बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1051–1060
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1051–1060
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[ अध्याय ४ अथवा शरीरस्थ इन्द्रियाँ मरनेपर, प्रकाशके समान कर देहान्तरका पुन: संकोचको - अथवा वैशेषिक तानुसार केवल देशमें जाता है? दान्त के अनुसार अन्तर की प्राप्ति है? लाते हैं- " वे ये सभी अनन्त हैं " र तथा सर्वात्मक नेसे इन्द्रियां तो उनका आध्या-भौतिक परिच्छेद. न और भावना-नः उनके अधीन भावतः सर्वगत पर भी भोक्ता - और वासना के तरके आरम्भवश कोच या विकास ही कहा भी चींटीके प्रमाण-समान है, हाथी-न तीनों लोकों-र इस सबके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३ । २२ ) इति । तथा चेदं वचनमनुकूलम् - " स यो हैता-ननन्तानुपास्ते " ( बृ ० उ ० १।५ । १६ ) इत्यादि " तं यथा यथो-पासते " इति च । तत्र वासना पूर्वप्रज्ञाख्या विद्याकर्मतन्त्रा जलूकावत् संततैव स्वप्नकाल इव कर्मकृतं देहाद् देहान्तरमारभते हृदयस्थैव । पुनर्देहान्तरारम्भे देहान्तरं पूर्वा-श्रयं विमुञ्चति — - इत्येतस्मिन्नर्थे । दृष्टान्त उपादीयते— .१०३७. 70. । समान है " । इसी प्रकार " जो भी इन अनन्तोंकी उपासना करता है " तथा " उसकी जो जिस प्रकार | उपासना करते हैं " इत्यादि वचन भी अनुकूल हो सकते हैं । इनमें कर्म और ज्ञानके अधीन जो पूर्वप्रज्ञा नामकी वासना है, वह जोंकके समान सर्वत्र व्याप्त रहते हुए ही हृदयस्थित रहकर जैसे स्वप्नावस्था के शरीरकी रचना करती है, उसी प्रकार इस देहसे भिन्न दूसरे कर्मजनित देहको रच लेती है । फिर देहान्तरका आरम्भ हो जानेपर अपने पूर्वाश्र देहको त्याग देती है - इस विषय में यह दृष्टान्त बतलाया जाता है-देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त तद् यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वान्य-माक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्येवमेवायमात्मेद ँ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यमाक्रमाक्रम्यात्मानमुपस ँ हरति ॥ ३ ॥
वह दृष्टान्त - जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्त में पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है, इसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर - अविद्या ( अचेतनावस्था ) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है ॥ ३ ॥
तत्तत्र देहान्तरसंचार इदं उस देहान्तरसंचार में यह निदर्शनम् — - यथा येन प्रकारेण उदाहरण है – यथा जिस प्रकार तृण-तृणजलायुका तृणजलूका तृण । जलूका ( घासपर चलनेवाली जोंक )
