बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 131–140
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140
पृष्ठ 131
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ जाय वैसे ही रा उपलब्ध मीप आसन त् लौकिक न आने देकर माभिमानके के स्वरूपमें उत्पन्न न हो वन्तन करना कि " देवता न होता है " किस देवता-की उपासना दिश्रुतियों पत्ति E, उससे मृत्यु र कहा गया । नेवासे मृत्यु तलाया जाता र जानने से इन्द्रियजनित बाली आसक्ति उसका प्राणा-है; क्योंकि आत्माभिमान-विक अज्ञानसे ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १२५ हेतुत्वाच्च । शास्त्रजनितो हि प्राणा- | उत्पन्न होता है । तथा प्राणात्मा-भिमान शास्त्रजनित है । अतः त्माभिमानः । तस्मादेवंविदः विरोध होने के कारण इस प्रकार पाप्मा दूरं भवतीति युक्तं विरोधा- | जाननेवालेसे पाप दूर रहता है— यह ठीक ही है । इसी अर्थको श्रुति त् । तदेतत्प्रदर्शयति-— प्रदर्शित करती है— सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्यु-मपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात्तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पा-मानं मृत्युमन्त्रवायानीति ॥ १० ॥
उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको हटाकर जहाँ इन दिशाओंका अन्त है वहाँ पहुँचा दिया । इनके पापको उसने तिरस्कारपूर्वक स्थापित कर दिया अत: ' मैं पापरूप मृत्युसे संश्लिष्ट न हो जाऊँ ' इस भयसे अन्त्यजनके पास न जाय और अन्त दिशा में भी न जाय ॥ १० ॥
सा वा एषा देवतेत्युक्तार्थम् । एतासां वागादीनां देवतानां पाप्मानं मृत्युं स्वाभाविकाज्ञान-प्रयुक्तेन्द्रियविषय संसर्गासङ्गज नि. तेन हि पाप्मना सर्वो म्रियते, स तो मृत्युः, तं प्राणात्माभिमान-रूपाभ्यो देवताभ्यो s पच्छिद्याप-हत्य, प्राणात्माभिमानमात्रतयैव ' सा वा एषा देवता ' इस वाक्य-का अर्थ कहा जा चुका है । उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको स्वाभाविक अज्ञान-प्रेरित इन्द्रियविषयोंके संसर्गजनित अभिनिवेशसे होनेवाले पापसे हो सब जीव मरते हैं, इसलिये वही मृत्यु है । उसे प्राणात्माभिमानरूप देवताओंसे अपहत्य — अलग कर । [ अन्य देवताओंका ] प्राणस्वरूप-मात्रमें ही अभिमान होनेके कारण | यहाँ मुख्य प्राणको अपहन्ता कहा
पृष्ठ 132
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ प्राणोऽपहन्तेत्युच्यते । विरोधादेव । तु पाप्मैवंविदो दूरं गतो भवति । किं पुनश्वकार देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य? इत्युच्यते — - यत्र यस्मिन्नासां प्राच्यादीनां दिशा-मन्तोऽवसानं तत्तत्र गमयाञ्चकार गमनं कृतवानित्येतत् । ननु नास्ति दिशामन्तः कथ-मन्तं गमितवान् १ इत्युच्यते— श्रौत विज्ञानवज्ञ्जनावधिनिमित्त-कन्पितत्वाद्दिशां तद्विरोधिजना-ध्युषित एव देशो दिशामन्तः, देशान्तो ऽरण्यमिति यद्वदित्य -दोषः । तत्तत्र गमयित्वा श्रासां देव-तानाम्, पाप्मन इति द्वितीया-बहुवचनम्, विन्यदधाद्विविधं न्यग्भावेनादधात्स्थापितवती प्राण-देवता । प्राणात्माभिमानशून्येषु ब्राह्म गया है, उससे विरोध कारण ही इस प्रकार जाननेवालेका अन्त पाप दूर चला जाता है । देवताओंके इन्द्रि पापरूप मृत्युको उनसे अलग फिर प्राणदेवताने क्या किया, सो प्राण्य बतलाया जाता है - जहाँ यानी त जिस स्थानपर इन पूर्वादि दिशाओं-का अन्त - अवसान है वहाँ उसे पहुँचा गच्छ दिया अर्थात् वहाँ उसका