बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1231–1240
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240
पृष्ठ 1231
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ५ धु - शोभन यह है कि ना करूँ ओर का में असाधु है कि वह तो र प्राण - ये जो जानने-शुभ करने से और शुभ ता । बाले उस पुत्र-पिता ने कहा, कहो | इन एकरूपताको - भावको प्राप्त -र्शनके द्वारा - भावको प्राप्त सलिये तुम्हें हिये कि यह त प्रकार परम-तब उसके । वह वचन ' । वह ' वि ' - अन्न ही ही ये समस्त इसलिये अन्न जाता है । ब्राह्मण १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ किं च रमिति - रमिति चोक्त-वान् पिता । किं पुनस्तद् रम् १ प्राणो वै रम्; कुत इत्याह प्राणे हि यस्माद् बलाश्रये सति सर्वाणि भूतानि रमन्तेऽतो रं प्राणः । सर्वभूताश्रयगुणमन्नं सर्वभूतर-तिगुणश्च प्राणः । न हि कश्चिद-नायतनो निराश्रयो रमते; नापि सत्यप्यायतनेऽप्राणो दुर्बलो रमते यदा त्वायतनवान् प्राणी बलवांश्च तदा कृतार्थमात्मानं मन्यमानो रमते लोकः; " युवा स्यात् साधुयुवाध्यायकः " ( तै ० उ ० २ । ८ । १ ) इत्यादिश्रुतेः । इदानीमेवंविदः फलमाह— सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्त्यन्नगुणज्ञानात् सर्वाणि भूतानि रमन्ते प्राणगुणज्ञानाद् य एवं वेद ॥ १ ॥
१२१७ इसके सिवा ' रम् ' यह कहा— पिताने ' रम् ' ऐसा भी कहा, सो वह ' रम् ' क्या है? प्राण ही ' रम् ' है । क्यों, सो बतलाते हैं — क्योंकि बल आश्रयभूत प्राणके रहनेपर ही सब भूत रमण करते हैं, इस-लिये प्राण ' रम् ' है । इस प्रकार अन्न समस्त भूतों के आश्रयरूप गुणवाला है और प्राण समस्त भूतोंके रतिरूप गुणवाला । बिना आयतन अर्थात् बिना आश्रयके भी कोई रमण नहीं कर सकता और आश्रयके होनेपर भी प्राणहीन अर्थात् बलहीन भी रमण नहीं कर सकता । जिस समय प्राणी आश्रयसे युक्त और बलवान् होता है तभी • अपनेको कृतार्थ मानता हुआ वह रमण करता है; जैसा कि " युवक हो, अच्छा युवक हो और विद्या-वान हो ” इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है । अब श्रुति इस प्रकार जानने-वाले उपासकका फल बतलाती है— जो ऐसा जानता है, उसमें अन्नगुण-का ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत प्रवेश करते हैं तथा प्राणगुणका ज्ञान होनेके कारण समस्त भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्वादशमन्नप्राण ब्राह्मणम् ॥ १२ ॥
बृ ० उ ० ७७-
पृष्ठ 1232
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रयोदश ब्राह्मण उक्थदृष्टिसे प्राणोपासना उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदँ सर्वमुत्थापय-त्युद्धास्मादुक्थविद् वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
' उक्थ ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही उक्थ है, क्योंकि प्राण ही इन सबको उत्थापित करता है । इस उपासकसे उक्थ-वेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है । जो ऐसी उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको प्राप्त करता है ॥ १ ॥