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१०३८. बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ स्यान्तमवसानं गत्वा प्राप्य अन्यं । तृणान्तरमाक्रमम्, श्राक्रम्यत इत्याक्रमस्तमाक्रममाक्रम्याश्रित्य आत्मानम् आत्मनः पूर्वावयवम् उपसंहरत्यन्त्यावयवस्थाने; एव-मेव अयमात्मा यः प्रकृतः संसारीदं शरीरं पूर्वोपाचं निहत्य स्वप्नं प्रतिपित्सुरिव पातयित्वा श्रविद्यां गमयित्वा अचेतनं कृत्वा स्वात्मोपसंहारेण, अन्य-माक्रमं तृणान्तरमिव तृणजलूका ' शरीरान्तरं गृहीत्वा प्रसारितया चासनया श्रात्मानमुपसंहरति, -तत्रात्मभावमारभते; यथा स्वप्ने -देहान्तरमारभते स्वप्न देहान्त-रस्थ इव शरीरारम्भदेश आरभ्य-माणे देहे जङ्गमे स्थावरे वा । तत्र च कर्मवशात् करणानि लब्धवृत्तीनि संहन्यन्तेः बाधं च कुशमृत्तिकास्थानीयं शरीरमा-रम्यते । तत्र च करणव्यूहमपेक्ष्य तृणके अन्त - अन्तिम भागपर पहुँच-कर दूसरे तृणरूप आक्रमका — जो ६ आक्रान्त किया जाय उसे आक्रम स कहते हैं, उस आक्रम यानी आधार. का आश्रय ले अपनेको अर्थात् अपने पूर्वावयवको पिछले अवयवके स्थानमें सकोड़ लेती है; इसी प्रकार यह संसारी आत्मा, जिसका यहाँ प्रकरण है, इस अपने पूर्वप्राप्त शरीरको मारकर - स्वप्नप्राप्तिकी इच्छावालेके समान गिराकर, इसे अविद्याको प्राप्त कराकर अर्थात् पु अपने आत्माके उपसंहारद्वारा इ अचेतन कर, तृणजलूका के एक तृणसे दूसरे तृणपर जानेके समान न्न दूसरे आक्रम यानी शरीरान्तरको | अपनी फैली हुई बासनासे ग्रहणकर श अपना उपसंहार कर लेता है, रू अर्थात् उसीमें आत्मभाव करने वा लगता है; जिस प्रकार यह स्वप्न में देहान्तरका आरम्भ करता है उसी प्रकार स्वप्न देहान्तरस्थ जीवके और समान यह शरीरारम्भदेशमें अर्थात् यह आरम्भ किये हुए जङ्गम या स्थावर पित देहमें आत्मभाव कर लेता है! कल्य वहीं कर्मवश इन्द्रियाँ भी वृत्ति- त युक्त होकर संगठित हो जाती हैं और कुश - मृत्तिकास्थानीय बाह्य स्का शरीरका भी आरम्भ हो जाता है । पेशस | फिर उसीमें इन्द्रियव्यूहकी अपेक्षासे
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[ अध्याय ४ म भागपर पहुँच-आक्रमका- जो जाय उसे आक्रम क्रम यानी आधार-अपनेको अर्थात् पिछले अवयव नती है; इसी प्रकार मा, जिसका यहाँ अपने पूर्वप्राप्त कर - स्वप्नप्राप्तिकी न गिराकर, इसे कराकर अर्थात् के उपसंहारद्वारा नृणजलूकाके एक पर जानेके समान नानी शरीरान्तरको वासना ग्रहणकर र कर लेता है, आत्मभाव करने प्रकार यह स्वप्नमें रम्भ करता है उसी हान्तरस्थ जीवके -रारम्भदेशमें अर्थात् ए जङ्गम या स्थावर कर लेता है! इन्द्रियाँ भी वृत्ति-गठित हो जाती हैं । न्तकास्थानीय बाह्य भारम्भ हो जाता है । न्द्रयव्यूहकी अपेक्षासे ब्राह्मण ४ ] घाङ्करभाष्यार्थ १०३ ९ वागाद्यनुग्रहायाग्न्यादिदेवताः वागादि इन्द्रियोंका उपकार करनेके संश्रयन्ते । एष देहान्तरारम्भ- लिये अग्नि आदि देवता आश्रय ले लेते हैं । यही देहान्तरके आरम्भकी विधिः ॥ ३ ॥ विधि है ॥ ३ ॥
आत्माके देहान्तरनिर्मारण में सुवर्णकारका दृष्टान्त तत्र देहान्तरारम्भे नित्योपा-तमेवोपादानमुपमृद्योषमृद्य देहा-न्तरमारभते, होस्विदपूर्वमेव पुनः पुनरादत्त इति? अत्रोच्यते दृष्टान्तः-तद् यथा पेशकारी उस देहान्तरके आरम्भमें जीव नित्य ग्रहण किये हुए उपादानको ही विगाड़ बिगाड़कर उसीसे देहा-न्तरका आरम्भ करता है अथवा पुनः पुनः नवीन उपादान ग्रहण करता है । इसमें दृष्टान्त बतलाया जाता है-पेशसो मात्रामपादायान्य-न्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेद ँ शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नत्रतरं कल्याणतरँ रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वान्येषां वा भूतानाम् ॥ ४ ॥
