बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 141–150

बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 141–150

पृष्ठ 141

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[ अध्याय१ यदन्नं तदा-वेति यविशन्त । वा एनँ : पुर एता विदस्वेषु भवत्यथ य सहैवाल ना ही है; उसे जैसे हमें भी इस ग सब ओरसे वे सब ओर. खाता है उससे उसका ज्ञातिजन ण करनेवाला, न भक्षण करने-भी इस प्रकार श्रितोंका पोषण हता है— जो भी चाहता है वह 1 देवताओंने, जो वन ( प्रकाशन ) चता हैं, मुख्य [ [ अन्त ] तो अधिक नहीं ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ कमस्ति । वा इति स्मरणार्थः ॥ इदं तत्सर्वमेतावदेव, किम्? यद-नं प्राणस्थितिकरमद्यते लोके तत्सर्वमात्मनात्मार्थमागासीः यागीतवानसि श्रागानेनात्ममा-त्कृतमित्यर्थः । वयं चान्नमन्त-रेण स्थातुं नोत्महामहे । श्रतोऽ नु पश्चानोऽस्मानस्मिन्नन्ने आत्मार्थे तवान्ने आभजस्व आभाजयस्व । णिचोऽववरणं छान्दसम् । अस्मांश्चान्नभागिनः कुरु । इतर आहते यूयं यद्यन्ना-र्थिनो वै मा मामभिसंविशत । समन्ततो मामाभिमुख्येन निवि-शत । इत्येवमुक्तवति प्राणे तथे-त्येवमिति " तं प्राणं परिसमन्तं परिसमन्तान्न्यविशन्त निश्चयेना-विशन्त, तं प्राणं परिवेष्टय निविष्टवन्त इत्यर्थः । तथा निवि-ष्टानां प्राणानुज्ञया तेषां प्राणे-नैवाद्यमानं प्राणस्थितिकरं सदन्नं तृप्तिकरं भवति न स्वातन्त्र्येण । है । इसमें ' वै ' यह निपात स्मरणके लिये है । यह वह सब इतना ही है । वह क्या? लोकमें प्राणकी स्थिति करनेवाला जो भी अन्न भक्षण किया जाता है उस सबका तो तुमने अपने लिये आगान कर लिया; अर्थात् आगानके द्वारा उसे अपने अधीन कर लिया । हम भी अन्नके बिना रहने में समर्थ नहीं हैं । अत: अब पीछेसे अपने लिये आगान किये हुए अपने इस अन्नमेंसे हमें भी भाग प्राप्त कराओ, ‘ आभजस्व ' में णिच्का श्रवण न होना छान्दस है । अर्थात् हमें भी अन्नका भागी बनाओ । " तब उनसे इतर - मुख्य प्राणने कहा, " वे तुम, यदि अन्नप्राप्तिके इच्छुक हो तो सब ओरसे अभिमुख भावसे मुझमें प्रवेश कर जाओ । " प्राणके इस प्रकार कहनेपर वे ' बहुत अच्छा ' ऐसा कहकर उस प्राणमें निश्चय ही उसे सब ओरसे घेरकर प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार प्राणकी आज्ञासे प्रविष्ट हुए उन सबकी, जो प्राणके द्वारा खाया जाता है वह प्राणकी स्थिति करने-वाला अन्न ही तृप्ति करनेवाला होता है । वागादिका स्वतन्त्रतासे अन्नके साथ सम्बन्ध नहीं होता ।