गमन सृजेत करा । किंतु दिशाओंका तो अन्त ही संस नहीं है, फिर उसे दिशान्तमें कैसे सः । पहुँचा दिया? इसपर हमारा कथन न्तश यह है कि दिशाओंकी कल्पना श्रौत- जनम विज्ञानवान् पुरुषोंकी सीमापर्यन्त प्रायः ही की गयी है, अतः उनसे विरुद्ध ने आचरणवाले लोगोंसे बसा हुआ देश ही दिशाओंका अन्त है; जैसे कि इत्थं देशका अन्त अरण्य होता है उसी मन्वव प्रकार ऐसा माननेमें भी दोष नहीं है । नीत्य न ज इन देवताओंके पापोंको वहाँ पहुँचाकर प्राणदेवताने उसे विविध सम्बन प्रकार से निम्नभावसे ( तिरस्कार-प्रार पूर्वक ) निहित - स्थापित कर दिया । ‘ पाप्मनः ' पद द्वितीयाबहुवचनान्त है । प्रसङ्गके सामर्थ्यंसे ज्ञात होता मप है कि उसे प्राणात्माभिमानशून्य
पृष्ठ 133
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय १ हो जाननेवालेका है । देवताओंके अलग कर नाकिया, सो - जहाँ यानी नदि दिशाओं-हाँ उसे पहुँचा उसका गमन तो अन्त ही दिशान्त में कैसे हमारा कथन कल्पना श्रौत-- सीमापर्यन्त उनसे विरुद्ध बसा हुआ देश है; जैसे कि होता है उसी में भी दोष नापको वहाँ उसे विविध ( तिरस्कार-न्त कर दिया । बहुवचनान्त ज्ञात होता भिमानशून्य ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ अन्त्यजनेष्विति सामर्थ्यात् । । इन्द्रिय संसर्गजो हि हि स स इति इति प्राण्याश्रयतावगम्यते । तस्मात्तमन्त्यं जनं नेयान गच्छेत्सम्भाषणदर्शनादिभिर्न सं-सृजेत् । तत्संसर्गे पाप्मना । संसर्गः कृतः स्यात्पाप्माश्रयो हि सः । तज्जननिवासं चान्तं दिग-न्तशब्दवाच्यं नेयाञ्जनशून्यमपि, जनमपि तद्देशवियुक्तमित्यभि-प्रायः । नेदिति परिभयार्थी निपातः । इत्थं जनसंसर्गे पाप्मानं मृत्यु-मन्ववायानीति । अनु अव अया नीत्यनुगच्छेयमिति, एवं भीतो न जनमन्तं चेयादिति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ १० ॥
अन्त्यजनोंमें स्थापित कर दिया । वह पाप इन्द्रियसंसर्गसे ही होनेवाला है, इसलिये उसका प्राणियोंके आश्रित रहना ज्ञात होता है । अतः उन अन्त्यजनोंके पास न जाय, अर्थात् सम्भाषण और दर्श-नादिसे भी उनका संसर्ग न करे ॥ ' उनका संसर्ग करनेपर पापसे भी संसर्ग होगा, क्योंकि वह पापका आश्रय है । उन लोगोंके निवास-स्थान अन्त यानी दिगन्तशब्दवाच्य देशमें उसके जनशून्य होनेपर भी, न जाय; तथा उस देशसे अलग my हुए अन्त्य जनके पास भी न जाय-ऐसा इसका अभिप्राय है । ' नेत् ' यह ' परिभय ( सवतः भय ) के अर्थ में निपात है । इस प्रकार इन अन्त्य जनोंके संसर्गमें जानेसे मैं पापरूप मृत्युको ' अन्ववा-यानि ' - ' अनु अव अयानि ' अर्थात् अनुगत होऊँगा, इस प्रकार डरता हुआ उन अन्त्यजन और अन्त देशों-में न जाय - इस प्रकार इसका पूर्वक्रियापद ' इयात् ' से सम्बन्ध है ॥ १० ॥
प्रारणद्वारा वागादिका अग्न्यादि देवभावको प्राप्त कराया जाना सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्यु-मपहत्याथैना मृत्युमत्यवहत् ॥ ॥ ११ ॥
पृष्ठ 134
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१२८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्मण उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्मभावको प्राप्त ] कर दिया ॥ ११ ॥ तरकरण
सावा एषा देवता, तदेतत्प्रा-णात्मज्ञानकर्मफलं वागादीना-मग्न्याद्यात्मत्त्रमुच्यते । अथैना मृत्युमत्यवहृत् यस्मादाध्यास्मि कपरिच्छेदकरः पाप्मा मृत्युः श्रारणात्मविज्ञानेनापहतस्तस्मात्स प्राणोऽपहन्ता पाप्मनो मृत्योः । तस्मात्स एवं प्राण एना वागादि-देवताः प्रकृतं पाप्मानं मृत्युमतीत्य श्रवहत्प्रापयत्स्वं स्वमपरिच्छिन्न-मग्न्यादिदेवतात्मरूपम् ॥ ११ ॥
