बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1351–1360
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1351–1360
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[ श्रध्याय६ ग्रहण करने चाहिये। सो बतलाये जाते तिल, माष, अणु शब्दके वाच्य अणु एक भेद ) है तथा किसी देश में कङ्ग ब्दसे प्रसिद्ध है । पाव लोकमें वल्ल से कहे जाते है । यों ( कुलथी ) को के अतिरिक्त जो हैं, उन्हें छोड़कर ओषधियां और हये -- यह हम कह य कर्म जन्म लेनेवाला, जिस क्या हुआ अथवा जिन को प्राप्त हुआ पुत्र ये ' श्रीमन्थ ' कर्मका संतान उत्पन्न करनेकी 1 ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ पितुश्च लोकपो भवतीति तरसम्पादनाय ब्राह्मणमारभ्यते । प्राणदर्शिनः श्रीमन्थं कर्म कृतवतः पुत्रमन्थेऽधिकारः । यदा पुत्र-मन्थं चिकीर्षति तदा श्रीमन्थं कृत्वर्तुकालं पन्थाः प्रतीक्षत इत्येतद्रेतस ओषध्यादिरसतमत्व-स्तुत्यावगम्यते-१३३५ अपने तथा पिताके लिये लोक-परलोक में हितकारी होता है; वैसे पुत्रकी उत्पत्ति कैसे हो? यह बताने के लिये अथवा ऐसे पुत्रकी प्राप्ति के उपायका सम्पादन करनेके लिये यह चतुर्थं ब्राह्मण प्रारम्भ किया जाता है । जिस प्राणोपासक पुरुषने श्रीमन्य कर्मका सम्पादन कर लिया है, उसीका पुत्रमन्थ-कर्ममें अधिकार है । साधक जब पुत्रमन्थ करना चाहता है, तब वह श्रीमन्थ - कर्मका अनुष्ठान करके पत्नी के ऋतुकालकी प्रतीक्षा करता है; यह बात रेतस् ( शुक्र ) को ओषधि आदिका रसतम ( सारतम ) बताकर उसकी प्रशंसा करनेसे जानी जाती है-एषां वै भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो-S पामोषधय ओषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः पुरुषस्य रेतः ॥ १ ॥
इन भूतों का रस पृथिवी है, पृथिवीका रस जल है, जलका रस-ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुष्प है, पुष्पोंका रस फल है, फलोंका रस ( आधार ) पुरुष है तथा पुरुषका रस ( सार ) शुक्र है ॥ १ ॥
एषां वै चराचराणां भूतानां इन चर - अचर समस्त भूतों-का रस - पारभूत तत्त्व पृथिवी पृथिवी रसः सारभूतः, सर्वभूतानां । है; क्योंकि ' पृथिवी सब भूतोंका मध्विति युक्तम् 1 । पृथिव्या आपो मधु ( सार ) है ', यह बात म रसः अप्सु हि पृथिव्योता च । ब्राह्मणमें कह आये हैं । पृथिवो-
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१३३६ वृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय प्रोता च । अपामोषधयो रसः कार्यत्वाद् रसत्वमोषध्यादीनाम् । श्रोषधीनां पुष्पाणि पुष्पाणां फलानि फलानां पुरुषः; पुरुषस्य रेतः । " सर्वेभ्यो-ऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् " ( ऐतरेय ० २ । १ । १ ) इति श्रुत्यन्तरात् ॥ १ ॥
६ का रस जल है; क्योंकि पृथिवी ब्राह जलमें ओतप्रोत है । जलका ओषधियाँ ( अन्न ) है । जलका कार्य र होनेके कारण ओषधियोंको उसका ईक्षा रस बताया गया है । ओषधियों का रस फूल, फूलोंका रस फल, फलों- वां का रस पुरुष और पुरुषका रस रेतस् ( शुक्र ) है । यह बात ' यह कम वीर्यं पुरुषके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न तक्ष्म हुआ तेज है ' इस दूसरी श्रुतिसे भी प्रमाणित होती है ॥ १ ॥ श्रेष्ठ
