बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1071–1080
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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[ अध्याय ४ 7--06 उष्ण और प्रकाश-अभिव्यक्त होता है, नपेक्षा से नहीं है, तो त है? – अग्नि के काशरूप धर्म दूसरे हित ( ओमल ) हैं दृष्टि से असम्बद्ध हैं, अपेक्षासे दृष्टि की निवृत्ति होनेपर हो जाते हैं । इसीसे जाती है कि ये प्रकाश धर्म ज्वलन-हुए हैं । त्व और प्रकाश भी धर्म नहीं हैं तो का स्वाभाविक धर्म को इसमें उदाहरण का स्वाभाविक धर्म - ऐसा तो कहा ही सकता । बेड़ियोंके न मोक्ष भी बन्धन-नभावमय धर्म है-भी उचित नहीं है, " एक ही अद्वितीय इस श्रुति के अनुसार स्वीकार की एकता मासे भिन्न कोई दूसरा ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५७ यस्य निगड निवृत्तिवद् बन्धन -! निवृत्तिर्मोक्षः स्यात् । परमात्म- । व्यतिरेकेणान्यस्याभावं विस्त-रेणावादिष्म । तस्मादविद्यानि -वृत्तिमात्रे मोक्षव्यवहार इति चावो -चाम । यथा रज्ज्यादौ सर्पाद्य-ज्ञान निवृत्तौ सर्पादिनिवृतिः । येऽप्याचक्षते मोक्षे विज्ञानान्त-रमानन्दान्तरं चाभिव्यज्यत इति तैर्वक्तव्योऽभिव्यक्तिशब्दार्थः । यदि तावल्लौकिक्येव उपलब्धि-विषयव्याप्तिरभिव्यक्ति शब्दार्थः, ततो वक्तव्यं किं विद्यमानमभि-व्यज्यतेऽविद्यमानमिति वा १ विद्यमानं चेद् यस्य मुक्तस्य । तदभिव्यज्यते तस्यात्मभूतमेव वदिति, उपलब्धिव्यवधानानुप-पत्तेर्नित्याभिव्यक्तत्वान्मुक्तस्या-भिव्यज्यत इति विशेषवचन-मनर्थकम् । बद्ध है नहीं, जिसकी बेड़ियों के टूटने के समान बन्धननिवृत्तिरूप मुक्ति हो । परमात्मासे भिन्न किसी अन्य वस्तुका अभाव हम पहले विस्तारसे बतला चुके हैं । अतः अविद्याकी निवृत्तिमात्र से ही मोक्ष-व्यवहार होता है - ऐसा हमारा कथन है, जिस प्रकार कि रज्जु आदिमें सर्पादिके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर सर्पादिकी भी निवृत्ति हो जाती है । जो लोग ऐसा कहते हैं कि मोक्षमें किसी विज्ञानान्तर या आनन्दान्तरको अभिव्यक्ति होती है, उन्हें ' अभिव्यक्ति ' शब्दका अर्थं बतलाना चाहिये । यदि लौकिकी उपलब्धि अर्थात् विषयव्याप्ति ही ' अभिव्यक्ति ' शब्दका अर्थ है तो यह बतलाना चाहिये कि विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है या अविद्यमान की? यदि कहें विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है तो जिस मुक्तके प्रति उस विद्यमान सुखकी अभिव्यक्ति होती है, उसका तो वह आत्मस्वरूप ही है, अत: नित्या-भिव्यक्त होनेसे उसकी उपलब्धिमें कोई व्यवधान न हो सकने के कारण वह मुक्तको अभिव्यक्त होता है - ऐसा विशेष वचन कहना व्यर्थ ही है । वृ ० उ०६७–