उक्थं तथोपासनान्तरम् । उक्थं शस्त्रम्; तद्धि प्रधानं महात्रते क्रतौ ॥ किं पुनस्तदुक्थम्? १ प्राणो वा उक्थम्; प्राणश्च प्रधान इन्द्रियाणामुक्थं च शस्त्राणामत उक्थमित्युपासीत । कथं प्राण उक्थम् १ इत्याह-प्राणो हि यस्मादिदं सर्वमुत्थाप-यति; उत्थापनादुक्थं प्राणः; न ह्यप्राणः कश्चिदुत्तिष्ठति । तदुपासन फलमाह — उद्धास्मा-देवंविद उक्थवित् प्राणविद् वीरः इसी प्रकार उक्थ ' एक अन्य उपासना है । उक्थ शस्त्र है, वही महाव्रत क्रतुमें प्रधान होता है । अच्छा तो वह उक्थ क्या है? प्राण हो उक्थ है; प्राण इन्द्रियों में प्रधान है और उक्थ शस्त्रोंमें प्रधान है; इसलिये प्राण उक्थ है - ऐसी उपा-सना करे । प्राण उक्थ किस प्रकार है? सो श्रुति बतलाती है— क्योंकि प्राण ही इस सबको उठाता है; उठाने के कारण प्राण उक्थ है; क्योंकि कोई भी प्राणहीन उठ नहीं सकता । अब श्रुति उसकी उपासनाका फल बतलाती है - इस प्रकार उपासना करनेवालेसे उक्थवित् - प्राणविद् वीर ब्राह्मण पुत्र उि अदृष्टं त जयति भूतान भैष्ठया वेद ॥ ' यजुः प्राण में हो कारण इस सायुज्य अ यजुर प्राणो प्राणेहि युज्यन्ते । कस्यचित युनक्तीति एवंविद उद्यच्छन्त विदे सर्वा
पृष्ठ 1233
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मुत्थापय-वायुज्य ५ ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ ९ पुत्र उचिष्ठति ह - दृष्टमेतत् फलम् || यानी पुत्र उत्पन्न होता है- यह इसका प्रत्यक्ष फल है । परोक्ष फल अदृष्टं तूक्थस्य सायुज्यं सलोकतां | यह है कि जो ऐसा जानता है, वह उक्थके सायुज्य और सलोकताको जयति य एवं वेद ॥ १ ॥ प्राप्त होता है ॥ १ ॥
उक्थ है, सकसे उक्थ-वह प्राणके एक अन्य T त्र है, वही - होता है । है? प्राण योंमें प्रधान प्रधान है; - ऐसी उपा-कार है? सो कि प्राण ही.. ; उठाने क्योंकि कोई सकता । नाका फल र उपासना T णवित् वीर यजुर्दृष्टिसे प्राणोपासना यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रेष्ठचाय यजुषः सायुज्य सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥
' यजु: ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है । सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं । जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता यजुरिति चोपासीत प्राणम्; प्राणो वै यजुः; कथं यजुः प्राणः? प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते । न ह्यसति प्राणे केनचित् कस्यचिद् योगसामर्थ्यम् अतो युनक्तीति प्राणो यजुः । एवंविदः फलमाह - – युज्यन्त
उद्यच्छन्त इत्यर्थः । हास्मा एवं-विदे सर्वाणि भूतानि ष्ठ्यं श्रेष्ठ- ।
है ॥ २ ॥
' यजु: ' इस प्रकार भी प्राणकी उपासना करे; प्राण ही यजु है; प्राण यजु किस प्रकार है? क्योंकि प्राणमें ही समस्त प्राणियोंका योग होता है । प्राणके न रहनेपर किसी के साथ किसीका योग होने-का सामर्थ्य नहीं है; अतः योग करता है, इसलिये प्राण यजु है । इस प्रकार उपासना करनेवालेका श्रुति फल बतलाती है - इस प्रकार उपासना करनेवालेको सम्पूर्णं भूत
पृष्ठ 1234
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १२२० भावस्तस्मै श्रेष्ठ्याय श्रेष्ठभावायायं नः श्रेष्ठो भवेदिति । यजुषः प्राणस्य सायुज्यमित्यादि सर्व समा-नम् ॥ २ ॥
समदृष्टिसे ५ । श्रेष्ठ - श्रेष्ठभावका नाम श्रेष्ठ्य है उस श्रेष्ठ्य यानी श्रेष्ठ - भाव के लिये, -यह हममें श्रेष्ठ हो, इस निमित्त से युक्त होते अर्थात् उद्यम करते हैं । तथा वह यजुरूप प्राणका सायुज्य प्राप्त करता है - इत्यादि सब अर्थं पूर्ववत् है ॥ २ ॥
प्राणोपासना साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यचि हास्मै सर्वाणि भूतानि श्रेष्ठयाय कल्पन्ते साम्नः सायुज्य ँ सलोकतां जयति य एवं वेद || ३ ॥ ' साम ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही साम है, क्योंकि प्राण में ही ये सब भूत सुसंगत होते हैं । समस्त भूत उसके लिये सुसंगत होते हैं तथा उसकी श्रेष्ठता के लिये समर्थ होते हैं । जो इस प्रकार उपासना करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
