बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1361–1370
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1361–1370
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[ अध्याय६ पत्नी यदि इस करने दे तो वह 5 द्वारा उसपर करे । करनेपर भी वह - न दे तो पति अनुसार दण्डका के साथ बलपूर्वक करे । भव न हो तो! दे दूँगा, दुभंगा भाग्यहीना ) बना ' मैं अपने यशो-यशको छीन लेता पाठ करते हुए । उस अभिशापसे वं ' वन्ध्या ' कही शस्विनी ही हो यशसा यश 11 तो उसे आशीर्वाद यशकी ही स्थापना ८ ॥ यदि इस पतिको सर दे - पतिके ही रहे, तब पति इन्द्रियद्वारा तुझमें पना करता हूँ ' ठ करते हुए उसके ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४५ इति तदा यशस्विनावेवोभावपि । समीप जाय । तव वे दोनों दम्पति यशस्त्री ( सन्तानवान् ) ही होते भवतः ॥ ८ ॥ हैं ॥ ८ ॥
wwwwww स यामिच्छेत् कामयेत मेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुख ँ संधायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपेदङ्गा-दङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे । स त्वमङ्गकषा-योऽसि दिग्धविद्धामिव मादयेमाममं मयीति ॥६ ॥
वह पुरुष अपनी जिस पत्नीके सम्बन्ध में ऐसी इच्छा करे कि यह मुझे हृदयसे चाहे, उसको योनिमें अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके और अपने मुखसे उसके मुखको मिलाकर उसके उपस्थभागका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे - ' हे वीर्यं! तुम मेरे प्रत्येक अङ्गसे प्रकट होतें हो, विशेषतः हृदयसे नाड़ीद्वारा तुम्हारा प्रादुर्भाव होता है, तुम मेरे अङ्गोंके रस हो । अतः जिस प्रकार विष लगाये हुए बाणसे घायल हुई हरिणी मच्छित हो जाती है, उसी प्रकार तुम मेरी इस पत्नी को मेरे प्रति उन्मत्त बना दो - इसे मेरे अधीन कर दो ' ॥ ६ ॥
सयां स्वभार्यामिच्छेदियं मां वह पुरुष अपनी जिस पत्नी के सम्बन्ध में ऐसी इच्छा करे कि यह कामयेतेति तस्यामर्थं प्रजननेन्द्रियं मेरे प्रति कामनायुक्त हो - मुझे मन-से चाहने लगे, उसको योनिमें निष्ठाय निक्षिप्य मुखेन मुखं अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुख से अपना मुख मिलाकर संघायोपस्थमस्या अभिमृश्य जपे - उसके उपस्थका स्पर्श करते हुए इस मन्त्रका जप करे - ' अङ्गाद-दिमं मन्त्रमङ्गादङ्गादिति ॥९ ॥ ङ्गादित्यादि ' ॥ ६ ॥
अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुख ँ संधायाभिप्राण्यापान्यादिन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदद इत्यरेता एव भवति ॥ १० ॥
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१३४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय६ अपनी जिस पत्नी के विषय में ऐसी इच्छा हो कि वह गर्भधारण ब्राह्मण तो उसकी योनि में अपनी जननेन्द्रियको स्थापित करके उसके मुखसे न करे । मुख मिलाकर अभिप्राणन ' कर्म करके अपानन क्रिया करे और अपना प्रथ ' इन्द्रियस्वरूप वीर्य के द्वारा मैं तेरे रेतसुको ग्रहण करता हूँ ' ऐसा कहे- ' पर वह रेतोहीन ही हो जाती है- गर्भिणी नहीं होती ॥ १०, ॥ करने- मिति अथ यामिच्छेन्न गर्भ दधीत पुरुष अपनी जिस पत्नी के पूर्ववि विषय में ऐसी इच्छा करे कि यह न धारयेद् गर्भिणी मा भूदिति गर्भ धारण न करे - गर्भवती न ' इन्द्रि तस्यामर्थमिति पूर्ववत् । अभिप्राण्याभिप्राणनं प्रथमं कृत्वा पश्चादपान्यात् – ' इन्द्रियेण ते रेवसा रेत आददे ' इत्यनेन मन्त्रेणारेता एव भवति न गर्भिणी भवतीत्यर्थः ॥ १० ॥
