बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1031–1040

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040

पृष्ठ 1031

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[ अध्याय ४ ऐसा किस समय जिस समय ऐसा लाया जाता है । क्रियाविशेषण है । र्थात् जहां इसका 7 जाता है । यह देनेवाली है, तो ये इसका अनुवाद — निश्चय ही यह है कि देहत्याग-नोंका छेदन होने.. नासे व्याकुल हुए ष्ट हो जाती है शचित्त पुरुषका की प्राप्ति में कोई ता । अतः जबतक आवे तबतक ही साधनों के करने में चाहिये- ऐसा श्रुति है ॥ ३५ ॥

है? र्वोच्छ्वास किस से किस प्रकार ता है । यह बत-तपता वाणि-नप्पलं वा बन्ध-ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१७ नात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥

वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोग के कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल - फल बन्धनसे छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर फिर जिस मार्ग से आया था, अभिव्यक्ति के लिये ही चला जाता है सोऽयं प्राकृतः शिरःपाण्यादि-मान् पिण्डो यत्र यस्मिन् काले-ऽयमणिमानं अणोर्भाव मणुत्वं कार्यमित्यर्थः, न्येति निग-च्छति, किनिमित्तम् १ जरया । वा स्वयमेव कालपक्कफलवञ्जीर्णः काश्यं गच्छति । उपतपतीत्यु-पतपञ्चरादिरोगः, तेनोपतपता चा, उपतप्यमानो हि रोगेण विषमाग्नितयान्नं भुक्तं न जर-यति, ततोऽन्नरसेनानुपचीय-मानः पिण्डः कार्श्यमापद्यते । तदुच्यते उपतपता वेत्यणिमानं निगच्छति । यदा का प्रतिपन्नो जरादिनिमित्तैः, तदोवच्छ्वा-उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष ॥ ३६ ॥

वह यह प्राकृत - शिर एवं हाथ-पाँव आदि अवयवोंवाला पिण्ड जिस समय अणिमा - अणुभाव - अणु-त्व अर्थात् कृशताको नैति ' प्राप्त हो जाता है । किस कारणसे? वृद्धावस्था से - कालद्वारा पकाये हुए फलके समान स्वयं ही जीर्ण - कुश हो जाता है । अथवा उपतपत्से-जो समीप रहकर तपाता है, वह ज्वरादि रोग ' उपतपत् ’ ( उपताप ) कहलाता है, उससे; क्योंकि रोगसे उपतप्त हुआ पुरुष विषम अग्नि हो जानेके कारण खाये हुए अन्नको नहीं पचा सकता, अतः अन्नके रससे वृद्धिको प्राप्त न होनेवाला पिण्ड कृशताको प्राप्त हो जाता है । इसीसे यह कहा जाता है कि ' उपतपता वा ' - अथवा ज्वरादि रोगसे कृशता-को प्राप्त हो जाता है । जिस समय वृद्धावस्थादि कारणोंसे शरीर अत्यन्त कृशताको प्राप्त हो जाता है, उस समय जीव ऊष्वच्छ्वास

