बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1241–1250

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1241–1250

पृष्ठ 1241

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1241 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ श्रिया E 11 वाला हो का ' तृतीय ' जितना यह ( प्रकाशित चतुर्थ होता है - मानो नर्थ है -- यह है । जो कार शोभा व्यान - ये ठही अक्षर पाद है । इस तृतीय यह जितना भीको जीत का त्रिपदा चतुर्थ पद म्ह जो तपता त्रका आगे तुरोय दर्शत नम् ' इत्यादि श्रुति स्वयं ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२७ यद् वै चतुर्थ प्रसिद्धं लोके तदिदं तुरीयशब्देनाभिधीयते । दर्शतं पदमित्यस्य कोर्थ: १ इत्युच्यते-- ददृश इव दृश्यत । इव ह्येष मण्डलान्तर्गतः पुरुषो । sar दर्शतं पदमुच्यते । परोरजा इत्यस्य पदस्य कोऽर्थः १ इत्यु-च्यते - सर्वं समस्तमुह्येवैष मण्ड-तस्थः पुरुषो रजो रजोजातं समस्तं लोकमित्यर्थः, उपर्युप र्याधिपत्यभावेन सर्वं लोकं रजोजातं तपति । उपर्युपरीति चीप्सा सर्वलोकाधिपत्यख्याप-नार्था । ननु सर्वशब्देनैव सिद्धत्वाद् वीप्सानर्थिका । नैष दोषः येषामुपरिष्टात् सविता दृश्यते तद्विषय एव सर्व-शब्दः स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्था वीप्सा । “ ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च ” ( छा ० उ ० १ । ६ । ८ ) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मात् सर्वा -वरोधार्थी वीप्सा । लोकमें जो चतुर्थं प्रसिद्ध है, वही यह ' तुरीय ' शब्दसे कहा गया है । ' दर्शतं पदम् ' इसका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है - यह मण्डलान्तर्गत पुरुष ' ददृश इव ' अर्थात् दीखता - सा है, इसलिये यह ' दशंत पद ' कहा जाता है । ' ' परोरजा: ' इस पदका क्या अर्थ है? सो बतलाते हैं - यह मण्डलस्य पुरुष समस्त रजः - रजः समूह अर्थात् सारे ही लोकको ऊपर - ऊपर आधिपत्य-भावसे सम्पूर्ण लोकरूप रजःसमूह-को प्रकाशित करता है । ' उपरि-उपरि ' यह द्विरुक्ति उसका समस्त लोकपर आधिपत्य प्रकट करनेके लिये है । याक्षेप - किंतु आधिपत्य ती ' सर्व ' शब्दसे ही सिद्ध हो जाता है - - ऐसी स्थिति में द्विरुक्ति तो व्यर्थ ही है | उत्तर - यह दोष नहीं है, क्यों--कि जिनके ऊपर सूर्य दिखायी देता हे, सर्वंशब्द तो उन्हींके विषयमें होगा - इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये द्विरुक्ति की गयी है । यह बात “ जो कि इससे ऊपरके लोक हैं, यह आदित्यमण्डल उनका और देवताओंके अभीष्ट फलोंका भी स्वामी है " इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है । अतः सभी लोकोंका अवरोध करनेके लिये यह द्विरुक्ति है ।

पृष्ठ 1242

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1242 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ १२२८ यथासौ सविता सर्वाधिपत्य-लक्षणया श्रिया यशसा च ख्या-त्या तपत्येवं हैव श्रिया यशसा च तपति योऽस्या एतदेवं तुरीयं दर्शतं पदं वेद ॥ ३ ॥

जो गायत्री के इस चतुर्थं दर्शत पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार श्री और कीर्तिसे प्रकाशित होता है जैसे कि यह आदित्य सर्वाधिपत्यरूपा श्री और कीर्तिसे तप रहा है ॥ ३ ॥