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१०५८ बृहदारण्यकोपनिषद् ' [ अध्याय 8 अथ कदाचिदेवाभिव्यज्यते, उपलब्धिव्यवधानादनात्मभूतं तदिति, अन्यतोऽभिव्यक्तिप्रस-ङ्गः । तथा चाभिव्यक्तिसाधना -पेक्षता । उपलब्धिसमानाश्रयत्वे तु व्यवधानकल्पनानुपपत्तेः सर्व-दाभिव्यक्तिरनभिव्यक्तिर्वा । न त्वन्तरालकल्पनायां प्रमाण -मस्ति । न च समानाश्रयाणामे-कस्यात्मभूतानां धर्माणामितरेत रविषयविषयित्वं सम्भवति । विज्ञानसुखयोश्च प्रागभिव्य-आत्मनो बन्धमोक्ष- क्तेः संसारित्वम्, विचार: अभिव्यक्त्युत्तर-कालं च मुक्तत्वं यस्य सोऽन्यः परस्मान्नित्याभिव्यक्तज्ञानस्त्र-रूपादत्यन्तवैलक्षण्यात्, शैत्य-मिबौष्ण्यातः और यदि वह कभी - कभी हो अभिव्यक्त होता है तो उसकी उपलब्धिमें व्यवधान रहने के कारण f वह अनात्मभूत है, तब तो उसकी दूसरे ( साधन ) से अभिव्यक्ति होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होता है और इस प्रकार अभिव्यक्तिके साधन की भी अपेक्षा हो जाती है । घ यदि उपलब्धिसमानाश्रयत्व माना जाय ' तो व्यवधानकी कल्पना न हो सकने के कारण या तो उसकी सर्वदा अभिव्यक्ति ही होगी या अनभिव्यक्ति ही । इन दोनों के बीचको कल्पना में कोई प्रमाण नहीं हैं ॥ एक ही आश्रयवाले अर्थात् एकही के आत्मभूत धर्मोका परस्पर विषय - विषयीभाव होना सम्भव नहीं । पूर्व ० - विज्ञान और आनन्दकी अभिव्यक्तिसे पूर्व जिसका संसारित्व 2 और अभिव्यक्तिके पश्चात् मुक्तत्व बतलाया जाता है, वह अत्यन्त विलक्षण होनेके कारण नित्याभि-व्यक्तज्ञानस्वरूप परमात्मासे भिन्न है, जैसे उष्णता से शीतलता । १. अर्थात् उपलब्धि और उपलब्धिके विषय विज्ञान एवं आनन्द — इन श दोनोंका एक आत्मा ही आश्रय है - ऐसा माना जाय ।
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' [ अध्याय8 IIIII I वह कभी - कभी ही है तो उसकी न रहने कारण है, तब तो उसकी ) से अभिव्यक्ति उपस्थित होता है र अभिव्यक्तिके पेक्षा हो जाती है । मानाश्रयत्व माना नकी कल्पना न रण या तो उसकी क ही होगी या 7। इन दोनों के कोई प्रमाण नहीं नाश्रयवाले अर्थात् धर्मो का परस्पर व होना सम्भव और आनन्दकी जिसका संसारित्व के पश्चात् मुक्तत्व - है, वह अत्यन्त कारण नित्याभि-परमात्मासे भिन्न शीतलता । एवं आनन्द - इन ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ परमात्मभेदकल्पनायां च बैं-दिकः कृतान्तः परित्यक्तः स्यात् । मोक्षस्य इदानीमिव निर्विशे-पत्वे तदर्थाधिकयनानुपपत्तिः शास्त्रवैयथ्यं च प्राप्नोतीति चेत्! न, अविद्याश्रमापोहार्थत्वात्; न हि वस्तुतो मुक्तामुक्तत्व विशे-गोऽस्ति, आत्मनो नित्यैकरूप-स्वात्; किंतु तद्विषया अविद्या पोद्यते शास्त्रोपदेशजनितवि-ज्ञानेन प्राक्तदुपदेशप्राप्तेस्तद-र्थश्च प्रयत्न