हो तो वह उसकी योनि में इत्यादि आदध अर्थं पूर्ववत् समझ लेना चाहिये । अभिप्राण्य - प्रथम अभिप्राणन भवति करके पश्चात् ' इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे ' इस मन्त्रके द्वारा अपानन करे । इससे वह अरेता पात्रे ही हो जाती है । तात्पर्य यह है कि तसि गर्भवती नहीं होती ॥। ११ ॥ न्मम अथ यामिच्छेद् दधीतेति तस्यामर्थं निष्ठाय मम मुखेन मुख ँ संधायापान्याभिप्राण्यादिन्द्रियेण ते समि रेतसा रेत आदधामीति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥ समि
पुरुषको अपनी जिस पत्नीके सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ एष धारण करे, वह उसकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुखसे मुख मिलाकर पहले अपानन ' क्रिया करके पश्चात् अभिप्राणन कर्म ब्राह करे और कहे — ' मैं इन्द्रियरूप वीर्यंके द्वारा तेरे रेतसुका आधान करता हास हूँ । ' ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ ११ ॥
१. पुरुष अपनी शिश्नेन्द्रियद्वारा स्त्रीकी योनिमें जो वायुको प्रविष्ट करता पति है, उसे ‘ अभिप्राणन ' कर्म कहते हैं और वह जा अपना शिश्नेन्द्रियका बाहर कच्चे कहते निकालते हुए उस वायुको भी बाहर निकाल देता है, उ उस क्रियाको ' अपानन ' अर्था हैं । ९, २. भावनाद्वारा पहले स्त्रीके रेतसयुक्त वायुका आकर्षण करना यहाँ प्रथम बाण ' अपानन - क्रिया ' है । अभिप्राणन कर्म तो पूर्ववत् ही है । रखत
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[ अध्याय ६ गर्भधारण 04 उसके न करे मुखसे अपना करे और कहे-ता हूँ ', ऐसा करने-॥ १० ॥
नी जिस पत्नीके इच्छा करे कि यह करे - गर्भवती न की योनि में इत्यादि झ लेना चाहिये । - प्रथम अभिप्राणन इन्द्रियेण ते रेतसा स मन्त्रके द्वारा इससे वह अरेता तात्पर्य यह है कि ती ॥ १ ९ ॥ मर्थ निष्ठाय दिन्द्रियेण ते न ॥ ११ ॥
हो कि यह गर्भ पित करके उसके त् अभिप्राणन कर्म का आधान करता युको प्रविष्ट करता नेन्द्रियका बाहर क्रियाको ' अपानन ' T करना यहाँ प्रथम ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३४७ अथ यामिच्छेद् दधीत गर्भ-मिति तस्यामर्थमित्यादि पूर्ववत् । पूर्वविपर्ययेणापान्याभिप्राण्यात्-' इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि ' इति गर्भिण्येव भवति ॥ ११ ॥
जिस पत्नी के सम्बन्धमें ऐसी इच्छा हो कि यह गर्भ धारण करे उसकी योनिमें... इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । पूर्वं मन्त्रके विपरीत पहले अपानन क्रिया करके ' इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आदधामि ' इस मन्त्रके द्वारा अभिप्राणन कर्म करे | ऐसा करनेसे वह गर्भवती ही होती है ॥ अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादाम-पात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोम शरबर्हिस्तीर्खा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुया-न्मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धे ऽहौषीः पुत्रपशू स्त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धे ऽहौषीराशापराकाशौ त आददेऽसाविति सवा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात् प्रैति यमेवंविद ब्राह्मणः शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोप-हासमिच्छेत ह्येवंवित् परो भवति ॥ १२ ॥
जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो, वह ' पति उस जारसे द्वेषभाव रखकर उसे दण्ड देना चाहे तो वह मिट्टीके कच्चे बर्तनमें [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि- स्थापन करके विपरीत क्रमसे ' अर्थात् दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्रभावसे सरकंडों का बर्हिष बिछाकर उनकी सींकोंको घीसे भिगोकर उनके अग्रभागको विपरीत दिशामें हो चाणाकार रखते हुए उस अग्निमें उनकी चार आहुतियां दे । उन आहुतियोंके मन्त्र
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१३४८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ ब्राह्मण इस प्रकार हैं— ] ‘ मम समिद्धेऽहौषीः प्राणापानी त आददे [ ह मन्त्र पढ़कर ‘ फट् ' शब्दका उच्चारण करके पहली आहुति दे, [ आहुति के वेताः अन्तमें ] ' असौ मम शत्रुः ' इस प्रकार बोलकर शत्रुका नाम लेना चाहिये । पूर्ववत् ‘ मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशू स्त आददे ' यह मन्त्र बोलकर दूसरी लोमा: आहुति दे और अन्त में ' असौ... ' कहकर शत्रुका नाम ले | इसी प्रकार ‘ मम समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददे ' यह मन्त्र बोलकर तीसरी आहुति जुहुया दे और अन्तमें ' असौ ' कहकर शत्रुका नाम ले तथा ' मम समिद्धेऽहौषी-राशापराकाशौ त आददे ' यह मन्त्र पढ़कर चौथी आहुति दे और पूर्ववत् आहुत ' असौ ' कहकर शत्रुके नामका उच्चारण करे । इस प्रकार मन्थ कर्मको जाननेवाला प्राणदर्शी विद्वान् ब्राह्मण जिसको शाप देता है, वह इन्द्रिय- ग्रहणं रहित एवं पुण्यहीन होकर इस लोकसे चल बसता है । अत: परस्त्रीगमनके इस भयंकर परिणामको जाननेवाला पुरुष किसी श्रोत्रियकी पत्नी से समा-गमकी तो बात ही क्या है, परिहासकी भी इच्छा न करे; क्योंकि उक्त शपति अभिचार कर्मको जाननेवाला श्रोत्रिय श्रथ पुनर्यस्य जायायै जार उपपतिः स्यात्तं चेद् द्विष्यादभि-चरिष्याम्येनमिति मन्येत तस्येदं कर्म 1 । आमपात्रेऽग्निमुपसमाधाय सर्व प्रतिलोमं कुर्यात्तस्मिन्नग्ना-उसका शत्रु बन जाता है ॥ १२ ॥
अब अभिचार कर्म बताते हैं । कर्मा ह जिस गृहस्थ विद्वान्की पत्नीका दारेण कोई जार उपपति हो, वह पति उस जारसे यदि द्वेष रखता हो कुर्या तथा इसके प्रति अभिचारका प्रयोग करूँगा, ऐसा निश्चित संकल्प देवं रखता हो तो उसके लिये यह कर्म है । वह मिट्टीके कच्चे बर्तन में भवत [ पञ्चभूसंस्कारपूर्वक ] अग्नि-स्थापन करके सारी क्रिया विपरीत क्रमसे करे; यथा ईशानसे अग्निकोण- पि * ‘ अरे! यौवन आदिसे प्रकाशित मेरी पत्नीरूप प्रज्वलित अग्निमें तूने त्रा बीर्यकी आहुति डाली है, अत: मैं तुझ अपराधी के प्राण और अपानको लिये लेता हूँ । ' चारों मन्त्रके अर्थ एक - से हैं । पहलेमें शत्रुके प्राण और अपानको, दूसरे में दिन पुत्र और पशुओंको, तीसरेमें यज्ञ और पुण्यको तथा चौथेमें प्रार्थना एवं प्रतिज्ञा-पूर्तिकी प्रतीक्षा के अपहरणकी बात कही गयी है ।
