बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1221–1230

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1221–1230

पृष्ठ 1221

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अध्याय ५ स्वधाकारके ॥ अर्थात् त्रयो और साम ) की जो उपा सामान धेनु अपने चार तन्य अर्थात् कार वाग्धेनु स्तनों से समान अन्न न कौन - से ये वह दूध हैं? धेनु दो वगण उप-कौन - से हैं? बार; क्योंकि को हवि दी उपजीवी सा कहकर स्वधाकार-हैं— स्वधा-णको स्वधा हैं । प्राण वृषभ राही वाक् उसका वत्स ह प्रस्रवित ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०७ मनसा ह्यालोचिते विषये वाक् । प्रवर्तते; तस्मान्मनो वत्सस्थानी-यम् ॥ एवं वाग्धेनूपासकस्तद्भा-व्यमेव प्रतिपद्यते ॥ १ ॥

होती है [ यानी पन्हाती है ] । मन-से आलोचना किये हुए विषयमें ही वाणीकी प्रवृत्ति होती है, इसलिये मन वत्सस्थानीय है । इस प्रकार वाक्रूपी धेनुका उपासक तद्रूपता-को ( तदुपाधिक ब्रह्मभावको ) हो प्राप्त होता है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये अष्टमं वाग्धेनुब्राह्मणम् ॥ ८ ॥

नवम ब्राह्मण. पुरुषान्तर्गत वैश्वानराग्नि, उसका घोष और मरणकालका सूचक अरिष्ट अयमग्निर्वैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति यमेतत् कर्णा-वपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोष शृणोति ॥ १ ॥

-जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर है, जिससे कि यह अन्न, जो कि भक्षण किया जाता है, पकाया जाता है । उसीका यह घोष होता है, जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता है । जिस समय पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥

श्रयमनिर्वैश्वानरः - पूर्ववदुपास- ' अयमग्निः वैश्वानरः'- पूर्ववत् । ' को- ' यह अग्नि वैश्वानर है ' यह ब्रह्मकी नान्तरम् ' अयमनिर्वैश्वानरः एक अन्य उपासना है । वह अग्नि ऽयमग्निः १ इत्याह - योऽयमन्तः । कौन - सा है? इसपर श्रुति कहती

पृष्ठ 1222

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१२०८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ पुरुषे । किं शरीरम्भकः १ / नेत्युच्यते येनाग्निना वैश्वा- । नराख्येनेदमन्नं पच्यते । किं तदन्नम्? यदिदमद्यते भुज्यते-नं प्रजाभिर्जाठरोऽग्निरित्यर्थः । तस्य साक्षादुपलक्षणार्थमिद-माह - तस्याग्नेरन्नं पचतो जाठरस्यैष घोषो भवति; को-सौ १ यं घोषम्, एतदिति क्रियाविशेषणम्, कर्णावपिधा-याङ्गुलीभ्यामपिधानं कृत्वा शृणोति; तं प्रजापतिमुपासीत वैश्वानरमग्निम् । अत्रापि ताद्भाव्यं फलम् । तत्र प्रासङ्गिक-मिदमरिष्टलक्षणमुच्यते - सोऽत्र । शरीरे भोक्ता यदोत्क्रमिष्यन् भवति नैनं घोषं शृणोति ॥ १ ॥

है जो कि यह पुरुषके भीतर है, क्या शरीरका आरम्भक अग्नि? नहीं; कौन - सा है सो बतलाया जाता है-जिस वैश्वानरसंज्ञक अग्नि से यह अन्न पकाया जाता है । वह अन्न कौन-सा है? जो यह अन्न प्रजाओंद्वारा ' अद्यते ' भक्षण किया जाता है; [ उस अन्नको पचानेवाला ] अर्थात् जाठराग्नि । उसका साक्षात् उपलक्षण कराने. के लिये श्रुति इस प्रकार कहती है-अन्न पचानेवाले उस जाठराग्निका यह घोष होता है; वह कौन - सा है? जिस घोषको पुरुष दोनों कान सूदकर अङ्गुलियोंसे ढक करके सुनता है; यहां ' एतत् ' यह क्रियाविशेषण है; उस प्रजापतिरूप वैश्वानराग्निकी उपासना करे । यहाँ भी तद्रूपताकी प्राप्ति ही फल है । उसमें श्रुति यह प्रसङ्गप्राप्त अरिष्ट बतलाती है-यहाँ शरीरमें वह भोक्ता पुरुष जिस समय उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको नहीं सुनता ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये नवमं वैश्वानराग्निब्राह्मणम् ॥ ६ ॥

