बृहदारण्यक उपनिषद — पृष्ठ 1371–1380
बृहदारण्यक उपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1371–1380
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[ अध्याय६ अभीष्ट 2 है । धिक अवस्था कहते हैं, उसके ओषधिशेषका । उसी के गूदे-' भ ' समझना ग्रेज विद्वान् सर ' नामक पौधेका एवं प्रामाणिक अध्याय में ( जो उल्लेख हुआ है । गया है-1 1 1 1 1 लयके शिखर पर में हो गूदा नहीं । इनमेंसे ऋषभ वीर, विषाणी, वीर्यं और कफ एवं वातरोगका भावप्रकाशकार I ॥ ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५५ 2870 अथाभिप्रातरेव स्थालीपाकावृताज्यं चेष्टित्वा स्थालीपाकस्योपघातं जुहोत्यग्नये स्वाहानुमतये स्वाहा देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहेति हुत्वोद्धृत्य प्राश्नाति प्राश्येतरस्याः प्रयच्छति प्रक्षाल्य पाणी उदपात्रं पूरयित्वा तेनैनां त्रिरभ्युक्षत्युत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ प्रपूर्व्या सं जायां पत्या सहेति ॥ १६ ॥
तदनन्तर चौथे दिन प्रातःकाल ही [ संध्या आदिका अनुष्ठान करके ] पत्नी के कूटे हुए चावलोंको लेकर स्थालीपाककी विधि से घीका संस्कार करके चरु पकाकर उसका भी संस्कार करके स्थालीपाकके अन्नमें से थोड़ा - थोड़ा लेकर प्रधान आहुतियाँ दे, उनके मन्त्र इस प्रकार हैं— ' अग्नये स्वाहा, अनुमतये स्वाहा, देवाय सवित्रे सत्यप्रसवाय स्वाहा ' । इस प्रकार आहुति देकर ' स्विष्टकृत् ' होम करके स्थाली में बचे हुए चरुको एक पात्रमें निकालकर उसमें घी मिलाकर पहले पति उस अन्नको खाता है । खाकर उसी उच्छिष्ट अन्नको अपनी पत्नीके लिये देता है । तत्पश्चात् हाथ - पैर धोकर शुद्ध आचमन करके जलपात्रको भरकर उसी जलसे अपनी पत्नीका तीन बार अभिषेक हे - ' उत्तिष्ठातो विश्वावसोऽन्यामिच्छ अथाभिप्रातरेव काले ऽनघात-स्थाली-निर्वृत्तांस्तण्डुलानादाय पाकावृता स्थालीपाक विधिनान्यं चेष्टित्वाज्य संस्कारं कृत्वा चरु श्रपयित्वा स्थालीपाकस्याहुती-करे । अभिषेकका मन्त्र इस प्रकार प्रपूर्व्यां सं जायां पत्या सह ' ॥१६ ॥
तदनन्तर प्रातःकाल ही कूटने से तैयार हुए चावलोंको लेकर स्थाली-पाककी विधिसे घीका संस्कार करके चरुको पकाकर स्थालीपाककी आहुति दे । स्थालीपाकमेंसे थोड़ा - थोड़ा अन्न लेकर ' अग्नये स्वाहा ' इत्यादि मन्त्रोंसे तीन आहुतियां दे । यहाँ जुहोत्युपघातमुपहस्पोपहत्याग्नये स्वाहेत्याद्याः । गार्थः सर्वो सारी विधि अपने - अपने गृह्यसूत्रके sa । अनुसार समझनी चाहिये । विधिद्रष्टव्यो
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१३५६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय६ M: हुत्वोद्धृत्य चरुशेषं प्राश्नाति स्वयं प्राश्येतरस्याः पत्यै प्रयच्छत्युच्छिष्टम् । प्रक्षाल्य पाणी भाचम्पोदपात्रं पूरयित्वा तेनोदकेनैनां त्रिरभ्युक्षत्यनेन मन्त्रेणोत्तिष्ठत इति सकृन्मन्त्रो-च्चारणम् ॥ १ ९ ॥ हवन करके शेष चरुको ब्राह एक पात्रमें निकालकर पति स्वयं भोजन करे । भोजन करके उच्छिष्ट भाग पत्नीको अर्पण करे । तत्पश्चात् पृशि हाथ - पैर धोकर शुद्ध आचमन करके त्रि जलपात्र भरकर उसी जलसे पत्नी-का तीन बार ' उत्तिष्ठात ' इत्यादि मन्त्र द्वारा अभिषेक करे । मन्त्रका पाठ एक ही बार करना के | चाहिये ॥ १६ ॥
