बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1021–1030

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030

पृष्ठ 1021

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[ श्रध्याय ४ दिव्य भोगसामग्री-ये है अर्थात् जो सामग्रियाँ हैं, सम्पन्न हैं, उनमें चक सम्पन्न होता - परम आनन्द है । और आनन्दवान्-किया गया है, - आत्मासे आनन्द नहीं है | विषय - यह परमानन्दका हुआ है - यह बात सरेके समान हो " कही गयी है । अतः आनन्द है ' ऐसी ही है । इसमें के समान राजा द्ध मानुष आनन्द-- उसका उत्तरोत्तर उत्कर्ष दिखाते निवृत्ति हो जाती, दको प्रदर्शित करती क्रमशः उत्तरोत्तर हुआ जहाँ वृद्धिकी पहुँच जाता है, रोम श्रवण और ' हो जानेके कारण ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १००७ मननाभावात् तं परमानन्द विवचन्नाह-अथ ये मनुष्याणामेवम्प्रकाराः शतमानन्दभेदाः स एकः पितृ-णाम् । तेषां विशेषणं जितलोका-नामिति, श्राद्धादिकर्मभिः पितृ-स्तोषयित्वा तेन कर्मणा जितो लोको येषां ये जितलोकाः पि-तरः; तेषां पितॄणां जितलोकानां मनुष्यानन्दशतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो भवति । सोऽपि शतगुणीकृतो गन्धर्व-लोके एक श्रानन्दो भवति । स च शतगुणीकृतः कर्मदेवानामेक श्रानन्दः । अग्निहोत्रादिश्रौतकर्म-णा ये देवत्वं प्राप्नुवन्ति ते कर्मदेवाः । तथैव श्रजानदेवा-नामेक आनन्दः - श्रजानत एव उत्पत्तित एव ये देवास्ते आजा । नदेवाः । यश्च श्रोत्रियोऽधीतवेदः, अवृजिनो वृजिनं पापं तद्रहितो यथोक्तकारीत्यर्थः; अकामहतो वीततृष्ण भाजानं देवेभ्योऽवग्या -| संख्याका व्यवहार नहीं रहता, उस परमानन्दका वर्णन करनेकी इच्छा से यहाँ श्रुति कहती है-मनुष्योंके आनन्दके जो इस प्रकारके सौ भेद हैं, वह पितृगणका एक आनन्द है । ' जितलोक ' यह उन पितृगणका विशेषण है, जिन्होंने श्राद्धादि कर्मोसे पितरोंको संतुष्ट कर उस कर्मसे पितृलोकको जीता है; वे जितलोक पितृगण होते हैं; मनुष्यानन्दका सौ गुना किया हुआ परिमाण उन जितलोक पितृगणका एक आनन्द होता है । वह भी सौ गुना किये जानेपर गन्धर्वलोकमें एक आनन्द होता है । और वह सौ गुना करनेपर कर्म-देवोंका एक आनन्द है । अग्नि-होत्रादि श्रौतकर्मके द्वारा जो देवत्व प्राप्त करते हैं, वे कर्मदेव कहलाते हैं । इसी प्रकार आजानदेवोंका एक आनन्द [ कर्मदेवोंके आनन्दसे सौगुना ] होता है । आजान अर्थात् उत्पत्तिसे ही जो देवता होते हैं, वे आजानदेव कहलाते हैं और जो श्रोत्रिय - वेद पढ़ा हुआ, अवृजिन-वृजिन पापको कहते हैं उससे रहित, अर्थात् शास्त्रोक्त कर्म करने-वाला है तथा अकामहत - आ-जाऩदेवोंसे नीचे जितने विषय हैं