‘ सा वा एषा देवता ' इस श्रृतिसे प्राधान्य प्राणात्मज्ञानरूप कर्मके फलस्वरूपसे त्यवहन वागादिकी अग्न्यादिरूपताका वर्णन किया जाता है । इसके अनन्तर तस्य प्राणदेवताने उनको मृत्युके पार किं रूप कर दिया । क्योंकि आध्यात्मिक यस्मिन परिच्छेदकर्ता पापरूप मृत्यु प्राणा-त्मज्ञानद्वारा नष्ट हो गया इसलिये अत्यमु प्राण पापरूप मृत्युका नाश करने- ता स्वय वाला है । अतः उस प्राणने ही इन साव वागादि देवताओंको, इनके प्रकृत मृत्युवि पापरूप मृत्युको पारकर, इनके अपरिच्छिन्न अग्न्यादि देवतात्म- एतावां स्वरूपको प्राप्त करा दिया || ११ | सोड मृत्युं सवै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्य-मोक्षान मुच्यत सोऽग्निरभवत्सोऽयमग्निः परेण मृत्युमति-कहि वागात्य क्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥
मानास उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया । वह वाक् समय मृत्युसे पार हुई यह अग्नि हो गयी । वह यह ५ दीप्यत अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है ॥ १२ ॥
सवै वाचमेव प्रथमामत्यव - | ' स वै वाचमेव वाचमेव प्रथमामत्यवहत्'- प्रथ हत् । स प्राणो वाचमेव प्रथम उस प्रसिद्ध प्राणने प्रथमा यानी वायुर प्रधाना वाक्का [ मृत्युसे ] अति-प्रधानामित्येतत् । उद्गीथकमणी- | वहन किया । उद्गीथकर्ममें अन्य वृ
पृष्ठ 135
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय१ दूरकर फिर
दिया ॥। ११ ॥
इस श्रुतिसे के फलस्वरूपसे रूपता का वर्णन इसके अनन्तर क आध्यात्मिक = प मृत्यु प्राणा-गया इसलिये का नाश करने-- प्राणने ही इन इनके प्रकृत नारकर, इनके दि देवतात्म-दिया ॥ ११ ॥
मृत्युमत्य-मृत्युमति-पार पहुँचाया । ह यह I १२ ॥ चमा मत्यवहत्'-प्रथमा यानी [ मृत्युसे ] अति-थकर्म में अन्य ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२ ९ A तरकरणापेक्षया साधकतमत्वं । प्राधान्यं तस्याः । तां प्रथमाम-स्यवद्वहनं कृतवान् । तस्याः पुनर्मृत्युमतीत्योढायाः किं रूपम् १ इत्युच्यते - सावाग्यदा यस्मिन्काले पाप्मानं मृत्युम् अत्यमुच्यतातीत्यामुच्यत मोचि-ता स्वयमेव, तदा सोऽग्निरभवत् । सा वाक्पूर्वमप्यग्निरेव सती मृत्युवियोगेऽप्यग्निरेवाभवत् । एतावांस्तु विशेषो मृत्युवियोगे । सोऽयमतिक्रान्तोऽग्निः परेण मृत्युं परस्तान्मृत्योर्दीप्यते ॥ प्राङ्. मोक्षान्मृत्युप्रतिबद्धो अध्यात्म-वागात्मना नेदानीमिव दीप्ति-मानासीत्, इदानीं तु मृत्युं परेण दीप्यते मृत्युवियोगात् ॥ १२ ॥
इन्द्रियोंकी अपेक्षा साधकतम होना ही उसकी प्रधानता है । उस प्रथमा वाग्देवताका उसने अतिवहन किया ।. किंतु मृत्युको पार करके ले जायी गयी उस वाणीका क्या रूप है, सो बतलाया जाता है - वह वाक् जब - – जिस समयमें पापरूप मृत्युको पार करके मुक्त हुई— स्वयं ही मृत्युसे छूट गयी, उस समय वह अग्नि हो गयी । वह बाक् पहले भी अग्निरूपा ही थी, अब मृत्युका वियोग हो जानेपर भी अग्नि ही हो गयी । विशेषता इतनी ही है कि मृत्युका वियोग होनेपर । वह यह [ मृत्युको ] अतिक्रान्त करनेवाला अग्नि ' परेण मृत्युम्’— मृत्युसे परे देदीप्यमान है, उ मुक्त होनेसे पूर्व अध्यात्मवागुरूप मृत्युसे प्रतिबद्ध होनेके कारण वह इस समयके समान दीप्तिमान् नहीं था; अब मृत्युका वियोग हो जानेके कारण वह मृत्युसे परे होकर । देदीप्यमान है ॥ १२ ॥