गायत्री की परम प्रतिष्ठा प्रारण हैं, ' गायत्री ' शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल सैषा गायत्र्येतस्मिँ स्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद् वै तत् सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चतुर्हि वै सत्यं तस्माद् यदिदानीं द्वौ विवद-मानावेयातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादह-मदर्शमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद् वै तत् सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत् प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बल सत्यादोगीय इत्येवंवेषा गायत्र्य-ध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाँ स्तन्त्रे स्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणास्तत्रे तद् यद् गया स्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम स यामेवामूँ सावित्रीमन्वाहै वैष सा स यस्मा अन्वाह तस्य त्राणा स्त्रायते ॥ ४ ॥

वह यह गायत्री इस चतुर्थं दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है । वह ' पद सत्यमें प्रतिष्ठित है । चक्षु हो सत्य है, चक्षु ही सत्य है -- यह प्रसिद्ध है । इसीसे यदि दो पुरुष ‘ मैंने देखा है ' ' मैंने सुना है ' इस प्रकार विवाद करते हुए आवें, तो उनमेंसे जो यह कहता होगा कि ' मैंने देखा है ' उसीका हमें ब्राह विश प्राण अपेक्ष है । प्राण ' गाय जिस इसक स श्वत प्रति त्य सम का मृत गाय सत्व ष्ठित इत्य

पृष्ठ 1243

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1243 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ध्याय ५ तुर्थ दर्श है, वह कीर्तिसे कि यह श्री और ॥ वचन और पढ़े चक्षुर्वै विवद-यादह-सत्यं प्रतिष्ठितं गायत्र्य-प्राणा वै तस्माद् वैष सा 11 उत है । वह - यह प्रसिद्ध कार विवाद ' उसीका हमें ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२ ९ विश्वास होगा । वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है । प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है । इसीसे कहते हैं कि सत्य की अपेक्षा बल ओजस्वी है । इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राण में प्रतिष्ठित है । उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था । प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया । इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका ' गायत्री ' नाम हुआ । आचार्यने आठ वर्षके वटुके प्रति उपनयन के समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है । वह जिस - जिस बटुकों इसका उपदेश करता है, यह उसके उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ ४ ॥

सैषा त्रिपदोक्ता या त्रैलोक्य-त्रै विद्यमाणलक्षणा गायत्र्येतस्मि-चतुर्थे तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता, सूर्यामूर्तरसत्वादादि -स्यस्य; रसापाये हि वस्तु नीर -समप्रतिष्ठितं भवति; यथा काष्ठादि दग्धसारं तद्वत् । तथा मूर्तीमूर्तात्मकं जगत् त्रिपदा गायत्र्यादित्ये प्रतिष्ठिता तद्र-सत्वात् सह त्रिभिः पादः । तद् वै तुरीयं पदं सत्ये प्रति-ष्ठितम् । किं पुनस्तत् सत्यम् १ इत्युच्यते -चक्षुर्वै सत्यम् । कथं । पूर्वोक्त तीन पदोंवाली वह यह त्रैलोक्य, त्रैविद्य ओर प्राणरूपा गायत्री इस चतुर्थं तुरीय दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है । [ यह मूर्तमूर्तरूप गायत्री चतुर्थ पदरूप आदित्य में प्रतिष्ठित है ] क्योंकि आदित्य मूर्तमूर्तरस स्वरूप हैं । रस न रहने पर तो वस्तु नीरस और अप्रतिष्ठित हो जाती है; जिस प्रकार जिसका सार दग्ध हो गया है, वह काष्ठादि नीरस हो जाता है, उसी प्रकार यहां भी समझना चाहिये । इस प्रकार मूर्तामूर्तात्मक जगदुरूग त्रिपदा गायत्री तीनों पादोंके सहित आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य उस ( जगत् ) का सार है । वह तुरीय पद सत्यमें प्रतिष्ठित | है | वह सत्य क्या है? सो बतलाया । जाता है - चक्षु ही सत्य है । किस