पृष्ठ 1022

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१००८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रा वन्तो विषयास्तेषुः तस्य चैव- । आजान देवैः: समान म्भूतस्य श्रानन्द इत्येतदन्वाकृष्यते! चशब्दात् । तच्छतगुणीकृतपरिमाणः प्र-जापतिलोके एक आनन्दो बिरा-दशरीरे । तथा तद्विज्ञानवाञ्श्रो-त्रियोऽधीतवेदवावृजिन इत्यादि पूर्ववत् तच्च्छतगुणीकृतपरिमाण एक आनन्दो ब्रह्मलोके हिरण्य-गर्भात्मनि । यश्चेत्यादि पूर्वत्र देव । श्रतः परं गणितनिवृत्तिः । एष परम आनन्द इत्युक्तः; यस्य च परमानन्दस्य ब्रह्मलोकाद्यान-न्दा मात्राः, उदघेरिव विप्रुषः । एवं शतगुणोत्तरोत्तरवृद्धयुपेता आनन्दा यत्रैकतां यान्ति, यश्च श्रोत्रियप्रत्यचोऽथैष एव सम्प्रसा-दलक्षणः परम आनन्दः । तत्र हि नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति; उनमें तृष्णारहित है; उ अ प्रकारके पुरुषका आनन्द भी आजा-नदेवोंके समान ही होता है - यह व अर्थ [ ' यम ' इसके ] ' च ' शब्दसे निकलता है । वह सौगुना किया हुआ आजान- तुल देवोंका आनन्द प्रजापतिलोकमें-विराट् शरीरमें एक आनन्द है । ता तथा विराट्के उपासक श्रोत्रिय— नत अधीतवेद, निष्पाप, निष्काम पुरुष- नन को भी वैसा ही आनन्द होता है- यथ इत्यादि सब अर्थं पूर्ववत् समझना देव चाहिये । उसके भी सौगने किये श्रो हुए परिमाणवाला ब्रह्मलोकमें अध अर्थात् हिरण्यगर्भात्मामें एक आनन्द उत्त है । ' यश्च ' इत्यादि वाक्यका अर्थ पेय पूर्ववत् समझना चाहिये । इससे ता आगे गणनाकी निवृत्ति हो जाती है । यह परम आनन्द है - ऐसा नन्न कहा गया है, समुद्रके बूँदके समान स ब्रह्मलोकादिके आनन्द जिस पर- श्रो मानन्दके केवल अंशमात्र हैं । च इस प्रकार उत्तरोत्तर सौगुनी सुख वृद्धिको प्राप्त हुए आनन्द जहाँ एक- सुख ताको प्राप्त हो जाते हैं और जो नाह श्रोत्रियको प्रत्यक्ष है, वही सम्प्रसाद-रूप परम आनन्द है । वहीँ न कोई बृ ० दूसरा देखता है, न कोई दूसरा