सर्व नानां च्छत तेन तत्र मते यथा च्छत्य जि चायुको मार्ग दे वह ऊ उसके छिद्र हो लोकमें देता है, ओर च ( शारीि वर्षो तक

पृष्ठ 1223

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अध्याय ५ तर है, क्या न? नहीं; जाता है-नसे यह अन्न अन्न कौन-जाओं द्वारा जाता है; ] अर्थात् क्षण कराने. कहती है-ठराग्निका ह कौन - सा दोनों कान करके सुनता याविशेषण नग्निकी तद्रूपताकी उसमें श्रुति तलाती है-पुरुष जिस होता को नहीं दशम ब्राह्मण प्रकरणान्तर्गंत उपासनाओं से प्राप्त होनेवाली गति सर्वेषामस्मिन् प्रकरण उपास- इस प्रकरणमें बतलायी गयी समस्त उपासनाओंका यह गतिरूप नानां गतिरियं फलं चोच्यते- फल बतलाया जाता है--यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमाग-च्छति तस्मै स तत्र विजिहीते तथा रथचक्रस्यखं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्र-मते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमाग-च्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥ १ ॥

जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है । वहाँ वह वायु उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता-मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊर्ध्वं होकर चढ़ता है । वह सूर्यलोकमें पहुँच जाता है । वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र होता है । उसमें होकर वह ऊपरको ओर चढ़ता है । वह चन्द्र-लोक में पहुँच जाता है । वहीं चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है । वह अशोक ( मानसिक दुःखसे रहित ) और महिम ( शारीरिक दुःखशून्य ) लोकमें पहुँच जाता है और उसमें सदा- -अनन्त वर्षोंतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥ १ ॥

पृष्ठ 1224

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ १२१० यदा वै पुरुषो विद्वानस्माल्लो-कात् प्रैति शरीरं परित्यजति स तदा वायुमागच्छत्यन्तरिक्षे तिर्थ-ग्भूतो वायुः स्तिभितोऽमेद्यस्ति- । ष्ठति, स वायुस्तत्र स्वात्मनि तस्मै संप्राप्ताय विजिहीते स्वात्मावयवान् विगमयतिच्छिद्री-करोत्यात्मानमित्यर्थः । किं- । परिमाणं छिद्रम् १ इत्युच्यते— यथा रथचक्रस्य खं छिद्रं प्रसिद्ध परिमाणम् । तेनच्छिद्रेण स विद्वानूर्ध्व आक्रमत ऊर्ध्वः सन् गच्छति स आदित्यमागच्छति ॥ आदित्यो ब्रह्मलोकं जिगमिषोर्मार्गनिरोधं कृत्वा स्थितः सोऽप्येवंविद उपासकाय द्वारं प्रयच्छति । तस्मै स तत्र विजिहीते, यथा लम्बरस्य खं वादित्रविशेषस्य-च्छिद्रपरिमाणं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति । जिस समय पुरुष अर्थात् उपा-सक इस लोकसे मरकर जाता है, शरीर त्याग करता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है, बाकाशमें तिर्यग्भूत ( तिरछा होकर स्थित ) वायु घनीभूत अर्थात् अभेद्यरूपसे विद्यमान है; वह वायु वहाँ अपनेमें प्राप्त हुए उस उपासक के लिये ' विजिहीते ' अपने अवयवोंका विच्छेद कर देता है अर्थात् अपनेको छिद्रयुक्त कर देता है । कितना बड़ा छिद्र करता है, सो बतलाया जोता है -- जैसा कि रथ के पहियेका छिद्र होता है, वैसे प्रसिद्ध परिमाण: वाला छिद्र कर देता है । उस छिद्रद्वारा वह विद्वान् ऊर्ध्वं होकर चढ़ता है, अर्थात् ऊर्ध्वोन्मुख होकर जाता है, वह आदित्यलोकमें पहुँच जाता है | आदित्य ब्रह्मलोक-को जानेवालेका मार्गं रोककर स्थित है । वह भी इस प्रकार जाननेवाले उस उपासकको मार्ग । दे देता है । उसके लिये वहां वह अपने [ मण्डल ] को छिद्रयुक्त कर देता है; जैसा कि लम्बर नामक एक वाद्य विशेषके छिद्रका परिमाण होता है । उसके द्वारा वह ऊररको | ओर चढ़ता है, वह चन्द्रलोक में | पहुँच जाता है । ब्राह्मण सो यथा सऊ प्रजापा विशिष्ट दुःखेन हिम वर्जित वसति संवत्सर बहून व व्याधि हैवल प्रेतम वेदैतद हैवल