उपपद्यत एव । श्रविद्यावतोऽविद्यानिवृत्यनि-वृत्तिकृतो विशेष भ्रात्मनः स्यादिति चेत्! न, अविद्या कल्पनाविषयत्वा-भ्युपगमात्, रज्जूषरशुक्तिका -१०५ ९ सिद्धान्ती - इस प्रकार परमात्मा-से भेदकी कल्पना करनेमें तो वैदिक सिद्धान्तका परित्याग हो जाता है । | पूर्व ० - यदि इस समय के समान मोक्षकी कोई विशेषता न मानी जायगी तो उसके लिये अधिक प्रयत्न करना सम्भव नहीं होगा तथा शास्त्रकी व्यर्थता भी प्राप्त होगी - यदि ऐसा कहें तो? सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है; क्योंकि अविद्यारूप भ्रमकी निवृत्ति-के लिये होने के कारण उनकी सार्थ -कता है ॥ परमार्थतः मुक्तत्व और अमुक्तत्वमें कोई भेद नहीं है, क्योंकि आत्मा सर्वदा एकरूप ही है । किंतु शास्त्रजनित विज्ञान से तद्विषयक अज्ञानका नाश होता है और उस शास्त्रोपदेश के प्राप्त होनेसे पहले उसके लिये प्रयत्न लकर करना भी भी उचित ही है । पूर्व०- अविद्यावान् आत्माका अविद्याकी निवृत्ति एवं अनिवृत्ति-के कारण रहनेवाला भेद तो रहेगा ही! सिद्धान्ती नहीं, क्योंकि आत्मा-को अविद्याजनित कल्पनाका विषय | माना गया है; इसलिये रज्जु, ऊसर,
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१०६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ गगनानां सर्पोदकरजतमलिनत्वा । | दिवददोष इत्यवोचाम । तिमिरातिमिर दृष्टिवदविद्या-कर्तृत्वाकर्तृत्वकृत आत्मनो वि-शेषः स्यादिति चेत्! न, " ध्यायतीव लेलायतीब " इति स्वतोऽविद्याकर्तृत्वस्य प्रति-सिद्धत्वात् श्रनेकव्यापारसंनि-पातजनितत्वाच्च श्रविद्याभ्रमस्य; विषयत्वोपपत्तेश्चः यस्य च प्र-विद्यामो घटादिवद् विविक्तो गृह्यते, स न अविद्याश्रमवान् । ' अहं न जाने मुग्धोऽस्मि ' इति प्रत्ययदर्शनादविद्याश्रमवत्वमेवे - -वि चेत्! शुक्ति और आकाश में भासनेवाले सर्प, जल, रजत और मालिन्यसे जैसे उनमें कोई दोष नहीं आता, उसी प्रकार आत्मामें भी अविद्या-जनित कल्पनासे कोई दोष नहीं आ सकता- ऐसा हम कह चुके हैं । पूर्व ० - तिमिर रोगयुक्त और तिमिर - रोगमुक्त दृष्टिसे जैसे चन्द्रमा-का भेद प्रतीत होता है, वैसे ही अविद्या कर्ता और अकर्ता होनेसे आत्मा में भी भेद हो जायगा! सिद्धान्ती -- नहीं, क्योंकि " ध्यान-सा करता है, चञ्चल - सा होता है " इस श्रुतिद्वारा स्वयं आत्माके अवि-व्याकर्ता होनेका निषेध किया गया है । इसके सिवा अविद्यारूप भ्रम तो अनेक व्यापारोंके मेलसे उत्पन्न होता है तथा वह आत्माका विषय भी है । अतः जिसके द्वारा अविद्या-रूप भ्रम घटादिके समान प्रत्यक्ष-तथा ग्रहण किया जाता है, वह अविद्यारूप भ्रमवाला नहीं हो सकता! पूर्व ० - ' मैं नहीं जानता, मूढ हूँ ' ऐसा अनुभव देखा जानेके कारण तो आत्मा अविद्यारूप भ्रम-वाला ही सिद्ध होता है!
