बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1061–1070

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070

पृष्ठ 1061

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1061 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय8 सोच्छील्य प्रत्ययको T है, इसलिये कर्म में होनेका स्वभाव केवल उस कर्म-नहीं होती - ऐसी श्रुति कहती है-पुण्यवान् हो जाता पापी हो जाता नापरूप कर्मसे ही ताप्राप्त हो जाती होनेकी अपेक्षा नाच्छील्य ( वैसा र तो तन्मयताकी हे - इतना ही कामक्रोधादिपूर्वक T आचरण करना का हेतु, उसके - तथा एक देह से का हेतु सिद्ध होता होकर ही जीव ग्रहण करता है । प संसार के कारण में विधि और और यहीं शास्त्रकी 7 ताच्छील्य - प्रत्यय = ) इस पाणिनि-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४७ अथो अप्यन्ये बन्धमोक्ष-कुशलाः खल्वाहुः — सत्यं कामा-दिपूर्वके पुण्यापुण्ये शरीरग्रहण-कारणम्, तथापि कामप्रयुक्तो हि पुरुषः पुण्यापुण्ये कर्मणी उपचि-नोति । कामप्रहाणे तु कर्म विद्यमानमपि पुण्यापुण्योपचय-करं न भवति । उपचिते अपि । पुण्यापुण्ये कर्मणी कामशून्ये फलारम्भके न भवतः । तस्मात् काम एव संसारस्य मूलम् । तथा चोक्तमाथर्वणे – “ कामान् यः कामयते मन्यमानः स काम मिर्जायते तत्र तत्र " ( मु ० उ ०३ । २ । २ ) इति । तस्मात् काम-मय एवायं पुरुषो यदन्यमयत्वं तदकारणं विद्यमानमपीत्यतो-S वधारयति काममय एवेति । यस्मात् स च काममयः सन् यादृशेन कामेन यथा-कामो भवति, तत्क्रतुर्भवति । स काम ईषदभिलाषमात्रेणा-भिव्यक्तो यस्मिन् विषये भवति, सोऽविहन्यमानः स्फुटी यहाँ दूसरे बन्धमोक्षकुशल पुरुष कहते हैं - यह ठीक है कि कामादिपूर्वक पुण्य और पाप ही शरीर - ग्रहणके कारण हैं तो भी कामनासे प्रेरित हुआ पुरुष ही पुण्य - पापरूप कर्मों का संग्रह करता है । कामनाका नाश होनेपर तो विद्यमान कर्म भी पुण्य - पापकी वृद्धि करनेवाला नहीं होता तथा कामनारहित होनेपर संग्रह किये हुए पुण्य - पाप कर्म भी फलके आर-म्भक नहीं होते । अतः कामना हो संसारका मूल है । ऐसा ही आथ-र्वणश्रुतिमें भी कहा है – “ जो पुत्र-पशु आदि कामनाओं को हो सर्वं-श्रेष्ठ मानता हुआ उनकी इच्छा करता है, वह उन कामनाओं के कारण उन उन स्थानोंमें जन्म लेता है । " अतः यह पुरुष काममय ही है; इसका जो अन्यमयत्व है, वह विद्यमान रहते हुए भी [ इसके सर्वमयत्वका ] कारण नहीं है, इसी-श्रुति निश्चय करती है कि यह काममय ही है । क्योंकि वह काममय होकर जैसी कामनासे युक्त अर्थात् ‘ यथाकाम ’ होता है ' तत्क्रतु ' होता है । थोड़ी-सी अभिलाषामात्र से अभिव्यक्त हुई वह कामना जिस विषय में होती है, | वह उससे आहत न होकर स्फुट

पृष्ठ 1062

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1062 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय भवन् क्रतुत्वमापद्यते । क्रतुर्नामा । ध्यवसायो निश्चयो यदनन्तरा क्रिया प्रवर्तते । यत्क्रतुर्भवति यादृक्कामकार्येण क्रतुना यथारूपः क्रतुरस्य सो-ऽयं यत्क्रतुर्भवति, तत् कर्म कुरुते, यद्विषयः क्रतुस्तत्फलनि-वृत्तये यद् योग्यं कर्म, तत् कुरुते निर्वर्तयति, यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते, तदीयं फलमभिसम्पद्यते । तस्मात् सर्व-मयत्वेऽस्य संसारित्वे च काम एव हेतुरिति ॥ ५ ॥