पृष्ठ 1244

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1244 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ १२३० चक्षुः सत्यमित्याह -- प्रसिद्धमेव - । चक्षुहिं वै सत्यम् । कथं प्रसि--द्धता १ इत्याह — तस्मात् यद् यदीदानीमेव द्वौ विवदमानौ विरुद्धं वदमानावेयातामागच्छे-यातामहमदर्थं दृष्टवानस्मीत्यन्य ' आहाहमश्रौषं स्वया दृष्टं न तथा तस्त्विति तयोर्य एवं ब्रूयाद-हम द्राक्षमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम न पुनर्यो यादहम-श्रौषमिति । श्रोतुर्मृषा श्रवणमपि -संभवति न तु चक्षुषो मृषा दर्शनम् तस्मान्नाश्रौषमित्युक्त-वते श्रद्दध्याम । तस्मात् सत्य-प्रतिपत्तिहेतुत्वात् सत्यं चक्षुस्त-स्मिन् सत्ये चक्षुषि सह त्रिभि-रितरैः पार्दैस्तुरीयं पदं प्रति ष्ठितमित्यर्थः । उक्तं च " स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति चक्षुषीति " ( ३ । ९ । २० ) । तद् वै तुरीयपदाश्रयं सत्यं बले प्रतिष्ठितम् । किं पुनस्तद्बलम् १ प्रकार चक्षु सत्य है? सो बतलाती है । यह बात प्रसिद्ध है कि चक्षु ही सत्य है ॥ ऐसी प्रसिद्धि क्यों है? सो श्रुति बतलाती है-इसलिये, यदि इसी समय दो विवाद करनेवाले - परस्परविरुद्ध बोलनेवाले आवें; उनमेंसे एक कहता हो, कि ' मैंने ऐसा देखा है ' और दूसरा कहे कि ' मैंने सुना है, तूने जैसी देखी है, वह वस्तु वैसो नहीं है ' तो उनमें से जो यह कहेगा कि ' मैंने उसे देखा है ' हम उसीका विश्वास करेंगे, जो ऐसा कहता है कि ' मैंने सुना है ' उसका नहीं । सुननेवालेका श्रवण तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रोंको मिथ्या दर्शन नहीं हो सकता । इसलिये जो कहता है कि ' मैंने सुना है ' उसमें हमारा विश्वास नहीं होता । अतः सत्यज्ञानका हेतु होनेके कारण चक्षु सत्य है । उस सत्यरूप चक्षुमें अन्य तीन पादोंके सहित तुरीय पद प्रतिष्ठित है - ऐसा इसका तात्पर्य है । कहा भी है- " वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित हे? चक्षु " । वह तुरीय पदका आश्रयभूत । सत्य बलमें प्रतिष्ठित है । वह बल क्या नास इत्या प्राणे तथा प्रोतं सत्यं चलं ओज यस्मि तस्मा रत्वं बलव एक ष्ठिता अतो यस्मि भवनि च जगत सा पु सैषा