पृष्ठ 1225

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अध्याय ५ अर्थात् उपा जाता है, उस समय है, आकाशमें कर स्थित ) अभेद्यरूपसे वहीं अपने में सकके लिये अवयवोंका अपनेको है | कितना सो बतलाया के पहियेका सिद्ध परिमाण: है । विद्वान् ऊर्ध्वं त् ऊर्ध्वोन्मुख आदित्यलोकमें दत्य ब्रह्मलोक-मार्ग रोककर इस प्रकार को मार्ग लिये वहां वह - छिद्रयुक्त कर लम्बर नामक उद्रका परिमाण वह ऊपरकी हे चन्द्रलोक में ब्राह्मण ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२११ सोऽपि तस्मै तत्र विजिद्दीते, यथा दुन्दुभेः खं प्रसिद्धम्, तेन स ऊर्ध्व आक्रमते । स लोकं प्रजापतिलोकमागच्छति, किं-विशिष्टम् १ अशोकं मानसेन दुःखेन विवर्जितमित्येतत्; हिमं हिमवर्जितं शारीरदुःख-वर्जितमित्यर्थः; तं प्राप्य तस्मिन् वसति शाश्वतीनित्याः समाः संवत्सरानित्यर्थः । ब्रह्मणो बहून् कल्पान् वसतीत्येतत् ॥ १॥ ।

ABPS - 23 वहाँ वह भी उसके लिये अपने-को छिद्रयुक्त कर देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र प्रसिद्ध है, उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है । वह लोक अर्थात् प्रजापतिलोकमें आ जाता है; कैसे लोकमें? ‘ अशो-कम् ' अर्थात् मानसिक दुःखसे रहित और ' अहिमम् ' – हिमबर्जित अर्थात् शारीरिक दु: खसे रहित लोकमें । वहाँ पहुँचकर वह उसमें ' शाश्वतीः समाः ' -- नित्य अर्थात्. अनन्त वर्षोंतक बसता है । तात्पर्य यह कि ब्रह्माके अनेकों कल्पोंतक वहाँ निवास करता है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये दशमं गतिब्राह्मणम् ॥ १० ॥

एकादश ब्राह्मण व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपोदृष्टिका विधान एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परम ँ हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद् वै परमं तपोयं प्रेतमरण्य हरन्ति परम हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परम हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥

पृष्ठ 1226

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१२१२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ ब्राह्मण व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है -- यह निश्चय ही परम तप है 200 जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है । मृत पुरुषको जो, भविष परमं वनको ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है; जो ( म्रियमाण व्यक्ति ) ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है । मरे हुए मनुष्यको परमं सब प्रकार जो अग्नि में रखते हैं, यह जानता है, वह परम लोकको ही जीत एतद् वै परमं तपः । किं तत् १ यद् व्याहितो व्याधितो ज्वरादिपरिगृहीतः सन् यत् तप्यते तदेतत् परमं तप इत्येवं चिन्तयेत्; दुःखसामान्यात् । तस्यैवं चिन्तयतो विदुषः कर्म-क्षयहेतुस्तदेव तपो भवत्यनिन्द-तोऽविषीदतः स एव च तेन विज्ञानतपसा दग्धकिल्विषः परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद । तथा मुमूर्षुरादावेव कन्पयति; किम्? एतद् वै परमं तपो यं प्रेतं मां ग्रामादरण्यं हरन्ति ऋत्विजो! अन्त्यकर्मणे तद् ग्रामादरण्यगमन-सामान्यात् परमं मम तत् तपी निश्चय ही परम तप है; जो ऐसा वेद । लेता है ॥ १ ॥ तथ