अथ प्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत्सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥
बृ ० उ ० ६-
पृष्ठ 136
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ ब्राह्मण फिर प्राणका अतिवहन किया । वह जिस समय मृत्यु हुआ वह वायु हो गया । वह् यह अतिक्रान्त वायु मृत्युसे परे बहता है ॥ १३ ॥ भात्येव
तथा प्राणो घ्राणम् - वायुर- इसी प्रकार प्राण अर्थात् घ्राण-परेणाति- वायु हो गया । वह मृत्युसे पार वेद ॥ भवत् । स तु पवते मृत्युं होकर बहता है । और सबका अर्थ फि क्रान्तः । सर्वमन्यदुक्तार्थम् ॥ १३ ॥ कहा जा चुका है ॥ १३ ॥ यह चन्द्र
है । इसी इसे इस अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स मनश्च आदित्योऽभवत्सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्त- यजमानी स्तपति ॥ १४ ॥
मृत्युमत फिर चक्षुका अतिवहन किया । वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह आदित्य हो गया । वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है ॥१४ ॥ यजमान
तथा चक्षुरादित्योऽभवत्स तु इसी प्रकार चक्षु आदित्य हो देवता तपति ॥ १४ ॥ गया और वह तपता है ॥ १४ ॥ ग्न्यादिर
दिपञ्चक अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशो ऽभवंस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥१५ ॥ यथा य
फिर श्रोत्रका अतिवहन किया । वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ इति श्र यह दिशा हो गया । वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं ॥ १५ ॥
तथा श्रोत्रं दिशोऽभवत् । दिशः । तथा श्रोत्र दिशा हो गया । दिशाएँ पूर्वादिके विभागसे स्थित अथ प्राच्यादिविभागेनात्रस्थिताः ॥१५ हैं ॥ १५ ॥
तदुद्यत अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत फि स कुछ अन्न चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो उस अन्न
पृष्ठ 137
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय१ त्र्युसे पार हुआ हता है ॥१३ ॥
T अर्थात् घ्राण-मृत्युसे पार और सबका अर्थ १३ ॥ मुच्यत स मतिक्रान्त-पार हुआ यह तपता है ॥१४ ॥
क्षु आदित्य हो है ॥ १४ ॥
मुच्यत ता न्ताः ॥१५ ॥
त्युसे पार हुआ हैं ॥ १५ ॥
शा हो गया । विभागसे स्थित मुच्यत स मतिक्रान्तो ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१ भात्येवं ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥
फिर मनका अतिवहन किया । वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ यह चन्द्रमा हो गया । वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है । इसी प्रकार यह देवता उसका इसे इस प्रकार जानता है ॥ १६ ॥
मनश्चन्द्रमा भाति । यथा पूर्व-यजमानं वागाद्यग्न्यादिभावेन मृत्युमत्यवहत्, एवमेनं वर्तमान-यजमानमपि ह वा एषा प्राण-देवता मृत्युमतिवहति वागाद्य- | ग्न्यादिभावेन । एवं यो वागा-दिपञ्चकविशिष्टं प्राणं वेद । " तं यथा यथोपासते तदेव भवति ” इति श्रुतेः ॥ १६ ॥
मृत्युसे अतिवहन करती है जो कि मन चन्द्रमा होकर प्रकाशित होता है । जिस प्रकार प्राणने पूर्व यजमानको वागादिके अग्न्यादि-भावसे मृत्युसे अतिवहन किया था उसी प्रकार यह प्राणदेवता इस वर्तमान यजमानको भी वागादिके अग्न्यादिभावद्वारा मृत्युसे अतिक्रान्त कर देती है जो कि इस प्रकार प्राणको वाग़ादि पञ्चदेवविशिष्ट जानता है, जैसा कि “ उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है तद्रूप ही हो जाता है " इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ १६ ॥