V ४ ब्रा होनेपर क्रतुरूप हो जाती है ' ऋतु ' अध्यवसाय अर्थात् निश्चयको । क कहते हैं, जिसके पीछे क्रियाकी उस प्रवृत्ति होती है । का यह ' यत्क्रतु ' होता है अर्थात् वा कामना के कार्यरूप जिस प्रकार के औ ऋतुसे यह युक्त होता है, इस प्रकार यह जैसे क्रतुवाला होता है, वही कर्म करता है । इसका जिस विषय- मन को लेकर ऋतु होता है, उसका फल तद सिद्ध करनेके लिये जो योग्य कर्म स्त होता है, उसीको करता है और जैसा कर्म करता है, वही अभिस- कथ म्पन्न होता अर्थात् उसीका फल कम प्राप्त करता है । अत: इसके सर्वम- कम यत्व और सांसारित्व में कामना ही मेत कारण है ॥ ५ ॥

कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम मन ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण लि तदेष श्लोको भवति । तदेव सक्तः सह कर्म- E णैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य । प्राप्यान्तं कर्म - उच णस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात् तन्म पुन-रैत्यस्मै लोकाय कर्मण इति नु कामयमानोऽथाकाम- निश यमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो लाघ न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥

उस विषयमें यह मन्त्र है - इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित चान प्राप्त

पृष्ठ 1063

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1063 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय४ 24 हो जाती है । अर्थात् निश्चयको पीछे क्रियाकी होता है अर्थात् जिस प्रकार के ता है, इस प्रकार होता है, वही नका जिस विषय-है, उसका फल जो योग्य कर्म करता है और है, वही अभिस-उसीका फल तः इसके सर्वम-व कामना ही निष्काम सह कर्म-यान्तं कर्म-कात् पुन-थाकाम-मकामो न ति ॥ ६ ॥

जिसमें अत्यन्त के सहित प्राप्त ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०४ ९ करता है । इस लोक में यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुन: इस लोकमें आ जाता प्राप्तकर कामना करनेवाला पुरुष ही ऐसा करता है । अब जो कामना है; अवश्य ही वाला पुरुष है [ उसके विषयमें कहते हैं ] जो अकाम, निष्काम न करते-, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता; वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ तत्तस्मिन्नर्थे एष श्लोको मन्त्रोऽपि भवति । तदेवैति तदेव गच्छति, सक्त आसक्त-स्तत्रोद्भूताभिलाषः सन्नित्यर्थः, कथमेति? सह कर्मणा यत् कर्म फलासक्तः सन्नकरोत्तेन कर्मणा सहैव वदेति तत् फल -मेति । किं तत् १ लिङ्गं मनः- -मनः प्रधानत्वाल्लिङ्गस्य मनो लिङ्गमित्युच्यते । अथ वा लिङ्गयतेऽवगम्यते-ऽत्रगच्छति येन तल्लिङ्गं तन्मनो यत्र यस्मिन्निषक्तं निश्चयेन सक्तमुद्भूताभि-लाषमस्य संसारिणः, तद्-भिलाषो हि तत् कर्म कृत-चान्, तस्मात्तन्मनोऽभिषङ्गवशा- | ६ ॥ तत् — उस विषयमें यह श्लोक अर्थात् मन्त्र भी है । तदेवेति - उसी-को जाता है, सक्त - आसक्त होकर अर्थात् उसमें अपनी अभिलाषा प्रकट कर, किस प्रकार जाता है? कर्मके सहित अर्थात् जिस कर्मको उसने फलासक्त होकर किया था, उस कर्म के सहित ही वह उसके फलके प्रति जाता है । वह ( जाने-वाला ) कौन है? लिङ्ग - मन, लिङ्ग-देह मनः प्रधान है, इसलिये मनको ' लिङ्ग ' ऐसा कहा जाता है । अथवा जिसके द्वारा लिङ्गन- -अवगम होता है अर्थात् जिससे साक्षी जानता है, उसे लिङ्ग कहते हैं, इस संसारीका वह मन जिसमें | निषक- निश्चयपूर्वक सक्त अर्थात् उद्भूताभिलाष होता है यानी अपनी | अभिलाषा प्रकट करता है; उस अभिलाषासे युक्त होकर ही उसने वह कर्म किया था, इससे अर्थात् उस चित्तको आसक्तिके कारण ही