यत एवं सर्वभूतानां सारतम- यदि इस प्रकार यह रेतस् ( वीर्य ) सम्पूर्ण भूतों का सारतम क्ल मेतद् रेतोऽतः का नु खन्वस्य तत्त्व है, तो इसके आधान के योग्य प्रकृ योग्या प्रतिष्ठेति- प्रतिष्ठा ( आधारभूमि ) क्या है? सोम ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं- का स ह प्रजापतिरीक्षांचक्रे हन्तास्मै प्रतिष्ठां कल्पयानीति स स्त्रिय ँ ससृजे ताँ सृष्ट्वाध उपास्त मुद प्रति तस्मात् स्त्रियमध उपासीत स एतं प्राञ्चं ग्रावाणमात्मन संस एव समुदपारयत्तेनैनामभ्यसृजत ॥ २ ॥
सुप्रसिद्ध प्रजापतिने विचार किया कि मैं इस वीर्यकी स्थापना के लिये यदि किसी योग्य प्रतिष्ठा ( आघार - भूमि ) का निर्माण करूँ, अत: उन्होंने स्त्रीकी आव सृष्टि की । उसकी सृष्टि करके उन्होंने उसके अधोभागकी उपासना की हो, ( मैथुनकर्मवा विधान किया ); अतः स्त्रीके अधोभागकी उपासना ( सेवन ) असं करे । प्रजापतिने इस उत्कृष्ट गतिशील प्रस्तरखण्ड - सदृश शिश्नेन्द्रियको यह ( उत्पन्न करके उसे ) स्त्रीकी ( योनिकी ) ओर प्रेरित किया, उससे इस विष नर-का संसर्ग किया ॥ २ ॥
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[ अध्याय६ क्योंकिपृथिवी है । जलका रस है । जलका कार्य षधियोंकोउसका है । ओषधियों का - रस फल, फलों-र पुरुषका रस । यह बात ' यह अङ्गोंसे उत्पन्न दूसरी श्रुतिसे भी ॥ १ ॥
कार यह रेतस् भूतों का सारतम आधान के योग्य मि ) क्या है? पर कहते हैं-मै प्रतिष्ठां वाध उपास्त वाणमात्मन ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३७ स ह स्रष्टा प्रजापतिरीक्षाञ्चक्रे । ईक्षां कृत्वा स स्त्रियं ससृजे । तां च सृष्ट्वाध उपास्त मैथुनाख्यं कर्माधउपासनं नाम कृतवान् । तस्मात् स्त्रियमध उपासीत । श्रेष्ठानुश्रयणा हि प्रजाः । अत्र वाजपेयसामान्य-क्लृप्तिमाह - – स एतं प्राचं प्रकृष्टगतियुक्तमात्मनो ग्रावाणं सोमाभिषवो पलस्थानीयं काठिन्यसामान्यात् प्रजननेन्द्रिय-सुदपारय दुत्पूरितवान् स्त्रीव्यञ्जनं प्रति तेनैनां स्त्रियमभ्यसृजदद्भि संसर्ग कृतवान् ॥ २ ॥
उस सुप्रसिद्ध सृष्टिकर्ता प्रजा-पतिने विचार किया । विचार करके उन्होंने स्त्रीकी सृष्टि की । उसकी सृष्टि करके अधोभागकी उपासना की । मैथुन नामक कर्म-का ही नाम अधोभागको उपासना है; उसीको सम्पन्न किया । इस-लिये स्त्रीके अधोभागकी उपासना ( सेवन ) करे; क्योंकि सारी प्रजा श्रेष्ठ पुरुषके आचार - व्यवहारका अनुकरण करनेवाली होती है । इस मैथुन- कर्ममें वाजपेय यज्ञ-की समानताकी कल्पना करते हैं-उन प्रजापतिने इस प्रकृष्ट गतियुक्त लोढेको, सोमरस निकालनेके लिये उपयोग में लाये जानेवाले प्रस्तर-खण्डके समान अपने शिश्न – जननेन्द्रियको, जो मैथुनकालमें कठोर हो जाता है, उत्पूरित किया — स्त्री - योनि की ओर प्रेरित किया । उस जननेन्द्रियसे इस स्त्रो का संसर्ग किया ' ॥ २ ॥