पृष्ठ 142

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१३६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ तस्माद्युक्तमेवावधारणम् अने-नैव तदद्यत इति । तदेव चाह-तस्माद्यस्मात्प्राणाश्रयतयैव प्राणा-नुज्ञयाभिसन्निविष्टा वागादि-देवताः तस्माद्यदन्नमनेन प्राणे-नाति लोकस्तेनान्नेनैता वागा द्यास्तुष्यन्ति । वागाद्याश्रयं प्राणं यो वेद वागादयश्च पञ्च प्राणाश्रया इति तमप्येवमेवं ह वै स्वा ज्ञातय अभिसंविशन्ति वागादय इव प्राणम् । ज्ञातीनामाश्रयणीयो भवतीत्यभिप्रायः । अभिसन्नि विष्टानां च स्वानां प्राणवदेव । वागादीनां स्वान्नेन भर्ता भवति । तथा श्रेष्ठः पुरोऽग्रत एता गन्ता भवति वागादीनामिव प्राणः । तथान्नादोऽनामयावीत्यर्थः । अ-धिपतिरधिष्ठाय च पालयिता स्वतन्त्रः पतिः प्राणवदेव वागा- । ब्र अत: “ वह अन्न प्राणके ही द्वारा खाया जाता है ” ऐसा निश्चय द करना उचित ही है । वही बात श्रुति भी कहती है- अतः क्योंकि A प्राणके आश्रित रहकर ही प्राणकी आज्ञासे बागादि देवता उसमें प्र प्रविष्ट हुए हैं इसलिये लोक अन श्रा यानी प्राणके द्वारा जो अन्न खाते भा हैं उसी अन्नसे ये वागादि भी तृप्त होते हैं ।वागादिके आश्रयभूत प्राणको पय जो ' वागादि पाँच प्राणके आश्रित भव हैं ' इस प्रकार जानता है उसको पुन भी इसी प्रकार ज्ञातिजन सब ओरसे मेच आश्रित करते हैं, जैसे प्राणको वागादि । तात्पर्य यह है कि वह अपने ज्ञातियोंका आश्रय होने योग्य मेव हो जाता है । तथा वागादिके भर्ता प्राणके समान वह भी अपने आश्रित या ज्ञातिजनोंका अपने अन्नद्वारा भरण च्छ करनेवाला होता है; तथा वह उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे जाने- तुट्ट वाला होता है, जैसे वागादिके आगे प्राण । इसी तरह वह अन्नाद अर्थात् अनामयावी ( निरामय— येभ व्याधिशून्य ) और अधिपति -- -वागादिके अधिपति प्राणके स्वत समान ही ज्ञातिजनोंका अधिष्ठाता विज्ञ होकर पालन करनेवाला अर्थात् स्वतन्त्र स्वामी होता है

पृष्ठ 143

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[ अध्याय १ प्राण ही " ऐसा निश्चय | वही बात - अतः क्योंकि.. रही प्राणकी देवता उसमें ये लोक अन अन्न खाते गादि भी तृप्त भूत प्राणको के आश्रित है उसको जन सब ओरसे जैसे प्राणको ह है कि वह य होने योग्य गादिके भर्ता अपने आश्रित -नद्वारा भरण तथा वह आगे जाने-वागादिके -ह वह अन्नाद निरामय-अधिपति--ति प्राणके का अधिष्ठाता चाला अर्थात् होता है ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभायार्थ १३७ दीनाम् । य एवं प्राणं वेद तस्यै-तद्यथोक्तं फलं भवति । किञ्च य उ हैवंविदं प्राणविदं प्रति स्वेषु ज्ञातीनां मध्ये प्रतिः प्रतिकूलो बुभूषति प्रतिस्पर्धी भवितुमिच्छति, सोऽसुरा इव प्राणप्रतिस्पर्धिनो न हैवालं न पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणीयेभ्यो भवति भर्तुमित्यर्थः । अथ पुनर्य एव ज्ञातीनां मध्ये एत-मेवंविदं वागादय इव प्राणम् अनु अनुगतो भवति, यो वैत-मेवंविदमन्वेवानुवर्तयन्नेव आत्मी-यान्भार्यान् बुभूषति भर्तुमि-च्छति, यथैव वागादयः प्रारणा-जुवृश्यात्मबुभूषत्र आसन् । स हैवालं पर्याप्तो भार्येभ्यो भरणी-येभ्यो भवति भर्तुं नेतरः स्वतन्त्रः । सर्वमेतत्प्राणगुण-विज्ञानफलमुक्तम् ॥ १८ ॥