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[ अध्याय६ आददे ' [ यह दे, [ आहुति के न लेना चाहिये । बोलकर दूसरी ले । इसी प्रकार तीसरी आहुति नम समिद्धेऽहौषी-दे और पूर्ववत् रमन्थ कर्मको है, वह इन्द्रिय-तः परस्त्रीगमन के की पत्नी से समा-रे; क्योंकि उक्त जाता है ॥ १२ ॥
-कर्म बताते हैं । द्वान्की पत्नीका हो, वह पति द्वेष रखता हो भिचारका प्रयोग निश्चित संकल्प के लिये यह कर्म कच्चे बर्तन में [ क ] अग्नि-री क्रिया विपरीत शानसे अग्निकोण-ज्वलित अग्निमें तूने अपानको लिये लेता , दूसरे में -अपानको बार्थना एवं प्रतिज्ञा-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ वेताः शरभृष्टीः शरेषीकाः प्रति- । लोमाः सर्पिषाक्ता घृताभ्यक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीरित्याद्या आहुतीरन्ते सर्वासामसाविति नाम ग्रहणं प्रत्येकम् । स एष एवं विद् यं ब्राह्मणः शपति स विसुकृतो विगत पुण्य-कर्मा प्रैति । तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहास मिच्छेन्नर्मापि न कुर्यात् किमुताधोपहासं हि यस्मा-देवंविदपि तावत् परो भवति शत्रु-वतीत्यर्थः ॥ १२ ॥
१३४ ९ की ओर दक्षिणाग्र या पश्चिमाग्र भावसे बर्हिषोंका परिस्तरण करे इत्यादि । उस अग्निमें इन वाणा-कार सरकंडोंकी सींकोंका प्रतिलोम ( दक्षिणा या पश्चिमाग्र ) भावसे ही रखते हुए घीमें भिगोकर उनकी आहुति दे । ' मम समिद्धेऽहौषीः ' इत्यादि चार आहुतियाँ दे और सबके अन्त में प्रत्येकके साथ ' असौ ' बोलकर शत्रुके नामका उच्चारण करे । वह यह इस प्रकार जानने-वाला ब्राह्मण जिसे शाप देता है, वह विसुकृत- पुण्यकर्मशून्य हो इस लोकसे चल बसता है । अतः परस्त्रीगमनके ऐसे भीषण परिणाम-को जाननेवाला पुरुष श्रोत्रिय विद्वान्की पत्नीसे उपहास - परिहा सकी भी इच्छा न करे ' फिर समागमकी तो बात ही क्या है । क्योंकि ऐसे अभिचार कर्मको जानने-वाला विद्वान् भी उसका पराया अर्थात् शत्रु बन जाता है ॥ १२ ॥
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत् त्र्यहं क ँसे न पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न वृषल्युपहन्यात् त्रिरा-व्रीहीनवघातयेत् ॥ १३ ॥
त्रान्त आप्लुत्य ऋतुभाव ( रजोधर्मं ) प्राप्त हो, उसकी वह पत्नी तीन जिसकी पन्नीको न खाय और चौथे दिन स्नान के बाद ऐसा वस्त्र दिनोंतक कांसके बर्तनोंमें
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१३५० बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय पहने जो फटा न हो, साफ - सुथरा पुरुष न छुए । वह रजस्वला नारी तो उसे धान कूटने के काममें लगावे अथ यस्य जायामार्तवं विन्देह- । तुभावः प्राप्नुयादित्येवमादिग्रन्थः श्रीई वा एषा स्त्रीणामित्यतः पूर्व द्रष्टव्यः सामर्थ्यात् । त्र्यहं कंसेन पिवेदहतवासाश्च स्यात् । नैनां 1 ६ हो । इसे कोई शूद्रजातीय स्त्री ब्राह्मण या जब तीन दिन बीतनेपर स्नान कर ले जो ॥ १३ ॥ अध्यय