स्थापना के लिये तः उन्होंने स्त्रीकी की उपासना की उपासना ( सेवन ) T शिश्नेन्द्रियको , उससे इस स्त्री-१. सृष्टि कार्य में इस क्रियाकी अत्यन्त आवश्यकता है । भोगबुद्धिसे न होकर यदि केवल उत्तम संतानोत्पादन के लिये यह क्रिया हो तो वह धर्मसम्मत है और आवश्यक है । इस क्रिया में प्राणिमात्रकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है । यह प्रवृत्ति संयमित हो, भोगार्थ न होकर केवल संतानोत्पादनार्थ हो, पुरुषों की स्वेच्छाचारिता और असंयमका निरोध हो, शुभ एवं श्रेष्ठ संतानोत्पादन के विज्ञानसे लोग परिचित हों; पतन करनेवाली पाशविक क्रियामात्र न रहकर लाक - कल्याणकारी यह मनुष्यका तथा निर्माण में सफल साधन हो, इसीके लिये शास्त्रनें इस नर - रत्नोंके उत्पादन प्राप्तःस्मरणीय महान् पुरुषांका विषयका स्पष्ट विधान किया गया है । ' जगत्के
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१३३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ तस्या वेदिरुपस्थो लोमानि बर्हिमधव समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन हि यजमानस्य लोको भवति तावानस्य लोको भवति य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासा स्त्रीणा सुकृतं वि वृङ्क्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं चरत्यास्य स्त्रियः f सुकृतं वृञ्जते ॥ ३ ॥
स्त्रीकी उपस्थेन्द्रिय वेदी है, वहाँके रोएँ कुशा हैं, योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है, योनिके पार्श्वभाग में जो दो कठोर मांसखण्ड है उनको मुष्क कहते हैं, वे दोनों मुष्क ही ' अधिषवण ' नामसे प्रसिद्ध चर्ममय सोम-फलक हैं । वाजपेय यज्ञ करनेसे यजमानको जितना पुण्यलोक प्राप्त होता है, उतना ही उसे भी प्राप्त होता है । जो कि इस प्रकार जानकर मैथुनका a आचरण करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और f जो इसे नहीं जानता है, वह यदि पुण्यको अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥
तस्या वेदिरित्यादि सर्वं सामान्यं प्रसिद्धम् । समिद्धो-ऽग्निर्मध्यतः स्त्रीव्यञ्जनस्य तौ सुष्कावधिषवणफलके इति व्यव-मैथुन करता है तो स्त्रियाँ ही उसके ' तस्या वेदिः ' इत्यादि सभी समानताएँ प्रसिद्ध हैं । स्त्री - योनिका मध्यभाग प्रज्वलित अग्नि है । वे दोनों मुष्क ( योनि के पार्श्वभागके युगल मांसखण्ड ) ' अधिषवण ' नाम-से प्रसिद्ध सोमफलक हैं; इस प्रकार | ' चर्माधिषवणे ' पदका दूरस्थित उत्पत्तिमें यही विज्ञान साधन स्वरूप रहा है । अतएव इसको जानकर ही प्रत्येक पुरुष इसके द्वारा विश्व - कल्याण में सहायक हो सकता है । अवश्य ही यह विज्ञान उन्हीं लोगोंके लिये है, जो प्रजोत्पादनके योग्य गृहस्थ आश्रममें तथा तरुण - अवस्थामें हैं । ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, यति एवं वालक - वृद्धोंके लिये अथवा संसारसे सर्वथा विरक्त पुरुषोंके लिये यह विषय त्याज्य है । इस विज्ञानके प्रतिपादनमें उन वाक्यों या शब्दोंका आना अनिवार्य है, जो अश्लील समझे जाते हैं; क्योंकि उसी विषयको समझाना है; अतएव इस प्रसंगके पाठक इसी दृष्टिसे इसको पढ़ें और सोचें ।
