बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1041–1050

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050

पृष्ठ 1041

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[ अध्याय४ धिकृत होना समान हीका एक कर्ता वागादि प्राण इस आते हैं । तब का अङ्गोंसे सर्वथा किंतु वह मोक्ष कैसे किस प्रकार ये आते हैं? सो है— इन तेजोमात्राओं-- तेजोमात्रा यानी अर्थात् रूपादिकी कारण चक्षु आदि हैं, उन इन ज्यादान – सम्यक् वसे अभ्यादान-दान अर्थात् उप-यानी पुण्डरीका-. नुक्रान्त - अन्वागत बुद्धि आदिके र हो जानेपर व्यक्तविज्ञानवान् स्याददान: ' इस यह विशेषण से है, क्योंकि चसे चक्षु आदि-होता, केवल • मात्र तो होता ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२७ इत्यादिवाक्येभ्यः - – हृदयमेव पुण्डरीकाकाशमन्ववक्रामत्यन्त्रा । गच्छति हृदयेऽभिव्यक्तविज्ञानो भवतीत्यर्थः, बुद्धयादिविक्षेपो-पसंहारे सति । न हि तस्य स्वतश्चलनं विक्षे-पोपसंहारादिविक्रिया वा; “ ध्याय-तोब लेलायतीच " ( ४ । ३ । ७ ) इत्युक्तत्वात् । बुद्धधाद्युपाधिद्वा रैव हि सर्वविक्रियाध्यारोप्यते तस्मिन् । कदा पुनस्तस्य तेजोमात्रा-भ्यादानम् इत्युच्यते— स यत्रैव चक्षुपि भवश्चाक्षुषः पुरुष आदि-त्यांशो भोक्तुः कर्मणा प्रयुक्तो यावद्देहधारणं तावच्चक्षुषोऽनुग्रहं कुर्वन् वर्तते, मरणकाले स्वस्य चक्षुरनुग्रहं परित्यजति, स्वमादि-त्यात्मानं प्रतिपद्यते । तदेतदुक्तम्-है, जैसा कि " वाक् गृहीत हो जाती है, चक्षु गृहीत हो जाती है " " इस सर्वावान् लोककी मात्राको ग्रहण कर " " शुक्रको ग्रहण कर " इत्यादि वाक्योंसे सिद्ध होता है । आत्माके चलन अथवा विक्षे-पोपसंहारादि विकार स्वतः नहीं होते; जैसा कि " ध्यायतीव लेलाय-तीव " इत्यादि मन्त्रद्वारा कहा गया है । बुद्धि आदि उपाधियोंके द्वारा ही उसमें सब प्रकारके विकारका आरोप किया जाता है । किंतु उसकी तेजोमात्राओंका उपसंहार कब होता है? सो बत-लाया जाता है - जिस समय भी वह चक्षुमें रहनेवाला चाक्षुष पुरुष आदित्यांश, जो भोक्ताके कर्मसे प्रेरित होकर जबतक देह धारण किया जाता है, तबतक उसके नेत्रों-का उपकार करता हुआ विद्यमान रहता है, मरणकालमें इसके चक्षु-का उपकार करना छोड़ देता है, अर्थात् अपने आदित्यस्वरूपको प्राप्त हो जाता है । इसीसे यह कहा है-" यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्यामि बाग- " जब इस मृत पुरुषकी वागिन्द्रिय प्येति वातं प्राणञ्चक्षुरादित्यम् " अग्निमें, प्राण वायुमें और नेत्र आदित्यमें लीन हो जाते हैं " ( ३ । २ । १३ ) इत्यादि । इत्यादि ।

पृष्ठ 1042

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१०२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ पुनर्देहग्रहणकाले संश्रयि-व्यन्ति, तथा स्वप्स्यतः प्रबुध्य-तयः तदेतदाह-- चाक्षुषः पुरुषो यत्र यस्मिन् काले पराड् पर्या-वर्तते परि समन्वात् पराङ् व्या-बर्तत इति, अथात्रास्मिन् काले ऽरूपज्ञो भवति, मुमूर्षु रूपं न जानाति । तदां अयमात्मा चक्षु रादितेजोमात्राः समभ्याददानो भवति स्वप्नकाल इव ॥ १ ॥