पृष्ठ 1032

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१०१८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ सी भवति यदोर्ध्वोच्छ्वासी, तदा भृशाहितसम्भारशकट-वदुत्सर्जन् याति । जराभिभवो रोगादिपीडनं कार्यापत्तिश्च शरीरवतोऽवश्यम्भाविन एते-ऽनर्था इति वैराग्यायेदमुच्यते । यदासावुत्सर्जन याति तदा कथं शरीरं विमुञ्चति? इति दृष्टान्त उच्यते — तत्तत्र यथा आम्रं वा फलम्, उदुम्बरं वा पिप्पलं वा फलम् - विषमाने-कदृष्टान्तोपादानं मरणस्पानि-यतनिमित्तत्वख्यापनार्थम्, अ-नियतानि हि मरणस्य निमि-त्तान्यसंख्यातानि च । एतदपि वैराग्यार्थमेव; यस्मादयमनेकम-रणनिमिचवांस्तस्मात् सर्वदा मृत्योरास्ये वर्तत इति — बन्ध-नातू - बध्यते येन वृन्तेन सह सबन्धनकारणो रसो यस्मिन् वा वध्यते इति वृन्तमेवोच्यते बन्धनम्, तस्माद् रसाद् वृन्ताद् वा VACHANA । लेने लगता है; और जिस समय ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने लगत समय वह अत्यन्त भाराक्रान्त छकड़ेके समान शब्द करता हुआ प्रयाण करता है | देहधारीके लिये जरासे अभिभव, रोगादिकी पीड़ा और कृशताकी प्राप्ति – ये अनर्थं अवश्यम्भावी हैं; इसलिये वैराग्यके लिये ऐसा कहा जाता है । जिस समय वह शब्द करता हुआ प्रयाण करता है, उस समय किस प्रकार देहका त्याग करता है? इसमें दृष्टान्त कहा जाता है-सो जिस प्रकार आम्र फल, उदुम्बर ( गूलर ) अथवा पिप्पलफल - यहां कई विषम दृष्टान्त मृत्युके अनियत-निमित्तत्वको सूचित करने के लिये हैं, क्योंकि मृत्युके कारण अनिश्चित श और अगणित हैं । यह कथन भी ज्ञ वैराग्यके लिये ही है; क्योंकि यह a देह मरणके अनेकों कारणोंवाला है, इसलिये सर्वदा मृत्युके मुखमें ही पड़ा हुआ है 1 । बन्धनसे-जिसके द्वारा फल वृन्तसे बँधा रा रहता है, वह बन्धनका कारण-रस अथवा जिसमें वह बँधा रहता है, वह वृन्त ही बन्धन कहा I गया है, उस रस या वृन्तरूप

पृष्ठ 1033

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[ श्रध्याय ४ AAMAL जिस समय लगता है, उस भाराक्रान्त द करता हुआ हधारीके लिये गादिकी पीड़ा प्ति – ये अनर्थ लिये वैराग्यके ना है । शब्द करता है, उस समय त्याग करता हा जाता है-- फल, उदुम्बर प्पलफल - यहाँ युके अनियत-करने के लिये रण अनिश्चित कथन भी = क्योंकि यह कारणोंवाला नृत्युके मुखमें । बन्धनसे-वृन्तसे बँधा नका कारण-समें वह बँधा बन्धन कहा या वृन्तरूप ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१ ९. बन्धनात् प्रमुच्यते वाताद्यनेक-निमित्तम्; एवमेवायं पुरुषों लिङ्गात्मा लिङ्गोपाधिरेभ्योऽङ्गे -भ्यश्चक्षुरादिदेहावयवेभ्यः स म्प्रमुच्य सम्यङ्निर्लेपेन प्रमुच्य, न सुषुप्तगमनकाल इव प्राणेन रक्षन् किं तर्हि? सह वायुनोप-संहृत्य, पुनः प्रतिन्यायं पुनः शब्दात् पूर्वमप्ययं देहाद् देहान्त-रमसकुद् गतवान् यथा स्वप्न बुद्धान्तौ पुनः पुनर्गच्छति तथा पुनः प्रतिन्यायं प्रतिगमनं यथागतमित्यर्थः । प्रतियोनि योनिं योनिं प्रति कर्म श्रुतादि-वशादाद्रवति । किमर्थम्? प्राणायैव प्राणव्यू-हायैवेत्यर्थः । सप्राण एव हि गच्छति, ततः प्राणायैवेति विशे-षणमनर्थकम् प्राणव्यूहाय हि गमनं देहाद् देहान्तरं प्रति तेन बन्धनसे वायु आदि अनेकों कारणों-वश [ फल ] छूट जाता है; वैसे ही यह पुरुष - लिङ्गात्मा - लिङ्गोपाधिक जीव इन अङ्गोंसे अर्थात् शरीरके चक्षु आदि अवयवोंसे सम्प्रमुक्त होकर अर्थात् सम्यक् - निर्लेपभावसे छूटकर जिस प्रकार सुषुप्तावस्था में जाने के समय प्राणके द्वारा इसकी रक्षा करता है, उस प्रकार नहीं; तो किस प्रकार? प्राणवायुके सहित इन्द्रियोंका उपसंहार करके पुनः प्रतिन्याय - यहाँ ' पुन: ' शब्दसे यह आशय है कि जिस प्रकार जीव पुनः - पुन: जागरित और स्वप्न-अवस्थाओं में जाता है, उसी प्रकार पहले भी यह एक देहसे दूसरे देहमें वारंवार गया था; अतः पुनः प्रति-न्याय - जैसे पहले आया था वैसे हो दूसरे देहमें चला जाता है । प्रतियोनि अर्थात् अपने कर्म और विद्या के अनुसार प्रत्येक योनिमें जाता है । किसलिये जाता है? प्राणके लिये ही अर्थात् प्राणव्यूह के प्राण तो जाता ही है, ऐसी स्थितिमें ' प्राणायैव ' यह विशेषण व्यर्थं होगा; लिङ्गात्माका जो एक देह से दूसरे देहमें जाना है, वह प्राणके