पृष्ठ 1064

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1064 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ देवास्य तेन कर्मणा तत्फल- । प्राप्तिः । तेनैतत् सिद्धं भवति कामो मूलं संसारस्येति ॥ श्रत उच्छिन्नकामस्य विद्यमानान्यपि कर्माणि ब्रह्मविदो वन्ध्याप्रस-वानि भवन्ति; “ पर्याप्तकामस्य कृतात्मनश्च इहैव सर्वे प्रविली-यन्ति कामाः ” ( मु ० उ ० ३ । २ । २ ) इति श्रुतेः । किञ्च प्राप्यान्तं कर्मण: - प्राप्य भुक्त्वा अन्तमवसानं यावत् कर्मणः फलपरिसमाप्ति कृत्वे-त्यर्थः कस्य कर्मणोऽन्तं प्राप्ये-त्युच्यते — तस्य यत्किञ्च कर्मे-हास्मिँल्लोके करोति निर्वर्तयत्य -यम्, तस्य कर्मणः फलं युक्त्वा अन्तं प्राप्य तस्माल्लोकात् पुन-रत्यागच्छत्यस्मै लोकाय कर्मणे । अयं हि लोकः कर्मप्रधानः तेनाह - ' कर्मणे ' इति, पुनः कर्म-करणाय । पुनः कर्म कृत्वा फलासङ्गवशात् पुनरमुं लोकं याती-त्येवम् । इति नु एवं नु कामय- । इसे उस कर्मसे उस फलकी प्राप्ति हो जाती है । इससे यह सिद्ध होता है कि काम ही संसारका मूल है । अतः जिसकी कामना निवृत्त हो गयी है, उस ब्रह्मवेत्ताके विद्यमान कर्म भी वन्ध्याकी संतति हो जाते हैं; जैसा कि “ आप्तकाम और शुद्ध-चित्त पुरुषकी सारी कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । तथा कर्मके अन्तको प्राप्तकर अर्थात् जहाँतक कर्मका अन्त यानी अवसान हो वहाँतक उसे पाकर-भोगकर यानी कर्मफलकी परिस-माप्ति करके; किस कर्मका अन्त पाकर? सो बतलाया जाता है-इस लोक में यह जो कुछ कर्म करता है उसका अर्थात् उस कर्म का फल भोगकर - उसका अन्त पाकर उस लोकसे, कर्म करनेके लिये, पुनः इस लोकमें आ जाता हैं । यह लोक ही कर्मप्रधान है, त इसीसे श्रुति कहती है- ' कर्मणे ' a अर्थात् पुनः कर्म करनेके लिये । इसी प्रकार पुनः कर्म करके फला- a सक्तिके कारण पुनः परलोकमें जाता है । इस प्रकार जो कामना

पृष्ठ 1065

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1065 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ श्रध्याय ४ उस फलकी प्राप्ति इससे यह सिद्ध होता संसारका मूल है । कामना निवृत्त हो वेत्ता के विद्यमान की संतति हो जाते आप्तकाम और शुद्ध-नारी कामनाएँ यहीं हैं " इस श्रुति अन्तको प्राप्तकर कर्मका अन्त यानी हाँतक उसे पाकर-कर्मफलकी परिस-किस कर्मका अन्त चलाया जाता है-ह जो कुछ कर्म अर्थात् उस कर्म-कर उसका अन्त कसे, कर्म करनेके - लोकमें आ जाता ही कर्मप्रधान है, कहती है- ' कर्मणे ' कर्म करनेके लिये । -: कर्म करके फला-I पुन: परलोकमें -प्रकार जो कामना ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ मानः संसरति । यस्मात् काम-यमान एचैवं संसरत्यथ तस्मा-दकामयमानो न क्वचित् संसरति । फलासक्तस्य हि गतिरुक्ता कामस्य हि क्रियानुपपत्तेरका -मयमानो मुच्यत एव । कथं पुनरकामयमानो भवति १ यो-S कामो भवत्यसावकामयमानः । कथमकामतेत्युच्यते - यो निष्का-मो. यस्मान्निर्गताः कामाः सो-ऽयं निष्कामः । कथं कामा निग-च्छन्ति १ य श्राप्तकामो भव-त्याताः कामा येन स आप्तकामः । कथमाप्यन्ते कामाः १ आत्म-कामत्वेन । यस्यात्मैव नान्यः कामयितव्यो वस्त्वन्तरभूतः पदार्थो भवति । आत्मैवानन्तरो-ऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एक-१०५१ । करनेवाला है वह संसार - बन्धनको प्राप्त होता है | चूँकि कामना करने-वाला ही इस प्रकार संसरित होता है, इसलिये जो कामना करनेवाला नहीं है, वह कभी संसार - बन्धनमें नहीं पड़ता । फलासक्तकी गति तो बतला द गयी; किंतु जो निष्काम है, उसकी क्रिया सम्भव न होनेके कारण कामना न करनेवाला पुरुष तो मुक्त ही हो जाता है, किंतु जीव कामना न करनेवाला कैसे होता है? जो अकाम होता है, वही कामना न करनेवाला है । अकामता कैसे होती है? सो बतलाया जाता है— जो निष्काम है अर्थात् जिससे कामनाएँ निकल गयी हैं, वह पुरुष निष्काम कहलाता है । कामनाएँ किस प्रकार निकल जाती हैं? जो आप्तकाम होता है अर्थात् जिसने सब कामनाओंको प्राप्त कर लिया है, वह आप्तकाम है उसकी कामनाएँ नहीं रहतीं ] । कामनाओं की प्राप्ति कैसे होती है? आत्मकाम होनेसे । जिसकी कामनाका विषय आत्मा ही होता है, कोई अन्य वस्तुरूप पदार्थ नहीं होता । आत्मा ही अन्तर- बाह्यरहित,. । पूर्ण प्रज्ञानघन और एकरस है ।.

