

अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्य-मन चक्षुरुद्गायद्यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगाययत् संक कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न ष्यन उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स यदे पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥४ ॥

देव फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, " तुम हमारे लिये उद्गान करो ” तब चक्षुने ' तथास्तु ' कहकर उनके लिये उद्गान किया । चक्षुमें जो भोग है f उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन मनने उसने करता है उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके अपने द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर हमार उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अननुरूप देखता है यही वह पाप कर है, यही वह पाप है ॥ ४ ॥ वह प

ऐसे ही अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यः ब श्रोत्रमुद्गायद्यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं

पृष्ठ 119

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[ अध्याय १ त्येष्यन्तीति यदेवेदम-1 न्न करो । " तब जो भोग हे वह शुभ सूंघता उद्गाता के द्वारा मीप जाकर उसे ही वह पाप है, तथेति तेभ्य-आगायद्यत् रनेन वै न व्यन्स यः स नाप्मा ॥४ ॥

गान करो " तब में जो भोग है वह शुभ दर्शन इस उद्गाता के पास जाकर यही वह पाप तथेति तेभ्यः यद्यत्कल्याणं ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३ शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्य-न्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदे-वेदमप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥

फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, " तुम हमारे लिये उद्ग करो । " तब श्रोत्रने ' तथास्तु ' कहकर उनके लिये उद्गान किया । श्रोत्रमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है उसे अपने लिये गाया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अननुरूप श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है ॥ ५ ॥

अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्यो मन उद्गायद्यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं संकल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्ये-ष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविध्यन्स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं संकल्पयति स एव स पात्मैवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपास्सृजन्नेवमेनाः पाप्मनाविध्यन् ॥६ ॥

फिर उन्होंने मनसे कहा, " तुम हमारे लिये ये उद्गान करो । ” तब मनने ' तथास्तु ' कहकर उनके लिये उद्गान किया । मनमें जो भोग है उसे उसने देवताओंके लिये आगान किया और वह जो शुभ संकल्प करता है उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अननुरूप संकल्प करता है यही वह पाप है, यही वह पाप है । इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका संसर्ग हुआ और ऐसे ही [ असुरोंने ] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ ६ ॥

वृ ० उ०८-

पृष्ठ 120

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११४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ' तथैव घ्राणादिदेवता उद्गीथ-निर्वर्तकत्वाज्जपमन्त्रप्रकाश्या उपा-' स्याश्चेति क्रमेण परीक्षितवन्तः ॥ देवानां चैतन्निश्चितमासीत् वागादिदेवताः क्रमेण परीक्ष्य-माणाः कल्याणविषय विशेषात्म-सम्बन्धासङ्गहेतोरासुरपाप्मसं-सर्गाद् उद्गीथनिर्वर्तनासमर्थाः । अतोऽनभिधेयाः " असतो मा सद्ग मय " इत्य नुपास्याश्च, अशुद्धत्वा दिवराव्यापकत्वाच्चेति । एवमु खल्वनुक्ता श्रप्येतास्त्व-' गादिदेवताः कन्याणाकल्याण-कार्यदर्शनादेवं वागादिवदेव, एनाः पाप्मनाविध्यन्पाप्मना विद्धवन्त इति यदुक्तं तत्पाप्म-मिरुपासृजन्पाप्मभिः संसगं कृतवन्त इत्येतत् ॥ ३-६ ॥ ब्राह्मप इसी प्रकार घ्राणादि देवता उद्गीथ कर्मके कर्ता होनेसे जप- म मन्त्रद्वारा प्रकाश्य और उपास्य हैं— ऐसा जानकर देवताओंने क्रमशः वाग उनकी परीक्षा की । देवताओंको उनके विषयमें यही निश्चय था कि मृत्य्व क्रमशः परीक्षा किये जानेपर वागादि देवाः देवता कल्याणविषयविशेषका अपने-से सम्बन्ध रखनेकी आसक्तिके कारण आसुर पापका संसर्ग हो तथ जानेसे उद्गीथकर्मका निर्वाह करने- उद्गा में समर्थ नहीं हैं । अतः अशुद्ध और यथा दूसरोंमें अव्यापक होनेके कारण " मुझको असत्से सत् की ओर ले विष्व जाओ " इस जपमन्त्रसे अप्रकाश्य त्मना और अनुपास्य हैं । फि इसी प्रकार, न कहे जानेपर भी, करो । ' शुभ और अशुभ दोनों प्रकारके किया । करेंगे 1 कार्यं देखे जानेसे त्वगादि अन्य किंतु जि देवगण भी वागादिके समान ही प्रकार हैं । इन्हें भी असुरोंने पापसे वेध है प्रकृतिस्व वह प्र दिया है । ऊपर जो कहा गया है ( सौतेल कि ' पापसे वेघ दिया ' उसका यही तात्पर्य है कि पापके द्वारा उन्हें अथा। संश्लिष्ट कर दिया यानी पापसे प्रदर्शना उनका संसर्ग कर दिया ॥३-६ ॥ मासन्यं