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[ अध्याय६ धर्माधिषवणे वै वाजपेयेन को भवतिय सुकृतं व्यास्य स्त्रियः निका मध्यभाग सखण्ड है उनको द्ध चर्ममय सोम-लोक प्राप्त होता जानकर मैथुनका र लेता है और स्त्रियाँ ही उसके इत्यादि सभी हैं | स्त्री - योनिका अग्नि है । वे के पार्श्वभाग के अधिषवण ' नाम-क हैं; इस प्रकार नका दूरस्थित जानकर ही प्रत्येक चय ही यह विज्ञान या तरुण - अवस्था में संसारसे सर्वथा नमें उन वाक्यों या कि उसी विषयको और सोचें । ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ ९ हितेन सम्बध्यते । वाजपेयया- । जिनो यावाँल्लोकः प्रसिद्धस्तावान् विदुषो मैथुनकर्मणो लोकः फल-मिति स्तूयते । तस्माद् बीभत्सा नो कार्येति । य एवं विद्वानधोपहासं चरत्यासां स्त्रीणां सुकृतं वृङ्क्त श्रावर्जयति । अथ पुनर्यो वाजपेयसम्पत्ति न जानात्य-विद्वान् रेतसो रसतमत्वं चाधोप-दासं चरति श्रास्य स्त्रियः सुकृत मावृञ्जतेऽविदुषः ॥ ३ ॥ ।
' तो मुष्कौ ' इन पदोंके साथ सम्बन्ध है । वाजपेय यज्ञद्वारा यजन करनेवालेको जितना लोक प्राप्त होता है, उतना ही लोक विद्वान के मैथुन कर्मका फल है, ऐसा कहकर यहाँ मैथुनकर्मकी स्तुति की जाती है; अत: इस घृणा नहीं करनी चाहिये । जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष मैथुनकर्म करता है, वह इन स्त्रियोंके पुण्यको अवरुद्ध कर लेता है और जो वाजपेय यज्ञ - सम्पादन-की प्रणालीको नहीं जानता है, रेतसको रसनम रूपमें नहीं अनुभव करता है, वह यदि मैथुनका सेवन करता है तो उस अज्ञानीके पुण्य-को स्त्रियाँ ही अवरुद्ध कर लेती हैं ॥ ३ ॥
एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक आरुणिराहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान्नाको मौद्गल्य आहैतद्ध स्म वै तद्विद्वान् कुमारहारित आह बहवो मर्या ब्राह्मणायना निरिन्द्रिया विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति य इदमविद्वा ँसो-ऽधोपहासं चरन्तीति बहु वा इद ँ सुप्तस्य वा जाग्रतो वा रेतः स्कन्दति ॥ ४ ॥
निश्चय ही इस मैथुनकर्मको वाजपेयसम्पन्न जाननेवाले अरुणनन्दन उद्दालक कहते हैं, इसे उस रूपमें जाननेवाले मुद्गलपुत्र नाक कहते हैं इसे उक्त रूपमें जाननेवाले कुमारहारित मुनि भी कहते हैं कि तथा
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१३४० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ बा ' बहुत से ऐसे मरणधर्मा नाममात्रके ब्राह्मण हैं, जो निरिन्द्रिय, सुकृतह और मैथुन - विज्ञान से अपरिचित होकर भी मैथुनकर्ममें आसक्तिपूर्वक प्रवृत्त होते हैं, वे परलोकसे भ्रष्ट हो जाते हैं । यदि पत्नीका ऋतुकाल प्राप्त होने. से पूर्वं इस प्राणोपासकका वीर्यं अधिक या कम सोते समय अथवा जागते समय गिर जाता है ( तो उसे निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करना चाहिये ) ॥ ४ ॥
एतद्ध स्म वै तद् विद्वानुद्दालक । ' आरुणिराहाघोपहासाख्यं मैथुन -कर्म वाजपेयसम्पन्नं विद्वानि स्पर्थः तथा नाको मौद्गन्यः कुमारहारितश्च किंत प्राहु: १ इत्युच्यते - बहवों मर्या मरण-धर्मिणो मनुष्या ब्राह्मणा अयनं येषां ते ब्राह्मणायना ब्रह्मबन्धवो जातिमात्रोपजीविन इत्येतत् । निरिन्द्रिया विश्लिष्टेन्द्रिया विसुकृतो विगतसुकृतकर्माणोऽ विद्वांसो मैथुन कर्मासक्ता इत्यर्थः । ते किमस्माल्लोकात् प्रयन्ति परलोकात् परिभ्रष्टा