पृष्ठ 1023

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[ अध्याय ४ इत है; उस इस आनन्द भी आजा-ही होता है - यह के ] ' च ' शब्दसे कया हुआ आजान-प्रजापतिलोकमें-एक आनन्द है । उपासक श्रोत्रिय-T प, निष्काम पुरुष-आनन्द होता है-पूर्ववत् समझना भी सोने किये ला ब्रह्मलोकमें त्मामें एक आनन्द दि वाक्यका अर्थ चाहिये । इससे निवृत्ति हो जाती आनन्द है - ऐसा बूँद समान आनन्द जिस पर अंशमात्र हैं । उत्तरोत्तर सौगुनी आनन्द जहाँ एक-जाते हैं और जो है, वही सम्प्रसाद-द है । वहीँ न कोई न कोई दूसरा ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १०० ९ अतो भूमा, भूमत्वादमृतः; इतरे । तद्विपरीताः । अत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे तुल्ये, अकामहतत्वकृतो विशेष आनन्दशतगुणवृद्धिहेतुः । अत्रै तानि साधनानि श्रोत्रियत्वावृजि -नत्वाकामहतत्वानि तस्य तस्या-नन्दस्य प्राप्तावर्थादभिहितानि यथा कर्माण्यग्निहोत्रादीनि देवानां देवत्वप्राप्तौ । तत्र च श्रोत्रियत्वावृजिनत्व लक्षणे कर्मणी अधरभूमिष्वपि समाने इति न उत्तरानन्दप्राप्तिसाधने अभ्यु-पेयेते । अकामहत्तत्वं तु वैराग्य- । तारतम्योपपत्तेरुत्तरोत्तरभृम्या-नन्दप्राप्तिसाधनमित्यगवम्यते । स एष परम आनन्दो वितृष्ण-श्रोत्रिय प्रत्यक्षोऽधिगतः । तथा च वेदव्यास: --- " यच्च काम सुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् " इति । सुनता है; इसलिये वह भूमा है और भूमा होनेके कारण अमृत है । अन्य आनन्द उससे विपरीत [ अर्थात् नाशवान् ] हैं । यहाँ [ भिन्न - भिन्न पर्यायोंमें ] श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तो समान हैं, किंतु अकामहतत्वके कारण जो विशेषता है, वही आनन्दकी सौगुनी । वृद्धिका कारण है । जिस प्रकार अग्निहोत्रादि कर्म. देवताओंके देवत्वको प्राप्तिके कारण हैं, उसी प्रकार यहां ये श्रोत्रियत्व, अवृ-जिनत्व और अकामहतत्व उस - उस आनन्दकी प्राप्तिमें सावन हैं - यह बात अर्थतः कह दी गयी । इनमें श्रोत्रियत्व और अवृजिनत्वरूप कर्म तो निम्नभूमियों में भी समान हैं, इसलिये वे आगे के आनन्दोंकी प्राप्तिमें हेतु नहीं माने जाते, किंतु अकामहतत्व तो वैराग्यका तारतम्य हो सकनेके कारण आगे - आगेकी भूमियोंके आनन्दोंकी प्राप्तिका साधन है - ऐसा ज्ञात होता है । वही तृष्णाहीन श्रोत्रियको प्रत्यक्ष होने-वाला परम आनन्द है - ऐसा ज्ञात होता है । ऐसा ही व्यासजी भी कहते हैं- " लोकमें जो भी कामजनित सुख है और जो दिव्ध महान् सुख है, ये तृष्णाक्षयजनित सुखके सोलहवें अंशके समान भी नहीं हैं । ” बृ ० उ ० ६४–

पृष्ठ 1024

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१०१० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ एष ब्रह्मलोको हे सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः । सोऽहमे-वमनुशिष्टो भगवते तुम्यं सहस्रं ददामि गवाम् । श्रत ऊर्ध्वं वि-मोक्षायैव ब्रूहीति व्याख्यात-मेतत् । यंत्र ह विमोक्षायेत्यस्मिन् वा-क्ये याज्ञवल्क्यो विभयाञ्चकार भीतवान् । याज्ञवल्क्यस्य भयका -रणमाह श्रुतिः न याज्ञवल्क्यो वक्तृत्वसामर्थ्याभावाद् भीतवान -ज्ञानाद् वा । किं तर्हि? मेधावी राजा सर्वेभ्यो मा मामन्तेभ्यः प्रश्न निर्णयावसानेभ्य उदरौत्सी-दावृणोदवरोधं कृतवानित्यर्थः । यद् यन्मया निर्णीतं प्रश्नरूपं विमोक्षार्थं तत्तदेकदेशत्वेनैव कामप्रश्नस्य गृहीत्वा पुनः पुनम पर्यनुयुक्त एव, मेधावित्वा-दिति । एतद् भयकारणम्-सर्व मदीयं विज्ञानं काम प्रश्नव्या-जेनीपादित्सतीति ॥ ३३ ॥

