बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1081–1090
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
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[ श्रध्याय४ जाती हैं ] तब यह र्मा होनेपर भी समूल नाश हो अमृत हो जाता है । : यह बात कह दी -मविषयक कामनाएं मृत्यु हैं, अतः मृत्यु-जानेपर विद्वान् हुए ही अमृत हो यहाँ - इस शरीर में ब्रह्मको अर्थात् क्ष को प्राप्त कर लेता को देशान्तर में जाने नहीं है; इसलिये उत्क्रमण नहीं के तैसे ही अपने पूर्णतया लीन हो नाममात्र हो बच सा ऊपर कहा के लीन हो जानेपर ने कारणमें मिल किस प्रकार मुक्त ह्रीं सर्वात्मा होकर हुए पूर्ववत् पुनः हिभावको प्राप्त नहीं यमें अब कहा जाता दृष्टान्त है - जिस अहि — सर्प, उसकी ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६७ निर्वयनी --निर्मोकः, सा अहि-निर्व्वयनी, वल्मीके सर्पाश्रये बन्मीकादावित्यर्थः मृता प्रत्यस्ता प्रक्षिप्ता अनात्मभावेन सर्पेण परित्यक्ता, शयीत वर्तेत एच-मेव यथायं दृष्टान्तः, इदं शरीरं सर्पस्थानीयेन मुक्तेन अनात्म-भावेन परित्यक्तं मृतमिव शेते । अथेतरः सर्पस्थानीयो मुक्तः सर्वात्मभूतः सर्पवचत्रैव वर्त-मानोऽप्यशरीर एव, न पूर्ववत् पुनः सशरीरो भवति । कामकर्म -प्रयुक्त शरीरात्मभावेन हि पूर्व सशरीरो मर्त्यश्च तद्वियोगादथ इदानीमशरीरः, अत एव च अमृतः प्राणः प्राणितीति प्राणः-' प्राणस्य प्राणम् ' ( ४ । ४ । १८ ) इति हि वक्ष्यमाणे श्लोके, " प्राण-बन्धनं हि सोम्य मनः " ( छा ० उ ० ६ । ८ । २ ) इति च श्रुत्यन्तरे; प्रकरणवाक्यसामर्थ्याच्च पर एव आत्मा चत्र प्राणशब्दवाच्यः; ब्रह्मैव परमात्मैव । किं पुनस्तत् १ तेज एव विज्ञानं ज्योतिः, येन निवयनी - काँचुली अर्थात् सर्पंकी काँचुली वल्मीक – सर्पके आश्रय यानी बांबी आदिपर मृत और प्रत्यस्त - सर्पद्वारा अनात्मभावसे प्रक्षिप्त - परित्यक्त होकर पड़ी रहती है; इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह शरीर सर्पस्थानीय मुक्त-पुरुषके द्वारा अनात्मभावसे परि--त्यक्त होकर मरे हुएके समान पड़ा रहता है । और उससे भिन्न जो सर्प-. स्थानीय सर्वात्मभूत मुक्त पुरुष है, वह सर्प के समान वहीं रहता हु भी अशरीर ही रहता है, पूर्ववत् पुनः शरीरयुक्त नहीं होता । वह पहले कामकर्मप्रयुक्त शरीरात्म-भावसे ही सशरीर और मरणधर्मा था; उसके न रहने से अब वह अशरीर है और इसीलिये अमृत है; वह प्राण - प्राणक्रिया करता है, इसलिये प्राण है । ' वह प्राण-का प्राण है ' ऐसा आगे कहे जाने-वाले मन्त्रमें और " हे सोम्य! मन प्राणरूप बन्धनवाला है " ऐसा एक अन्य श्रुतिमें कहा भी है । प्रकरण-के वाक्यका सामर्थ्यंसे भी यहाँ परमात्मा ही ' प्राण ' शब्दका वाच्य है | ब्रह्म हो अर्थात् परमात्मा. ही है । और वह क्या है? तेज हो है- विज्ञानरूप ज्योति ही है, जिस