सामेति चोपासीत प्राणम् । ' साम ' इस प्रकार भी प्राणकी प्राणो वै साम । कथं प्राणः साम? उपासना करे । प्राण ही साम है । प्राणे हि यस्मात् सर्वाणि भूतानि प्राण साम किस प्रकार है? क्यों-सम्य श्चि संगच्छन्ते; संगमनाद कि प्राणमें ही सब भूत संगत होते साम्यापत्तिहेतुत्वात् साम प्राणः ॥ हैं; सङ्गमन अर्थात् साम्यप्राप्ति के सम्यञ्चि संगच्छन्ते हास्मै सर्वाणि कारण प्राण साम है । सम्पूर्ण भूत भतानि । न केवलं संगच्छन्त उसके साथ संगत हो जाते हैं; केवल संगत ही नहीं होते, इसके एव, श्रेष्ठभावाय चास्मै कल्पन्ते श्रेष्ठभावके लिये भी समर्थं होते हैं । समर्थ्यन्ते साम्नः सायुज्यमि- सामके सायुज्यको प्राप्त होता है-स्यादि पूर्ववत् ॥ ३ ॥ इत्यादि अर्थं पूर्ववत् है ॥ ३ ॥
ब्राह्मण सायु प्राप प्राण ही रक्षा क को प्राप्त और तं प्राणो व वै इत्याह-देहं प्रा हिंसिता यस्मात प्रसिद्धं विद्व न त्राय तत्त्रं प्राप्नोती पाठात् च माप्नोति '
पृष्ठ 1235
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय१ श्रेष्ठ है, -भाव के लिये इस निमित्तसे उद्यम करते रूप प्राणका T है - इत्यादि २ ॥ सर्वाणि भूतानि सलोकतां म है, क्योंकि लिये सुसंगत कार उपासना - है ॥ ३ ॥
र भी प्राणकी ही साम है । कार है? क्यों-भूत संगत होते साम्यप्राप्तिके । सम्पूर्ण भूत हो जाते हैं; हीं होते, इसके
समर्थ होते हैं ।
नाप्त होता है-है ॥ ३ ॥
ब्राह्मण १३ ] शाङ्करभाष्यार्थं १२२१ क्षत्रदृष्टिसे प्रारणोपासना क्षत्रं प्राणो वै क्षत्त्रं प्राणो हि वै क्षत्त्रं त्रायते हैनं प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्त्रमत्रमाप्नोति क्षत्त्रस्य सायुज्य 7 सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥
प्राण क्षत्र है - इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही क्षत्र है । प्राण ही क्षत्र है - यह प्रसिद्ध है । प्राण इस देहकी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है । अत्रम् — अन्य किसोसे त्राण न पानेवाले क्षत्र ( प्राण ) को प्राप्त होता है । जो इस प्रकार और सलोकताको जीत लेता है ॥ ४ तं प्राणं तत्त्रमित्युपासीत । प्राणो वै क्षत्त्रं प्रसिद्धमेतत् प्राणो हि वै क्षत्त्रम् । कथं प्रसिद्धता १ इत्याह- त्रायते पालयत्येनं पिण्डं देहं प्राणः क्षणितोः शस्त्रादि-हिंसितात् पुनम सेनापूरयति यस्मात् तस्मात् चतत्राणात् प्रसिद्धं क्षत्त्रत्वं प्राणस्य । विद्वत्फलमाह - प्र क्षत्त्रमत्र न त्रायतेऽन्येन केनचिदित्यत्रं चत्त्रं प्राणस्तमत्रं तत्त्रं प्राणं प्राप्नोतीत्यर्थः । शाखान्तरे बा पाठात् चत्त्रमात्रं प्राप्नोति प्राणो उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य ॥ उस प्राणकी ' क्षत्र ' इस प्रकार उपासना करे । प्राण ही क्षत्र है— यह प्रसिद्ध है कि प्राण ही क्षत्र है । यह प्रसिद्ध किस कारण है, सो श्रुति बतलाती है - इस पिण्ड यानी शरीरकी प्राण क्षतसे - शस्त्रादिकी पीडासे रक्षा करता है अर्थात् उसे पुन: मांससे भर देता है, अतः क्षतसे रक्षा करनेके कारण प्राणका क्षत्रत्व प्रसिद्ध है | अब श्रुति उपासकको मिलनेवाला फल बतलाती है - प्र क्षत्त्रम् अत्रम् -जिसका किसी दूसरेसे त्राण नहीं किया जाता, वह प्राण ' अत्र - क्षत्र है, उस अत्र क्षत्ररूप प्राणको प्राप्त होता है । शाखान्तर ( माध्यन्दिनी शाखा ) में पाठान्तर होने के कारण क्षत्रमात्रको प्राप्त होता है अर्थात् प्राण १. त्राणहीन । २. वहाँ ' प्र क्षत्त्रमत्रमाप्नोति ' के स्थान में ' प्र क्षत्त्रमात्र-माप्नोति ' ऐसा पाठान्तर है ।