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[ अध्याय ४ काशमें भासनेवाले और मालिन्यसे दोष नहीं आता, मामें भी अविद्या-कोई दोष नहीं हम कह चुके हैं । मर- रोगयुक्त और दृष्टिसे जैसे चन्द्रमा-होता है, वैसे ही और अकर्ता होने द हो जायगा! हीं, क्योंकि " ध्यान-चञ्चल - सा होता है " वयं आत्मा के अवि-निषेध किया गया अविद्यारूप भ्रम के मेलसे उत्पन्न न्ह आत्माका विषय सके द्वारा अविद्या-दके समान प्रत्यक्ष-या जाता है, वह मवाला नहीं हो नहीं जानता, मूढ भव देखा जानेके ना अविद्यारूप भ्रम-होता है! ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्याथ १०६१ न तस्यापि विवेकग्रहणात्; न हि यो यस्य विवेकेन ग्रहीता; स तस्मिन् भ्रान्त इत्युच्यते; तस्य च विवेकग्रहणम्, तस्मि -न्नेव च भ्रमः - इति विप्रतिषि-द्धम्; न जाने सुग्धोऽस्मीति दृश्यते इति ब्रवीषि — ----- तद्दर्शिनश्च अज्ञानं मुग्धरूपता दृश्यत इति च - तद्दर्शनस्य विषयो भवति, कर्मतामापद्यत इति । तत् कथं कर्मभूतं सत् कर्तृस्वरूपदृशि -विशेषणम् अज्ञानमुग्धते स्या-ताम्? अथ दृशिविशेषणत्वं तयोः, कथं कर्म स्याताम् -दृशिना व्याप्येते? कर्म हि कर्तृक्रियया व्याप्यमानं भवति अन्यच्च व्याप्यम्, अन्यद् व्याप-कम्; न तेनैव तद् व्याप्यते; वद कथमेवं सति, अज्ञान-मुग्धते दृशिविशेषणे स्याताम् १ न चाज्ञानविवेकदर्शी अज्ञान-सिद्धान्ती - ऐसी बात नहीं है । क्योंकि उस अनुभवका भी पृथकू करके ग्रहण होता है और जो जिसका पृथक् करके ग्रहण करने-वाला है; वह उसमें भ्रान्त है— ऐसा कहा नहीं जा सकता । उसी-का तो पृथक् करके ग्रहण होता है और उसीमें भ्रान्ति है -- ऐसा कहना तो विरुद्ध है । ' में नहीं जानता, मुग्ध हूँ ' यह अनुभव दिखायी देता है - ऐसा तुम कहते हो और ऐसा भी कहते हो कि उसे देखनेवालेकी अज्ञान एवं सुग्ध-रूपता देखी जाती है -- इस प्रकार तो वे अज्ञानादि दर्शनके विषय अर्थात् कर्मरूपताको प्राप्त हो जाते हैं । तब कर्मभूत होकर वे अज्ञान और मुग्धता कर्तृौं स्वरूप साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? और यदि वे साक्षीके विशेषण हैं तो वे उसके कर्म कैसे हो सकते हैं अर्थात् साक्षीसे व्याप्त कैसे होंगे? कर्म तो कर्ताकी क्रियासे व्याप्त होनेवाला होता है तथा व्याप्य दूसरा होता है और व्यापक दूसरा; वह उसीसे व्याप्त नहीं होता । ऐसी स्थिति में बतलाओ, अज्ञान और मुग्धता साक्षीके विशेषण किस प्रकार हो सकते हैं? तथा अज्ञानको अपनेसे पृथक् देखनेवाला - अज्ञान-
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१०६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय४ घ मात्मनः कर्मभूतमुपलभमान | को अपना कर्मभूत अनुभव करने-| वाला उसे शरीरान्तर्गत कृशता उपलब्धृधर्मत्वेन गृह्णाति -- शरीरे और रूपादिके समान साक्षी प कार्श्यरूपादिवत्, तथा । सुखदुःखेच्छाप्रयत्नादीन् सर्वो लोको गृह्णातीति चेत्! तथापि ग्रहीतुर्लोकस्य विवि-कतैवाभ्युपगता स्यात् । जानेऽहं त्वदुक्तं मुग्ध एव ' इति चेद् भवत्वज्ञो मुग्धः, यस्तु एवंदर्शी, तं ज्ञम् अमुग्धं प्रति जानीमहे वयम् । तथा व्या-सेनोक्तम्– ' इच्छादि कृत्स्नं क्षेत्र क्षेत्री प्रकाशयति ' इति, " समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं पर-मेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्य न्तम् - " ( गीत १३ ।