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१०६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय 8 श्रात्मज्योतिषा जगदवभास्य-मानं प्रज्ञानेत्रं विज्ञानज्योतिष्मत् सदविभ्रंशद् वर्तते । यः कामप्रश्नो विमोक्षार्थी याज्ञवल्क्येन वरो दत्तो जनकाय, सहेतुको बन्धमोक्षार्थलक्षणो दृष्टान्तदन्तिकभूतः स एष निर्णीतः सविस्तरो जनकयाज्ञ-चन्क्याख्यायिकारूपधारिण्या श्रु-त्या; संसारविमोक्षोपाय उक्तः प्राणिभ्यः । इदानीं श्रुतिः स्वय- । मेवाह - विद्यानिष्क्रयार्थ जनके- । नैवमुक्तमितिः कथम्? सो s ह-मेवं विमोक्षितस्त्वया भगवते तुभ्यं विद्यानिष्क्रयार्थं सहस्रं ददामि - इतिह एवं किल उवाच उक्तवान् जनको वैदेहः । अत्र कस्माद् विमोक्षपदार्थे निर्णीते, विदेहराज्यमात्मानमेव च न निवेदयति, एकदेशोक्ताविव सहस्रमेव ददाति १ तत्र कोऽभि-प्राय इति १, आत्मज्योतिसे अवभासित होता हुआ जगत् प्रज्ञानेत्र और विज्ञान-ज्योतिर्मय होकर विशेषरूपसे च्युत न होता हुआ विद्यमान रहता है । C याज्ञवल्क्यने विमोक्षके लिये जनकको जो कामप्रश्नरूप वर दिया था, उस दृष्टान्तदान्तिक भूत बन्धमोक्षार्थलक्षण सहेतुक प्रश्नका जनक - याज्ञवल्क्य -आख्यायिकारूप- च धारिणी श्रुतिने विस्तारपूर्वक निर्णय कर दिया तथा प्राणियोंको संसार-से ' मुक्त होनेका उपाय भी बतला दिया । अब श्रुति स्वयं ही कहती है कि इस विद्याका बदला चुकाने- इ के लिये जनकने इस प्रकार कहा । किस प्रकार? आपके द्वारा इस प्रकार विमुक्त किया हुआ मैं इस विद्यादानसे उऋण होनेके लिये आप श्रीमान्को एक सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ- ऐसा विदेहराज जनकने कहा । यहाँ मोक्षतत्त्वका निर्णय हो जानेपर भी जनक विदेहराज्य और स अपने को ही समर्पण क्यों नहीं कर रा देता? उसका जैसे एकदेश ही कहा गया हो — इस प्रकार केवल सहस्र [ गौएँ ] ही क्यों देता है? इसमें उसका क्या अभिप्राय है?
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[ अध्याय 8 अवभासितहोता ज्ञानेत्र और विज्ञान-कर विशेषरूप से च्युत विद्यमान रहता है । विमोक्षके लिये कामप्रश्नरूप वर दिया दृष्टान्तदाष्टन्तिकभूत क्षण सहेतुक प्रश्नका त्रय - आख्यायिकारूप-विस्तारपूर्वक निर्णय प्राणियोंको संसार-उपाय भी बतला त्रुति स्वयं ही कहती का बदला चुकाने-न इस प्रकार कहा । आपके द्वारा इस किया हुआ मैं इस उऋण होनेके लिये एक सहस्र [ गौएँ ] विदेहराज जनकने तत्त्वका निर्णय हो नक विदेहराज्य और मर्पण क्यों नहीं कर जैसे एकदेश ही - इस प्रकार केवल ] ही क्यों देता है? त्या अभिप्राय है? ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०६६ अत्र केचिद वर्णयन्ति – अध्या- । त्मविद्यारसिको जनकः श्रुतम-प्यर्थं पुनर्मन्त्रैः शुश्रूषति; अतो न सर्वमेव निवेदयति श्रुत्वाभि-प्रेतं याज्ञवल्क्यात् पुनरन्ते निचे- । दयिष्यामीति हि मन्यते, यदि चात्रैव सर्वं निवेदयामि, निधु-चाभिलाषोऽयं श्रवणादिति । मत्वा, श्लोकान् न वक्ष्यति -इति च मयात् सहस्रदानं शुश्रू-पालिङ्गज्ञापनायेति । सर्वमप्येतदसत् पुरुषस्येव प्रमाणभूतायाः श्रुतेर्व्याजानुप-पत्तेः । अथशेषोपपत्तेश्व – दि मोक्षपदार्थ उक्तेऽपि श्रात्मज्ञा-नसाधने श्रात्मज्ञानशेषभूतः सर्वेषणा परित्यागः संन्यासा-ख्यो वक्तव्योऽर्थशेषो विद्यते; तस्माच्छ्लोकमात्रशुश्रूषा कल्प-ना गति -यहाँ कोई - कोई ऐसा कहते हैं- — जनक अध्यात्मविद्याका रसिक है, वह सुनी हुई बातको भी पुनः-पुनः मन्त्रोंके द्वारा सुनना चाहता है । इसलिये वह सारेको ही समर्पण नहीं करता । वह ऐसा समझता है कि याज्ञवल्क्यसे अपना सारा अभिमत विषय सुनकर अन्त में सर्वस्व समर्पण करूंगा तथा उसे यह भय भी है कि यदि मैं यहीं सब कुछ दे डालूँगा तो याज्ञवल्क्यजी यह समझकर कि अब इसकी श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त हो गयी है, मन्त्रोंद्वारा इसका वर्णन नहीं करेंगे । अतः यह सहस्रदान उसकी शुश्रूषा के लिङ्गको सूचित करनेके लिये है । किंतु ये सब बातें ठीक नहीं हैं; क्योंकि साधारण मनुष्योंकी भांति प्रमाणभूत श्रुतिके लिये किसी बहानेकी आवश्यकता नहीं । हो सकती । इसके सिवा, अभी कुछ वक्तव्य अर्थ शेष है, इससे भी सहस्रमात्र दान संगत है । मोक्ष-तत्त्वका निरूपण हो जानेपर भी आत्मज्ञानका साधन और आत्म-ज्ञानका शेषभूत सर्वेषणात्यागरूप-संन्याससंज्ञक वक्तव्य विषय अभी अवशिष्ट है ही । अतः मन्त्रश्रवणमात्र-। की इच्छाकी कल्पना करना क्लिष्ट
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१०७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय का हि गतिः पुनरुक्तार्थकल्पना -सा चायुक्ता सत्या गर्यो । न च तत् स्तुतिमात्रमित्यवोचाम । ननु — - एवं सति श्रत ऊध्व ' विमोक्षायैव ' इति वक्तव्यम् — नैष दोषः श्रात्मज्ञानवद् ' अप्रयोजकः संन्यासः पक्षे प्रति-' पत्तिकर्मवत् - इति हि मन्यते; " संन्यासेन तनुं त्यजेत् " इति स्मृतेः । साधनत्वपक्षेऽपि न ' अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ' इति प्रश्नमर्हति, मोक्षसाधनभूतात्म-ज्ञानपरिपाकार्थत्वात् ॥ ७ ॥
आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताको मोक्ष प्राप्त तदेते श्लोका भवन्ति । ४ । है । एक बार कहे हुए विषय पुनः कहनेकी कल्पना करना तो अगतिकगति है । गति रहते हुए तो वैसी कल्पना करनी उचित नहीं है । और यह [ संन्यासादि । स्तुतिमात्र हैं नहीं - यह हम पहले है कह चुके हैं । त्रा प्र ० - किंतु यदि ऐसा होता हैं श तो ' इसके आगे विमोक्षके लिये हो कहिये ' ऐसा कहना चाहिये था? उ ० – यहाँ यह दोष नहीं है, इ क्योंकि जनक ऐसा समझता है कि आत्मज्ञानके समान संन्यास मोक्ष- भ का प्रयोजक ( साक्षात् साधन ) द नहीं है, ' प्रतिपत्तिकर्मके समान उसका पाक्षिक अनुष्ठान किया जा सकता है, जैसा कि " संन्यास के इ द्वारा शरीर त्याग करे " इस ज्ञ स्मृतिसे सिद्ध होता है । यदि उसे ( विविदिषासंन्यासको ) साधन-पक्ष में माना जाय तो भी उसके क विषय में ' इससे आगे मोक्ष के लिये ही कहिये ' ऐसा प्रश्न नहीं किया वि जा सकता; क्योंकि संन्यास तो इ मोक्षके ही साधनभूत आत्मज्ञान के परिपाकके लिये है ॥ ७ ॥ तं