| जो प्राणको इस प्रकार जानता है उसे उपयुक्त फल मिलता है । इसके सिवा स्वजनों यानी ज्ञातियोंमेंसे जो भी इस प्रकार जाननेवाले इस प्राणवेत्ता प्रति प्रतिकूल यानी उसका प्रतिस्पर्धी होना चाहता है वह प्राणके प्रति-स्पर्धी असुरोंके समान अपने भर-णीयों ( आश्रितों ) का भरण करने-में अलम् अर्थात् समर्थ नहीं होता । तथा ज्ञातियोंमेंसे जो भी, प्राण अनुगामी वागादिके समान, इस प्रकार जाननेवाले इस प्राणवेत्ताका अनु — अनुगत होता है अर्थात् जो भी इस प्राणवेत्ताका अनुवर्तन करते हुए ही अपने आत्मीय यानी भरणी-योंका भरण करनेकी इच्छा करता है, जिस प्रकार कि वागादि प्राणका अनुवर्तन करते हुए अपनेको भरण करनेके इच्छुक थे, वह अपने भरणीयोंके प्रति उनका भरण करनेमें अलम् अर्थात् समर्थं होता है, अन्य जो स्वतन्त्र है वह ऐसा करने में समर्थ नहीं होता । यह सब प्राणके गौण विज्ञानका फल कहा गया है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 144

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१३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ ब्रा प्रारणके आङ्गिरसत्वकी उपपत्ति य कार्यकरणानामात्मत्वप्रतिपा-दनाय प्राणस्थाङ्गिरसत्वमुपन्यस्तं सोऽयास्य आङ्गिरस इति । अस्माद्धेतोरयमाङ्गिरस इत्याङ्गि-रसत्वे हेतुनकः । तद्धेतुसिद्ध-द्यर्थमारभ्यते, तद्धेतुसिद्धयायत्तं हि कार्यकरणात्मत्वं प्राणस्य । अनन्तरं च वागादीनां प्राणा-धीनतोक्ता सा च कथमुपपाद-नीया १ इत्याह-भूत और इन्द्रयोंका आत्मत्व रा प्रतिपादन करनेके लिये ' सोऽयास्य आङ्गिरसः इस वाक्यसे प्राणके इ आङ्गिरसत्वका उल्लेख किया था । किंतु यह इसलिये आङ्गिरस है— ता इस प्रकार इसकी आङ्गिरसतामें हेतु नहीं बताया गया था । उस हेतुकी सिद्धिके लिये अब आरम्भ रस किया जाता है; क्योंकि उसके हि हेतुकी सिद्धिके अधीन ही प्राणी प्रॉ कार्यकरणरूपता है । आङ्गिरसत्वके पश्चात् जो वागादिकी प्राणाधीनता वा बतलायी गयी है उसका उपपादन वा किस प्रकार किया जा सकता है? सो बतलाते हैं-सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गाना हि रसः प्राणो वा I अङ्गानां रसः प्राणो हि वा अङ्गाना रसस्तस्माद्यस्मात्क- उप स्माच्चाङ्गात्प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष हि वा द्यत अङ्गाना रसः ॥ १६ ॥

वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि वह अङ्गोंका रस ( सार ) यस है । प्राण ही अङ्गका रस है, निश्चय प्राण ही अङ्गोंका रस है; क्योंकि ङ्गग जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण कर जाता है, वह उसी जगह सूख जाता है, अत: यही अङ्गों का रस है ॥ १६ ॥