पृष्ठ 1034

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१०२० वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

ह्यस्य कमफलापभागार्थसिद्धिः ।

न प्राणसत्तामात्रेण । तस्मात्ताद -र्थ्या युक्तं विशेषणं प्राणव्यूहा -येति ॥ ३६ ॥

व्यूहकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही होता है; उसीसे इसके कर्म-फलभोगकी सिद्धि होती है, केवल प्राणकी सत्ता से ही नहीं; अतः प्राण भोगका अङ्ग है यह सिद्ध करने के लिये ' प्राणव्यूहाय ' यह विशेषण देना उचित है ॥ ३६ ॥

-देहान्तरग्रहणका प्रकार तत्रास्येदं शरीरं परित्यज्य गच्छतो नान्यस्य देहान्तरस्योपा-दाने सामर्थ्यमस्ति देहेन्द्रिय-वियोगात्; न चान्येऽस्य भृत्य-स्थानीया गृहमिव राज्ञे शरीरा-न्तरं कृत्वा प्रतीक्षमाणा विद्यन्ते; अथैवं सति कथमस्य शरीरान्त-रोपादानमिति? उच्यते --- सर्वं ह्यस्य जगत् स्व-कर्मफलोपभोगसाधनत्वायोपात्तं स्वकर्मफलोपभोगाय चायं प्रवृत्तो देहाद्देहान्तरं प्रतिपित्सुः; तस्मात् सर्वमेव जगत् स्वकर्मणा प्रयुक्तं तत्कर्मफलोपभोगयोग्यं साधनं शङ्का - मरणकालमें इस शरीर -को छोड़कर जानेवाले पुरुषमें दूसरे • देहको ग्रहण करनेका सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि उसके देह और इन्द्रियों-का वियोग हो जाता है और राजा के लिये घर बनाकर प्रतीक्षा करनेवाले सेवकों के समान इसके a लिये दूसरा देह बनाकर प्रतीक्षा च करनेवाले इन्द्रियादि हैं नहीं; ऐसी स्थिति में इसका अन्य देह ग्रहण करना कैसे सम्भव हो सकता है? f समाधान - बतलाते हैं - इस जीव- f के लिये सारा संसार अपने कर्म-I फलभोगके साधनरूपसे प्राप्त हुआ है और स्वकर्मफलभोगके लिये ही यह एक देहसे दूसरा देह प्राप्त करनेका इच्छुक होकर प्रवृत्त प्रेरित होता; अतः स्वकर्मसे सारा ही जगत् उसके स कर्मफलभोगके योग्य साधन होनेसे

पृष्ठ 1035

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[ अध्याय ४ भिव्यक्तिके लिये इसके कर्म-होती है, केवल नहीं; अतः है यह सिद्ध व्हाय ' यह है ॥ ३६ ॥