ब्र होता है— इसमें प्रमाणभूत मन्त्र म अणुः पन्था विततः पुराणो १. ज्ञानके साधनभूत कर्मोंको यहाँ प्रतिपत्तिकर्म कहा गया है ।
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[ श्रध्याय४ कहे हुए विषय के कल्पना करना तो है । गति रहते हुए ना करनी उचित यह [ संन्यासादि ] नहीं - यह हम पहले यदि ऐसा होता विमोक्षके लिये हो कहना चाहिये था? यह दोष नहीं है, ऐसा समझता है कि समान संन्यास मोक्ष-( साक्षात् साधन ) वपत्तिकर्मके समान - अनुष्ठान किया जा सा कि " संन्यास के त्याग करे " इस होता है । यदि उसे न्यासको ) साधन-नाय तो भी उसके आगे मोक्षके लिये प्रश्न नहीं किया क्योंकि संन्यास तो वनभूत आत्मज्ञानके है ॥ ७ ॥
में प्रमाणभूत मन्त्र विततः पुराणो या है । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७१ A माँ स्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव । तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ ८ ॥
उस विषयमें ये मन्त्र हैं - यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्णं और पुरातन है । वह मुझे स्पर्शं किये हुए है और मैंने ही उसका फल साधक ज्ञान प्राप्त किया है । धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते - जी ही मुक्त होकर शरीर - त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥
यात्मकामस्य ब्रह्मविदो मोक्ष इत्येतस्मिन्नर्थे मन्त्रब्राह्मणोक्ते, विस्तरप्रतिपादका एते श्लोका भवन्ति अणुः सूक्ष्मः पन्था दुर्विज्ञेयत्वात्; विततः विस्तीर्णः, विस्पष्टतरणहेतुत्वाद्वा ' वितरः ' इति पाठान्तरात्, मोक्षसाधनो ज्ञानमार्गः । पुराणश्चिरंतनो नि-स्यश्रुतिप्रकाशितत्वात्, न ताकिं-कबुद्धिप्रभवकुदृष्टिमार्गवदर्वाक्का लिकः । मां स्पृष्टो मया लब्ध इत्यर्थः; यो हि येन लभ्यते, स तं स्पृशतीव संबध्यते । तेनायं ब्रह्मविद्यालक्षणो मोक्षमार्गो मया लब्धत्वात् ‘ मां स्पृष्टः ' इत्यु-च्यते । आत्मकाम ब्रह्मवेत्ताका मोक्ष होता है— मन्त्र और ब्राह्मणद्वारा कहे हुए इस अर्थ में उसके विस्तार-का प्रतिपादन करनेवाले ये मन्त्र हैं - यह ज्ञानमार्ग दुर्विज्ञेय होने के कारण अणु - सूक्ष्म है तथा वितत यानी विस्तीर्ण है, अथवा जहाँ [ माध्यन्दिनी शाखाके अनुसार ' विततः ' के स्थान में ] ' वितरः ' ऐसा पाठान्तर है, वहाँ विस्पष्टतर-णका हेतु होनेके कारण ज्ञानमार्ग मोक्षका साधन है [ –ऐसा अर्थं समझना चाहिये ] । यह पुराण अर्थात् नित्य श्रुतिद्वारा प्रकाशित होने के कारण पुरातन है, तार्किकों-की बुद्धिसे उत्पन्न हुए कुदृष्टिरूप मार्गों के समान अर्वाचीन नहीं है । यह मेरे द्वारा स्पृष्ट है अर्थात् मुझे प्राप्त है । जो जिसके द्वारा प्राप्त किया जाता है, वह उसे स्पर्श - सा करता है - उससे संबद्ध होता है । इससे यह ब्रह्मविद्यारूप मोक्षमार्ग मुझे प्राप्त होनेके कारण ' मुझे स्पर्श किये हुए है ' ऐसा कहा जाता है ।