सोऽयास्य आङ्गिरस इत्यादि । ‘ सोऽयास्य आङ्गिरसः ' इत्यादि उत

पृष्ठ 145

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अध्याय १ का आत्मत्व ये ' सोऽयास्य यसे प्राणके किया था । ङ्गिरस है— आङ्गिरसतामें था । उस अब आरम्भ नोंकि उसके ही प्राणी आङ्गिरसत्वके प्राणाधीनता का उपपादन सकता है? प्राणो वा द्यस्मात्क-हिवा रस ( सार ) है; क्योंकि सी जगह सूख रसः ' इत्यादि ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ यथोपन्यस्तमेवोपादीयते उत्त । रार्थम् ' प्राणो वा अङ्गानां रसः ' इत्येवमन्तं वाक्यं यथाव्याख्या-तार्थमेव पुनः स्मारयति । कथम्? ' प्राणो वा अङ्गानां रसः ' इति । ' प्राणो हि'-हिशब्दः प्रसिद्धौ - अङ्गानां रसः । प्रसिद्धमेतत्प्राणस्याङ्गरसत्वं न वागादीनाम् । तस्माद्युक्तं प्राणो वा इति स्मारणम् । कथं पुनः प्रसिद्धत्वम् १ इत्यत आह । तस्माच्छब्द उपसंहारार्थ उपरित्वेन सम्बध्यते । यस्मा-द्यतोऽवयवात्कस्मादनुक्तविशेषात्, यस्मात्कस्माद्यतः कुतश्चिच्चा-ङ्गाच्छरीरावयवाद विशेषितात्प्राण १. अर्थात् इस वाक्यका अन्वय इस १३ ९ वाक्यका जिस प्रकार पहले उल्लेख हो चुका है उसीको अब श्रुति उत्तर देनेके लिये ग्रहण करती है । ' प्राणो वा अङ्गानां रसः ' यहाँतकके वाक्यका ऊपर की हुई व्याख्याके अनुसार ही श्रुति पुनः स्मरण कराती है । किस प्रकार स्मरण कराती है? प्राण ही अङ्गोंका रस है— इस प्रकार । ' प्राणो हि ' इसमें ' हि शब्द प्रसिद्धिके अर्थमें है । अङ्गोंका रस है । प्राणका ही यह अङ्गरसत्व प्रसिद्ध है, वागादिका नहीं । अतः ' प्राणो वै ' इस प्रकार उसका स्मरण करना उचित ही है । किंतु, उसकी प्रसिद्धि प्रकार है? सो श्रुति अब बतलाती है । ' तस्मात् ' शब्द उपसंहारके लिये है; अत: वह उपरित्वभावसे [ आगेके वाक्यसे ] सम्बन्ध रखता है । ' यस्मात् ' — जिस अवयवसे और ' कस्मात् ' जिसका विशेष बतलाया नहीं गया ऐसे किसी भी अवयवसे । अतः यस्मात् - कस्मात् - जिस - किसी भी अविशेषित अङ्ग यानी शरीरके प्रकार है -- ' यस्मात्कस्माच्चाङ्गात्प्राणः उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यति तस्मादेष हि वा अङ्गानां रस:। '

पृष्ठ 146

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१४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय १ उत्क्रामत्यपसर्पति तदेव तत्रैव । तदङ्गं शुष्यति नीरसं भवति शोष-मुपैति । तस्मादेष हि वा अङ्गानां रस इत्युपसंहारः । अतः कार्यकररणानामात्मा प्राणइत्येतत्सिद्धम् । आत्मापाये हि शोषो मरणं स्यात्तस्मात्तेन जीवन्ति प्राणिनः सर्वे । तस्माद पास्य वागादीन्प्राण एवोपास्य इति समुदायार्थः ॥ १ ९ ॥ अवयवसे प्राण उत्क्रान्त - अपसर्पित हो जाता है वह अङ्ग वहाँ ही शुष्क— नीरस हो जाता है अर्थात् सूख जाता है । अतः निश्चय यही अङ्क्षों-का रस है - ऐसा इसका उपसंहार है । इससे यह सिद्ध होता है कि प्राण भूत और इन्द्रियोंका आत्मा है । आत्माका वियोग होनेपर ही शोष - मरण होता है; अतः समस्त प्राणी उसीसे जीवित रहते हैं । इसलिये वागादि समस्त प्राणोंको त्यागकर प्राण ही उपासनीय है-यह इसका समुदायार्थं है ॥ १६ ॥