पृष्ठ 1245

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1245 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय ५ सो प्रसिद्ध है प्रसिद्धि लाती है-समय दो स्परविरुद्ध मेंसे एक देखा है ' सुना है, वस्तु वैसी यह कहेगा म उसीका कहता है का नहीं । मिथ्या भी को मिथ्या इस लिये सुना है ' हीं होता । निके कारण रूप चक्षुमें हित तुरीय इसका है - " वह उत है? आश्रयभूत हबल क्या ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्याथ १२३१ इत्याह - प्राणो वै बलं तस्मिन् प्राणे बले प्रतिष्ठितं सत्यम् । तथा चोक्तम् " सूत्रे तदोतं च प्रोतं च " इति । यस्माद् बले सत्यं प्रतिष्ठितं तस्मादाहु: -जलं सत्यादोगीय ओजीय श्रोजस्तरमित्यर्थः । लोकेऽपि यस्मिन् हि यदाश्रितं भवति तस्मादाश्रितादाश्रयस्य बलवत्त-रत्वं प्रसिद्धम्ः न हि दुर्बलं बलवतः क्वचिदाश्रयभूतं दृष्टम् । एवमुक्तन्यायेन उ एषा गाय-sus यात्ममध्यात्मे प्राणे प्रति -ष्ठिता । सैंषा गायत्री प्राणः, अतो गायत्र्यां जगत् प्रतिष्ठितम् । यस्मिन् प्राणे सर्वे देवा एकं भवन्ति, सर्वे वेदाः कर्माणि फलं च सैवं गायत्री प्राणरूपा सती जगत आत्मा । सा हैषा गांस्तत्रे त्रावती; के पुनर्गयाः ९ प्राणा वागादयो वै गयाः शब्दकरणात्; तांस्तत्रे सैषा गायत्री; तत्तत्र यद्यस्मादू | हे? सो श्रुति बतलाती है - प्राण ही बल है । उस प्राणरूप बलमे सत्य प्रतिष्ठित है । ऐसा ही कहा भी है कि " उस सूत्रमें [ सूत्रसंज्ञक प्राणमें ] यह | सत्यसंज्ञक भूतसमुदाय ] ओतप्रोत है । " क्योंकि बल में सत्य प्रतिष्ठित है, इसलिये कहा है कि सत्यकी अपेक्षा बल ओगीय -ओजीय अर्थात् अधिक ओजस्वी है । लोकमें भी जो वस्तु जिसमें आश्रित होती है, उसकी अपेक्षा उस आश्रयका अधिक बलवान् होना प्रसिद्ध है । कहीं भी दुर्बल बलवान्-का आश्रयभूत नहीं देखा गया । इस प्रकार उक्त न्याय से यह गायत्री अध्यात्म – शरीरस्थ प्राण में प्रतिष्ठित है । वह यह गायत्री प्राण हे, इसलिये गायत्रीमें जगत् प्रतिष्ठित है । जिस प्राण में सम्पूर्ण देव एक हो जाते हैं तथा समस्त वेद, कर्म और फल भी जिसमें एक हो जाते हैं, वह गायत्री इस प्रकार प्राणरूपा होनेके कारण जगत्की आत्मा है । उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था । वे गय कौन हैं? वागादि प्राण ही गय हैं, क्योंकि वे शब्द करते हैं । इस गायत्रीने उनका त्राण किया था । इस प्रकार चूँकि इसने

पृष्ठ 1246

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1246 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२३२ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ गर्यास्त तस्माद् गायत्री नाम ॥ गयत्राणाद् गायत्रीति प्रथिता । आचार्य उपनीय माणव-कमष्टवर्ष यामेवामुं गायत्रीं सावित्रीं सवितृदेवताका मन्वाह पच्छोऽर्धर्चशः समस्तां च; एषैव सा साक्षात्प्राणो जगत आत्मा माणवकाय समर्पितेहेदानीं व्याख्याता नान्या । स आचार्यो यस्मै माणवकायान्वादानुवक्ति । तस्य माणवकस्य गयान् प्राणां स्नायते नरकादिपतनात् ॥ ४ ॥

गयोंका त्राण किया था; इसलिये इसका नाम गायत्री है | गयौंका त्राण करनेके कारण यह ' गायत्री ' इस प्रकार प्रसिद्ध हुई । उस आचार्यने आठ वर्षके वटुका उपनयन कर उसे जिस सविता देवतासम्बन्धिनी सावित्री-का पहले पदश: फिर आधो- आधी ऋचा करके और फिर सम्पूर्णरूप-से उपदेश किया था वह साक्षात् प्राण जगत् की आत्मा यह गायत्री ही उस वटुको समर्पण की गयी थी, जिसकी कि इस समय व्याख्या की गयी है, कोई और नहीं । वह आचार्य जिस बटुको उसका उपदेश करता है, उस बटुके गय यानी प्राणोंकी वह गायत्री नरकादिमें गिरने से रक्षा करती | है ॥ ४ ॥

अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री - सावित्रीका महत्त्व विशार ब्राह्मण A [ गाय का उ वाक्क छन्दव प्रतिग्रह सकता वा नोऽन स्काम प्रायम शरीरे सरस्व इत्येत न यत्त श गायत्र कस्मा त्युक्त सरस्व माणक ता ँ हैत । मेके सावित्रीमनुष्टुभमन्त्राहुर्वागनुष्टुवेतद् दोनों क वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद् गायत्रीमेव सावित्री- होता मनुब्र याद् यदि ह वा अप्येवं विद् बह्निव प्रतिगृह्णाति कहते तत्सवि न हैव तद् गायत्र्या एकंचन पदं प्रति ॥ ५ ॥

• कोई शाखावाले उस इस अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं ।

पृष्ठ 1247

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1247 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अध्याय१ ना; इसलिये है । ह ' गायत्री ' आठ वर्षके उसे जिस नो सावित्री-आधी - आधी सम्पूर्णरूप-वह साक्षात् यह गायत्री समर्पण की कि इस समय , कोई और जिस बटुको है, उस टु वह गायत्री रक्षा करती र अनुष्टुवेतद् व सावित्री-तिगृह्णाति ५ ॥ उपदेश करते हैं । ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ NAN १२३३ [ गायत्री छन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्री- 22 का उपदेश करते हैं । ] वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं । किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये । गायत्री छन्दवाली सावित्रीका ही उपदेश करे । ऐसा जाननेवाला जो अधिक प्रतिग्रह भी करे, तो भी वह गायत्री के एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥

तामेतां सावित्रीं हैके शाखि-नोऽनुष्टुभम् नुष्टुप्प्रभवामनुष्टुप्छन्द-स्का मन्चाहरुपनीताय । तदभि प्रायमाह — वागनुष्टुप् । वाक् च शरीरे सरस्वती, तामेव हि वाचं सरस्वतीं माणवकायानुब्रूम । इत्येतद् वदन्तः । न तथा कुर्यान्न तथा विद्याद् यत्त आहुर्मृषैव तत् । किं तर्हि? गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयात् । कस्मात्? यस्मात् प्राणो गायत्री-त्युक्तम् । प्राण उक्त वाक् च सरस्वती चान्ये च प्राणाः सर्वं माणवकाय समर्पितं भवति । कोई शाखावाले उपनीत वटु-को अनुष्टुप् - अनुष्टुप्रभव अर्थात् अनुष्टुप् छन्दवाली उस इस सावित्री-का उपदेश करते हैं । श्रुति उनका अभिप्राय बतलाती है - वाक् अनु-ष्टुप् है । वाक् ही शरीरमें सरस्वदी है, उस वग्रूपा सरस्वतीका ही हम माणवक ( वटु ) को उपदेश करते है - ऐसा कहते हुए वे उसका उपदेश करते हैं । किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये, ऐसा नहीं समझना चाहिये; वे जो कहते हैं, वह मिथ्या ही है । तो फिर क्या करना चाहिये? गायत्री छन्द-वाली सावित्रीका ही उपदेश करे । क्यों? क्योंकि प्राण गायत्री है-ऐसा कहा जा चुका है । प्राणका उपदेश हो जानेपर वाक् सरस्वती और अन्य सब प्राण भी वटुको समर्पित हो जाते हैं । १. अनुष्टुप् छन्द चार पादोंका होता है और गायत्री छन्द तीन पादका । दोनोंके पाद आठ - आठ अक्षरके ही होते हैं । अनुष्टुप् छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं । अनुष्टुप छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है-तत्सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वनातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ इति वृ ० उ ० ७८-