' हे सम्राट्! यह ब्रह्मलोक है ' ना । ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले- ] ' इस प्रकार उपदेश किया हुआ मैं श्रीमान्को - आपको सहस्र गौएँ देता हूँ । अब आगे मोक्षके ति लिये ही कहिये । ' इस प्रकार इसकी प्न पहले व्याख्या की जा चुकी है । कर प्रव यहाँ ' मोक्षके लिये ही कहिये ' इस वाक्यके कहनेपर याज्ञवल्क्यजी डर गये । श्रुति याज्ञवल्क्यजीके विद्य भयका कारण बतलाती है - याज्ञ-वल्क्यजी बोलनेका सामर्थ्यं न विद्य रहने से अथवा अज्ञानवश नहीं अत डरे । तो फिर क्या बात थी? धर्म इसलिये कि इस मेधावी राजाने त मुझे सभी अन्तोंके लिये - प्रश्न- सर्वा म निर्णयोंके लिये उदरौत्सीत् - आवृत ' सर्व कर दिया अर्थात् रोक लिया I । मैंने परम मोक्षके लिये जिस - जिस प्रश्नका सर्वा निर्णय किया है, उसे यह मेघावी होनेके कारण कामप्रश्नके एकदेश- एवम रूपसे ग्रहण करके फिर भी प्रश्न संसा किये ही जाता है । उनके भयका साक्ष यही हेतु है कि कामप्रश्न के मिषसे विज्ञा ही यह तो मेरा सारा विज्ञान ले स्व लेना चाहता है ॥ ३३ ॥। आन

स ए

पृष्ठ 1025

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[ अध्याय ४ ! यह ब्रह्मलोक है ' ने कहा । [ जनक कार उपदेश किया को - आपको सहस्र अब आगे मोक्षके । ' इस प्रकार इसकी की जा चुकी है । 1 के लिये ही कहिये ' नेपर याज्ञवल्क्यजी ति याज्ञवल्क्यजीके बतलाती है - याज्ञ-नेका सामर्थ्य न अज्ञानवश नहीं - क्या बात थी? मेधावी राजाने -तोंके लिये - प्रश्न-उदरौत्सीत् - आवृत रोक लिया 1 । मैंने जिस - जिस उसे यह मेघव कामप्रश्न के एकदेश-के फिर भी प्रश्न है । उनके भा कामप्रश्न के मिषसे सारा विज्ञान ले ॥ ३३ ॥

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०११ सम्बन्ध - भाष्य अत्र विज्ञानमयः स्वयंज्यो-तिरात्मा स्वप्ने प्रदर्शितः । स्व-नान्तबुद्धान्तसंचारेण कार्य-करणव्यतिरिक्तता । कामकर्म-प्रविवेकश्चासङ्गतया महामत्स्य-दृष्टान्तेन प्रदर्शितः । पुनश्चा-विद्याकार्य स्वप्न एव घ्नन्ती चेत्यादिना प्रदर्शितम् । अर्थाद-विद्यायाः सतत्त्वं निर्धारितम् -तद्धर्माध्यारोपणरूपत्वमनात्म-धर्मत्वं च । तथा विद्यायाश्च कार्य प्रदर्शितं सर्वात्मभावः स्वप्न एव प्रत्यक्षतः ' सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ' इति । तत्र च सर्वात्मभावः स्वभावोऽस्य, एवम् श्रविद्याकामकर्मादिसर्व-संसारधर्मसम्बन्धातीतं रूपमस्य साक्षात् सुषुप्ते गृह्यते इत्येतद् विज्ञापितम् । स्वयंज्योतिरात्मा, एष परम आनन्दः; एष विद्याया विषयः; स एष परमः सम्प्रसादः सुखस्य । यहाँ स्वप्न में विज्ञानमय आत्माको स्वयंज्योति दिखाया गया है । स्वप्नस्थान और जाग-रितस्थान में संचारके द्वारा उसकी देह और इन्द्रियोंसे भिन्नता दिखायी गयी तथा महामत्स्यके दृष्टान्तसे असङ्गताके कारण उसका काम और कर्मोंसे पार्थक्य भी प्रदर्शित किया गया है । फिर ‘ घ्नन्तीव ' इत्यादि वाक्यसे यह दिखाया गया है कि अविद्याका कार्य स्वप्न ही है । इससे स्वतः ही आत्मापर अनात्मधर्मो का आरोप करना तथा अनात्मधर्म होना अविद्याका स्व-रूप दिखलाया गया । इसी तरह ' मैं सर्व हूँ - ऐसा मानता है, वह इसका परमलोक है ' इस वाक्यद्वारा प्रत्यक्षत: स्वप्न-में ही सर्वात्मभाव विद्याका कार्य दिखलाया गया । वहाँ सर्वात्मभाव इसका स्वभाव है, इस सूचित किया गया कि सुषुप्तावस्था-में इस आत्माका अविद्या, काम और कर्मादि सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोके सम्बन्धसे अतीत रूप प्रत्यक्ष ग्रहण किया जाता है । आत्मा स्वयंप्रकाश है, यह परम आनन्दस्वरूप है; विद्या विषय है; वह यह आत्मा ही परम