अथैनामभिपद्यतेऽमोऽहमस्मि सा त्व ँसा त्वमस्य-कर मोऽहं सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथिवी स्वं इति तावेहि सरभाव है सह रेतो दधावहै पु से पुत्राय इस वित्तय इति ॥ २० ॥
तीन तदनन्तर पति अपनी कामना के अनुसार पत्नीको खीर आदि भोजन करानेके पश्चात् शयनकालमें ' अमोऽहमस्मि ' इत्यादि मन्त्र पढ़कर उसका मन्त्र भग आलिङ्गन करे । [ उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है - ] ' देवि! में प्राण भग हूँ, तुम वाक् हो; तुम वाक् हो, मैं प्राण हूँ; मैं साम हूँ, तुम ऋत हो; मैं आंकाश हूँ, तुम पृथ्वी हो; अत: आओ, हम दोनों दम्पति एक दूसरेका अ आलिङ्गन करें, एक साथ रेतस् धारण करें, जिससे हमें पुरुषत्वविशिष्ट म पुत्रका लाभ हो ॥ २० ॥
श्रथैनामभिमन्त्रय तीरौदनादि यथापत्यकामं भुक्त्वेति क्रमो द्रष्टव्यः । संवेशन कालेऽमोऽह मस्मीत्यादिमन्त्रेणाभिपद्यते । २० दे तदनन्तर इस पत्नीको अभिमन्त्रित च करके जैसी संतानकी इच्छा हो, ग अ उसके अनुसार खीर आदि भोजन स करने के पश्चात् उसके साथ शयन । करे । यह क्रम समझना चाहिये ' । fa शयन - कालमें ' अमोऽहमस्मि इत्यादि मन्त्रसे पत्नीका आलिङ्गन || करे ॥ २० ॥
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[ अध्याय६ चरुको एक ति स्वयं भोजन उच्छिष्ट भाग | तत्पश्चात् आचमन करके 7 जलसे पत्नी-ष्ठत ' इत्यादि भिषेक करे । दो बार करना ना त्वमस्य-पृथिवीत्वं से पुत्राय र आदि भोजन पढ़कर उसका देवि! में प्राण म ऋत हो; मैं एक दूसरेका पुरुषत्वविशिष्ट को अभिमन्त्रित की इच्छा हो, - आदि भोजन के साथ शयन झना चाहिये । ' अमोऽहमस्मि ' नीका आलिङ्गन ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १३५७ अथास्या ऊरू विद्यापयति विजिहीथां द्यावा-पृथिवी इति तस्यामर्थं निष्ठाय मुखेन मुख ँ संधाय त्रिरेनामनुलोमामनुमाष्टि विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिशतु । आसिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातु ते । गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भ धेहिं पृथुष्टु-के । गर्भं ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥२१ ॥
तत्पश्चात् पत्नीके ऊरुद्वय ( दोनों जाँघों ) को एक दूसरेसे विलग करे । [ उस समय यह मन्त्र पढ़ना चाहिये - ] ' विजिहीथां द्यावापृथिवी इति ' ( हे ऊरुस्वरूप आकाश और पृथिवी! तुम दोनों विलग होओ ) इसके बाद पत्नीकी योनिमें अपनी जननेन्द्रिय स्थापित करके उसके मुह मुँह मिलाकर अनुलोम - क्रमसे पत्नीके [ केशादि पादान्त ] सम्पूर्णं शरीरका तीन बार मार्जन करे ] मार्जन - कालमें ' विष्णुर्योनिं कल्पयतु ' इत्यादि मन्त्रका पाठ करे, जिसका भाव इस प्रकार है-- ] ' प्रिये! सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तेरी जननेन्द्रियको पुत्रकी उत्पत्ति में समर्थं बनावें । भगवान् सूर्यं तेरे [ तथा उत्पन्न होनेवाले बालकके ] अङ्गोंको विभाग-पूर्वक पुष्ट एवं दर्शनीय बनावें । विराट् पुरुष भगवान् प्रजापति मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें वीर्यका आधान करें । भगवान् घाता मुझसे अभिन्न भावसे स्थित हो तेरे गर्भका धारण एवं पोषण करें । देवि! जिसकी भूरि - भूरि स्तुति की जाती है, वह सिनीवाली ( जिसमें चन्द्रमाकी एक कला शेष रहती है, वह अमावास्या ) तुम हो, तुम यह गर्भ धारण करो, धारण करो । देव अश्विनीकुमार ( सूर्य और चन्द्रमा ) अपनी किरणरूपी कमलोंकी माला धारण करके मुझसे अभिन्नरूपमें स्थित हो तुझमें गर्भका आधान करें ॥ २१ ॥
ऊरू विद्यापयति । तदनन्तर ' विजिहीथां द्यावापृथिवी अथास्या इस मन्त्रसे पत्नीके ऊरुद्वयको एक विजिहीथां द्यावापृथिवी इत्यनेन । दूसरे से अलग करे । ' तस्यामर्थं ' । त्रिरेनां इत्यादि मन्त्रभागका अर्थं पूर्ववत् है । तस्यामर्थमित्यादिपूर्ववत्
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१३५८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्राह्मण शिरःप्रभृत्यनुलोमा मनु माष्टि ' विष्णुर्योनि ' इत्यादि मन्त्रों में से प्रति- प्रत्येकको पढ़कर पत्नी के मस्तकसे वायु विष्णुर्यो नि मित्यादि लेकर पैरतकके अङ्गोंको तीन - तीन गर्भ अ -मन्त्रम् ॥ २१ ॥ बार मार्जन ( स्पर्श ) करे ॥ २१ ॥ वायुके
( जरा तुम ग हिरण्मयी अरणी याभ्यां निर्मन्थतामश्विनौ, सो तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतये गर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी तथा गर्भ एवं गर्भं दधामि तेऽसाविति प्राचीन कालमें ज्योतिर्मयी अरणियां थीं, जिनसे मन्थन किया । उस मन्थनसे अमृतरूप गर्भ प्रकट हुआ गर्भको हम तेरी कुक्षिमें स्थापित करते हैं । इसलिये -महीने में उत्पन्न कर सके । जैसे पृथ्वीका गर्भ अग्नि है, काले । यथाग्नि-मन्त्रे | वायुर्दिशां समि ॥ २२ ॥ गर्भ
अश्विनीकुमारोंने । उसी अमृतरूप अथ कि तू इसे दशवें जैसे स्वर्गीय भूमि संन - इन्द्रसे गर्भवती है, जैसे दिशाओं का गर्भ वायु है, उसी प्रकार मैं तुझमें पुत्ररूप गर्भ स्थापित करता हूँ, अमुक देवि! ॥ २२ ॥ पुष्य
अन्ते नाम गृह्णात्यसाविति । ' असो ' पदके द्वारा यह सूचित प्रज किया गया है कि अन्तमें पत्नीका मन -तस्याः ॥ २२ । नामोच्चारण करना चाहिये ॥ २२ ॥ वा
सुह सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति । यथा वायुः पुष्क रिणी समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु करव लेक सहावैतु जरायुणा । इन्द्रस्यायं व्रजः कृतः सार्गलः इस का सपरिश्रयः । तमिन्द्र निर्जहि गर्भेण सावरा पशु सहेति ॥ २३ ॥ प्राप
मैंन प्रसवकालमें प्रसव करनेवाली स्त्रीके ऊपर ' यथा वायु । " इत्यादि मन्त्र पढ़कर जल छिड़के । [ मन्त्रार्थं इस प्रकार है- ] ' जैसे
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[ अध्याय ६ दि मन्त्रों में से नी के मस्तक से को तीन - तीन करे ॥ २१ ॥
नामश्विनौ, यथाग्नि-वायुर्दिशां ॥२२ ॥
अश्विनीकुमारोंने उसी अमृतरूप 5 तू इसे दशवें से स्वर्गीय भूमि प्रकार मैं तुझमें द्वारा यह सूचित अन्तमें पत्नीका चाहिये ॥ २२ ॥