देहग्रहण समय पुनः | उसका आश्रय ले लेंगे, ऐसा ही सोने और जागनेवाले पुरुषके विषय-में भी होता है । इसीसे श्रुति कहती ब है - जिस समय चाक्षुष पुरुष पराङ्- स | पर्यावर्तन - सब ओरसे अपनी ओर क व्यावर्तन कर लेता है, उस समय क पुरुष अरूपज्ञ हो जाता है अर्थात् ह मुमूर्षुको रूपका ज्ञान नहीं होता । ज | उस समय स्वप्नकाल के समान यह ने आत्मा चक्षु आदि तेजोमात्राओंको सब ओर से सम्यक् - निर्लेपभावसे । ग्रहण करनेवाला होता है ॥ १ ॥

लिङ्गात्मामें विभिन्न इन्द्रियोंके लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन एकोभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्र-तीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरेकीभवति न वद-तीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत द इत्याहुरेकीभवति न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजा-नातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्यायं प्रद्योतते तेन लि प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूघ्नों वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्कामन्तं प्राणोऽनूत्का-मति प्राणमनूत्क्रामन्तं सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति दे सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्वव क्रामति तं विद्या- रस कर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २ ॥ व

देखता [ ' चक्षु ऐसा - इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है, तो लोग ' नहीं स्प कहते हैं, [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है, तो ' नहीं

पृष्ठ 1043

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[ अध्याय ४ के समय पुनः लेंगे, ऐसा ही सोने पुरुषके विषय-इसीसे श्रुति कहती क्षुष पुरुष पराङ्-रसे अपनी ओर है, उस समय जाता है अर्थात् नहीं होता । के समान यह ते जोमात्राओं को - निर्लेपभावसे होता है ॥ १ ॥

उसके ति न जिघ्र-वति न वद-तिन मनुत न विजा-द्योतते तेन वा मूर्ध्ना णोऽनूत्का-नूत्क्रामन्ति तं विद्या-तो लोग ' नहीं ती है, तो ' नहीं ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०२ ९ सूँघता ' ऐसा कहते हैं, [ रसनेन्द्रिय ] एक रूप हो जाती है तो ' नहीं चखता ' ऐसा कहते हैं, [ वागिन्द्रिय ] एक रूप हो जाती है तो ' नहीं बोलता ' ऐसा कहते हैं, [ श्रोत्रेन्द्रिय ] एक रूप हो जाती है तो ' नहीं सुनता ' ऐसा कहते हैं, [ मन । एकरूप हो जाता है तो ' मनन नहीं करता ' ऐसा कहते हैं, [ त्वगिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो ' स्पर्श नहीं करता ' ऐसा कहते हैं और यदि [ बुद्धि लिङ्गात्मासे ] एक रूप हो जाती है तो ' नहीं जानता ' ऐसा कहते हैं । उस इस हृदयका अग्र ( बाहर जानेका मार्ग ) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य भागसे बाहर निकलता है । उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राण उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण ( इन्द्रियवर्ग ) उत्क्रमण करते हैं; उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है; उस समय उसके साथ - साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा ( अनुभूत विषयोंकी वासना ) भी जाते हैं ॥ २ ॥