पृष्ठ 1248

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1248 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय ५ १२३४ किञ्चेदं प्रासङ्गिकमुक्त्वा गायत्रीविदं स्तौति – यदि हवा श्रप्येवंविद बह्निव - न वि तस्य सर्वात्मनो बहु नामास्ति किंचित् सर्वात्मकत्वाद् विदुषः - प्रति-गृह्णाति, न हैव तत् प्रतिग्रहजातं गायत्र्या एकंचनैकमपि पदं प्रति पर्याप्तम् ॥ ५ ॥

गायत्री छन्दवाली सावित्रीके विषयमें यह प्रासङ्गिक बात कहकर अब श्रुति गायत्र्युपासककी स्तुति करती है— यदि इस प्रकार जानने-वाला अधिक प्रतिग्रह भी करे— ' अधिक ' इसलिये कहा कि सर्वात्मक होनेके कारण उस विद्वान्‌के लिये वास्तवमें बहुत कुछ भी नहीं है; तो भी वह प्रतिग्रह- समुदाय गायत्री-के एक पादके लिये भी पर्याप्त नहीं है ॥ ५ ॥

गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन स य इमा ँ स्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् प्रथमं पद्माप्नुयादथ यावतीयं त्रयी-बिद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णी-ब्राह्म स विदि वनप स प्र प्रथम याता भुक्त सप्र विद्य सोऽ तेन सोश यात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव यात तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनच- फल नाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥ व

जो इन तीन पूर्णं लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह ( प्रतिग्रह ) सम इस गायत्रीके इस प्रथम पादको व्याप्त करता है और जितनी यह त्रयी-विद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह ( प्रतिग्रह ) इसके इस द्वितीय याव पादको व्याप्त करता है और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह ( प्रतिग्रह ) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है और यही इसका तय तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तपता है, यह किसीके द्वारा कर्त प्राप्य नहीं है; क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है? ॥ ६ ।

पृष्ठ 1249

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1249 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रध्याय ५ सावित्रीके -बात कहकर ककी स्तुति कार जानने-ह भी करे-कि सर्वात्मक विद्वान् के लिये भी नहीं है; मुदाय गायत्री-ये भी पर्याप्त न गृहणीयात् तीयं त्रयी-तद् द्वितीयं बतिगृह्णी-देव वि केनच-६ ॥ - वह ( प्रतिग्रह ) तनी यह त्रयी-सके इस द्वितीय प्रतिग्रह करता नौर यही इसका किसीके द्वारा ता है? ॥ ६ ॥

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३५ सय इमांखीन् स यो गायत्री -! विदिमान् भूरादींस्त्रीन् गोऽश्वादि-धनपूर्णांल्लोकान् प्रतिगृह्णीयात् स प्रतिग्रहोऽस्या गायत्रचा एतत् प्रथमं पदं यद् व्याख्यातमाप्नु-यात् । प्रथमपदविज्ञानफलं तेन भुक्तं स्यान्न त्वधिकदोषोत्पादकः स प्रतिग्रहः । अथ पुनर्यावतीयं त्रयी-विद्या, यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पद्मा-प्नुयात् । द्वितीयपदविज्ञानफल तेन भुक्तं स्यात् । तथा यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् तृतीयं पदमाप्नु-यात् । तेन तृतीयपदविज्ञान-फलं भुक्तं स्यात् । कल्पयित्वेदमुच्यते । पादत्रय-सममपि यदि कश्चित् प्रतिगृही-यात् तत् पादत्रयविज्ञानफलस्यैव तयकारणं न त्वन्यस्य दोषस्य कर्तृत्वे क्षमम् । न चैवं दाता ' स य इमांस्त्रीन् ' जो गायत्र्यु-पासक इन गो अश्वादि घनसे पूर्णं भूर्लोकादि तीन लोकोंका प्रतिग्रह ( दान ) स्वीकार करता है, वह प्रतिग्रह इस गायत्रीके इस प्रथम पादको, जिसकी कि व्याख्या की गयी है, व्याप्त करता है । अर्थात् उसके द्वारा केवल प्रथम पादके विज्ञानका फल भोगा जाता है, वह प्रतिग्रह इससे अधिक दोष उत्पन्न करनेवाला नहीं है । और फिर जितनी भी यह त्रयीविद्या है, उतना जो प्रतिग्रह करता है, उसका वह प्रतिग्रह इसके इस द्वितीय पादको ही व्याप्त करता है । उसके द्वारा द्वितीय पादके विज्ञानका फल ही. भोगा जाता है । तथा जितने ये प्राणी हैं, जो उतना प्रतिग्रह करता है, वह प्रतिग्रह इसके तृतीय पादको ही व्याप्त करता है । उसके द्वारा तृतीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है । यह बात कल्पना करके कही गयी है अर्थात् यदि कोई गायत्रीके पादत्रयके समान भी प्रतिग्रह करे तो उसका वह प्रतिग्रह पादत्रयविज्ञानके फलमात्रका क्षय करनेका कारण हो सकता ' है, वह कोई और दोष करनेमें समर्थ नहीं है । ऐसे दाता और