वायुः पुष्क-गर्भ एजतु तः सार्गलः सावरा यु......... कार हे— ] ' जैसे ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १३५ ९ SAVANT 100 वायु पोखरीके जलको सब ओरसे चञ्चल कर देती है, उसी प्रकार तेरा गर्भं अपने स्थानसे चले और जरायुके साथ बाहर निकले । इन्द्र ( प्रसूति वायुके ) लिये यह योनिरूप मार्ग निर्मित हुआ है; जो अर्गला - गर्भवेष्टन ( जरायु ) के साथ है । इन्द्र! ( प्रसव- वायो! ) उस मार्गपर पहुँचकर तुम गर्भं एवं मांसपेशीके साथ बाहर सोऽयन्तीमद्भिरभ्युच्चति प्रसव-काले सुखप्रसवनार्थमनेन मन्त्रेण । यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजत्विति ॥ २३ ॥
अथ जातकर्म-निकलो ॥ २३ ॥
प्रसवकालमें सुखपूर्वक बच्चा पैदा करनेके लिये ' यथा वायुः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः । एवा ते गर्भ एजतु ' इत्यादि मन्त्र पढ़कर प्रसव करनेवाली बीको जलसे सींचे ॥ २३ ॥
अब जातकर्मका वर्णन करते हैं-जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क आधायक से पृषदाज्य संनीय पृषदाज्यस्योपघातं जुहोत्यस्मिन् सहस्र पुष्यास मेधमानः स्वे गृहे । अस्योपसन्द्यां माच्छैत्सीत् प्रजया च पशुभिश्च स्वाहा । मयि प्राणा ँ स्त्वयि मनसा जुहोमि स्वाहा । यत् कर्मणा त्यरीरिचं यद् वा न्यूनमिहाकरम् । अग्निष्टत्स्विष्टकृद् विद्वान् स्त्रिष्ट ँ सुहुतं करोतु नः स्वाहेति ॥ २४ ॥
पुत्र उत्पन्न होनेपर पिता उसे अपनी गोदमें लेकर अग्निकी स्थापना करके कांसके कटोरे में दधिमिश्रित घी रखकर उसका थोड़ा - थोड़ा सा अंश लेकर “ अस्मिन् सहस्रम् ” इत्यादि मन्त्रोंद्वारा अग्निमें आहुति दे ॥ मन्त्रार्थं इस प्रकार हे ] अपने इस घर में पुत्ररूपसे वृद्धिको प्राप्त हुआ मैं सहस्रों मनुष्यों-का एकमात्र पोषण करनेवाला होऊँ । मेरे इस पुत्रकी संततिमें प्रजा तथा पशुओं के साथ सम्पत्तिका कभी उच्छेद न हो - स्वाहा । मुझ पितामें जो प्राण हैं, उन प्राणोंका तुझ पुत्रमें में मन - ही - मन होम करता हूँ, स्वाहा । मैंने प्रधान कर्म करनेके साथ - साथ जो कुछ अधिक कार्यं कर डाला हो
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१३६० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्राह्मण अथवा आवश्यक कर्ममें भी जो न्यूनता ( त्रुटि ) कर दी हो, हमारे कर्मको विद्वान् अग्निदेव स्विष्टकृत् ( अभीष्टसाधक ) होकर स्विष्ट उस गोर अथ द सुहुत ( न्यूनातिरिक्त दोष से रहित ) कर दें - स्वाहा ॥ २४ ॥
जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क पुत्र जन्म होनेपर अग्निस्थापन हिंतेना करके पुत्रको गोद में लेकर और श्रधाय पुत्र कसे पृषदाज्यं संनीय काँसके कटोरे में दधिमिश्रित हिरण्ये रखकर दहीको घी में मिलाकर घृत प्रत्येक संयोज्य दधि घृते पृषदाज्यश्योप- उसका थोड़ा - थोड़ा सा अंश लेकर घातं जुहोत्यस्मिन् सहस्रमित्या- ' अस्मिन् सहस्रम् ' इत्यादि अग्निके आवाप स्थान में आहुति द्यावापस्थाने ॥ २४ ॥ दे ॥ २४ ॥
गुह्य अथास्य दक्षिणं कर्णमभिनिधाय वाग् वागिति यह त्रिरथ दधि मधु घृत ँ संनीयानन्तर्हितेन जातरूपेण अ प्राशयति । भूस्ते दधामि दधामि भुवस्ते दधामि स्वस्ते वेदो दधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामीति ॥ २५ ॥ नाम