नमें इस शरीर -पुरुषमें दूसरे सामर्थ्य नहीं न्ह और इन्द्रियों-जाता है और बनाकर प्रतीक्षा समान इसके नाकर प्रतीक्षा हैं नहीं; ऐसी देह ग्रहण हो सकता है? हैं- इस जीव-र अपने कर्म--प से प्राप्त हुआ लभोगके लिये दूसरा देह इच्छुक होकर अतः स्वकर्मसे जगत् उसके य साधन होनेसे ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १०२१ कृत्वा प्रतीक्षत एव; " कृतं लोकं पुरुषोऽभिजायतॆ ” इति श्रुतेः; यथा स्वप्नाञ्जागरितं प्रति पित्सोः, तत् कथम् १ इति लोकप्रसिद्धो दृष्टान्त उच्यते— उसकी प्रतीक्षा करता ही है; जैसा कि “ पुरुष भूतपञ्चकद्वारा रचे हुए शरीरको सर्वतः व्याप्त करके उत्पन्न होता है " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, जैसे कि स्वप्नावस्थासे जाग-रितस्थानको प्राप्त करनेकी इच्छा-वाले पुरुषका शरीर पहलेहीसे तैयार रहता है; सो कैसे? इस विषयमें यह लोकप्रसिद्ध दृष्टान्त कहा जाता है-तद् यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूत-ग्रामण्यो ऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्यय-मागच्छतीत्येव हैवंविद् सर्वाणि भूतानि प्रति-कल्पन्त इदं ब्रह्मायातीमागच्छतीति ॥ ३७ ॥

सो जिस प्रकार आते हुए राजाको उग्रकर्मा एवं पापकर्म में नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान आये, ये आये ' इस प्रकार कहते हुए कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत ' यह ब्रह्म कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥

तत्तत्र यथा राजानं राज्याभि-षिक्तमायान्तं स्वराष्ट्रे, उग्रा जाति-विशेषाः क्रूरकर्माणो वा प्रत्येनसः, प्रति प्रत्येनसि पापकर्मणि नियु-क्ताः प्रत्येनसस्तस्करादिदण्ड-नादौ नियुक्ताः सूताश्रग्राम-ण्यश्च सूतग्रामण्यः --- सूता वर्ण-सङ्करजातिविशेषा ग्रामण्यो ग्रा- | और निवासस्थान तैयार रखकर ‘ ये प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस आता है, यह आता है ' इस प्रकार उसमें दृष्टान्त - जिस प्रकार अपने राष्ट्रमें आते हुए राज्या-भिषिक्त राजाकी उग्र - जातिविशेष अथवा क्रूर कर्म कर्म करनेवाले एवं प्रत्येना- प्रत्येक एनस् यानी पाप-कर्ममें नियुक्त अर्थात् चौरादिको दण्ड देने आदि कार्यों में नियुक्त सूत और ग्रामणी - सूत एक वर्णसंकर जातिविशेष तथा ग्रामणी ग्रामके नेताओं ( मुखिया

पृष्ठ 1036

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१०२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ मनेतारस्ते पूर्वमेव राज्ञ श्राग-मनं बुद्ध्वा, अन्नैर्भोज्यभक्ष्या-दिप्रकारैः, पानैर्मदिरादिभिः श्रावसथैश्व प्रासादादिभिः प्रति-कल्पन्ते निष्पन्नैरेव प्रतीचन्ते ' श्रयं राजा श्रापात्ययमागच्छ-' ति ' इत्येवं वदन्तः । यथायं दृष्टान्तः, एवं हैवंविदं कर्मफलस्य वेदितारं संसारिण-मित्यर्थः, कर्मफलं हि प्रस्तुतं तदेवंशब्देन परामृश्यते, सर्वाणि भूतानि शरीरकर्तॄणि करणानु-ग्रहीतृणि चानित्यादीनि तत्स्क -प्रयुक्तानि कृतैरेव कर्मफलोप-भोगसाधनैः प्रतीक्षन्ते । ' इदं ब्रह्म भोक्त कर्तृ चास्माकमायाति तथेदमागच्छति ' इत्येवमेव च कृत्वा प्रतीक्षन्त इत्यर्थः ॥ ३७ ॥