' अथ यस्य जायामार्तवं दोनों प विन्देत् ' इत्यादि ग्रन्थको ' श्रीर्ह वा मिलाक एषा स्त्रीणां ' इस मन्त्रभागके पहले समर्थ समझना चाहिये; क्योंकि अर्थबल-से ऐसा ही ठोक जान पड़ता है । स जिसकी पत्नीको आतंक - ऋतु- वर्णतो भाव ( रजोधर्म ) प्राप्त हो, ', उसकी वह पत्नी तीन दिनोंतक काँसेके सर्व बर्तन में न खाय और चौथे दिन स्नान करके ऐसा वस्त्र पहने जो पाचा फटा न हो, साफ - सुथरा हो । तामी स्त्रातामश्नातां च वृषलो वृषली वा स्नानके बाद और पहले भी उस नोपहन्यानोपस्पृशेत् । त्रिरात्रान्ते त्रिरात्र-व्रतसमाप्तावाप्लुत्य स्नात्वा-इतवासाः स्यादिति व्यवहितेन सम्बन्धः । तामाप्लुतां व्रीहीनव-घातयेद् व्रीह्मवघाताय तामेव विनियुञ्ज्यात् ॥ १३ ॥
स य इच्छेत् पुत्रो ब्रवीत सर्वमायुरियादिति ऋतुमती स्त्रीको कोई शूद्रजातीय जनि स्त्री या पुरुष न छुए । तीन रात बीतने पर — त्रिरात्र-व्रतकी समाप्ति होनेपर वह आप्ल-| वन - स्नान करनेके पश्चात् जो फटा द्वौ न हो, ऐसा स्वच्छ वस्त्र पहने, इस यित प्रकार व्यवधानयुक्त अहतवासा पदके साथ इस वाक्यका अन्वय अध्य है । स्नान करनेके पश्चात् उस स्त्री- दही से धान कुटावे । धान कूटनेके जन्म कार्यमें उसीको लगावे ॥ १३ ॥
द मे शुक्लो जायेत वेदमनु- यित क्षीरौदनं पाचयित्वा सर्पि- दै ष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥
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[ श्रध्याय६ जातीय स्त्री या स्नान कर ले जायामार्त न्थको ' श्री वा न्त्रभागके पहले क्योंकि अर्थबल-जान पड़ता है । आतंद - ऋतु-प्राप्त हो, उसकी दिनोंतक काँसे के और चौथे दिन वस्त्र पहने जो T फ - सुथरा हो । पहले भी उस कोई शूद्रजातीय ए । नेपर - त्रिरात्र-पर वह आप्ल-पश्चात् जो फटा वस्त्र पहने, इस [ क्त अहतवासा वाक्यका अन्वय पश्चात् उस स्त्री-वे ॥ १३ ॥
येत वेदमनु-यित्वा सर्पि-३ ॥ ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५१ जो पुरुष चाहता हो कि मेरा अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंकी दोनों पति - पत्नी दूध और चावलको मिलाकर खायँ । इससे वे उपयुक्त समर्थं होते हैं ॥ १४ ॥
स य इच्छेत् पुत्रो मे शुक्लो वर्णतो जायेत वेदमेकमनुबुवीत सर्वमायुरियाद् वर्षशतं चीरौदनं पाचयित्वा सर्पिष्यन्तमश्नीया-तामीश्वरौ समर्थों जनयितवै जनयितुम् ॥ १४ ॥
पुत्र शुक्ल वर्णका हो, एक वेदका आयुतक जीवित रहे, उस दशामें वे पकाकर खीर बना लें और उसमें घी योग्यतावाले पुत्रको उत्पन्न करने में जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र शुक्ल वर्णंका उत्पन्न हो, एक वेदका अध्ययन करे तथा पूरी आयु भर- सौ वर्षोंतक जीवित रहे तो वे दोनों पति - पत्नी दूध - चावलका खीर पकाकर उसमें घी डालकर खायँ । इससे वे वैसे पुत्रको जन्म देने में समर्थ होते हैं ॥ १४ ॥
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो जायेत द्वौ वेदावनुबुवीत सर्वमायुरियादिति दध्योदनं पाच-यित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १५ ॥
जो चाहे कि मेरा पुत्र कपिल अध्ययन करे और पूरे सौ वर्षोंतक दहीके साथ भात पकाकर उसमें घी जन्म देने में समर्थ होते हैं ॥ १५ ॥
दध्योदनं दध्ना चरुं पाच-यित्वा द्विवेदं चेदिच्छति पुत्रं तदैवमशन नियमः ॥ १५ ॥
या पिङ्गल वर्णका हो, दो वेदोंका जीवित रहे तो वह और उसकी पत्नी मिलाकर खायें । इससे वे वैसे पुत्रको दध्योदन बनाकर - दही के साथ चरु पकाकर ( दोनों दम्पति भोजन करें ) यदि द्विवेदी पुत्रको पानेकी इच्छा हो, तब ऐसे भोजनका नियम है ॥ १५ ॥