उसमें दृष्टान्त — जिस प्रकार सोनार सुवर्णं भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर ( अधिक सुन्दर ) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्ट कर – अचेतनावस्थाको प्राप्तकर दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्यभूतोंके नवीन और कल्याणतर रूपकी रचना करता है ॥ ४ ॥
तत्तत्रैतस्मिन्नर्थे - यथा पेश- उस इस विषय में यह दृष्टान्त स्कारी पेशः सुवर्ण तत् करोतीति है - जिस प्रकार पेशकारी - पेशस् सुवर्णको कहते हैं, उसे जो बनावे पेशकारी सुवर्णकारः, पेशसः | वह पेशकारी - सोनार, पेशस् अर्थात्
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बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ १०४० सुवर्णस्य मात्रामपादायापच्छिद्य । गृहीत्वा अन्यत् पूर्वस्माद् रच-नाविशेषान्नवतरमभिनवतरं कन्याणात् कल्याणतरं रूपं तनुते निर्मिनोति । एवमेवायमात्मे त्यादि पूर्ववत् । नित्योपात्तान्येव पृथिव्यादी-न्याकाशान्तानि पञ्च भूतानि यानि ' द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे ' इति चतुर्थे व्याख्यातानि पेश: -स्थानीयानि तान्येवोपमृद्योष-मृद्य, अन्यदन्यच्च देहान्तरं नव-तरं कल्याणतरं रूपं संस्थान-विशेषं देहान्तरमित्यर्थः, कुरुते । पित्र्यं वा पितृम्यो हितं पितृ-लोकोपभोगयोग्यमित्यर्थः, गान्धर्व गन्धर्वाणामुपभोगयो-ज्यम्, तथा देवानां दैवम्, प्रजापतेः प्राजापत्यम्, ब्रह्मण इदं ब्राह्मं वा; यथाकर्म यथा-श्रुतमन्येषां वा भूतार्ना सम्बन्धि शरीरान्तरं कुरुत इत्यभिसम्ब-ध्यते ॥ ४ ॥
व सुवर्णकी मात्राका अपादान - अपच्छे. दन अर्थात् ग्रहण कर; पूर्वंरचना-विशेषसे भिन्न दूसरा नवीनतर और कल्याणसे भी कल्याणतर रूप बनाता है, उसी प्रकार यह श्रात्मा-इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है । आत्मा नित्यगृहोत जो पृथ्वी-से लेकर आकाशपर्यन्त सुवर्णस्था-नीय पांच भूत हैं, जिनकी ' द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे ' इस वाक्यसे चतुर्थं प्रपाठक में व्याख्या की गयी है, उन्हींको बिगाड़ - बिगाड़कर दूसरे-दूसरे देहान्तरको अर्थात् पूर्वापेक्षा नवीन और कल्याणतर रूप-संस्थान विशेष यानी देहान्तरको रच लेता है । पित्र्य — जो पितरोंके लिये उपयोगी हो अर्थात् पितृलोक-के उपभोगके योग्य हो, गान्धर्व-जो गन्धर्वोके उपभोगयोग्य हो, इसी प्रकार देवताओंके लिये उप-योगी – देव, प्रजापतिके लिये उप-| योगी - प्राजापत्य और जो ब्रह्माका है, उस ब्राह्म शरीरकी तथा इसी प्रकार कर्म और ज्ञान के अनुसार वह अन्य भूतोंसे सम्बद्ध शरीरा-न्तरकी रचना कर लेता है - इस प्रकार इसका सम्बन्ध है ॥ ४ ॥
१. उपनिषद् के द्वितीय अध्याय में ।
