बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 121–130

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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[ अध्याय १ दिव होनेसे जप-उपास्य हैं— ओंने क्रमशः देवताओंको निश्चय था कि नेपर वागादि शेषका अपने-7 आसक्ति के का संसर्ग हो निर्वाह करने-तः अशुद्ध और के कारण की ओर ले अप्रकाश्य हे जानेपर भी, नों प्रकार के त्वगादि अन्य के समान ही पासे वेध कहा गया है उसका यही द्वारा उन्हें यानी पापसे ना ॥३-६ ॥ ब्राह्मण ३ ] * शाङ्करभाष्यार्थ ११५ मुख्य प्रारणका उद्गान, उसका पापविद्ध न होना तथा उसकी उपासनाका फल वागादिदेवता उपासीना अपि वागादि देवताओंकी उपासना मृत्य्वतिगमनायाशरणाः सन्तो करनेपर भी मृत्युका अतिक्रमण करनेमें किसी को अपना सहायक देवाः क्रमेण- न पाकर देवताओंने क्रमशः— अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति । तथेति तेभ्य एष प्राण उद्गायत्ते विदुरनेन वै न उद्गात्रात्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाविव्यत्सन् । स यथाश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वंसेतैव हैव विध्वंसमाना विष्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन्परासुराः । भवत्या-त्मना परास्य द्विषन्भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७ ॥

फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, " तुम हमारे लिये उद्गान करो । ” तब ' बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा । किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये । तब देवगण प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ से । जो बद इस प्रकार जानता है वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे ससे द्वेष करनेवाले व्य ( सौतेले भाई ) का पराभव होता है ॥ ७ ॥

अथानन्तरं ह इममित्यभिनय- तदनन्तर, ' ह इमम् ' यह अभिनय ( अङ्गुलि आदिद्वारा प्रत्यक्ष संकेत ) प्रदर्शनार्थम् । सन्यमास्ये भव- प्रदर्शित करने के लिये है, उन्होंने आसन्य – आस्यमें रहनेवाले अर्थात् मासन्यं मुखान्तर्बिलस्थं प्राणम्- | मुखान्तर्गत छिद्रमें स्थित प्राणसे

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११६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ चुस्त्वं न उद्गायेति । तथेत्येवं । शरणमुपगतेभ्यः स एष प्राणो मुख्य उद्गायदित्यादि पूर्ववत् । पाप्मनाऽविव्यत्सन्वेधनं कर्तुमिष्ट -वन्तस्ते च दोषासंसर्गिणं सन्तं मुख्यं प्राणम् । स्वेन आसङ्ग-दोषेण वागादिषु लब्धप्रसरास्त दभ्यासानुवृच्या संस्रक्ष्यमाणा विनेशुर्विनष्टा विध्वस्ताः । कथमिव? इति दृष्टान्त उच्यते-स यथा स दृष्टान्तो यथा लोके -ऽश्मानं पाषाणमृत्वा गत्वा प्राप्य, लोष्टः पांसुपिण्डः पाषाणचूर्ण-नायाश्मनि निक्षिप्तः स्वयं विध्यं सेत विस्रंसेत विचूर्णीभवेत्, एवं ब्राह्मण कहा, “ तुम हमारे लिये उद्गान करो । ” तब ' तथास्तु ' कहकर यतः, अपनी शरण में आये हुए देवताओंके त्वप्रत लिये उस मुख्य प्राणने उद्गान किया — इत्यादि सब प्रसङ्ग पूर्ववत् सङ्गज समझना चाहिये । असुरोंने जो संस दोषके संसर्गसे रहित था उस मुख्य देवा व प्राणको पापसे विद्ध करना चाहा । अपने अभिनिवेशरूप दोषके कारण किर वागादिमें उनकी गति हो गयी थी । अग्न्य किंतु उसी अभ्यासकी अनुवृत्तिसे मध्यम मुख्य प्राणके साथ संसर्ग करनेको उद्यत होनेपर वे नाशको प्राप्त हो भाविक गये अर्थात् विध्वस्त हो गये । विज्ञान किस प्रकार विध्वस्त हो गये? इस विषयमें दृष्टान्त दिया जाता सन् है । ' स यथा ' - जैसा कि वह दुज्झि दृष्टान्त है— लोकमें पाषाणको चूर्णं शास्त्रस करनेके लिये फेंका हुआ लोष्ट-मिट्टीका ढेला उस अश्मा यानी भिमान पत्थरपर जाकर - पहुँचकर अर्थात् प्रतिप पत्थरको प्राप्त होकर स्वयं विध्वस्त-छिन्न भिन्न यानी चूर्णं हो जाता है न्नित्य हैव यथायं दृष्टान्त एवमेव, विध्वं- उसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त इत्प समाना विशेषेण है वैसे ही वे असुरगण विध्वस्त १ ध्वंसमाना होकर - विशेषरूपसे ध्वस्त होकर ' ततो द विष्वञ्चो नानागतयो विनेशुर्विनष्टा विष्वक् यानी नाना गतियोंको प्राप्त ' अभवन