प्राणका अन्नाद्यागान अथात्मनेऽन्नाद्यमागायद्यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥
फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यका आगान किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नसे प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥
पृष्ठ 138
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ यथा वागादिभिरात्मार्थमागानं कृतं तथा मुख्योऽपि प्राणः सर्व-प्राणसाधारणं प्राजापत्यफलमा-गानं कृत्वा त्रिषु पवमानेषु, अथा-नन्तरं शिष्टेषु नवसु, स्तोत्रेषु, आत्मने आत्मार्थमन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं चान्नाद्यमागायत् । कर्तुः कामसंयोगो वाचनिक इत्युक्तम् । कथं पुनस्तदन्नाद्यं प्राणे-नात्मार्थमागीतमिति गम्यते १ इत्यत्र हेतुमाह — यत्किञ्चेति सामान्यान्नमात्रपरामर्शार्थः I । हीति हेतौ । यस्माल्लोके प्राणिभिर्य-त्किञ्चिदन्नमद्यते भक्ष्यते तदने-नैव । अन इति प्राणस्याख्या प्रसिद्धा अनःशब्दः सान्तः शकटवाची, यस्त्वन्यः स्वरान्तः सप्राणपर्यायः । ब्राह्मण जिस प्रकार वागादिन अपने लिये आगान किया था उसी प्राणेनैव प्रकार मुख्य प्राणने भी तीन पव- कि मानों में समस्त प्राणोंके लिये समान प्राजापत्यरूप फलका आगान कर एवान्ना इसके पश्चात् शेष नौ स्तोत्रमं परिणत अपने लिये अन्नाद्यका — जो अन्न प्राणः हो और आद्य ( भक्ष्य ) भी हो उस प्रतिष्ठा अन्नाद्यका आगान किया । यदपि उद्गानकर्ताको जो यह इच्छित पदार्थका संयोग होता है, वह प्रतिष्ठा वाचनिक है - ऐसा पहले कहा कण्याप जा चुका है । किंतु प्राणने उस प्राणेऽ अन्नाद्यका अपने लिये आगान किया - यह कैसे जाना जाता है? इसमें श्रुति हेतु बतलाती प्रारणक है – ' यत्किञ्च ' – यह पद सामान्य- न रूपसे अन्नमात्रका परामर्शं करनेके लिये है । ' हि ' यह अव्यय हेत्वर्थ में तदद्यत है । अर्थात् क्योंकि लोकमें प्राणियों-द्वारा जो कुछ भी अन्न भक्षण अन्ननि किया जाता है वह अन - प्राणके नैष द्वारा ही खाया जाता है । ' अन ' यह प्राणका नाम प्रसिद्ध है । सान्त ' अनस् ' शब्द शकटका वाचक कारस्य है और जो दूसरा स्वरान्त नकृतो ( अकारान्त ) है वह प्राणका १. ‘ अथात्मनेऽन्नाद्यमागायत् ' इस श्रुतिवचनसे विहित । मर्थ प्र २. मन्त्र १ । ३ । २ के भाष्यमें ।
पृष्ठ 139
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय१ वागादिने अपने किया था उसी भी तीन पव-गोंके लिये समान का आगान कर नौ स्तोत्रोंमें का जो अन्न द ) भी हो उस किया । जो यह इच्छित होता है, वह पहले कहा तु प्राणने उस लिये आगान जाना जाता हेतु बतलात ह पद सामान्य-परामर्श करनेके अव्यय हेत्वर्थ में लोक में प्राणियों -भी अन्न भक्षण ह अन - प्राणके जाता है । ' अन ' म प्रसिद्ध है । शकटका वाचक दूसरा स्वरान्त वह प्राणका ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः । किञ्च न केवलं प्राणेनाद्यत एवान्नाद्यम्, तस्मिञ्चरीराकार-परिणतेऽन्नाद्य इह प्रतितिष्ठति प्राणः । तस्मात्प्राणेनात्मनः प्रतिष्ठार्थमागीतमन्नाद्यम् । यदपि प्राणेनान्नादनं तदपि प्रतिष्ठार्थमेवेति न वागादिष्विव कल्याणासङ्गजपाप्मसम्भवः प्राणेऽस्ति ॥ १७ ॥