इति । मैथुनकर्मणो ऽत्यन्तपापहेतुत्वं दर्शयति - य इदमविद्वांसोऽ-घोपहासं चरन्तीति । अरुणनन्दन उद्दालक निश्चय ही इसको पूर्वोक्त रूपसे जानकर अर्थात् ' अधोपहास ' नामक मैथुन-कर्म वाजपेय यज्ञके महत्वसे सम्पन्न है, ऐसा जानकर तथा मुद्गलपुत्र नाक और कुमारहारित भी इसे उक्त रूपमें जानकर कहते हैं; वे क्या कहते हैं? यह बता रहे हैं-बहुत बहुत - - से से ऐसे ऐसे मर्य — मरणधर्मी मनुष्य ब्राह्मणायन — ब्राह्मण हैं अयन जिनके वे ब्रह्मबन्धु अर्थात् ब्राह्मण जातिका नाम लेकर जीने-वाले, निरिन्द्रिय- जिनकी इन्द्रियाँ संयुक्त न रहकर बिलग - बिलग बिखरी रहती हैं तथा विसुकृत्-पुण्यकर्म रहित अर्थात् मैथुन-विज्ञानसे अपरिचित होते हुए भी मैथुनकर्ममें आसक्त पुरुष हैं, वे क्या होते हैं? वे परलोकभ्रष्ट हो जाते हैं । मैथुन कर्म अत्यन्त पापका हेतु हे —यह दिखाते हैं- ' जो अविद्वान् इसे न जानते हुए भी मैथुनका सेवन करते हैं ' इत्यादि । का रेल प्रा प त प इस जो मैं ग्रह प्रक इन प्रा वी पे ना
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[ अध्याय६ य, सुकृतहीन क्तिपूर्वक प्रवृत्त प्राप्त होने. अथवा जागते श्चित करना लक निश्चय पसे जानकर नामक मैथुन-हत्त्वसे सम्पन्न नामुद्गलपुत्र रित भी इसे कहते हैं; वे बता रहे हैं--मरणधर्मी ब्राह्मण हैं बन्धु अर्थात् लेकर जीने-नकी इन्द्रियाँ बिलग - बिलग विसुकृत् -तमैथुन-होते हुए भी पुरुष हैं, वे लोकभ्रष्ट हो व्यन्त पापका ते हैं - ' जो जानते हुए करते हैं ' ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं श्रीमन्थं कृत्वा पत्न्या ऋतु-कालं ब्रह्मचर्येण प्रतीक्षते यदीदं रेतः स्कन्दति बहु चापं वा सुप्तस्य वा जाग्रतो वा राग-प्राबल्यात् ॥ ४ ॥
तदभिमृशेदनु वा १३४१ श्रीमन्थ करके जो ब्रह्मचर्य -पालनपूर्वक पत्नीके ऋतुकालकी प्रतीक्षा करता है, उसका यह वीर्यं यदि रागकी प्रबलताके कारण थोड़ा या अधिक, सोते समय अथवा जागते समय गिर जाय, ( तो वह निम्नाङ्कित प्रायश्चित्त करे ) ॥ ४ ॥
मन्त्रयेत यन्मेऽद्य रेतः पृथिवीमस्कान्त्सीद् यदोषधीरप्यसरद् यदपः । इदमहं तद्वेत आददे पुनर्मामेत्विन्द्रियं पुनस्तेजः पुनर्भगः । पुनरग्निर्धिष्ण्या यथास्थानं कल्पन्तामित्यनामिकाङ्गुष्ठा-भ्यामादायान्तरेण स्तनौ वा भ्रुवौ वा निमृज्यात् ॥५ ॥
उस वीर्यको हाथ से छूए तथा अभिमन्त्रित करे - स्पर्श करते समय इस प्रकार कहे — ' आज जो मेरा वीर्य स्खलित होकर पृथिवीपर गिरा है, जो पहले कभी अन्नमें भी गिरा है तथा जो जलमें पड़ा है उस इस वीर्यको मैं ग्रहण करता हूँ । ' ऐसा कहकर अनामिका और अङ्गुष्ठसे उस वीर्यंको ग्रहण करके दोनों स्तनों अथवा भौंहोंके बीच में लगावे | लगाते समय इस प्रकार कहे - ' ( जो स्खलित वीर्यरूपसे बाहर निकल गयी थी, वह मेरी ) इन्द्रिय पुनः मेरे पास लौट आवे । मुझे पुनः तेज और पुनः सौभाग्यकी प्राप्ति हो । अग्नि ही जिनके स्थान हैं, वीर्यको यथास्थान स्थापित कर दें ' ॥ तदभिमृशेदनुमन्त्रयेत वानुज-पेदित्यर्थः । यदाभिमृशति तदा-नामिकाङ्गुष्ठाभ्यां तद्रेत आदत्त वे देवगण पुनः मेरे शरीरमें उस ५ ॥ उसका स्पर्श एवं अनुमन्त्रण ( अभिमन्त्रण ) अर्थात् बार - बार जप करे । जब स्पर्श करे तब ' यन्मे... .. से लेकर आददे ' तक मन्त्र पढ़ कर अनामिका और अङ्गुष्टसे उस