एकीभवति करणजातं स्वेन लिङ्गात्मना, तदेनं पार्श्वस्था प्राहुर्न पश्यतीति । तथा घ्राण-देवतानिवृत्तौ घ्राणमेकी मवति लिङ्गात्मना, तदा न जिघ्रती-त्याहुः । समानमन्यत् । जिह्वायां सोमो वरुणो वा देवता, तन्निवृत्यपेक्षया न रसयत इत्याहु: । तथा न वदति न शृणोति न मनुते न स्पृशति न विजानातीत्याहुः । । जब इन्द्रियवर्गं अपने लिङ्गदेह-के साथ एकरूप हो जाते हैं, तब आसपास बैठे हुए लोग कहते हैं-' यह नहीं देखता ' । इसी प्रकार जब घ्राणदेवताके निवृत्त होनेपर घ्राणेन्द्रिय लिङ्गात्माके साथ एक-रूप हो जाती है, तब ' नहीं सूँघता ' ऐसा कहते हैं । शेष अर्थं इसीके समान है । जिह्वामें सोम या वरुण देवता है, उसकी निवृत्तिकी अपेक्षासे ' नहीं चखता ' ऐसा कहते हैं । इसी तरह ' नहीं बोलता, नहीं सुनता, मनन नहीं करता, स्पर्श नहीं करता, नहीं जानता ' ऐसा कहते हैं ।

पृष्ठ 1044

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१०३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ तदोपलक्ष्यते देवतानिवृत्तिः कर- । णानां च हृदय एकीभावः । तत्र हृदय उपसंहृतेषु करणेषु योऽन्तर्व्यापारः स कथ्यते— तस्य हैतस्य प्रकृतस्य हृदयस्य हृदयच्छिद्रस्येत्येतत्, अग्र नाडी-मुखं निर्गमनद्वारं प्रद्योतते स्वप्न -काल इव स्वेन भासा तेजोमात्रा दानकृतेन स्वेनैव ज्योतिषा आत्मनैव च । तेनात्मज्योतिषा प्रद्योतेन हृदयाग्रेणैष आत्मा विज्ञानमयो लिङ्गोपाधिर्निर्गच्छ-ति निष्क्रामति । तथा आथ-र्वणे " कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति " ( प्र ० उ ० ६ । ३ ) “ स प्राणमसृजत ” ( प्र ० उ ० ६ । ४ ) इति । तत्र चात्म चैतन्यज्योतिः सर्वदाभिव्यक्ततरम् । तदुपाधि-द्वारा ह्यात्मनि जन्ममरणगमना-ब्रा उस समय इन्द्रियाभिमानी देव-ताओं की निवृत्ति और इन्द्रियोंका गम हृदयमें एकीभाव उपलक्षित होता है । व्य उस समय इन्द्रियोंका हृदय में विद्य उपसंहार हो जानेपर जो अ अन्त-र्व्यापार होता है, उसका वर्णन तज्ज किया जाता है उस इस प्रकृत स्थ हृदयका अर्थात् हृदयच्छिद्रका अग्न प्रक नाडीमुख अर्थात् बाहर निकलनेका ण द्वार प्रद्योतित - अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, जिस प्रकार स्वप्न- निि कालमें आत्मज्योतिसे स्थित रहता स्या है, उसी प्रकार इस समय भी तेजो-मात्राओंके ग्रहणके कारण आत्म- प्राध ज्योतिसे तथा स्वयं अपने - आपसे वाय ही प्रकाशित हो जाता है । उस आत्मज्योतिसे प्रकाशित हृदयद्वारसे यथा यह लिङ्गोपाधिक विज्ञानमय आत्मा त निकल जाता है । ऐसा ही आथ- परल वैण ( प्रश्न ) उपनिषदमें भी कहा भ हे " [ उसने सोचा- ] में किसके उत्क्रमण करनेपर उत्क्रान्त होऊँगा धिक और किसके प्रतिष्ठित होनेपर प्रति- मति ष्ठित हो जाऊँगा " " उसने प्राणकी वाग रचना की " इत्यादि । उस लिङ्गात्मामें आत्मचैतन्य- मनि ज्योति सर्वदा अत्यन्त अभिव्यक्त ख्या रहती है । उस उपाधिके द्वारा ही आत्मामें जन्म, मरण, गमन, साथ