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१०७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय न केवलं मया लब्धः किं स्वनुवित्तो मयैवः अनुवेदन नाम विद्यायाः परिपाकापेक्षया फलावसानतानिष्ठाप्राप्तिः, भुजे-रिव तृप्त्यवसानता; पूर्वं तु ज्ञानप्राप्तिसंबन्धमात्रमेवेति विशेषः । किम् असावेव मन्त्रको ब्रह्मविद्या फलं प्राप्तः, नान्यः प्राप्तवान् येन ' अनुवित्तो मयैव ' इत्यवधारयति १ नैष दोषः, अस्याः फलम् आत्मसाक्षिकमनुत्तममिति ब्रह्म-विद्यायाः स्तुतिपरत्वात् एवं कृतार्थात्माभिमानकरम् आत्मप्रत्ययसाक्षिकमात्मज्ञानम्, किमतः परमन्यत् स्यात् — इति ब्रह्मविद्यां स्तौति । न तु पुनर-न्यो ब्रह्मवित् तत्फलं न प्राप्नो-तीति, “ तद् यो यो देवानाम् " ( बृ ० उ ० १ । ४ । १० ) इति सर्वार्थश्रुतेः । ४ मैंने इसे केवल प्राप्त ही किया है अपितु मैंने ही नहीं अनुवेदन भी किया है । विद्या इसका परिपाककी अपेक्षासे जो उसकी फलपर्यन्त स्थितिकी प्राप्ति है, उसे अनुवेदन कहते हैं, जैसे भोजनका पर्यवसान वृप्ति में होनेवाला है । छ ' मां स्पृष्ट: ' इस पूर्ववाक्य में तो वि केवल ज्ञानप्राप्तिका सम्बन्धमात्र ही बतलाया गया है— इतना स उससे इसका अन्तर है । शङ्का -- क्या अकेले इस मन्त्र- इ द्रष्टाने ही ब्रह्मविद्याका फल प्राप्त किया है, किसी दूसरेने प्राप्त नहीं किया, जिससे कि वह ' मेरेद्वारा ही अनुवित्त है ' ऐसा निश्चय करता है । समाधान -- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यह वाक्य ' इस विद्याका अनुत्तम फल आत्मसाक्षिक है ' इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी स्तुति करने बत वाला है । इस प्रकार आत्मज्ञान कि ' मैं कृतार्थं हूँ ' ऐसा आत्माभिमान प करनेवाला और स्वानुभवसिद्ध है, इससे बढ़कर और क्या हो सकता वि है? - इस प्रकार श्रुति ब्रह्मविद्या- त की स्तुति करती है । कोई अन्य ब्रह्मवेत्ता इस फलको प्राप्त नहीं के करता- ऐसी बात नहीं है; क्योंकि “ देवताओंमेंसे जिस - जिसने उसे पि जाना " ऐसी सबके कृतार्थत्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति है ।
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[ अध्याय४ केवल प्राप्त ही नहीं तु मैंने ही इसका किया है | विद्या अपेक्षासे जो उसकी व्यतिकी प्राप्ति है, उसे ते हैं, जैसे भोजनका प्ति में होनेवाला है । इस पूर्ववाक्य में तो नाप्तिका सम्बन्धमात्र गया है - इतना अन्तर है । या अकेले इस मन्त्र-विद्याका फल प्राप्त दूसरेने प्राप्त नहीं कि वह ' मेरेद्वारा है ' ऐसा निश्चय -- यह कोई दोष नहीं वाक्य ' इस विद्याका आत्मसाक्षिक है! इस द्याकी स्तुति करने-. स प्रकार आत्मज्ञान ऐसा आत्माभिमान र स्वानुभवसिद्ध है, और क्या हो सकता श्रुति ब्रह्मविद्या-ती है । कोई अन्य फलको प्राप्त नहीं बात नहीं है; क्योंकि जिस - जिसने उसे सबके कृतार्थत्वका रनेवाली श्रुति है । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ तदेवाह - तेन ब्रह्मविद्या-मार्गेण धीराः प्रज्ञावन्तः- -अन्येऽपि ब्रह्मविद इत्यर्थः, अपियन्ति अपिगच्छन्ति, ब्रह्म-विद्याफलं मोक्षं स्वगं लोकम् स्वर्गलोकशब्दस्त्रिविष्टपवाच्यपि सन्निह प्रकरणान्मोक्षाभिधायकः । इतः अस्माच्छरीरपातादूर्ध्व