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[ श्रध्याय ४ अपादान - अपच्छे-कर; पूर्वंरचना-दूसरा नवीनतर कल्याणतर रूप कार यह आत्मा-पूर्ववत् है । यगृहोत जो पृथ्वी-पर्यन्त सुवर्णंस्था-, जिनकी ' द्वे वाव वाक्यसे चतुर्थ या की गयी है, - बिगाड़कर दूसरे-अर्थात् पूर्वापेक्षा कल्याणतर रूप-यानी देहान्तरको त्र्य — जो पितरोंके 7 अर्थात् पितृलोक-ग्य हो, गान्धर्व-उपभोगयोग्य हो, ताओंके लिये उप-नापतिके लिये उप-= य और जो ब्रह्माका रीरकी तथा इसी र ज्ञानके अनुसार से सम्बद्ध शरीरा-कर लेता है - इस म्बन्ध है ॥ ४ ॥
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४१ सर्वेमय आत्माकी कर्मानुसार ये s स्य बन्धन संज्ञका उपाधि-भूताः, यैः संयुक्तस्तन्मयोऽ-यमिति विभाव्यते, ते पदार्थाः पुञ्जी कृत्ये हैकत्र प्रति निर्दिश्यन्ते ---विभिन्न गतियोंका निरूपरण इस आत्माके जो बन्घनसंज्ञक उपाधिभूत पदार्थ हैं और जिनसे संयुक्त होकर यह तद्रूप है - ऐसा समझा जाता है, उन पदार्थोंका यहाँ एक जगह एकत्रित करके निर्देश किया जाता है— स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चतुर्मयः श्रोत्रमयः पृथ्वीमय आपोमयो वायु-मय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाम-मयः क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमय-स्तद् यदेतदिदम्मयोऽदोमय इति यथाकारी यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः - काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामों भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ॥ ५ ॥
वह यह आत्मा ब्रह्म है । वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षमंय, श्रोत्रमय, पृथ्वीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोधमय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है । जो कुछ इदंमय ( प्रत्यक्ष ) और अदोमय ( परोक्ष ) है, वह वही है । वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है । शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मा पापी होता है । पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है । कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामनावाला होता है बृ ० उ ० ६६–
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१०४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रा वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्पवाला होता है वैसा ही करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥
स वा अयम्, य एवं संसरत्या-त्मा, ब्रह्मैव पर एव, योऽशनाया-यतीतः । विज्ञानमयो विज्ञानं बुद्धिस्तेनोपलक्ष्यमाणस्तन्मयः । ' कतम आत्मेति योऽयं विज्ञान-मयः प्राणेषु ” ( ४ । ३ । ७ ) इति ह्युक्तम् ॥ विज्ञानमयो विज्ञान-प्रायः, यस्मात्तद्धर्मत्वमस्य विभा-व्यते " ध्यायतीव लेलायतीव " ( ४ । ३ । ७ ) इति । तथा मनोमयो मनः संनिकर्षा-न्मनोमयः । तथा प्राणमयः प्राणः पश्चवृत्तिस्तन्मयः, येन चेतनश्च लतीव लक्ष्यते । तथा चक्षुर्मयो रूपदर्शनकाले । एवं श्रोत्रमयः शब्दश्रवणकाले । एवं तस्य तस्येन्द्रियस्य व्यापारोद्भवे तत्त-न्मयो भवति । एवं बुद्धिप्राणद्वारेण चक्षुरा-दिकरणमयः सशरीरारम्भक-जो आत्मा इस प्रकार संसरित पा होता ( इहलोक - परलोकमें गमना-गमन करता ) है, वह यह परब्रह्म हो भ | है, जो