पृष्ठ 1045

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[ श्रध्याय ४ द्रयाभिमानी देव-और इन्द्रियोंका उपलक्षित होता है । इन्द्रियों का हृदय में जानेपर जो अन्त-है, उसका वर्णन - उस इस प्रकृत हृदयच्छिद्रका अग्र - बाहर निकलनेका अत्यन्त प्रकाशित जिस प्रकार स्वप्न-तिसेस्थित रहता स समय भी तेजो-के कारण आत्म-स्वयं अपने - आपसे जाता है । उस काशित हृदयद्वारसे विज्ञानमय आत्मा ऐसा ही आथ-निषद् में भी कहा बा-- ] मैं किसके - उत्क्रान्त होऊँगा ष्ठत होनेपर प्रति-' " उसने प्राणकी दि । नामें आत्मचैतन्य-नत्यन्त अभिव्यक्त उपाधिके द्वारा म, मरण, गमन, ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३१ गमनादिसर्वविक्रियालक्षणः सं व्यवहारः; तदात्मकं हि द्वादश-विधं करणं बुद्धयादि । तत् सूत्रं तज्जीवनं सोऽन्तरात्मा जगतस्त-स्थुषश्च । तेन प्रद्योतेन हृदयाग्र-प्रकाशेन निष्क्रममाणः केन मार्गे ण निष्क्रामति । इत्युच्यते- --। आगमन आदि सम्पूर्णं विकाररूप | व्यवहार होते हैं और तद्रूप ही बुद्धि आदि बारह इन्द्रियाँ हैं । वह सूत्र है, वह जीवन है और वही स्थावर-जंगमका अन्तरात्मा है । उस | प्रद्योतसे अर्थात् हृदयाग्रके प्रकाश-से निकलनेवाला आत्मा किस मार्ग से निकलता है, सो कहा जाता है-चक्षुष्टो वा आदित्य लोकप्राप्ति- यदि उसका ज्ञान या कर्म निमित्तं ज्ञानं कर्म वा यदि स्यात् । मूर्ध्ना वा ब्रह्मलोक-प्राप्तिनिमित्तं चेत् । अन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः शरीरावयवेभ्यो यथाकर्म यथाश्रुतम् । तं विज्ञानात्मानमुत्क्रामन्तं परलोकाय प्रस्थितं परलोकायो-भूताकून मित्यर्थः प्राणः सर्वा -धिकारिस्थानीयो राज्ञइवानूत्का -मति तं च प्राणमनूत्क्रामन्तं वागादयः सर्वे प्राणा अनूका मन्ति । यथाप्रधानान्वाचि-ख्यासा इयम्, न तु क्रमेण सार्थवद् गमनमिह विवक्षितम् । आदित्यलोककी प्राप्तिका कारण होता है तो वह चक्षुद्वारसे निकलता है । यदि ब्रह्मलोक की प्राप्तिका कारण होता है तो मूर्धदेश से निक-। लता है । इसी प्रकार अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार वह शरीर के अन्यान्य देश या अवयवोंसे निकल जाता है । उस विज्ञानात्मा के उत्क्रान्त-परलोक के लिये प्रस्थित अर्थात् परलोकगमन के लिये वासनायुक्त होनेपर, राजाके सर्वाधिकारी के समान प्राण उसके साथ - साथ उत्क्रमण करता है और उस प्राणके उत्क्रान्त होनेपर वागादि सारे ही प्राण उसके साथ - साथ उत्क्रमण करते हैं । यहां लोगोंके समूहके समान विज्ञानात्मा, प्राण और इन्द्रियों का एक साथ मिलकर क्रमसे जाना विवक्षित नहीं है, बल्कि उनके प्राधान्यके अनुसार उसका उल्लेख करना अभीष्ट है ।