पृष्ठ 1066

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1066 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ रसः, नो॑र्ध्वं न तिर्यङ् नाध । आत्मनोऽन्यत् कामयितव्यं वस्त्व-न्तरम् । यस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येच्छृणुयान्मन्वीत विजानीयाद्वा, एवं विजानन् कं कामयेत । ज्ञायमानो ह्यन्यत्वेन * पदार्थः कामयितव्यो भवति, न चासावन्यो ब्रह्मविद श्राप्तकाम -- स्यास्ति । य एवात्मकामतया आप्तकामः स निष्कामोऽकामो-कामयमानश्चेति मुच्यते । न हि यस्य आत्मैव सर्वं भवति, तस्यानात्मा कामयितव्योऽस्ति 1 । - अनात्मा चान्यः कामयितव्यः । -सर्व चात्मैवाभूदिति विप्रति षिद्धम् । सर्वात्मदर्शिनः काम-' यितव्याभावात् कर्मानुपपत्तिः । ये तु प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्म - कल्पयन्ति ब्रह्मविदोऽपि तेषां नास्मैव सर्वं भवति; प्रत्यवायस्य : जिहासितव्यस्य आत्मनोऽन्यस्य आत्मासे भिन्न कामना के योग्य कोई अन्य वस्तु न ऊपर है, न इधर-उघर है और न नीचे है | जिसके 5 लिये सब आत्मा ही हो गया है, I किसके द्वारा किसे देखे, सुने, मनन करे अथवा जाने? इस प्रकार जानने- f वाला किसकी कामना करे । जो ब पदार्थं अन्य रूप से जाना जाता है, वही कामना योग्य होता है और यह अन्य पदार्थ आप्तकाम ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें है नहीं । अतः जो भी बात्म- न काम होनेके कारण आप्तकाम होता ए है, वही निष्काम, अकाम और कामना न करनेवाला भी है; इस- भव लिये मुक्त हो जाता है । जिसके ति लिये सब कुछ आत्मा ही हो जाता भा है उसके लिये कामना के योग्य कोई मुच अनात्मा नहीं रहता । कोई दूसरा कामनाके योग्य अनात्मा भी रहे भा और सब कुछ आत्मा भी हो गया-ऐसा कथन तो विपरीत ही है । वाम अतः सर्वात्मदर्शी के लिये कामनाके क्रा योग्य वस्तुका अभाव हो जाने कारण कर्म सम्भव नहीं है । नाश जो लोग प्रत्यवायकी निवृत्तिके ब्रह्म लिये ब्रह्मवेत्ताके भी कर्मकी कल्पना ब्रह्म करते हैं, उनके लिये सब आत्मा मेत ही नहीं होता, क्योंकि प्रत्यवाय तो काम आत्मासे भिन्न कोई अन्य त्यागने ( बृ