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[ अध्याय १ लिये उद्गान स्तु ' कहकर हुए देवताओंके गणने उद्गान प्रसङ्ग पूर्ववत् असुरोंने जो था उस मुख्य करना चाहा । दोषके कारण हो गयी थी । की अनुवृत्तिसे सर्ग करनेको प्राप्त हो हो गये । वस्त हो गये? दिया जाता सा कि वह पाषाणको चूर्णं हुआ लोष्ट-अश्मा यानी हुँचकर अर्थात् स्वयं विध्वस्त-हो जाता है कं यह गण विध्वस्त ध्वस्त होकर गतियों को प्राप्त ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ यतः, ततस्तस्मादासुरविनाशाद्देव -त्वप्रतिबन्धभूतेभ्यः स्वाभाविका -सङ्गजनितपाप्मभ्यो वियोगाद् असंसगंधर्मिमुख्यप्राणाश्रयबलाद् देवा वागादयः प्रकृता अभवन् । किमभवन १ स्वं देवतारूप-मग्न्याद्यात्मकं वक्ष्यमाणम् । पूर्व-मध्यग्न्याद्यात्मन एव सन्तः स्वा-भाविकेन पाप्मना तिरस्कृत-विज्ञानाः पिण्डमात्राभिमाना -सन् । ते तत्पाप्मवियोगा-दुज्झित्वा पिण्डमात्राभिमानं शास्त्रसमर्पितवागाद्यग्न्याद्यात्मा-मिमाना बभ्रुवुरित्यर्थः ॥ किश्च ते प्रतिपक्षभूता असुराः पराभव -नित्यनुवर्तते । पराभूता विनष्टा इत्यर्थः । होते हुए विनष्ट हो गये । क्योंकि ऐसा हुआ इसलिये असुरभावका विनाश हो जानेसे देवत्वके प्रति-भूत स्वाभाविक अभि अभिनिवेश-जनित पापसे वियोग हो जानेके कारण असंसर्गधर्मी मुख्य प्राणके आश्रयके प्रभावसे वागादि देवगण प्रकृतिस्थ हो गये । वे क्या हो गये? [ सो बतलाया जाता है— ] वे आगे बतलाये जाने-वाले अपने अग्न्यादिरूप देवभावको प्राप्त हो गये । पहले भी वे अग्न्यादि-स्वरूप ही थे । अपने स्वभावजनित पापसे विज्ञानशक्तिके तिरस्कृत हो जानेसे वे पिण्डमात्रके अभिमानसे युक्त हो गये थे । उस पापका वियोग हो जानेसे वे पिण्डमात्रके अभिमान-को त्यागकर शास्त्रसमर्पित वागादि अग्न्यादिरूपताके अभिमानसे युक्त हो गये । तथा उनके प्रतिपक्षी वे असुरगण पराभूत हो गये — इस प्रकार ' पराभवन् ' ' यहाँ ‘ अभवन् ’ क्रियाकी अनुवृत्ति होती है । वे पराभूत यानी विनष्ट हो गये । १. मूलमें ' ततो देवा अभवन् परा असुरा: ' ऐसा पाठ है । इसमें एक वाक्य ' ततो देवा अभवन् ' है और दूसरा ' असुरा परा अभवन् ( पराभवन् ) ' है । इसमें ' अभवन् ' क्रियाकी अनुवृत्ति हुई है ।