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१३५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ ब्राह्म अथ य इच्छेत् पुत्रो मे श्यामो लोहिताक्षो जायेत । वीत त्रीन् वेदाननुबुवीत सर्वमायुरिया दित्युदौदनं पाच-स यित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ ॥१६ १६ ॥ ॥ वा जो चाहे कि मेरा पुत्र श्याम वर्णं, अरुण नयन हो, तीन वेदोंका स्वाध्याय करे तथा पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी निर्भ केवल जलमें चावल पकाकर भात तैयार कर लें और उसमें घी मिलाकर चेदो उस खायँ । इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देने में समर्थ होते हैं ॥ १६ ॥ खा
केवलमेव स्वाभाविकमोदनम् ।
उदग्रहणमन्यप्रसङ्गनिवृत्य-र्थम् ॥ १६ ॥
अथ य इच्छेद् दुहिता मे केवल स्वाभाविक ही भात अथ खायँ, ' उद ' शब्दका प्रयोग दुग्ध आदि अन्य प्रसङ्गों की निवृत्तिके लिये है ॥ १६ ॥ इत
गच पण्डिता जायेत सर्वमायु-पा रियादिति तिलौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नी-शुभ यातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १७ ॥
जो चाहता हो कि मेरी पुत्री विदुषी हो और पूरे सौ वर्षोंकी आयुतक वा जीवित रहे, वह और उसकी पत्नी तिल और चावलकी खिचरी पकाकर च उसमें घी मिलाकर खायें । इससे वे उक्त योग्यतावाली कन्याको जन्म देने में समर्थ होते हैं ॥ १७ ॥
दुहितुः पाण्डित्यं गृहतन्त्र-विषयमेव वेदेऽनधिकारात् ।
तिलौदनं कुशरम् ॥ १७ ॥
अथ य इच्छेत् पुत्रो मे गृहशास्त्रमें निपुण होना ही पुत्रीका पाण्डित्य है; क्योंकि वेदमें उसका अधिकार नहीं है । तिली-दनका अर्थ है तिल - चावलकी खिचड़ी ॥ १७ ॥ घ
पण्डितो विगीतः समिति-गमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत सर्वान् वेदाननुब्रु-
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[ अध्याय६ क्षो जायेत दौदनं पाच-तवै ॥१६॥
तीन वेदोंका नौर उसकी पत्नी घी मिलाकर होते हैं ॥ १६ ॥
विक ही भात का प्रयोग दुग्ध झोंकी निवृत्तिके सर्वमायु-मन्तमश्नी-वर्षोकी आयुतक - खिचरी पकाकर कन्याको जन्म निपुण होना ही है; क्योंकि वेदमें नहीं है । तिलौ-तिल - चावल की तः समिति-वेदाननुब्रु-ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५३ वीत सर्वमायुरियादिति मा ँ सौदनं पाचयित्वा सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितत्रा औक्षेण वार्षभेण वा ॥ १८ ॥
जो चाहता हो कि मेरा पुत्र प्रख्यात पण्डित, विद्वानोंको सभामें निर्भय प्रवेश करनेवाला तथा श्रवणसुखद वाणी बोलनेवाला हो, सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करे और पूरे सौ वर्षोंतक जीवित रहे, वह पुरुष और उसकी पत्नी ओषधियोंका गूदा और चावल पकाकर उसमें घी मिलाकर खायँ । इससे वे उक्त योग्यतावाले पुत्रको जन्म देनेमें समर्थ होते हैं । उक्षा अथवा ऋषभ नामक ओषधिके गूदेके साथ खानेका नियम है ॥ १८ ॥