पृष्ठ 1067

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1067 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ अध्याय ४ मनाके योग्य कोई र है, न इधर-नीचे है | जिसके ही हो गया है, वह देखे, सुने, मनन इस प्रकार जानने-मना करे । जो ना जाता है, वही ता है और यह नाम ब्रह्मवेत्ताकी तः जो भी बात्म-आप्तकाम होता न, अकाम और बला भी है; इस-है । जिसके मा ही हो जाता ना योग्य कोई ता । कोई दूसरा अनात्मा भी रहे मा भी हो गया-विपरीत ही है । - लिये कामनाके भाव हो जाने के नहीं है । की निवृत्तिके कर्मकी कल्पना नये सब आत्मा कि प्रत्यवाय तो ई अन्य त्यागने ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ अभिप्रेतत्वात् । येन चाशनाया-द्यतीतो नित्यं प्रत्यवायासम्बद्धो विदित आत्मा, तं वयं ब्रह्मविदं ब्रूमः । नित्यमेव शनायाद्यती-तमात्मानं पश्यति । यस्माच्च जिहासितव्यमन्यमुपादेयं वा यो न पश्यति, तस्य कर्म न शक्यत १०५३ । योग्य पदार्थ ही माना गया है । ब्रह्मवेत्ता तो हम उसे कहते हैं, जिसने आत्माको क्षुधादिसे अतीत और प्रत्यवायसे असम्बद्ध जाना है । वह सर्वदा क्षुधादिसे अतीत आत्माको ही देखता है; क्योंकि जो | आत्मासे भिन्न किसी हेय या उपादेय वस्तुको नहीं देखता उससे कर्मका सम्बन्ध होना सम्भव ही नहीं है; जो ब्रह्मवेत्ता नहीं है, एव सम्बन्धुम्, यस्त्वब्रह्मवित्तस्य उसीको प्रत्यवायको निवृत्तिके लिये भवत्येव प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्मे ति न विरोधः । अतः कामा-भावादकामयमानो न जायते, मुच्यत एव । तस्यैवमकामयमानस्य कर्मा-भावे गमनकारणाभावात् प्राणा । वागादयः, नोत्क्रामन्ति नोर्ध्वं । क्रामन्ति देहात् । स च विद्वा-नाप्तकाम आत्मकामतयेहैव । ब्रह्मभूतः । सर्वात्मनो हि ब्रह्मणो दृष्टान्तत्वेन प्रदर्शित-मेतद्रूपम् - " तद्वा अस्यैतदाप्त-कर्मको आवश्यकता है, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है | अतः कामनाका अभाव होने के कारण कामना न करनेवाला पुरुष जन्म नहीं लेता, वह मुक्त ही हो जाता है । इस प्रकार कामना न करनेवाले उस पुरुषके कर्मोंका अभाव हो जानेके कारण गमनका कोई कारण न रहनेसे उसके वागादि प्राण उत्क्रमण नहीं करते - देहसे ऊपर-की ओर नहीं जाते 1 । और आत्म-कामताके कारण आप्तकाम हुआ वह विद्वान् यहीं ब्रह्मभूत हो जाता है । " वह यह निश्चय ही इसका आप्तकाम, आत्मकाम और अकामरूप है " इस प्रकार यह काममात्मकाममकामं रूपम् " दृष्टान्तरूपसे उस ब्रह्मका ही ( बृ ० उ ० ४ । ३ । २१ ) इति । रूप दिखाया गया है । ' अथा-