यह निश्चय परम तप है । वह क्या है? व्याहित - व्याधित अर्थात् मग्ना ज्वरादिसे ग्रस्त हुआ पुरुष जो ताप सामा होता है, यह परम तप है-- ऐसा चिन्तन करे; क्योंकि ताप और तप जयति इनमें समान ही क्लेश है । इस प्रकार चिन्तन करनेवाले उस विद्वान्का, जो कि स्वतः प्राप्त हुए रोगादिकी निन्दा नहीं करता तथा उससे विषादको प्राप्त नहीं होता, वही तप कर्मक्षयका हेतु हो जाता है I । जो इस प्रकार जानता है, वह अन उस विज्ञानरूप तपके द्वारा पापों- श्र को दग्ध करके परम लोकपर विजय प्राप्त कर लेता है । नान्तर इसी प्रकार मरणासन्न पुरुष आरम्भमें ही कल्पना करता है; क्या कल्पना करता है? मर जानेपर अन्न मुझे ऋत्विग्गण अन्त्येष्टिकर्मके लिये शुष्य जो ग्रामसे वनमें ले जायेंगे, यह भूयं निश्चय ही परम तप होगा - ग्रामसे कि‍ वन - गमन में समानता होनेके कारण । वह मेरा परम तप हो जायगा । यह

पृष्ठ 1227

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अध्याय५ परम तप है, पुरुषको जो नाण व्यक्ति ) हुए मनुष्यको है; जो ऐसा है । वह अर्थात् पुरुष जो ताप तप है -- ऐसा ताप और तप लिश है । इस नेवाले उस वतः प्राप्त हुए * करता तथा नहीं होता, हेतु हो जाता जानता है, वह के द्वारा पापों लोकपर विजय रणासन्न पुरुष करता है; है? मर जानेपर येष्टिकर्मके लिये जायँगे, यह होगा — ग्रामसे T होनेके कारण जायगा । यह ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ भविष्यति । ग्रामादरण्यगमनं परमं तप इति हि प्रसिद्धम् 1 । परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद । तथैतद् वै परमं तपो यं प्रेत-मग्नावस्यादद्धति अग्निप्रवेश-सामान्यात्, परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥

१२१३ | तो प्रसिद्ध ही है, कि ग्रामसे वनमें जाना परम तप है । जो ऐसा जानता | है, वह निश्चय ही परम लोकको जीत लेता है । तथा जिस मृतकको सब ओरसे अग्नि में रखते हैं - यह भी उसके लिये परमतप होता है, क्योंकि अग्निप्रवेश से इसको समानता है । जो ऐसा जानता है, वह निश्चय ही परम लोकको जीत लेता है ॥ १ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकादशं तपोब्राह्मणम् ॥ ११ ॥

---द्वादश ब्राह्मण ग्रन्न- प्राणरूप ब्रह्मकी उपासना और तद्विषयक आख्यान अन्नं ब्रह्मेति - तथैतदुपास- ' अन्नं ब्रह्म ' – इस प्रकार इस अन्य उपासनाका विधान करनेकी जान्तरं विधित्सन्नाह— इच्छासे वेद कहता है-अन्नं ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात् प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधा-भूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः पितरं किः स्विदेवैवंविदुषे साधु कुर्यां कमेवास्मा असाधु

पृष्ठ 1228

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१२१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद कस्त्वेनयोरे- ब्राह्म कधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वि वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि ग्राह्यम रमिति प्राणो वैरं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि पूतिश रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति तत् -सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥

ब्रह्म कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है । कोई कहते हैं- प्राण ब्रह्म है; किंतु अर ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है । परंतु ये यस्मा -दोनों देव एकरूपताको प्राप्त होकर परम भावको प्राप्त होते हैं - ऐसा पैति निश्चय कर प्रातृद ऋषिने अपने पितासे कहा था - ' इस प्रकार जाननेवाले-का मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ? [ क्योंकि कृतकृत्य हो प्राणः जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सकता है और न अशुभ न श हो । ] ' पिताने हाथसे निवारण करते हुए कहा - ' प्रावृद! ऐसा मत -तस्मान - कहो । इन दोनोंकी एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता ऽनात हे? ' अत: उससे उस ( प्रावृदके पिता ) ने ' वि ' ऐसा कहा । ' वि ' यही अन्न नोपप है । वि - रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं । ' रम् ' यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं । जो ऐसा जानता है, वेवान उसमें ये सब भत प्रविष्ट होते हैं और अन्नं ब्रह्मान्नमद्यते यत् तद् अश्लेत्येक आचार्या आहुस्तन्न । तथा ग्रहीतव्यमन्नं ब्रह्मेति । अन्ये चाहु: - प्राणो ब्रह्मेति, तच्च तथा न ग्रहीतव्यम् । सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥ धाभाव

त्वं गच अन्न ब्रह्म है । अन्न जो कि तदेत खाया जाता है, वह ब्रह्म है - ऐसा किन्हीं आचायका कथन है; किंतु स्म प्रा ' अन्न ब्रह्म है ' इसे इसी रूपमें नहीं किंस्वित स्वीकार करना चाहिये । दूसरे कहते हैं— प्राण ब्रह्म है; इसे भी इस मया रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये ।

पृष्ठ 1229

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[ अध्याय५ कस्त्वेनयोरे- 70 उ हैतदुवाच निविष्टानि णि भूतानि ने विशन्ति 11 नहीं है; क्योंकि ब्रह्म है; किंतु ता है । परंतु ये - होते हैं- ऐसा कार जाननेवाले-कि कृतकृत्य हो है और न अशुभ वृद! ऐसा मत नाको प्राप्त होता ' वि ' यही अन्न नाण है, क्योंकि सा जानता है, हैं ॥ १ ॥

अन्न जो कि ब्रह्म है - ऐसा कथन है; किंतु इसी रूप में नहीं इये । दूसरे कहते इसे भी इस करना चाहिये । ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१५ किमर्थं पुनरन्नं ब्रह्मेति न किंतु ' अन्न ब्रह्म है ' ऐसा क्यों 1 ग्राह्यम्; यस्मात् पूयति क्लिद्यते पूतिभावमापद्यत ऋते प्राणात्, तत् कथं ब्रह्म भवितुमर्हति १ ब्रह्म हि नाम तद् यदविनाशि । अस्तु वहिं प्राणो ब्रह्म, नैवम् यस्माच्छुष्यति वै प्राणः शोषसु-पैति ऋतेऽन्नात्, अत्ता हि प्राणः छतोऽन्नेनाद्येन विना न शक्नोत्यात्मानं धारयितुम् तस्माच्छुष्यति वै प्राण ऋते-ऽन्नात् । त एकैकस्य ब्रह्मता नोपपद्यते यस्मात् तस्मादेते ह स्वेवानप्राणदेवते एकधाभूयमेक-धाभावं भूत्वा गत्वा परमतां परम-त्वं गच्छतो ब्रह्मत्वं प्राप्नुतः । तदेतदेवमध्यवस्य ह स्माह स्म प्रातृदो नाम पितरमात्मनः किंस्वित् स्विदिति वितर्के, यथा मया ब्रह्म परिकल्पितमेवंविदुषे । नहीं समझना चाहिये? योंकि प्राणके बिना यह सड़ता है, इसमे पानी छूटने लगता है अर्थात् यह पूर्तिभाव - दुर्गन्धको प्राप्त हो जाता है । फिर यह किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है? ब्रह्म तो वही हो सकता है, जो अविनाशी हो । अच्छा तो प्राण ही ब्रह्म रहे, ऐसा नहीं; क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है- शुष्कताको प्राप्त हो जाता है । प्राण तो अन्न भक्षण करनेवाला है; अत: अपने भक्ष्य अन्नके बिना वह अपनेको धारण करनेमें समर्थ नहीं है, इसीसे अन्नके विना प्राण सूख जाता है । अत: इनमेंसे एक - एकका ब्रह्मत्व सम्भव नहीं है, इसलिये ये अन्न और प्राण -- दो देवता एकरूप होकर— एकभावको प्राप्त होकर परमता ----परमभावको प्राप्त होते अर्थात् ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाते हैं । इसे इस प्रकार निश्चय कर प्रातृद नामके ऋषिने अपने पिता से कहा-' किस्वित् ' ( कौन सा ) - इसमें ‘ स्वित् ’ यह वितर्कभाव सूचित करने के लिये है, मैंने जिस प्रकार ब्रह्मकी कल्पना की है, उस प्रकार जाननेवालेका मैं