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११८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ यथा पुराकल्पेन वर्णितः पूर्व-यजमानोऽतिक्रान्तकालिकः एता-मेवाख्यायिकारूपां श्रुतिं दृष्ट्वा तेनैव क्रमेण वागादिदेवताः परी-क्ष्य, ताश्रापोह्यासङ्गपाप्मास्पद -दोषवत्वेनादोषास्पदं मुख्यं प्राण-मात्मत्वेनोपगम्य वागाद्याध्या-त्मिकपिण्डमात्र परिच्छिन्नात्माभि-मानं हित्वा वैराजपिण्डाभिमानं वागाद्यग्न्याद्यात्मविषयं वर्तमान-प्रजापतित्वं शास्त्रप्रकाशितं प्रति-पनः, तथैवायं यजमानस्तेनैव विधिना भवति प्रजापतिस्वरूपे णात्मना । परा चास्य प्रजापति-त्वप्रतिपक्षभूतः पाप्मा द्विषन्भ्रातृ-व्यो भवति । यतोऽद्वेष्टापि भवति कश्चिद् भ्रातृव्यो भरतादितुल्यः, यस्त्विन्द्रिय विषयासङ्गजनितः पा-प्मा भ्रातृव्यो द्वेष्टा च पारमा-थिंकात्मस्वरूपतिरस्करणहेतुत्वात् स च पराभवति विशीर्यते लोष्ट-! ब्राह्मण जिस प्रकार पूर्वोक्त कल्पनाके अनुसार वर्णित पूर्व यानी भूत- वत्प्राप कालिक यजमान इस आख्यायिका-लम् रूपा श्रुतिको देखकर उसी क्रमसे वागादि देवताओंकी परीक्षा कर यथोत्त उन्हें अभिनिवेशजनित पापके पूर्वराज संसर्गरूप दोषके कारण त्यागकर जो दोषका आश्रय नहीं है उस मुख्य प्राणको ही आत्मभावसे प्राप्त हो आध्यात्मिक पिण्डमात्रसे परिच्छिन्न फल वागादिमें आत्मत्वका अभिमान छोड़कर वागादिकी अग्न्यादि- रूपमेव रूपताविषयक शास्त्रप्रकाशित विराट्- वगार्द पिण्डाभिमान यानी वर्तमान - प्रजा-पतित्वको प्राप्त हुआ था, उसी आत्म प्रकार यह वर्तमान यजमान भी उसी क्रमसे प्रजापतिरूपसे स्थित तदुपप होता है । तथा इसके प्रजापतित्वका प्रतिपक्षभूत पापरूपी द्व ेष करनेवाला रण भ्रातृव्य ( सौतेला भाई ) पराभवको प्राप्त होता है । भरतादिके समान किया कोई - कोई भ्रातृव्य द्वेष न करने-वाला भी होता है किंतु जो इन्द्रियोंके विषयोंकी आसक्तिसे उन्ती होनेवाला पापरूपी भ्रातृव्य है वह वे द्वेष्टा ही होता है; कारण, वह है, वह आत्माके पारमार्थिक स्वरूपके आस्य अङ्गों का तिरस्कारका हेतु होता हैं । प्राणका सङ्ग होनेपर मृत्पिण्डके समान

पृष्ठ 125

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अध्याय १ क कल्पनाके यानी भूत-आख्यायिका-उसी क्रमसे परीक्षा कर नित पापके -ण त्यागकर है उस मुख्य प्राप्त हो से परिच्छिन्न - अभिमान - अग्न्यादि-काशित विराट-वर्तमान- प्रजा-- था, उसी यजमान भी स्थ जापतित्वका ष करनेवाला E ) पराभवको दिके समान षन करने-कं आसक्ति है वह कारण, वह क स्वरूपके हैं । प्राणका सम ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११६ वत्प्राणपरिष्वङ्गात् । कस्य तत्फ- । पराभूत - नष्ट हो जाता है । यह फल किसको मिलता है? इसपर लम्? इत्याह — य एवं वेद | | श्रुति कहती कहती है- ' जो ऐसा जानता यथोक्तं प्राणमात्मत्वेन प्रतिपद्यते है; अर्थात् पूर्वयजमानके समान जो उपर्युक्त प्राणको आत्मस्वरूपसे