प्रारण बृहस्पतित्वकी उपपत्ति न केवलं कार्यकरणयोरेवात्मा प्राणो रूपकर्मभूतयोः । किं तर्हि? ऋग्यजुःसाम्नां नामभूतानामा-रमेति सर्वात्मकतया प्राणं स्तुव न्महीकरोत्युपास्यत्वाय-प्राण रूपात्मक पञ्चभूतों और कर्मभूत ' इन्द्रियोंका ही आत्मा नहीं है तो और किसका है? वह नाम स्वरूप ऋक्, यजुः और सामका भी आत्मा है । इस प्रकार सर्वात्मकता-द्वारा प्राणकी स्तुति करते हुए वेद उसके उपास्यत्वके लिये उसे महि-मान्वित करता है । एष एव उ बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥

यह ही बृहस्पति है । वाक् ही बृहती है; उसका यह पति है; इसलिये यह बृहस्पति है ॥ २० ॥।

१. प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय होनेके कारण स्थूलशरीर अर्थात् भूत रूपात्मक और ज्ञान तथा क्रियाकी शक्तिवाली होनेसे इन्द्रियाँ कर्म हैं । ब्र ब इत छ वा ( श्र छ बा क्त S 462 वि वा ब त नो पा ज वा ग

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श्रध्याय १ -अपसर्पित _ ही शुष्क— अर्थात् सूख यही अङ्गों-उपसंहार है । ता है कि का आत्मा होनेपर ही अतः समस्त रहते हैं | प्राणोंको सनीय है-है ॥१६ ॥

भूतों और आत्मा नहीं ? वह नाम सामका भी सर्वात्मकता-करते हुए वेद ये उसे महि स्या एवं पति है; भूत रूपात्मक ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१ एष उ एंव प्रकृत आङ्गिरसो बृहस्पतिः । कथं बृहस्पतिः? इत्युच्यते-- वाग्वै बृहती बृहती छन्दः षट्त्रिंशदक्षरा । अनुष्टुपच वाक् । कथम्? “ वाग्वा अनुष्टुप् ” ( नृसिं ० पू ० १ । १ ) इति श्रुतेः । सा च वागनुष्टुब्बृहत्यां छन्दस्यन्तर्भवति । अतो युक्तं वाग्वै बृहतीति प्रसिद्धवद्ध क्तुम् । बृहत्यां च सर्वा ऋचो -ऽन्तर्भवन्ति प्राणसंस्तुतत्वात् । " प्राणो बृहती प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ” इति श्रुत्यन्तरात् । वागात्मत्वाच्चच प्राणेऽन्तर्भावः । तत्कथम्? इत्याह - तस्या वाचो बृहत्या ऋच एष प्राणः पतिः । यह प्राण ही प्रकृत आङ्गिरस बृहस्पति है । किस प्रकार बृहस्पति है? सो बतलाया जाता है -- वाक् ही बृहती - छत्तीस अक्षरोंवाली बृहत्ती छन्द है । वाक् अनुष्टुप् भी है । किस प्रकार? " वाक् ही अनुष्टुप् है " इस श्रुतिके अनुसार । किंतु वह अनुष्टुप् वाक् बृहती छन्द-में अन्तर्भूत हो जाती है । ' अतः वाक् ही बृहती है ' इस प्रकार प्रसिद्धके समान कहना उचित ही है । " प्राण वृहती है, प्राण ऋक् है - इस प्रकार ही जाने " इस अन्य श्रुतिसे प्राणरूपसे बृहतीकी स्तुति की जानेके कारण बृहतीमें भी समस्त ऋचाओंका अन्तर्भाव हो जाता है । समस्त ऋचाएँ वागुरूपा हैं, इसलिये भी उनका प्राणमें अन्त-र्भाव होता है । सो किस प्रकार? इसपर श्रुति कहती है— उस वाक्का — बृहतीका यानी ऋक्का यह प्राण पति है, क्योंकि यही उसको ' अभिव्यक्त तस्या निर्वर्तकत्वात् । कौष्ठ्याग्नि- करनेवाला है— जठराग्निद्वारा प्रेरितमारुतनिवेर्त्या हि ऋक् । प्रेरित वायुसे ही ऋक् निष्पन्न होती है अथवा वाणीका पालन पालनाद्वा वाचः पतिः । प्राणेन करनेके कारण यह उसका १. जठराग्निद्वारा प्रेरित जो शरीरान्तर्गत प्राणवायु है वही ऊपरकी ओर जाकर कण्ठादिसे आहत हो वर्णोंके रूपमें अभिव्यक्त होता है । देवताधिकरणमें वाक्को प्राणात्मिका ही निश्रित किया गया है और ऋक् वागात्मिका बतलायी गयी है इसलिये उसका प्राणमें अन्तर्गत होना उचित ही है ।