पृष्ठ 1230

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१२१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ किंस्वित् साधु कु साधु शोभनं । पूजां कां स्वरमै पूजां कुर्या मित्यभिप्रायः, किमेवास्मै विदुषे ऽसाधु कुर्यां कृतकृत्योऽसावित्य भिप्रायः । अन्नप्राणौ सहभतौ ब्रह्मेति विद्वान्नासावसाधकरणेन खण्डितो भवति, नापि साधु-करणेन महीकृतः । तमेवंवादिनं स पिता ह स्माह पाणिना हस्तेन निवारयन् मा प्रावृद मैवं वोचः । कस्त्वेनयो-रन्नप्राणयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां कस्तु गच्छति न कश्चि-दपि विद्वाननेन ब्रह्मदर्शनेन परमतां गच्छति । तस्मान्मैवं वक्तुमर्हसि कृतकृत्योऽसाविति । यद्येवं ब्रवीतु भवान् कथं पर-मतां गच्छतीति १ तस्मा उ है-तद् वक्ष्यमाणं वच उवाच । किं तत् १ वीति । किं तद् वीत्युच्यते - अन्नं वै वि । अन्ने हि यस्मादिमानि सर्वाणि भूतानि विष्टान्याश्रितान्यतोऽन्नं वीत्युच्यते । क्या साघु करूँ? साधु - शोभन अर्थात् पूजा; तात्पर्य यह है कि उसकी मैं क्या तो पूजा करूँ और क्या ऐसा जाननेवालेका में असाधु करूँ? अभिप्राय यह है कि वह तो कृतकृत्य है । अन्न और प्राण - ये मिलकर ब्रह्म हैं - ऐसा जो जानने-वाला है वह पुरुष अशुभ करनेसे तो खण्डित नहीं होता और शुभ करनेसे महान् नहीं होता । इस प्रकार कहनेवाले उस पुत्र-को हाथसे रोकते हुए पिताने कहा, ' प्रावृद! नहीं, ऐसा मत कहो । इन अन्न और प्राणको एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परम - भावको प्राप्त करता है? इस ब्रह्मदर्शनके द्वारा कोई भी विद्वान् परम - भावको प्राप्त नहीं कर सकता । इसलिये तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिये कि यह कृत्यकृत्य है । ' यदि ऐसी बात है तो आप बतलाइये कि किस प्रकार परम्-भाव प्राप्त करता है? तब उसके प्रति उसके पिताने यह आगे कहा जानेवाला वचन कहा । वह वचन ` क्या था? वह था ' वि ' । वह ' ' वि ' क्या है सो बतलाते हैं- -अन्न ही ' वि ' है, क्योंकि अन्न में ही ये समस्त भूत विष्ट -- आश्रित है, इस लिये अन्न ' वि ' इस प्रकार कहा जाता है । ब्राह्म वि वान् प्राणो हि यस भूता सर्वभ तिगुण नायत सत्य रमते बलवां मन्यम स्यात् उ ०२ इदान सर्वाणि विशन्त भूतानि य एवं