२७ ) इत्यादि शतश उक्तम् । तस्मा न्नात्मनः स्वतो बद्धमुक्तज्ञाना-ज्ञानकृतो विशेषोऽस्ति, सर्वदा समैकरसस्वाभाव्याम्युपगमात् । धर्मरूपसे नहीं ग्रहण करता । पूर्व ० – सुख - दुःख, इच्छा और II प्रयत्नादि [ आत्मा के धर्मो ] को तो E सभी लोग ग्रहण करते हैं! E सिद्धान्ती - इस प्रकार भी ग्रहण करनेवाले पुरुषकी पृथक्ता ही स्वीकार की जाती है । और तुमने जो कहा कि ' मैं नहीं जानता, मुग्ध ही हूँ ', सो तुम भले ही अज्ञ या मुग्ध रहो, किंतु जो इस प्रकार देखनेवाला है वह तो ज्ञाता और अमुग्ध ही है — ऐसी हमारी प्रतिज्ञा है । व्यासजीने भी ऐसा ही कहा है कि ' क्षेत्री ( आत्मा ) इच्छादि सम्पूर्ण क्षेत्रोंको प्रकाशित करता है । ' " समस्त भूतोंमें समानरूपसे स्थित और उनके नष्ट होनेपर भी नष्ट न होनेवाले परमेश्वरको " इत्यादि सैकड़ों प्रकारसे उसका वर्णन किया गया है । अतः स्वयं आत्माकी बद्धमुक्त एवं ज्ञान - अज्ञान-के कारण कोई विशेषता नहीं होती; क्योंकि उसे सर्वदा समान । और एकरसस्वरूप माना गया है ।
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[ अध्याय४ भूत अनुभव करने-रीरान्तर्गत कृशता समान साक्षीके ग्रहण करता । दु: ख, इच्छा और माके धर्मों ] को तो करते हैं! इस प्रकार भी ग्रहण की पृथक्ता ही ती है । और तुमने नहीं जानता, मुग्ध भले ही अज्ञ या जो इस प्रकार वह तो ज्ञाता और ऐसी हमारी प्रतिज्ञा भी ऐसा ही कहा आत्मा ) इच्छादि प्रकाशित करता तों में समानरूपसे के नष्ट होनेपर भी ले परमेश्वरको " प्रकारसे उसका है । अतः स्वयं क एवं ज्ञान - अज्ञान-ई विशेषता नहीं से सर्वदा समान रूप माना गया है । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६३ ये तु श्रतोऽन्यथा आत्मवस्तु परिकल्प्य बन्धमोक्षादिशास्त्रं च अर्थवादमापादयन्ति, ते उत्स -हन्ते खेऽपि शाकुनं पद ं द्रष्टुम्, खं वा मुष्टिना श्रक्रष्टुम्, चर्म वद् वेष्टितुम्; वयं तु तत् कर्तुम शक्ताः; सर्वदा समैकरसम् अद्वै -तम् अविक्रियम् अजम् अजरम् अमरम् अमृतम् अभयम् आत्म-तत्त्वं ब्रह्मैव स्मः - इत्येष सर्व-वेदान्त निश्वितोऽर्थ इत्येवं प्रति पद्यामहे । तस्माद् ब्रह्माप्येतीति उपचारमात्रमेतत् - विपरीतग्रहव-देहसंवतेर्विच्छेदमात्रं विज्ञान-फलमपेक्ष्य ॥ ६ ॥
किंतु जो लोग आत्मतत्त्वको अन्य प्रकार से कल्पना कर बन्ध-मोक्षादि - शास्त्रको केवल अर्थवाद बतलाते हैं, वे तो खाकाशमें भी पक्षीके चरणचिह्न देखना चाहते हैं अथवा आकाशको मुट्ठोसे खींचना और उसे चमड़े के समान लपेटनेकी इच्छा करते हैं; हम तो ऐसा करने में समर्थ हैं नहीं; हम सर्वदा सम, एकरस, अद्वैत, अविकारी, अजन्मा, अजर, अमर, अमृत, अभयरूप आत्मतत्त्व ब्रह्म ही है--यही सम्पूर्ण वेदान्तोंका निश्चित अर्थ है -- ऐसा समझते हैं । अतः विप-रीतग्रहणसे होनेवाली देहसंतति-का विच्छेदमात्र जो विज्ञानका फल है, उसकी अपेक्षासे ' ब्रह्म को प्राप्त होता है ' यह कथन उपचारमात्र है ॥ ६ ॥
स्वप्न बुद्धान्तगमनदृष्टान्तस्य दाष्टन्तिकः संसारो वर्णितः । संसारहेतुश्च विद्याकर्म पूर्वप्रज्ञा व-गिता । यैश्वोपाधिभूतैः कार्य-करणलक्षणभूतैः परिवेष्टितः संसारित्वमनुभवति, तानि चो-क्तानि । तेषां साक्षात्प्रयोजक स्वप्न और जागरित अवस्थाओं-में जानेका जो दृष्टान्त दिया गया था उसके दान्तिक संसारका वर्णन कर दिया गया । संसारके हेतुभूत विद्या, कर्म और पूर्व ज्ञा-का भी निरूपण किया गया; और जिन उपाधिभूत देह एवं इन्द्रिय-लक्षणभूतोंसे परिवेष्टित हुआ जीव संसारित्वका अनुभव करता है उनका भी उल्लेख | कर दिया गया । उनके