पृष्ठ 1026

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१०१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ च पराकाष्ठा --- इत्येतदेवमन्तेन । ग्रन्थेन व्याख्यातम् । तच्चैतत् । सर्वं विमोक्षपदार्थस्य दृष्टान्तभूतं बन्धनस्य च । ते चैते मोक्ष-बन्धने सहेतुके सप्रपञ्चे निर्दिष्टे विद्याविद्याकार्ये, तत् सर्वं दृष्टान्त-भूतमेवेति, तद्दान्तिकस्थानीये मोक्षबन्धने सहेतुके कामप्रश्नार्थ-भूते त्वया वक्तव्ये इति पुनः पर्यनुयुङ्क्ते जनकः - श्रत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति । तत्र महामत्स्यवत् स्वप्न बुद्धान्तो असङ्गः संचरत्येक आत्मा स्वयं-ज्योतिः -- इत्युक्तम् । यथा चासौ कार्यकरणानि मृत्युरूपाणि परि-त्यजन्नुपाददानश्च महामत्स्यवत् स्वप्नबुद्धान्तावनुसंचरति तथा जायमानो म्रियमाणश्च तैरेव मृत्यु-रूपैः संयुज्यते वियुज्यते च । ' उभौ लोकावनुसंचरति ' इति संचरणं स्वप्न बुद्धान्तानुसंचारस्य दार्शन्तिकत्वेन सूचितम् । तदिह सम्प्रसाद और सुखकी पराकाष्ठा है - यह सब यहांतक के ग्रन्थद्वारा बतलाया गया और यह सब मोक्ष-पदार्थ तथा बन्धनका दृष्टान्तभूत है । विद्या और अविद्या के कार्य भूत यि उन इन मोक्ष और बन्धनका हेतु और विस्तारके सहित निरूपण किया गया, किंतु वह सब दृष्टान्त-रूप ही है, अतः कामप्रश्न के विषय-भूत तथा उनके दान्तिकस्थानीय मोक्ष और बन्धनोंका आपको हेतु- सं के सहित वर्णन करना चाहिये-इसीसे जनक फिर प्रश्न करता है कि इससे आगे मोक्ष के लिये लिये ही उपदेश कीजिये । ऊपर यह बतलाया गया था कि महामत्स्य के समान स्वप्न और द्र जागरितमें एक ही स्वयंप्रकाश असङ्ग आत्मा संचार करता है । जिस प्रकार यह मृत्युके रूप देह पा और इन्द्रियोंको त्यागता एवं ग्रहण ही करता हुआ महामत्स्यके समान क्रमशः स्वप्न और जागरितस्थानों-में संचार करता है, उसी प्रकार जन्म और मरणको T सम हुआ भी मृत्युके रूपोंसे संयुक्त और री वियुक्त होता है । ‘ दोनों लोकोंमें क्रमशः संचार करता है ' इस वाक्य- चा द्वारा संचारको स्वप्न और जाग-रितके अनुसंचारके दाष्टन्तिकरूपसे यैव दिखाया है । उस संचारका यहाँ