| लोगों ) को कहते हैं - वे पहलेहीसे राजाके आनेका समाचार जानकर भक्ष्यभोज्यादिरूप अन्न और मदिरा | आदि पान तथा महल आदि आवसथ ( निवासस्थान ) के सहित ' प्रतिकल्पन्ते ' अर्थात् तैयार किये हुए इन अन्न - पानादिके सहित ' यह राजा आता है, राजा आता है ' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं । जैसा यह दृष्टान्त है, उसी प्रकार इस ऐसा जाननेवाले अर्थात् कर्मफलके ज्ञाता संसारीकी - यह क कर्मफलका ही प्रसङ्ग है, इसलिये ६ ' एवं ' शब्दसे उसीका परामर्श इ किया गया है - शरीरकी रचना करनेवाले सम्पूर्णं भूत और इन्द्रियों-के अनुग्राहक सूर्यादि देवता, उसके अ कर्मोंसे प्रेरित होकर उसके किये न हुए कर्मफलभोगके साधनों सहित प्रतीक्षा करते हैं । वे ' यह ब्रह्म मा अर्थात् कर्ता - भोक्ता जी हमारे पास आ है ' ऐसा भाव रखकर उसकी ना प्रतीक्षा करते हैं - ऐसा इसका | तात्पर्य है || ३७ || गा प्राणोंके देहान्तरगमनका प्रकार भो तमेवं जिगमिषु के सह इस प्रकार जानेके लिये तैयार गच्छन्ति १ ये वा गच्छन्ति हुए उस जीवके साथ कौन जाते प्रा ते हैं? और जो परलोक - शरीरकी रचना

पृष्ठ 1037

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[ अध्याय ४ हैं - वे पहले ही से चार जानकर और मदिरा महल आदि ब ) सहित तैयार किये दि सहित ' यह जा आता है ' हुए प्रतीक्षा न्त है, उसी ननेवाले अर्थात् संसारी की यह है, इसलिये का परामर्श नारकी रचना और इन्द्रियों-देवता, उसके उसके किये धनों सहित वे ' यह - जीव यह आ रहा खकर उसकी - ऐसा इसका ककी के लिये तैयार कौन जाते. हारीरकी रचना त्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२३ किं तत्क्रियाप्रणुन्ना आहोस्वित् करनेवाले आदित्यादि भूत जाते हैं, तत्कर्मवशात् स्वयमेव गच्छन्ति वे उसके वागादि व्यापार [ यानी कहने आदि ] से प्रेरित होकर परलोकशरीरकर्तॄणि च भूता- जाते हैं अथवा उसके कर्मवश स्वयं हो जाते हैं - इसमें दृष्टान्त कहा नीति; अत्रोच्यते दृष्टान्तः । जाता है । तद् यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्यो ऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोछ्वासी भवति ॥ ३८ ॥

जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्र-कर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत प्रकार जब यह ऊर्ध्वोच्छ्वास लेने इस आत्मा के अभिमुख होकर इसके तद् यथा राजानं प्रयियासन्तं प्रकर्षेण यातुमिच्छन्त मुग्राः प्रत्ये-नसः सूतग्रामण्यस्तं यथाभिस-मायन्त्याभिमुख्येन समायन्स्ये कीभावेन तमभिमुखा श्रायन्त्य-नाज्ञप्ता एव राज्ञा केवलं तज्जि-गमिपाभिज्ञाः, एवमेवे ममात्मानं भोक्तारमन्तकाले मरणकाले सर्वे प्राणा वागादयोऽभिसमायन्ति । एवं गाँवके नेतालोग जाते हैं, उसी लगता है तो अन्तकालमें प्राण साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥

- वह दृष्टान्त - जिस प्रकार जाने-की तैयारी करनेवाले अर्थात् प्रकर्ष-से जानेकी इच्छावाले अर्थात् जानेकी अत्यन्त इच्छा रखनेवाले राजाके अभिमुख होकर उसके उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेतालोग एक साथ मिलकर सामने आते हैं; राजाकी आज्ञाके बिना ही केवल उसकी जानेकी इच्छा जानकर ही तैयार हो जाते हैं, उसी प्रकार अन्तकाल यानी. मरणसमयमें वागादि सम्पूर्ण प्राण भोक्ता आत्मा-के सम्मुख एकत्रित हो जातें हैं ।

पृष्ठ 1038

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१०२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवतीति | ' यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ' इसको व्याख्यातम् ॥ ३८ ॥ व्याख्या पहले कर दी गयी है ॥ ३८ ॥

f इति वृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये तृतीयं ज्योतिर्ब्राह्मणम् ॥ ३ ॥ ए

चतुर्थ ब्राह्मण यय मरणोन्मुख जीवकी दशाका वर्णन स यत्रायमात्मा ---- संसारोप-वर्णनं प्रस्तुतम् । तत्रायं पुरुष एम्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य इत्यु-क्तम् । तत् सम्प्रमोक्षणं कस्मिन् काले कथं वा १: इति सविस्तरं संसरणं वर्णयितव्यमित्या-रम्यते ' स यत्रायमात्मा ' यहाँ संसार- ति के उपवर्णनका प्रसङ्ग है । उसमें I ' यह आत्मा इन अङ्गोंसे सम्यक् स प्रकारसे मुक्त होकर ' ऐसा कहा न गया है । वह आत्माकी सम्यक् मुक्ति किस समय अथवा किस प्रकार होती है - इसका विस्तार- स पूर्वक वर्णन करना है — इसीसे वा आरम्भ किया जाता है— ह स यत्रायमात्माबल्यं न्येत्य सम्मोहमिव न्येत्य-थैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स एतास्ते जोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ्ं पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥

वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहको प्राप्त हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखता से आते हैं । वह इन [ प्राणोंकी । तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त ( अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है । जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सर्वं ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥

पृष्ठ 1039

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[ अध्याय ४ नो भवति ' इसकी दी गयी है || ३८ || ' यहाँ संसार-नसङ्ग है । उसमें अङ्गोंसे सम्यक् कर ' ऐसा कहा माकी सम्यक् अथवा किस इसका विस्तार-रना है - इसीसे ता है— इमिव न्येत्य-स्तेजोमात्राः त्रैष चाक्षुषः ॥ १ ॥

सम्मोह भिमुखता से आते रसे ग्रहण करके जिस समय यह रूपज्ञानहीन ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२५ सोऽयमात्मा प्रस्तुतो तंत्र य-रिमन् कालेऽवन्य मबलभावं नि एत्य गत्वा, यद् देहस्य दौर्बल्यं तदात्मन एव दौर्बल्यमित्युपच -र्यतेऽवन्यं न्येत्येति, न ह्यसौ स्वतोऽमूर्तत्वादवलभावं गच्छ ति । तथा सम्मोहमिच – सम्मू-ढता सम्मोहो विवेकाभावः, सम्मूढतामिव न्येति निगच्छति । न चास्य स्वतः सम्मोहोऽसम्मो-हो वास्ति, नित्य चैतन्यज्योति: -स्वभावत्वात् । तेनेवशब्दः सम्मोहमिच न्येतीति उत्क्रान्ति-काले हि करणोपसंहारनिमित्तो व्याकुलीभावः 9 श्रात्मन इव लक्ष्यते लौकिकः; तथा च वक्तारो भवन्ति, सम्मूढः सम्मूढोऽयमिति । अथवा उभयत्र इवशब्दप्रयो-गो योज्यः, अल्पमिव न्येत्य सम्मोहमित्रन्येतीति, उभयस्थ वह यह प्रस्तुत आत्मा जिस समय अबल्य - अवलभावको प्राप्त होकर, यहाँ जो देह की दुर्बलता है, वह आत्माकी ही दुर्बलता है, इस प्रकार उपचारसे कहा जाता है कि अवलभावको प्राप्त होकर, स्वयं अमूर्त होनेके कारण यह अबलभाव-को प्राप्त नहीं होता । तथा मानो सम्मोहको [ प्राप्त होता है ] सम्मू-ढताको ही सम्मोह कहते हैं, सम्मोह का अर्थ है विवेकका अभाव, इस प्रकारकी सम्मूढताको मानो प्राप्त होता है । इसे स्वतः सम्मोह अथवा असम्मोह है भी नहीं, क्योंकि यह नित्यचैतन्यज्योतिःस्वरूप है । इसी-. से ' सम्मोहमिव न्येति ' इसमें ' इव ' शब्दका प्रयोग किया गया है; क्यों-कि लौकिक पुरुषों को उत्क्रान्तिके समय इन्द्रियोंके उपसंहारके कारण होनेवाली व्याकुलता आत्माको - सी जान पड़ती है और ऐसा ही कहने-वाले कहते भी हैं कि यह सम्मूढ-अत्यन्त अचेत हो गया है । अथवा ' अबत्यम् ' और ' सम्मो-हम् ' दोनोंही के साथ ' इव ' शब्द-का प्रयोग करना चाहिये; अर्थात् मानो अबलताको प्राप्त मानो सम्मूढताको | प्राप्त हो जाता है; क्योंकि दोनों-वृ ० उ०६५-