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१०६४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ धर्माधर्माविति पूर्वपक्षं कृत्वा काम एवेत्यवधारितम् । यथा च ब्राह्मणेन श्रयमर्थोऽवधारितः, एवं मन्त्रेणापीति बन्धं बन्ध-कारणं चोक्त्योपसंहृतं प्रकर-णम् ' इति नु कामयमानः ' इति । ' अथाकामयमानः ' इत्यारभ्य सुषुप्तदृष्टान्तस्य दान्तिकभूतः सर्वात्मभावो मोक्ष उक्तः । मोक्ष-कारणं च आत्मकामतया यद् आप्तकामत्वमुक्तम्, तच्च साम-र्थ्यान्नात्मज्ञानमन्तरेण श्रात्म-कामतयाप्त कामत्वमिति - साम-र्थ्याद् ब्रह्मविद्येव मोक्षकारण-मित्युक्तम् । अतो यद्यपि कामो मूलमित्युक्तम्, तथापि मोक्ष-कारणविपर्ययेण बन्धकारणम-विद्या- इत्येतदप्युक्तमेव भवति । अत्रापि मोक्षो मोक्षसाधनं च ब्राह्मणेनोक्तम्; तस्यैव दृढीकर- । ब्रा साक्षात् प्रेरक धर्म और अध हैं- ऐसा पूर्वपक्ष करके यह निश्य किया गया कि काम ही उनका प्रेरक है । जिस प्रकार ब्राह्मणभाग- 1 के द्वारा इस अर्थका निश्चय किया था, वैसे ही मन्त्रके द्वारा भी बन्ध और बन्धके कारणका वर्णन कर ट ' इति नु कामयमानः ' इत्यादि पदोंसे इस प्रकरणका उपसंहार कर दिया गया । फिर ' अथाकामयमानः ' इस प्रकार आरम्भ कर सुषुप्तावस्थारूप २ दृष्टान्तके दान्तिकभूत सर्वात्म-भावरूप मोक्षका वर्णन किया गया । यहाँ मोक्षका कारण जो आत्मकामत्वके द्वारा आप्तकामत्व बतलाया गया है, वह आत्म- य कामत्वद्वारा आप्तकामत्व प्रकरण-की सामर्थ्य से आत्मज्ञानके बिना हो नहीं सकता, अतः सामर्थ्यसे ब्रह्मविद्या ही मोक्षका कारण बतलायी गयी है । इसलिये यद्यपि स संसारका मूल काम है -- यह प्र बतलाया गया है, तथापि यह बात भी कही हुई हो ही जाती है कि मोक्षके कारण ज्ञानसे विपरीत अज्ञान ही बन्धनका कारण है । यहां भी मोक्ष और मोक्षका साधन -- ये ब्राह्मण-भागद्वारा बतलाये गये हैं ।
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[ श्रध्याय ४ धर्म और अधर्म क्ष करके यह निश्चय काम ही उनका प्रकार ब्राह्मणभाग- । थंका निश्चय किया के द्वारा भी बन्ध रणका वर्णन कर वनः ' इत्यादि पदोंसे उपसंहार कर कामयमानः ' इस कर सुषुप्तावस्थारूप न्तिकभूत सर्वात्म-का वर्णन किया क्षका कारण जो द्वारा आप्तकामत्व है, वह आत्म-कामत्व प्रकरण-वात्मज्ञान के बिना J अतः सामर्थ्य से मोक्षका कारण । इसलिये यद्यपि काम है-- यह है, तथापि यह हुई हो ही जाती कारण ज्ञानसे ही वन्धनका भी मोक्ष धन -- ये ब्राह्मण-नाये गये हैं । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६५ णाय मन्त्री उदाह्रियते श्लोक | उसीको दृढ करनेके लिये श्लोक-शब्दवाच्य मन्त्रका उल्लेख किया शब्दवाच्यः- जाता है— विद्वान्का अनुत्क्रमरण तदेष श्लोको भवति । यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति । तद्यथाहिनियनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेद शरीर शेतेऽथायम-शरीरोऽस्मृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥ ७ ॥