स्विष्टकृत् होमके अनन्तर पिता शिशुके दाहिने कानको अपने मुखके पास ले आकर ' वाक् वाक् वाक् ' इस प्रकार तीन बार कहे । तत्पश्चात् दही, मधु और घी एकमें मिलाकर उसे दूसरे धातुओंके मेलसे रहित श विशुद्ध सोनेकी चम्मचसे बालकको चटावे 1 | उस समय इन चार मन्त्रोंका येन पाठ करे ] ' भूस्ते दधामि ' ' भुवस्ते दधामि ' ' स्वस्ते दधामि ' ' भूर्भुवः स्वः को सवं त्वयि दधामि ॥। २५ ॥ अथास्य दक्षिणं कर्णम- तदनन्तर इस बालकके दाहिने मन्त्र तुम्ह मिनिधाय स्वं मुखं कान को अपने मुखके पास ले जाकर की बाग वागिति त्रिर्जपेत् । ' वाक् वाक् ' यह तीन बार जपे । जिरसत्प १. तीन बार कहनेका तात्पर्य यह है कि तेरी बुद्धिमें वेदत्रयीरूप बाणी- हो प्रवेश करे । २. मैं तुझमें भूर्लोककी स्थापना करता हूँ, भुवर्लोककी स्थापना करता हूँ स्वर्लोककी स्थापना करता हूँ तथा भूर्भुवः स्वः सब लोकोंकी स्थापना करता
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[ अध्याय ६ दी हो, हमारे उस होकर स्विष्ट गोर २४ ॥ नेपर अग्निस्थापन दमें लेकर और दधिमिश्रितघृत घी में मिलाकर डा सा अंश लेकर -इत्यादि मन्त्र स्थान में आहुति वात न जातरूपेण धामि स्वस्ते ते ॥ २५ ॥
नको अपने मुख क ' । तत्पश्चात् के मेल से रहित इन चार मन्त्रोंका मि ' ' भूर्भुवः स्वः बालक दाहिने के पास जाकर तीन बार जपे । वेदत्रयीरूप वाणी. स्थापना करता हूँ, करता हूँ! स्थापना ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३६१ अथ दधि मधु घृतं संनीयानन्त । तत्पश्चात् काँसके कटोरेमें दही, मधु और घी लेकर किसी दूसरे हितेनान्यवहितेन जातरूपेण द्रव्यके व्यवघानसे रहित विशुद्ध हिरण्येन प्राशयत्येतैर्मन्त्रैः सोनेकी चम्मचद्वारा ' भूस्ते ' इत्यादि मन्त्र पढ़कर वालकको प्रत्येक वस्तु प्रत्येकम् ॥ २५ ॥ चटावे ॥ २५ ॥
नाम - कर्म अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति तदस्य तद् गुह्यमेव नाम भवति ॥ २६ ॥
इसके बाद बालकका नामकरण करे । ' तुम वेद हो । ' अतः वेद यह उस बालकका गुप्त नाम ही होता है ॥ २६ ॥
अथास्य नामधेयं करोति इसके बाद इस बालकका नामकरण करे ' तुम वेद हो ' अतः वेदोऽसीति । तदस्य तद् गुह्यं वेद उस बालकका गोपनीय नाम
नाम भवति वेद इति ॥ २६ ॥ । होता है ॥ २६ ॥
अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद् यः सुदत्रः । येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति ॥ २७ ॥
तदनन्तर इस बालकको माताकी गोदमें देकर ' यस्ते स्तनः ' इत्यादि पढ़ते हुए स्तन पिलावे [ मन्त्रका भाव इस प्रकार है - ] ' हे सरस्वति! मन्त्र तथा पोषणका आधार है, जो रत्नों-तुम्हारा जो स्तन दूधका अक्षयभण्डार और उदार दानी है तथा की खान है तथा सम्पूर्ण धन राशिका जाता पोषण करती हो, इस जिसके द्वारा तुम समस्त वरणीय पर्योका शरीर में प्रविष्ट सत्पुत्रके जीवनधारणार्थं उस स्तनको तुम मेरी पत्नीके होकर इस शिशुके मुखमें दे दो ॥ २७ ॥
वृ ० उ ० ८६–
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१३६२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय अथैनं मात्र प्रदाय स्वाङ्कस्थं स्तनं प्रयच्छति यस्ते स्तन इत्यादिमन्त्रेण ॥ २७ ॥