पृष्ठ 148

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बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ १४२ हि पाल्यते वाक् । अप्राणस्य । शब्दोच्चारणसामर्थ्याभावात् । तस्मादु बृहस्पतिर्ऋचां प्राण आत्मेत्यर्थः ॥ २० ॥

BAL पति है । प्राणसे ही वाणीका पालन होता है, क्योंकि प्राणहीनको

शब्दोच्चारणकी शक्ति नहीं होती ।

अतः यह बृहस्पति यानी ऋचाओं-का प्राण अर्थात् आत्मा है ॥ २० ॥

प्राणके ब्रह्मणस्पतित्वकी उपपत्ति तथा यजुषाम् । कथम्? इसी प्रकार यह यजुर्मन्त्रोंका भी आत्मा है । किस प्रकार? एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः यह ही ब्रह्मणस्पति है । वाक् इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है ॥ २१ ॥

एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । चाग्वै ब्रह्म, ब्रह्म यजुः, तच्च चाग्विशेष एव । तस्या वाचो यजुषो ब्रह्मण · एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः पूर्ववत् । कथं पुनरेतदवगम्यते बृहती-ब्रह्मणोर्ऋग्यजुष्ट्वं न पुनरन्यार्थ-त्वम् १ इत्युच्यते — वाचोऽन्ते सामसामानाधिकरण्यनिर्देशात् “ वाग्वै साम? ( १ । ३ । २२ ) इति ॥ २१ ॥

ही ब्रह्म है, उसका यह पति है, यह ही ब्रह्मणस्पति है । वाक् ही ब्रह्म है । ब्रह्म अर्थात् यजु: है, क्योंकि वह भी एक प्रकारकी वाणी ही है । उस वाक् – यजुः यानी ब्रह्मका यह पति है; इसलिये पूर्ववत् यह ब्रह्मणस्पति है । किंतु यह कैसे जाना जाता है । कि बृहती और ब्रह्म क्रमशः ऋक् और यजुः के ही वाचक हैं, इनका कोई दूसरा अर्थ नहीं है? इसपर कहा जाता है - अन्तमें [ अर्थात् आगे चलकर ] “ वाग्वै साम ” इस वाक्यद्वारा वाणीका सामके साथ । सामानाधिकरण्य दिखलाया है । ब्राह तथ ब्रह्म कर प ॠग ग्वि ऋग सम इति तथ अरि पत्ते वे श्रुत