पूर्वयजमानवदित्यर्थः ॥ ७ ॥ । 1 जानता है ' ॥ ७ ॥

मुख्य प्रारणका अङ्गिरसत्व फलमुपसंहृत्याधुनाख्यायिका । रूपमेवाश्रित्याह — कस्माच्च हेतो-र्वागादीन्मुक्त्वा मुख्य एव प्रारण आत्मत्वेनाश्रयितव्यः १ इति । तदुपपत्तिनिरूपणाय यस्मादयं वागादीनां पिण्डादीनां च साधा । रण आत्मा, इत्येतमर्थमाख्या- । किया दर्शयन्त्याह श्रुतिः — फलका उपसंहार कर ' अब श्रुति आख्यायिकाके ही रूपका आश्रय करके कहती है –वागादि अन्य सब प्राणोंको छोड़कर मुख्य प्राणका ही आत्मभावसे क्यों आश्रय लेना चाहिये? उसकी उपपत्ति बतलानेके लिये, अर्थात् क्योंकि यह मुख्यप्राण वागादि और पिण्डादिका साधारण आत्मा है [ इसलिये यही आत्मभावसे आश्रयितव्य है ] – इंस अर्थको आख्यायिकासे दिखलाते हुए श्रुति कहती है— ते होचुः क्व नु सोऽभूद्येो न इत्थमसक्तेत्ययमास्ये-ऽन्तरिति सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानां हि रसः ॥८ ॥

वे बोले, " जिसने हमें इस प्रकार असक्त - देवभावको प्राप्त किया है, वह कहाँ है? " [ उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि ] " यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका रस है ” ॥ ८ ॥

१. अर्थात् फलयुक्त प्रधान विधिका वर्णन कर ।

पृष्ठ 126

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१२० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ते प्रजापतिप्राणा मुख्येन प्राणेन परिप्रापितदेवस्वरूपा होचुरुक्तवन्तः फलावस्थाः 1 किम्? इत्याह - क्व न्विति त्रितर्के ॥ । क्व नु कस्मिन्नु सोऽभूत् । कः? यो नोऽस्मानित्थमेवमसक्त सज्जितवान्देवभावमात्मत्वेनोप-गमितवान् । स्मरन्ति हि लोके केनचिदुपकृता उनकारिणम् ॥ लोकवदेव स्मरन्तो विचा-रयमाणाः कार्यकरणसंघाते -त्मन्येवोपलब्धवन्तः । कथम् १ यमास्येऽन्तरिति, आस्ये मुखे य आकाशस्तस्मिन्नन्तरयं प्रत्यक्षो वर्तत इति । सर्वो हि लोको विचार्याध्यवस्यति, तथा देवाः । यस्मादयमन्तराकाशे वागा-द्यात्मत्वेन विशेषमनाश्रित्य वर्त-मान उपलब्धो देवैः, तस्मात्स प्राणोऽयास्यो विशेषानाश्रयाच्च ब्राह्मण मुख्य प्राणके द्वारा देवस्वरूपको प्राप्त कराये हुए वे प्रजापतिके असत्त फलावस्थित प्राण कहने लगे । क्या अत कहने लगे? सो बतलाते हैं - – “ कनु ' यह वितर्क अर्थ में है । अर्थात्, करण भला वह कहाँ - किसमें रहता कथ है? कौन? जिसने हमें इस प्रकार दङ्गा असक्त — - सञ्जित किया अर्थात् आत्मभावसे देवत्वको प्राप्त कराया सार है । ” लोकमें किसीके द्वारा उपकृत रसत्व होनेवाले लोग उस उपकारीका स्मरण किया ही करते हैं । चक्ष्या इस प्रकार लोकवत् स्मरण- द्विशेष विचार करते हुए उन्होंने उसे भूत और इन्द्रियोंके संघातरूप अपने नां स शरीरमें ही उपलब्ध किया । किस प्रकार उपलब्ध किया? - तस्मा यह आस्यके भीतर है — आस्य त्मत्वे अर्थात् मुखमें जो आकाश है उसीमें यह प्रत्यक्ष विद्यमान है । सभी लोग आत्म विचारकर निश्चय करते हैं । उसी परीत प्रकार देवोंने भी किया । चानि क्योंकि देवताओंने इसे वागादि रूपसे किसी विशेषका आश्रय न करके अन्तराकाशमें ही उपलब्ध किया था इसलिये वह प्राण अथास्य है, तथा किसी विशेष इन्द्रियका रसिद्ध | आश्रय न करनेके कारण उसने