पृष्ठ 1236
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १२२२ भवतीत्यर्थः । चत्त्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥
५ हो जाता है - ऐसा अर्थ होगा ब्राह्म । जो इस प्रकार उपासना करता है, द्वि वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको " गाय प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
राजन्न इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्विजो त्रयोदशमुक्थब्राह्मणम् ॥ १३ ॥ निमि
गायत्र चतुर्दश ब्राह्मण-' ब्राह्म गायत्र्युपासना विपा ब्रह्मणे हृदयाद्यनेकोपाधि-विशिष्टस्योपासनमुक्तम् । अथे-दानीं गायत्र्युपाधिविशिष्टस्यो-पासनं वक्तव्यम्, इत्यारभ्यते । सर्वच्छन्दसां हि गायत्रीछन्दः प्रधानभूतम्, तत्प्रयोक्तृगयत्रा -णाद् गायत्रीति वक्ष्यति ॥ न चान्येषां छन्दसां प्रयोक्तप्राण-त्राणसामर्थ्यम्; प्राणात्मभूता च सा सर्वच्छन्दसां चात्मा प्राणः । प्राणश्च चतत्राणात् क्षत्त्रमि -हृदय आदि अनेक उपाधियोंसे ब्राह्मण विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलायी सम्बन गयी । अब आगे गायत्रीरूप उपाधिसे विशिष्ट ब्रह्म की उपासना बतलानी है; ब्राह्मण इसलिये प्रकरणका आरम्भ किया वक्तव्य जाता है । सम्पूर्णं छन्दोंमें गायत्री गायत्र छन्द ही प्रधानभूत है । उसका प्रयोग करनेवालेके गयेका त्राण करनेके निरङ्क कारण यह गायत्री है - — ऐसा श्रुति बतलावेगी । अन्य छन्दोंमें अपने पुरुषा प्रयोक्ताके प्राणोंकी रक्षा करनेका विधान सामर्थ्यं नहीं है । किंतु वह प्राणकी स्वरूपभूता है और प्राण सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा है । तथा क्षतसे त्राण भ करनेके कारण प्राण क्षेत्र है - ऐसा त्युक्तम्; प्राणश्च गायत्री; तस्मात् ऊपर कहा जा चुका है । प्राण ही गाय गायत्री है, इसलिये उसीकी उपासना- लोक तदुपासनमेव विधित्स्यते । का विधान करना अभीष्ट है ।
पृष्ठ 1237
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
[ अध्याय५ अर्थ होगा । ना करता है, रसलोकताको निक उपाधियोंसे सना बतलायी त्रीरूप उपाधिसे ना बतलानी है । आरम्भ किया छन्दोंमें गायत्री - । उसका प्रयोग त्राण करनेके है - ऐसा श्रुति छन्दोंमें अपने - रक्षा करनेका किंतु वह प्राणकी प्राण सम्पूर्ण तथा क्षतसे त्राण क्षत्र है - ऐसा का है । प्राण ही उसीकी उपासना-अभीष्ट है । ब्राह्मण १४ 1 शाङ्करभाष्यार्थ द्विजोत्तमजन्म हेतुत्वाच्च — " गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्था वैश्यम् " इति द्विजोत्तमस्य द्वितीयं जन्म गायत्री निमित्तम् । तस्मात् प्रधाना गायत्री | ' ब्राह्मणा व्युत्थाय ' ' ब्राह्मणा अभिवदन्ति ' ' स ब्राह्मणो, विपापो विरजोऽविचिकित्सो । ब्राह्मणो भवति ' इत्युचमपुरुषार्थ-सम्बन्धं ब्राह्मणस्य दर्शयति । तच्च ब्राह्मणत्वं गायत्रीजन्ममूलमतो वक्तव्यं गापच्याः सतत्वम् । गायत्र्या हि यः सृष्टी द्विजोत्तमो निरङ्कुश एवोचमपुरुषार्थ साधने ऽधिक्रियते 9 श्रतस्तन्मूलः परम-पुरुषार्थ सम्बन्धः । तस्मात्तदुपासन-विधानापाह -१२२३ ANAN इसके सिवा ब्राह्मणोंके जन्मका हेतु होने से भी [ इसका विधान किया जाता है ] | " गायत्री से ब्राह्मणकी रचना की, त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी और जगतीसे वैश्पकी " इस श्रुतिके अनुसार