कि क्षुधा - पिपासादि धर्मोसे अ परे है । वह विज्ञानमय - विज्ञान बुद्धि भ को कहते हैं, उससे उपलक्षित होने- चा वाला अर्थात् तन्मय है । उसके विषय में " यह आत्मा कौन है? जो यह प्राणों में विज्ञानमय है " ” ऐसा कहा जा चुका है । विज्ञानमय अर्थात् य विज्ञानप्राय; क्योंकि ' ध्यायतीव ले- वि लायतीव " इत्यादि वाक्यसे इसका विज्ञानधर्मत्व प्रतीत होता है । इसी प्रकार वह मनोमय है— मनकी संनिधिके कारण वह मनोमय है तथा प्राणमय है- प्राण पाँच वृत्तियोंवाला है, तन्मय वह है, जिससे कि वह चेतन चलता हुआ-सा देखा जाता है तथा रूपदर्शन-के समय वह चक्षुर्मय है । एवं शब्द सुनने के समय वह श्रोत्रमय है । इसी प्रकार उस - उस इन्द्रियके व्यापारका प्रादुर्भाव होनेपर वह तत्तद्रूप हो जाता है । इस प्रकार बुद्धि और प्राणके द्वारा वह चक्षु आदि इन्द्रियमय होकर शरीरा-
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[ अध्याय ४ वैसा ही कर्म करता है ॥५ ॥
प्रकार संसरित रलोक गमना-यह परब्रह्म हो पिपासादि धर्मोसे नय - विज्ञान बुद्धि उपलक्षित होने-मय है । उसके कौन है? जो नमय हे " ऐसा वज्ञानमय अर्थात् ' ध्यायतीव ले-वाक्यसे इसका होता है । मनोमय है-कारण वह णमय है- प्राण , तन्मय वह है, चलता हुआ-था रूपदर्शन-है । एवं शब्द श्रोत्रमय है । उस इन्द्रियके - होनेपर वह । बुद्धि और चक्षु आदि = शरीरा-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४३ पृथिव्यादिभूतमयो भवति । तत्र । पार्थिव शरीरारम्भे पृथिवीमयो भवति । तथा वरुणादिलोकेषु आयशरीरारम्भे पोमयो भवति । तथा वायव्य शरीरारम्भे वायुमयो भवति । तथा आकाश -शरीरारम्भे श्राकाशमयो भवति । एवमेतानि तैजसानि देव-शरीराणि तेष्वारम्यमाणेषु तन्म-यस्तेजोमयो भवति । अतो व्य-तिरिक्तानि पश्वादिशरीराणि | नरकप्रेतादिशरीराणि चातेजो-मयानि । तान्यपेक्ष्याह — अतेजो-मय इति । एवं कार्यकरणसङ्घातमयः सन्नात्मा प्राप्तव्यं वस्त्वन्तरं पश्यन्निदं मया प्राप्तमदो मया रम्भक पृथिवी आदि भूतमय हो जाता है । उस समय वह पार्थिव शरीरका आरम्भ होनेपर पृथिवी-मय हो जाता है तथा वरुणादि लोकोंमें जलीय शरीरका आरम्भ होने पर जलमय होता है एवं वायव्य शरीरका आरम्भ होनेपर वायुमय होता है और आकाशशरीरका आरम्भ होनेपर आकाशमय हो जाता है । इसी प्रकार ये देवशरीर तैजस हैं, इनका आरम्भ होनेपर वह तद्रूप अर्थात् तेजोमय हो जाता है । इनसे भिन्न पशु आदिके शरीर और नारकीय जीवोंके तथा प्रेता-दिके शरीर अतेजोमय हैं । उनकी अपेक्षासे श्रुति कहती है — ‘ अतेजो-मय ' । इस प्रकार यह आत्मा देहे-न्द्रियसंघातमय होकर, अन्य प्राप्तव्य वस्तुको देखता हुआ, ' यह मैंने प्राप्त कर ली है और वह मुझे प्राप्त प्राप्तव्यमित्येवं विपरीत प्रत्ययस्त - करनी है ' इस प्रकार विपरीत ज्ञानयुक्त होकर उसकी अभिलाषा-दभिलाषः काममयो भवति । वाला अर्थात् काममय होता है और तस्मिन् कामे दोषं पश्यतस्तद्विष - उस कामनामें दोष देखनेपर जब तत्सम्बन्धी अभिलाषा निवृत्त हो याभिलाषप्रशमे चित्तं प्रसन्न- जाती है, तब चित्त प्रसन्न - निष्क-शान्तं भवति, तन्मयो - ल्मष अर्थात् शान्त हो जाता है, मकलुषं इसलिये तन्मय अर्थात् अकाममय S काममयः । होता है ।