पृष्ठ 1046

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१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय तदैष श्रात्मा सविज्ञानो भवति स्वप्न इव विशेषविज्ञानवान् भवति कर्मवशान स्वतन्त्रः । स्वातन्त्र्येण हि सविज्ञानत्वे सर्वः कृतकृत्यः स्यात्, नैत्र तु तल्ल -भ्यते, अत एवाह व्यासः-" सदा तद्भावभावितः " ( गीता ८ । ६ ) इति । कर्मणा तूद्भा-व्यमानेनान्तःकरणवृत्तिविशेषा-श्रितवासनात्मक विशेषविज्ञानेन सर्वो लोक एतस्मिन् काले सविज्ञानो भवति । सविज्ञानमेव च गन्तव्यमन्ववक्रामत्यनुग-च्छति विशेषविज्ञानोद्भासित-मेवेत्यर्थः । तस्मात् तत्काले स्वातन्त्र्यार्थ योगधर्मानुसेवनं परिसंख्या नाभ्यासश्च विशिष्टपुण्योपचयश्च श्रद्दधानैः परलोकार्थिभिरप्रमत्तैः कर्तव्य इति । सर्वशास्त्राणां यत्नतो विधेयोऽर्थो दुश्चरिताश्चोपरमणम् । न हि तत्काले शक्यते किश्चित् सम्पादयितुम्; कर्मणा नीयमा-४ उस समय यह आत्मा सविज्ञान होता है अर्थात् स्वप्न के समान अपने कर्मवश विशेष विज्ञानवान् होता है, स्वतन्त्रतासे नहीं; यदि स्वतन्त्रतासे विज्ञानवान् हो सकता तो सभी कृतकृत्य तो हो जाते; किंतु वह कृतकृत्यता तो [ सभीको ] प्राप्त नहीं होती; इसीसे व्यासदेवने कहा है- " हृदय में सदा उसी भाव-का चिन्तन करते रहनेसे [ वह उसीको प्राप्त होता है, " । अतः इस समय सब लोग कर्मद्वारा उद्भुत अन्तःकरण की वृत्ति विशेष के आश्रित रहनेवाले वासनात्मक विशेष ज्ञानसे सविज्ञान होते हैं । इस प्रकार सविज्ञान अर्थात् विशेष विज्ञान से उद्भासित होकर ही अपने गन्तव्य स्थानको अनुक्रमण-अनुगमन करता है । अतः परलोककी इच्छा रखने-वाले श्रद्धालु पुरुषोंको उस समय स्वातन्त्र्य प्राप्त करनेके लिये प्रमाद-हीन होकर निरन्तर योगधर्मौका सेवन, विवेकका अभ्यास और विशेषरूप से पुण्यका संचय करना चाहिये । सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधेय अर्थका आचरण करना चाहिये तथा दुष्कर्मसे दूर रहना चाहिये ॥ किंतु उस ( उत्क्रान्तिके ) समय कुछ भी सम्पादन नहीं किया जा सकता,