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[ अध्याय १ देवस्वरूपको प्रजापति लगे । क्या हैं- " कनु ' है । अर्थात्, कसमें रहता इस प्रकार अर्थात् - प्राप्त कराया द्वारा उपकृत - उपकारीका हैं । वत् स्मरण-होंने उसे भूत तरूप अपने ध किया । किया? -र है - आस्य काश है उसीमें है । सभी लोग रते हैं । उसी TT 1 इसे वागादि का आश्रय न ही उपलब्ध इ प्राण अथास्य ष इन्द्रियका कारण उसने ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ असक्त सञ्जितवान्वागादीन् । । अत एवाङ्गिरस आत्मा कार्य-करणानाम् । कथमाङ्गिरसः? प्रसिद्धं ह्येत-दङ्गानां कार्यकरणलक्षणानां रसः सार श्रात्मेत्यर्थः । कथं पुनरङ्ग-रसत्वम् १ तदपाये शोषप्राप्तेरिति चक्ष्यामः । यस्माच्चायमङ्गरसत्वा-द्विशेषानाश्रितत्वाच्च कार्यकरणा-नां साधारण आत्मा विशुद्धव, तस्माद्वागादीनपास्य प्राण एवा -त्मत्वेनाश्रयितव्य इति वाक्यार्थः । श्रात्मा ह्यात्मत्वेनोपगन्तव्योऽवि -परीतबोधाच्छ्रेयः प्राप्तेः, विपर्यये चानिष्टप्राप्तिदर्शनात् ॥ ८ ॥

वागादि इन्द्रियोंको असक्त - अग्न्यादि देवभावसे संयुक्त किया । इसीसे वह भूत और इन्द्रियोंका आि आत्मा है । वह आङ्गिरस क्यों है? क्योंकि यह कार्य करणरूप अङ्गोंका रस-सार अर्थात् आत्मा है - ऐसा प्रसिद्ध है । किंतु इसका अङ्गरसत्व क्यों है? क्योंकि इसके चले जानेपर शरीर सूख जाता है - ऐसा हम आगे कहेंगे । इस प्रकार क्योंकि यह अङ्गरस होनेसे और किसी विशेषके आश्रित न होनेके कारण भूत और इन्द्रियों का साधारण आत्मा है और विशुद्ध भी है, इसलिये बाग़ादिको छोड़कर प्राणहीका आत्मभावसे आश्रय लेना चाहिये — यह इस वाक्यका तात्पर्य है । आत्माको ही आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये, क्योंकि अविपरीत बोधसे ही श्रेय-की प्राप्ति होती है, विपरीत ज्ञानसे तो अनिष्टकी ही प्राप्ति देखी गयी है ॥ ८ ॥

प्रारणकी शुद्धताका प्रतिपादन स्यान्मतं प्राणस्य विशुद्धि- पूर्व ० - हमारा विचार है कि रसिद्धेति । प्राणकी विशुद्धि सिद्ध नहीं होती ।