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१०४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय बा ४ एवं तस्मिन् विहते कामे इसी प्रकार किसीके द्वारा 30 De मद उस केनचित् स कामः क्रोधत्वेन कामनाका विघात होनेपर बहु का परिणमते, तेन तन्मयो काम क्रोधरूप में परिणत हो जाता भवन् है, इसलिये तद्रूप होकर वह क्रोष-क्रोधमयः । स क्रोधः केनचिदु- मय हो जाता है । वह क्रोध जब वि पायेन निवर्तितो यदा भवति किसी उपाय से निवृत्त हो जाता है, तब चित्त प्रसन्न और अनाकुल क्षप तदा प्रसन्नमनाकुलं चित्तं सद- होनेपर अक्रोध कहा जाता है, हृदि क्रोध उच्यते, तेन तन्मयः । एवं कामक्रोधाभ्याम् चकामाक्रोधा भ्यां च तन्मयो भूत्वा धर्म-मयोऽधर्ममयश्च भवति । न हि कामक्रोधादिभिर्विना धर्मादि-प्रवृत्तिरुपपद्यते । “ यद्यद्धि कुरुते कर्म तचत् कामस्य चेष्टितम् ” इति स्मरणात् । धर्ममयोऽधर्ममयश्च भूत्वा सर्वमयो भवति । समस्तं धर्मा-धर्मयोः कार्य यावत्किश्चिद् व्याकृतम्, तत् सर्व धर्मा-धर्मयोः फलं तत् प्रतिपद्यमान-स्तन्मयो भवति । किं बहुना, तदेतत् सिद्धमस्य यदयमिदम्मयो गृह्यमाणविषयादिमयः, तस्मादय -उसके कारण वह अक्रोधमय हो गृह इय जाता है । इस प्रकार काम - क्रोष और अकाम - अक्रोधके कारण तन्मय होकर वह धर्ममय और अधर्ममय भी हो जाता है, क्योंकि काम- वा | क्रोधादिके बिना धर्मादिकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं है । " जीव यथ जो - जो भी कर्म करता है, वह - वह भव कामकी ही चेष्टा है " इस स्मृतिसे भी यही सिद्ध होता है | क्रि धर्ममय और अधर्ममय होकर च वह सर्वमय हो जाता है । जितना कुछ व्याकृत है वह सब धर्म सा और अधर्मका ही कार्य है, वह सब धर्म और अधर्मका ही फल का है, उसे प्राप्त करनेवाला भी पा तन्मय हो जाता है । अधिक क्या? इसके विषयमें यह बात त्य सिद्ध ही है कि यह इदंमय– गृह्यमाण विषयादिमय है, इसलिये
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[ श्रध्याय४ किसीके द्वाराउस बात होनेपरवह परिणत हो जाता होकर वह क्रोध-| वह क्रोध जब वृत्त हो जाता है, और अनाकुल कहा जाता है, अक्रोधमय हो कार काम - क्रोध के कारण तन्मय - और अधर्ममय क्योंकि काम-धर्मादिकी प्रवृत्ति नहीं है । " जीव ता है, वह वह " इस स्मृतिसे - है | अधर्ममय होकर है । जितना वह सब धर्म कार्य है, वह मंका ही फल रनेवाला भी है । अधिक में यह बात यह इदंमय— यहै, इसलिये ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४५ मदोमेयः । ऋद इति परोक्षं । कार्येण गृह्यमाणेन निर्दिश्यते । अनन्ता ह्यन्तःकरणे भावना-विशेषाः, नैव ते विशेषतो निर्दे-ष्टुं शकयन्ते । तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे कार्यतोऽवगम्यन्ते इदमस्य हृदि वर्ततेऽदोऽस्येति । तेन गृह्यमाणकार्येणेदम्यतया निर्दि-श्यते, परोक्षोऽन्तःस्थो व्यव-हारोऽयमिदानीमदोमय इति । संक्षेपतस्तु यथा कर्तुं यथा वा चरितुं शीलमस्य सोऽयं यथाकारी यथाचारी, स तथा भवति । करणं नाम नियता क्रिया