| तदनन्तर अपने अमें ब्राह्मण: हुए इस शिशुको माताकी बैठे देकर ' यस् स्तनः गोद में निष्ठां प्र मन्त्र के द्वारा उसका ' इत्यादि स्तन बालकके तीस्पर्थः मुहमें दे ॥ २७ ॥
णस्य पुत्र अथास्य मातरमभिमन्त्रयते । इलासि मैत्रा-भवतीत्य वरुणी वीरे वीरमजीजनत् । सा त्वं वीरवती भव यास्मान् वीरवतोऽकरदिति । तं वा एतमाहुरतिपिता बताभूरतिपितामहो बताभूः परमां बत काष्ठां प्रापच्छ्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवंविदो ब्राह्मण.. स्य पुत्रो जायत इति ॥ २८ ॥
इसके बाद बालककी माताको इस प्रकार ' इलासि ' इत्यादि मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित करे [ मन्त्रका भाव इस प्रकार है ] ' हे देवि! तू ही स्तुति के कात्य योग्य मैत्रावरुणी ( अरुन्धती ) है । वीरे! तूने वीर पुत्रको जन्म देकर हमें पुत्रा वीरवान् - वीर पुत्रका पिता बनाया है, अतः तू वीरवती हो । इस बालक- औप को देखकर दूसरे लोग कहें- ' तू सचमुच अपने पिता से भी आगे बढ़ गया, शरी तू निःसंदेह अपने पितामहसे भी श्रेष्ठ निकला, तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा ब्रह्मतेजके द्वारा उन्नतिकी चरम सीमाको पहुँच गया । ' इस प्रकार विशिष्ट- पुत्रा ज्ञानसम्पन्न जिस ब्राह्मणके ऐसा पुत्र उत्पन्न होता है, वह पिता भी इसी वैया प्रकार स्तुत्य होता है ॥ २८ ॥
अथास्य मातरमभिमन्त्रयत इलासीत्यनेन । तं वा एतमाहु-रित्यनेन विधिना जातः पुत्रः पितरं पितामहं चातिशेत इति श्रिया यशसा ब्रह्मवर्चसेन परमाँ ॥ १ इसके बाद ' इलासि ' इत्यादि पुत्र मन्त्रद्वारा इस बालककी माताको पार अभिमन्त्रित करे । ' तं वा एतमाहुः पार इस वाक्यद्वारा यह बताया रुर्ण गया है कि शास्त्रीय विधिसे उत्पन्न किया हुआ पुत्र अपने पिता पुत्र और पितामहसे भी आगे बढ़ जाता पुत्र है तथा ' तू लक्ष्मी, कीर्ति तथा पुत्र | ब्रह्मचर्यके द्वारा उन्नतिकी परा
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[ अध्याय| अपने अके माताकी गोद में स्तनः ' इत्यादि का स्तन बालकके ॥ इलासि मैत्रा-वीरवतीभव माहुरतिपिता बत कांष्ठां विदो ब्राह्मण-• इत्यादि मन्त्रद्वारा व! तू ही स्तुतिके को जन्म देकर हमें हो । इस बालक-भी आगे बढ़ गया, लक्ष्मी, कीर्ति तथा इस प्रकार विशिष्ट-वह पिता भी इसी ' इलासि ' इत्यादि बालककी माताको । ' तं वा एतमाहुः ' यह बताया शास्त्रीय विधिसे आ पुत्र अपने पिता भी आगे बढ़ जाता क्ष्मी, कीर्ति तथा - उन्नतिकी परा ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३६३ निष्ठां प्रापदित्येवं स्तुत्यो भव | काष्ठाको पहुँच गया ' इस प्रकार तीत्यर्थः । यस्य चैवंविदो ब्राह्म- कहकर लोग उसकी स्तुति करते णस्य पुत्रो जायते स भवतीत्यध्याहार्यम् इति हैं । ऐसे विशिष्टज्ञानसे सम्पन्न जिस चैवं स्तुत्यो ब्राह्मणके ऐसा पुत्र होता है, वह पिता भी उस पुत्रकी भाँति ही ॥ २८ ॥ स्तुतिका पात्र हो जाता है ॥ २८ ॥
वृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये चतुर्थब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण--समस्त प्रवचनका वंश अथ वशः । पौतिमाषीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनी पुत्र गौतमी पुत्राद् गौतमीपुत्रो भारद्वाजी-पुत्राद् भारद्वाजी पुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्र औपस्वस्तीपुत्रादौपस्वस्तीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पारा. शरीपुत्रः कात्यायनीपुत्रात् कात्यायनीपुत्रः कौशिकी-पुत्रात् कौशिकीपुत्र आलम्बीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्राच्च वैयाघ्रपदीपुत्रः काण्वी पुत्राञ्च कापीपुत्राच्च कापीपुत्रः गौतमीपुत्राद् गौतमी-॥ १ ॥ आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो
पुत्रो भारद्वाजीपुत्राद् भारद्वाजीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् पाराशरीपुत्रो वात्सीपुत्राद् वात्सीपुत्रः पाराशरीपुत्रात् वार्कारुणीपुत्राद् वारुणीपुत्रो वार्का-पाराशरीपुत्रो रुणीपुत्राद् वार्कारुणीपुत्र आर्तभागीपुत्रादार्तभागी-सांस्कृतीपुत्रात् सांस्कृती-पुत्रः शौङ्गीपुत्राच्छौङ्गीपुत्रः आलम्बी-पुत्र आलम्बायनीपुत्रादालम्बायनीपुत्र जायन्तीपुत्राज्जायन्तीपुत्रो पुत्रादालम्बीपुत्रो
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१३६४ बृहदारण्यकोपनिषद् | अध्याय ६ माण्डूकायनीपुत्रान्माण्डूकायनीपुत्रो माण्डूका ब्राह्मण ण्डूकीपुत्रः शाण्डिलीपुत्राच्छाण्डिलीपुत्रो राथीतरी 94735 पुत्रसे, प पुत्राद् राथीतरीपुत्रो भालु कीपुत्राद् भालुकपुत्रः कौशिको प कौञ्चिकीपुत्राभ्यां क्रौञ्चिकीपुत्रौ वेदभृतीपुत्राद बैट. गौतमीपुत्र पुत्रसे त भृतीपुत्रः कार्शकेयीपुत्रात् कार्शकेयीपुत्रः प्राचीन योगी. पाराशरी पुत्रात् प्राचीनयोगीपुत्रः साञ्जीबीपुत्रात् साञ्जीवीपुत्रः आर्तभाग वार्कारुणी प्राश्नीपुत्रादासुरिवासिनः प्राश्नीपुत्र आसुरायणादासु- पुत्रसे, रायण आसुरेरासुरः ॥ २ ॥ याज्ञवल्क्याद् या ज्ञव पुत्रसे
माण्डूका ल्क्य उद्दालकादुद्दालको ऽरुणादरुण उपवेशेरुपवेशिः पुत्रने रा कुः कुश्रिर्वाजश्रवसो वाजश्रवा जिह्वावतो बाध्यो- पुत्रोंसे, से, काश गाजिह्वावान् बाध्योगोऽसिताद् वार्षगणादसितो साञ्जीव वार्षगणो हरितात् कश्यपाद्धरितः कश्यपः शिल्पात् य कश्यपाच्छिल्पः कश्यपः कश्यपान्नैध वेः कश्यपो उद्दालक नै विर्वाचो वागम्भिण्या अम्भिण्यादित्यादादित्या- बासे, व वार्षगण नीमानि शुक्लानि यजू ँषि वाजसनेयेन याज्ञवल्क्ये- पसे, शि नाख्यायन्ते ॥ ३ ॥ समानमा सांजीवीपुत्रात् सांजी- अम्भि
वीपुत्रो माण्डुकायनेर्माण्डू काय निर्माण्डव्यान्माण्डव्यः वाजस कौत्सात् कौत्सो माहित्थेर्मा हि त्थिर्वामकक्षायणाद् यह एक वामकक्षायणः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यो वात्स्याद् च्यसे, वात्स्यः कुः कुश्रिर्यज्ञवचसो राजस्तम्बायनाद् यज्ञ- वामक यज्ञवच वचा राजस्तम्बायनस्तुरात् कावषेयात् तुरः कावषेयः तुर • प्रजापतेः प्रजापतिर्ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे स्वयम् नमः ॥ ४ ॥ अ
अब वंशका वर्णन किया जाता है— पोतिमाषीपुत्रनं कात्यायनीपुत्रसे कात्यायनीपुत्रने, गौतमीपुत्र से गौतमीपुत्रने भारद्वाजी पुत्रसे, भारद्वाजी पुत्रते । स्त्री प्र पाराशरीपुत्रसे, पाराशरीपुत्र ने औपस्वस्तीपुत्रसे, औपस्वस्तीपुत्रने पाराशरी-