पृष्ठ 1068

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1068 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ तस्य हि दान्तिक भूतोऽयमर्थ । उपसंहियतेऽथाकामयमान इत्या-दिना । स कथमेवम्भूतो मुच्यत इत्युच्यते - पो हि सुषुप्तावस्थ मित्र निर्विशेषमद्वैतमलुप्तचिद्रूप-ज्योतिःस्वभावमात्मानं पश्यति, तस्यैवाकामयमानस्य कर्माभावे -गमनकारणाभावात् प्राणा वागा--दयो नोत्क्रामन्ति । किंतु विद्वान् स इहैव ब्रह्म, यद्यपि देहवानिव लक्ष्यते, स ब्रह्मैव । सन् ब्रह्माप्येति । यस्मान्न हि तस्याब्रह्मत्व परिच्छेदहेतवः - कामाः सन्ति, तस्मादिहैव ब्रह्मैव -सन् ब्रह्माप्येति न शरीरपातो-उत्तरकालम् । वा कामयमानः ' इत्यादि व यह उसीके दान्तिकभूत अर्थंका उप- बा संहार किया गया है । मो वह इस प्रकारका साधक किस इति प्रकार मुक्त होता है? सो कहा च जाता है - जो सुषुप्ति - अवस्था में क्रि स्थितकी भांति निर्विशेष, अद्वैत, नि अलुप्तचिद्रूप ज्योतिःस्वरूप आत्मा- 440 को देखता है, उस कामना न करनेवाले पुरुषके कर्मो का अभाव I हो जानेके कारण गमनका कोई मन्त्र कारण न रहने से उसके वागादि न प्राण उत्क्रमण नहीं करते; किंतु वह विद्वान् यहीं ब्रह्मरूप हो जाता स्वा है, यद्यपि वह देहवान - सा दिखायी स्वभ देता है, किंतु वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है; क्योंकि पार उसके अब्रह्मत्वके परिच्छेदकी हेतु-भूता कामनाएं नहीं रहतीं, इसलिये पारा वह यहीं ब्रह्म हो रहकर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, शरीरपात के चारा पश्चात् नहीं । विप्र न हि विदुषो मृतस्य भावान्त- मरे हुए विद्वान्को भावान्तरकी मोक्षस्य भावान्तर- रापत्तिर्जीवतो- प्राप्ति नहीं होती अर्थात् उसका स्वप्रतिषेधः ऽन्यो भावो देहान्तर- जीवितावस्थासे भिन्न भाव नहीं उष्ण होता, देहान्तरका संयोग न प्रतिसन्धानाभावमात्रेणैव तु होनेसे ही ' वह ब्रह्म को प्राप्त होता पला ब्रह्माप्येतीत्युच्यते । भावान्तरा- है ' ऐसा कहा जाता है । यदि पत्तौ हि मोक्षस्य सर्वोपनिषद्विव- मोक्ष कोई भावान्तरप्राप्ति मानी कृत्य जाय तो सम्पूर्ण उपनिषद्का चितोऽर्थ आत्मैकत्वाख्यः स विवक्षित जो आत्मैक्यरूप

पृष्ठ 1069

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1069 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

[ श्रध्याय ४ न्यादि वाक्यसे यह भूत अर्थका उप-का साधक किस ना है? सो कहा सुषुप्ति - अवस्था में निविशेष, अद्वैत, तिःस्वरूप आत्मा-उस कामना न के कर्मोंका अभाव ण गमनका कोई उसके वागादि नहीं करते; किंतु ब्रह्मरूप हो जाता देहवान् - सा दिखायी ह ब्रह्म ही रहकर होता है; क्योंकि के परिच्छेदकी हेतु-नहीं रहतीं, इसलिये ही रहकर ब्रह्मको ब है, शरीरपातके द्वान्को भावान्तरकी ती अर्थात् उसका भिन्न भाव नहीं तरका संयोग न ब्रह्म को प्राप्त होता जाता है । यदि वान्तरप्राप्ति मानी सम्पूर्ण उपनिषद्का जो आत्मैक्यरूप ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ बाधितो भवेत्, कर्महेतुकञ्च मोक्षः प्राप्नोति, न ज्ञाननिमित्त इति । स चानिष्टः, अनित्यत्वं च मोक्षस्य प्राप्नोति, न हि क्रियानिर्वृत्तोऽर्थो नित्यो दृष्टः । नित्यश्चं मोक्षोऽभ्युपगम्यते, " एष नित्यो महिमा " ( वृ ० उ ० ४ । ४ । २३ ) इति मन्त्रवर्णात् । न च स्वाभाविकात् स्वभावाद-न्यन्नित्यं कल्पयितुं शक्यम् } स्वाभाविकश्चेदग्न्युष्णवदात्मनः स्वभावः, स न शक्यते पुरुषव्या-पारानुभावीति वक्तुम् । न रौष्ण्यं प्रकाशो वाग्निव्या पारानन्तरानुभावी । अग्निव्या-पारानुभावी स्वाभाविकश्चेति विप्रतिषिद्धम् । ज्वलन व्यापारानुभावित्वम् उष्ण प्रकाशयोरिति चेन्न, अन्यो-पलब्धिव्यवधानापगमाभिव्य-क्त्यपेक्षत्वात् । ज्वलनादिपूर्वक-१०५५ | सिद्धान्त है, वह बाधित हो जायगा तथा मोक्ष कर्मनिमित्तक हो जायगा, ज्ञाननिमित्तक नहीं रहेगा और यह इष्ट नहीं है, क्योंकि इससे मोक्षकी अनित्यता भी प्राप्त होती है न, कर्मसे निष्पन्न होनेवाला पदार्थ नहीं देखा गया और मोक्ष तो नित्य ही माना गया है, जैसा कि यह " ब्राह्मणकी नित्य महिमा है " इस मन्त्रवर्णसे सिद्ध होता है । इसके सिवा स्वाभाविक ( अकृ-त्रिम ) स्वरूप से भिन्न कोई अन्य पदार्थ नित्य है - ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । यदि अग्निके उष्णत्व के समान मोक्ष आत्माका स्वाभाविक स्वरूप है तो उसके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि वह पुरुषके व्यापारद्वारा पीछे-से होनेवाला है | अग्निका उष्णत्व या प्रकाश भी अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला नहीं है । वह अग्निके व्यापारके पीछे होनेवाला है और स्वाभाविक भी है - ऐसा कहना तो विरुद्ध है । यदि कहो कि अग्निके उष्णत्व और प्रकाशका ज्वलन व्यापारके पीछे होना तो सिद्ध होता ही है — तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि वह तो दूसरेकी उपलब्धिके व्यवधान की निवृत्तिकी अभिव्यक्तिकी अपेक्षासे है । * ज्वलनादि व्यापारपूर्वक जो * आगे इसी वाक्यको व्याख्या की जाती है ।