विधिप्रतिषेधादिगम्या, चरणं नामानियतमिति विशेषः । साधुकारी साधुर्भवतीति यथा-कारीत्यस्य विशेषणम्, पापकारी पापो भवतीति च यथाचारी-त्यस्य । ताच्छीन्यप्रत्ययोपादानाद अदोमय भी है । ' अदः ’ इस पदसे गृह्यमाण कार्यंसे भिन्न परोक्ष वस्तु-का निर्देश होता है । अन्तःकरणमें अनन्त भावनाविशेष हैं, उसका विशेषरूपसे निर्देश नहीं किया जा सकता । समय - समय पर उनके कार्यसे ही यह पता चलता है कि इसके हृदय में यह भावना है और उसके हृदय में यह । उस गृह्यमाण कार्यसे उनका इदंमयरूपसे निर्देश किया जाता है और जो अन्त: -करण में स्थित परोक्ष व्यवहार है, वह इस समय अदोमय है । संक्षेपतः तो, जिसका जैसा करने या आचरणमें लानेका स्वभाव है, वह यथाकारी और यथाचारी होता है, जो यथाकारी ( जैसा करनेवाला ) हे वह वैसा ही हो जाता है । विधि और प्रतिषेधसे ज्ञात होनेवाली जो नियत क्रिया है, उसका नाम ' करना ' है और अनियत आचरणका नाम ' आचरण-में लाना ' है, यह इन दोनोंका भेद है । साधु करनेवाला साधु होता है - यह ' यथाकारी ' इस पदका विशेषण है और पाप करनेवाला पापी होता है - यह ' यथाचारी ' इस पदका विशेषण है । ' यथाकारी और यथाचारी ' इन पदों में
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१०४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 अत्यन्ततात्पर्यवैव तन्मयत्वम्, न तु तत्कर्म मात्रेणेत्याशङ्कयाह-पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति । पुण्यपापकर्म-मात्रेणैव तन्मयता स्यान्न तु ताच्छील्यमपेक्षते । ताच्छील्ये तु तन्मयत्वातिशय इत्ययं विशेषः । तत्र कामक्रोधादिपूर्वक पुण्या-पुण्यकारिता सर्वमयत्वे हेतुः, संसारस्य कारणम्, देहादेहान्तर-संचारस्य च । एतत्प्रयुक्तो ह्यन्यदन्यद् देहान्तरमुपादत्ते । तस्मात् पुण्यापुण्ये संसारस्य कारणम् । एतद्विषयौ हि विधि-प्रतिषेधौ । अत्र शास्त्रस्य साफ-न्यमिति । | ' णिनि ' इस ताच्छील्य प्रत्ययको ग्रहण किया गया है, इसलिये कमें अत्यन्त परायण होनेका स्वभाव ही तन्मयता है, केवल उस कर्म. | मात्रसे तन्मयता नहीं होती - ऐसी द आशङ्का करके श्रुति कहती है— पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् हो जाता है और पापकर्मंसे पापी हो जाता है अर्थात् पुण्य पापरूप कर्मसे ही पुरुषको तन्मयता प्राप्त हो जाती है, उसे वैसे स्वभाव होनेकी अपेक्षा नहीं रहती । ताच्छील्य ( वैसा स्वभाव ) होनेपर तो तन्मयताकी अधिकता होती है— इतना ही अन्तर है । ऐसी स्थिति में कामक्रोधादिपूर्वक पुण्य या अपुण्यका आचरण करना ही जीव सर्वमयत्वका हेतु, उसके संसारका कारण तथा एक देह दूसरे देहमें जानेका हेतु सिद्ध होता है । इससे प्रेरित होकर ही जीव दूसरे दूसरे देहको ग्रहण करता है । अतः पुण्य और पाप संसारके कारण हैं । इन्हींके विषय में विधि और प्रतिषेध होते हैं और यहीं शास्त्रकी सफलता है । १. वह इसका स्वभाव है - इस अर्थ में होनेवाले प्रत्ययको ताच्छील्य - प्रत्यय कहते हैं । यहाँ ‘ सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये ' ( ३ । २ । ७८ ) इस पाणिनि-सूत्र के अनुसार ' णिनि ' प्रत्यय हुआ है ।