जीवन्त एव विमुक्ताः ।
सन्तः ॥ ८ ॥
१०७३ 1000 यही बात श्रुति बतलाती है— उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे धीर-बुद्धिमान् अर्थात् दूसरे भी ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मविद्या के फल मोक्ष —स्वर्गलोक-को प्राप्त करते हैं । ' स्वर्गंलोक ' शब्द देवलोकका वाचक होनेपर भी यहाँ प्रकरणवश मोक्षका वाचक है । इतः - इस शरीरका पतन होनेके पश्चात् जीवित रहते हुए ही विमुक्त होकर [ शरीरसतानन्तर मोक्ष प्राप्त करते हैं ] ॥ ८ ॥
मोक्षमार्ग के विषय में मतभेद तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गल हरितं लोहितं च । एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित् पुण्यकृत्तैजसश्च ॥ ६ ॥
उस मार्ग के विषय में मतभेद है । कोई उसमें शुक्ल और कोई नीलवर्णं बतलाते हैं तथा कोई पिङ्गलवर्ण, कोई हरित और कोई लोहित कहते हैं । किंतु यह मार्ग साक्षात् ब्रह्मद्वारा अनुभूत है । उस मागंसे पुण्य करनेवाला परमात्मतेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता ही जाता है ॥ १ ॥।
तस्मिन् मोक्षसाधनमार्गे विप्रतिपत्तिर्मुमुक्षूणाम्; कथम्? तस्मिन् — - शुक्लं शुद्धं विमलमाहुः केचिन्मुमुक्षवः; नीलम् अन्ये, पिङ्गलम् अन्ये, हरितं लोहितं । वृ ० उ०६८– उस मोक्षसाधनरूप ज्ञानमागं-में मुमुक्षुओंका मतभेद है; किस प्रकार? कोई मुमुक्षु तो उसमें शुक्ल शुद्ध अर्थात् निर्मल ( उज्ज्वल वर्ण ) बतलाते हैं, दूसरे नील वर्णं कहते हैं तथा अपनी - अपनी दृष्टिके अनुसार अन्य मुमुक्षुगण उसमें पिङ्गल, हरित और लोहित
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१०७४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ४ च यथादर्शनम् । नाड्यस्तु एताः । सुषुम्नायाः श्लेष्मादिरससंपूर्णाः ' शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य ' ( ४ । ३ । २० ) इत्याद्युक्त-त्वात् । आदित्यं वा मोक्षमार्गम् एवं-विधं मन्यन्ते – = “ एष शुक्ल एष नील: " ( छा ० उ ० ८ । ६ । १ ) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । दर्शन -मार्गस्य च शुक्लादिवर्णासंभ-वात्, सर्वथापि तु प्रकृताद् ब्रह्म-विद्या मार्गादन्य एते शुक्लादयः । ननु शुक्लः शुद्धोऽद्वैतमार्गः । न, नीलपीतादिशब्दैर्वर्ण-वाचकैः सहानुद्रवणात्; यान् शुक्लादीन् योगिनो मोक्षपथान् आहुः ", न ते मोक्षमार्गाः; संसारविषया एव हि ते-" चक्षुष्टो वा सूनों वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यः " ( बृ ० उ ० ४ । ४ । २ ) इति शरीरदेशा-' निःसरणसंबन्धाद् ब्रह्मादिलोक-प्रापका हि ते । तस्मादयमेव मोक्ष मार्गः - य आत्मकामत्वेन आप्त-कामतया सर्वकामक्षये गमनानुप-वर्ण बतलाते हैं । किंतु ये श्लेष्मादि रससे परिपूर्ण सुषुम्नादि