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१३४२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्राह्म मदद इत्येवमन्तेन मन्त्रेण पुन- / वीर्यको हाथमें ले । फिर ' पुनर्माम् " -से लेकर........ निसृज्यात् ' तक मन्त्र श्री -ममित्येतेन निमृज्यादन्तरेण पढ़कर उस वीर्यको दोनों मध्ये भ्रुबौ भ्रुवोर्वा स्तनौ भौहों अथवा स्तनोंके बोचमें मध्ये स्तनयोर्वा ॥ ५ ॥ लगावे ' ॥ ५ ॥
अथ यद्युदक आत्मानं पश्येत्तदभिमन्त्रयेत मयि मलव तेज इन्द्रियं यशो द्रविण सुकृतमिति श्री वा यशि एषा स्त्रीणां यन्मलोद्वासास्तस्मान्मलोद्वाससं यशस्वि-भिग नीमभिक्रम्योपमन्त्रयेत ॥ ६ ॥
यदि कभी भूलसे जलमें वीर्य स्खलित हो जानेपर वहां अपनी परछाई कार्य ' देख ले, तब उस जलको इस प्रकार अभिमन्त्रित करे - – ' देवगण मुझमें त्रिरात्र तेज, इन्द्रिय ( वीर्यं ), यश, धन और सत्कर्मकी प्रतिष्ठा करें । ' [ तत्पश्चात् जिसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करना हो उस पत्नीकी इस प्रकार स्तुति ( प्रशंसा ) करे - ] ' यह मेरी पत्नी संसारकी समस्त स्त्रियोंमें लक्ष्मी-स्वरूपा है; क्योंकि इसके वस्त्रमें रजस्वलापनके चिह्न स्पष्ट दिखायी देते सा हैं । ' तदनन्तर [ जब वह ] रजस्वला एवं यशस्विनी पत्नी [ तीन रातके वोप -बाद स्नान कर ले तब उस ] के पास जाकर कहे - [ आज हम दोनोंको इत्य वह कार्य करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति होती है ] ॥ ६ ॥ व
अथ यदि कदाचिदुदक आत्मा- | यदि कभी जलमें [ वीर्य इच्छा करे स्खलित हो जानेपर वहाँ ] अपने- । नमात्मच्छायां पश्येत्तत्राप्यभिम- को – अपनी छाया को देखे तब इच्छा ' मयि तेजः ' इत्यादि मन्त्र से जलको यदि य न्त्रयेतानेन मन्त्रेण मयि तेज इति । अभिमन्त्रित करे । बना स्वरूप * इस मन्त्रद्वारा दो कार्य किये जाते हैं— वीर्यका आदान और मार्जन । करे । हाथमें लेना आदान है और भौंहों अथवा स्तनोंके बीचमें उसे लगाना मार्जन है । इन कार्योंकी दृष्टिसे मन्त्रके भी दो भाग हो जाते हैं । ' यन्मे ' से लेकर ' आददे ' तक आदान - मन्त्र है और ‘ पुनर्माम् ' से लेकर ' निमृज्यात् ' तक मार्जन - मन्त्र ।
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[ अध्याय६ र ' पुनर्मास् नात् ' तक मन्त्र र्यको दोनों बीचमें ये मयि श्री वा नं यशस्वि-अपनी परछाई देवगण मुझमें रें । ' [ तत्पश्चात् प्रकार स्तुति स्त्रियोंमें लक्ष्मी-दिखायी देते - [ तीन रातके ज हम दोनोंको 11 जल में [ वीर्यं वहाँ ] अपने-देखे मन्त्र से जलको न और मार्जन | गाना मार्जन है । से लेकर ' आददे ' क मार्जन - मन्त्र | ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ श्रीर्ह वा एषा पत्नी स्त्रीणां मध्ये यद्यस्मान्मलोद्वासा उद्गत-मलवद्वासास्तस्माचां मलोद्वाससं यशस्विनीं श्रीमतीमभिक्रम्या-मिगस्योपमन्त्रयेतेदमद्यावाभ्यां
कार्य यत् पुत्रोत्पादनमिति ।
त्रिरात्रान्त प्राप्लुताम् ॥ ६ ॥ ।