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१२२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ननु परिहृतमेतद्वागादीनां कल्याणवदनाद्यासङ्गवत्प्राणस्य आसङ्गास्पदत्वाभावेन । बाढम्, किं त्वाङ्गिरसत्वेन वागादीनामात्मत्वोक्त्या वागादि-द्वारेण शवस्पृष्टितत्स्पृष्टेरिवा-शुद्धता शङ्कयते - इत्याह- शुद्ध एव प्राणः । कुत:? सिद्धान्ती किंतु वागादिके शुभभाषणादिविषयक अभिनिवेश के समान प्राणमें किसी प्रकारकी अभिनिवेशास्पदता नहीं है - ऐसा बतलाकर हम इस शङ्काका परि-हार कर चुके हैं । पूर्व०- पूर्व०- ठीक ठीक है है,, किंतु जिस प्रकार शवका स्पर्श होनेसे उसे स्पर्श करनेवालेकी अशुद्धता मानी जाती है उसी प्रकार आङ्गिरस होनेसे वागादिका आत्मा बतलाया जानेसे वागादिके द्वारा उसकी भी अशुद्धताकी शङ्का होती है; इसपर श्रुति कहती है- प्राण शुद्ध ही है । क्यों शुद्ध है? -सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरं ह्यस्या मृत्युदूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥

वह यह देवता ‘ दूर् ' नामवाली है, क्योंकि इससे मृत्यु दूर है । जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ॥ ६ ॥

सा वा एषा देवता दूर्नाम ॥। यं प्राणं प्राप्याश्मानमिव लोष्ट-वद्विध्वस्ता असुरास्तं परामृशति सेति 1 । सैवैषा येयं वर्तमानयज-मानशरीरस्था देवैर्निर्धारता " अय-मास्येऽन्तः " इति । देवतां च सा व वह यह देवता ' दूर् ' नामवाली है । जिस प्राणको प्राप्त होकर पत्थरको प्राप्त हुए मृत्पिण्डके समान असुरगण नष्ट हो गये थे उसीका श्रुति ' सा ( वह ) ' ऐसा कहकर परामर्श करती है । वह यही है जिसे कि देवोंने " यह आस्यके भीतर है " इस प्रकार वर्तमान यजमान के शरीरमें स्थित निश्चय किया है । ब्राह्मण स्यात् भावेन यस्त ख्यात यः । त दूर्नाम इत्याह प्राणदे पाप्मा णस्य मृत्योर एवं प्र विद वा अ विदः प्रकृतं मुपास्त उप यथा १ प्रकार

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[ अध्याय १ वागादिके अभिनिवेश के • प्रकार की M हों है - ऐसा काका परि किंतु जिस होनेसे उसे शुद्धता मानी आ मा बतलाया - उसकी भी होती है; - है- प्राण है? — ह दूर ' नामवाली बाप्त होकर use समा थे उसीका सा कहकर वह यही है के भीतर यजमान के किया है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३. स्यात्, उपासनक्रियायाः कर्म- । भावेन गुणभूतत्वात् । यस्मात्सा दूर्नाम दुरित्येवं ख्याता । नामशब्दः ख्यापनपर्या-यः । तस्मात्प्रसिद्धास्या विशुद्धि-दूर्नामत्वात् । कुतः पुनर्नामत्वम्? इत्याह- दूरं दूरेः हि यस्मादस्याः प्राणदेवताया मृत्युरासङ्गलक्षणः पाप्मा । असंश्लेषधर्मित्वात्प्रा-णस्य समीपस्थस्यापि दूरता मृत्योस्तस्माद् दूरित्येवं ख्यातिः, एवं प्राणस्य विशुद्धिर्ज्ञापिता । विदुषः फलमुच्यते — दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति । अस्मादेवं-विदः, य एवं वेद तस्मादेवमिति प्रकृतं विशुद्विगुणोपेतं प्राण-मुपास्त इत्यर्थः । उपासनं नाम उपास्यार्थवादे यथा देवतादिस्वरूपं श्रुत्या ज्ञाप्यते उपासनाक्रियाके कर्मभावसे गुणभूत होनेके कारण वह देवता भी है । ' क्योंकि यह प्राण देवता ' दूर् ’ नामवाली है अर्थात् ' दूर् ’ इस प्रकार विख्यात है – यहाँ ' नाम ' शब्द ' ख्याति ' का पर्याय है— अतः ' दूर ' नामवाली होनेसे इसकी विशुद्धि भी प्रसिद्ध है । इसका ' दूर् ' नाम क्यों है? इसपर श्रुति कहती है-क्योंकि इस प्राणदेवतासे मृत्यु यानी, आसक्तिरूप पाप दूर है । प्राण असंसर्गधर्मी है, इसलिये समीपस्थ होनेपर भी इससे मृत्युकी दूरता है अतः ' दूर् ' इस प्रकार ही इसकी प्रसिद्धि है; इस तरह प्राणकी विशुद्धि बतलायी गयी । अब इसके विद्वान् ( उपासक ) का फल बतलाया जाता है - इससे मृत्यु दूर रहता है । इससे अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेसे यानी जो इस प्रकार जानता है उससे । इस प्रकार अर्थात् जो विशुद्धिगुणविशिष्ट प्राणकी उपासना करता है । उपास्य - सम्बन्धी अर्थंवादमें श्रुतिके द्वारा देवतादिका जैसा १. क्योंकि जिस प्रकार यज्ञमें कारकरूपसे देवगण गुणभूत होते हैं, उसी प्रकार प्राण भी द्रव्यादिसे पृथक् विहित क्रियामें गुणभूत होनेके कारण देवता है ।