पृष्ठ 1027

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[ श्रध्याय ४ सुखकी पराकाष्ठा हाँतक के ग्रन्थद्वारा और यह सब मोक्ष-न्धनका दृष्टान्तभूत अविद्या के कार्यभ और बन्धनका हेतु के सहित निरूपण तु वह सब दृष्टान्त-कामप्रश्न के विषय-दाष्टन्तिकस्थानीय नका आपको हेतु-न करना चाहिये-फिर प्रश्न करता है मोक्ष लिये बतलाया गया था क समान स्वप्न और क ही स्वयंप्रकाश संचार करता है । यह मृत्युके रूप देह त्यागता एवं ग्रहण महामत्स्यके समान और जागरितस्थानों-ता है, उसी प्रकार मरणको प्राप्त होता के रूपोंसे संयुक्त और है । ' दोनों लोकोंमें करता है ' इस वाक्य-को स्वप्न और जाग-करके दान्तिकरूपसे उस संचारका यहां ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ विस्तरेण सनिमित्तं संचरणं वर्ण यितव्यमिति तदर्थोऽयमारम्भः । तत्र च बुद्धान्तात् स्वप्नान्तम् श्रयमात्मानुप्रवेशितः । तस्मात् सम्प्रसादस्थानं मोक्षदृष्टान्त-भूतम् । ततः प्रच्याव्य बुद्धान्ते संसारव्यवहारः प्रदर्शयितव्यः," । इति तेनास्य सम्बन्धः । १०१३ | उसके कारणसहित विस्तारपूर्वक वर्णन करना है - इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । वहाँ ( सतरहवें मन्त्रमें ) इस आत्माका जागरितसे स्वप्नान्तमें अनुप्रवेश कराया गया है । अतः सम्प्रसाद ( सुषुप्त ) - स्थान मोक्षका दृष्टान्तभूत है | वहाँसे च्युत करके जागरित में संसारका व्यवहार प्रदर्शित करना है, अतः उसोसे इस ( आगे के वाक्य ) का सम्बन्ध है— आत्माकी संसाररूप जागरित स्थानमें पुनरावृत्ति स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्चैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या-द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥

वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गंसे ही यथास्थान जागरित अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥

स वै बुद्धान्तात् स्वप्नान्त-क्रमेण सम्प्रसन्न एष एतस्मिन् सम्प्रसादे स्थित्वा ततः पुन-रीषत् प्रच्युतः स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वेत्यादि पूर्ववद् बुद्धान्ता-यैव श्राद्रवति ॥ ३४ ॥।

जागरितसे स्वप्नान्तक्रमद्वारा सम्प्रसादको प्राप्त हुआ वह यह पुरुष इस सम्प्रसादमें स्थित रहकर फिर वहाँसे थोड़ा च्युत हो स्वप्ना-न्तमें रमण और विहारकर - इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये- फिर जागरितस्थानको हो लौट जाता है ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1028

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१०१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ मुमूर्षुकी दशाका वर्णन इत आरभ्यास्य संसारो वर्ण्यते; यथायमात्मा स्वप्नान्ताद् बुद्धा-न्तमागतः, एवमयमस्माद् देहाद् देहान्तरं प्रतिपत्स्यत इत्याहात्र दृष्टान्तम्-अब यहाँसे आगे संसारका क वर्णन किया जाता है; जिस प्रकार य यह आत्मा स्वप्नस्थान से जागरित-स्थानमें आया है, उसी प्रकार यह ण इस देहसे दूसरे देहको प्राप्त होगा- ण सो इसमें श्रुति दृष्टान्त बतलाती है- च तद् यथानः सुसमाहितमुत्सर्जद् यायादेवमेवायं घु श्र शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ उत्सर्जन् याति यत्रैतदूवछ्वासी भवति ॥ ३५ ॥ स्य