पृष्ठ 1250

बृहदारण्यक उपनिषद, पृष्ठ 1250 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

१२३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५ प्रतिग्रहीता वा गायत्रीविज्ञान- । स्तुतये कल्प्यते, दाता प्रति ग्रहीता च यद्यप्येवं सम्भाव्यते नासौ प्रतिग्रहोऽपराधक्षमः, कस्मात् १ यतोऽभ्यधिकमपि ' पुरुषार्थविज्ञानमवशिष्टमेव चतुर्थ-पादविषयं गायत्रयास्तद्दर्शयति -श्रथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति । यचैतचैव केनचन केनचिदपि प्रतिग्रहेणाप्यं नैव प्राप्यमित्यर्थः,, यथा पूर्वोक्तानि त्रीणि पदानि । एतान्यपि नैवाप्यानि केनचित् कम्पयित्वैवमुक्तं परमार्थतः कृत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् त्रैलो -प्रतिग्रहीताकी वेवल गायत्र्युपा- ब्राह्मण सनाकी स्तुतिके लिये ही कल्पना की गयी हो - ऐसी बात नहीं है; काम यद्यपि ऐसा दाता और प्रतिग्रह यस्म करनेवाला सम्भव हो सकता है, उ किंतु यह प्रतिग्रह कोई अपराध एकपट ( दोष ) करनेमें समर्थ नहीं है, और क्यों? क्योंकि गायत्रीके चतुर्थ है, [ पादका विषयभूत इससे भी अधिक नहीं पुरुषार्थविज्ञान अभी अवशिष्ट है विरा ही । उसे श्रुति दिखलाती है— इस [ ( वि और यह जो तपता है यही कर इसका तुरीय अर्थात् चौथा दर्शत उसकी परोरजा पद है । और यह जो है, काम किसी भी प्रतिग्रहके द्वारा आप्य तस्य | अर्थात् प्राप्तव्य नहीं है, जिस कार उपस कि पूर्वोक्त तीन पद हैं । वास्तव में तो ये भी किसीसे आप्य नहीं हैं, मने कल्पना करके ही ऐसा कहा है । इत्या वास्तवमें त्रैलोक्यादिके समान इतना कोई कहाँसे प्रतिग्रह करेगा? त्रैल अतः तात्पर्य यही है कि इस रूपे क्यादिसमम् । तस्माद् गायत्रचेवं- प्रकारकी गायत्रीकी ही उपासना प्रकारोपास्येत्यर्थः ॥ ६ ॥ करनी चाहिये ॥ ६ ॥ दिन

तुरी गायत्रीका उपस्थान और उसका फल पादै तस्या उपस्थानं गायंत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय स्वे पदाय परोरज सेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै । पदं