नाडियाँ हो हैं, क्योंकि उन्होंके विषयमें ' शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य ' इत्यादि. कहा गया है | अथवा वे आदित्यरूप मोक्ष-मार्गको ऐसा मानते हैं, जैसा कि " यह शुक्ल है, यह नील है ” इत्यादि अन्य श्रुतिमें कहा गया है । ज्ञान-मार्गके तो शुक्लादि वर्णं होने अस-म्भव हैं; सभी प्रकार प्रकृत ब्रह्म-विद्यारूप मार्गसे तो ये शुक्लादि भिन्न ही हैं । पूर्व ० – किंतु शुक्ल अर्थात् शुद्ध तो अद्वैतमार्ग हो सकता है! सिद्धान्ती — नहीं, क्योंकि इसका वर्णवाचक नीलपीतादि शब्दोंके साथ उच्चारण किया गया है । योगीलोग जिन शुक्लादि मोक्ष-मार्गोंके विषयमें कहते हैं, वे मोक्षमार्ग नहीं हैं; उनका विषय तो संसार ही है - " चक्षुसे, मूर्धा-से अथवा शरीर के किन्हीं अन्य भागोंसे " इस प्रकार शरीरके भागोंसे जीवके निकलनेका सम्बन्ध होनेके कारण वे तो ब्रह्मलोकादि-की प्राप्ति करानेवाले ही हैं । अतः जो आत्मकामत्वके द्वारा आप्तकाम हो जानेसे सम्पूर्ण कामनाओंका
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[ श्रध्याय ४ हैं । किंतु ये श्लेष्मादि सुषुम्नादि नाडियाँ क उन्होंके विषय में पिङ्गलस्य ' इत्यादि. आदित्यरूप मोक्ष-मानते हैं, जैसा कि यह नील है " इत्यादि कहा गया है | ज्ञान-बादि वर्ण होने अस-प्रकार प्रकृत ब्रह्म-से तो ये शुक्लादि ऋतु शुक्ल अर्थात् शुद्ध हो सकता है! - नहीं, क्योंकि इसका ल - पीतादि शब्दोंके ण किया गया है । जिन शुक्लादि मोक्ष-व्यमें कहते हैं, वे हीं हैं; उनका विषय है - " चक्षुसे, मूर्धा-के किन्हीं अन्य प्रकार शरीर के के निकलनेका सम्बन्ध वे तो ब्रह्मलोकादि-नेवाले ही हैं । अतः के द्वारा आप्तकाम सम्पूर्ण कामनाओंका ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७५ पत्तौ प्रदीपनिर्वाणवच्चक्षुरादीनां । कार्य करणानामत्रैव समवनयः-इति एष ज्ञानमार्गः पन्थाः, ब्रह्मणा परमात्मस्वरूपेणैव ब्राह्म-णेन त्यक्तसर्वेषणेन, अनुवित्तः । तेन ब्रह्मविद्यामार्गेण ब्रह्मविदन्यः अपि एति । कीदृशो ब्रह्मवित् तेन एति १ -इत्युच्यते — पूर्वं पुण्यकृद् भूत्वा पुनस्त्यक्त पुत्राद्येषणः, परमात्म-तेजस्यात्मानं संयोज्य तस्मिन्न-भिनिर्वृत्तस्तैजसश्च - श्रात्मभूत इहैव इत्यर्थः; ईदृशो ब्रह्मवित् तेन मार्गेण एति । न पुनः पुण्यादिसमुच्चयका-रिणो ग्रहणम्, विरोधादित्यवो-चाम " अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः । शान्ताः । संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ॥ " ( महा ० शा ० ४७ । ५५ ) इति च स्मृतेः; " त्यज धर्ममधर्म च " है क्षय हो जानेपर कहीं जाना सम्भव न होनेसे दीपक बुझ जाने के समान चक्षु आदि देह और इन्द्रियों-का यहीं लीन हो जाना है -- यही मोक्षमार्ग है । ' एष पन्थाः ' यह् ज्ञानमार्ग ब्रह्म के द्वारा अर्थात् जिसने समस्त एषणाएँ त्याग दी हैं, उस परमात्मस्वरूप ब्रह्मज्ञके द्वारा ही अनुवित्त है । उस ब्रह्मविद्यारूप मार्गसे अन्य ब्रह्मवेत्ता भी