लोक में जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लादा हुआ छकड़ा शब्द करता चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हो शब्द यत करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊर्ध्वोच्छ्वास छोड़नेवाला हो जात है ॥ ३५ ॥

तत्तत्र यथा लोकेऽनः शकटं सुसमाहितं सुष्ठु भृशं वा समा-हितं माण्डोपस्करणेन उलूखल -मुसलशूर्पपिठरादिनान्नाद्येन च सम्पन्नं सम्भारेण श्राक्रान्तमि-त्यर्थः S5, तथा भाराक्रान्तं सदुत्स-र्जच्छन्दं कुर्वद् यथा यायाद् गच्छेच्छाकटिकेनाधिष्ठितंसत्, एवमेव यथोक्तो दृष्टान्तोऽयं शारीरः शरीरे भवः, | १. थाली या मथानी । लि यहाँ जिस प्रकार लोकमें सुस- पा माहित- सुष्ठु अथवा अत्यन्त समा-हित अर्थात् भाण्डादि गृहसामग्री-ऊखल, मूसल, सूप और पिठर ' " ) आदिसे तथा खाद्यसामग्रीसे सम्पन्न, तात्पर्य यह कि अत्यन्त बोझेसे ३ लदा हुआ छकड़ा उपर्युक्त प्राज्ञ प्रकारसे बोझेसे दबा होने के अन कारण गाड़ीवानके बैठकर हाँकने - वत पर शब्द करता चलता है, इसी लि प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त बताया निव गया है, यह शारीर अर्थात् शरीरमें शब्द

पृष्ठ 1029

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[ श्रध्याय४ से आगे संसारका ता है; जिस प्रकार -नस्थान से जागरित-है, उसी प्रकार यह देहको प्राप्त होगा-दृष्टान्त बतलाती है-यायादेवमेवायं उत्सर्जन याति छकड़ा शब्द करता अधिष्ठित हो शब्द डोड़नेवाला हो हा जाता प्रकार लोक में सुस-थवा अत्यन्त समा ण्डादि गृहसामग्री-सूप और पिठर द्यसामग्री से सम्पन्न, क अत्यन्त बोसे छकड़ा उपर्युक्त कैसे दबा होने के नके बैठकर हाँकने-चलता है, इसी यह दृष्टान्त बताया रीर अर्थात् शरीरमें ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ कोऽसौ? आन्मा लिङ्गोपाधिः, यः स्वप्नबुद्धान्ताविव जन्ममर-णाभ्यां पाप्मसंसर्गवियोगलक्ष-णाभ्यमिहलोक परलोकावनुसं-चरति । यस्पोत्क्रमणमनु प्राणा-द्युत्क्रमणम्, स प्राज्ञेण परेण आत्मना स्वयंज्योतिःस्वभावेन अन्वारूढोऽधिष्ठितः - अवमा-स्यमानः, तथा चोक्तम्-' आत्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्य-यते ' इति, उत्सर्जन् याति । तत्र चैतन्यात्मज्योतिषा भास्ये लिङ्गे प्राणप्रधाने गच्छति तदु-पाधिरण्यात्मा गच्छतीव । तथा श्रुत्यन्तरम् — “ कस्मिन्न्वहम् " ( प्र ० उ ० ६ । ३ ) इत्यादि “ ध्यायतीव " ( वृ ० उ ० ४ । ३ । ७ ) इति च; अत एवोक्तं प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ इति । अन्यथा प्राज्ञेनैकीभूतः शकट- । वत् कथमुत्सर्जन याति । तेन लिङ्गोपाधिरात्मा उत्सर्जन मर्मसु निकृत्यमानेषु दुःखवेदनया आर्तः शब्दं कुर्वन् याति गच्छति । १०१५ | रहनेवाला, कौन है वह? लिङ्ग-देहोपाधिक आत्मा, जो कि स्वप्न और जागरितस्थानोंके समान [ देह और पापके और जन्म और मरणके द्वारा क्रमश: इस लोक और परलोक में संचार करता है ।. तथा जिसके उत्क्रमण के साथ - साथ प्राणादिका उत्क्रमण होता है, वह स्वयंज्योतिःस्वरूप प्राज्ञ अर्थात् परात्मासे अन्वारूढ - अधिष्ठित यानी अवभासित हुआ - जैसा कि कहा है कि ' यह आत्मज्योतिसे हो इधर - उधर जाता है ' - शब्द करता जाता है । उस समय चैतन्यात्मज्योतिसे भास्य प्राणप्रधान लिङ्गदेहके जाने-पर उस लिङ्गदेहरूप उपाधिवाला आत्मा भी जाता - सा जान पड़ता है । ऐसी हो “ किसके उत्क्रमण करनेपर में उत्क्रान्त होता हूँ " तथा " डशनसा करता है " इत्यादि अन्य श्रुतियां भी हैं; इसीसे ' प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित हुआ ' ऐसा कहा है; नहीं तो प्राज्ञात्मा से एकी-भूत होनेपर यह छकड़े के समान शब्द करता कैसे जाता: अत: लिङ्गोपाधिक आ छेदन किये जानेपर ( मर्मस्थानोंसे छूटनेप और वेदना से व्याकुल हो शब्द करता हुआ जाता है ।