१३४३ [ जिसके गर्भ से पुत्रकी उत्पत्ति करनी हो उस पत्नीकी स्तुति इस प्रकार करे - ] यह पत्नी सब स्त्रियों-में लक्ष्मीस्वरूपा है, क्योंकि यह मलोद्वासा है, रजस्वला होनेके कारण इसके वस्त्रमें रजके चिह्न स्पष्ट दीखते हैं । अत: उस मलो-द्वासा ( रजस्वला ), यशस्विनी श्रीमती पत्नीके पास, जब वह तीन रातके बाद स्नान करके शुद्ध हो गयी हो, जाकर उससे उपमन्त्रणा करे – कहे — ' आज हम दोनोंको यह करना है, जिससे पुत्रकी उत्पत्ति हो ' ॥ ६ ॥
सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ॥ ७ ॥
वह पत्नी यदि इस पतिको मैथुन न करने दे तो पति उसे उसकी इच्छाके अनुसार वस्त्र, आभूषण आदि देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे । इतने पर भी यदि वह इसे मैथुनका अवसर न दे तो वह पति इच्छानुसार दण्डका भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक समागम करे । यदि यह भी सम्भव न हो तो कहे ' मैं तुझे शाप देकर दुर्भगा ( वन्ध्या ) बना दूँगा । ' ऐसा कहकर वह उसके निकट जाय और ' मैं अपनी यश: -स्वरूप इन्द्रियद्वारा तेरे यशको छीने लेता हूँ । ' इस मन्त्रका उच्चारण करे । इस प्रकार शाप देनेपर वह अयशस्विनी ( वन्ध्या अथवा दुभंगा ) हो ही जाती है ॥ ७ ॥
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१३४४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय सा वेदस्मै न दद्यान्मैथुनं कर्तु काममेनामवक्रीणीयादाभरणा-दिना ज्ञापयेत् । तथापि सा नैव दद्यात् काम-मेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपह त्यातिक्रामे मैथुनाय । शस्यामि त्वां दुर्भगांकरिष्या-मीति प्रख्याप्य तामनेन मन्त्रेणो-पगच्छेत् - ' इन्द्रियेण ते यशसा यश आददे ' इति । सा तस्मात्त-दभिशापाद् वन्ध्या दुर्भगेति ख्यातायशा एव भवति ॥ ७ ॥
६ वह ( धर्म ) पत्नी यदि ब्राह्मण | पतिको मैथुन न करने दे तो इसवह इति आभूषण आदिके द्वारा उसपर अपना प्रेम प्रकट करे । भवतः यदि वैसा करनेपर भी वह मैथुनका अवसर न दे तो पति अपनी इच्छा के अनुसार दण्ड मुखेन भय दिखाकर उसके साथ बलपूर्वक मैथुन के लिये प्रयत्न करे । दङ्गात [ यह भी सम्भव न हो तो? योज ' मैं तुझे शाप दे दूँगा, दुर्भगा व ( वन्ध्या अथवा भाग्यहीना ) बना मुझे दूँगा ' ऐसा कहकर ' मैं अपने यशो- करके रूप इन्द्रिय से तेरे यशको छीन लेता करते । हूँ ' इस मन्त्रका पाठ करते हुए होतें ह उसके पास जाय । उस अभिशापसे अङ्गों क वह ' दुभंगा ' एवं ' वन्ध्या ' कही हरिणी जानेवाली अयशस्विनी ही हो उन्मत्त | जाती है ॥ ७ ॥ स
काम सा चेदस्मै दद्यादिन्द्रियेण ते यशसा यश निष्ठा आदधामीति यशस्विनावेव भवतः ॥ ८ ॥
संधा वह पत्नी यदि उस पतिको मैथुनका अवसर दे तो उसे आशीर्वाद देते हुए कहे — ' मैं अपनी यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें यशकी ही स्थापना दिम करता हूँ । ' तब वे दोनों दम्पति यशस्वी ही होते हैं ॥ ८ ॥
सा चेदस्मै दद्यादनुगुणैव: । वह पत्नी यदि इस पतिको नि मैथुनका अवसर दे — पतिके स्याद् मर्तुस्तदानेन सर्वथा अनुकूल हो रहे, तब पति तें मन्त्रेणोपगच्छेत् ' इन्द्रियेण ' मैं यशोरूप इन्द्रियद्वारा तुझमें ' ते यशसा यश आदधामि ' यशकी ही स्थापना करता हूँ उसके