पृष्ठ 1040

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१०२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ NNN परोपाधिनिमित्तत्वाविशेषात् स- हीका अन्योपाधिकृत होना समान मानकर्तृक निर्देशाच्च । अथास्मिन् काले एते प्राणा वागादय एनमात्मानमभिसमा यन्ति । तदास्य शरीरस्यात्मनो -ऽङ्गेभ्यः सम्प्रमोक्षणम् । कथं पुनः सम्प्रमोक्षणम् ९ केन वा प्रकारेणात्मानमभिसमायन्ति १ इत्युच्यते-स श्रात्मा एतास्तेजो मात्रा ः— हे, तथा दोनोंहो का एक कर्ता बतलाया गया है । इस समय ये वागादि प्राण इस श आत्माके अभिमुख आते हैं । तब इस देही आत्माका अङ्गोंसे सर्वथा मोक्ष होता है । किंतु वह मोक्ष कैसे होता है और किस प्रकार ये आत्माके अभिमुख आते हैं? सो बतलाया जाता है— वह आत्मा इन तेजोमात्राओं-तेजसो मात्रास्ते जोमात्रास्तेजोऽव- को -तेजकी मात्रा तेजोमात्रा यानी यवा रूपादिप्रकाशकत्वाच्चक्षुरा-दीनि करणानीत्यर्थः, ता एताः समभ्याददानः सम्यङ् निर्लेपेना-म्याददान श्रभिमुख्येनाददानः संहरमाणः- तत्स्वप्नापेक्षया विशेषणं समिति, न तु स्वप्ने निर्लेपेन सम्यगादानम्, अस्ति स्वादानमात्रम्, “ गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुः; ' ( बृ ० उ ० २ । १ । १७ ) " अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय ” ( ४ | ३ | १६ ) “ शुक्रमादाय ” ( ४ । ३ । ११ ) तेजके अवयव अर्थात् रूपादिकी प्रकाशक होने के कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ तेजोमात्रा हैं, उन इन इन्द्रियोंका समभ्यादान — सम्यक् अर्थात् निर्लेपभावसे अभ्यादान-अभिमुखतया आदान अर्थात् उप-संहार कर, हृदय यानी पुण्डरीका-काशमें ही अनुकान्त - अन्वागत होता है अर्थात् बुद्धि आदिके विक्षेपका उपसंहार हो जानेपर हृदयमें ही अभिव्यक्तविज्ञानवान् होता है । ' समभ्याददानः ' इस क्रियापदमें ' सम् ' यह विशेषण स्वप्नकी अपेक्षासे है, क्योंकि स्वप्नमें निर्लेपभावसे चक्षु आदि -का उपसंहार नहीं होता, केवल आदान ( उपसंहार ) मात्र तो होता