पृष्ठ 1030

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१०१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ तद् कस्मिन् काल इति । उच्यते यत्रेतद् भवति । एत-दिति क्रियाविशेषणम् । ऊर्ध्वो । च्छ्वासी यत्रोर्ध्वोच्छ्वासीत्वम- । स्य भवतीत्यर्थः । दृश्यमानस्या-प्यनुवदनं वैराग्य हेतोः - ईदृशः कष्टः खन्त्रयं संसारः, येनोत्ना न्तिकाले मर्मसु उत्कृश्यमानेषु स्मृतिलोपो दुःखवेदनार्तस्य पुरु-षार्थसाधन प्रतिपत्तौ चासामर्थ्य । परवशीकृत चित्तस्य । तस्माद् यावदियमवस्था नागमिष्यति, तावदेव पुरुषार्थसाधनकर्तव्यता-याम् अप्रमतो भवेदित्याह कारुण्याच्छ्रुतिः ॥ ३५ ॥

[ यदि कहें । ऐसा किस समय होता है? तो जिस समय ऐसा होता है, वह बतलाया जाता है । यहाँ ' एतत् ' क्रियाविशेषण है । ऊर्ध्वोच्छ्वासी अर्थात् जहां इसका ऊर्ध्वोच्छ्वास हो जाता है । यह अवस्था दिखायी देनेवाली है, तो भी वैराग्यके लिये इसका अनुवाद किया जाता है— निश्चय ही यह संसार ऐसा कष्टप्रद है कि देहत्याग -के समय मर्मस्थानोंका छेदन होते-. पर दुःख और वेदनासे व्याकुल हुए पुरुषकी स्मृति नष्ट हो जाती है तथा उस परवशचित्त पुरुषका पुरुषार्थके साधनोंकी प्राप्ति में कोई सामर्थ्य नहीं रहता । अत: जबतक यह अवस्था न आवे तबतक ही पुरुषको पुरुषार्थंसाधनोंके करने में सावधान रहना चाहिये - ऐसा श्रुति करुणावश कहती है ॥। ३५ ॥ ऊर्ध्वोच्छ्वास क्यों और किसलिये होता है? तदस्योघ्वच्छ्वासित्वं कस्मिन् उसका ऊर्ध्वोच्छ्वास किस काले किंनिमित्तं कथं किमर्थ वा समय किस कारण से किस प्रकार और किसलिये होता है । यह बत-स्यात् । इत्येतदुच्यते --- लाया जाता है— स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाणि-मानं निगच्छति तद् यथानं वोदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्ध-