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१२४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तथा मनसोपगम्य आसनं । चिन्तनं लौकिकप्रत्ययाव्यवधानेन यावत्तद्देवतादिस्वरूपात्माभिमाना-भिव्यक्तिरिति लौकिकात्माभि-मानवत् । " देवो भूत्वा देवान-प्येति " ( बृ ० उ ० ४ । १ । २ ) “ किन्देवतोऽस्यां प्राच्यां । दिश्यसि ” ( बृ ० उ ० ३।९ ।२० ) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः ॥ ९ ॥

TIPIR ब्राह्मण स्वरूप ज्ञात कराया जाय वैसे ही स्वरूपको मनके द्वारा उपलब्ध हेतुत्व करके उसके उप ( समीप ) आसन त्मा करना - बैठना अर्थात् लौकिक प्रत्ययोंका व्यवधान न आने देकर पाप्म जबतक लौकिक आत्माभिमानके व । समान उस देवतादिके स्वरूपमें आत्मत्वका अभिमान उत्पन्न न हो तबतक उसीका चिन्तन करना मप उपासना है; जैसा कि " देवता होकर देवताओंमें लीन होता है " पाप्य " इस पूर्व दिशामें तू किस देवता - प्मा वाला ( किस देवताकी उपासना करनेवाला ) है " इत्यादि श्रुतियोंसे हटाक सिद्ध होता है ॥ ६ ॥ पापक

मृत्युस प्राणोपासकसे मृत्यु दूर रहता है - इसकी उपपत्ति अन्त सावा एषा देवता दूरं हवा अस्मान्मृत्युर्भवतीत्युक्तम् । कथं पुनरेवंविदो दूरं मृत्युर्भवति १ इत्युच्यते - — एवं विश्वविरोधात् । इन्द्रिय विषयसंसर्गासङ्गजो हि पाप्मा प्राणात्माभिमानिनो हि विरुध्यते, वागादिविशेषात्मा-• भिमान हेतुत्वात् स्वाभाविकाज्ञान-सा " वह यह देवता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ' ऐसा ऊपर कहा गया । एतार किंतु इस प्रकार जाननेवालेसे मृत्यु पाप्म दूर क्यों रहता है? सो बतलाया जाता है- क्योंकि इस प्रकार जानने से प्रयुक्त मृत्युका विरोध है । इन्द्रियजनित T विषयोंके संसर्गंसे होनेवाली आसक्ति हातो ही पाप ( मृत्यु ) है, उसका प्राणा-त्माभिमानीसे विरोध है; क्योंकि रूपा वह वागादि परिच्छिन्नात्माभिमान- हत्य का हेतु है और स्वाभाविक अज्ञान से