ब्रह्मको प्राप्त हो सकता है । उस मार्ग से किस प्रकारका ब्रह्मवेत्ता जाता है? सो बतलाया जाता है-- पहले पुण्य करनेवाला होकर फिर पुत्रादि एषणाओंसे मुक्त हो जो परमात्मतेजमें अपनेको जोड़कर उसीमें उपशान्त हो गया है अर्थात् इस शरीर में ही उस परमात्मतेजसे सम्पन्न आत्मभूत हो गया है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता उस मासे जाता है । यहाँ ' पुण्यकृत् ' शब्दसे पुण्यादि-समुच्चय करनेवालोंको ग्रहण नहीं किया गया; क्योंकि ज्ञान और कर्मका परस्पर विरोध है -- ऐसा हम कह चुके हैं । इस विषय में “ पाप और पुण्यकी निवृत्ति होनेपर जिसे पुनर्जन्मसे निर्भय एवं शान्त संन्यासी प्राप्त करते हैं, उस मोक्षा-त्माको नमस्कार है " ऐसी स्मृति भी तथा " धर्म और अधर्मका त्याग करो '
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१०७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४ इत्यादिपुण्यापुण्यत्यागो १ देशात्; “ निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कार-मस्तुतिम् | अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ " " नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च । शीलं स्थितिर्दण्ड निघानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥ " इत्यादिस्मृतिभ्यश्च । उपदेक्ष्यति च इहापि तु — " एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् " ( ४ । ४ । २३ ) इति कर्म-प्रयोजनाभावे हेतुमुक्त्वा, " तस्मादेवंत्रिच्छान्तो दान्तः " ( ४ । ४ । २३ ) इत्यादिना सर्वक्रियोपरमम् । तस्माद् यथा-व्याख्यातमेव पुण्यकृत्त्वम् । अथवा यो ब्रह्मवित् तेन एति, स पुण्यकृत् तैंजसश्च -इति ब्रह्मवित्स्तुतिरेषा; पुण्य-कृति तैजसे च योगिनि महाभाग्यं प्रसिद्ध लोके, इत्यादि प्रकारसे पुण्य पापके त्याग-का भी उपदेश दिया गया है । " जो सब प्रकारकी आशाओंसे रहित, | आरम्भ - शून्य, नमस्कार और स्तुति आदि न करनेवाला, निषिद्धाचरण-से रहित और क्षीणकर्मा है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं " तथा " ब्रह्मवेत्ताका ऐसा कोई धन नहीं है जैसे कि एकता, समता, सत्यता, शील, स्थिति, अहिंसा, सरलता और विभिन्न प्रकारकी क्रियाओंसे निवृत्त होना है " इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध होती है । यहाँ भी " यह ब्रह्मवेत्ता की नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न वटती ही है ' इस प्रकार कर्मके प्रयोजनके अभाव में हेतु बतलाकर " अत: इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त [ उपरत होकर ] " इत्यादि वाक्यसे सम्पूर्ण क्रियाओंसे उपरतिका उपदेश दिया जायगा । अतः यहाँ जिस प्रकार ऊपर व्याख्या की गयी है, वही ' पुण्यकृत् ' का स्वरूप है । अथवा जो ब्रह्मवेत्ता उस मार्ग से जाता है वह पुण्यकर्मा और तैजस है - इस प्रकार यह ब्रह्मवेत्ताकी स्तुति है । पुण्यकृत् और तेजस योगी में महाभाग्य रहता है- यह लोकमें प्रसिद्ध है; अत: लोकमें