द्विजोत्तमका द्वितीय जन्म गायत्री के कारण है । इसलिये गायत्री प्रधान है । ' ब्राह्मण व्युत्थान करके [ भिक्षाचर्या करते हैं ) ', ' ब्राह्मण अभिवादन करते हैं ', ' वह ब्राह्मण निष्पाप, निर्दोष और निःशङ्क ब्राह्मण होता है ' इत्यादि श्रुतियाँ ब्राह्मणका उत्तम पुरुषार्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करती हैं । और वह ब्राह्म-णत्व गायत्री जन्ममूलक है; इसलिये गायत्रीका तत्त्व बतलाना आवश्यक है । जो गायत्रोद्वारा रचा हुआ निरङ्कुश द्विजश्रेष्ठ है, उसीका उत्तम पुरुषार्थसाधनमें अधिकार है । अतः परम पुरुषार्थंका सम्बन्ध गायत्रो-मूलक है । इसलिये उसकी उपासना-का विधान करनेके लिये श्रुति कहती है-गायत्री के प्रथम लोकरूप पादकी उपासना भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥
पृष्ठ 1238
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ १२२४ भूमि अन्तरिक्ष और द्यौ - ये आठ अक्षर हैं । आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका, एक ( प्रथम ) पाद है । यह ( भूमि आदि ) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है । इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है, वह त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्येतान्य- । ष्टावक्षराणि, अष्टाक्षरमष्टावक्षराणि यस्य तदिदमष्टाक्षरम् ह वै प्रसिद्धावद्योतकौ, एकं प्रथमं गायत्र्यै गायत्र्याः पदम्, यक्का- । रेणैवाष्टत्व पूरणम्, एतदु हैबैतदे -वास्या गायत्र्याः पदं पादः प्रथमो भूम्यादिलक्षणस्त्रैलोक्यात्मा; अष्टाक्षरत्वसामान्यात् । एवमेतत् त्रैलोक्यात्मकं गाय-5 पाः प्रथमं पदं यो वेद तस्यैतत् फलम् - स विद्वान् यावत् किश्चिदेषु त्रिषु लोकेषु जेतव्यं तावत् सर्वे ह जयति योऽस्था एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥
जीत लेता है ॥ १ ॥
भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौः –इस प्रकार ये आठ अक्षर हैं । गायत्री का एक अर्थात् प्रथम पाद अष्टाक्षर-जिसमें आठ अक्षर हों, ऐसा यह अष्टाक्षर है । ह और वै - ये प्रसिद्धि-के सूचक निपात हैं । ' द्यौ: ' इसके यकारसे ही आठ संख्या की पूर्ति होती है; यही इस गायत्रीका भूमि आदि लक्षणोंवाला त्रिलोकरूप प्रथम पाद है, क्योंकि आठ अक्षर होने में इनकी समानता है । इस प्रकार गायत्रीके इस त्रैलोक्यात्मक प्रथम पादको जो जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है । वह उपासक, जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, इस त्रिलोकीमें जो कुछ जय करने योग्य है, उस सभीको जीत लेता है ॥१ ॥
गायत्रीके द्वितीय त्रयीरूप पादकी उपासना तथा- इसी प्रकार -ऋचो यजू ँषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर ँह वा एक गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥
ब्राह ही गायत्र वह उस ऋ जयी टाव गाय हैवा लक्ष देव त्रय्य माध्य एतद वेद त एक ताव तुरी तत
पृष्ठ 1239
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ध्याय ५ वाला ही गायत्रीका वह इस द्यौः - इस 1. गायत्री अष्टाक्षर-ऐसा यह - ये प्रसिद्धि-द्यौ: ' इसके व्याकी पूर्ति त्रीका भूमि त्रिलोकरूप आठ अक्षर है । इस पादको जो प्राप्त होता इस प्रकार ता है, इस - करने योग्य ता है ॥१ ॥
रहवा यावतीयं तदेवं पर्द ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५ ' ऋच:, यजू ंषि सामानि ' ये आठ अक्षर हैं । आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक ( द्वितीय ) पाद है । यह ( ऋक् आदि ) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है । जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है [ अर्थात् त्रयीविद्याका जितना फल है ] उस सभी को जीत लेता है ॥ २ ॥