पृष्ठ 1047

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[ अध्याय४ यह आत्मा सविज्ञान स्वप्न के समान विशेष विज्ञानवान् तन्त्रतासे नहीं; यदि विज्ञानवान् हो सकता कृत्य तो हो जाते; कृत्यता तो [ सभीको ] ; इसीसे व्यासदेवने में सदा उसो भाव-करते रहने से [ वह होता है, ” | अतः सब लोग कर्मद्वारा करणकी वृत्तिविशेष के नेवाले वासनात्मक सविज्ञान होते हैं । विज्ञान अर्थात् विशेष भासित होकर ही ' स्थानको अनुक्रमण-है । लोककी इच्छा रखने-पुरुषोंको उस समय करने के लिये प्रमाद-निरन्तर योगधर्मोका का अभ्यास और ण्यका संचय करना पूर्ण शास्त्रोंके विधेय रण करना चाहिये दूर रहना चाहिये । कान्तिके 5 ) ) समय कुछ हीं किया जा सकता, ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३३ नस्य स्वातन्त्र्पाभावात्; “ पुण्यो वैपुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन " ( ३ । २ । १३ ) इ-त्युक्तम् । एतस्य ह्यनर्थस्योपश-मोपायविधानाय सर्वशाखोपनि पदः प्रवृत्ताः । न हि तद्विहितो-पायानुसेवनं मुक्त्वा आत्यन्ति -को s स्थानर्थस्योपशमोपायोऽस्ति तस्मादत्रैवोपनिषद्विहितो पाये यत्नपरैर्भवितव्यमित्येष प्रकर-पार्थः । शकटवत् सम्भृतसम्भार उत्स-र्जन् यातीत्युक्तं किं पुनस्तस्य परलोकाप प्रवृत्तस्य पथ्यदनं शाकटिकसम्भारस्थानीयम्, गत्वा वा परलोकं यद् भुङ्क्ते? शरीराद्यारम्भकं च यत् तत् किम्? इत्युच्यते - तं परलो-काय गच्छन्तमात्मानं विद्या-कर्मणी, विद्या च कर्मच विद्याकर्मणी विद्या सर्वप्रकारा विहिता प्रतिषिद्धा च, अविहिता क्योंकि कर्मद्वारा ले जाये जाते हुए जीवकी स्वतन्त्रता नहीं रहती; इस विषयमें " पुण्यकर्म से पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी ” ऐसा ऊपर कहा जा चुका है । इस अनर्थकी निवृत्तिका उपाय बतानेके लिये ही समस्त शाखाओंकी उप-निषदें प्रवृत्त हुई हैं । उनके विधान किये हुए उपायके निरन्तर सेवनके विना इस अनर्थं को आंत्यन्तिक निवृत्तिका कोई और उपाय नहीं है; अत: इस उपनिषद्विहित उपाय-के अनुष्ठान में ही प्रयत्न करते रहना चाहिये यही इस प्रकरणका तात्पर्य है । ऊपर यह कहा गया है कि गाड़ीके समान जिसने वोझा धारण किया हुआ है, वह जीव शब्द करता हुआ जाता है; किंतु गाड़ी-वानके राहखर्चके समान परलोक-के लिये जानेवाले इस जीवकी रास्तेकी भोजनसामग्री क्या है, जिसे यह परलोकमें जाकर खाता हे? तथा जो उसके शरीरादिका आरम्भक है, वह भी क्या है? सो बतलाया जाता है- परलोकको जानेवाले उस आत्माके साथ विद्या और कर्म - सब प्रकारकी विहित । और प्रतिषिद्ध तथा अविहित और