पर्याय है, अतः वह अनेन अर्थात् प्राणसे ही खाया जाता है । इसके सिवा अन्नाद्य प्राणसे केवल खाया ही नहीं जाता, अपि तु उस अन्नाद्यके शरीराकारमें परिणत होनेपर उसमें ही प्राण प्रतिष्ठित होता है । अतः अपनी प्रतिष्ठाके लिये प्राणने अन्नाद्यका आगान किया । प्राणके द्वारा जो अन्नका अदन ( भक्षण ) होता है वह भी उसकी प्रतिष्ठाके ही लिये है; अतः वागादिके समान प्राणमें शुभाभिनिवेशजनित पापकी सम्भा-वना नहीं है ॥ १७ ॥
प्रारणका सर्वपोषकत्व और उसकी इस प्रकारकी उपासनांका फल नन्ववधारणमयुक्तं प्राणेनैव तदद्यत इति, वागादीनामपि अन्ननिमित्तोपकारदर्शनात् । नैष दोषः प्राणद्वारत्वात्तदुप-कारस्य । कथं प्राणद्वारकोऽ-नकृतो वागादीनामुपकार इत्येत-मर्थं प्रदर्शयन्नाह -शङ्का - किंतु ऐसा जो निश्चय किया है कि वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है यह तो ठीक नहीं है, क्योंकि अन्नसे होनेवाला उपकार तो वागादिको भी होता देखा जाता है | 1. समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वह उपकार प्राणके ही द्वारा होता है । अन्नके कारण होनेवाला वागादिका उपकार प्राणके द्वारा होनेवाला कैसे है? इसी बात को दिखाने के लिये श्रुति कहती है-
पृष्ठ 140
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१३४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय१ ब्राह्मण ते देवा अब्रु वन्नेतावद्वा इद ँ सर्वं यदन्नं तदा-कमसि त्मन आगासीरनु नोऽस्मिन्नन्न आभजस्वेति ते वै इदं त माभिसंविशतेति तथेति त समन्तं परिण्यविशन्त नं तस्माद्यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवह वा एन ् तत्सन स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वाना श्र ेष्ठः पुर एता यागी भवत्यन्नादो ऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवंविद स्वेषु त्कृर्ता प्रति प्रतिर्बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवत्यथ य रेण एवैतमनु भवति यो वैतमनु भार्याम्बुभूषति स हैवालं नु भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥ आत्म
आभा वे देवगण बौले, " यह जो अन्न है वह सब तो इतना ही है; उसे छान्द तुमने अपने लिये आगान कर लिया है । अतः अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमें भागी बनाओ । ” [ प्राणने कहा ] " वे तुमलोग सब ओरसे कुरु । मुझमें प्रवेश कर जाओ । " तब ' बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर वे सब ओरसे इत उसमें प्रवेश कर गये । अतः प्राण के द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे र्थिनो ये प्राण भी तृप्त होते हैं । अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञातिजन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वह स्वजनोंका भरण करनेवाला, समन्त उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करने- शत वाला और सबका अधिपति होता है । ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार त्येव जाननेवालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है - जो भी परिस इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह विश निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है ॥ १८ ॥
निवि ते वागादयो देवाः, स्वविषय- उन वागादि देवताओंने, जो. अपने विषयका द्योतन ( प्रकाशन ) ष्टाना द्योतनाद्देवाः, अब्रुवन्तुक्तवन्तो करनेके कारण देवता हैं, मुख्य नैवा प्राणसे कहा — ' ' यह [ अन्न ] तो तृप्ति मुख्यं प्राणम् इदमेतावन्नातोऽधि । इतना ही है इससे अधिक नहीं ,