उसी अर्थ में यह मन्त्र है -- जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है तो फिर यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं ( इस शरीर में ही ) उसे ब्रह्मको प्राप्ति हो जाती है । इसमें दृष्टान्त - जिस प्रकार सर्पंकी काँचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्यक्त हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है- तेज ही है । तब विदेहराज जनकने कहा, ' वह मैं जनक श्रीमान्को सहस्र गौएँ देता हूँ ' ॥ ७ ॥
तत् तस्मिन्नेवार्थे एष श्लोको | ' तत् ' – उसी अर्थ में यह श्लोक मन्त्रो भवति । यदा यस्मिन् काले यानी मन्त्र है - जब – जिस समय सर्वं अर्थात् समस्त काम– तृष्णाओं सर्वे समस्ताः कामाः तृष्णाप्रभेदाः के भेद सर्वथा छूट जाते हैं, आत्म-प्रमुच्यन्ते, आत्मकामस्य ब्रह्म- कामी ब्रह्मवेत्ताकी वे समस्त काम-विदः समूलतो विशीर्यन्ते, ये नाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं; जो प्रसिद्धा लोके इहामुत्रार्थाः पुत्र- लोकमें प्रसिद्ध पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणारूप ऐहिक और वित्तलोकैषणालक्षणा अस्य प्र- पारलौकिक कामनाएँ इस पुरुषके सिद्धस्य पुरुषस्य हृदि बुद्धौ श्रिता हृदय - बुद्धिमें आश्रित हैं [ वे जब
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१०६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय श्राश्रिता: - अथ तदा मर्त्यो मरणधर्मा सन्, कामवियोगात् समूलतः, अमृतो भवति । अर्थादनात्मविषयाः कामा श्वविद्यालक्षणा मृत्यव इत्येतदुक्तं भवति श्रतो मृत्युवियोगे विद्वान् जीवन्नेव अमृतो भवति । अत्र अस्मिन्नेव शरीरे वर्तमानो ब्रह्म समश्नुते, ब्रह्मभावं मोक्षं प्रतिप-द्यत इत्यर्थः । अतो मोतो न देशान्तरगमनाद्यपेक्षते । तस्माद् विदुषो नोत्क्रामन्ति प्राणाः, यथावस्थिता एव स्वकारणे पुरुषे समवनीयन्ते; नाममात्रं हि अवशिष्यते - इत्युक्तम् । कथं पुनः समवनीतेषु प्राणेषु देहे च स्वकारणे प्रलीने विद्वान् मुक्तोऽत्रैव सर्वात्मा सन् वर्त-मानः पुनः पूर्ववद् देहित्वं सं सारित्वलक्षणं न प्रतिपद्यते १ इत्य-त्रोच्यते - तत्तत्रायं दृष्टान्तः- -यथा लोके ' अहिः सर्पः, तस्य ४ | समूल नष्ट हो जाती हैं ] तब मर्त्य – मरणधर्मा होनेपर यह भी नि कामनाओं का समूल नाश हो नि ' जानेके कारण अमृत हो जाता है । व यहाँ अर्थतः यह बात कह दी प्र गयो कि अनात्मविषयक कामनाएँ ही अविद्यारूप मृत्यु हैं, अतः मृत्यु- पा का वियोग हो जानेपर विद्वान् म जीवित रहते हुए ही अमृत हो स जाता है । वह यहाँ - इस शरीर में ही रहता हुआ ब्रह्मको अर्थात् ब्रह्मभावरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है । अतः मोक्षको देशान्तरमें जाने आदिकी अपेक्षा नहीं है; इसलिये विद्वान्के प्राणोंका उत्क्रमण नहीं प होता । वे जैसेके तैसे ही अपने अ कारण पुरुषमें पूर्णतया लीन हो स जाते हैं, केवल नाममात्र हो बब रहता है-- ऐसा ऊपर कहा इ गया है । किंतु प्राणों लीन हो जानेपर तथा देहके अपने कारणमें मिल झ जानेपर विद्वान् किस प्रकार मुक्त होकर अर्थात् यहीं सर्वात्मा होकर उ विद्यमान रहते हुए पूर्ववत् पुनः ५ संसारित्वरूप देहिभावको प्राप्त नहीं होता? इस विषय में अब कहा जाता है - उसमें यह दृष्टान्त है - जिस त प्रकार लोकमें अहि — सर्प, उसकी