पृष्ठ 1048

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१०३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ अप्रतिषिद्धा च, तथा कर्म विहितं प्रतिषिद्धं च अविहित मप्रतिषिद्धं च, समन्वारभेते सम्यगन्वारमेते श्रन्वालभेते अनुगच्छतः । पूर्वप्रज्ञा च--पूर्वानुभूतविषया प्रज्ञा पूर्वप्रज्ञा । अतीतकर्म फलानुभववासने-त्यर्थः । सा च वासना अपूर्व कर्मारम्भे कर्मविपाके चाङ्गं भवति; तेना-सावप्यन्वारभते, न हि तया वासनया बिना कर्म कर्तुं फलं चोपभोक्तुं शक्यते; न नप-स्ते विषय कौशलमिन्द्रियाणां भवति । पूर्वानुभवासनाप्रवृ-तानां त्विन्द्रियाणामिहाभ्यास-मन्तरेण कौशलमुपपद्यते; दृश्य-ते च केषाञ्चित् कासुचित् क्रियासु चित्रकर्मादिलक्षणासु विनैवेद्दाभ्यासेन जन्मत एव कौशलं कासुचिदत्यन्तसौकर्य -युक्तास्वप्यकौशलं केषाञ्चित् । यथा विषयोपभोगेषु स्वभावत एव केषाञ्चित् कौशलाकौशले दृश्येते । तच्चैतत् सर्वं पूर्व-। अप्रतिषिद्ध विद्या ही यहाँ विद्या है एवं विहित और प्रतिषिद्ध तथा I | अविहित और अप्रतिषिद्ध कर्म ही कर्म हैं- ये विद्या और कर्म सम्प्रक पू अन्वारम्भ अन्वालम्भन अर्थात् अनुसरण करते हैं । तथा पूर्वप्रज्ञा म पूर्वानुभवसम्बन्धिनी प्रज्ञा अर्थात् अतीत कर्मफलानुभवकी वासना भी [ साथ जाता है ] । म वह वासना ही अपूर्वं कर्मके आरम्भ और कर्मविपाकमें अम वि होती है; अत: यह भी उसके साथ प्र जाती है; उस वासनाके बिना यह कर्म करने और उसका फल भोगने- वि में समर्थ नहीं होता; क्योंकि जिस य विषयका अभ्यास नहीं होता, उसमें मि इन्द्रियोंकी कुशलता भी नहीं होती । यहाँ पूर्वानुभवकी वासनासे प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंकी बिना अभ्यास- देह के कुशलता होनी सम्भव है; यह बात देखी ही जाती है कि किन्हीं पूर्व पुरुषोंकी तो चित्रकलादि के समान न्व क्रियाओं में भी बिना अभ्यासके जम्मसे ही कुशलता होती है और वा किन्हीं किन्हीं की अत्यन्त सुगम क्रियाओं में भी कुशलता नहीं होती । जन जैसे विषयोपभोग में भी किन्हींकी स्वभावतः ही कुशलता या अकुश- कर लता देखी जाती है । सो यह सब

पृष्ठ 1049

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[ श्रध्याय ४ यहाँ विद्या है प्रतिषिद्ध तथा तिषिद्ध कर्म ही कर्म सम्यक् नम्भन अर्थात् तथा पूर्वप्रज्ञा प्रज्ञा अर्थात् विकी वासना ] । अपूर्व कर्मके विपाकमें अङ्ग उसके साथ के बिना यह का फल भोगने-क्योंकि जिस होता, उसमें भी नहीं की वासना से चना अभ्यास-भव है; यह E कि किन्हीं दि के समान अभ्यासके होती है और यन्न सुगम नहीं होती । भी किन्हीं की या अकुश-सो यह सब ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३५ प्रज्ञोद्भवानुद्भवनिमित्तम्, तेन पूर्वप्रज्ञया विना कर्मणि वा फलोपभोगे वा न कस्यचित् । प्रवृत्तिरुपपद्यते । तस्मादेतत् त्रयं शाकटिकस-= मारस्थानीयं परलोकपथ्यदनं विद्याकर्म पूर्वप्रज्ञाख्यम् । यस्माद् विद्याकर्मणी पूर्वप्रज्ञा च देहान्तर-प्रतिपच्युपभोगसाधनम्, तस्माद्

विद्याकर्मादि शुभमेव समाचरेत् ।

यथेष्टदेहसंयोगोपभोगौ स्याता-मिति प्रकरणार्थः ॥ २ ॥

पूर्वप्रज्ञा के उबुद्ध और अनुद्बुद्ध होनेके कारण ही होती है । इसलिये पूर्वप्रज्ञा के बिना किसीकी भी कर्म या उसके फलोपभोगमें प्रवृत्तिः होनी सम्भव नहीं है । अतः गाड़ीवान के राहखर्च की सामग्री के समान ये विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा नामक तीन पदार्थ ही परलोकके मार्गंकी भोजन-सामग्री हैं । चूँकि विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञा- ये देहान्तर की प्राप्ति और उपभोग के साधन हैं, इसलिये शुभ विद्या और कर्मादिका हो आचरण करे, जिससे कि अभीष्ट देहकी प्राप्ति और उपभोग हों - यही इस प्रकरणका ताल हे ॥ २ ॥