पृष्ठ 1070

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1070 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१०५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ मग्निः उष्ण प्रकाश गुणाभ्या-मभिव्यज्यते तन्नाग्न्यपेक्षया, किं तर्ह्यन्यदृष्टेरग्नेरौष्ण्यप्रकाशौ धर्मो व्यवहितौ कस्यचिद् दृष्ट्या स्वसम्बध्यमानौ, ज्वलना-पेक्षया व्यवधानापगमे दृष्टेरभि-व्यज्येते । तदपेक्षया भ्रान्तिरुप - | जायते - ज्वलन पूर्व कावेतौ उष्ण प्रकाश धर्मों जाताविति । यद्युष्णप्रकाशयोरपि स्वाभावि-कत्वं न स्यात् । यः स्वाभाविको-ऽग्नेर्धर्मः, तमुदाहरिष्यामः । न च स्वाभाविको धर्म एव नास्ति पदार्थानामिति शक्यं वक्तुम्, न च निगडभङ्ग इवाभावभूतो मोक्षो बन्धन -निवृत्तिरुपपद्यते, परमात्मै-कत्वाभ्युपगमात् “ एकमेवा-द्वितीयम् " ( छा ० उ ० ६ । २ । १ ) अग्नि अपने उष्ण और प्रकाश-गुणों सहित अभिव्यक्त होता है. f वह अग्निकी अपेक्षासे नहीं है, तो फिर क्या बात है? –अग्निके र उष्णत्व और प्रकाशरूप धर्म दूसरे- f की दृष्टिसे व्यवहित ( ओभल ) हैं ह अर्थात् किसीकी दृष्टिसे असम्बद्ध हैं, अतः ज्वलनकी अपेक्षासे दृष्टि 5 उस व्यवधानकी निवृत्ति होनेपर वे अभिव्यक्त हो जाते हैं । इसीसे यह भ्रान्ति हो जाती है कि ये त उष्णत्व और प्रकाश धर्म ज्वलन-पूर्वक उत्पन्न हुए हैं । य यदि उष्णत्व और प्रकाश भी वि अग्निके स्वाभाविक धर्म नहीं हैं तो त जो भी अग्निका स्वाभाविक धर्म हो हम उसीको इसमें उदाहरण देंगे | पदार्थोंका स्वाभाविक धर्म व है हो नहीं ऐसा तो कहा हो नहीं जा सकता । बेड़ियोंके त टूटने के समान मोक्ष भी बन्धन-प निवृत्तिरूप अभावमय धर्म है-| ऐसा कहना भी उचित नहीं है, क क्योंकि “ एक ही अद्वितीय ब्रह्म है " इस श्रुतिके अनुसार | परमात्माकी एकता स्वीकार की इति श्रुतेः । न चान्यो बद्धोऽस्ति, गयी है । परमात्मासे भिन्न कोई दूसरा