विविधं गीतो विगीतः प्रख्यात इत्यर्थः । समितिंगमः सभां गच्छतीति प्रगन्म इत्यर्थः पृथग्ग्रहणात् । शुश्रूषितां श्रोतुमिष्टां रमणीयां वाचं भाषिता संस्कृताया अर्थ-वत्या वाचो भाषितेत्यर्थः । मांसमिश्र मोदनं मांसौदनम् । तन्मांसनियमार्थमाह-नाना प्रकार से जिसकी महत्ता गायी जाय, वह विगीत कहलाता है । विगीत अर्थात् प्रख्यात । समि-निगम - विद्वानों की सभा में जाने-प्रगल्भ । ' समितिगमः ' का अर्थ विद्वान् या पण्डित इसलिये नहीं किया गया | कि मन्त्रमें पाण्डित्यका पृथक् ग्रहण देखा जाता है । शुश्रूषिता - सुनने-में प्रिय, रमणीयवाणीका वक्ता अर्थात् संस्कारयुक्त सार्थकवाणी बोलनेवाला । ओषधि अथवा फलके गुदेको मांस कहते है; उससे मिश्रि भातको यहीं ' मांसौदन ' कहा गया है । उस ओषधिके गुदेका नियम करनेके लिये कहते हैं - उक्षाके गूदेके साथ । गर्भाधान में समर्थ सडको उक्षा कहते हैं । उसी समान शक्तिशाली होनेसे ओषधि-श्रौक्षेण वा मांसेन । उता सेचनस- विशेषका नाम भी उक्षा है, कोषमें दो प्रकारके अर्थ मिलते हैं । कलकत्ते से प्रकाशित * ' उक्षा ' शब्दके उसे अष्टवर्गान्तर्गत ॠषभ ' नामक ' वाचस्पत्य ' नामक वृहत् संस्कृताभिधानमें
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१३५४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ श्रध्याय६ ब्राह्म मर्थः पंगवस्तदीयं मांसम् । / उसीका गूदा यहां अभीष्ट है । पूर्वोक्त सांडसे भी अधिक अवस्था वाले बैलको ऋषभ कहते हैं, उसके ऋषभस्ततोऽप्यधिकवयास्तदीय- समान शक्तिशाली ओषधिशेषका स्था नाम भी ऋषभ है । उसीके गूदे- देव को यहाँ ' आषंभ ' समझना मार्षभं मांसम् ॥ १८ ॥ चाहिये ॥ १ ॥ प्रा
-wwwwww उद ओषधिका पर्याय माना गया है— ' ऋषभ ओषधी च ' । प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान् सर विद्य मोनियर विलियम्सने अपने बृहत् संस्कृत - अंग्रेजीकोषमें इसे ' सोम ' नामक पौधेका सह पर्याय माना है । * ‘ ऋषभ ' नामक ओषधिका आयुर्वेदके अत्यन्त प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ ' सुश्रुत संहिता ' के ' सूत्रस्थान ' नामक प्रथम खण्डके ३८ वें अध्याय में ( जो करव द्रव्यसंग्रहणीयाध्याय भी कहलाता है ) सैंतीस द्रव्यगणोंके अन्तर्गत उल्लेख हुआ है । संस्क ‘ भावप्रकाश ' नामक प्रसिद्ध संग्रह ग्रन्थ में उसका वर्णन इस रूपमें आया है- से जीवकर्षभको ज्ञेयो हिमाद्रिशिखरोद्भवौ रसोतकन्दवत् कन्दौ निःसारी. सूक्ष्मपत्रकौ ॥ ऋषभो वृषशृङ्गवत् ऋषभो वृषभो वीरो विषाणी ब्राह्म इत्यपि जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदी मधुरो • पित्तदानी काशवातक्षयावहौ ॥ । ' अग इस । एक है ॥ हाथ | अप है-जीवक और ऋषभक, ( ऋषभ ) नामकी ओषधियाँ हिमालयके शिखरपर उत्पन्न होती हैं । उनकी जड़ लहसुन के सदृश होती है । दोनोंमें ही गूदा नहीं नि होता, केवल त्वचा होती है; दोनोंमें छोटी - छोटी पत्तियाँ होती हैं 1 । इनमें से ऋषभ बैलके सींगकी आकृतिका होता है । इसके दूसरे नाम हैं - वृषभ, वीर, विषाणी, पाव ब्राह्म आदि । जीवक और ऋषभ दोनों ही बलकारक, शीत, वीर्यं और कफ चे बढ़ानेवाले, मधुर, पित्त और दाहका शमन करनेवाले तथा खाँसी एवं वातरोगका श्रप नाश करनेवाले हैं । जु S ऋषभकी प्रसिद्ध अष्टवर्ग नामक ओषधियों में गणना है । भावप्रकाशकार स्व लिखते हैं-वि
जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यो ऋद्धिवृद्धिके ।
अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरका दिभिः ॥