एवं विद्यादिसम्भारसम्भृतो देहान्तरं प्रतिपद्यमानः, मुक्त्वा पूर्व देहं पक्षीव वृक्षान्तरं देहा- । न्तरं प्रतिपद्यते । अथवा श्रति-वाहिकेन शरीरान्तरेण कर्मफल- । जन्मदेशं नीयते । किश्वात्रस्थस्यैव सर्वगतानां करणानां वृत्तिलाभो भवति ॥ इस प्रकार विद्यादि भार लदा हुआ, देहान्तरको प्राप्त करने-वाला जीव पूर्वदेहको छोड़कर वृक्षसे दूसरे वृक्षको जानेवाले पक्षी-के समान, अन्य देहको प्राप्त, करता है अथवा एक दूसरे अति-वाहिक देहसे कर्मफलके उद्भव-स्थान ( देवलोकादि ) को ले जाया जाता है । शङ्का - क्या उसे यहाँ स्थित रहते हुए ही सर्वगत इन्द्रियोंको वृत्ति प्राप्त

पृष्ठ 1050

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१०३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ श्राहोस्विच्छरीरस्थस्य संकुचि-तानि करणानि मृतस्य भिन्नघट-प्रदीपप्रकाशवत् सर्वतो व्याप्य पुनर्देहान्तरारम्भे संकोचमुप-गच्छन्ति १ किञ्च मनोमात्रं वैशे- । षिकसमय इव देहान्तरारम्भदेशं प्रति गच्छति १ किंवा कल्पना-न्तरमेव वेदान्तसमय इति । उच्यते - " त एते सर्व एव -समाः सर्वेऽनन्ताः " ( बृ ० उ ० १। ५ । १३ ) इति श्रुतेः - स-- र्वात्मकानि तावत् करणानि, सर्वात्मकप्राणसंश्रयाच्च; तेषा -- माध्यात्मिकाधिभौतिकपरिच्छेदः ' प्राणिकर्मज्ञानभावनानिमित्तः । श्रतस्तद्वशात् स्वभावतः सर्व-गतानामनन्तानामपि प्राणानां कर्मज्ञानवासनानुरूपेणैव देहा-न्तरारम्भवशात् प्राणानां वृत्तिः - संकुचति विकसति च । तथा चोक्तम् — “ समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एमिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽ--नेन सर्वेण " ( बृ ० उ ० १ ॥ ना | हो जाती है? अथवा शरीरस्थ जीवकी संकुचित इन्द्रियां मरनेपर, ३ फूटे हुए घड़ेके प्रकाशके समान वच सर्वत्र व्याप्त होकर, देहान्तरका नन आरम्भ होनेपर पुन: संकोचको ।१ प्राप्त हो जाती हैं? अथवा वैशेषिक पास सिद्धान्तवालोंके मतानुसार केवल मन ही देहान्तरके देशमें जाता है? विद्य किंवा वेदान्तसिद्धान्तके अनुसार कल्पनान्तर ही देहान्तर की प्राप्ति है? स्वप समाधान - बतलाते हैं- " वे ये देहा सभी समान और सभी अनन्त हैं " पुन इस श्रुतिके अनुसार तथा सर्वात्मक श्रयं प्राणके आश्रित होनेसे इन्द्रियाँ तो दृष्टा सर्वात्मक हो हैं; उनका आध्या-त्मिक और आधिभौतिक परिच्छेद. प्राणियों के कर्म, ज्ञान और भावना-के कारण है । अत: उनके अधीन मा होने के कारण, स्वभावतः सर्वगत निव और अनन्त होनेपर भी भोक्ता हर प्राणोंके कर्म, ज्ञान और वासना के अनुसार ही देहान्तरके आरम्भवश तृणख प्राणोंकी वृत्तिका संकोच या विकास आत्म होता है । ऐसा ही कहा भी दूसरे हे " यह प्राण चींटीके प्रमाण- त का है, मच्छर के समान है, हाथी- निद के बराबर है, इन तीनों लोकों-के समान है और इस सबके तृण