ऋचो यजूंषि सामानीति त्रयीविद्यानामक्षराणि, एतान्यप्य-ष्टावेव तथैवाष्टाक्षरं हवा एक गायत्र्यै पदं द्वितीयम् एतदु हैवास्या एतद् ऋग्यजुःसाम-लक्षणमष्टाक्षरत्वसामान्या-देव । स यावतीयं त्रयीविद्या त्रय्या विद्यया यावत् फलजात -मायते तावद्ध जयति योऽस्या एतद् गायत्र्यास्त्रे विद्यलक्षणं पदं वेद ॥ २ ॥
' ऋचः, यजू ंषि, सामानि ' ये त्रयीविद्याके अक्षर हैं । ये भी आठ ही हैं; इसी प्रकार गायत्रीका एक अर्थात् द्वितीय पद भी आठ अक्षरों-वाला है । अष्ठाक्षरत्वमें समानता होनेके कारण ही यह ऋग्यजुःसाम-' रूप गायत्रीका द्वितीय पाद है । जो इस गायत्री के इस त्रैविद्य ( तीनों वेद ) रूप पदको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है अर्थात् त्रयीविद्यासे जितना फल प्राप्त किया जाता है, वह सब जीत लेता है ॥ २ ॥
गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परो-रजापादकी उपासना तथा- 1 तथा-प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षर हवा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्य एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजाय एष तपति यद् वै चतुर्थं तत् तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति
पृष्ठ 1240
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ १२२६ सर्वमुह्येवैष रज उपर्युपरि तपत्येव हैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥
प्राण, अपान, ब्यान — ये आठ अक्षर हैं । आठ अक्षरवाला हो गायत्रीका एक ( तृतीय ) पाद है । यह प्राणादि ही इस गायत्रीका ' तृतीय ' ' पाद है । जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है । और यह जो तपता ( प्रकाशित. होता ) है वही इसका तुरीय, दर्शत एवं परोरजा पद है । जो चतुर्थं होता हे, वही ' तुरीय ' कहलाता है । ' दर्शतं पदम् ' इसका अर्थ है - मानो [ यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष ] दीखता है, ' परोरजा: ' इसका अर्थ है -- यह सभी रज [ यानी लोकों ] के ऊपर - ऊपर रहकर प्रकाशित होता है । जो गायत्रीके इस चतुर्थं पदको इस प्रकार और कीर्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ३ प्राणोऽपानो व्यान एतान्यपि । प्राणाद्यभिधानाक्षराण्यष्टौ । तच्च गाययास्तृतीयं पदं यावदिदं प्राणिजातं तावद्ध जयति यो-S स्या एतदेवं गायत्र्यास्तृतीयं पदं वेद । अथानन्तरं गायत्र्यात्रिप-दायाः शब्दात्मिकायास्तुरीयं पदमुच्यतेऽभिधेयभूतमस्याः प्रकृताया गायच्या एतदेव वक्ष्य-माणं तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति तुरीयमित्यादि-वाक्यपदार्थ स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः-जानता है, वह इसी प्रकार शोभा ॥ प्राण, अपान, व्यान – ये प्राणादिके नाम भी आठ हो अक्षर हैं । यह गायत्रीका तृतीय पाद है । जो इस प्रकार गायत्रीके इस तृतीय पदको जानता है, वह यह जितना प्राणिसमूह है, उस सभीको जीत ता है । अब आगे शब्दात्मिका त्रिपा गायत्रीका अभिधेयभूत चतुर्थं पद बतलाया जाता है । यह जो तपता है, वही इस प्रकृत गायत्रीका आगे बतलाया जानेवाला तुरोय दर्शत परोरजा पद है । ' तुरीयम् ' इत्यादि वाक्यके पदोंके अर्थकी श्रुतिस्त्रयं ही व्याख्या करती है । बा वा दश इत्त इच इल चरल स य रज ची ना वी सा श वी ल व