पृष्ठ 149

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ध्याय १ वाणीका Ta

होती ।

ऋचाओं-॥२० ॥

जुर्मन्त्रोंका र? त्या एष - पति है, है । वाक् यजु: है, रकी वाणी जुः यानो लिये पूर्ववत् T जाता है मशः ऋक् हैं, इ ? इसपर [ अर्थात् साम " इस TH के साथ चलाया है । ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ तथा च ' वाग्वै बृहती ' ' वाग्वै । ब्रह्म ' इति च वाक्समानाधि-करणयोर्ऋग्यजुष्ट्वं युक्तम् । परिशेषाच्च - साम्नि अभिहिते ऋग्यजुषी एव परिशिष्टे । वा-ग्विशेषत्वाच्च - वाग्विशेषो हि ' ऋग्यजुष ' । तस्मात् तयोर्वाचा समानाधिकरणता युक्ता । अविशेषप्रसङ्गाच्च - सामोद्गीथ इति च स्पष्टं विशेषाभिधानत्वम्, तथा बृहतीब्रह्मशब्दयोरपि विशे-बाभिधानत्वं युक्तम् । अन्यथा अनिर्धारित विशेषयोरानर्थक्या-पत्तेश्व विशेषाभिधानस्य वाङ्मात्र-वे चोभयत्र पौनरुक्त्यात् । ऋग्यजुः सामोद्गीथशब्दानां च श्रुतिष्वेवक्रमदर्शनात् । २१ ॥ १४३ उसीके समान ' वाग्वै बृहती ' ' वाग्वै ब्रह्म ' इन वाक्योंमें जो वाक्के समानाधिकरण [ बृहती और ब्रह्म ] हैं उसका ऋक् और यजुः होना उचित ही है । यही बात परिशेषसे भी सिद्ध होती है— सामके कह देनेपर ऋक् और यजुः ही परिशिष्ट ( शेष ) रहते हैं । तथा वाग्विशेष होनेसे भी यही बात मालूम होती है - ऋक् और यजुः ये वाग्विशेष ही हैं । अतः वाणीके साथ उन दोनोंका समानाधिकरण होना उचित ही है । इसके सिवा [ बृहती और ब्रह्मका रूढ अर्थं लेनेसे ] अविशेषका प्रसत होगा । [ आगे ] साम और उद्गीथ कहकर स्पष्टतया विशेषका उल्लेख किया है, उसी प्रकार बृहती और ब्रह्म शब्दोंका भी विशेष अर्थ बतलाना आवश्यक है । अन्यथा विशेषका निश्चय न होनेसे उनकी निरर्थकता ही सिद्ध होगी । यदि उनका विशेष वाक् ही बतलाया जाय तो दोनों जगह पुनरुक्तिका प्रसङ्ग होगा । तथा ऋक्, यजुः, साम और उद्गीथ – इन शब्दोंका श्रुतियोंमें ऐसा ही क्रम देखा गया हैं । [ इसलिये बृहती और ब्रह्म शब्द क्रमशः ऋक् और यजु: के ही वाचक हैं ] ॥२१ ॥

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१४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १ प्रारणके सामत्वकी उपपत्ति एष उ एव साम वाग्वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वेव समः प्लुषिणा समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते साम्नः सायुज्य सलो-कतां य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥

यह ही साम है । वाक् ही ' सा ' है और यह ( प्राण ) ' अम ' है । ' सा ' और ' अम ' ही साम हैं; यही सामका सामत्व है; क्योंकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान इससे यह साम है । जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है ॥ २२ ॥

एष उ एव साम । कथम् १ इत्याह- ' यही साम है । किस प्रकार? वाग्वै सा यत्किञ्चित्स्त्रीशब्दा- सो बतलाते हैं - वाक् ही ' सा ' है । ब्राह्म उ ० वाक् शब्द समुद्र नाि उच्य च त्वा प्राण वाव तत्त जो कुछ भी स्त्रीशब्दवाच्य है वह स्व भिधेयं सा वाक् । सर्वस्त्रीशब्दा- वाक् है । ' सा ' यह सर्वनाम शब्द त भिधेयवस्तुविषयो हि सर्वनाम समस्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओंको विषय ' सा ' शब्द: । तथा श्रम एष करता है । तथा ' अम ' यह प्राण वक्ष प्राणः । सर्वपुंशब्दाभिधेयवस्तु है । ' अम ' शब्द समस्त पुल्लिङ्ग- सा विषयोऽमः शब्दः । “ केन मे शब्दोंद्वारा कही जानेवाली वस्तुओं- सा को विषय करता है । " [ यदि कोई पौंस्नानि नामान्याप्नोषीति, पूछे ] मेरे पुंल्लिङ्ग नामोंको तू किसके प्राणेनेति ब्रूयात्केन द्वारा प्राप्त करता है? तो ‘ प्राणसे ' प्र मे स्त्रीना- ऐसा कहे और [ यदि पूछे कि ] स्त्रीलिङ्ग मांनीति वाचा " ( कौषी ० | नामोंको किससे प्राप्तकरता है तो